बुधवार, 9 मार्च 2016

mukatak

मुक्तक:
मुक्त देश, मुक्त पवन 
मुक्त धरा, मुक्त गगन
मुक्त बने मानव मन 
द्वेष- भाव करे दहन 
*
होली तो होली है, होनी को होना है
शंका-अरि बनना ही शंकर सम होना है
श्रद्धा-विश्वास ही गौरी सह गौरा है
चेत न मन, अब तुझको चेतन ही होना है
*
मुक्त कथ्य, भाव,बिम्ब,रस प्रतीक चुन ले रे!
शब्दों के धागे से कबिरा सम बुन ले रे!
अक्षर भी क्षर से ही व्यक्त सदा होता है
देना ही पाना है, 'सलिल' सत्य गुण ले रे!!
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