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सोमवार, 6 जुलाई 2026

हिन्दी में तकनीकी शिक्षा



हिन्दी में तकनीकी शिक्षा

भारतीय संविधान की 22 मान्यता प्राप्त भाषाएँ भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में निम्नलिखित 22 भाषाओं को आधिकारिक तौर पर मान्यता दी गई है: असमिया, बंगाली, गुजराती, हिंदी, कन्नड़, कश्मीरी, कोंकणी, मलयालम, मणिपुरी, मराठी, नेपाली, उड़िया, पंजाबी, संस्कृत, सिंधी, तमिल, तेलुगु, उर्दू, बोडो, संथाली, मैथिली और डोगरी।
वर्णमालानुसार
सर्व श्री
०० -अनामिका तिवारी कृषि जबलपुर 
०० -अनामिका बर्मन कंप्यूटर साइंस विद्यार्थी जबलपुर।
०० -अनिल कुमार कोरी विद्युत जबलपुर।
०० -अर्जुन चव्हाण कोल्हापुर
०० -अरुण अर्णव खरे मैकेनिकल भोपाल।
०० -अल्फिया नाज विद्यार्थी प्रबंधन जबलपुर।
०० -अवधेश सक्सेना, सिविल नोएडा।
०० -अव्यक्त अग्रवाल शिशु रोग चिकित्सा जबलपुर।
-आकाश जैन, सिविल जबलपुर।
-आयशा बानो मंसूरी फार्मेसी जबलपुर।
-आशुतोष सक्सेना कम्प्यूटर साइंस बेगलुरु।
-ए.पी.सिंह महासचिव आई जी एस दिल्ली।
-कल्याणी बैरागी रसायन जबलपुर।
-कृष्णकांत शिवहरे गणित जबलपुर
-गीतिका श्रीवास्तव कम्प्यूटर साइंस जबलपुर।
-देवेंद्र गोंटिया 'देवराज' सिविल जबलपुर।
-नमिता राजपूत भौतिकी जबलपुर।
-नरेंद्र कुमार गोंटिया, कृषि यांत्रिकी जबलपुर।
-निधि खन्ना, कृषि यांत्रिकी, जबलपुर।
-नीलम अग्रवाल, फैशन तकनालाजी जबलपुर
0 -नैंसी केशरी कम्प्यूटर साइंस जबलपुर।
-पंकज जैन ए आई जबलपुर।
-प्रज्जयंत पाठक विद्युत जबलपुर।
-प्रियंका चौबे गणित जबलपुर।
-बिपिन त्रिवेदी मैकेनिकल जबलपुर।
-भागीरथ विश्वकर्मा छात्र।
-भूषण कुमार विद्यार्थी ज्ञानगंगा।
-मेघा अग्रवाल जबलपुर।
-रघुराज सिंह कर्मयोगी रेलवे कोटा।
-रवींद्र तोमर सिविल जबलपुर।
-रामचंद्र चौरसिया खनन यांत्रिकी जबलपुर।
-राजीव जैन मैकेनिकल जबलपुर।
-राजेंद्र कुमार शर्मा 'राही' सिविल भोपाल।
-राजेंद्र लड़िया व्यवसाय प्रबंधन जबलपुर।
-राम नारायण खरे अंबिकापुर।
-रोहित मिश्रा, दंत शल्यज्ञ, जबलपुर।
-विवेक रंजन श्रीवास्तव, सिविल, भोपाल।
-वेदांत श्रीवास्तव जबलपुर।
-शिवराम गुप्ता विद्यार्थी ज्ञानगंगा।
-शिवम नंदा विद्युत जबलपुर।
-शोभित वर्मा इलैक्ट्रानिक्स जबलपुर।
-संजय वर्मा, सिविल जबलपुर।
-संजीव वर्मा 'सलिल', सिविल, जबलपुर।
-साक्षी गुप्ता सिविल छात्र जबलपुर।
-सुनील कुमार वाजपेयी, सिविल, लखनऊ।
-सुरेंद्र साहू नेत्र विशेषज्ञ जबलपुर।
-सुरेंद्र सिंह पंवार, सिविल, जबलपुर।
-सोनम विश्वकर्मा विद्युत जबलपुर।
-सौम्या साहू कृषि जबलपुर छात्र।
-स्वाति पटैल सिविल जबलपुर।
-हरिओम पटैल विद्यार्थी ज्ञानगंगा।
-हर्ष श्रीवास्तव विद्युत जबलपुर।
-हेमंत पटैल, जबलपुर।
-हेमेंद्र नाथ सिंह गौतम, सिविल, रीवा।
५२
०००
0 अनामिका बर्मन 

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 और तकनीकी शिक्षा

सारांश 

शिक्षा किसी भी देश की प्रगति का आधार होती है। वर्तमान समय विज्ञान और तकनीक का युग है। ऐसे समय में भारत सरकार द्वारा लागू की गई राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 भारतीय शिक्षा व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन है। इस नीति का उद्देश्य विद्यार्थियों को आधुनिक, व्यावहारिक और रोजगारोन्मुख शिक्षा प्रदान करना है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का मुख्य उद्देश्य शिक्षा को सरल, आधुनिक और विद्यार्थियों के अनुकूल बनाना है। यह नीति विद्यार्थियों में रचनात्मकता, तार्किक सोच, कौशल विकास और आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देती है।
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तकनीकी शिक्षा का महत्व: 

    आज हर क्षेत्र में तकनीक का उपयोग हो रहा है। कंप्यूटर, इंटरनेट, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रोबोटिक्स और डिजिटल तकनीकों ने शिक्षा और रोजगार के क्षेत्र को बदल दिया है। तकनीकी शिक्षा विद्यार्थियों को आधुनिक तकनीकों का ज्ञान प्रदान करती है और उन्हें भविष्य के लिए तैयार करती है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में तकनीकी शिक्षा को विशेष महत्व दिया गया है। अब विद्यार्थियों को विद्यालय स्तर से ही कंप्यूटर शिक्षा, कोडिंग और डिजिटल शिक्षा से जोड़ा जाएगा। इस नीति में व्यावहारिक ज्ञान और कौशल विकास पर विशेष ध्यान दिया गया है।

राजभाषा, कौशल विकास व रोजगार : 

    राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में मातृभाषा को विशेष महत्व दिया गया है। इससे विद्यार्थियों को तकनीकी विषयों को समझने में आसानी होगी। हिंदी माध्यम के विद्यार्थी भी अब तकनीकी शिक्षा को बेहतर ढंग से समझ सकेंगे। नई शिक्षा नीति विद्यार्थियों को केवल सैद्धांतिक ज्ञान तक सीमित नहीं रखती, बल्कि उन्हें व्यावहारिक प्रशिक्षण भी प्रदान करती है। प्रोजेक्ट कार्य, इंटर्नशिप और प्रशिक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से विद्यार्थियों को वास्तविक अनुभव प्राप्त होगा। कोविड-19 महामारी के बाद डिजिटल शिक्षा का महत्व बहुत बढ़ गया है। नई शिक्षा नीति में ऑनलाइन शिक्षा और डिजिटल प्लेटफॉर्म को बढ़ावा दिया गया है। इससे ग्रामीण क्षेत्रों के विद्यार्थियों को भी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त करने का अवसर मिलेगा। तकनीकी शिक्षा विद्यार्थियों को रोजगार के लिए तैयार करती है। आज कंपनियाँ ऐसे युवाओं को प्राथमिकता देती हैं जिनके पास तकनीकी ज्ञान और व्यावहारिक कौशल हो। नई शिक्षा नीति विद्यार्थियों को आत्मनिर्भर बनाने का प्रयास करती है।

निष्कर्ष

    अंततः कहा जा सकता है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 भारतीय शिक्षा प्रणाली में एक ऐतिहासिक परिवर्तन है। यह नीति विद्यार्थियों को आधुनिक तकनीकी ज्ञान, कौशल और रोजगार के अवसर प्रदान करती है। यदि इस नीति को सही ढंग से लागू किया जाए, तो भारत शिक्षा और तकनीक के क्षेत्र में विश्व का अग्रणी राष्ट्र बन सकता है।
000 
परिचय : विद्यार्थी कंप्यूटर साइंस, तक्षशिला, जबलपुर।  

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० डॉ. अनिल कुमार कोरी 
हिंदी में इंजीनियरिंग विषयों का अध्यापन
० 
सारांश: अपने देश के अंतिम कमजोर व्यक्ति को विकास की मुख्य धारा में लाने के लिए हमें हिंदी भाषा को इंजीनियरिंग विषयों के अध्यापन में शामिल करना होगा। अगर हमारे भारत देश को सन् 2047 तक पूर्ण विकसित राष्ट्र बनाना है तो अन्य विकसित राष्ट्रों की तरह हमें हिंदी को इंजीनियरिंग विषयों के अध्यापन में शामिल करना ही होगा। यदि हिंदी भाषा को इंजीनियरिंग विषयों में सम्मिलित कर लिया जाता है तो निश्चित ही हमारा देश वर्ष 2047 तक विकसित राष्ट्रों में शामिल हो जाएगा।
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    हम हिन्दुस्तानी स्वभाव से बहुत सहज एवं सरल होते हैं जब किसी दूसरे के मान-सम्मान की बात आती है तो पूरे मनोयोग से मान-सम्मान करते हैं और अपनों को भूल जाते हैं, यही हालहमारी मातृभाषा हिंदी का है।  अंग्रेजों को देश छोड़े लगभग आठ दशक बीत गए लेकिन इतने वर्षों बाद भी हम अंग्रेजी का मोह नहीं त्याग पाये। वैसे तो हमें सभी भाषाओं का सम्मान करना चाहिए, लेकिन इसके चलते अपनी मातृभाषा का अपमान भी नहीं होने देना चाहिए। हम उन सभी उन्नत देशों पर नज़र डालें चाहे वो अमेरिका, रुस, चीन, जापान या इंग्लैंड तो हम पाएँगे कि सभी देश उन्नति के शिखर पर सिर्फ अपनी मातृभाषा के कारण ही हैं और हम अपनी मातृभाषा हिंदी के प्रति जागरूक बिल्कुल भी नहीं हैं। हिंदी सप्ताह, हिंदी पखवाड़ा या हिंदी दिवस मनाकर ही हम संतुष्ट हो जाते हैं और फिर दुबारा हम हिंदी को भूल जाते हैं।

    हमें याद रखना होगा कि अगर हम अपने देश के अंतिम कमजोर व्यक्ति को अगर मुख्य धारा में लाना चाहते हैं, तो हमें हिंदी भाषा को इंजीनियरिंग विषयों के अध्यापन में शामिल करना ही होगा। अगर हमारे भारत देश को सन् 2047 तक पूर्ण विकसित राष्ट्र बनाना है तो अन्य विकसित राष्ट्रों की तरह हमें हिंदी को इंजीनियरिंग विषयों के अध्यापन में शामिल करना ही होगा। मैं एक उदाहरण देना चाहूंगा कि हमारे जबलपुर इंजीनियरिंग महाविद्यालय जबलपुर के पूर्व प्राचार्य डॉ. एम. पी. चौरसिया जब उच्च अध्ययन पी-एच.डी. करने रूस गये तब उन्होंने वहाँ के हाई वोल्टेज विषय के ऑथर रिज्विक की पुस्तक का अंग्रेजी विषय में अनुवाद किया और वह पुस्तक आज भी पूरे देश में रेफ्रेंस पुस्तक के रूप में उपयोग की जाती है। इस उदाहरण से मैं यह बताना चाहता हूँ कि यदि हमारी मातृभाषा हिंदी को इंजीनियरिंग विषयों में मान्यता होती तो यही पुस्तक ''उच्च विभव'' के रूप में हमारे विषयों में सम्मिलित होती । इसी तरह से यदि हम इंजीनियरिंग विषयों को हिंदी भाषा में अध्ययन कराते तो हम बहुत आसानी से निचले स्तर के विद्यार्थियों को भी प्रथम पंक्ति के विद्यार्थियों तक लाकर खड़ा कर पाते, लेकिन अभी भी वक्त है यदि हिंदी भाषा को इंजीनियरिंग विषयों में सम्मिलित कर लिया जाता है तो निश्चित ही हमारा देश वर्ष 2047 तक विकसित राष्ट्रों में शामिल हो जाएगा।

जबलपुर, उज्जैन तथा सागर में अध्यापन काल के कुछ अनुभव : 

    मेरा अनुभव कहता है कि हमारे महाविद्यालयों में जो भी छात्र प्रवेश लेते हैं उनका माध्यम या तो हिंदी होता है या अँग्रेजी होता है। यहाँ पर मुख्य रूप से ध्यान देने वाली बात ये है , कि दोनो ही माध्यम के ज्यादातर विद्यार्थियों का पारिवारिक एवं आसपास का वातावरण हिंदी माध्यम का होता है। ऐसे विद्यार्थी जिनका वातावरण हिंदी माध्यम का होता है उन्हें भी इंजीनियरिंग विषयों में हिंदी भाषा का प्रयोग आसान होता है।

विद्युत यांत्रिकी शब्दकोश, अनुवाद में कठिनाई व निराकरण :

    मेरे विचार से तकनीकी शब्द हो प्रयोग के लिए प्रचलित हैं उनका अनुवाद ना करते हुए उन्ही प्रचलित शब्दों का प्रयोग इंजीनियरिंग विषयों में हिंदी भाषा में स्वीकार किया जाना उपयुक्त होगा। मैने देखा विद्युत विषयों रजिस्टेंस को प्रतिरोध, वोल्टेज को विभव, करेंट को धारा और इंडक्टेंस को प्रेरण पढ़ना कठिन है अतः उन्हीं प्रचलित शब्दों को हिंदी में प्रयोग किया जाना उचित होगा।
००० 

- विभागाध्यक्ष (विद्युत विभाग) एवं उप प्राचार्य (जेईसी जबलपुर), बैचलर ऑफ इंजीनियरिंग (रीवा इंजीनियरिंग कॉलेज), मास्टर ऑफ इंजीनियरिंग (जेईसी जबलपुर) एंड पीएचडी (आरजीपीवी, भोपाल), पूर्व प्रोफेसर एवं नोडल ऑफिसर इंदिरा गाँधी इंजीनियरिंग कॉलेज सागर म.प्र., फ़ेलो द इंस्टीट्यूशन ऑफ इंजीनियर्स (इंडिया), संस्थापक, अंतस साहित्यिक सांस्कृतिक सामाजिक संस्था जबलपुर, प्रकाशित कृतियां- इलेक्ट्रिकल मशीन एंड प्रोटेक्शन सिस्टम तथा ६ साहित्यिक कृतियाँ। पता- 1083, संजीवनी नगर, गढ़ा, जबलपुर, म.प्र. 482003  
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० प्रोफ़ेसर (डॉ.) अर्जुन चव्हाण, कोल्हापुर 

भारत में तकनीकी शिक्षा के माध्यम के रूप में हिंदी की प्रयोजनमूलकता

सारांश:

      भारत में तकनीकी शिक्षा का माध्यम स्वातंत्र्योत्तर काल से मुख्यतः अंग्रेजी रहा है, जिसके कारण बहुसंख्यक मातृभाषा-भाषी विद्यार्थी अवधारणात्मक स्तर पर पिछड़ते रहे हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने मातृभाषा-आधारित शिक्षा एवं बहुभाषिकता को नीतिगत प्राथमिकता दी है। AICTE ने हिंदी सहित बारह भारतीय भाषाओं में इंजीनियरिंग पाठ्यपुस्तकों के निर्माण की योजना क्रियान्वित की है। प्रस्तुत लेख इस पृष्ठभूमि में हिंदी की प्रयोजनमूलकता का विश्लेषण करता है I अवधारणात्मक स्पष्टता, ग्रामीण-वंचित वर्गों की सहभागिता तथा नवाचार-क्षमता की दृष्टि से लाभ, तथा मानकीकृत शब्दावली के अभाव एवं संस्थागत अवरोध जैसी बाधाओं को रेखांकित करते हुए। इस विषय का अध्ययन यह तर्क प्रस्तुत करता है कि AI आधारित अनुवाद प्रणालियों (भाषिणी, इंडिकट्रांस2) ने हिंदी माध्यम तकनीकी शिक्षा को पहले से अधिक सुगम बना दिया है। निष्कर्षतः हिंदी को तकनीकी शिक्षा का पूरक एवं सशक्त माध्यम बनाना आत्मनिर्भर भारत के ज्ञान-दर्शन के अनुरूप एक नीतिगत आवश्यकता है।

कुंजी शब्द : हिंदी माध्यम शिक्षा, तकनीकी शिक्षा, राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020, मातृभाषा-आधारित शिक्षा, AICTE, तकनीकी शब्दावली, मशीन अनुवाद, ज्ञान-लोकतंत्रीकरण

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प्राक्कथन :

    भारत की भाषिक व्यवस्था विश्व की सर्वाधिक समृद्ध संरचनाओं में से एक है। संविधान की आठवीं अनुसूची में सूचीबद्ध बाईस भाषाओं में हिंदी, जो अनुच्छेद 343 के अंतर्गत राजभाषा है, सर्वाधिक व्यापक भाषिक समुदाय की प्रतिनिधि भाषा है। देश ही नहीं, विदेशों में भी हिंदी के प्रति लगाव और आदर भाव बढने लगा हैI इन पंक्तियों के लेखक की मान्यता है कि ‘‘आज विश्वपटल पर हिंदी एक सक्षम, समृद्ध, सुप्रतिष्ठित संस्कार सम्पन्न राष्ट्र की भाषा के रूप में मान्यता प्राप्त भाषा हैI’’1 

    शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 की धारा 29() स्पष्ट करती है कि शिक्षण का माध्यम यथासंभव बालक की मातृभाषा में होना चाहिएI2  यह इस मनोवैज्ञानिक तथ्य पर आधारित है कि मस्तिष्क उस भाषा में सर्वाधिक ग्रहणशील होता है जिसमें वह बाल्यकाल से चिंतन करता रहा है। तकनीकी विषयों में, जहाँ अवधारणात्मक स्पष्टता केंद्रीय है, यह सिद्धान्त विशेष महत्त्व रखता है।

    हिंदी माध्यम के अंगीकरण से विषय एवं भाषा के दोहरे बोझ से मुक्ति मिलती है तथा ग्रामीण-वंचित विद्यार्थियों की सहभागिता बढ़ती है। इसके विपरीत, माध्यम के अभाव से शैक्षणिक पिछड़ापन, वर्गीय असमानता तथा राष्ट्रीय मानव-संसाधन क्षमता की सीमितता जैसे बहुस्तरीय नुकसान उत्पन्न होते हैं। इन्हीं चुनौतियों के परिप्रेक्ष्य में यह लेख हिंदी की प्रयोजनमूलकता का विवेचन करता है।

विषय-विवेचन :

1.  तकनीकी शिक्षा की आवश्यकता एवं वर्तमान माध्यम-स्थिति

      भारत की विशाल युवा जनसंख्या के लिए तकनीकी शिक्षा रोजगार-सृजन, कौशल-विकास, नवाचार तथा वैश्विक प्रतिस्पर्धा की दृष्टि से राष्ट्रीय अनिवार्यता है। तथापि, स्वातंत्र्योत्तर भारत में इसका माध्यम मुख्यतः अंग्रेजी रहाI एक औपनिवेशिक विरासत जबकि बहुसंख्यक जनसंख्या की भाषिक क्षमता हिंदी तथा क्षेत्रीय भाषाओं में निहित है। AICTE ने 2021-22 से बारह भारतीय भाषाओं (हिंदी, मराठी, गुजराती, बांग्ला, तमिल, तेलुगु, कन्नड, मलयालम आदि) में तकनीकी पाठ्यपुस्तकों के निर्माण की योजना आरंभ की, जिसके अंतर्गत द्वितीय वर्ष की सामग्री हेतु 18.6 करोड़ रुपये आवंटित किए गएI3 AICTE अध्यक्ष प्रो. टी.जी. सीतारम के अनुसार लगभग 600 पाठ्यपुस्तकें इन भाषाओं में तैयार हो चुकी हैं, और AI-आधारित अनुवाद प्रणाली किसी पुस्तक का 80% यथार्थता के साथ दस मिनट में अनुवाद कर सकती है।4 यह व्यवस्था वैकल्पिक है, अनिवार्य नहीं। तथापि चौबीस लाख इंजीनियरिंग सीटों में से मात्र अठारह लाख ही भर पाती हैं, जो अंग्रेजी की प्रधानता अभी भी सुदृढ़ बने रहने का संकेत है।

2.  पिछड़ने के कारण :

      भाषाई अवरोध सर्वाधिक मूलभूत कारण हैI विषय और भाषा का युगपत् बोध संज्ञानात्मक भार बढ़ाता है। शिक्षा की पहुँच में असमानता, अंग्रेजी पर अत्यधिक निर्भरता तथा भारतीय भाषाओं में मानकीकृत तकनीकी शब्दावली का अभाव अतिरिक्त बाधाएँ हैं। वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली आयोग (CSTT) ने 1961 से कार्य करते हुए लगभग आठ लाख शब्दों का मानकीकरण किया है5 परन्तु इनका शिक्षण-प्रक्रिया में व्यावहारिक प्रचलन सीमित है। इन सबका संचयी परिणाम शोध एवं नवाचार में राष्ट्रीय सीमाओं के रूप में प्रकट होता है।

3.  राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 तथा मातृभाषा का महत्त्व :

      NEP 2020 के अनुच्छेद 4.11 के अनुसार, जहाँ संभव हो, शिक्षण का माध्यम कम से कम कक्षा पाँच तक, अधिमानतः कक्षा आठ तक, मातृभाषा/स्थानीय भाषा होनी चाहिएI6 यह RTE अधिनियम 2009 की धारा 29() से सुसंगत है। नीति मूलतः त्रिभाषा सूत्र, समावेशी शिक्षा तथा ज्ञान के लोकतंत्रीकरण पर बल देती है और किसी भाषा को थोपने का निषेध करती है। दीक्षा पोर्टल जैसी पहले पहली से बारहवीं कक्षा तक तैंतीस भारतीय भाषाओं में सामग्री उपलब्ध कराती हैं।7 AICTE की बारह-भाषा पाठ्यपुस्तक योजना इस नीतिगत संकल्प का प्रत्यक्ष संस्थागत क्रियान्वयन है।

4.  तकनीकी, अभियांत्रिकी एवं चिकित्सा शिक्षा में हिंदी का महत्त्व :

      ज्ञान ग्रहण की सहजता तथा अवधारणात्मक स्पष्टता हिंदी माध्यम का सर्वप्रथम लाभ हैI भाषिक अपरिचय भ्रम उत्पन्न कर सकता है, भले ही अंतर्निहित सिद्धान्त सरल हो। यह ग्रामीण-वंचित वर्गों के सशक्तीकरण तथा राष्ट्रीय ज्ञान-संरचना के विकास से जुड़ा है, जो आत्मनिर्भर भारत की अवधारणा से संगत है। सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र में भाषिणी (BHASHINI) जुलाई 2022 में आरंभ राष्ट्रीय भाषा अनुवाद मिशनबाईस भाषाओं में वाक् पहचान, मशीन अनुवाद तथा लिप्यंतरण सुविधाएँ देता हैI8  IIT मद्रास के AI4 भारत केंद्र द्वारा विकसित इंडिकट्रांस2 मॉडल सभी बाईस अनुसूचित भाषाओं को समर्थन देने वाला प्रथम अनुवाद मॉडल है, जो 23 करोड़ से अधिक द्विभाषिक वाक्य-युगलों पर प्रशिक्षित हैI9 अभियांत्रिकी में हिंदी सहित आठ भारतीय भाषाओं में कंप्यूटर विज्ञान एवं इंजीनियरिंग पाठ्यक्रम 2021-22 से उपलब्ध कराए गए हैं; AICTE अध्यक्ष डॉ. अनिल सहस्रबुद्धे के अनुसार मातृभाषा में तकनीकी शिक्षा विद्यार्थियों की आधारभूत समझ को सशक्त करती है।10 चिकित्सा शिक्षा में मातृभाषा रोगी-चिकित्सक संवाद तथा जनस्वास्थ्य जागरूकता को अधिक प्रभावी बनाती है, यद्यपि यह क्षेत्र अभी आरंभिक अवस्था में है।

5.  प्रमुख समस्याएँ एवं समाधान :

      मानकीकृत शब्दावली का अभाव, गुणवत्तापूर्ण पाठ्यसामग्री की कमी, प्रशिक्षित शिक्षकों का अभाव, अनुवाद-संबंधी सीमाएँ, AI-अनुवाद की विश्वसनीयता 80% से अधिक न होना,    तथा यह व्यापक धारणा कि भारतीय भाषाएँ जीवन में आगे नहीं ले जा सकतींI ये सभी संस्थागत-मानसिक अवरोध इस परिवर्तन के मार्ग की प्रमुख बाधाएँ हैं। समाधान हेतु आवश्यक है: CSTT के 'शब्द' डिजिटल भंडार (बाईस लाख से अधिक प्रविष्टियाँ)11 का व्यापक संस्थागत उपयोग; AICTE की पाठ्यपुस्तक योजना का सभी वर्षों-शाखाओं तक विस्तार; शिक्षक-प्रशिक्षण कार्यक्रम; AI अनुवाद प्रणालियों का निरंतर परिष्कार; तथा NEP 2020 के मातृभाषा-प्रावधानों के क्रियान्वयन हेतु सतत नीतिगत एवं बजटीय सहायता। जिस गति से समाधान का क्रियान्वयन होगा, उसी के अनुपात में तकनीकी शिक्षा के माध्यम भाषा के रूप में हिंदी को सुस्थापित करना सुलभ होगा I साथ ही उस राष्ट्र का भी भला होगा, जिसके हम निवासी हैं और जिसकी भाषा हिंदी है I   

निष्कर्ष :

भारत में तकनीकी शिक्षा के माध्यम के रूप में हिंदी की प्रयोजनमूलकता एक बहुआयामी एवं व्यावहारिक रूप से क्रियान्वयन-योग्य संभावना है। NEP 2020 ने मातृभाषा-आधारित शिक्षा को संवैधानिक तथा नीतिगत आधार दिया है और AICTE की पहलों ने इसे संस्थागत कार्यक्रमों में रूपांतरित करना आरंभ किया है। बारह भारतीय भाषाओं में निर्मित होती पाठ्यपुस्तकें, तथा अठारह से अधिक संस्थानों में पहले से ही प्रारंभ हुए क्षेत्रीय-भाषा पाठ्यक्रम, यह प्रमाणित करते हैं कि यह परिवर्तन अब केवल कागजी नीति नहीं अपितु ज़मीनी क्रियान्वयन की दिशा में अग्रसर है। तथापि, तकनीकी तथा पारिभाषिक शब्दावली, पाठ्यसामग्री तथा शिक्षक-प्रशिक्षण संबंधी संरचनात्मक बाधाएँ अभी भी विद्यमान हैं, जिनके समाधान हेतु बहु-हितधारक, समन्वित तथा सतत प्रयासों की आवश्यकता हैI केवल नीतिगत घोषणाओं से यह परिवर्तन पूर्ण नहीं हो सकता। भाषिणी तथा इंडिकट्रांस2 जैसी AI आधारित अनुवाद प्रणालियों के विकास ने इस परिवर्तन को पहले से कहीं अधिक व्यावहारिक एवं सुगम बना दिया है, जिससे अनुवाद की पारंपरिक बाधा समय एवं व्यय दोनों की दृष्टि से उल्लेखनीय रूप से कम हुई है।

      अंततः यह रेखांकित करना अत्यंत आवश्यक लगता है कि हिंदी को तकनीकी शिक्षा के माध्यम के रूप में अपनाना केवल भाषाई प्रश्न नहीं, अपितु यह ज्ञान-लोकतंत्रीकरण, सामाजिक न्याय, शैक्षिक समानता, कौशल विकास तथा आत्मनिर्भर भारत के निर्माण से जुड़ा एक व्यापक शिक्षा-दार्शनिक प्रश्न है। जब तकनीकी ज्ञान भाषिक अवरोधों से मुक्त होकर देश के प्रत्येक कोने तक ग्रामीण से नगरीय, वंचित से संभ्रांत समान रूप से सुलभ होगा, तभी भारत अपनी संपूर्ण मानव-संसाधन क्षमता का सही रूप में उपयोग कर सकेगा। इसकी सफलता पर ज्ञान-समृद्ध तथा आत्मनिर्भर भारत के निर्माण को गति मिलेगी, इसमें संदेह नहीं।

संदर्भ सूची (APA Style):

1.   विश्वमंच पर हिंदी : विविध आयाम – प्रोफेसर (डॉ.) अर्जुन चव्हाण, पृष्ठ 8, अमन प्रकाशन, कानपुर, प्रथम सं. 2021

2.   Government of India. (2009). The Right of Children to Free and Compulsory Education Act, 2009 (Section 29(f)). https://www.education.gov.in/rte

3.   India Education Diary. (2022, July 15). AICTE bets big on engineering in Indian languages, undertakes the translation of technical books in 12 scheduled languages. https://indiaeducationdiary.in/aicte-bets-big-on-engineering-in-indian-languages-undertakes-the-translation-of-technical-books-in-12-scheduled-languages/

4.   Elets digitalLEARNING. (2025, April 8). AICTE to provide engineering textbooks in 12 Indian languages by 2026. https://digitallearning.eletsonline.com/2025/04/aicte-to-provide-engineering-textbooks-in-12-indian-languages-by-2026/

5.   Commission for Scientific and Technical Terminology. (n.d.). About CSTT. Ministry of Education, Government of India. https://www.cstt.education.gov.in/en

6.   Government of India. (2020). National Education Policy 2020 (Para 4.11). Ministry of Education. https://www.education.gov.in/sites/upload_files/mhrd/files/NEP_Final_English_0.pdf

7.   Press Information Bureau, Government of India. (n.d.). Education in mother tongue. https://www.pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=1847061

8.   Digital India Bhashini Division. (n.d.). Bhashini. Ministry of Electronics and Information Technology, Government of India. https://en.wikipedia.org/wiki/Bhashini

9.   Gala, J., Chitale, P. A., AK, R., Gumma, V., Doddapaneni, S., Kumar, A., Nawale, J., Sujatha, A., Puduppully, R., Raghavan, V., Kumar, P., Khapra, M. M., Dabre, R., & Kunchukuttan, A. (2023). IndicTrans2: Towards high-quality and accessible machine translation models for all 22 scheduled Indian languages. Transactions on Machine Learning Research. https://arxiv.org/abs/2305.16307

10. Punekar News. (2021, May 27). Students can now take classes of engineering in their mother tongue: AICTE. https://www.punekarnews.in/students-can-now-take-classes-of-engineering-in-their-mother-tongue-aicte/

11. ForumIAS. (2024, September 13). Commission for Scientific and Technical Terminology (CSTT). https://forumias.com/blog/commission-for-scientific-and-technical-terminology-cstt/

- पूर्व अध्यक्ष, हिंदी विभाग, शिवाजी विश्वविद्यालय, कोल्हापुर, महाराष्ट्र, प्रदेश अध्यक्ष महाराष्ट्र विश्व हिंदी परिषद नई दिल्ली, पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई द्वारा राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित, ६५ से अधिक पुस्तकें प्रकाशित, १५० से अधिक शोध-पत्रों का लेखन, ५५० से अधिक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठियों में अध्यक्ष, बीज भाषक, अतिथि, विशेषज्ञ के रूप में कार्य, ६० से ज्यादा पीएच. डी. तथा एम्. फिल. के शोध मार्गदर्शक, ५० से अधिक अंतरराष्ट्रीय, राष्ट्रीय, साहित्य अकादमी आदि पुरस्कारों से सम्मानित, साहित्यिक सांस्कृतिक- आयोजनों में मारिशस, उज़्बेकिस्तान, रूस, श्रीलंका आदि देशों की यात्राऍं, अनेक राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं में विभिन्न पदों पर कार्यरत। निवास : 'अक्षर' बंगला, 11/1, आर के नगर 3 के पास, मोरेवाडी, कोल्हापुर 416013 महाराष्ट्र, चलभाष : 9422423660, वाट्सऐप : 9075095034
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० अरुण अर्णव खरे

डिजिटल युग, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और हिंदी तकनीकी कंटेंट : अवसर, चुनौतियाँ और भविष्य 

सारांश: इक्कीसवीं सदी का तीसरा दशक मानव सभ्यता के इतिहास में डिजिटल परिवर्तन के युग के रूप में दर्ज किया जाएगा। इंटरनेट, स्मार्टफोन, क्लाउड कंप्यूटिंग और अब कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence) ने ज्ञान के सृजन, संग्रह, प्रसार और उपयोग की पूरी प्रक्रिया बदल दी है। आज सूचना किसी पुस्तकालय या विश्वविद्यालय की चारदीवारी तक सीमित नहीं है, बल्कि कुछ सेकंड में दुनिया के किसी भी कोने तक पहुँच जाती है। भारत जैसे बहुभाषी देश में यह परिवर्तन और भी महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि यहाँ करोड़ों लोग अपनी मातृभाषा में ज्ञान प्राप्त करना चाहते हैं। लंबे समय तक विज्ञान और तकनीक का अधिकांश साहित्य अंग्रेज़ी तक सीमित रहा, किंतु डिजिटल युग और एआई ने हिंदी में तकनीकी कंटेंट के नए द्वार खोल दिए हैं। अब प्रश्न यह नहीं है कि हिंदी में तकनीकी सामग्री उपलब्ध होगी या नहीं, बल्कि यह है कि वह कितनी प्रामाणिक, उपयोगी और भविष्योपयोगी होगी।

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बदलती हुई समय की तस्वीर

    पिछले एक दशक में भारत में इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की संख्या में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। सस्ते स्मार्टफोन, 4जी–5जी नेटवर्क, डिजिटल भुगतान, ई-गवर्नेंस और ऑनलाइन शिक्षा ने तकनीक को आम नागरिक तक पहुँचा दिया है। गाँवों और छोटे शहरों का युवा अब केवल मनोरंजन के लिए इंटरनेट का उपयोग नहीं करता, बल्कि प्रोग्रामिंग, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल मार्केटिंग, साइबर सुरक्षा, कृषि तकनीक और उद्यमिता जैसे विषय भी सीखना चाहता है।

    यूट्यूब, ब्लॉग, पॉडकास्ट, ऑनलाइन पाठ्यक्रम और सोशल मीडिया ने हिंदी तकनीकी कंटेंट की माँग को कई गुना बढ़ा दिया है। पिछले कुछ वर्षों में हिंदी तकनीकी सामग्री की मात्रा तेजी से बढ़ी है, फिर भी उसकी गुणवत्ता और गहराई में पर्याप्त सुधार की आवश्यकता है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि अधिकांश सामग्री अभी भी अंग्रेज़ी स्रोतों के अनुवाद पर आधारित है। अनेक यूट्यूब वीडियो और ब्लॉग केवल विदेशी लेखों का सरलीकृत रूप प्रस्तुत करते हैं। उनमें मूल अवधारणाओं की व्याख्या, भारतीय संदर्भ, व्यावहारिक उदाहरण और आलोचनात्मक विश्लेषण का अभाव रहता है। उदाहरण के लिए यदि कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर चर्चा हो, तो कई लेख केवल यह बता देते हैं कि एआई क्या है, लेकिन यह नहीं समझाते कि स्वास्थ्य, न्याय, शिक्षा, कृषि या प्रशासन में इसका व्यावहारिक उपयोग कैसे हो सकता है। इसी प्रकार साइबर सुरक्षा, ब्लॉकचेन, क्लाउड कंप्यूटिंग, क्वांटम कंप्यूटिंग अथवा मशीन लर्निंग जैसे विषयों पर अधिकांश हिंदी सामग्री परिचयात्मक स्तर से आगे नहीं बढ़ पाई है।

    दूसरी समस्या तकनीकी शब्दावली की है। एक ही शब्द के लिए अलग-अलग लेखक अलग-अलग हिंदी शब्दों का प्रयोग करते हैं। उदाहरण के लिए Cache के लिए कहीं कैश, कहीं अंतरिम स्मृति, तो कहीं अस्थायी भंडार लिखा जाता है। Cloud Computing को कोई क्लाउड कंप्यूटिंग लिखता है, तो कोई मेघ संगणनComputer के लिए कंप्यूटर और संगणक दोनों प्रचलित हैं। ऐसी विविधता विद्यार्थियों और सामान्य पाठकों में भ्रम उत्पन्न करती है।

    मेरे विचार से मानकीकरण आवश्यक है, लेकिन अति-हिंदीकरण नहीं। भाषा का उद्देश्य संप्रेषण है, परीक्षा लेना नहीं। यदि कोई शब्द पहले से ही विश्वभर में प्रचलित है और हिंदी समाज ने उसे सहज रूप से स्वीकार कर लिया है, तो उसका कृत्रिम अनुवाद करने का कोई विशेष लाभ नहीं है। आज कोई भी व्यक्ति कंप्यूटर, मोबाइल, इंटरनेट, ई-मेल, डाउनलोड, प्रिंटर, स्कैनर, सर्वर, ब्राउज़र, ऐप जैसे शब्द सहजता से समझ लेता है। यदि इनके स्थान पर संगणक, अंतरजाल, अधोभारण, मुद्रक या अनुप्रयोग जैसे शब्द अनिवार्य कर दिए जाएँ, तो तकनीकी लेखन आम पाठक से दूर हो जाएगा। हाँ, जिन शब्दों के लिए सरल, सुबोध और व्यापक रूप से स्वीकार्य हिंदी उपलब्ध है, उनका प्रयोग अवश्य होना चाहिए। उदाहरण के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence), साइबर सुरक्षा (Cyber Security), डेटा गोपनीयता (Data Privacy), डिजिटल भुगतान (Digital Payment) आदि। अर्थात् सर्वोत्तम नीति वही होगी जिसे भाषा-विज्ञानी व्यावहारिक द्विभाषिकता (Pragmatic Bilingualism) कहते हैं। व्यापक रूप से स्वीकृत अंग्रेज़ी शब्दों को देवनागरी में अपनाया जाए और जहाँ आवश्यक हो वहाँ उनके साथ सरल हिंदी अर्थ भी दिए जाएँ।

एआई ने बदल दी लेखन की दुनिया

    एआई ने लेखन प्रक्रिया का स्वरूप बदल दिया है। पहले किसी तकनीकी विषय पर लेख लिखने के लिए लेखक को अनेक पुस्तकों, शोध-पत्रों और वेबसाइटों से सामग्री एकत्र करनी पड़ती थी। प्रारंभिक मसौदा तैयार करने में ही कई घंटे, कभी-कभी कई दिन लग जाते थे। अब वही प्रारंभिक मसौदा एआई कुछ ही मिनटों में तैयार कर सकता है। इससे लेखक का समय बचता है, जिसे वह तथ्यों की जाँच, संदर्भों की पुष्टि, भाषा को अधिक प्रभावशाली बनाने और अपने मौलिक विचार जोड़ने में लगा सकता है। इस प्रकार एआई लेखक का प्रतिस्पर्धी नहीं, बल्कि उसका सक्षम सहायक बन सकता है।

उदाहरण के लिए, यदि किसी लेखक को 'क्वांटम कंप्यूटिंग' पर लेख लिखना है, तो एआई कुछ ही क्षणों में उसकी रूपरेखा, प्रमुख अवधारणाएँ, तकनीकी शब्दों की व्याख्या और विश्व में हुए नवीनतम शोधों का संक्षिप्त परिचय उपलब्ध करा सकता है, किंतु यह तय करना कि कौन-सी जानकारी विश्वसनीय है, भारतीय पाठकों के लिए कौन-से उदाहरण अधिक उपयुक्त होंगे, किन तथ्यों का संदर्भ देना चाहिए और लेख में किस प्रकार का विश्लेषण या निष्कर्ष प्रस्तुत किया जाए, यह कार्य अभी भी लेखक को ही करना पड़ता है। एआई लेखन की गति बढ़ा सकता है, लेकिन लेखन की गुणवत्ता और विश्वसनीयता अभी भी मानव लेखक के विवेक पर निर्भर करती है।

    एक और उदाहरण से मैं अपनी बात स्पष्ट करना चाहता हूँ। किसी शिक्षक को "साइबर सुरक्षा" पर विद्यार्थियों के लिए व्याख्यान तैयार करना हो तो एआई कुछ ही मिनटों में व्याख्यान का प्रारूप, उदाहरण, प्रश्नोत्तरी और प्रस्तुति तैयार कर सकता है, लेकिन शिक्षक को अपने विद्यार्थियों की आयु, समझ, स्थानीय परिस्थितियों और कक्षा के स्तर के अनुसार उसमें आवश्यक परिवर्तन करने होंगे। इसलिए अंतिम प्रभावी व्याख्यान एआई और शिक्षक, दोनों के संयुक्त प्रयास का परिणाम होता है।

    मेरे विचार से यह उदाहरण विशेष रूप से प्रभावी है, क्योंकि यह स्पष्ट करता है कि एआई "पहला ड्राफ्ट" लिखता है, जबकि "अंतिम लेख" लेखक की बौद्धिक क्षमता, अनुभव और दृष्टि से तैयार होता है। यही अंतर एआई को सहायक और मनुष्य को रचनाकार बनाता है।

हिंदी तकनीकी कंटेंट का भविष्य

    आने वाले पाँच से दस वर्षों में हिंदी तकनीकी कंटेंट का स्वरूप आज से बिल्कुल अलग होगा। विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में हिंदी माध्यम के विद्यार्थियों को कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित व्यक्तिगत शिक्षण उपलब्ध होगा। विद्यार्थी अपनी गति और क्षमता के अनुसार पढ़ सकेंगे तथा एआई उन्हें तत्काल प्रतिक्रिया, अभ्यास और त्रुटि-सुधार उपलब्ध कराएगा।

    सॉफ्टवेयर, प्रोग्रामिंग टूल्स, एपीआई दस्तावेज़, तकनीकी प्रशिक्षण और शोध सामग्री भी धीरे-धीरे हिंदी में उपलब्ध होने लगेगी। ओपन-सोर्स समुदाय, विश्वविद्यालय और उद्योग यदि मिलकर कार्य करें तो तकनीकी शब्दावली का मानकीकरण भी संभव होगा। इससे हिंदी केवल साहित्य की भाषा नहीं रहेगी, बल्कि विज्ञान, इंजीनियरिंग, चिकित्सा और कृत्रिम बुद्धिमत्ता की भी प्रभावी भाषा बन सकेगी।

    पिछले कुछ वर्षों में हिंदी तकनीकी पारिस्थितिकी ने उल्लेखनीय प्रगति की है। भारतीय भाषाओं में कंप्यूटिंग के विकास की आधारशिला रखने में सी-डैक (C-DAC) की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण रही है। आज उसी दिशा को भाषिणी, अनुवादिनी और अन्य एआई आधारित परियोजनाएँ नई गति प्रदान कर रही हैं। भारत सरकार की भाषिणी (BHASHINI) परियोजना भारतीय भाषाओं के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित अनुवाद, वाणी पहचान और टेक्स्ट-टू-स्पीच जैसी सुविधाओं के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। अनुवादिनी (Anuvadini), दीक्षा (DIKSHA), स्वयं (SWAYAM) तथा उमंग (UMANG) जैसे प्लेटफॉर्म हिंदी में शिक्षा, ई-गवर्नेंस और डिजिटल सेवाओं की पहुँच बढ़ा रहे हैं। दूसरी ओर ChatGPT, Gemini, Copilot तथा अन्य एआई आधारित उपकरणों ने हिंदी में तकनीकी लेखन, अनुवाद और अध्ययन सामग्री तैयार करना अत्यंत सरल बना दिया है। YouTube पर हजारों हिंदी चैनल अब प्रोग्रामिंग, डेटा साइंस, साइबर सुरक्षा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और वेब डेवलपमेंट जैसे जटिल विषयों को सहज भाषा में समझा रहे हैं। फिर भी अधिकांश सामग्री अभी अंग्रेज़ी स्रोतों पर आधारित अनुवाद या प्रारंभिक स्तर की व्याख्या तक सीमित है। उदाहरणस्वरूप मशीन लर्निंग, क्वांटम कंप्यूटिंग, ब्लॉकचेन या साइबर सुरक्षा जैसे विषयों पर गहन और शोधपरक हिंदी सामग्री अभी भी अपेक्षाकृत कम उपलब्ध है।

एआई बनाम मानव का आईक्यू : क्या मशीन वास्तव में अधिक बुद्धिमान है?

    कृत्रिम बुद्धिमत्ता की बढ़ती क्षमताओं को देखकर अक्सर यह प्रश्न उठता है कि क्या एआई मनुष्य से अधिक बुद्धिमान हो जाएगी। इसका उत्तर सरल "हाँ" या "नहीं" में नहीं दिया जा सकता। आईक्यू परीक्षण मनुष्यों के लिए बनाए गए हैं जबकि एआई के प्रदर्शन को बेंचमार्क (जैसे MMLU, GPQA, ARC, SWE-Bench आदि) से आँका जाता है। फिर भी कुछ शोधकर्ताओं ने जिज्ञासावश आधुनिक एआई मॉडलों पर मानव आईक्यू परीक्षणों के प्रश्न चलाए हैं लेकिन ये अनौपचारिक या प्रयोगात्मक तुलनाएँ भर हैं, न कि एआई का आधिकारिक आईक्यू। कुछ प्रयोगों में ChatGPT-4, Claude और Gemini जैसे मॉडलों ने तर्कशक्ति, भाषा-समझ, गणित और पैटर्न पहचान से जुड़े अनेक प्रश्नों के सही उत्तर दिए। कुछ शोधों में इनके प्रदर्शन की तुलना 120 से 150 या उससे अधिक आईक्यू वाले मनुष्यों के स्तर से की गई। इसके सामानांतर टेरेन्स टाओ या मर्लिन वोस सावंट जैसे व्यक्तियों का अनुमानित आईक्यू 220-230 के आसपास माना जाता है। इतिहास की महानतम महिला शतरंज खिलाड़ियों में से एक जूडित पोल्गार का आई क्यू 170 माना गया है। इसके बावजूद यह तुलना भ्रामक हो सकती है, क्योंकि एआई का मूल्यांकन मानव आईक्यू परीक्षणों से नहीं, बल्कि विशेष बेंचमार्कों से किया जाता है। मनुष्य की मौलिकता, संवेदना, नैतिक विवेक और अनुभवजन्य निर्णय क्षमता का अभी तक कोई समकक्ष माप एआई में उपलब्ध नहीं है।

    एआई की सबसे बड़ी शक्ति उसकी विशाल स्मृति, तीव्र गणना क्षमता और कुछ ही सेकंड में लाखों दस्तावेज़ों का विश्लेषण करने की योग्यता है। इसके विपरीत मनुष्य सीमित जानकारी के आधार पर भी अनुभव, अंतर्ज्ञान, संवेदना, नैतिक विवेक और रचनात्मक कल्पना के सहारे निर्णय ले सकता है। उदाहरण के लिए कोई एआई शेक्सपीयर, प्रेमचंद और निराला की शैली में कविता लिख सकता है, किंतु कविता की अनुभूति नहीं कर सकता, वह करुणा पर लेख लिख सकता है, किंतु करुणा का अनुभव नहीं कर सकता। इसी प्रकार एआई किसी रोग के हजारों शोध-पत्रों का विश्लेषण कर सकता है, पर किसी चिकित्सक की मानवीय सहानुभूति और परिस्थितिजन्य निर्णय क्षमता का स्थान नहीं ले सकता। इसलिए एआई और मनुष्य की तुलना प्रतिस्पर्धियों के रूप में नहीं, बल्कि सहयोगियों के रूप में अधिक उपयुक्त है। भविष्य उसी का होगा जो एआई की गति, विशाल ज्ञान-संग्रह और मानव की विवेकपूर्ण बुद्धि, संवेदना तथा नैतिक निर्णय क्षमता का संतुलित उपयोग करना सीखेगा।

हिंदी के सामने सबसे बड़ी चुनौती

    अधिकांश बड़े एआई मॉडल अंग्रेज़ी और पश्चिमी डेटा पर प्रशिक्षित हैं। परिणामस्वरूप भारतीय सामाजिक संदर्भ, पारिवारिक संरचना और सांस्कृतिक प्रतीकों की व्याख्या कई बार अधूरी या पश्चिमी दृष्टिकोण से प्रभावित दिखाई देती है। इसलिए भारतीय भाषाओं के लिए स्थानीय डेटा, स्थानीय विशेषज्ञता और भारतीय संदर्भों पर आधारित प्रशिक्षण अत्यंत आवश्यक है।

    दूसरा प्रश्न है, क्या हिंदी में तकनीकी कंटेंट विकसित करने से हम दुनिया से कट जाएँगे? यह आशंका स्वाभाविक है कि यदि तकनीकी ज्ञान हिंदी में उपलब्ध कराया जाएगा, तो कहीं हम वैश्विक वैज्ञानिक समुदाय से अलग-थलग तो नहीं पड़ जाएँगे। वास्तव में यह चिंता निराधार है। दुनिया के अनेक विकसित देशों ने अपनी मातृभाषा में शिक्षा, शोध और तकनीकी सामग्री का विशाल भंडार तैयार किया है, फिर भी वे वैश्विक विज्ञान और तकनीक के अग्रणी देशों में शामिल हैं। जापान में अधिकांश इंजीनियरिंग शिक्षा जापानी भाषा में होती है। जर्मनी ने उच्च शिक्षा और औद्योगिक अनुसंधान में जर्मन भाषा को मजबूत बनाए रखा है। फ्रांस आज भी विज्ञान, प्रशासन और तकनीकी दस्तावेज़ों में फ्रेंच को प्राथमिकता देता है। चीन ने इंटरनेट, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, इंजीनियरिंग और डिजिटल प्रौद्योगिकी का विशाल पारिस्थितिकी तंत्र मंदारिन भाषा में विकसित किया है। दक्षिण कोरिया ने भी तकनीकी शिक्षा और डिजिटल सेवाओं का अधिकांश आधार कोरियाई भाषा में तैयार किया है। इन देशों के वैज्ञानिक अंग्रेज़ी जानते हैं, अंतरराष्ट्रीय शोध-पत्र अंग्रेज़ी में भी प्रकाशित करते हैं, किंतु अपने नागरिकों के लिए ज्ञान का प्राथमिक माध्यम अपनी मातृभाषा को ही बनाए रखते हैं।

    भारत के लिए भी यही संतुलित मॉडल अधिक उपयुक्त होगा। प्रारंभिक शिक्षा, तकनीकी प्रशिक्षण, डिजिटल साक्षरता और जनसामान्य के लिए ज्ञान-विज्ञान की सामग्री हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में उपलब्ध होनी चाहिए, जबकि वैश्विक शोध, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और नवीनतम वैज्ञानिक साहित्य तक पहुँच के लिए अंग्रेज़ी का ज्ञान भी समान रूप से आवश्यक है। प्रश्न "हिंदी या अंग्रेज़ी" का नहीं, बल्कि "हिंदी और अंग्रेज़ी" का है। मातृभाषा में ज्ञान सीखने से समझ गहरी होती है, जबकि अंग्रेज़ी वैश्विक संवाद का माध्यम बनती है। यदि हिंदी में उच्च गुणवत्ता का तकनीकी कंटेंट विकसित किया जाता है, तो वह करोड़ों भारतीयों को ज्ञान की मुख्यधारा से जोड़ेगा, न कि उन्हें दुनिया से अलग करेगा। वास्तव में जो समाज अपनी भाषा में ज्ञान का सृजन करता है, वही वैश्विक ज्ञान-समुदाय में अधिक आत्मविश्वास के साथ योगदान देने में सक्षम होता है।

    आवश्यकता ऐसे लेखकों, शिक्षकों और शोधकर्ताओं की है जो सीधे हिंदी में सोचें, लिखें और तकनीकी विषयों को भारतीय संदर्भों के साथ प्रस्तुत करें। तकनीकी शब्दावली का संतुलित प्रयोग भी आवश्यक है। अत्यधिक संस्कृतनिष्ठ शब्द पाठक को दूर कर देते हैं, जबकि अत्यधिक हिंग्लिश भाषा की गरिमा घटा सकती है। इसलिए वही शब्द अपनाने चाहिए जो सरल, प्रचलित और अर्थ-स्पष्ट हों।

    डिजिटल युग और कृत्रिम बुद्धिमत्ता हिंदी के लिए अभूतपूर्व अवसर लेकर आए हैं। आज पहली बार यह संभावना बनी है कि विश्वस्तरीय तकनीकी ज्ञान करोड़ों हिंदी भाषियों तक उनकी अपनी भाषा में पहुँचे। इससे शिक्षा, उद्यमिता, शोध, नवाचार और सामाजिक समावेशन को नई गति मिलेगी। यह भविष्य स्वतः निर्मित नहीं होगा। इसके लिए सरकार, विश्वविद्यालयों, उद्योग, भाषा विशेषज्ञों, तकनीकी समुदाय और लेखकों को मिलकर कार्य करना होगा। एआई को अंतिम लेखक नहीं, बल्कि एक दक्ष सहायक के रूप में स्वीकार करना होगा। तथ्य-जाँच, मौलिक चिंतन, सांस्कृतिक संवेदनशीलता और मानवीय विवेक की भूमिका भविष्य में और अधिक महत्वपूर्ण होगी।

संदर्भ:
1. The Ethics of Artificial Intelligence (Unesco), 2. डिजिटल इंडिया भाषिणी (BHASHINI) – राष्ट्रीय भाषा प्रौद्योगिकी मिशन, 3. सी-डैक (C-DAC) – भारतीय भाषा प्रौद्योगिकी एवं डिजिटल नवाचार संबंधी प्रकाशन, 4. OECD – Artificial Intelligence Policy Observatory, 5. स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय – AI Index Report (वार्षिक वैश्विक एआई रिपोर्ट)

- से.नि. मुख्य अभियंता लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग म.प्र., बी.ई. मेकेनिकल भोपाल विश्व विद्यालय, २ उपन्यास, ५ कहानी संग्रह, ५ व्यंग्य संग्रह, ३ काव्य संग्रह १० पुस्तकें खेलों पर प्रकाशित। आकाशवाणी एवं दूरदर्शन पर वार्ताओं का प्रसारण। अनेक सम्मान। आवास- डी-1/35 दानिश नगर भोपाल (.प्र.) 462026 चलभाष 9893007744, ईमेल: sportsbharti@gmail.com

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0 अल्फिया नाज

नई शिक्षा नीति 2022 और तकनीकी शिक्षा : शिक्षण, अधिगम एवं करियर परिप्रेक्ष्य

सारांश: 
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    नई शिक्षा नीति 2022 का उद्देश्य भारत की शिक्षा व्यवस्था को आधुनिक, व्यावहारिक, कौशल-आधारित तथा रोजगारोन्मुख बनाना है। इस नीति में तकनीकी शिक्षा को विशेष महत्व दिया गया है ताकि विद्यार्थी केवल सैद्धांतिक ज्ञान तक सीमित न रहें, बल्कि व्यावहारिक कौशल भी प्राप्त करें। इससे वे बदलती तकनीक और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के अनुरूप स्वयं को तैयार कर सकें।

    शिक्षण के क्षेत्र में इस नीति के अंतर्गत आधुनिक शिक्षण विधियों, डिजिटल तकनीकों, स्मार्ट कक्षाओं, ई-लर्निंग तथा प्रोजेक्ट-आधारित शिक्षण को बढ़ावा दिया गया है। शिक्षक की भूमिका केवल ज्ञान देने वाले की नहीं, बल्कि मार्गदर्शक और प्रेरक की भी मानी गई है। इससे विद्यार्थियों में रचनात्मकता, नवाचार और समस्या-समाधान की क्षमता विकसित होती है।

    अधिगम (लर्निंग) को अधिक प्रभावी बनाने के लिए अनुभवात्मक शिक्षा, व्यावहारिक प्रशिक्षण, इंटर्नशिप, प्रयोगशाला कार्य तथा उद्योगों के साथ सहयोग पर विशेष बल दिया गया है। विद्यार्थियों को अपनी रुचि और क्षमता के अनुसार विषय चुनने की स्वतंत्रता दी गई है, जिससे सीखना अधिक रोचक और उपयोगी बनता है।

    करियर परिप्रेक्ष्य की दृष्टि से यह नीति अत्यंत महत्वपूर्ण है। तकनीकी शिक्षा के माध्यम से विद्यार्थियों को इंजीनियरिंग, सूचना प्रौद्योगिकी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), रोबोटिक्स, डाटा साइंस, साइबर सुरक्षा तथा अन्य आधुनिक क्षेत्रों में रोजगार और स्वरोजगार के अवसर प्राप्त होते हैं। साथ ही, उद्यमिता (Entrepreneurship), स्टार्टअप संस्कृति तथा कौशल विकास को भी प्रोत्साहित किया गया है, जिससे विद्यार्थी नौकरी खोजने वाले नहीं बल्कि नौकरी देने वाले बन सकें।

    अंततः, नई शिक्षा नीति 2022 और तकनीकी शिक्षा का उद्देश्य ऐसे कुशल, आत्मनिर्भर, नवाचारी तथा जिम्मेदार नागरिक तैयार करना है जो देश के आर्थिक, सामाजिक और तकनीकी विकास में महत्वपूर्ण योगदान दे सकें। यह नीति विद्यार्थियों के शिक्षण, अधिगम एवं करियर निर्माण के लिए एक सशक्त आधार प्रदान करती है।
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परिचय : विद्यार्थी एम ओ एम, तक्षशिला जबलपुर।
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० अवधेश कुमार सक्सेना 

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 और तकनीकी शिक्षा: बदलते भारत का नया स्वरूप 
 
सारांश: 



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    21वीं शताब्दी ज्ञान और तकनीक की शताब्दी है। किसी भी देश की प्रगति इस बात पर निर्भर करती है कि उसकी शिक्षा प्रणाली अपने युवाओं को भविष्य की चुनौतियों के लिए कितना तैयार करती है। भारत सरकार द्वारा लागू की गई राष्ट्रीय शिक्षा नीति देश की शिक्षा व्यवस्था में एक युगांतरकारी बदलाव है, जिसका एक मुख्य स्तंभ तकनीकी शिक्षा को आधुनिक, व्यावहारिक और वैश्विक स्तर का बनाना है।

तकनीकी शिक्षा में मुख्य बदलाव और सुधार

    राष्ट्रीय शिक्षा नीति ने पारंपरिक तकनीकी शिक्षा की सीमाओं को तोड़कर इसे और अधिक लचीला और रोजगारपरक बनाया है। इसके मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:

1. बहु-विषयक दृष्टिकोण: 
पहले तकनीकी शिक्षा (जैसे इंजीनियरिंग) को अन्य विषयों (जैसे कला, मानविकी, या संगीत) से बिल्कुल अलग रखा जाता था। नई नीति के तहत अब एक इंजीनियरिंग का छात्र इतिहास या संगीत भी पढ़ सकता है। आईआईटी जैसे शीर्ष संस्थानों को बहु-विषयक शिक्षा और अनुसंधान विश्वविद्यालयों के रूप में विकसित किया जा रहा है, ताकि छात्रों का समग्र विकास हो सके।

1. बहु प्रवेश एवं निर्गम (मल्टीपल एंट्री और एग्जिट सिस्टम )
अक्सर देखा गया है कि आर्थिक या व्यक्तिगत कारणों से छात्र बीच में ही अभियांत्रिकी (इंजीनियरिंग ) या तकनीकी कोर्स छोड़ देते थे, जिससे उनका साल बर्बाद हो जाता था। अब ऐसा नहीं होगा:
1 वर्ष पूरा होने पर:  प्रमाण पत्र (सर्टिफिकेट )
2 वर्ष पूरा होने पर: उच्च पत्रोपाधि (एडवांस डिप्लोमा )
3 या 4 वर्ष पूरा होने पर: स्नातक उपाधि 

इसके साथ ही 'एकेडमिक बैंक ऑफ क्रेडिट' की शुरुआत की गई है, जहाँ छात्रों के डिजिटल क्रेडिट सुरक्षित रहेंगे, ताकि वे कुछ समय बाद अपनी पढ़ाई वहीं से दोबारा शुरू कर सकें।

1. मातृभाषा और क्षेत्रीय भाषाओं में तकनीकी शिक्षा
राष्ट्रीय शिक्षा नीति का एक बहुत बड़ा क्रांतिकारी कदम तकनीकी शिक्षा को स्थानीय और क्षेत्रीय भाषाओं में उपलब्ध कराना है। अंग्रेजी भाषा की बाध्यता के कारण ग्रामीण पृष्ठभूमि के कई प्रतिभाशाली छात्र तकनीकी क्षेत्रों में पीछे रह जाते थे। अब देश के कई इंजीनियरिंग कॉलेजों में हिंदी, तमिल, तेलुगु, मराठी जैसी भाषाओं में बी.टेक कोर्स शुरू किए जा चुके हैं।

1. भविष्य की तकनीकों पर बल : आज की दुनिया एआई आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस और डेटा की है। नई नीति के तहत तकनीकी शिक्षा के पाठ्यक्रम को उद्योग जगत की मांग के अनुसार बदला जा रहा है। इसमें मुख्य रूप से शामिल हैं:

    आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग 3D प्रिंटिंग और रोबोटिक्स डेटा साइंस और ब्लॉकचेन तकनीक क्लाउड कंप्यूटिंग और साइबर सुरक्षा अनुसंधान और नवाचार को बढ़ावा । तकनीकी शिक्षा केवल किताबी ज्ञान तक सीमित न रहे, इसके लिए अनुसंधान पर विशेष ध्यान दिया गया है:
नेशनल रिसर्च फाउंडेशन : देश में शोध और नवाचार की संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए राष्ट्रीय शोध फाउंडेशन की स्थापना की गई है। यह तकनीकी विश्वविद्यालयों को अनुसंधान के लिए फंड और संसाधन उपलब्ध कराता है, ताकि भारत पेटेंट और नई खोजों के मामले में आत्मनिर्भर बन सके।
इसके अलावा, उद्योगों और तकनीकी संस्थानों के बीच की दूरी को कम करने के लिए इंटर्नशिप को अनिवार्य किया गया है, जिससे छात्रों को वास्तविक कामकाजी माहौल का अनुभव मिल सके।
चुनौतियाँ और आगे की राह
किसी भी नीति की सफलता उसके क्रियान्वयन पर निर्भर करती है। तकनीकी शिक्षा के क्षेत्र में अभी भी कुछ चुनौतियाँ हैं:
ग्रामीण क्षेत्रों में उच्च तकनीक वाले बुनियादी ढांचे और हाई-स्पीड इंटरनेट की उपलब्धता।
शिक्षकों को आधुनिक तकनीकों के अनुसार प्रशिक्षित करना।
क्षेत्रीय भाषाओं में उच्च गुणवत्ता वाली तकनीकी पाठ्यपुस्तकों और डिजिटल सामग्री को लगातार अपडेट करना।
निष्कर्ष
राष्ट्रीय शिक्षा नीति केवल एक दस्तावेज नहीं, बल्कि भारत को वैश्विक ज्ञान महाशक्ति बनाने का एक संकल्प है। तकनीकी शिक्षा में किए गए ये सुधार युवाओं को न केवल 'रोजगार खोजने वाला' बल्कि 'रोजगार देने वाला’ बनने के लिए प्रेरित करेंगे। यदि इस नीति को पूरी निष्ठा के साथ धरातल पर उतारा जाता रहा, तो आने वाले समय में भारतीय तकनीकी विशेषज्ञ पूरी दुनिया का नेतृत्व करेंगे।
० 

- डी.सी.ई. (ऑनर्स), बी. ई. (सिविल), एम. ए. समाजशास्त्र, एलएल. बी., पी.जी.डी.आर.डी., जल संसाधन विभाग मैं 42 वर्ष इंजीनियरिंग सेवा, १८ कृतियाँ प्रकाशित, आकाशवाणी, साधना टीवी, संगम टीवी, साहित्य आज तक, पोएट्री वर्ल्ड में काव्य पाठ, भारत के संविधान को पद्य बद्ध करने में 140 कवियों के समूह में भागीदारी पर हिन्दी भवन दिल्ली में ग्लोबल वर्ल्ड रिकॉर्ड प्राप्त, चलभाष : 9827329102, ईमेल : awadheshsaxena29@gmail.com 
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 ० डॉ. अव्यक्त अग्रवाल 

गिरकर खड़े होने की कला (रेज़िलियेंस) हेतु आवश्यक हिंदी में तकनीकी शिक्षा

सारांश: रेज़िलियेंस जीवन की महत्वपूर्ण क्षमता है।.बच्चों को हर कठिनाई से बचाना आवश्यक नहींहै। हर प्रयास की प्रशंसा करें और अनावश्यक तुलना करने से बचें। .समस्या समाधान की आदत विकसित करें, भावनाओं को स्वीकार करें, परिवार को सुरक्षित और सहयोगी बनाएँ तथा tगलतियों को सीखने का अवसर समझें। पारस्परिक बात-चीत में स्वभाषा का उपयोग करें। विदेशी भाषा बोलने में गौरव अनुभव न करें। 


० 
कुछ महीने पहले एक किशोर अपने माता-पिता के साथ मेरे क्लिनिक में आया। वह पढ़ाई में बहुत अच्छा था। उसने अपनी परीक्षा में 90 प्रतिशत से अधिक अंक प्राप्त किए थे फिर भी उसके चेहरे पर खुशी नहीं थी। वह निराश दिखाई दे रहा था। कारण यह था कि उसके एक मित्र के अंक उससे अधिक थे। कुछ देर चुप रहने के बाद उसने कहा- "मुझे लगता है कि मैं कभी पर्याप्त अच्छा नहीं हूँ।" उसका यह वाक्य मेरे मन में लंबे समय तक रहा।

    आज के समय में हम एक विचित्र स्थिति देख रहे हैं। हमारे बच्चों के पास पहले से अधिक सुविधाएँ हैं, बेहतर शिक्षा है, बेहतर संसाधन हैं, असीमित जानकारी उपलब्ध है फिर भी कई बच्चे असफलता, आलोचना, अस्वीकृति और तुलना की जाने के कारण पहले की पीढ़ियों के बच्चों की तुलना में अधिक असन्तुष्ट दिखाई देते हैं। इसलिए आज हमारी सबसे बड़ी जिम्मेदारी केवल बुद्धिमान बच्चे बनाना नहीं है। हमें ऐसे बच्चे तैयार करने हैं जो जीवन की चुनौतियों का सामना कर सकें।जो गिरें लेकिन फिर उठ खड़े हों। इसी क्षमता को रेज़िलियेंस कहते हैं।

रेज़िलियेंस क्या और क्यों ?

    रेज़िलियेंस का अर्थ है कठिन परिस्थितियों से उबरने की क्षमता। इसका अर्थ यह नहीं कि बच्चे को कभी दुख न हो, कभी असफलता न मिले, कभी तनाव न आए बल्कि इसका अर्थ है दुख, असफलता और तनाव के बाद भी आगे बढ़ते रहने की क्षमता। जीवन में इसकी आवश्यकता इसलिए  है कि जीवन किसी के लिए भी हमेशा आसान नहीं होता। हर बच्चे को कभी न कभी हार, निराशा, आलोचना, दोस्ती टूटने, परीक्षा में असफलता' या किसी अन्य चुनौती का सामना करना पड़ता है। जो बच्चे इन परिस्थितियों से सीख लेते हैं, वे आगे चलकर अधिक सफल और संतुलित वयस्क बनते हैं।

रेसीलिएंस और मातृभाषा

    क्या बच्चों को हर कठिनाई से बचाना चाहिए? हर माता-पिता अपने बच्चे को दुख से बचाना चाहते हैं। यह स्वाभाविक है। यदि हम बच्चे के सामने आनेवाली हर छोटी कठिनाई को हटा देंगे, 
तो वह चुनौतियों से निपटना नहीं सीख पाएगा। जैसे मांसपेशियाँ उपयोग से मजबूत होती हैं, वैसे ही मानसिक मजबूती भी अनुभवों से विकसित होती है। हिंदी में तकनीकी विषय सुनना-समझना, पढ़ना और लिखना एक मानसिक चुनौती प्रस्तुत करती है। आरंभ में तकनीकी जानकारी हिंदी में बोलना -राजा कठिन प्रतीत होता है किंतु क्रमश: सरल होता जाता है। जब बच्चा साइकिल सीखता है तो वह कई बार गिरता है। यदि हर बार हम उसे साइकिल से उतार दें तो वह कभी सीख नहीं पाएगा। लेकिन यदि हम उसके पास खड़े रहें, उसे प्रोत्साहित करें, और दोबारा प्रयास करने दें, तो वह सीख जाता है। जीवन भी कुछ ऐसा ही है।

प्रयास की प्रशंसा कीजिए

    बच्चों की केवल उपलब्धियों की नहीं, बल्कि उनके प्रयासों की भी प्रशंसा कीजिए। जब बच्चा समझता है कि उसकी मेहनत महत्वपूर्ण है, तो वह असफलता से कम डरता है। तुलना रेज़िलियेंस की दुश्मन है। 

"देखो, शर्मा जी का बेटा..."

    यह वाक्य अनेक बच्चों के आत्मविश्वास को नुकसान पहुँचाता है। हर बच्चा अलग है। हर बच्चे की यात्रा अलग है। तुलना की बजाय प्रगति पर ध्यान दीजिए। समस्या नहीं, समाधान सोचने की आदत डालिए। जब बच्चे के सामने कोई समस्या आए तो तुरंत समाधान देने की बजाय पूछिए- "तुम्हारे अनुसार इसका समाधान क्या हो सकता है?" धीरे-धीरे बच्चा मस्या सुलझाने वाला व्यक्ति बनता है। भावनाओं को स्वीकार कीजिए। रेज़िलियेंस का अर्थ भावनाओं को दबाना नहीं है। यदि बच्चा दुखी है, तो उसे दुखी होने का अधिकार है। यदि वह निराश है, तो उसकी बात सुनिए। सुनना-समझना और समर्थन देना मानसिक मजबूती का आधार है।

परिवार सबसे बड़ा सुरक्षा कवच

    जो बच्चे प्रेम, स्वीकृति और सुरक्षा का अनुभव करते हैं, वे कठिन परिस्थितियों से बेहतर उबर पाते हैं। उन्हें पता होता है कि दुनिया चाहे जैसी हो घर उनका सुरक्षित स्थान है।गलतियों को सीखने का अवसर मानिए गलती करना असफलता नहीं है।गलती करना सीखने की प्रक्रिया का हिस्सा है। जो बच्चे गलतियों से डरते नहीं, वे नई चीज़ें सीखने का साहस रखते हैं।

जीवन में सफलता केवल प्रतिभा से नहीं मिलती। मैंने ऐसे अनेक बच्चों को देखा है जो बहुत प्रतिभाशाली थे, लेकिन चुनौतियों के सामने टूट गए और ऐसे भी बच्चे देखे हैं जो साधारण क्षमताओं के बावजूद असाधारण उपलब्धियाँ प्राप्त कर गए। जो जीत गए उनमें एक बात समान थी वे हार मानना नहीं जानते थे। यदि हम अपने बच्चों को गिरकर फिर उठना सिखा दें, तो हमने उन्हें जीवन की सबसे मूल्यवान सीख दे सकेंगे और यह सीख केवल और केवल अपनी भाषा में दी जा सकती है, किसी विदेशी भाषा में नहीं।
००० 
- MBBS, MD वर्तमान में एसोसिएट प्रोफेसर, मेडिकल कॉलेज, जबलपुर के पद पर कार्यरत,वरिष्ठ शिशु रोग विशेषज्ञ, लेखक एवं शोधकर्ता । 20 से अधिक शोध-पत्र राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय शोध पत्रिकाओं में प्रकाशित। उनकी प्रकाशित पुस्तकों में 'सही के हीरो', 'सही के हीरो–2' (कहानी-संकलन) तथा 'Handbook of Pediatric Emergencies for MBBS and MD Students' शामिल हैं।
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० आकाश जैन 

उद्योग की अपेक्षाएँ व भाषा संतुलन: तकनीकी-व्यावसायिक शिक्षा में मातृभाषा का गौरव और सफलता का रोडमैप
लेखक: प्रोफ़ ेसर आकाश जैन
भूवैज्ञानि नि क व असि सि स्टेंट प्रोफ़ ेसर
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वि वि
इंजीनि नि यरि रि ंग वि वि भाग, तक्षशि शि ला इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनि नि यरि रि ंग एंड टेक्नोलॉजी, जबलपुर
प्रस्तावना: भाषाई अस्मि ता और आधुनि क औद्योगि क परि दृश्य
वर्त र्तमान युग अभूतपूर्व र्व तकनीकी संक्रमण, वैश्वि श्वि श्वि करण और कृत्रि त्रि म बुद्धि धि मत्ता (AI) का दौर है। इस चतुर्थ र्थ औद्योगि गि क क्रांति ति (Industry 4.0) के परि रि दृश्य में इंजीनि नि यरि रि ंग, मैनेजमेंट, चि चि कि कि त्सा और साइंस जैसे व्यावहारि रि क व तकनीकी वि वि षयों के छात्रों के समक्ष केवल 'वि वि षय-नि नि ष्ठ योग्यता' (Technical Competence) सि सि द्ध करने की चुनौती नहीं है, बल्कि ल्कि ल्कि अपनी 'अभि भि व्यक्ति क्ति क्ति -क्षमता' (Expressive Power) को वैश्वि श्वि श्वि क मानदंडों के अनुकूल बनाने की भी है। उद्योग जगत की बदलती परि रि भाषा और परि रि वेश से यह सि सि द्ध है कि कि मातृभाषा के बि बि ना कि कि सी प्रकार की उन्नति ति संभव नहीं है।
ऐति ति हासि सि क रूप से हमारे समाज में यह भ्रांति ति रही है कि कि उच्च तकनीकी और प्रबंधकीय शि शि क्षा केवल अंग्रेजी के माध्यम से ही संभव है। परंतु वर्त र्तमान उद्योगों की बदलती 'अपेक्षाएं' और 'भाषा संतुलन' (Language Balance) का सि सि द्धांत इस रूढ़ि ढ़ि वादी सोच को धराशायी कर रहा है। आज का कॉर्पो र्पो रेट जगत यह भली-भांति ति समझ चुका है कि कि मौलि लि क सोच, नवाचार (Innovation) और सृजनात्मकता (Creativity) केवल और केवल व्यक्ति क्ति क्ति की 'मातृभाषा' या 'क्षेत्रीय भाषा' में ही अंकुरि रि त व पल्लवि वि त हो सकती है। इति ति हास गवाह है कि कि मातृभाषा से अलग जा कर अन्य भाषाओं में प्रयोग करके आगे बढ़ ने की कोशि शि श से देश का वि वि कास कभी नहीं हुआ। आज की आवश्यकता ऐसे पेशेवरों की है जो तकनीकी रूप से रीढ़ की हड्डी की तरह मजबूत हों और भाषाई रूप से पानी की तरह लचीले हों।
1. आज की आवश्यकता – 'ग्लोबल' नहीं, 'ग्लोकल' पेशेवर
वर्त र्तमान में उद्योगों की कार्य र्यशैली और उनकी मानव संसाधन (HR) नीति ति यों में एक बड़ ा संरचनात्मक बदलाव आया है। अब उद्योग केवल 'अंग्रेजी' या मशीनी भाषा बोलने वाले युवाओं को नहीं, बल्कि ल्कि ल्कि ऐसे 'ग्लोकल' (Global + Local) पेशेवरों को खोज रहे हैं, जो अंतर्रा र्रा र्राष्ट्रीय स्तर पर भी संवाद कर सकें और भारत के सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों के उपभोक्ताओं से भी उनकी भाषा में जुड़ सकें।
● संज्ञानात्मक वि वि कास (Cognitive Development): वि वि ज्ञान और मनोवि वि ज्ञान यह सि सि द्ध कर चुके हैं कि कि कि कि सी भी जटि टि ल समस्या का समाधान ढूंढते समय मानव मस्ति स्ति स्ति ष्क अपनी मातृभाषा में ही सबसे तेज वि वि चार करता है। एक इंजीनि नि यर या चि चि कि कि त्सक जब अपनी भाषा की सहजता में सोचता है, तो उसका 'नवोन्मेष' (Creativity/Innovation) अपनी चरम सीमा पर होता है।
● बाजार की जमीनी समझ (Market Penetration): भारत का सबसे बड़ ा उपभोक्ता वर्ग र्ग टि टि यर-2, टि टि यर-3 शहरों और ग्रामीण अंचलों में बसता है। मैनेजमेंट के जो छात्र अपनी मातृभाषा या क्षेत्रीय भाषा में पारंगत हैं, वे कंपनि नि यों के उत्पादों और सेवाओं को जन-जन तक पहुंचाने में उन लोगों से कहीं अधि धि क सफल सि सि द्ध हो
रहे हैं जो केवल अंग्रेजी जानते हैं।
● सहानुभूति ति पूर्ण र्ण संवाद (Empathetic Communication): उद्योग की सबसे बड़ ी अपेक्षा यह है कि कि आप वि वि परीत परि रि स्थि स्थि स्थि ति ति यों में कैसा व्यवहार करते हैं। एक संतुलि लि त भाषा और शांत दि दि माग कठि ठि न से कठि ठि न व्यावसायि यि क संकट (Crisis) को टाल सकता है।
2. औद्योगि क संदर्भ र्भ: तकनीकी एवं प्रबंधकीय व्यावहारि क उदाहरण (Industrial Case Studies)
तकनीक और प्रबंधन के क्षेत्र में भाषा का संतुलन केवल कोई साहि हि त्यि त्यि त्यि क या सैद्धांति ति क बात नहीं है, बल्कि ल्कि ल्कि यह सीधे तौर पर उद्योगों की 'कार्य र्यकुशलता' (Operational Efficiency), 'उत्पादकता' (Productivity) और वि वि त्तीय स्थि स्थि स्थि रता से जुड़ी है। इसे हम तीन मुख्य क्षेत्रों के व्यावहारि रि क उदाहरणों से समझ सकते हैं:
क) इंजीनि नि यरि रि ंग और उत्पादन (Engineering & Shop-Floor Operations)
मान लीजि जि ए आप एक 'ऑटोमेशन इंजीनि नि यर' (Automation Engineer) हैं और आपने जर्म र्मन तकनीक पर आधारि रि त एक अत्यंत आधुनि नि क 'स्वचालि लि त उत्पादन प्रणाली' (Automated Production Line) का डि डि ज़ाइन तैयार कि कि या है। इस मशीन के ब्लूप्रि प्रि ंट, कोडि डि ंग और मैनुअल भले ही अंग्रेजी में हों, लेकि कि न कारखाने के जमीनी स्तर (Shop Floor) पर काम करने वाले तकनीशि शि यन (Technicians) और श्रमि मि क केवल स्थानीय भाषा या हि हि ंदी समझते हैं।
यदि दि आप वहां 'Predictive Maintenance' या 'Thermal Overload' जैसे क्लि क्लि क्लि ष्ट अंग्रेजी शब्दों का लगातार प्रयोग करेंगे, तो श्रमि मि क भ्रमि मि त हो सकते हैं, जि जि ससे दुर्घ र्घटना या उत्पादन में देरी की 'आशंका' नि नि श्चि श्चि श्चि त तौर पर बढ़ जाती है। यहाँ एक सफल इंजीनि नि यर भाषा का संतुलन बनाता है; वह श्रमि मि कों को उनकी सरल भाषा में समझाता है कि कि : "जब मशीन का तापमान इस लाल नि नि शान से ऊपर जाए, तो 'पूर्वा र्वा र्वानुमानि नि त रखरखाव' (Predictive Maintenance) के तहत हमें सेंसर की जांच करनी है।" स्थानीय भाषा में इस सटीक संवाद से 'डाउनटाइम' (Downtime) कम होता है, जि जि से हर इंडस्ट्री तुरंत स्वीकार करती है। यही सि सि द्धांत जब मार्के र्के ट में सरल सुगम भाषा में जाता है तब वि वि त्तीय रूप से उद्योग को प्रबलता व सशक्तता भी प्राप्त होती है।
ख) प्रबंधन और वि वि पणन (Management & Agri-FinTech)
आप एक 'सॉफ्टवेयर-एज़ -ए-सर्वि र्वि र्विस' (SaaS) उत्पाद या 'फि फि नटेक' (FinTech) स्टार्ट र्टअप के 'उत्पाद प्रबंधक' (Product Manager) हैं। आपको ग्रामीण भारत के कृषि षि क्षेत्र के लि लि ए एक नया 'ऋण प्रदाता ऐप' (Lending App) लॉन्च करना है।
यदि दि आपकी मार्के र्के टि टि ंग team केवल अंग्रेजी के भारी-भरकम शब्दों जैसे 'Collateral-free micro-loans', 'Amortization schedule', या 'Disbursal turnaround time' का प्रयोग करेगी, तो भारत का आम कि कि सान उस ऐप पर कभी भरोसा नहीं करेगा। मैनेजमेंट के छात्र को यहाँ भाषा संतुलन की आवश्यकता होती है। जब वह अपनी मातृभाषा के माध्यम से कि कि सान से जुड़कर कहता है: "यह ऐप आपको बि बि ना कि कि सी 'बंधक' (Collateral/Security) के, सीधे आपके बैंक खाते में 'ऋण राशि शि का त्वरि रि त हस्तांतरण' (Instant Disbursal) सुनि नि श्चि श्चि श्चि त करता है।" तो यह भाषा संतुलन कंपनी के 'यूजर बेस' (User Base) को करोड़ों में बदल देता है। आज 'PhonePe', 'DeHaat' और 'AgroStar' जैसे सफल भारतीय स्टार्ट र्टअप्स इसी भाषाई संतुलन के कारण अरबों डॉलर की कंपनि नि याँ (Unicorns)
बने हैं।
ग) डेटा साइंस और अनुसंधान (Data Science & Analytics)
आप एक 'डेटा वि वि श्लेषक' (Data Analyst) हैं और आपने कृत्रि त्रि म बुद्धि धि मत्ता (AI) के जरि रि ए कि कि सी महामारी या फसल के रोगों का एक जटि टि ल 'पूर्वा र्वा र्वानुमान मॉडल' (Predictive Model) तैयार कि कि या है। कोडि डि ंग और एल्गोरि रि द्म (Python/R) पूरी तरह अंग्रेजी में हो सकते हैं। लेकि कि न जब आपको इस डेटा का 'प्रस्तुतीकरण' (Presentation) सरकारी अधि धि कारि रि यों, कृषि षि वैज्ञानि नि कों या नीति ति नि नि र्मा र्मा र्माताओं (Policy Makers) के सामने करना है, तो आपकी भूमि मि का बदल जाती है।
उद्योग और समाज को आपकी कोडि डि ंग की पंक्ति क्ति क्ति यों से सरोकार नहीं है, उन्हें उसके 'प्रति ति फल' (Outcomes) से मतलब है। यदि दि आप वहां भाषा का संतुलन रखकर अपने जटि टि ल 'Neural Networks' के नि नि ष्कर्षों र्षों को सरल हि हि ंदी में 'डेटा का सरलीकरण' (Data Storytelling) करते हुए समझा सकें: "इस डेटा के 'गहन वि वि श्लेषण' (Deep Analysis) से यह सि सि द्ध होता है कि कि आगामी मानसून में इस वि वि शि शि ष्ट क्षेत्र में फसल को संकट है, जि जि सके लि लि ए हमें 'पूर्व र्व-तैयारी' (Proactive Measures) करनी होगी।" तो आपका यह भाषाई संतुलन तकनीकी ज्ञान को 'सामाजि जि क कल्याण' और 'व्यावसायि यि क नि नि र्ण र्णय' में बदल देता है।
घ) शि शि क्षा के प्रति ति नजरि रि या: प्रति ति भा भाषा की मोहताज नहीं होती
भारत जैसे देश में जहां प्रत्येक प्रदेश की अपनी खुद की मातृभाषा है, वहां केवल अंग्रेजी में पढ़ कर छात्र सीखने के बजाय रटने से परीक्षा पास करने पर वि वि श्वास रख कर कार्य र्य करने लगते हैं, जो भवि वि ष्य में व्यावहारि रि क रूप से गलत सि सि द्ध होता है और फलस्वरूप बेरोजगारी दर अप्रत्याशि शि त रूप से बढ़ ती है। इसकी अपेक्षा मातृभाषा वि वि षय से शि शि क्षा छात्र को स्वतः जोड़कर सोचने-वि वि चारने पर वि वि श्वास दि दि लाती है, जि जि ससे छात्र का वास्तवि वि क उत्थान हो सकता है।
3. नकारात्मक को सकारात्मक में बदलने का नजरि या (Converting Challenges into Opportunities)
हमारे सामने कई ऐसी चुनौति ति याँ या नकारात्मक पहलू आते हैं, जि जि न्हें यदि दि सही नजरि रि ए से देखा जाए, तो वे छात्रों के लि लि ए सबसे बड़ ा वरदान बन सकते हैं:
वर्त र्तमान नकारात्मक चुनौती
भवि वि ष्य का सकारात्मक रूपांतरण
हि हि
दी/क्षेत्रीय माध्यम की पृष्ठभूमि मि का डर: कई छात्र सोचते हैं कि कि वे हि हि ंदी माध्यम से हैं, इसलि लि ए कॉर्पो र्पो रेट में पीछे रह जाएंगे और हीनग्रंथि थि का शि शि कार हो जाते हैं।
अंग्रेजी केवल एक 'संपर्क र्क भाषा' या टूल है, बुद्धि धि मत्ता का पैमाना नहीं। अपनी मातृभाषा की अभि भि व्यक्ति क्ति क्ति की गहराई को अपनी ताकत बनाएं। यह आपको भीड़ से अलग एक 'जमीन से जुड़ ा' सच्चा लीडर बनाएगा।
भाषा की शुद्धता का अति ति -आग्रह: कुछ लोग केवल एक ही भाषा पर अड़ े रहते हैं, जि जि ससे कॉर्पो र्पो रेट संवाद में रुकावट आती है।
'भाषा संतुलन' का अर्थ र्थ तकनीकी शब्दों का बहि हि ष्कार करना नहीं है, बल्कि ल्कि ल्कि तकनीकी टर्म्स र्म्स र्म्स को अपनी मातृभाषा के व्याकरण के साथ ऐसा सरल मि मि श्रण तैयार करना है जि जि से सामने वाला आसानी से समझ
वर्त र्तमान नकारात्मक चुनौती भवि वि ष्य का सकारात्मक रूपांतरण
सके।
क्षेत्रीय लहजे की झि झि झक: अपनी भाषा के प्रभाव या लहजे के कारण छात्र इंटरव्यू में शांत बैठ जाते हैं।
जबकि कि आज बहुराष्ट्रीय कंपनि नि याँ 'वि वि वि वि धता और समावेशि शि ता' (Diversity & Inclusion) पर जोर दे रही हैं। आपकी क्षेत्रीय पृष्ठभूमि मि आपकी कमजोरी नहीं, बल्कि ल्कि ल्कि देश के एक वि वि शि शि ष्ट सांस्कृति ति क आर्थि र्थि र्थिक क्षेत्र की आपकी गहरी समझ का प्रमाण है।
4. भवि ष्य की असीम संभावनाएं: राष्ट्रीय शि क्षा नीति (NEP) और तकनीकी आत्मनि र्भ र्भरता
● 'स्वभाषा' से 'स्वावलंबन': जब देश का छात्र अपनी भाषा में कोडि डि ंग, डेटा साइंस और रोबोटि टि क्स सीखेगा, तो देश में 'बौद्धि धि क संपदा' का नि नि र्मा र्मा र्माण तेजी से होगा। रटने की प्रवृत्ति त्ति खत्म होगी और वास्तवि वि क आवि वि ष्कार सामने आएंगे।
● एआई (AI) का भाषाई लोकतंत्रीकरण: आज मशीन लर्निं र्निं र्निंग और नेचुरल लैंग्वेज प्रोसेसि सि ंग (NLP) के माध्यम से एआई भारतीय भाषाओं को सीख रहा है। भवि वि ष्य में उन प्रोफेशनल्स की भारी मांग होगी जो तकनीकी रूप से सुदृढ़ होने के साथ-साथ अपनी मातृभाषा के व्याकरण और शब्दावली के भी वि वि शेषज्ञ होंगे।
5. छात्रों के आगामी भवि ष्य के लि ए रोडमैप और उच्च शब्दावली संदर्भ र्भ
छात्रों को उद्योगों की कसौटी पर खरा उतरने के लि लि ए कॉर्पो र्पो रेट जगत में अपनी बात रखते समय कुछ गरि रि मापूर्ण र्ण और शुद्ध हि हि ंदी शब्दों का प्रयोग करना चाहि हि ए, जो उनके व्यक्ति क्ति क्ति त्व को 'गंभीर' और 'वि वि श्वसनीय' बनाते हैं। ध्यान रहे:
"शब्दों का चयन और भाषा का संतुलन यह तय करता है कि कि आपके पास जो ज्ञान है, उसका मूल्य दुनि नि या क्या लगाएगी।"
नि
ष्कर्ष र्ष: अपनी जड़ ों से जुड़ कर छूना है आसमान
उद्योग की अपेक्षाएं समय के साथ बाजार की मांग के अनुसार बदलती रहेंगी, लेकि कि न 'प्रभावी संवाद' और 'संतुलि लि त भाषा' का महत्व कभी कम नहीं होगा। इंजीनि नि यरि रि ंग, साइंस, चि चि कि कि त्सा और मैनेजमेंट के आगामी भवि वि ष्य के कर्ण र्णधारों (छात्रों) को यह समझना होगा कि कि मातृभाषा में सोचना, क्षेत्रीय भाषाओं का सम्मान करना और अपनी राष्ट्रभाषा हि हि ंदी को संवाद का मुख्य माध्यम बनाना कोई पि पि छड़ ापन नहीं है। बल्कि ल्कि ल्कि यह वह 'अधि धि ष्ठान' (Foundation) है जि जि स पर उनके करि रि यर की गगनचुंबी इमारत खड़ ी होगी।
जब एक वैज्ञानि नि क अपने आवि वि ष्कारों को, एक इंजीनि नि यर अपने डि डि ज़ाइन को और एक मैनेजर अपनी व्यावसायि यि क योजनाओं को एक संतुलि लि त, सरल और प्रभावशाली भाषा में प्रस्तुत करता है, तो सफलता उसके कदम चूमती है।
नकारात्मकताओं से डरने के बजाय, उन्हें सीखने के एक अवसर के रूप में देखना ही छात्रों को एक उज्ज्वल, आत्मनि नि र्भ र्भर और असीम संभावनाओं से भरे भवि वि ष्य की ओर ले जाएगा। अपनी जड़ ों (मातृभाषा) से पोषण पाकर वैश्वि श्वि श्वि क क्षि क्षि ति ति ज (अंग्रेजी व आधुनि नि क तकनीक) की ओर कदम बढ़ ाना ही आज के युवा का परम कर्त्त र्त्तव्य और सफलता का महामंत्र है। आवि वि ष्कार जनसामान्य के लि लि ए ही होते हैं, उद्योग भी जनसामान्य की आवश्यकताओं के अनुकूल हो चलते हैं और जनसामान्य अपनी स्वयं की नि नि ज भाषा मातृभाषा को ही संपूर्ण र्णता से समझता है और देश स्वदेशी व उन्नत बनता है।
००० 

० आयशा बानो मंसूरी


फार्मेसी: बेहतर स्वास्थ्य, नए अवसर और उज्ज्वल भववष्य की राह
स्वास्थ्य सेवा, वैज्ञावनक नवाचार और सार्माविक सशक्तिकरण का र्मिबूत आधार
लेक्तिका: आयशा बानो र्मंसूरी एक युवा लेखिका, जो अपने ववचारोों को शब्ोों के माध्यम से समाज तक पहुँचाने का प्रयास कर रही हैं।
पररचय
"स्वास्थ्य ही सबसे बडा धन है।" यह केवल एक कहावत नहीों, बखि जीवन का सबसे बडा सत्य है। स्वस्थ व्यखि ही अपने पररवार, समाज और देश की प्रगवत में योगदान दे सकता है।
जब भी स्वास्थ्य सेवाओों की बात होती है, तो सबसे पहले डॉक्टर और नसस का नाम आता है। लेवकन हर सुरवित और प्रभावी दवा के पीछे एक महत्वपूर्स भूवमका फार्माावसस्ट (Pharmacist) की भी होती है।
फामेसी केवल दवाइयाुँ देने का कायस नहीों है। यह ववज्ञान, अनुसोंधान, तकनीक और मानव सेवा का ऐसा िेत्र है जो लोगोों के जीवन को बेहतर बनाने का काम करता है। नई दवाइयोों की िोज से लेकर उनकी गुर्वत्ता, सुरिा और सही उपयोग सुवनवित करने तक, फामासवसस्ट की भूवमका अत्योंत महत्वपूर्स होती है।
आज फामेसी केवल एक रोजगार नहीों, बखि समाज सेवा, वैज्ञावनक ववकास और राष्ट्र वनमासर् का सशि माध्यम बन चुकी है।
फार्मेसी का बढ़ता हुआ क्षेत्र (Scope of Pharmacy)
समय के साथ फामेसी का िेत्र लगातार ववस्तृत होता जा रहा है। आज एक फामेसी स्नातक (Pharmacy Graduate) के पास अनेक िेत्रोों में रोजगार और कररयर बनाने के अवसर उपलब्ध हैं।
फामासवसस्ट वनम्न िेत्रोों में अपना भववष्य बना सकते हैं—
 अस्पताल एवों खिवनकल फामेसी
 दवा वनमासर् उद्योग (Pharmaceutical Industry)
 नई दवाओों का अनुसोंधान एवों ववकास (Research & Development)
 गुर्वत्ता वनयोंत्रर् एवों गुर्वत्ता आश्वासन (Quality Control & Quality Assurance)
 खिवनकल ररसचस
 जैव प्रौद्योवगकी (Biotechnology)
 औषवध सुरिा (Pharmacovigilance)
 सरकारी स्वास्थ्य ववभाग
 वशिर् एवों शोध सोंस्थान
 मेवडकल राइव ोंग
 अपनी मेवडकल स्टोर या फामेसी व्यवसाय की स्थापना
भारत ही नहीों, बखि पूरी दुवनया में योग्य फामासवसस्टोों की माोंग लगातार बढ़ रही है।
दवलत एवं आवदवासी ववद्यावथायों के वलए सुनहरा अवसर
वशिा जीवन बदलने की सबसे बडी शखि है और फामेसी उन ववद्यावथसयोों के वलए एक बेहतरीन अवसर है जो अपने पररवार और समाज की खस्थवत बदलना चाहते हैं।
सरकार द्वारा दी जाने वाली छात्रवृवत्तयाुँ, आरिर् व्यवस्था और वववभन्न शैिवर्क योजनाएुँ दवलत एवों आवदवासी ववद्यावथसयोों को उच्च वशिा प्राप्त करने में सहायता करती हैं।
फामेसी की पढ़ाई पूरी करने के बाद ववद्याथी—
 सम्मानजनक नौकरी प्राप्त कर सकते हैं।
 आवथसक रूप से आत्मवनभसर बन सकते हैं।
 अपने गाुँव और जनजातीय िेत्रोों में बेहतर स्वास्थ्य सेवाएुँ उपलब्ध करा सकते हैं।
 अपनी मेवडकल स्टोर या फामेसी शुरू कर सकते हैं।
 समाज में स्वास्थ्य जागरूकता फैला सकते हैं।
 आने वाली पीवढ़योों के वलए प्रेरर्ा बन सकते हैं।
जब वकसी पररवार का एक सदस्य फामासवसस्ट बनता है, तो उसका लाभ पूरे पररवार और समाज को वमलता है।
नई तकनीकें बदल रही हैं फार्मेसी का भववष्य
आज ववज्ञान और तकनीक ने फामेसी के िेत्र में नई क्ाोंवत ला दी है।
कृवत्रर्म बुक्तिर्मत्ता (Artificial Intelligence - AI)
एआई की सहायता से नई दवाओों की िोज पहले की तुलना में अवधक तेज़ और स ीक हो रही है।
व्यक्तिगत उपचार (Personalized Medicine)
अब मरीज की आनुवोंवशक सोंरचना (Genetic Profile) के आधार पर दवाइयाुँ दी जा रही हैं, वजससे इलाज अवधक प्रभावी और सुरवित बन रहा है।
िीन थेरेपी (Gene Therapy)
यह तकनीक आनुवोंवशक बीमाररयोों के उपचार में नई उम्मीद लेकर आई है।
नैनो तकनीक (Nanotechnology)
इस तकनीक की मदद से दवाइयाुँ शरीर के उसी वहस्से तक पहुँचाई जाती हैं जहाुँ उनकी सबसे अवधक आवश्यकता होती है, वजससे दवा का प्रभाव बढ़ता है और दुष्प्रभाव कम होते हैं।
िैववक दवाइयााँ और आधुवनक टीके
नई जैववक दवाइयाुँ (Biologics), बायोवसवमलर और आधुवनक वैक्सीन कैंसर, सोंक्मर् और अन्य गोंभीर बीमाररयोों के इलाज में महत्वपूर्स भूवमका वनभा रहे हैं।
आज फामेसी केवल दवाइयाुँ बनाने तक सीवमत नहीों है, बखि भववष्य की स्वास्थ्य सेवाओों को नई वदशा दे रही है।
फार्मेसी और औद्योवगक ववकास
फामासस्यूव कल उद्योग भारत की सबसे तेजी से बढ़ने वाली उद्योगोों में से एक है।
यह उद्योग अनेक िेत्रोों में रोजगार के अवसर प्रदान करता है—
 दवा वनमासर्
 वैक्सीन वनमासर्
 जैव प्रौद्योवगकी
 वचवकत्सा उपकरर् वनमासर्
 आयुवेवदक एवों हबसल उत्पाद
 न्यू रास्यूव कल्स
 अनुसोंधान एवों ववकास
 गुर्वत्ता वनयोंत्रर्
 दवा ववपर्न (Pharmaceutical Marketing)
 वनयासत (Export)
यह उद्योग देश की अथसव्यवस्था को मजबूत बनाने के साथ-साथ लािोों लोगोों को रोजगार भी प्रदान करता है।
राष्ट्र वनर्मााण र्में फार्मेसी की भूवर्मका
एक स्वस्थ राष्ट्र की पहचान सुरवित, प्रभावी और सस्ती दवाइयोों से होती है।
फामासवसस्ट यह सुवनवित करते हैं वक—
 दवाइयाुँ सुरवित होों।
 उनकी गुर्वत्ता सवोत्तम हो।
 सही मरीज को सही दवा वमले।
 दवाओों का सही उपयोग हो।
 दवाओों का दुरुपयोग रोका जाए।
 लोगोों में स्वास्थ्य के प्रवत जागरूकता बढ़े।
फामासवसस्ट अस्पतालोों, प्रयोगशालाओों, दवा उद्योगोों, मेवडकल स्टोरोों और शोध सोंस्थानोों में रहकर देश की स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत बनाते हैं।
वनष्कर्ा
फामेसी केवल एक पेशा नहीों, बखि मानव सेवा का एक महान माध्यम है।
यह ववज्ञान, सेवा, अनुसोंधान और नवाचार का ऐसा सोंगम है जो समाज को स्वस्थ, सुरवित और समृद्ध बनाने में महत्वपूर्स भूवमका वनभाता है।
ववशेष रूप से दवलत एवों आवदवासी समुदाय के ववद्यावथसयोों के वलए फामेसी वशिा, सम्मानजनक रोजगार, आवथसक आत्मवनभसरता और समाज सेवा का एक उत्कृष्ट् अवसर है।
यवद युवा इस िेत्र को अपनाते हैं, तो वे केवल अपना भववष्य ही नहीों, बखि अपने पररवार, समाज और देश का भववष्य भी उज्ज्वल बना सकते हैं।
आइए, हर्म फार्मेसी को केवल एक कररयर नहीं, बक्ति स्वस्थ भारत, आत्मवनभार भारत और ववकवसत भारत के वनर्मााण की र्मिबूत नींव के रूप र्में अपनाएाँ।
प्रेरणादायक संदेश
"दवाइयााँ बीर्माररयों का इलाि करती हैं, लेवकन फार्माावसस्ट यह सुवनवित करते हैं वक सही दवा सही सर्मय पर सही र्मरीि तक सुरवक्षत रूप से पहुाँचे। यही उनकी सबसे बडी सेवा और सर्माि के प्रवत सर्मपाण है।"
००० 


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० आशुतोष सक्सेना 

हिंदी में उच्च तकनीकी शिक्षा : संभावनाएँ, चुनौतियाँ एवं कृत्रिम बुद्धिमत्ता की भूमिका

सारांश: भारत बहुभाषी देश है, जहाँ अधिकांश विद्यार्थी प्रारम्भिक शिक्षा अपनी मातृभाषा अथवा क्षेत्रीय भाषा में प्राप्त करते हैं। उच्च तकनीकी शिक्षा प्रायः अंग्रेज़ी माध्यम में होने के कारण अनेक प्रतिभाशाली विद्यार्थियों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने भारतीय भाषाओं में तकनीकी शिक्षा को बढ़ावा देने का स्पष्ट लक्ष्य निर्धारित किया है। वर्तमान समय में इंजीनियरिंग, चिकित्सा, डेंटल, फार्मेसी, कृषि, कंप्यूटर विज्ञान, इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में हिंदी माध्यम से अध्ययन हेतु पाठ्यपुस्तकें, शब्दावली, डिजिटल संसाधन तथा ऑनलाइन सामग्री तेजी से विकसित हो रही है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence), मशीनी अनुवाद, Google Translate, ChatGPT, वॉयस-टू-टेक्स्ट तथा डिजिटल शब्दकोश जैसी आधुनिक तकनीकें विद्यार्थियों के लिए जटिल विषयों को सरल भाषा में समझने, अनुवाद करने, नोट्स तैयार करने, प्रश्न हल करने तथा शोध लेखन में अत्यंत उपयोगी सिद्ध हो रही हैं। यद्यपि तकनीकी शब्दावली के मानकीकरण, गुणवत्तापूर्ण अध्ययन सामग्री तथा प्रशिक्षित शिक्षकों की उपलब्धता जैसी चुनौतियाँ अभी भी विद्यमान हैं, फिर भी डिजिटल तकनीकों के सहयोग से हिंदी में उच्च तकनीकी शिक्षा का भविष्य अत्यंत उज्ज्वल दिखाई देता है। यह व्यवस्था शिक्षा में समान अवसर, समावेशिता तथा आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य को सुदृढ़ बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
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प्रस्तावना

    ज्ञान-विज्ञान के आधुनिक युग में तकनीकी शिक्षा किसी भी राष्ट्र के आर्थिक एवं सामाजिक विकास का आधार है। इंजीनियरिंग, चिकित्सा, कृषि, सूचना प्रौद्योगिकी, फार्मेसी तथा अन्य तकनीकी क्षेत्रों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा राष्ट्र की प्रगति का प्रमुख साधन है। भारत में लंबे समय तक तकनीकी शिक्षा का प्रमुख माध्यम अंग्रेज़ी रहा, जिसके कारण ग्रामीण एवं हिंदी माध्यम से अध्ययन करने वाले अनेक विद्यार्थियों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 ने मातृभाषा एवं भारतीय भाषाओं में शिक्षा को प्रोत्साहित करते हुए तकनीकी शिक्षा को भी भारतीय भाषाओं में उपलब्ध कराने पर बल दिया है। परिणामस्वरूप अनेक संस्थानों ने हिंदी में पाठ्यक्रम, अध्ययन सामग्री तथा डिजिटल संसाधनों का विकास प्रारम्भ किया है।

हिंदी में तकनीकी शिक्षा के लाभ 

    स्वभाषा में  विद्यार्थियों की अवधारणात्मक समझ बेहतर होती है। ग्रामीण एवं आर्थिक रूप से कमजोर विद्यार्थियों को समान अवसर प्राप्त होते हैं। जटिल वैज्ञानिक सिद्धांतों को सरल भाषा में समझना आसान होता है।  नवाचार एवं अनुसंधान में स्थानीय प्रतिभाओं की भागीदारी बढ़ती है। रोजगार एवं उद्यमिता के अवसरों का विस्तार होता है। जन सामान्य भी विज्ञान की अवधारणाओं से परिचित हो पाता है। 

विभिन्न क्षेत्रों में हिंदी अनुप्रयोग के कदम 

    इंजीनियरिंग: यांत्रिक, सिविल, विद्युत, कंप्यूटर तथा इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग की अनेक पुस्तकों एवं व्याख्यानों का हिंदी अनुवाद उपलब्ध कराया जा रहा है।

     चिकित्सा एवं डेंटल शिक्षा: मानव शरीर रचना, शरीर क्रिया विज्ञान, रोग विज्ञान तथा दंत चिकित्सा संबंधी विषयों के हिंदी संसाधनों का विकास हो रहा है।

    फार्मेसी: औषध निर्माण, औषध विज्ञान तथा औषधीय रसायन जैसे विषयों की हिंदी शब्दावली विकसित की जा रही है।

    कृषि एवं पशु चिकित्सा: कृषि अनुसंधान, मृदा विज्ञान, फसल उत्पादन, डेयरी विज्ञान तथा पशुपालन संबंधी सामग्री हिंदी में उपलब्ध होने से किसानों एवं विद्यार्थियों को प्रत्यक्ष लाभ मिल रहा है।

    कंप्यूटर एवं सूचना प्रौद्योगिकी: प्रोग्रामिंग, साइबर सुरक्षा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डेटा साइंस तथा क्लाउड कम्प्यूटिंग जैसे विषयों पर हिंदी सामग्री निरंतर बढ़ रही है।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) एवं Google Translate की भूमिका

    आधुनिक डिजिटल तकनीकों ने हिंदी माध्यम के विद्यार्थियों के लिए नई संभावनाएँ खोली हैं।

    चैट जीपीटी एवं अन्य एआई टूल

* कठिन तकनीकी विषयों को सरल हिंदी में समझाना।
* नोट्स तैयार करना।
* प्रोजेक्ट रिपोर्ट लिखने में सहायता।
* प्रोग्रामिंग कोड समझाना।
* प्रश्नोत्तर अभ्यास।
* शोध लेखों का सारांश तैयार करना।
* तकनीकी शब्दों का अर्थ स्पष्ट करना।

यांत्रिक (गूगल) अनुवाद 

* अंग्रेज़ी पुस्तकों का प्रारंभिक हिंदी अनुवाद।
* तकनीकी लेखों का त्वरित अनुवाद।
* नए शब्दों का अर्थ समझना।
* विदेशी शोध सामग्री तक पहुँच बनाना।

 एआई आधारित अनुवाद तकनीक

* रीयल-टाइम अनुवाद
* Speech-to-Text
* Text-to-Speech
* OCR द्वारा स्कैन की गई पुस्तकों का हिंदी रूपांतरण
* बहुभाषी ई-लर्निंग

    डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म

* ऑनलाइन वीडियो व्याख्यान
* वर्चुअल लैब
* इंटरैक्टिव क्विज़
* AI आधारित व्यक्तिगत शिक्षण (Personalized Learning)

    चुनौतियाँ

* तकनीकी शब्दावली का मानकीकरण
* गुणवत्तापूर्ण पाठ्यपुस्तकों की कमी
* प्रशिक्षित हिंदी माध्यम शिक्षकों का अभाव
* सभी विषयों की समान गुणवत्ता वाली डिजिटल सामग्री का अभाव
* मशीन अनुवाद में कभी-कभी अर्थगत त्रुटियाँ

समाधान

* AI आधारित उच्च गुणवत्ता अनुवाद प्रणाली विकसित की जाए।
* विश्वविद्यालयों द्वारा हिंदी तकनीकी सामग्री तैयार की जाए।
* द्विभाषिक (Hindi-English) अध्ययन सामग्री उपलब्ध कराई जाए।
* शिक्षकों को AI आधारित शिक्षण का प्रशिक्षण दिया जाए।
* मुक्त डिजिटल पुस्तकालय विकसित किए जाएँ।
* तकनीकी शब्दावली का निरंतर अद्यतन किया जाए।

निष्कर्ष

हिंदी में उच्च तकनीकी शिक्षा केवल भाषा परिवर्तन नहीं बल्कि ज्ञान के लोकतंत्रीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, Google Translate, मशीन अनुवाद, डिजिटल पुस्तकालय तथा ऑनलाइन शिक्षण प्लेटफ़ॉर्म इस परिवर्तन को गति प्रदान कर रहे हैं। यद्यपि अभी अनेक चुनौतियाँ विद्यमान हैं, किन्तु उचित नीतियों, गुणवत्तापूर्ण संसाधनों एवं आधुनिक तकनीकों के समन्वय से हिंदी में तकनीकी शिक्षा विश्वस्तरीय बन सकती है। इससे भारत की विशाल युवा प्रतिभा को अपनी भाषा में ज्ञान अर्जित करने तथा वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने का अवसर प्राप

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मैं वर्तमान में सिस्को में इंजीनियरिंग मैनेजर के पद पर कार्यरत हूँ और आईटी उद्योग में 25 वर्षों से अधिक का अनुभव रखता हूँ। सिस्को से पहले मैंने कई प्रतिष्ठित प्रौद्योगिकी कंपनियों में विभिन्न तकनीकी और नेतृत्वकारी भूमिकाओं में कार्य किया है।

मैंने एमसीए (MCA) की डिग्री प्राप्त की है तथा Indian Institute of Management Kozhikode से एआई (Artificial Intelligence) एवं डेटा साइंस में प्रमाणन प्राप्त किया है।

वर्तमान में मैं क्लाउड सिक्योरिटी के क्षेत्र में कार्यरत हूँ, जहाँ एआई पहलों, उत्पाद विकास (Development) तथा गुणवत्ता (Quality Engineering) का नेतृत्व कर रहा हूँ।

मैं वर्ष 2002 से बेंगलुरु में निवास कर रहा हूँ, जबकि मेरा मूल निवास Gwalior, Madhya Pradesh है।
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० ए.पी.सिंह महासचिव आई जी एस दिल्ली।

० कल्याणी बैरागी रसायन जबलपुर।

० कृष्णकांत शिवहरे गणित जबलपुर

० गीतिका श्रीवास्तव कम्प्यूटर साइंस जबलपुर

 


0 नैन्सी केशरी

डिजिटल युग, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और हिंदी तकनीकी सामग्री


    सारांश : डिजिटल युग, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और हिंदी तकनीकी सामग्री एक-दूसरे के पूरक हैं। डिजिटल तकनीक ने जीवन को सरल बनाया है, AI ने कार्यों को अधिक बुद्धिमान और प्रभावी बनाया है, तथा हिंदी तकनीकी सामग्री ने आधुनिक ज्ञान को आम जनता तक पहुँचाने का मार्ग प्रशस्त किया है।
    
    यदि इन तकनीकों का उपयोग जिम्मेदारी, नैतिकता और डिजिटल सुरक्षा के साथ किया जाए, तो भारत ज्ञान, नवाचार और तकनीकी विकास के क्षेत्र में विश्व में अग्रणी स्थान प्राप्त कर सकता है। इसलिए प्रत्येक नागरिक को डिजिटल साक्षरता बढ़ानी चाहिए और AI जैसी आधुनिक तकनीकों का सकारात्मक एवं रचनात्मक उपयोग करना चाहिए।
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    डिजिटल युग ने मानव जीवन के लगभग हर क्षेत्र में व्यापक परिवर्तन किए हैं। आज शिक्षा, स्वास्थ्य, व्यापार, बैंकिंग, कृषि, मनोरंजन और संचार जैसे सभी क्षेत्रों में डिजिटल तकनीकों का उपयोग तेजी से बढ़ रहा है। इंटरनेट, स्मार्टफोन, क्लाउड कंप्यूटिंग और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (ए.आई.) ने दुनिया को पहले से अधिक तेज, सुविधाजनक और आपस में जुड़ा हुआ बना दिया है। इस बदलते समय में हिंदी भाषा भी तकनीकी दुनिया में अपनी मजबूत पहचान बना रही है। हिंदी में तकनीकी सामग्री का विस्तार ज्ञान को अधिक लोगों तक पहुँचाने का महत्वपूर्ण माध्यम बन गया है।

डिजिटल युग का महत्व:

    डिजिटल युग वह समय है जिसमें अधिकांश कार्य डिजिटल तकनीकों के माध्यम से किए जाते हैं। पहले जिन कार्यों में कई दिन लगते थे, वे आज कुछ मिनटों में पूरे हो जाते हैं। ऑनलाइन शिक्षा, डिजिटल भुगतान, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग, ई-गवर्नेस और ई-कॉमर्स जैसी सुविधाओं ने लोगों का जीवन सरल और सुविधाजनक बना दिया है। ग्रामीण क्षेत्रों तक इंटरनेट की पहुँच बढ़ने से डिजिटल सेवाओं का लाभ अधिक से अधिक लोगों को मिलने लगा है।
डिजिटल तकनीक ने सूचना के आदान-प्रदान को भी आसान बना दिया है। आज कोई भी व्यक्ति मोबाइल फोन के माध्यम से दुनिया भर की जानकारी कुछ ही क्षणों में प्राप्त कर सकता है। इससे शिक्षा, शोध और व्यवसाय के नए अवसर विकसित हुए हैं।

क्या है कृत्रिम बुद्धिमत्ता:

    कृत्रिम बुद्धिमत्ता ऐसी तकनीक है जिसके माध्यम से कंप्यूटर और मशीनें मनुष्यों की तरह सोचने, सीखने, निर्णय लेने और समस्याओं का समाधान करने की क्षमता प्राप्त करती हैं।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता के उपयोग:

· यह  शिक्षा के क्षेत्र में विद्यार्थियों को व्यक्तिगत सीखने का अनुभव प्रदान करती है।

· स्वास्थ्य सेवाओं में रोगों की पहचान, चिकित्सा परीक्षण और उपचार में डॉक्टरों की सहायता करती है।

· कृषि के क्षेत्र में यह मौसम का अनुमान लगाने, फसल की निगरानी और उत्पादन बढ़ाने में उपयोगी है।

· बैंकिंग में ऑनलाइन लेन-देन की सुरक्षा और धोखाधड़ी की पहचान के लिए ए.आई. का उपयोग किया जाता है।

· उद्योगों में स्वचालित मशीनों का संचालन।

· भाषा अनुवाद, वॉयस असिस्टेंट और चैटबॉट जैसी सेवाएँ।

ए.आई. से लाभ:

    कृत्रिम बुद्धिमत्ता कार्यों को तेज़, सटीक और कम समय में पूरा करती है। इससे मानव श्रम की बचत होती है और उत्पादकता बढ़ती है। यह बड़े-बड़े आँकड़ों का विश्लेषण करके बेहतर निर्णय लेने में सहायता करती है। यह शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी सेवाओं को अधिक प्रभावी और सुलभ बनाती है। यह नए रोजगार और तकनीकी नवाचारों के अवसर भी प्रदान करता है। AI के कारण कार्यों की गति और गुणवत्ता दोनों में सुधार हुआ है। यह समय और लागत की बचत करने के साथ-साथ अधिक सटीक परिणाम भी प्रदान करता है।

हिंदी तकनीकी सामग्री का बढ़ता महत्व:

भारत में करोड़ों लोग हिंदी भाषा का उपयोग करते हैं। इसलिए डिजिटल प्लेटफॉर्म पर हिंदी तकनीकी सामग्री की आवश्यकता लगातार बढ़ रही. है। पहले अधिकांश तकनीकी जानकारी केवल अंग्रेज़ी में उपलब्ध होती थी, जिससे हिंदी भाषी लोगों को कठिनाई होती थी। आज ब्लॉग, वेबसाइट, ऑनलाइन पाठ्यक्रम, यूट्यूब, मोबाइल ऐप और सोशल मीडिया के माध्यम से हिंदी में तकनीकी जानकारी आसानी से उपलब्ध हो रही है।

हिंदी तकनीकी सामग्री के प्रमुख क्षेत्र कंप्यूटर शिक्षा, प्रोग्रामिंग और कोडिंग, साइबर सुरक्षा, डिजिटल मार्केटिंग, मोबाइल एप्लिकेशन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, मशीन लर्निंग, डेटा साइंस, क्लाउड कंप्यूटिंग, रोबोटिक्स आदि हैं। 

AI और हिंदी भाषा: 

AI ने हिंदी भाषा के विकास में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया है। इससे हिंदी भाषी विद्यार्थियों, शिक्षकों, किसानों, व्यापारियों और आम नागरिकों को नई तकनीकों को समझने और अपनाने में सुविधा मिल रही है।आज AI आधारित अनुवाद, वॉयस टाइपिंग, स्पीच-टू-टेक्स्ट, टेक्स्ट-टू-स्पीच, चैटबॉट और भाषा सीखने वाले प्लेटफॉर्म हिंदी में उपलब्ध हैं। लोग अपनी मातृभाषा में प्रश्न पूछ सकते हैं और उत्तर प्राप्त कर सकते हैं। इससे डिजिटल सेवाएँ अधिक समावेशी और उपयोगकर्ता-अनुकूल बन रही हैं। AI की सहायता से हिंदी में लेख, समाचार, शोध सामग्री, शैक्षणिक नोट्स और विभिन्न प्रकार की डिजिटल सामग्री तेजी से तैयार की जा सकती है। इससे ज्ञान का प्रसार पहले की तुलना में कहीं अधिक तेज़ और व्यापक हुआ है।

चुनौतियाँ: 

डिजिटल युग और AI के अनेक लाभ हैं, लेकिन कुछ चुनौतियाँ साइबर अपराध और डेटा सुरक्षा का खतरा, व्यक्तिगत गोपनीयता की सुरक्षा, AI द्वारा गलत या भ्रामक जानकारी का प्रसार, डिजिटल साक्षरता की कमी, तकनीक पर अत्यधिक निर्भरता, रोजगार के कुछ पारंपरिक क्षेत्रों पर प्रभाव आदि हैं। इन चुनौतियों का समाधान जागरूकता, उचित कानून, डिजिटल शिक्षा और जिम्मेदार तकनीकी उपयोग के माध्यम से किया जा सकता है।

भविष्य की संभावनाएँ:

भविष्य में AI और डिजिटल तकनीक का उपयोग और अधिक व्यापक होगा। शिक्षा, चिकित्सा, कृषि, परिवहन, उद्योग और शासन व्यवस्था में AI महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। हिंदी भाषा में तकनीकी सामग्री का विस्तार होने से ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों के लोग भी आधुनिक तकनीक से जुड़ सकेंगे। इससे डिजिटल भारत के निर्माण को नई गति मिलेगी और ज्ञान सभी तक समान रूप से पहुँचेगा।
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परिचय: विद्यार्थी बी.टेक. सीएस VIसेमिस्टर तक्षशिला जबलपुर, चलभाष: 9993213833, ईमेल: keshrinaincy61@gmail.com
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साक्षी गुप्ता

साक्षी गुप्ता विद्यार्थी सिविल तक्षशिला जबलपुर चलभाष: 7389754551 ई मेल: sg7827134@gmail.com