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मंगलवार, 12 मार्च 2013

चिंतन सलिला: १ महा शिव रात्रि :

चिंतन सलिला: १
महा शिव रात्रि :
यह स्तम्भ चौपाल है जहाँ आप स्वस्थ्य चर्चा कर सकते हैं बिना किसी संकोच और पूर्वाग्रह के--
१. वर्तमान परिवेश में धार्मिक पर्वों और धार्मिक साहित्य की प्रासंगिकता?
२. शिव का स्वरूप और अवदान...
स्वागत है आपके विचारों का...
*
इंदिरा प्रताप : 
प्रिय संजीव भाई ,
महा शिवरात्री पर आपका यह योग दान मुझे बहुत सराहनीय लगा ,मैं ऐसी ही  कल्पना कर रही थी कि आप कुछ अवश्य लिखेंगे | मेरे लिय धार्मिक पर्वों का बहुत महत्त्व है शायद इसका कारण है कि ये हमें अपनी जड़ों से बांधे रखने का, आधुनिकता के इस युग में एक एक सशक्त माध्यम है | मेरे विचार से हमारे मनीषियों ने जो आचार - विचार बनाए थे वह देश और काल के माप दंड पर अच्छी तरह तोल कर बनाए थे | मैं मानती हूँ कि समय के साथ परिवर्तन अवश्यंभावी होता है और समय के साथ चलने के लिए उन्हें बदलना ही चाहिए | लेकिन पुरातन सब त्यागने योग्य है मैं नहीं मानती | सार - सार ग्रहण करने  की आवश्यकता होती है | धर्म के आश्रित हो मनुष्य अपने आप को बुरे काम से बचा सकता था | आज समाज में जो अनैतिकता फैली हुई है उसका कारण भी यही है कि हमने अपने पुराने धर्म ग्रंथों और मनीषियों की बातो को नकार दिया है | धर्म किस तरह मनुष्य के जीवन से जुड़ता था उसका एक उदाहरण देना चाहूँगी , पंचवटी की परिकल्पना शायद इस लिए की गई थी कि हमारे मनीषी उन पांच पेड़ों को सुरक्षित रखना चाहते थे जो बहुत महत्त्व पूर्ण थे उन्हें मंदिर के सामने स्थापित कर दिया ,एक तो मंदिर के प्रांगन में होने के कारण उनपर कोई प्रहार नहीं करेगा और वह नष्ट होने से बाख जाएँगे , दूसरे पुराने समय में लोग मंदिरों को ही रस्ते में विश्राम स्थल की तरह प्रयोग करते थे जिससे उनको छाया मिल सके और बेल फल जो बहुत गुण कारी मन जाता है और उसके पात्र को शिव जी से जोड़ दिया | आज भी भारत के ग़रीब इलाकों में पथिकों के लिए यही व्यवस्था है |इसी तरीके से हमारे मनीषियों ने धर्म का बाना पहनाकर पेड़ों की पूजा कर वाई और उन्हें सुरक्षित किया तो दूसरी और उसे सामाजिक परिवेश से भी जोड़ दिया | सीता को पंचवटी से जोड़ कर उसे सामाजिक ,धार्मिक और पवित्रता की  आस्था से जोड़ दिया | हर पर्व अपने में एक कल्याणकारी रूप छिपाए है ,बस ज़रूरत है तो उसे स्वस्थ विचारों के साथ उसका विश्लेषण करने की | 
एक अनुरोध --- यह मेरे अपने  विचार हैं इस से किसी का सहमत होना आवश्यक नहीं है | इंदिरा
*




संजीव 'सलिल'
दिद्दा!

वन्दे मातरम.
महाभारतकार के अनुसार 'धर्मं स: धारयेत' अर्थात वह जो धारण किया जाए वह धर्म है.

प्रश्न हुआ: 'क्या धारण किया जाए?'

उत्तर: 'वह जो धारण   करने योग्य है.'

प्रश्न: 'धारण  करने योग्य है क्या है?

उत्तर: वह जो श्रेष्ठ है? 

प्रश्न: श्रेष्ठ क्या है?

उत्तर वह जो सबके लिए हितकर है.

डॉ. राम मनोहर लोहिया के अनुसार धर्म लंबे समय की राजनीति और राजनीति तत्कालीन समय का धर्म है.

उक्तानुसार धर्म सदैव प्रासंगिक और सर्वोपयोगी होता है अर्थात जो सबके लिए नहीं, कुछ या किसी के लिए हितकर हो वह धर्म नहीं है.

साहित्य वह जो सबके हित सहित  हो अर्थात व्यापक अर्थ में साहित्य ही धर्म और धर्म ही साहित्य है.

साहित्य का सृजन अक्षर से होता है. अक्षर का उत्स ध्वनि है. ध्वनि का मूल नाद है... नाद अनंत है... अनंत ही ईश्वर है.

इस अर्थ में अक्षर-उपासना ही धर्मोपासना है. इसीलिये अक्षर-आराधक को त्रिकालदर्शी, पूज्य और अनुकरणीय कहा गया, उससे समाज का पथ-प्रदर्शन चाह गया, उसका शाप अनुल्लन्घ्य हुआ. अकिंचन गौतम के शाप से देवराज इंद्र भी न बच सका.

धर्म समय-सापेक्ष है. समय परिवर्तन शील है. अतः, धर्म भी सतत गतिशील और परिवर्तन शील है, वह जड़ नहीं हो सकता.

पञ्च तत्व की देह पञ्चवटी में पीपल (ब्रम्हा, नीम (शक्ति, रोगाणुनाशक, प्राणवायुदाता), आंवला (हरि, ऊर्जावर्धक ), बेल (शिव, क्षीणतानाशक ) तथा  तथा आम (रसवर्धक  अमृत) की छाया  में काया को विश्राम देने के साथ माया को समझने में भी समर्थ हो सकती थी.

मन के अन्दर जाने का स्थान ही मन्दिर है. मन मन्दिर बनाना बहुत सरल है किन्तु सरल होना अत्यंत कठिन है. सरलता की खोज में मन्दिर में मन की तलाश ने मन को ही जड़ बना दिया.

शिव वही है जो सत्य और सुन्दर है. असत्य या असुंदर शिव नहीं हो सकता. शिव के प्रति समर्पण ही 'सत' है.

शिव पर शंका का परिणाम सती होकर ही भोगना पड़ता है. शिव अर्थात सत्य पर संदेह हो तो मन की शांति छिन जाती है और तन तापदग्धता भोगता ही है.

शिव पर विश्वास ही सतीत्व है. शंकर शंकारि (शंका के शत्रु अर्थात विश्वास) है. विश्वास की संगिनी श्रद्धा ही हो सकती है. तभी तो तुलसी लिखते हैं: 'भवानी-शंकरौ वन्दे श्रृद्धा-विश्वास रूपिणौ' किसी भी काल में श्रृद्धा और विश्वास अप्रासंगिक कैसे हो सकते हैं?

जिसकी सत्ता किसी भी काल में समाप्त न हो वही तो महाकाल हो सकता है. काल से भी क्षिप्र होने पर ही वह काल का स्वामी हो सकता है. उसका वास क्षिप्रा तीर पर न हो तो कहाँ हो?

शिव सृजन से नाश और नाश से सृजन के महापथ निर्माता हैं. श्रृद्धा और विश्वास ही सम्मिलन की आधार भूमि बनकर द्वैत से अद्वैत की ओर ले जाती हैं. श्रृद्धा की जिलहरी का विस्तार और विश्वास के लिंग की दृढ़ता से ही नव सृजन की नर्मदा (नर्मम ददाति इति नर्मदा जो आत्मिक आनंद दे वह नर्मदा है) प्रवाहित होती है.

संयम के विनाश से सृजन का आनंद देनेवाला अविनाशी न हो तो और कौन  होगा? यह सृजन ही कालांतर में सृजक को भस्म कर देगा (तेरा अपना खून ही आखिर तुझमें आग लगाएगा).

निष्काम शिव  काम क्रीडा में भी काम के वशीभूत नहीं होते, काम को ह्रदय पर अधिकार करने का अवसर दिए बिना क्षार कर देते हैं किन्तु रति (लीनता अर्थात पार्थक्य का अंत) की प्रार्थना पर काम को पुनर्जीवन का अवसर देते हैं. निर्माण में नाश और नाश से निर्माण ही शिवत्व है.

इसलिए शिव अमृत ग्रहण न करने और विषपायी होने पर भी अपराजित, अडिग, निडर और अमर हैं. दूसरी ओर अमृत चुराकर भागनेवाले शेषशायी अमर होते हुए भी अपराजित नहीं रणछोड़ हैं.

सतीनाथ सती को गँवाकर किसी की सहायता नहीं कहते स्वयं ही प्रलय के वाहक बन जाते हैं जबकि सीतानाथ छले जाकर याचक हो जाते हैं. सती के तप का परिणाम अखंड अहिवात है जबकि सीता के तप का परिणाम पाकर भी खो देना है.

सतीनाथ मर्यादा में न बंधने के बाद भी मर्यादा को विस्मृत नहीं करते जबकि सीतानाथ मर्यादा पुरुषोत्तम होते हुए भी सीता की मर्यादा की रक्षा नहीं कर पाते.

शिव रात्रि की प्रासंगिकता अमृत और गरल के समन्वय की कला सीखकर जीने में है.

शेष अशेष...

Sanjiv verma 'Salil'
salil.sanjiv@gmail.com
http://divyanarmada.blogspot.in

7 टिप्‍पणियां:

sn Sharma ने कहा…

sn Sharma द्वारा yahoogroups.com

आदरणीय आचार्य जी ,
आपके चिंतन मनन और मंथन की क्षमता पर चकित हूँ । जीवन दर्शन के और उसमें निहित
आध्य्यात्म के कठिन पक्षों को आप जिस सहजता से सरल शब्दों में समझा देते हैं वह बड़े बड़े
विद्वानों के बस का नहीं । यह क्षमता आपको किसी अलोकिक अवतार के रूप में प्रतिष्ठापित करती है ।
ज्ञान का इतना बड़ा भण्डार आपने कहाँ अर्जित किया होगा कब आपको ऐसे स्वाध्याय का समय
मिला होगा मेरे लिए कल्पनातीत है अस्तु आपको अवतारी ही मान कर श्रद्धावनत हूँ ।
आज के युग में समाज को धर्म की जो परिभाषा पढाई जा रही वही हमें भ्रम
अविश्वासों और पतन की और ले जा रही है । बड़ी आवश्यकता है आपके विचारों
को जन जन तक पहुंचाने की पर कैसे हो यहीं बुद्धि और सामर्थ्य असफल हो
जाती है । आज का भौतिकवादी मनुष्य इस और कान और ध्यान देना ही नहीं
चाहता और हमें पुरातनपंथी कह कर सब कुछ नकार देता है । इस समस्या से कैसे
निपटा जाय और हम आध्यात्म की यह मशाल कैसे और कब तक जलाए रख सकते है ।
शिक्षा के क्षेत्र से भारतीय दर्शन को ऐसा विदा कर दिया गया की उसका पुनर्स्थापन
असम्भव लगता है । हम करें तो क्या करें ?

सादर
कमल

sanjiv verma 'salil' ने कहा…

आपका बड़प्पन है कि आप मुझ बच्चे का उत्साहवर्धन करते हैं. बच्चे को बढ़ने के लिए प्रोतसाहित करते हुए पिता अपनी पराजय की स्वयं सहर्ष घोषणा कर देता है. मेरा सौभाग्य कि पिताश्री के स्वर्गारोहण पश्चात् उनकी छायावत अग्रज का हाथ सर पर है. मुझ अज्ञानी के पास जो भी शब्द सुमन है गुरुजनों के अक्षत-आशीष है. माँ शारदा कब-काया कहलवा लें वही जानें... मेरा तो कुछ भी नहीं... अस्तु नत मस्तक हूँ.

sn Sharma ने कहा…

sn Sharma द्वारा yahoogroups.com

vicharvimarsh


प्रिय इंदिरा जी ,
आपकी प्रतिक्रया पढी । धार्मिक पर्व आज भी समाज में मनाये जाते हैं लेकिन
केवल एक लकीर पीटने के रूप में । उसमें निहित भावना और दर्शन को महत्व नहीं
मिलता । व्रत और उपास के साथ उस पर्व की विशेषताओं और उसमें निहित भावना
को समझाने का कोई प्रयास नहीं करता है । हमारी इस आवश्यकता की उपेक्षा सबसे
बड़ी समस्या है । आपका आलेख सारगर्भित और प्रेरणादायक है । अशेष साधुवाद !
दादा

- madhuvmsd@gmail.com ने कहा…

- madhuvmsd@gmail.com

आ. संजीव जी , दिद्दा एवं दादा
आपके विचार पढ़े जो सोचने को बाध्य करते है हम कहाँ थे और कहाँ खो गए धर्म पर संजीवजी के विचार व शिव की व्याख्या में सार ही सार है, जैसा कि दिद्दा ने लिखा है कि बार बार पढ़ कर कुछ समझ आ सकता है. धर्म को कुरूप करने में हमारे धर्माधिकारी पंडित, यानी ढोंगी पंडित ही रहे, अपना व्यापार बढ़ाने के लिए अज्ञानी, लोक मानस को धर्म के नाम पर लूट ते रहे और धर्म का रूप इतना विकृत कर दिया कि आधिनिक युग में युवा वर्ग धर्म की सिमित परिभाषा ही समझ पाया है, या तो वो धर्म के नाम पर मंदिर समझता है या टी वी. सिरिअल पर दिखाए जाने वाले रीती रिवाज .अफसोस इस बात का है कि मार्ग दर्शक कभी लोकप्रिय नही होते, जितने भी बड़े बड़े प्रवक्ता संस्कार चैनल पर या आस्था चैनल पर दिखाए व सुनाये जाते है उनके ठाट-बाट देख कर, उनके कथनी व करनी पर संदेह उपजता है और युवा वर्ग प्रश्न करता है.
आज धर्म का एक डरावना रूप प्रस्तुत किया जा रहा, उसका सही विश्लेषण नही हों रहा है, और उसे करेगा कौन, घर में माता पिता, स्कूल में शिक्षक तथा समाज में नेता, अब सवाल उठता है कया वो सही विश्लेषण स्वयं जानते है? परिवर्तन शील युग में धर्म की चाल धर्म का रूप भी परिवर्तित हों चुका है, प्रश्न पूछता यवा वर्ग, तर्क करता है तर्कसंगत विचार-विमर्श करता है, वो विश्लेषण करता है, और यदि उसे जबरदस्ती कुछ ग्रहन करने को बाध्य किया जाए तो वो उसको अस्वीकार करता है,
अतः आवशयकता है की संजीव जी जैसे महानुभव- मार्ग दर्शक बने, और सत्य धर्म की परिभाषा जन जन तक पहुचाए, परन्तु किस -प्रकार?

Indira Pratap ने कहा…


प्रिय संजीव भाई,
महा शिवरात्री पर आपका यह योग दान मुझे बहुत सराहनीय लगा, मैं ऐसी ही कल्पना कर रही थी कि आप कुछ अवश्य लिखेंगे| मेरे लिय धार्मिक पर्वों का बहुत महत्त्व है शायद इसका कारण है कि ये हमें अपनी जड़ों से बांधे रखने का, आधुनिकता के इस युग में एक एक सशक्त माध्यम है| मेरे विचार से हमारे मनीषियों ने जो आचार-विचार बनाए थे वह देश और काल के माप दंड पर अच्छी तरह तोल कर बनाए थे| मैं मानती हूँ कि समय के साथ परिवर्तन अवश्यंभावी होता है और समय के साथ चलने के लिए उन्हें बदलना ही चाहिए| लेकिन पुरातन सब त्यागने योग्य है मैं नहीं मानती| सार-सार ग्रहण करने की आवश्यकता होती है| धर्म के आश्रित हो मनुष्य अपने आप को बुरे काम से बचा सकता था| आज समाज में जो अनैतिकता फैली हुई है उसका कारण भी यही है कि हमने अपने पुराने धर्म ग्रंथों और मनीषियों की बातो को नकार दिया है| धर्म किस तरह मनुष्य के जीवन से जुड़ता था उसका एक उदाहरण देना चाहूँगी, पंचवटी की परिकल्पना शायद इस लिए की गई थी कि हमारे मनीषी उन पांच पेड़ों को सुरक्षित रखना चाहते थे जो बहुत महत्त्व पूर्ण थे उन्हें मंदिर के सामने स्थापित कर दिया, एक तो मंदिर के प्रांगन में होने के कारण उनपर कोई प्रहार नहीं करेगा और वह नष्ट होने से बाख जाएँगे, दूसरे पुराने समय में लोग मंदिरों को ही रस्ते में विश्राम स्थल की तरह प्रयोग करते थे जिससे उनको छाया मिल सके और बेल फल जो बहुत गुण कारी मन जाता है और उसके पात्र को शिव जी से जोड़ दिया| आज भी भारत के ग़रीब इलाकों में पथिकों के लिए यही व्यवस्था है|इसी तरीके से हमारे मनीषियों ने धर्म का बाना पहनाकर पेड़ों की पूजा कर वाई और उन्हें सुरक्षित किया तो दूसरी और उसे सामाजिक परिवेश से भी जोड़ दिया| सीता को पंचवटी से जोड़ कर उसे सामाजिक, धार्मिक और पवित्रता की आस्था से जोड़ दिया| हर पर्व अपने में एक कल्याणकारी रूप छिपाए है ,बस ज़रूरत है तो उसे स्वस्थ विचारों के साथ उसका विश्लेषण करने की |
एक अनुरोध--- यह मेरे अपने विचार हैं इस से किसी का सहमत होना आवश्यक नहीं है| इंदिरा

Pranava Bharti ने कहा…

Pranava Bharti yahoogroups.com
vicharvimarsh

आ. सलिल जी,स्नेही दादा एवं प्रिय दिद्दा!
इस गूढ़ विषय पर आप सबके विचार देखे भर थे, पर उन्हें ठीक से पढ़ नहीं पाई थी,गुनने की तो बात मेरी मन:स्थिति से कोसों दूर की है। आज प्रात:कालीन बेला में अपनी सूक्ष्म बुद्धि के अनुसार जितना पढ़ सकी,कुछ गुनने की चेष्टा करूंगी क्योंकि इसके बिना तो लिखा-पढ़ा सब व्यर्थ ही हो जाता है। फिर मैं तो आप लोगों के जैसा चितन-मनन भी नहीं कर सकी हूँ , आज भी नहीं कर पा रही हूँ-

आ. सलिल जी ने 'धर्म'की इतनी गहरी तथा सारगर्भित व्याख्या की है, उन्हें तथा आप सबको मेरा शत शत वन्दन स्वीकार हो। वास्तव में मुझे लगता है कि 'धर्म' की व्याख्या बहुत कठिन है। यदि शब्दों में कहें तो 'धर्म'अर्थात जो धारण करने योग्य हो साथ ही जो हमारे सारे अस्तित्व को संभालता हो, जीवन के हर पल में हमारे साथ सदा खड़ा रहकर हमारा उचित मार्ग-निर्देशन करता हो। दादा के कथनानुसार हम जो' लकीर पीट रहे हैं, उससे तो हमारी पीढ़ियाँ और भी भ्रमित होंगी। बिलकुल सही, हो ही रही हैं हमारी पीढियां भ्रमित! हम उन्हें समझाने में स्वयं को अशक्त पा रहे हैं क्योंकि कहीं न कहीं हम स्वयं द्विविधा में जीते हैं।
संजीव जी ने लिखा-(मन के अन्दर जाने का स्थान ही मन्दिर है. मन मन्दिर बनाना बहुत सरल है किन्तु सरल होना अत्यंत कठिन है. सरलता की खोज में मन्दिर में मन की तलाश ने मन को ही जड़ बना दिया।
शिव वही है जो सत्य और सुन्दर है. असत्य या असुंदर शिव नहीं हो सकता. शिव के प्रति समर्पण ही 'सत्य' है.)सच ही सरल होना अत्यंत कठिन है। यदि सरल हो गए तो आनन्दमय हो गए, यही आनन्द'शिव'में है।
हमें कुछ प्रार्थना,कुछ चिंतन की आवश्यकता है। प्रार्थना के साथ ही समर्पण आ जाता है।'हर पल वर्तमान में रहना ही प्रार्थना है'पर जैसे सरल रहना कठिन है वैसे ही प्रति पल प्रार्थना में रहना भी कठिन है।
आ. दिद्दा के अनुसार 'पुरातन सब त्यागने योग्य है मैं नहीं मानती'मुझे भी उनका यह विचार शतप्रतिशत सही लगता है। पता नहीं यह हमारी पीढ़ी के विचार हैं अथवा हमारे उस वातावरण की देन जिसमें हमारी सिंचाई हुई है।पुराने से ही नया जन्मता है। हमने पहले यदि कुछ पाया है तभी उसमें से विचारों की नई कोपल फूटेंगी। यदि कुछ है ही नहीं तो बंजर में क्या उग पायेगा? बदलाव की ज़रुरत तो सदा होती है।
पर जब तथाकथित धर्मप्रिय लोगों को अपने चारों ओर देखती हूँ,एक महिला होने के नाते स्वयं को प्रश्नों से घिरा पाती हूँ और जब उनके उत्तर में थोडा- बहुत कुछ कहने की चेष्टा करती हूँ,और उन्हें अनदेखा,अनसुना पाती हूँ तब लगता है कि 'चुप रहना' श्रेयस्कर है। कभी-कभी यह भी लगता है कि यदि सभी चुप हो जाएं तो????????????
यह कोई हल नहीं है। किसीको तो बाग़-डोर संभालनी होती ही है,कोई तो सेना का नेतृत्व करेगा ही। उसके बिना तो बिखराव होना निश्चित ही है। (बताइए, मैं क्या कर लूंगी ,यहाँ तक सुबह लिखा था,सोचा था अभी भेजकर आनन्दित हो सकूँगी, अब शाम के 5 बजने को हैं ---------------अब स्वयं भी बिखर गई ,पता नहीं क्या लिखने वाली थी।) आत्म- चितन की बहुत भारी आवश्यकता है।
हमारे देश के प्रहरी को हमारा सलाम !यह 'सांझा' करना भी पूजा से कम नहीं
बस अब प्रेषित करती हूँ आधा-अधूरा ही, क्रम टूट गया है

आप सब विद्वानों को मेरा शत -शत वंदन
सादर
प्रणव

बेनामी ने कहा…

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