रविवार, 28 जुलाई 2019

समीक्षा - दिन कटे हैं धूप चुनते

कृति समीक्षा :
'दिन कटे हैं धूप चुनते' हौसले ले स्वप्न बुनते 
समीक्षाकार : आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
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[कृति विवरण : दिन कटे हैं धूप चुनते, नवगीत संग्रह, अवनीश त्रिपाठी, प्रथम संस्करण २०१९, आईएसबीएन ९७८९३८८९४६२१६, आकार २२ से.मी. X १४ से.मी., आवरण सजिल्द बहुरंगी, जैकेट सहित, बेस्ट बुक बडीज टेक्नोलॉजीस प्रा. लि. नई दिल्ली, कृतिकार संपर्क - ग्राम गरएं, जनपद सुल्तानपुर २२७३०४, चलभाष ९४५१५५४२४३, ईमेल tripathiawanish9@gmail.com]
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धरती के 
मटमैलेपन में 
इंद्रधनुष बोने से पहले,
मौसम के अनुशासन की 
परिभाषा का विश्लेषण कर लो। 

साहित्य की जमीन में गीत की फसल उगाने से पहले देश, काल, परिस्थितियों और मानवीय आकांक्षाओं-अपेक्षाओं के विश्लेषण का आव्हान करती उक्त पंक्तियाँ गीत और नवगीत के परिप्रेक्ष्य में पूर्णत: सार्थक हैं। तथाकथित प्रगतिवाद की आड़ में उत्सवधर्मी गीत को रुदन का पर्याय बनाने की कोशिश करनेवालों को यथार्थ का दर्पण दिखाते नवगीत संग्रह "दिन कटे हैं धूप चुनते" में नवोदित नवगीतकार अवनीश त्रिपाठी ने गीत के उत्स "रस" को पंक्ति-पंक्ति में उँड़ेला है। मौलिक उद्भावनाएँ, अनूठे बिम्ब, नव रूपक, संयमित-संतुलित भावाभिव्यक्ति और लयमय अभिव्यक्ति का पंचामृती काव्य-प्रसाद पाकर पाठक खुद को धन्य अनुभव करता है। 

स्वर्ग निरंतर 
उत्सव में है  
मृत्युलोक का चित्र गढ़ो जब,
वर्तमान की कूची पकड़े 
आशा का अन्वेषण कर लो। 
मिट्टी के संशय को समझो 
ग्रंथों के पन्ने तो खोलो,
तर्कशास्त्र के सूत्रों पर भी
सोचो-समझो कुछ तो बोलो।  
हठधर्मी सूरज के 
सम्मुख 
फिर तद्भव की पृष्ठभूमि में 
जीवन की प्रत्याशावाले
तत्सम का पारेषण कर लो।  

मानव की सनातन भावनाओं और कामनाओं का सहयात्री गीत-नवगीत केवल करुणा तक सिमट कर कैसे जी सकता है? मनुष्य के अरमानों, हौसलों और कोशिशों का उद्गम और परिणिति डरे, दुःख, पीड़ा, शोक में होना सुनिश्चित हो तो कुछ करने की जरूरत ही कहाँ रह जाती है? गीतकार अवनीश 'स्वर्ग निरंतर उत्सव में है' कहते हुए यह इंगित करते हैं कि गीत-नवगीत को उत्सव से जोड़कर ही रचनाकार संतुष्टि और सार्थकता के स्वर्ग की अनुभूति कर सकता है। 

नवगीत के अतीत और आरंभिक मान्यताओं का प्रशस्तिगान करते विचारधारा विशेष के प्रति  प्रतिबद्ध गीतकार जब नवता को विचार के पिंजरे में कैद कर देते हैं तो "झूमती / डाली लता की / महमहाई रात भर" जैसी जीवंत अनुभूतियाँ और अभिव्यक्तियाँ गीत से दूर हो जाती हैं और गीत 'रुदाली' या 'स्यापा' बनकर जिजीविषा की जयकार करने का अवसर न पाकर निष्प्राण हो जाता है। अवनीश ने अपने नवगीतों में 'रस' को मूर्तिमंत किया है-

गुदगुदाकर 
मंजरी को 
खुश्बूई लम्हे खिले, 
पंखुरी के 
पास आई 
गंध ले शिकवे-गिले,
नेह में 
गुलदाउदी 
रह-रह नहाई रात भर। 

कवि अपनी भाव सृष्टि का ब्रम्हा होता है। वह अपनी दृष्टि से सृष्टि को निरखता-परखता और मूल्यांकित करता है। "ठहरी शब्द-नदी" उसे नहीं रुचती। गीत को वैचारिक पिंजरे में कैद कर उसके पर कुतरने के पक्षधरों पर शब्दाघात करता कवि कहता है-

"चुप्पी साधे पड़े हुए हैं
कितने ही प्रतिमान यहाँ
अर्थ हीन हो चुकी समीक्षा 
सोई चादर तान यहाँ 

कवि के  मंतव्य को और अधिक स्पष्ट करती हैं निम्न पंक्तियाँ- 

अक्षर-अक्षर आयातित हैं 
स्वर के पाँव नहीं उठते हैं 
छलते संधि-समास पीर में 
रस के गाँव नहीं जुटते हैं। 
अलंकार ले 
चलती कविता 
सर से पाँव लदी। 

अलंकार और श्रृंगार के बिना केवल करुणा एकांगी है। अवनीश एकांगी परिदृश्य का सम्यक आकलन करते हैं -

सौंपकर 
थोथे मुखौटे 
और कोरी वेदना,
वस्त्र के झीने झरोखे 
टाँकती अवहेलना,
दुःख हुए संतृप्त लेकिन 
सुख रहे हर रोज घुनते। 

सुख को जीते हुए दुखों के काल्पनिक और मिथ्या नवगीत लिखने के प्रवृत्ति को इंगित कर कवि कहता है- 

भूख बैठी प्यास की लेकर व्यथा 
क्या सुनाये सत्य की झूठी कथा 
किस सनातन सत्य से संवाद हो 
क्लीवता के कर्म पर परिवाद हो 

और 
चुप्पियों ने मर्म सारा  
लिख दिया जब चिट्ठियों में, 
अक्षरों को याद आए 
शक्ति के संचार की

अवनीश के नवगीतों की कहन सहज-सरल और सरस होने के निकष पर सौ टका खरी है। वे गंभीर बात भी इस तरह कहते हैं कि वह बोझ न लगे -

क्यों जगाकर 
दर्द के अहसास को 
मन अचानक मौन होना चाहता है? 

पूर्वाग्रहियों के ज्ञान को नवगीत की रसवंती नदी में काल्पनिक अभावों और संघर्षों से रक्त रंजीत हाथ दोने को तत्पर देखकर वे सजग करते हुए कहते हैं- 

फिर हठीला 
ज्ञान रसवंती नदी में 
रक्त रंजित हाथ धोना चाहता है।  

नवगीत की चौपाल के वर्तमान परिदृश्य पर टिप्पणी करते हुए वे व्यंजना के सहारे अपनी बात सामने रखते हुए कहते हैं कि साखी, सबद, रमैनी का अवमूल्यन हुआ है और तीसमारखाँ मंचों पर तीर चला कर अपनी भले ही खुद ठोंके पर कथ्य और भाव ओके नानी याद आ रही है- 

रामचरित की 
कथा पुरानी 
काट रही है कन्नी 
साखी-शबद 
रमैनी की भी 
कीमत हुई अठन्नी 
तीसमारखाँ 
मंचों पर अब 
अपना तीर चलाएँ ,
कथ्य-भाव की हिम्मत छूटी 
याद आ गई नानी। 
और 
आज तलक 
साहित्य  जिन्होंने 
अभी नहीं देखा है,
उनके हाथों 
पर उगती अब 
कविताओं की रेखा।  

नवगीत को दलितों की बपौती बनाने को तत्पर मठधीश दुहाई देते फिर रहे हैं कि नवगीत में छंद और लय की अपेक्षा दर्द और पीड़ा का महत्व अधिक है। शिल्पगत त्रुटियों, लय भंग अथवा छांदस त्रुटियों को छंदमुक्ति के नाम पर क्षम्य ही नहीं अनुकरणीय कहनेवालों को अवनीश उत्तर देते हैं- 

मात्रापतन 
आदि दोषों के
साहित्यिक कायल हैं 
इनके नव प्रयोग से सहमीं 
कवितायेँ घायल हैं 
गले फाड़ना 
फूहड़ बातें 
और बुराई करना,
इन सब रोगों से पीड़ित हैं 
नहीं दूसरा सानी। 

'दिन कटे हैं धूप चुनते' का कवि केवल विसंगतियों अथवा भाषिक अनाचार के पक्षधरताओं को कटघरे में नहीं खड़ा करता अपितु क्या किया जाना चाहिए इसे भी इंगित करता है। संग्रह के भूमिकाकार मधुकर अष्ठाना भूमिका में लिखते हैं "कविता का उद्देश्य समाज के सम्मुख उसकी वास्तविकता प्रकट करना है, समस्या का यथार्थ रूप रखना है। समाधान खोजना तो समाज का ही कार्य है।' वे यह नहीं बताते कि जब समाज अपने एक अंग गीतकार के माध्यम से समस्या को उठता है तो वही समाज उसी गीतकार के माध्यम से समाधान क्यों नहीं बता सकता? समाधान, उपलब्धु, संतोष या सुख के आते ही सृजन और सृजनकार को नवगीत और नवगीतकारों के बिरादरी के बाहर कैसे खड़ा किया जा सकता है?  अपनी विचारधारा से असहमत होनेवालों को 'जातबाहर' करने का धिकार किसने-किसे-कब दिया? विवाद में न पड़ते हुए अवनीश समाधान इंगित करते हैं- 
स्वप्नों की 
समिधायें लेकर 
मन्त्र पढ़ें कुछ वैदिक,
अभिशापित नैतिकता के घर 
आओ, हवं करें। 
शमित सूर्य को 
बोझल तर्पण 
ायासित संबोधन,
आवेशित 
कुछ घनी चुप्पियाँ 
निरानंद आवाहन। 
निराकार 
साकार व्यवस्थित 
ईश्वर का अन्वेषण,
अंतरिक्ष के पृष्ठों पर भी 
क्षितिज चयन करें। 
अपनी बात को और अधिक स्पष्ट करते हुए नवगीतकार कहता है- 

त्रुटियों का 
विश्लेषण करतीं
आहत मनोव्यथाएँ  
अर्थहीन वाचन की पद्धति 
चिंतन-मनन करें। 
और 
संस्कृत-सूक्ति 
विवेचन-दर्शन 
सूत्र-न्याय संप्रेषण 
नैसर्गिक व्याकरण व्यवस्था 
बौद्धिक यजन करें। 

बौद्धिक यजन की दिशा दिखाते हुए कवि लिखता है -

पीड़ाओं 
की झोली लेकर 
तरल सुखों का स्वाद चखाया...
 .... हे कविता!
जीवंत जीवनी 
तुमने मुझको गीत बनाया। 

सुख और दुःख को धूप-छाँव की तरह साथ-साथ लेकर चलते हैं अवनीश त्रिपाठी के नवगीत। नवगीत को वर्तमान दशक के नए नवगीतकारों ने पूर्व की वैचारिक कूपमंडूकता से बाहर निकालकर ताजी हवा दी है। जवाहर लाल 'तरुण', यतीन्द्र नाथ 'राही, कुमार रवींद्र, विनोद निगम, निर्मल शुक्ल, गिरि मोहन गुरु, अशोक गीते, संजीव 'सलिल', गोपालकृष्ण भट्ट 'आकुल', पूर्णिमा बर्मन, कल्पना रामानी, रोहित रूसिया, जयप्रकाश श्रीवास्तव, मधु प्रसाद, मधु प्रधान, संजय शुक्ल, संध्या सिंह, धीरज श्रीवास्तव, रविशंकर मिश्र बसंत शर्मा, अविनाश ब्योहार आदि के कई नवगीतों में करुणा से इतर वात्सल्य, शांत, श्रृंगार आदि रसों की छवि-छटाएँ ही नहीं दर्शन की सूक्तियों और सुभाषितों से सुसज्ज पंक्तियाँ भी नवगीत को समृद्ध कर नई दिशा दे रही है। इस क्रम में गरिमा सक्सेना और अवनीश त्रिपाठी का नवगीतांगन में प्रवेश नव परिमल की सुवास से नवगीत के रचनाकारों, पाठकों और श्रोताओं को संतृप्त करेगा।  

वैचारिक कूपमंडूकता के कैदी क्या कहेंगे इसका पूर्वानुमान कर नवगीत ही उन्हें दशा दिखाता है-

चुभन 
बहुत है वर्तमान में 
कुछ विमर्श की बातें हों अब,
तर्क-वितर्कों से पीड़ित हम 
आओ समकालीन बनें। 

समकालीन बनने की विधि भी जान लें-

कथ्यों को 
प्रामाणिक कर दें 
गढ़ दें अक्षर-अक्षर,
अंधकूप से बाहर निकलें 
थोड़ा और नवीन बनें। 

'दर्द' की देहरी लांघकर 'उत्सव' के आँगन में कदम धरता नवगीत यह बताता है की अब परिदृश्य परिवर्तित हो गया है- 

खोज रहे हम हरा समंदर,
मरुथल-मरुथल नीर,
पहुँच गए फिर, चले जहाँ से, 
उस गड़ही के तीर  .

नवगीत विसंगतियों को नकारता नहीं उन्हें स्वीकारता है फिर कहता है- 
चेत गए हैं अब तो भैया 
कलुआ और कदीर। 

यह लोक चेतना ही नवगीत का भविष्य है। अनीति को बेबस ऐसे झेलकर आँसू बहन नवगीत को अब नहीं रुच रहा। अब वह ज्वालामुखी बनकर धधकना और फिर आनंदित होने-करने के पथ पर चल पड़ा है -

'ज्वालामुखी हुआ मन फिर से
आग उगलने लगता है जब  
गीत धधकने लगता है तब   

और 

खाली बस्तों में किताब रख 
तक्षशिला को जीवित कर दें 
विश्व भारती उगने दें हम 
फिर विवेक आनंदित कर दें
परमहंस के गीत सुनाएँ 

नवगीत को नव आयामों में गतिशील बनाने के सत्प्रयास हेति अवनीश त्रिपाठी बढ़ाई के पात्र हैं। उन्होंने साहित्यिक विरासत को सम्हाला भर नहीं है, उसे पल्लवित-पुष्पित भी किया है। उनकी अगली कृति की उत्कंठा से प्रतीक्षा मेरा समीक्षक ही नहीं पाठक भी करेगा। 
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[संपर्क: आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल', विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१, चलभाष ७९९९५५९६१८, ईमेल : salil.sanjiv@gmail.com]

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