गुरुवार, 17 मार्च 2016

muktika

मुक्तिका
मापनी- २१२२ २१२२ २१२२ २१२
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आज संसद में पगड़ियाँ, फिर उछालीं आपने
शब्द-जालों में मछलियाँ, हँस फँसा लीं आपने

आप तो पढ़ने गये  थे, अब सियासत कर रहे 

लोभ सत्ता पद कुरसियाँ, मन बसा लीं आपने  

जिसे जनता ने चुना, उसके विरोधी भी चुने
दूरियाँ अपने दरमियाँ, अब बना लीं आपने

देश की रक्षा करें जो, जान देकर रात-दिन
वक्ष पर उनके बरछियाँ, क्यों चला लीं आपने?
  
पूँछ कुत्ते की न सीधी, हो कभी सब जानते
व्यर्थ झोले से पुँगलियाँ, फिर निकालीं आपने 

सात फेरे डाल लाये, बुढ़ापे में भूलकर 
अल्पवस्त्री नव तितलियाँ मन बसा लीं आपने
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