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रविवार, 29 अक्टूबर 2017

muktak,

मुक्तक 
*
स्नेह का उपहार तो अनमोल है
कौन श्रद्धा-मान सकता तौल है? 
भोग प्रभु भी आपसे ही पा रहे
रूप चौदस भावना का घोल है
*
स्नेह पल-पल है लुटाया आपने।
स्नेह को जाएँ कभी मत मापने
सही है मन समंदर है भाव का
इष्ट को भी है झुकाया भाव ने
*
फूल अंग्रेजी का मैं,यह जानता
फूल हिंदी की कदर पहचानता
इसलिए कलियाँ खिलता बाग़ में
सुरभि दस दिश हो यही हठ ठानता
*
उसी का आभार जो लिखवा रही
बिना फुरसत प्रेरणा पठवा रही
पढ़ाकर कहती, लिखूँगी आज पढ़
सांस ही मानो गले अटका रही
*

मुक्तक muktak

एक छंद 
राम के काम को, करे प्रणाम जो, उसी अनाम को, राम मिलेगा 
नाम के दाम को, काम के काम को, ध्यायेगा जो, विधि वाम मिलेगा 
देश ललाम को, भू अभिराम को, स्वच्छ करे इंसान तरेगा 
रूप को चाम को, भोर को शाम को, पूजेगा जो, वो गुलाम मिलेगा 

muktak

मुक्तक 
विदा दें, बाद में बात करेंगे, नेता सा वादा किया, आज जिसने 
जुमला न हो यह, सोचूँ हो हैरां, ठेंगा दिखा ही दिया आज उसने 
गोदी में खेला जो, बोले दलाल वो, चाचा-भतीजा निभाएं न कसमें 
छाती कठोर है नाम मुलायम, लगें विरोधाभास ये रसमें 

muktak

मुक्तक 
वामन दर पर आ विराट खुशियाँ दे जाए 
बलि के लुटने से पहले युग जय गुंजाए 
रूप चतुर्दशी तन-मन निर्मल कर नव यश दे 
पंच पर्व पर प्राण-वर्तिका तम पी पाए 

शनिवार, 28 अक्टूबर 2017

neerajana chhand

हिंदी के नए छंद १८
नीराजना छंद
*
लक्षण:
१. प्रति पंक्ति २१ मात्रा।
२. पदादि गुरु।
३. पदांत गुरु गुरु लघु गुरु।
४. यति ११ - १०।
लक्षण छंद:
एक - एक मनुपुत्र, साथ जीतें सदा।
आदि रहें गुरुदेव, न तब हो आपदा।।
हो तगणी गुरु अंत, छंद नीरजना।
मुग्ध हुए रजनीश, चंद्रिका नाचना।। 
टीप:
एक - एक = ११, मनु पुत्र = १० (इक्ष्वाकु, नृग, शर्याति, दिष्ट,
धृष्ट, करुषय, नरिष्यन्त, प्रवध्र, नाभाग, कवि  भागवत)
उदाहरण:
कामदेव - रति साथ, लिए नीराजना।
संयम हो निर्मूल, न करता याचना।।
हो संतुलन विराग - राग में साध्य है।
तोड़े सीमा मनुज, नहीं आराध्य है।।   
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matiman chhand

हिंदी के नए छंद १७
मतिमान छंद 
*
विधान:
१. प्रति पंक्ति मात्रा २१
२. पदादि गुरु
३.पदांत लघु गुरु लघ गुरु
४. यति ११-१०
*
लक्षण छंद:
ग्यारह-दस यति रखें सदा मतिमान जी
हो पदादि गुरु, रहे- पदांत जगांत रगांत जी
'जो बोया वह काट', सत्य मत भूलना
स्वप्न करो साकार, तभी सुख-झूलना
*
उदाहरण:
कौन किसी का सदा, सोच अनुमान रे!
खोज न बाहर, आप- बनो प्रतिमान रे!!
हो अनदेखी अगर, राह मत छोड़ना।
मंजिल पाए बिना, पाँव मत मोड़ना।। 
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शुक्रवार, 27 अक्टूबर 2017

doha

दोहा सलिला
*
ताज न मंदिर-मकबरा, मात्र इमारत भव्य भूल सियासत देखिए, कला श्रेष्ठ शुचि दिव्य
*
नेताओं से लीजिए, भत्ता-सुविधा छीन भाग जाएँगे चोर सब, श्रेष्ठ सकें हम बीन
*
एंकर अनुशासित रहे, ठूँसे नहीं विचार वक्ता बोले विषय पर, लोग न हों बेज़ार
*
जानकार वक्ता रहें, दलगत करें न बात सच उद्घाटित हो तभी, सुधर सकें हालात
*
हम भी जानें बोलना, किंतु बुलाये कौन? घिसे-पिटे चेहरे बुला, सच को करते मौन
*
केंद्र-राज्य में भिन्न दल, लोकतंत्र की माँग एक न मनमानी करे, खींच न पाए टांग
*
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गुरुवार, 26 अक्टूबर 2017

chitragupta - kayastha

'चित्रगुप्त ' और 'कायस्थ' क्या हैं ?
विजय राज बली माथुर

विजय माथुर पुत्र स्वर्गीय ताज राजबली माथुर,मूल रूप से दरियाबाद (बाराबंकी) के रहनेवाले हैं.१९६१ तक लखनऊ में थे . पिता जी के ट्रांसफर के कारण बरेली,शाहजहांपुर,सिलीगुड़ी,शाहजहांपुर,मेरठ,आगरा ( १९७८  में अपना मकान बना कर बस गए) अब अक्टूबर २००९ से पुनः लखनऊ में बस गए हैं. १९७३ से मेरठ में स्थानीय साप्ताहिक पत्र में मेरे लेख छपने प्रारंभ हुए.आगरा में भी साप्ताहिक पत्रों,त्रैमासिक मैगजीन और फिर यहाँ लखनऊ के भी एक साप्ताहिक पत्र में आपके लेख छप चुके है.अब 'क्रन्तिस्वर' एवं 'विद्रोही स्व-स्वर में' दो ब्लाग  लिख रहे हैं तथा 'कलम और कुदाल' ब्लाग में पुराने छपे लेखों की स्कैन कापियां दे  रहे हैं .ज्योतिष आपका व्यवसाय है और लेखन तथा राजनीति शौक है. 
*

प्रतिवर्ष विभिन्न कायस्थ समाजों की ओर से देश भर मे भाई-दोज के अवसर पर कायस्थों के उत्पत्तिकारक के रूप मे 'चित्रगुप्त जयंती'मनाई जाती है । 'कायस्थ  बंधु' बड़े गर्व से पुरोहितवादी/ब्राह्मणवादी कहानी को कह व सुना तथा लिख -दोहराकर प्रसन्न होते हैं परंतु सच्चाई को न कोई समझना चाह रहा है न कोई बताना चाह रहा है। आर्यसमाज,कमला नगर-बलकेशवर, आगरा मे दीपावली पर्व के प्रवचनों में  स्वामी स्वरूपानन्द जी ने बहुत स्पष्ट रूप से समझाया था, उनसे पूर्व प्राचार्य उमेश चंद्र कुलश्रेष्ठ ने सहमति व्यक्त की थी। आज उनके शब्द आपको भेंट करता हूँ। प्रत्येक प्राणी के शरीर में 'आत्मा' के साथ 'कारण शरीर' व 'सूक्ष्म शरीर' भी रहते हैं। यह भौतिक शरीर तो मृत्यु होने पर नष्ट हो जाता है किन्तु 'कारण शरीर' और 'सूक्ष्म शरीर' आत्मा के साथ-साथ तब तक चलते हैं जब तक कि,'आत्मा' को मोक्ष न मिल  जाये। इस सूक्ष्म शरीर में 'चित्त'(मन) पर 'गुप्त'रूप से समस्त कर्मों-सदकर्म,दुष्कर्म  एवं अकर्म अंकित होते रहते हैं। इसी प्रणाली को 'चित्रगुप्त' कहा जाता है। इन कर्मों के  अनुसार मृत्यु के बाद पुनः दूसरा शरीर और लिंग इस 'चित्रगुप्त' में अंकन के आधार  पर ही मिलता है। अतः, यह पर्व 'मन'अर्थात 'चित्त' को शुद्ध व सतर्क रखने के उद्देश्य  से मनाया जाता था। इस हेतु विशेष आहुतियाँ हवन में दी जाती थीं। आज कोई ऐसा नहीं करता है। बाजारवाद के जमाने में भव्यता-प्रदर्शन दूसरों को हेय समझना ही ध्येय रह गया है। यह विकृति और अप-संस्कृति है। काश लोग अपने अतीत  को जान सकें और समस्त मानवता के कल्याण -मार्ग को पुनः अपना सकें। हमने तो  लोक-दुनिया के प्रचलन से हट कर मात्र हवन की पद्धति को ही अपना लिया है। इस पर्व  को एक जाति-वर्ग विशेष तक सीमित कर दिया गया है।
पौराणिक पोंगापंथी ब्राह्मणवादी व्यवस्था में जो छेड़-छाड़ विभिन्न वैज्ञानिक आख्याओं के साथ की गई है उससे 'कायस्थ' शब्द भी अछूता नहीं रहा है।
'कायस्थ'=क+अ+इ+स्थ, क=काया या ब्रह्मा ; अ=अहर्निश;इ=रहने वाला; स्थ=स्थित।

'कायस्थ' का अर्थ है ब्रह्म में अहर्निश स्थित रहने वाला सर्व-शक्तिमान व्यक्ति।
आज से दस लाख वर्ष पूर्व मानव अपने वर्तमान स्वरूप में आया तो ज्ञान-विज्ञान का विकास भी किया। वेदों मे वर्णित मानव-कल्याण की भावना के अनुरूप  शिक्षण- प्रशिक्षण की व्यवस्था की गई। जो लोग इस कार्य को सम्पन्न करते थे  उन्हे 'कायस्थ' कहा गया। ये मानव की सम्पूर्ण 'काया' से संबन्धित शिक्षा देते थे। अतः इन्हे 'कायस्थ' कहा गया। किसी भी अस्पताल में आज भी जनरल मेडिसिन विभाग का हिन्दी रूपातंरण आपको 'काय चिकित्सा विभाग' ही मिलेगा। उस समय  आबादी अधिक न थी और एक ही व्यक्ति सम्पूर्ण काया से संबन्धित सम्पूर्ण ज्ञान- जानकारी देने मे सक्षम था। किन्तु जैसे-जैसे आबादी बढ़ती गई शिक्षा देने हेतु  अधिक लोगों की आवश्यकता पड़ती गई। 'श्रम-विभाजन' के आधार पर शिक्षा भी दी  जाने लगी। शिक्षा को चार वर्णों मे बांटा गया-
1. जो लोग ब्रह्मांड से संबन्धित शिक्षा देते थे उनको 'ब्राह्मण' कहा गया और उनके द्वारा प्रशिक्षित विद्यार्थी शिक्षा पूर्ण करने के उपरांत जो उपाधि धारण करता था वह 'ब्राह्मण' कहलाती थी और उसी के अनुरूप वह ब्रह्मांड से संबन्धित शिक्षा देने के योग्य माना जाता था।
2- जो लोग शासन-प्रशासन-सत्ता-रक्षा आदि से संबन्धित शिक्षा देते थे उनको 'क्षत्रिय'कहा गया और वे ऐसी ही शिक्षा देते थे तथा इस विषय मे पारंगत विद्यार्थी को 'क्षत्रिय' की उपाधि से विभूषित किया जाता था जो शासन-प्रशासन-सत्ता-रक्षा से संबन्धित कार्य करने व शिक्षा देने के योग्य माना जाता था।

3-जो लोग व्यापार-व्यवसाय आदि से संबन्धित शिक्षा प्रदान करते थे उनको  'वैश्य' कहा जाता था। इस विषय मे पारंगत विद्यार्थी 'वैश्य' की उपाधि से विभूषित किये जाते थे जो व्यापार-व्यवसाय करने और इसकी शिक्षा देने के योग्य मान्य थे ।

4-जो लोग विभिन्न सूक्ष्म -सेवाओं से संबन्धित शिक्षा देते थे उनको 'क्षुद्र' कहा जाता था और इन विषयों मे पारंगत विद्यार्थी को 'क्षुद्र' की उपाधि से विभूषित किया जाता था ये विभिन्न सेवाओं मे कार्य करने व इनकी शिक्षा प्रदान करने के पात्र थे।

ध्यान देने योग्य महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि,'ब्राह्मण','क्षत्रिय','वैश्य' और 'क्षुद्र' सभी योग्यता आधारित उपाधियाँ थी। ये सभी कार्य श्रम-विभाजन पर आधारित थे । अपनी योग्यता और उपाधि के आधार पर एक पिता के अलग-अलग पुत्र-पुत्रियाँ ब्राह्मण,
क्षत्रिय वैश्य और क्षुद्र हो सकते थे उनमे किसी प्रकार का भेद-भाव न था।'कायस्थ' चारों वर्णों से ऊपर होता था और सभी प्रकार की शिक्षा -व्यवस्था के लिए उत्तरदाई था। ब्रह्मांड की बारह राशियों के आधार पर कायस्थ को भी बारह वर्गों मे विभाजित किया
गया था। जिस प्रकार ब्रह्मांड चक्राकार रूप मे परिभ्रमण करने के कारण सभी राशियाँ समान महत्व की होती हैं उसी प्रकार बारहों प्रकार के कायस्थ भी समान ही थे।

कालांतर मे व्यापार-व्यवसाय से संबन्धित वर्ग ने दुरभि-संधि करके शासन-सत्ता और पुरोहित वर्ग से मिल कर 'ब्राह्मण' को श्रेष्ठ तथा योग्यता आधारित उपाधि -वर्ण व्यवस्था को जन्मगत जाती-व्यवस्था मे परिणत कर दिया जिससे कि बहुसंख्यक
'क्षुद्र' सेवा-दाताओं को सदा-सर्वदा के लिए शोषण-उत्पीड़न का सामना करना पड़ा उनको शिक्षा से वंचित करके उनका विकास-मार्ग अवरुद्ध कर दिया गया।'कायस्थ' पर ब्राह्मण ने अतिक्रमण करके उसे भी दास बना लिया और 'कल्पित' कहानी गढ़ कर चित्रगुप्त को ब्रह्मा की काया से उत्पन्न बता कर कायस्थों मे भी उच्च-निम्न का वर्गीकरण कर दिया।

खेद एवं दुर्भाग्य की बात है कि आज कायस्थ-वर्ग खुद ब्राह्मणों के बुने कुचक्र को ही मान्यता दे रहा है और अपने मूल चरित्र को भूल चुका है। कहीं कायस्थ खुद को 'वैश्य' वर्ण का अंग बता रहा है तो कहीं 'क्षुद्र' वर्ण का बता कर अपने लिए आरक्षण की मांग कर रहा है। यह जन्मगत जाति-व्यवस्था शोषण मूलक है और मूल भारतीय अवधारणा के प्रतिकूल है। आज आवश्यकता है योग्यता मूलक वर्ण-व्यवस्था बहाली की एवं उत्पीड़क जाति-व्यवस्था के निर्मूलन की।'कायस्थ' वर्ग को अपनी मूल भूमिका का निर्वहन करते हुए भ्रष्ट ब्राह्मणवादी -जातिवादी -जन्मगत व्यवस्था को ध्वस्त करके 'योग्यता आधारित' मूल वर्ण व्यवस्था को बहाल करने की पहल करनी चाहिए।

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मुक्तक

मुक्तक 
संवेदना का जन्मदिवस नित्य ही मने
दिल से दिल के तार जुड़ें, स्वर्ग भू बने
वेदना तभी मिटे, सौहार्द्र-स्नेह हो-
शांति का वितान दस दिशा रहा तने
*
श्याम घटा बीच चाँद लिये चाँदनी
लालिमा से, नीलिमा से सजी चाँदनी
सुमन गुच्छ से भी अधिक लिए ताजगी-
बिजलियाँ गिरा रही है विहँस चाँदनी
*
उषा की नमी दे रही दुनिया को ज़िंदगी
डिहाइड्रेशन से गयी क्यों अस्पताल में?
सूरज अधिक तपा या चाँदनी हुई कुपित
धरती से आसमान तक चर्चे है आज ये.
*
जग का सारा तिमिर ले, उसे बना आधार
रख दे आशा दीप में, कोशिश-बाती प्यार
तेल हौसले, योजना-तीली बाले ज्योति-
रमा-राज में हो सके ज्योतित सब संसार
*
रूपया हुआ अज़ीज़ अब, रुपया ही है प्यार
रुपये से इरशाद कह, रूपया पा हो शाद
रुपये की दीवानगी हद से अधिक न होय
रुपये ही आबाद कर, कर देता बर्बाद
*
कुछ मुट्ठी भर चेहरे, बासी सोच- विचार
नव पीढ़ी हित व्यर्थ हैं, जिनके सब आचार
चित्र-खबर में छप सकें, बस इतना उद्देश्य-
परिवर्तन की कोशिशें कर देते बेकार.
*
कतरा-कतरा तिमिर पी, ऊषा ले अरुणाई
'जाग' सूर्य से कह रही, 'चल कर लें कुड़माई'
'धत' कह लहना सिंह हुआ, भास्कर तपकर लाल
नेह नर्मदा तीर पर, कलकल पडी सुनाई
*
पंकज को आ गया है सुन सोना पर प्यार
देख लक्ष्मी को चढ़ा पल में तेज बुखार
कहा विष्णु से लीजिये गहने सभी समेट-
वित्तमंत्री चेता रहे भाव करें हद पार
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nav kundaliya

नव कुण्डलिया, nav kundaliya, 
रात जा रही, उषा आ रही
उषा आ रही, प्रात ला रही
प्रात ला रही, गीत गा रही 
गीत गा रही, मीत भा रही
मीत भा रही, जीत पा रही
जीत पा रही, रात आ रही
*
गुप-चुप डोलो, राज न खोलो
राज न खोलो, सच मत तोलो
सच मत तोलो,मन तुम सो लो
मन तुम सो लो, नव रस घोलो
नव रस घोलो, घर जा सो लो
घर जा सो लो, गुप-चुप डोलो
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navgeet

नवगीत:  
चित्रगुप्त को
पूज रहे हैं
गुप्त चित्र
आकार नहीं
होता है
साकार वही
कथा कही
आधार नहीं
बुद्धिपूर्ण
आचार नहीं
बिन समझे
हल बूझ रहे हैं
कलम उठाये
उलटा हाथ
भू पर वे हैं
जिनका नाथ
खुद को प्रभु के
जोड़ा साथ
फल यह कोई
नवाए न माथ
खुद से खुद ही
जूझ रहे हैं
पड़ी समय की
बेहद मार
फिर भी
आया नहीं सुधार
अकल अजीर्ण
हुए बेज़ार
नव पीढ़ी का
बंटाधार
हल न कहीं भी
सूझ रहे हैं
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नये सवैये

लहर-लहर लहरित सलिल,  अमल-विमल कलकल सतत,  निरख-निरख जन-मन मुदित.
घहर-घहर घरशित सरित,  छिटक-छिटक प्रमुदित अमित,  बिखर-बिखर कण-कण क्षरित.
चरण-चरण कर सुख वरण, कदम-कदम हर दुख हरण, सिहर-सिहर तृण-तृण दमित.
बरस-बरस जलधर धवल, तरुवर मुरझित बढ़ हरित, मरु-गुलशन कर रवि उदित.
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naye chhand savaiye

हिंदी के नए छंद: मातंगी सवैया 
विधान: 
१. प्रति पंक्ति ३६ मात्रा 
२.  sss की ६ आवृत्तियाँ
३. यति १२-२४-३६ पर 
४. आदि-अंत sss
*
दौड़ेंगे-भागेंगे, कूदेंगे-फांदेंगे, मेघों सा गाएँगे 
वृक्षों सा झूमेंगे, नाचेंगे-गाएँगे, आल्हा गुन्जाएँगे
आतंकी शैतानों, मारेंगे-गाड़ेंगे, वीरों सा जीतेंगे  
चंदा सा, तारों सा, आकाशी दीया हो,  दीवाली लाएँगे 
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राम चरितावली

भरत भक्ति कर राम की, तज पाए मद-मोह
राम न सत्ता तज सके, पाया पत्नी विछोह
मोह नहीं कर्तव्य था, राजा हो निष्काम
सुविधा वरता नागरिक, तजते राजा राम
दोष न सीता ने दिया, बनी रही अनुरक्ति
दूर हुए पर सिया से, रही राम की युक्ति 
*
युगल भक्ति आदर्श का है पावनतम रूप
तन-मन दोनों ही कहें, सिया-राम हैं भूप
सिया-राम हैं भूप, मोह-माया को मारें
निरासक्त कर कर्म, 'सलिल' तो प्रभु जी तारें
अहंकार को मार, रिपुसूदन का ध्यान कर
सदय रहें श्रुतकीर्ति, युगल मूर्ति का गान कर
*
सदियाँ गाती हैं सतत, शुची संयम के गीत
भारत-मांडवी का मिलन, देहातीत पुनीत
*
लखन-उर्मिला एक मन, भले रहे तन दूर
रिपुसूदन-श्रुतिकीर्ति थे, तार और संतूर
*
सिया राम थीं, राम सिय, सलिल-सलिल की धार
द्वैताद्वैत न भिन्न ज्यों, जग असार में सार
*
आठ, चार, थे एक भी, मिल हनुमत सम्पूर्ण
शून्य कर सके दनुज-दल, अहं कर सके चूर्ण
*
साँसों की सरयू सलिल, आस-हास सिय-राम
भारत-मांडवी गोमती, सिकता कमल अनाम
*
लखन-उर्मिला शौर्य-तप, हो न सके विधि वाम 
रिपुसूदन-श्रुतिकीर्ति हैं, श्रेय-प्रेय निष्काम
*
शून्य 'स्व' सब कुछ 'सर्व' है, सत्ता सेवाग्राम
राम-राम कर सब चले, हनु संकल्प अकाम
*
घातक आरक्षण रजक, लव-कुश युक्ति न आम
ऍम-ख़ास अंतर न हो, घट-घटवासी राम
*
छोड़ दिया है राम ने, नहीं व्यथा का अंत
प्राण-पखेरू उड़ चल, नहीं अवध में तंत
*
दशरथ की दस इन्द्रियाँ, पल में हो निष्प्राण
तज कर देह विदेह हो, पाती-देतीं त्राण
*
उन्मन मन-खग उड़ चला, वहीं जहाँ सिय-राम
वध न श्रवण का क्षम्य था, भोग लिया परिणाम
*
चित्रगुप्त के न्याय में, होती तनिक न भूल
कर्म किया फल भी गहो, मिले फूल या शूल
*
सत्य राम का दिव्य शर, कर्म राम का चाप
दृष्टि राम की सियामय, लक्ष्य मिटाना पाप
*
धर्म काम निष्काम कर, कौशल्या सम मौन
मर्म सुमित्रा-कैकई, सम परिपूरक कौन?
*
जनक विरागी राग हैं,दशरथ अवध बहाल
कृपा दृष्टि है सुनयना, सीता धरणि निहाल
*
राम नाम को सेतु कर, सिया नाम तट बंध
हनुमत दृढ़ स्तम्भ भव, पार करे हो अंध
पार करे हो अंध, राम-सिय बने सहारा 
दौड़े देव तुरंत, भक्त ने अगर पुकारा
पग पखार ले 'सलिल', बिसर मत ईश-नाम को
सिया नाम तट बांध, सेतु कर राम नाम को 
*
यायावर हो विचर मन, तज न राम का ध्यान
राम सनेही जो वही, है सच्चा इनसान
 है सच्चा इनसान, सिया के चरणों में नत
हिंदी की जयकार, करे दिन-रात अनवरत
जीव तभी संजीव, मिटा तम बने दिवाकर
साथ शब्द के विचरे, बन निश-दिन यायावर 
*
दंडक दुनिया छंद भी, देख न हो भयभीत
संग सिया-विश्वास तो, होगी पग-पग जीत
होगी पग-पग जीत, दनुज बाधा हारेगी
शीशम कोशिश सतत, लक्ष्य पर मन वारेगी
श्रृंगवेरपुर संध्या,वन्दन कर पा ठंडक
होकर भाव-विभोर, भोर जय कर ले दंडक 
*

*
भीतर-बाहर राम हैं, सोच न तू परिणाम
भला करे तू और का, भला करेंगे राम
*
विश्व मित्र के मित्र भी, होते परम विशिष्ट
युगों-युगों तक मनुज कुल, सीख मूल्य हो शिष्ट
*
राम-नाम है मरा में, जिया राम का नाम
सिया राम का नाम है, राम सिया का नाम
*
उलटा-सीधा कम-अधिक, नीचा-ऊँच विकार 
कम न अधिक हैं राम-सिय, पूर्णकाम अविकार
*
मन मारुतसुत हो सके, सुमिर-सुमिर सिय-राम
तन हनुमत जैसा बने, हो न सके विधि वाम
*
मुनि सुतीक्ष्ण मति सुमति हो, तन हो जनक विदेह
धन सेवक हनुमंत सा, सिया-राम का गेह
*
शबरी श्रम निष्ठा लगन, सत्प्रयास अविराम
पग पखर कर कवि सलिल, चल पथ पर पा राम
*
हो मतंग तेरी कलम, स्याही बन प्रभु राम
श्वास शब्द में समाहित, गुंजित हो निष्काम
*
अत्रि व्यक्ति की उच्चता, अनुसुइया तारल्य
ज्ञान किताबी भंग शर, कर्मठ राम प्रणम्य
*
निबल सरलता अहल्या, सिया सबल निष्पाप
गौतम संयम-नियम हैं, इंद्र शक्तिमय पाप
*
नियम समर्थन लोक का, पा बन जाते शक्ति
सत्ता दण्डित हो झुके, हो सत-प्रति अनुरक्ति
*
जनगण से मिल जूझते, अगर नहीं मतिमान.
आत्मदाह करते मनुज, दनुज करें अभिमान.
*
भंग करें धनु शर-रहित, संकुच-विहँस रघुनाथ.
भंग न धनु-शर-संग हो, सलिल उठे तब माथ.
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नवगीत

नवगीत 
तुमने जो कुछ दिया 
*
तुमने जो कुछ दिया
उसे ही ओढ़ा मैंने.
सीधा मारग धरा,
न तोड़-मरोड़ा मैंने.
*
हो लहना, चन्दर, सुधा,
रत्ना-तुलसीदास.
चाहा, अनचाहा जिया,
माना खासमखास.
अगिन परिच्छा बाद भी,
नियति रही वनवास.
अश्वमेध का अश्व
न कोई, छोड़ा मैंने.
*
साँसों का संतूर ले,
इकतारे सी आस.
करम चदरिया कुसुम्बी,
ओढी पा सुख-त्रास.
प्रिय का प्रिय होकर जिया,
भले कहे जग दास.
था तो मैं रणछोड़,
नहीं मुख मोड़ा मैंने.
.
चमरौधा सीता रहा,
ले होंठों पर हास.
ज्यों की त्यों चादर रखी,
भले हुआ उपहास.
आम आदमी सा जिया,
जुमला कहा न खास.
छप्पन इंची सीना,
किया न चौड़ा मैंने.
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बुधवार, 25 अक्टूबर 2017


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baalgeet

बाल गीत :
चिड़िया
*
चहक रही 
चंपा पर चिड़िया
शुभ प्रभात कहती है
आनंदित हो
झूम रही है
हवा मंद बहती है
कहती: 'बच्चों!
पानी सींचो,
पौधे लगा-बचाओ
बन जाएँ जब वृक्ष
छाँह में
उनकी खेल रचाओ
तुम्हें सुनाऊँगी
मैं गाकर
लोरी, आल्हा, कजरी
कहना राधा से
बन कान्हा
'सखी रूठ मत सज री'
टीप रेस,
कन्ना गोटी,
पिट्टू या बूझ पहेली
हिल-मिल खेलें
तब किस्मत भी
आकर बने सहेली
नमन करो
भू को, माता को
जो यादें तहती है
चहक रही
चंपा पर चिड़िया
शुभ प्रभात कहती है
***
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एक रचना 
*
क्या लिखूँ?
कैसे लिखूँ?
कब कुछ लिखूँ, बतलाइये?
मत करें संकोच
सच कहिये, नहीं शर्माइये।
*
मिली आज़ादी चलायें जीभ जब भी मन करे
कौन होते आप जो कहते तनिक संयम वरें?
सांसदों का जीभ पर अपनी, नियंत्रण है नहीं
वायदों को बोल जुमला मुस्कुराते छल यहीं
क्या कहूँ?
कैसे कहूँ?
क्या ना कहूँ समझाइये?
क्या लिखूँ?
कैसे लिखूँ?
कब कुछ लिखूँ, बतलाइये?
*
आ दिवाली कह रही है, दीप दर पर बालिये
चीन का सामान लेना आप निश्चित टालिए
कुम्हारों से लें दिए, तम को हराएँ आप-हम
अधर पर मृदु मुस्कराहट हो तनिक भी अब न कम
जब मिलें
तब लग गले
सुख-दुःख बता-सुन जाइये
क्या लिखूँ?
कैसे लिखूँ?
कब कुछ लिखूँ, बतलाइये?
*
बाप-बेटे में न बनती, भतीजे चाचा लड़ें
भेज दो सीमा पे ले बंदूक जी भरकर अड़ें
गोलियां जो खाये सींव पर, वही मंत्री बने
जो सियासत मात्र करते, वे महज संत्री बनें
जोड़ कर कर
नागरिक से
कहें नेता आइये
एक रचना
*
क्या लिखूँ?
कैसे लिखूँ?
कब कुछ लिखूँ, बतलाइये?
मत करें संकोच
सच कहिये, नहीं शर्माइये।
*
मिली आज़ादी चलायें जीभ जब भी मन करे
कौन होते आप जो कहते तनिक संयम वरें?
सांसदों का जीभ पर अपनी, नियंत्रण है नहीं
वायदों को बोल जुमला मुस्कुराते छल यहीं
क्या कहूँ?
कैसे कहूँ?
क्या ना कहूँ समझाइये?
क्या लिखूँ?
कैसे लिखूँ?
कब कुछ लिखूँ, बतलाइये?
*
आ दिवाली कह रही है, दीप दर पर बालिये
चीन का सामान लेना आप निश्चित टालिए
कुम्हारों से लें दिए, तम को हराएँ आप-हम
अधर पर मृदु मुस्कराहट हो तनिक भी अब न कम
जब मिलें
तब लग गले
सुख-दुःख बता-सुन जाइये
क्या लिखूँ?
कैसे लिखूँ?
कब कुछ लिखूँ, बतलाइये?
*

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मंगलवार, 24 अक्टूबर 2017

doha

दोहा सलिला 

परमब्रम्ह ओंकार है, निराकार-साकार 
चित्रगुप्त कहते उसे, जपता सब संसार 
*
गणपति-शारद देह-मन, पिंगल ध्वनि फूत्कार
लघु-गुरु द्वैताद्वैत सम, जुड़-घट छंद अपार 
वेद-पाद बिन किस तरह, करें वेद-अभ्यास 
सुख-सागर वेदांग यह, पढ़-समझें सायास 
*
नेह नर्मदा की लहर, सम अवरोहारोह 
गति-यति, लय का संतुलन, सार्थक मन ले मोह 
*
लिपि-अक्षर मिल शब्द हो, देते अर्थ प्रतीति 
सार्थक शब्दों में निहित, सबके हित की नीति 
*
वर्ण-मात्रा-समुच्चय, गद्य-पद्य का मूल
वाक्य गद्य, पद पद्य बन, महके जैसे फूल 
*
सबका हित साहित्य में, भर देता है जान   
कथ्य रुचे यदि समाहित, भाव-बिम्ब-रसवान  
*
वर्ण मात्रा भाव मिल, रच देते हैं छंद 
गति-यति-लय की त्रिवेणी, लुटा सके आनंद 
*
दृश्य-प्रतीकों से बने, छंद सरस गुणवान 
कथन सारगर्भित रहे, कहन सरस रसखान 
*


मदिरा सवैया

रचना विधान- (गुरु लघु लघु x ७) + गुरु
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कार्य व कारण भिन्न दिखें पर भिन्न नहीं दिखते भर हैं
साध्य व साधन एक नहीं पर एक बने फ़लते तब हैं
तीर व लक्ष्य न एक हुए यदि तो न धनुर्धर जीत सके
ज्यों विधि विष्णु व शंकर हैं त्रय एक नहीं पर एक सखे!
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