शुक्रवार, 10 मार्च 2017

holi ke hurhure

होरी के जे हुरहुरे
संजीव 'सलिल'

होरी के जे हुरहुरे, लिये स्नेह-सौगात
कौनऊ पढ़ मुसक्या रहे, कौनऊ दिल सहलात 
कौनऊ दिल सहलात, किन्हऊ खों चढ़ि गओ पारा,
जिन खों पारा चढ़े, होय उनखों मूं कारा।   
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मुठिया भरे गुलाल से, लै पिचकारी रंग। 
रंग कांता खों मले, सत्यजीत भई जंग।। 
कि बोलो सा रा रा रा.....
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बिरह-ब्यथा मिथलेस की, बिनसे सही न जाय।
छोड़ मुंगेली जबलपुर, आखें धुनी रमांय। 
कि बोलो सा रा रा रा.....
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गायें संग प्रमोद के, विहँस कल्पना फाग।
पहन प्रेरणा घूमतीं, फूल-धतूरा पाग।। 
कि बोलो सा रा रा रा.....
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मुग्ध मंजरी देखकर, भूला राह बसंत।
मधु हाथों मधु पानकर, पवन बं रहे संत।। 
कि बोलो सा रा रा रा.....
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विनिता की महिमा 'सलिल', मो सें बरनि न जाय।
दोहा-पिचकारी चला, घर छिप धता बतांय।। 
कि बोलो सा रा रा रा.....
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नीला-पीला रंग सुमन, चेहरे-छाया खूब।
श्याम घटा में चाँदनी, जैसे जाए डूब।। 
कि बोलो सा रा रा रा.....
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गूझों का आनंद लें, लुक-छिप मृदुला माँग। 
अनिल बीच में रोककरकर, अडा रहे हैं टाँग। 
कि बोलो सा रा रा रा.....
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लाल गाल कर उषा के, अरुण हुआ मदमस्त
सेव-पपडिया खा हुईं, मुदित सुनीता पस्त
कि बोलो सा रा रा रा.....
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काट लिए वनकोटि फिर, चाहें पुष्प पलाश।  
माया-ममता बिन 'सलिल', फगुआ हुआ हताश।। 
कि बोलो सा रा रा रा.....
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