शुक्रवार, 10 मार्च 2017

muktak

मुक्तक 
कांता रॉय 
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साँझ की छाया ढली, फिर याद कोई आ गया  
याद चंदन, वदन पुलकित, कौन मन पर छा गया 
छवि मनोहर आँख में प्रतिभासती मन हर रही
सुनहली यादों के घोड़े चढ़ मुझे हरषा गया 
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