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शनिवार, 14 जनवरी 2017

"साइकिल" जो किसी फेरारी, लैंबॉर्गिनी , बुगाटी या रोल्स रायल से कीमती है !

व्यंग

"साइकिल" जो किसी फेरारी, लैंबॉर्गिनी , बुगाटी या रोल्स रायल से कीमती है !

विवेक रंजन श्रीवास्तव
ओ बी ११ , विद्युत मण्डल कालोनी , रामपुर जबलपुर
९४२५८०६२५२

            हमारी संस्कृति में पुत्र की कामना से बड़े बड़े यज्ञ करवाये गये हैं . आहुतियो के धुंए के बीच प्रसन्न होकर अग्नि से यज्ञ देवता प्रगट हुये हैं और उन्होने यजमान को पुत्र प्राप्ति के वरदान दिये . यज्ञ देवता की दी हुई खीर खाकर राजा दशरथ की तीनो रानियां गर्भवती हुईं और भगवान राम जैसे मर्यादा पुरोषत्तम पुत्र हुये जिन्होने पिता के दिये वचन को निभाने के लिये राज पाट त्याग कर वनवास का रास्ता चुना . आज जब बेटियां भी बेटो से बढ़चढ़ कर निकल रहीं है , पिता बनते ही हर कोई फेसबुक स्टेटस अपडेट करता दीखता है " फीलिंग हैप्पी " साथ में किसी अस्पताल में एक नन्हें बच्चे की माँ के संग तस्वीर लगी होती है .  सैफ अली खान जैसे तो तुरत फुरत मिनटो में अपने बेटे का नामकरण भी कर डालते हैं , और हफ्ते भर में ही बीबी को लेकर नया साल मनाने भी निकल पड़ते हैं .  अपनी अपनी केपेसिटी के मुताबिक खुशियां मनाई जाती हैं ,  मिठाईयां बांटी जाती हैं . कोई जरूर खोज निकालेगा कि अखिलेश के होने पर सैफई में मुलायम ने कितने किलो मिठाईयाँ बाँटी थी . ये और बात है कि जहाँ राम के से बेटे के उदाहरण हैं , वहीं अनजाने में ही सही पर अश्वमेघ यज्ञ के घोड़े को बांधकर लव कुश द्वारा पिता की सत्ता को चुनौती देने का प्रसंग भी रामायण में ही मिल जाता है .तो दूसरी ओर गणेश जी द्वारा पिता शिव को द्वार पर ही रोक देने की चुनौती का प्रसंग भी प्रासंगिक है .तो दूसरी ओर हिरणाकश्यप जैसे राक्षस के यहाँ प्रहलाद से धार्मिक पुत्र होने और दूसरी ओर धृतराष्ट्र की दुर्योधन के प्रति अंध आसक्ति के उदाहरण हैं .लगभग हर धर्म में परमात्मा को पिता की संज्ञा दी जाती है .  पिता के प्रति श्रद्धा भाव को व्यक्त करने के लिये पश्चिमी सभ्यता में फादर्स डे मनाने की परंपरा लोकप्रिय है . व्यवसायिकता और पाश्चात्य अंधानुकरण को आधुनिकता  का नाम देने के चलते हम भी अब बड़े गर्व से फादर्स डे मनाते हुये पिता को डिनर पर ले जाते हैं या उनके लिये आन लाइन कोई गिफ्ट भेजकर गर्व महसूस करने लगे हैं .  
            पिता पुत्र के संबंधो को लेकर अनुभव के आधार पर तरह तरह की लोकोक्तियां और कहावतें प्रचलित हैं .मुलायम अखिलेश प्रसंग ने सारी लोकोक्तियो और कहावतों को प्रासंगिक बना दिया है .  कहा ये जाता है कि जब पुत्र के पांव  पिता के जूते के नाप के हो जायें तो पिता को पुत्र से मित्र वत् व्यवहार करने लगना चाहिये . जब पुत्र पिता से  बढ़ चढ़ कर निकल जाता है तो कहा जाता है कि "बाप न मारे मेढ़की, बेटा तीरंदाज़" . यद्यपि बाप से बढ़कर यदि बेटा निकले तो शायद सर्वाधिक खुशी पिता को ही होती है , क्योकि पिता ही होता है जो सारे कष्ट स्वयं सहकर चुपचाप पुत्र के लिये सारी सुविधा जुटाने में जुटा रहता है . पर यह आम लोगो की बातें हैं . पता नही कि अखिलेश और मुलायम  दोनो मे से तीरंदाज कौन है ? एक कहावत है "बाढ़े पूत पिता के धरमे , खेती उपजे अपने करमे" अर्थात पिता के लोकव्यवहार के अनुरूप पुत्र को विरासत में सहज ही प्रगति मिल जाती है पर खेती में फसल तभी होती है जब स्वयं मेहनत की जाये . "बाप से बैर, पूत से सगाई"  कहावत भी बड़ी प्रासंगिक है एक चाचा इधर और एक उधर दिखते हैं . "बापै पूत पिता पर थोड़ा, बहुत नहीं तो थोड़ा -थोड़ा"  कहावत के अनुरूप अखिलेश मुलायम को उन्ही की राजनैतिक  चालो से पटकनी देते दिख रहे हैं . सारे प्रकरण को देखते हुये लगता है कि "बाप बड़ा  न भइया, सब से बड़ा रूपइया" सारे  नाते रिश्ते बेकार, पैसा और पावर ही आज सब कुछ है . आधुनिक प्रगति की दौड़ में वो सब बैक डेटेड दकियानूसी प्रसंग हो चुके हैं जिनमें पिता को आश्वस्ति देने के लिये भीष्म पितामह की सदा अविवाहित रहने की प्रतिज्ञा , या पुरू द्वारा अपना यौवन पिता ययाति को दे देने की कथा हो .  
            आधुनिकता में हर ओर नित  नये प्रतिमान स्थापित हो रहे हैं , अखिलेश मुलायम भी नये उदाहरण नये समीकरण रच रहे हैं .समाजवादी पार्टी का चुनाव चिन्ह "साइकिल" ,किसी फेरारी, लैंबॉर्गिनी , बुगाटी या रोल्स रायल से कीमती बन चुकी है . बड़े बड़े वकील पिता पुत्र की ओर से चुनाव आयोग के सामने अपने अपने दावे प्रति दावे , शपथ पत्रो और साक्ष्यो के अंबार लगा रहा है . अपने अपने स्वार्थो में लिपटे सत्ता लोलुप दोनो धड़ो के साथ दम साधे चुनाव आयोग के फैसले के इंतजार में हैं .
  
विवेक रंजन श्रीवास्तव
ओ बी ११ , विद्युत मण्डल कालोनी , रामपुर जबलपुर
९४२५८०६२५२




1 टिप्पणी:

POOJA... ने कहा…

ये साइकिल किसको मिलेगी ये तो नहीं जानती पर हाँ आपका ये लेख/व्यंग्य पढ़कर मज़ा जरुर आ गया... एक कहावत और भी तो थी की "बाप बड़ा न भैया, सबसे बड़ा रूपया"... हाँ यहाँ रूपये की जगह सत्ता और कुर्सी ने ले ली है... पर सत्ता और कुर्सी जिसके पास रहेगी रुपया भी तो वहीँ रहेगा...
और आपका पता पढ़कर और भी अच्छा लगा... बहुत वक़्त गुज़ारा है जबलपुर में, और रामपुर, M.P.E.B. कॉलोनी, शक्ति भवन... वाह... क्या आज भी वहां सब वैसा ही है???