गुरुवार, 28 सितंबर 2017

hindi ke naye chhand 6- kakhara chhand

हिंदी के नए छंद ६ 
पाँच मात्रिक याज्ञिक जातीय ककहरा छंद
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पहली बार हिंदी पिंगल की आधार शिला गणों को पदांत में रखकर छंद निर्माण का प्रयास है। माँ सरस्वती की कृपा से अब तक ३ मात्रा से दस मात्रा तक में २०० से अधिक नए छंद अस्तित्व में आ चुके हैं। भानु जी के अनुसार छंद रचना हेतु कम से कम ७ मात्रा की पंक्तियाँ आवश्यक हैं। माँ सरस्वती की कृपा से यहाँ ५ मात्राओं की पंक्तियों से बननेवाले १० छंद क्रमश: प्रस्तुत किये जा रहे हैं। छंद रचना सीखने के इच्छुक रचनाकार इन्हें रचते चलें तो सहज ही कठिन छंदों को रचने की सामर्थ्य पा सकेंगे। ५ मात्रिक भवानी, राजीव, साधना, हिमालय व आचमन छंदों के बाद प्रस्तुत है ककहरा छंद। 
ककहरा छंद
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विधान:
प्रति पद ५ मात्राएँ।
पदादि: नगण।
पदांत: सगण।
सूत्र: न ग = १११ २।
ल स = १ ११२।
उदाहरण:
गीत-
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कमलिनी
खिल रही।
.
दिन हुआ
जग उठो।
तम मिटा
सँग मिलो।
कुमुदिनी
मिल रही
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अनमनी
सुबह को,
हुलसते
सपन दो।
खुद खुशी
झर रही
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खत लिखे
गुल खिले।
लब हँसे
मन मिले।
नद नदी
गह रही
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