मंगलवार, 23 जुलाई 2019

दिगपाल छन्द

मुक्तक 
मापनी २२११ २२२२ २११२ २२ = २४
चौबीस मात्रिक अवतारी जातीय दिगपाल छन्द
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जीना न इसे आया, मरना न उसे भाया
हर बशर यहाँ नाखुश, संसार अजब माया
हर रोज सजाता है, सोचे कि आप सजता
आखिर न बचा पाता, नित मिट रही सुकाया
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सँग कौन कभी आता? सँग कौन कभी जाता?
अपना जिसे बताता, तम में न संग छाया
तू वृक्ष तो लगाये , फल अन्य 'सलिल' खाये
संतोष यही कर ले, सुंदर जहां बनाया
जो भी यहाँ लुटाया, ले मान वही पाया
क्यों जोड़ रहा पल-पल? कण-कण यहाँ पराया
नित जला प्राण-बाती, चुप उषा मुस्कुराती
जो कुछ रचा-सुनाया, क्यों मोल कुछ लगाया?
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भू बिछा, गगन ओढ़ा सँग पवन खिलखिलाया
मरकर हुए अमर हैं, कब काल मिटा पाया?
मत प्रेम-पंथ तजना, मत भूल भजन भजना
खुद में खुदी खुदा है, मत भूल सच भुलाया
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बहर मफऊल फ़ायलातुन मफऊल फ़ायलातुन

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