शनिवार, 22 जनवरी 2011

हिन्दी सेवी परिचय : १ हिन्दी हित संरक्षक सेठ गोविन्ददास -संजीव 'सलिल'

हिन्दी सेवी परिचय : १

इस स्तम्भ के अंतर्गत अनन्य हिन्दी सेवकों से नयी पीढ़ी को परिचित करने का प्रयास है ताकि वे सद्प्रेरणा ग्रहण कर हिन्दी को विश्व भाषा बनाने के महाभियान में अपनी सारस्वत समिधा समर्पित कर सकें.


हिन्दी हित संरक्षक सेठ गोविन्ददास
                                                                                                
संजीव 'सलिल'
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           हिन्दी को भारत की राष्ट्र भाषा बनाने के स्वप्न दृष्टाओं में सेठ गोविन्ददास अनन्य इसलिए हैं कि उन्होंने संसद में हिन्दी के पक्ष में मतदान करने के लिये अपने राजनैतिक दल कोंग्रेस के व्हिप का उल्लंघन करने के लिये केन्द्रीय नेतृत्व से अनुमति ली और हिन्दी के पक्ष में निर्भीकता के साथ मतदान किया. सामान्यतः अपने दल की नीति से बंधे रहने की परंपरा को तोड़ने का साहस ही सांसद नहीं करते, करें तो दल से द्रोह का आरोप लगता है किन्तु सेठ जी ने दल से निष्ठा बनाये रखते हुए दल की घोषित नीति के विरोध में मतदान कर संसदीय लोकतंत्र और हिन्दी दोनों की हित रक्षा कर अपनी निर्भीकता तथा कौशल का परिचय दिया.   
               
         सनातन सलिला नर्मदा के तट पट स्थित संस्कारधानी जबलपुर में मारवाड़ से आकर बसे महेश्वरी वैश्य समाज के राजा गोकुलदास के पुत्र दीवान बहादुर सेठ जीवनदास को १६ अक्टूबर १८९६ को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई जिसका नाम गोविन्द दास रखा गया. वैभवशाली राज परिवार में शिक्षित-दीक्षित होने पर भी अपनी माता श्री के सात्विक स्वभाव को उन्होंने ग्रहण किया. तरुण गोविन्द ने १९१६ में श्री शारदा भवन पुस्तकालय की स्थापना कर देश की गणमान्य विभूतियों को आमंत्रित कर उनके व्याख्यानों के माध्यम से हिन्दी भाषा और साहित्य के विकास का पथ प्रशस्त करने के साथ-साथ सामान्य जनों को भी हिन्दी से जोड़ा. द्वारकाप्रसाद मिश्र, ब्योहार राजेन्द्र सिंह, ज्वालाप्रसाद वर्मा, माणिकलाल चौरसिया आदि के सहयोग से उन्होंने जबलपुर को खड़ी हिन्दी का गढ़ बना दिया. सन १९२० में युवा गोविन्ददास गंदी जी के नेतृत्व में स्वतंत्रता सत्याग्रह में समर्पित हो गये. राष्ट्र और राष्ट्रभाषा उनके जीवन का लक्ष्य हो गये.

साहित्य सृजन के आरंभिक दिनों में में उनकी रूचि काव्य लेखन में थी. १९१६ से १९२० के बीच कवि गोविन्ददास ने 'बाणासुर पराभव' और 'उषा-अनिरुद्ध परिणय' खण्ड काव्य रचे. उषा-अनिरुद्ध परिणय' १९३० में 'प्रेम विजय' शीर्षक से तत्पश्चात 'पत्र-पुष्प' और 'संवाद-सप्तक' काव्य संग्रह प्रकाशित हुए. उनकी इन कृतियों में पारंपरिक आदर्शों के प्रति प्रतिबद्धता, नीतिप्रियता, राष्ट्रीय नव जागरण आदि तत्वों की प्रधानता है. छांदस काव्य लेखन की परिपाटी को अपनाते हुए उन्होंने तत्सम शब्दावली का प्रयोग प्रचुरता से किया. 

कालान्तर में उनकी प्रवृत्ति गद्य विशेषकर नाट्य और संस्मरण लेखन की ओर अधिक हो गयी. उनके शताधिक नाटकों में कर्ण, हर्ष, कुलीनता, शाशिगुप्त, अशोक, आदि प्रसिद्ध हुए. पौराणिक, ऐतिहासिक, सामाजिक घटनाओं और प्रसंगों को वर्त्तमान के लिये प्रेरणा-स्त्रोत बनाने के दृष्टिकोण से एकांकी, प्रहसन और एकल पात्री नाटकों में ढालकर प्रस्तुत करने में वे सिद्धहस्त थे. पारंपरिक भारतीय नाट्य पद्धति के साथ आधुनिक रचना-शिल्प का समन्वय उनका वैशिष्ट्य है. नाट्य विधा में उनके गहन अध्येता गोविंददास जी के गंभीर अध्येता रूप का उद्घाटन 'नाट्य कला मीमांसा' शीर्षक पुस्तक में प्रकाशित उनके ४ उद्बोधनों से मिलता है. गद्य लेखन की नया विधाओं को भी उन्होंने समृद्ध किया.

'इंदुमती' नामक वृहद् औपन्यासिक कृति की रचना कर सेठजी ने ख्याति अर्जित की. 'मेरे जीवन के विचार स्तंभ' नामक निबंध संग्रह में सेठ जी के ललित गद्य-लेखन क्षमता का अच्छा परिचय मिलता है. 'उथल-पुथल के युग' शीर्षक संस्मरण संग्रह में सेठ गोविन्ददास के तटस्थ जीवन बोध की झलकियाँ हैं. 'आत्म-निरीक्षण' ३ भागों में लिखित उनकी आत्मकथा है. अपनी विदेश और स्वदेश यात्राओं के पर्यटन वृत्त लिखकर उन्होंने हिन्दी के पर्यटन साहित्य को समृद्ध किया. उत्तराखंड की यात्रा' तथा 'दक्षिण भारत की यात्रा' उनकी महत्वपूर्ण कृतियाँ हैं. पारंपरिक वैषनव संप्रदाय में उनकी अगाध आस्था उनके लेखन में सर्वत्र दृष्टव्य है.जीवनी साहित्य में मोतीलाल नेहरु, जवाहरलाल नेहरु, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, सरदार पटेल, रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद आदि कालजयी चरित्रों पर उनका लेखन उल्लेखनीय है. 'स्मृतिकण' शीर्षक से सेठ जी ने अनेक प्रमुख व्यक्तित्वों के शब्द-चित्र अंकित किये है.

सेठ जी का राष्ट्रीयतापरक समाज सुधारक पत्रकारिता से भी लगाव था. दैनिक लोकमत, मासिक श्री शारदा, दैनिक जयहिंद, साप्ताहिक जनसत्ता आदि के प्रकाशन-सञ्चालन में उनका उल्लेखनीय योगदान रहा. अस्न्स्कर्धनी जबलपुर की संस्कृतिक गतिविधियों के केंद्र 'शहीद स्मारक' के निर्माण के लिये महाकोशल कोंग्रेस के माध्यम से आर्थिक जनसहयोग एकत्र करने में उनकी प्रमुख भूमिका रही किन्तु कालांतर में उनके वंशजों ने पारिवारिक न्यास बनाकर इस पर आधिपत्य कर लिया. सेठ जीकी राजनैतिक विरासत उनके पुत्रों जगमोहनदास तथा मनमोहनदास व पुत्री रत्ना कुमारी देवी ने ग्रहण की किन्तु उनके पौत्रों-प्रपौत्रों में समाज सेवा के स्थान पर व्यावसायिकता का अधिक विकास हुआ. फलतः कल के प्रवाह में सेठ जी का साहित्यिक अवदान तथा हिन्दी सेवा ही नयी पीढ़ी के लिये प्रेरणा का स्त्रोत है. सेठ जी की स्मृति में जिला चिकित्सालय का नाम विक्टोरिया अस्पताल से बदलकर सेठ गोविन्ददास चिकित्सालय कर दिया गया है. सेठ जी की आदमकद प्रतिमा शहीद स्मारक प्रांगण में स्थापित है.

चित्र परिचय: १. सेठ गोविन्ददास जी, २. धर्मपत्नी गोदावरी देवी के साथ सेठ जी, ३. संसद के रूप में राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्रपसाद जी से शपथ ग्रहण करते हुए, ४. राजसी गणवेश में सेठजी, ५. सेठ जी, ६. सेठ गोविन्ददास चिकित्सालय .

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1 टिप्पणी:

Hanvant Rajpurohit ने कहा…

गोविंददास कि मुर्खता के कारण उत्तर भारत में कई विकसित संस्कृतीयां, भाषाये नष्ट हो गयी. यहां तक कि गोविंददास के इस कार्य ने अपनी मातृभाषा के प्रती भी गद्दारी कि है. उनके इस दोगले रवैये के कारण राजस्थानी कि मुल लिपीयां महाजनी और मुडिया नष्ट हो गयी. वर्तमान राजस्थानी का ५०% हिंदी करण हो गया और जल्द ही ये हिंदी राजस्थानी को खाने के कगार पर है.