रविवार, 20 दिसंबर 2009

HINDI POETRIC TRANSLATION OF MEGHDOOTAM 51 to 55

HINDI POETRIC TRANSLATION OF MEGHDOOTAM 51 to 55
by Prof. C. B.Shrivastava
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ब्रह्मावर्तं जनपदम अथ च्चायया गाहमानः
क्षेत्रं क्षत्रप्रधनपिशुनं कौरवं तद भजेथाः
राजन्यानां शितशरशतैर यत्र गाण्डीवधन्वा
धारापातैस त्वम इव कमलान्य अभ्यवर्षन मुखानि॥१.५१॥
उसे पार कर , रमणियों के नयन में
झूलाते हुये रूप अपना सुहाना
दशपुर निवासिनि चपल श्याम स्वेता
भ्रमर कुंद सी भ्रूलता में दिखाना
शब्दार्थ .. भ्रूलता भौंह रूपी लता अर्थात भौहो का चपल संचालन


हित्वा हालाम अभिमतरसां रेवतीलोचनाङ्कां
बन्धुप्रीत्या समरविमुखो लाङ्गली याः सिषेवे
कृत्वा तासाम अधिगमम अपां सौम्य सारस्वतीनाम
अन्तः शुद्धस त्वम अपि भविता वर्णमात्रेण कृष्णः॥१.५२॥
फिर छांहतन ! जा वहां पार्थ ने की
जहाँ वाण वर्षा कुरुक्षेत्र रण में
नृपति मुख विवर में कि ज्यों हो तुम्हारी
सघन धार वर्षा कमल पुष्प वन में


तस्माद गच्चेर अनुकनखलं शैलराजावतीर्णां
जाह्नोः कन्यां सगरतनयस्वर्गसोपानपङ्क्तिम
गौरीवक्त्रभ्रुकुटिरचनां या विहस्येव फेनैः
शम्भोः केशग्रहणम अकरोद इन्दुलग्नोर्मिहस्ता॥१.५३॥
गृहयुद्ध रत बन्धुजन प्रेम हित हो
विमुख युद्ध से त्याग मादक सुरा को
जिसे रेवती की मदिर दृष्टि ने
प्रेमरस घोलकर और मादक किया हो
बलराम ने जिस नदी नीर का सौभ्य
सेवन किया औ" लिया था सहारा
उसी सरस्वती का मधुर नीर पी
श्याम रंगतन ! हृदय शुद्ध होगा तुम्हारा


तस्याः पातुं सुरगज इव व्योम्नि पश्चार्धलम्बी
त्वं चेद अच्चस्फटिकविशदं तर्कयेस तिर्यग अम्भः
संसर्पन्त्या सपदि भवतः स्रोतसि च्चाययासौ
स्याद अस्थानोपगतयमुनासंगमेवाभिरामा॥१.५४॥
आगे तुम्हें हिमालय से उतरती
कनखल निकट मिलेगी जन्हुकन्या
सगर पुत्र हित स्वर्ग सोपान जो बन
धरा स्वर्ग संयोगिनी स्वयं धन्या
धरे चंद्र की कोर को उर्मिकर से
उमा का भृकुटि भंग उपहास करके
फेनिल तरल , मुक्त मधुहासिनी जो
जहाँ केश से लिप्त शंकर शिखर के

शब्दार्थ .. कनखल... हरिद्वार के निकट एक स्थान
जन्हुकन्या..गंगा नदी

आसीनानां सुरभितशिलं नाभिगन्धैर मृगाणां
तस्या एव प्रभवम अचलं प्राप्य गौरं तुषारैः
वक्ष्यस्य अध्वश्रमविनयेन तस्य शृङ्गे निषण्णः
शोभां शुभ्रां त्रिनयनवृषोत्खातपङ्कोपमेयम॥१.५५॥
सुरगज सदृश अर्द्ध अवनत गगनगंग
अति स्वच्छ जलपान उपक्रम करो जो
चपल नीर की धार में बिम्ब तो तब
दिखेगा कि अस्थान यमुना मिलन हो

शब्दार्थ .. गगनगंग..आकाशगंगा
अस्थान यमुना मिलन .. गंगा यमुना मिलन स्थल तो प्रयाग है , पर अस्थान ामिलन अर्थात प्रयाग के अतिरिक्त कही अंयत्र मिलना

1 टिप्पणी:

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' ने कहा…

सरस, सहज, सरल काव्यानुवाद मर्मस्पर्शी है. साधुवाद.