रविवार, 30 नवंबर 2014

नवगीत:
अनेक वर्णा पत्तियाँ हैं
शाख पर तो क्या हुआ?
अपर्णा तो है नहीं अमराई
सुख से सोइये

बज रहा चलभाष सुनिए
काम अपना छोड़कर
पत्र आते ही कहाँ जो रखें
उनको मोड़कर
किताबों में गुलाबों की
पंखुड़ी मिलती नहीं
याद की फसलें कहें, किस नदी
तट पर बोइये?

सैंकड़ों शुभकामनायें
मिल रही हैं चैट पर 
सिमट सब नाते गए हैं
आजकल अब नैट पर
ज़िंदगी के पृष्ठ पर कर
बंदगी जो मीत हैं 
पड़ गये यदि सामने तो
चीन्ह पहचाने नहीं  
चैन मन का, बचा रखिए
भीड़ में मत खोइए
***

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