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रविवार, 1 जनवरी 2017

kavita

नए साल की पहली रचना-
कलह कथा 
*
कुर्सी की जयकार हो गयी, सपा भाड़ में भेजें आज 
बेटे के अनुयायी फाड़ें चित्र बाप के, आये न लाज 

स्वार्थ प्रमुख, निष्ठा न जानते, नारेबाजी शस्त्र हुआ 
भीड़तंत्र ही खोद रहा है, लोकतंत्र के लिए कुआं 

रंग बदलता है गिरगिट सम, हुआ सफेद पूत का खून
झुका टूटने के पहले ही बाप, देख निज ताकत न्यून   

पोल खुली नूरा कुश्ती की, बेटे-बाप हो गए एक 
चित्त हुए बेचारे चाचा, दिए गए कूड़े में फेंक 

'आजम' की जाजम पर बैठे, दाँव आजमाते जो लोग 
नींव बनाई जिनने उनको ठुकराने का पाले रोग 

'अमर' समर में हों शहीद पछताएँ, शत्रु हुए वे ही
गोद खिलाया जिनको, भोंका छुरा पीठ में उनने ही 

जे.पी., लोहिया, नरेन्द्रदेव की, आत्माएँ करतीं चीत्कार 
लालू, शरद, मुलायम ने ही सोशलिज्म पर किया प्रहार 

घर न घाट की कोंग्रेस के पप्पू भाग चले अवकाश 
कहते थे भूकम्प आएगा, हुआ झूठ का पर्दाफाश 

अम्मा की पादुका उठाये हुईं शशिकला फिर आगे 
आर्तनाद ममता का मिथ्या, समझ गए जो हैं जागे  

अब्दुल्ला कर-कर प्रलाप थक-चुप हो गए, बोलती बन्द 
कमल कर रहा आत्मप्रशंसा, चमचे सुना रहे हैं छंद 

सेनापति आ गए नए हैं, नया साल भी आया है 
समय बताएगा दुश्मन कुछ काँपा या थर्राया है?

इनकी गाथा छोड़ चलें हम,घटीं न लेकिन मिटीं कतार 
बैंकों में कुछ बेईमान तो मिले मेहनती कई हजार

श्री प्रकाश से नया साल हो जगमग करिये कृपा महेश 
क्यारी-क्यारी कुसुम खिलें नव, काले धन का रहे न लेश 

गुप्त न रखिये कोई खाता, खुला खेल खेलें निर्भीक 
आजीवन अध्यक्ष न होगा, स्वस्थ्य बने खेलों में लीक 

*** 

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