मंगलवार, 9 जुलाई 2019

कार्यशाला : कुण्डलिया

©️ कार्य शाला 
दोहा से कुण्डलिया - कुण्डलिया के विविध अंत 
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अपना तो कुछ है नहीं,सब हैं माया जाल
धन दौलत की चाह में,रूचि न सुख की दाल  - शशि पुरवार 
रुची न सुख की दाल, विधाता दे पछताया।
मूर्ख मनुज क्या हितकर यह पहचान न पाया।।
सत्य देख मुँह फेर, देखता मिथ्या सपना।

चाह न सुख संतोष, मानता धन को नपना।। -संजीव 'सलिल'
*
कुण्डलिया के विविध अंत:
पहली पंक्ति का उलट फेर
सब हैं माया जाल, नहीं है कुछ भी अपना
एक चरण  
सत्य देख मुख फेर, दुःख पाता फिर-फिर वहीं  
कहते ऋषि मुनि संत, अपना तो कुछ है नहीं 
शब्द समूह 
सत्य देख मुख फेर, सदा माला जपना तो 
बनता अपना जगत, नहीं कुछ भी अपना तो 
एक शब्द
देता धोखा वही, बन रहा है जो अपना 
एक अक्षर 
खाता धोखा देख, अहर्निश  मूरख सपना 
एक मात्रा 
रो-पछताता वही, नहीं जो जाग सम्हलता
*  



द्वि इंद्रवज्रा सवैया
सम वर्ण वृत्त छन्द इन्द्रवज्रा के दो चरण (प्रत्येक चरण में 11-11 वर्ण, लक्षण ''स्यादिन्द्रवज्रा यदि तौ जगौ गः'' अर्थात इन्द्रवज्रा के प्रत्येक चरण में दो तगण, एक जगण + दो गुरु वर्ण) हैं । इसका स्वरुप इस प्रकार है-



ऽऽ । ऽऽ । ।ऽ । ऽऽ

तगण तगण जगण दो गुरु

उदाहरण-
विद्येव पुंसो महिमेव राज्ञः

प्रज्ञेव वैद्यस्य दयेव साधोः।

लज्जेव शूरस्य मुजेव यूनो,

सम्भूषणं तस्य नृपस्य सैव॥

उदाहरण-

०१. होता उन्हें केवल धर्म प्यार, सत्कर्म ही जीवन का सहारा

०२. माँगो न माँगो भगवान देंगे

चाहो न चाहो भव तार देंगे।

होगा वही जो तकदीर में है,

तदबीर के भी अनुसार देंगे।। -संजीव

०३. आवारगी से सबको बचाना

सीखा यही है सबको सिखाना

जो काम आये वह काम का है

जो देश का है वह नाम का है -रामदेव लाल विभोर

०४. नाते निभाना मत भूल जाना

वादा किया है करके निभाना

तोडा भरोसा जुमला बताया

लोगों न कोसो खुद को गिराया -संजीव

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