मंगलवार, 21 मार्च 2017

muktak-muktika

मुक्तक
मौन वह कहता जिसे आवाज कह पाती नहीं. 
क्या क्षितिज से उषा-संध्या मौन हो गाती नहीं. 
शोरगुल से शीघ्र ही मन ऊब जाता है 'सलिल'- 
निशा जो स्तब्ध हो तो क्या तुम्हें भाती नहीं?
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मुक्तिका
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मौन वह कहता जिसे आवाज कह पाती नहीं।
क्या क्षितिज से उषा-संध्या मौन हो गाती नहीं?

शोरगुल से शीघ्र ही मन ऊब जाता है 'सलिल'-
निशा जो स्तब्ध हो तो क्या तुम्हें भाती नहीं?

कशिश-आकर्षण न हो तो घूमता नित सूर्य क्यों?
मोह होता यदि नहीं तो धरा तरसाती नहीं।।

बँध शिखा के पाश में दे आहुति निज प्राण की।
पतंगा खुश है, लगावों में कमी आती नहीं।।

खिंचावों से दूर रहना कहो संभव है कहाँ?
भोगता जो योग को क्या वही वैरागी नहीं?


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