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शुक्रवार, 2 जनवरी 2026

जनवरी २, कब क्या, गीत, निशि, डहलिया, राम सेंगर, त्रिपदी, शिव, शाला छंद,


सलिल सृजन जनवरी २
जनवरी : कब क्या?
*
१. ईसाई नव वर्ष।
३.सावित्री बाई फुले जयंती।
४. लुई ब्रेक जयंती।
५. परमहंस योगानंद जयंती।
१०. विश्व हिंदी दिवस।
१२. विवेकानंद / महेश योगी जयन्ती, युवा दिवस।
१३. गुरु गोबिंद सिंह जयंती।
१४. मकर संक्रांति, बीहू, पोंगल, ओणम।
१५. थल सेना दिवस, कुंभ शाही स्नान।
१९. ओशो महोत्सव।
२०. शाकंभरी पूर्णिमा।
23. नेताजी सुभाष चंद्र बोस जयंती.
२६. गणतंत्र दिवस।
२७. स्वामी रामानंदाचार्य जयंती।
२८. लाला लाजपत राय जयंती।
३०. म. गाँधी शहीद दिवस, कुष्ठ निवारण दिवस।
३१. मैहर बाबा दिवस।
***
साहित्यकार / कलाकार:
सर्व श्री / सुश्री / श्रीमती
१. अर्चना निगम ९४२५८७६२३१
त्रिभवन कौल स्व.
राकेश भ्रमर ९४२५३२३१९५
विनोद शलभ ९२२९४३९९००
सुरेश कुशवाह 'तन्मय'
डॉ. जगन्नाथ प्रसाद बघेल ९८६९०७८४८५
२. राम सेंगर ९८९३२४९३५६
राजकुमार महोबिआ ७९७४८५१८४४
राजेंद्र साहू ९८२६५०६०२५
४. शिब्बू दादा ८९८९००१३५५
८. पुष्पलता ब्योहार ०७६१ २४४८१५२
१२. आदर्श मुनि त्रिवेदी
संतोष सरगम ८८१५०१५१३१
१५. अशोक झरिया ९४२५४४६०३०
१६. हिमकर श्याम ८६०३१७१७१०
२३. अशोक मिजाज ९९२६३४६७८५
२६. उमा सोनी 'कोशिश' ९८२६१९१८७१
***
राम सेंगर
जन्म २-१-१९४५, नगला आल, सिकन्दराऊ, हाथरस उत्तर प्रदेश।
प्रकाशित कृतियाँ:
१. शेष रहने के लिए, नवगीत, १९८६, पराग प्रकाशन दिल्ली।
२. जिरह फिर कभी होगी, २००१, अभिरुचि प्रकाशन दिल्ली।
३.एक गैल अपनी भी, २००९, अनामिका प्रकाशन, इलाहाबाद।
४. ऊँट चल रहा है, २००९, नवगीत, उद्भावना प्रकाशन, दिल्ली।
५. रेत की व्यथा कथा, २०१३, नवगीत, उद्भावना प्रकाशन, दिल्ली।
नवगीत शतक २ तथा नवगीत अर्धशती के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर।
संपर्क: चलभाष ९८९३२४९३५६।
*
शुभांजलि
*
'शेष रहने के लिए',
लिखते नहीं तुम।
रहे लिखना शेष यदि
थकते नहीं तुम।
नहीं कहते गीत 'जिरह
फिर कभी होगी'
मान्यता की चाह कर
बिकते नहीं तुम।
'एक गैल अपनी भी'
हो न जहाँ पर क्रंदन
नवगीतों के राम
तुम्हारा वंदन
*
'ऊँट चल रहा है'
नवगीत का निरंतर।
है 'रेत की व्यथा-कथा'
समय की धरोहर।
कथ्य-कथन-कहन की
अभिनव बहा त्रिवेणी
नवगीत नर्मदा का
सुनवा रहे सहज-स्वर।
सज रहे शब्द-पिंगल
मिल माथ सलिल-चंदन
***
गीत
निशि जिज्ञासु
.
निशि जिज्ञासु सवाल पूछती
ख्वाब दिखा हो मौन बूझती
.
ऊँच-नीच का भेद न माने
तंद्रा-निद्रा सबको देती
धर्म पंथ दल मुल्क जाति को
ठेंगा दिखा, न पंगा लेती
भेद-भाव पर तम की चादर
डाल साम्य पर खुदी रीझती 
निशि जिज्ञासु सवाल पूछती
ख्वाब दिखा हो मौन बूझती
.
किल्ली ढिल्ली करे अहं की
राजा-रंक शरण में आते
कोई हँसकर, कोई रोकर
झुक नैना में नींद बसाते
पार पा सकें, युक्ति किसी को
कोई भी क्यों नहीं सूझती
निशि जिज्ञासु सवाल पूछती
ख्वाब दिखा हो मौन बूझती
.
कौन कहाँ से है आया तू?
जोड़-छोड़ क्यों पछताया तू?
तू तू मैं मैं करी उम्र भर
खुद को जीत कभी पाया तू?
अहं बुद्धि क्यों भटकाती है?
धैर्य चदरिया फटी सीझती
निशि जिज्ञासु सवाल पूछती
ख्वाब दिखा हो मौन बूझती
२.१.२०२६
०००
डहलिया
0
मूलत: मेक्सिको में समुद्र तट से ५००० फुट ऊँचे रेतीले घास मैदानों में ऊगनेवाला डहलिया ब्यूट की मार्चियोनेस द्वारा १७८९ में मैड्रिड के रास्ते इंग्लैंड लाया गया। इनके खो जाने पर १८०४ में लेडी हालैन्ड द्वारा अन्य पौधे लाए गए। ये भी नष्ट हो गए। वर्ष १८१४ में शांति होने तथा महाद्वीप को खोले जाने पर फ्रांस से नए पौधे मँगवाए गए। लिनियस के शिष्य डॉ. डाहल के नाम पर इसे डहलिया कहा गया। महाद्वीप में इसे 'जॉर्जिना' भी कहा जाता है। १८०० के अंत तक डहलिया फूल की पंखुड़ियों से प्राप्त डहलिया एक्सट्रैक्ट प्राचीन दक्षिण अमेरिका से लेकर मध्य मेक्सिको, युकाटन और ग्वाटेमाला की पूर्व-कोलंबियाई संस्कृतियों में एक महत्वपूर्ण जड़वाला औषधीय गुणों के लिए जाना जात था। इसके कंद या जड़ें, उनके अंदर संग्रहीत पौष्टिक इनुलिन और कंद की त्वचा में केंद्रित एंटीबायोटिक यौगिकों दोनों के लिए मूल्यवान थीं। फूल का एज़्टेक नाम एकोकोटली या कोकोक्सोचिटल अर्थात 'पानी का पाइप' है। यह नाम डहलिया के औषधिक प्रभाव (शरीर प्रणाली में पानी की अनुपस्थिति व प्रवाह) को देखते हुए उपयुक्त है।
प्रकार
बगीचे में रंगों और आकृतियों की विविधता के लिए डहलिया लोकप्रिय पुष्प है। ये आसानी से उगने वाले बहुरंगी फूल क्रीमी सफ़ेद, हल्के गुलाबी, चमकीले पीले, लेकर शाही बैंगनी, गहरे लाल आदि अनेक रंगों में खिलते हैं। इस लोकप्रिय उद्यान फूल की ६०,००० से अधिक नामित किस्में हैं। डहलिया बहु आकारी पुष्प है। एकल-फूल वाले ऑर्किड डहलिया से लेकर फूले हुए पोम पोम डहलिया तक, सजावटी डहलिया के फूल आकार, रूप और रंग की विविधता में होते हैं। देर से गर्मियों में खिलनेवाले अपने खूबसूरत फूलों के साथ, डहलिया बगीचे में शानदार पतझड़ का रंग भर देते हैं। बॉल डाहलिया का ऊपरी भाग चपटा होता है, तथा पंखुड़ियाँ सर्पिल आकार में बढ़ती हैं। कैक्टस डहेलिया की पंखुड़ियाँ तारे के आकार में बढ़ती हैं। मिग्नॉन डहलिया में गोल किरण पुष्प होते हैं। आर्किड डाहलिया का केंद्र खुला होता है तथा एक डिस्क के चारों ओर पुष्पों की किरणें होती हैं। पोम्पोम डहलिया गोल आकार में उगते हैं और उनकी पंखुड़ियाँ घुमावदार होती हैं। सजावटी डहलिया को १५ अलग-अलग रंगों और संयोजनों में वर्गीकृत किया जा सकता है।
लाल डहलिया: 'अरेबियन नाइट': गहरे बरगंडी रंग के फूल लगभग ३.५ इंच चौड़े होते हैं। 'बेबीलोन रेड': लंबे समय तक चलने वाली, 8 इंच की डिनर प्लेट एक आकर्षक रंग में खिलती है। 'बिशप लैंडैफ़': मधुमक्खियों और बागवानों दोनों द्वारा पसंद किया जाने वाला यह छोटा लाल डाहलिया लाल पंखुड़ियों और गहरे रंग के पत्तों से सजा हुआ है। 'क्रेव कुएर': ११ इंच के डिनर प्लेट के आकार के ये फूल मजबूत तने के ऊपर खिलते हैं, ये जीवंत लाल फूल ४ फीट से अधिक ऊंचे होते हैं। 'रेड कैप': ४ इंच चौड़े फूल चमकीले लाल रंग में खिलते हैं। 'रेड फॉक्स': सघन पौधे जो गहरे लाल, ४ इंच के फूलों के साथ खिलते हैं।
सफेद डहलिया: 'बूम बूम व्हाइट': ५ इंच के खूबसूरत फूलों वाला एक सफ़ेद बॉल डाहलिया। 'सेंटर कोर्ट': यह सफेद डहलिया मजबूत तने के ऊपर ६ इंच के सफेद फूलों का प्रचुर उत्पादक है। 'लांक्रेसी': ४ इंच का, मलाईदार सफेद गेंद जैसा डाहलिया जो छोटे कंदों से उगता है। 'पेटा की शादी': शानदार, मलाईदार ३ इंच के फूलों की प्रचुरता पैदा करती है। 'स्नोकैप': बीच में हरे रंग के विचित्र स्पर्श के साथ सपाट सफेद पंखुड़ियाँ। 'व्हाइट डिनर प्लेट': ये शानदार, शुद्ध सफेद डहलिया फूल १० इंच तक चौड़े होते हैं। 'व्हाइट ओनेस्टा': यह बहुत अधिक फूलने वाला, सपाट सफेद रंग का डहलिया ३.५ इंच चौड़ा होता है।
गुलाबी डहलिया: 'कैफे औ लेट': सुंदर मलाईदार गुलाबी फूल ९ इंच तक चौड़े होते हैं और शादियों और समारोहों में अपनी खूबसूरती से सबको चौंका देते हैं। 'चिल्सन्स प्राइड': 4 इंच की ये सफेद और गुलाबी सुंदरियां गर्मी में लाल हो जाती हैं। 'एसली': ३ इंच के गुलाबी डहलिया में फूलों की भरमार होती है। 'हर्बर्ट स्मिथ': कंद भले ही छोटे हों, लेकिन ये चमकीले गुलाबी रंग के डहलिया 6 इंच तक चौड़े होते हैं। 'रेबेका लिन': प्रचुर मात्रा में, छोटे गुलाबी फूल बबल गम की याद दिलाते हैं। 'सैंड्रा': गेंद के आकार में गुलाबी पंखुड़ियों के साथ किसी भी परिदृश्य में नाटकीयता जोड़ती है। 'मधुर प्रेम': मलाईदार सफेद किनारों वाले हल्के गुलाबी फूल समय के साथ हल्के लाल रंग में बदल जाते हैं। 'ट्रिपल ली ​​डी': कॉम्पैक्ट पौधों के ऊपर असामान्य गुलाबी-सैल्मन रंग।
पीला डहलिया: 'गोल्डन टॉर्च': गोल, पीले रंग की गेंदें जो कटे हुए फूलों की सजावट के लिए उपयुक्त हैं। 'केल्विन फ्लडलाइट': विशाल, लंबे समय तक टिकने वाले पीले फूल जो 10 इंच तक चौड़े होते हैं। 'पोल्वेंटन सुप्रीम': लंबी शाखाओं के ऊपर गेंदों के रूप में खिलने वाला कोमल पीला डाहलिया। 'सन किस्ड': मजबूत तने, जिसके ऊपर चमकीली पीली पंखुड़ियां होती हैं। 'येलो परसेप्शन': आकर्षक 4 इंच के फूलों में पीले रंग की पंखुड़ियां होती हैं, जिनके सिरे सफेद होते हैं।
बैंगनी डहलिया: 'बेबीलोन पर्पल': विशाल डिनर प्लेट बैंगनी रंग की शाही छटा में खिलती है। 'ब्लू बॉय डाहलिया': शायद नीले डाहलिया का सबसे करीबी विकल्प, यह बकाइन डाहलिया तितलियों को आकर्षित करता है। 'दिवा': गहरे, शाही बैंगनी रंग का डाहलिया मजबूत तने पर खिलता है। 'फ़र्नक्लिफ़ इल्यूज़न': हल्के बकाइन फूल 8 इंच तक चौड़े होते हैं। 'प्रेशियस': एक बैंगनी-लैवेंडर फूल जो धीरे-धीरे सफेद हो जाता है।
औषधिक महत्व
डंडेलियन और चिकोरी में पाया जाने वाला १५ से २० प्रतिशत इनुलिन (शरीर की इंसुलिन आवश्यकता पूरी करने में सहायक प्राकृतिक उच्च फाइबर खाद्य), 'डहलिन' अर्थात डहलिया कंद में होता है। इनुलिन निकालने के लिए, जड़ों या कंदों को काट और चूने के दूध से उपचारित कर भाप में पकाया जाता है। फिर रस को निचोड़-छान-साफ कर तरल को एक घूमने वाले कूलर में गुच्छे बनने तक चलाया जाता है। इन गुच्छों को एक केन्द्रापसारक मशीन द्वारा अलगकर, धो और रंगहीन कर प्राप्त शुद्ध उत्पाद अंत में तनु अम्ल से उपचारित कर लेवुलोज में परिवर्तित किया जाता है। लेवुलोज के इस घोल को बेअसर कर वैक्यूम पैन में सिरप में वाष्पित किया जाता है। प्राप्त पूर्ण शुद्ध उत्पाद का मीठा और सुखद स्वाद मधुमेह रोगियों,कन्फेक्शनरी बनाने और चीनी उत्पादों के क्रिस्टलीकरण को धीमा करने के लिए भी उपयोगी बनाता है। इसे शराब बनाने और मिनरल वाटर उद्योगों में भी आसानी से इस्तेमाल किया जा सकता है। एक स्कॉटिश विश्वविद्यालय ने डहेलिया कंद से सेना के लिए एक मूल्यवान और अत्यंत आवश्यक औषधि निकालने की प्रक्रिया विकसित की।विशेष उपचार से गुजरने के बाद, डाहलिया कंद और चिकोरी से शुद्ध लेवुलोज (अटलांटा स्टार्च या डायबिटिक शुगर) से मधुमेह और तपेदिक तथा बच्चों की दुर्बलता का इलाज किया जाता है। १९०८ में पेरिस में आयोजित चीनी उद्योग की दूसरी अंतर्राष्ट्रीय कांग्रेस में पढ़े गए एक शोधपत्र के अनुसार शुद्ध लेवुलोज इनुलिन को तनु अम्लों के साथ उलट कर बनाया जाता है। सेलुलर क्षतिरोधक एंटीऑक्सीडेंट गुणों, सूजनरोधी प्रभाव, रक्त शर्करा विनियमन, कार्डियोवैस्कुलर सपोर्ट तथा प्रतिरक्षा प्रणाली सहायक के रूप में डहलिया अर्क की महत्वपूर्ण भूमिका पर शोध जारी है।
***
कुछ त्रिपदियाँ
*
नोटा मन भाया है,
क्यों कमल चुनें बोलो?
अब नाथ सुहाया है।
*
तुम मंदिर का पत्ता
हो बार-बार चलते
प्रभु को भी तुम छलते।
*
छप्पन इंची छाती
बिन आमंत्रण जाकर
बेइज्जत हो आती।
*
राफेल खरीदोगे,
बिन कीमत बतलाये
करनी भी भोगोगे।
*
पंद्रह लखिया किस्सा
भूले हो कह जुमला
अब तो न चले घिस्सा।
*
वादे मत बिसराना,
तुम हारो या जीतो-
ठेंगा मत दिखलाना।
*
जनता भी सयानी है,
नेता यदि चतुर तो
यान उनकी नानी है।
*
कर सेवा का वादा,
सत्ता-खातिर लड़ते-
झूठा है हर दावा।
*
पप्पू का था ठप्पा,
कोशिश रंग लाई है-
निकला सबका बप्पा।
*
औंधे मुँह गर्व गिरा,
जुमला कह वादों को
नज़रों से आज गिरा।
*
रचना न चुराएँ हम,
लिखकर मौलिक रचना
आइए हम अपना नाम कमाएं.
*
गागर में सागर सी,
क्षणिक लघु, जिसका अर्थ है बड़ा-
ब्रज के नटनागर सी।
*
मन ने मन से मिलकर
उन्मन हो कुछ न कहा-
धीरज का बाँध ढहा।
*
है किसका कौन सगा,
खुद से खुद ने पूछा?
उत्तर जो नेह-पगा।
*
तन से तन जब रूठा,
मन, मन ही मन रोया-
सुनकर झूठी-झूठा।
*
तन्मय होकर तन ने,
मन-मृण्मय जान कहा-
क्षण भंगुर है दुनिया।
***
शिव वंदना : एक दोहा अनुप्रास का
*
शिशु शशि शीश शशीश पर, शुभ शशिवदनी-साथ
शोभित शशि सी शशिमुखी, मोहित शिव शशिनाथ
*
शशीश अर्थात चन्द्रमा के स्वामी शिव जी के मस्तक पर बाल चन्द्र शोभायमान है, चन्द्रवदनी चन्द्रमुखी पावती जी उनके साथ हैं जिन्हें निहारकर शिव जी मुग्ध हो रहे हैं.
***
एक दोहा श्लेष का 
शुभ रजनी! शशि से कहा, तारे हैं नाराज.
किसकी शामत आ गई, करे हमारा काज.
२.१.२०१८
***
गीत :
घोंसला
*
घोंसले में
परिंदे ही नहीं
आशाएँ बसी हैं
*
आँधियाँ आएँ न डरना
भीत हो,जीकर न मरना
काँपती हों डालियाँ तो
नीड तजकर नहीं उड़ना
मंज़िलें तो
फासलों को नापते
पग को मिली हैं
घोंसले में
परिंदे ही नहीं
आशाएँ बसी हैं
*
संकटों से जूझना है
हर पहेली को सुलझाना है
कोशिशें करते रहे जो
उन्हें राहें सूझना है
ऊगती उषा
तभी जब साँझ
खुद हंसकर ढली है
घोंसले में
परिंदे ही नहीं
आशाएँ बसी हैं
११-१०-२०१६
***
नवगीत
.
हाथों में मोबाइल थामे
गीध दृष्टि पगडंडी भूली
भटक न जाए
.
राजमार्ग पर जाम लगा है
कूचे-गली हुए हैं सूने
ओवन-पिज्जा का युग निर्दय
भटा कौन चूल्हे में भूने?
महानगर में सतनारायण
कौन कराये कथा तुम्हारी?
गोबर बिन गणेश का पूजन
कैसे होगा बिपिनबिहारी?
कलावती की कथा सुन रहे
लीला की लीला मन झूली
मटक न आए
.
रावण रखकर रूप राम का
करे सिया से नैन मटक्का
मक्का जाने खों जुम्मन नें
बेंच दई बीजन कीं मक्का
हक्का-बक्का खाला बेबस
बिटिया बारगर्ल बन सिसके
एड्स बाँट दूँ हर गाहक को
भट्टी अंतर्मन में दहके
ज्वार-बाजरे की मजबूरी
भाटा-ज्वार दे गए सूली
गटक न पाए
.
नवगीत:
*
खुशियों की मछली को
चिंता का बगुला
खा जाता है
.
श्वासों की नदिया में
आसों की लहरें
कूद रहीं हिरणी सी
पलभर ना ठहरें
आँख मूँद मगन
उपवासी साधक
ठग जाता है
.
पथरीले घाटों के
थाने हैं बहरे
देख अदेखा करते
आँसू-नद गहरे
एक टाँग टाँग खड़ा
शैतां, साधू बन
डट खाता है
.
श्वेत वसन नेता से
लेकिन मन काला
अंधे न्यायलय ने
सच झुठला डाला
निरपराध फँस जाता
अपराधी झूठा
बच जाता है
२.१.२०१५
छंद सलिला:
शाला छंद
*
(अब तक प्रस्तुत छंद: आगरा, अचल, अचल धृति, आर्द्रा, आल्हा, इंद्र वज्र, उपेन्द्र वज्र, कीर्ति, घनाक्षरी, प्रेमा, वाणी, शक्तिपूजा, सार, माला)
शाला छंद में 2 छंद, 4 छंद, 44 अक्षर और 71 अक्षर होते हैं। पहले, दूसरे और चौथे चरण में 2 तगण 1 जगण 2 गुरु होते हैं और तीसरे चरण में जगण तगण जगण 2 गुरु होते हैं।
शाला दे आनंद, इंद्रा तीसरे चरण में
हो उपेन्द्र शुभ छंद, चरण एक दो तीन में
उदाहरण:
१. जा पाठशाला कर लो पढ़ाई, भूलो न सीखा तब हो बड़ाई
पढ़ो-लिखो जो वह आजमाओ, छोडो अधूरा मत पाठ भाई
२. बोलो, न बोलो मत राज खोलो, चाहो न चाहो पर साथ हो लो
करो न कोई रुसवा किसी को, सच्चा कहो या मत झूठ बोलो
३. बाती मिलाओ मन साथ पाओ, वादा निभाओ फिर मुस्कुराओ
बसा दिलों में दिल आप दोनों, सदा दिवाली मिल के मनाओ
२.१.२०१४
***

गुरुवार, 1 जनवरी 2026

१ जनवरी, सॉनेट, नया साल, दोहा, अंक, गीत, चित्रगुप्त, लघुकथा, बाल गीत, प्रार्थना,

सलिल सृजन १ जनवरी
*
नव वर्ष : नव अनुष्ठान
लघुकथा २०२५ 
विश्ववाणी हिंदी संस्थान अभियान जबलपुर के तत्वावधान में तिनका तिनका नीड़, निर्माण के नूपुर, नींव के पत्थर, दोहा दोहा नर्मदा, दोहा सलिला निर्मला, दोहा दिव्य दिनेश, हिंदी सॉनेट सलिला, चंद्र विजय अभियान, फुलबगिया, हिंदी सॉनेट साधना तथा बचपन के दिन के बाद साझा संकलन 'लघुकथा २०२५' का प्रकाशन प्रस्तावित है। हर सहभागी से १० लघुकथाएँ, चित्र, सूक्ष्म परिचय (नाम, जन्म दिनाँक.माह.वर्ष, डाक का पता, वाट्स एप क्रमांक) वाट्स ऐप ९४२५१८३१४४ पर आमंत्रित हैं। हर सहभागी को ६ पृष्ठ प्राप्त होंगे, सहभागिता निधि २१०० रु. है। इस अनुष्ठान में सहभागिता हेतु इच्छुक साथी ३१ जनवरी तक अपना नाम वाट्स एप क्रमांक तथा शहर का नाम इस सूचना को कॉपी-पेस्ट कर जोड़ें। 
०१. संजीव वर्मा 'सलिल' जबलपुर  
०२. सरला वर्मा 'शील' भोपाल  
०३. अविनाश ब्यौहार जबलपुर
०४. नीलिमा रंजन भोपाल   
०५. वसुधा वर्मा मुंबई  
०६. मुकुल तिवारी जबलपुर 
०७. खंजन सिन्हा भोपाल  
०८. मनीषा सहाय 'सुमन' राँची 
०९. मनोहर चौबे 'आकाश' जबलपुर 
१०. अरविन्द श्रीवास्तव झाँसी 
११. छाया सक्सेना जबलपुर 
१२. संगीता भारद्वाज भोपाल 
१३. अस्मिता शैली जबलपुर 
१४. विद्या श्रीवास्तव भोपाल 
१३. शोभा सिंह जबलपुर 
१४. भावना मयूर पुरोहित हैदराबाद
१५. रेखा श्रीवास्तव अमेठी 
१६. विनोद जैन 'वागवार' सागवाड़ा  
१७. नवनीता चौरसिया जावरा 
१८. संतोष शुक्ला नवसार 
१९. सुरेन्द्र सिंह पवार जबलपुर 
२०. मीना भट्ट जबलपुर 
२१.  
२२. 
२३. 
२४. 
२५.  
. . .  
गीत
.
नया साल बन सके पुरोहित
साँसों को यजमान बनाए
हास दे सके अधर अधर को
उल्लासों के सुमन खिलाए
.
खिलखिल खिल मन नलिनी शतदल
दे नीलिमा छत्र सिर पर धर
लाल लालिमा जवाकुसुम की
सके श्यामता 'मावस की हर
शरत्पूर्णिमा की रजनीशी
चटक चाँदनी गले लगाए
नया साल बन सके पुरोहित
साँसों को यजमान बनाए
.
नव आशा ले करें अर्चना
श्रम-सीकर अँजुरी में भरकर
सफल साधना स्नेह सुवासित
पुष्पा दे जीवन सुगंध भर
किरण करों से भुवन भास्कर
सुख-समृद्धि हित यज्ञ कराए
नया साल बन सके पुरोहित
साँसों को यजमान बनाए
.
जग-जीवन की सुखकर सुषमा 
दसों दिशा राजीव खिलाए
राज बहादुर करे धरा को
शांति निकेतन कर हर्षाए
विहँस जीव संजीव हो सके
हो प्रबुद्ध बुद्ध हो पाए
नया साल हो सके पुरोहित
साँसों को यजमान बनाए
१.१.२०२६
००० 
प्रार्थना
.
प्रभु जी! अगर बुढ़ापा देना
ऐसा देना दाँत न टूटे।
डाइबिटीज न होने पाए
अस्पताल-डाक्टर नहिं लूटे।।
.
रहे जवां दिल, रुके न धड़कन
चट कर पाऊँ चाट चटपटी
अपने-सपने रहें साथ में
चाल भले हो निपट अटपटी
ऊबड़-खाबड़ डगर भले हो
उम्मीदों का साथ न छूटे
प्रभु जी! अगर बुढ़ापा देना
ऐसा देना टाँग न टूटे
.
कविताओं की पहुनाई हो
नहीं कलम की रुसवाई हो
संगी-साथी रहें किताबें
नहीं कल्पना हरजाई हो
नेह नर्मदा नित नहलाना
एकाकी तकदीर न फूटे
प्रभु जी! अगर बुढ़ापा देना
ऐसा देना हाथ न टूटे
.
काल कुम्हार उठाए माटी
चाक चलाकर कुंभ बनाए
बूँद-बूँद रिसता जीवन-जल 
रीते माटी में मिल जाए
जैसी करनी, वैसी भरनी
नाहक ही क्यों माथा कूटे
प्रभु जी! अगर बुढ़ापा देना
ऐसा देना आस न टूटे
१.१.२०२६
०००
सॉनेट
नया साल
नया साल है, नया हाल हो, नई चाल चलना है,
बीती ताहि बिसार हमें लिखना है नई कहानी,
मन में जग पाए शिव शंकर, तन बन सके भवानी,
जाग उठें मिल सूर्य देव सम कर्मव्रती बनना है।
सबके सपने अपने हों ताना-बाना बुनना है,
मिलें स्नेह से बोलें साथी हम सब मीठी बानी,
छोड़ सकें जाने से पहले कोई कहीं निशानी,
अपनी कम कह औरों की हमको ज्यादा सुनना है।
अनिल अनल भू धरा सलिल सम ताल-मेल रख पाएँ,
नेह नर्मदा नित्य नहाएँ भुज भेंटें सब हिल-मिल,
अगली पीढ़ी को दे पाएँ नव मांगलिक विरासत।
श्रम सीकर की गंग बहाकर जग तारें तर जाएँ,
बंजर में भी नव आशा के सुमन सकें शत शत खिल,
रखें अधर पर हास करें हम नए साल का स्वागत।
१.१.२०२४
•••
सॉनेट
नया साल
दो हजार चौबीस स्वागत है, आ जाओ,
जो बीता सो बीता कुछ शुभ नया करो,
दर्द दूर कर, सबके मन में हर्ष भरो,
तिमिर दूरकर, नव उजास बनकर छाओ।
जन-गण को दे हर्ष झूम आल्हा गाओ,
जनमंगल की राह चलो, बिल्कुल न डरो,
आसमान छूती मंँहगाई, पर कतरो,
सपने हों साकार युक्ति कुछ बतलाओ,
आपदा विपदा युद्ध त्रास दे रहे मिटा,
शांति-राज कर दो हर जन को चैन मिले,
बजे बाँसुरी कान्हा की हो रास मधुर।
जिनके मन हैं मलिन, उन्हें दो कुचल हटा,
शत्रु देश के ढह जाएँ मजबूत किले,
सुख-संतोष सभी पाएँ सब सकें निखर।
३१-१२-२०२३
•••
सोनेट
कल-आज-कल
*
जाने वाला राह बनाता आने वाला चलता है,
पलता है सपना आँखों में तब ही जब हम सोए हों,
फसल काटता केवल वह ही जिसने बीजे बोए हों,
उगता सूरज तब ही जब वह नित संझा में ढलता है।
वह न पनपता जिसको सुख-सौभाग्य अन्य का खलता है,
मुस्कानों की कीमत जानें केवल वे जो रोए हों,
अपनापन पाते हैं वे जो अपनेपन में खोए हों,
लोहा हो फौलाद आग में तप जब कभी पिघलता है।
कल कल करता निर्झर बहता कल पाता मन बैठ निकट,
किलकिल करता जो हो बेकल उसमें सचमुच नहीं अकल,
दास न होना कल का मानव कल-पुर्जों का स्वामी बन।
ठोकर मार न कंकर को तू शंकर उससे हुए प्रगट,
काट न जंगल खोद न पर्वत मिटा न नदी बचा ले जल,
कल से कल को जोड़ आज तू होकर नम्र न नाहक तन।।
३१.१२.२०२३
***
गीत
उजास दे
*
नवल वर्ष के
प्रथम सूर्य की
प्रथम रश्मि
पल पल उजास दे।
गूँजे गौरैया का कलरव
सलिल-धार की घटे न कलकल
पवन सुनाए सन सन सन सन
हो न किसी कोने में किलकिल
नियति अधर को
मधुर हास दे।
सोते-जगते देखें सपने
मानें-तोड़ें जग के नपने
कोशिश कर कर थक जाएँ तो
लगें राम की माला जपने
पीर दर्द सह
झट हुलास दे।
लड़-मिलकर सँग रहना आए
कोई छिटककर दूर न जाए
गले मिल सकें, हाथ मिलाएँ
नयन नयन को नयन बसाए
अधर अधर को
नवल हास दे।
१-२-२०२३,१५•२३
•••
सॉनेट
बेधड़क
बेधड़क बात अपनी कही
कोई माने न माने सचाई
हो न जाती सुता सम पराई
संग श्वासा सी पल पल रही
पीर किसने किसी की गही?
मौज मस्ती में जग साथ था
कष्ट में झट तजा हाथ था
वेदना सब अकेले तही
रेणु सब अश्रुओं से बही
नेह की नर्मदा ना मिली
शेष है हर शिला अनधुली
माँग पूरी करी ना भरी
तुम उड़ाते भले हो हँसी
दिल में गहरे सचाई धँसी
संजीव
१-१-२०२३,४•३८
जबलपुर
●●●
सॉनेट
पग-धूल
ईश्वर! तारो दे पग-धूल
अंश तुम्हारा आया दर पर
जागो जागो जागो हरि हर
क्षमा करो मेरी सब भूल
पग मग पर चल पाते शूल
सुनकर भी अनसुना रुदन-स्वर
क्यों करते हो करुणा सागर
देख न देखी आँसू-झूल
क्या कर सकता भेंट अकिंचन?
अँजुरी में कुछ श्रद्धा-फूल
स्वीकारो यह ब्याज समूल
तरुण पथिक, हो मधुर कृपालु
आस टूटती दिखे न कूल
आकुल किंकर दो पग-धूल
संजीव
१-१-२०२३, ४•२०
जबलपुर
●●●
सॉनेट
*
नया साल है, नया हाल हो, चाल नई,
आशा-अरमानों का सफर नया हो अब,
अमरकंटकी सलिल सदा निर्मल हो सब,
याद न कर जो बीत गई सो बीत गई।
बना सके तो बना सृजन की रीत नई,
जैसा था वैसा ही है इंसां-जग-रब,
किया न अब, साकार करेगा सपना कब?
पूरा पुरातन ही प्रतीत हो प्रीत गई।
नया-पुराना चित-पट दो पहलू जैसे,
करवट बदले समय न जानें हम कैसे?
नहीं बदलते रहते जैसे के तैसे।
जैसे भी हो पाना चाहें पद-पैसे,
समझ न पाते अकल बड़ी है या भैंसे?
जैसा छह आओ हम-तुम हों वैसे।
***
सॉनेट
जाड़ा आया है
*
ठिठुर रहे हैं मूल्य पुराने, जाड़ा आया है।
हाथ तापने आदर्शों को सुलगाया हमने।
स्वार्थ साधने सुविधाओं से फुसलाया हमने।।
जनमत क्रयकर अपना जयकारा लगवाया है।।
अंधभक्ति की ओढ़ रजाई, करते खाट खड़ी।
सरहद पर संकट के बादल, संसद एक नहीं।
जंगल पर्वत नदी मिटाते, आफत है तगड़ी।।
उलटी-सीधी चालें चलते, नीयत नेक नहीं।।
नफरत के सौदागर निश-दिन, जन को बाँट रहे।
मुर्दे गड़े उखाड़ रहे, कर ऐक्य भावना नष्ट।
मिलकर चोर सिपाही को ही, नाहक डाँट रहे।।
सत्ता पाकर ऐंठ रहे, जनगण को बेहद कष्ट।।
गलत आँकड़े, झूठे वादे, दावे मनमाने।
महारोग में रैली-भाषण, करते दीवाने।।
१.१.२०२२
***
अंक माहात्म्य (०-९)
*
शून्य जन्म दे सृष्टि को, सकल सृष्टि है शून्य।
जुड़-घट अंतर शून्य हो, गुणा-भाग फल शून्य।।
*
एक ईश रवि शशि गगन, भू मैं तू सिर एक।
गुणा-भाग धड़-नासिका, है अनेक में एक।।
*
दो जड़-चेतन नार-नर, कृष्ण-शुक्ल दो पक्ष।
आँख कान कर पैर दो, अधर-गाल समकक्ष।।
*
तीन देव व्रत राम त्रय, लोक काल ऋण तीन।
अग्नि दोष-गुण ताप ऋतु, धारा मामा तीन।।
*
चार धाम युग वेद रिपु, पीठ दिशाएँ चार।
वर्ण आयु पुरुषार्थ चौ, चौका चौक अचार।।
*
पाँच देव नद अंग तिथि, तत्व अमिय शर पाँच।
शील सुगंधक इन्द्रियाँ, कन्या नाड़ी साँच।।
*
छह दर्शन वेदांग ऋतु, शास्त्र पर्व रस कर्म।
षडाननी षड राग है, षड अरि-यंत्र न धर्म।।
*
सात चक्र ऋषि द्वीप स्वर, सागर पर्वत रंग।
लोक धातु उपधातु दिन, अश्व अग्नि शुभ अंग।।
*
अष्ट लक्ष्मी सिद्धि वसु, योग कंठ के दोष।
योग-राग के अंग अठ, आत्मोन्नति जयघोष।
*
नौ दुर्गा ग्रह भक्ति निधि, हवन कुंड नौ तंत्र।
साड़ी मोहे नौगजी, हार नौलखा मंत्र।।
१.१.२०२२
***
गीत
बिदा दो
बिदा दो, जाना मुझे है दूर
चिर विरह नव मिलन का संतूर
*
भूमिका जो मिली थी मैंने निभाई
करी तुमने अदेखी, नजरें चुराई
गिर रही है यवनिका अंतिम नमन लो
नहीं अपनी, श्वास भी होती पराई
छाँव थोड़ी धूप हमने साथ झेली
हर्ष गम से रह न पाया दूर
बिदा दो, जाना मुझे है दूर
चिर विरह नव मिलन का संतूर
*
जब मिले थे किए थे संकल्प
लक्ष्य पाएँ तज सभी विकल्प
चल गिरे उठ बढ़े मिल साथ
साध्य ऊँचा भले साधन स्वल्प
धूल से ले फूल का नव नूर
बिदा दो, जाना मुझे है दूर
चिर विरह नव मिलन का संतूर
*
तीन सौं पैंसठ दिवस थे साथ
हाथ में ले हाथ, उन्नत माथ
प्रयासों ने हुलासों के गीत
गाए, शासन दास जनगण नाथ
लोक से हो तंत्र अब मत दूर
बिदा दो, जाना मुझे है दूर
चिर विरह नव मिलन का संतूर
*
जा रहा बाईस का यह साल
आ रहा तेईस करे कमाल
जमीं पर पग जमा छू आकाश
हिंद-हिंदी करे खूब धमाल
बजाओ मिल नव प्रगति का तूर
बिदा दो, जाना मुझे है दूर
चिर विरह नव मिलन का संतूर
*
अभियान आगे बढ़ाएँ हम-आप
छुएँ मंज़िल नित्य, हर पथ माप
सत्य-शिव-सुंदर बने पाथेय
नव सृजन का हो निरंतर जाप
शत्रु-बाधा को करो झट चूर
बिदा दो, जाना मुझे है दूर
चिर विरह नव मिलन का संतूर
३१-१२-२०२२
१६•३६, जबलपुर
●●●
कविता
*
महाकाल ने महाग्रंथ का पृष्ठ पूर्ण कर,
नए पृष्ठ पर लिखना फिर आरंभ किया है।
रामभक्त ने राम-चरित की चर्चा करके
आत्मसात सत-शिव करना प्रारंभ किया है।
चरण रामकिंकर के गहकर
बहे भक्ति मंदाकिनी कलकल।
हो आराम हराम हमें अब
छू ले लक्ष्य, नया झट मधुकर।
कृष्ण-कांत की वेणु मधुर सुन
नर सुरेश हों, सुर भू उतरें।
इला वरद, संजीव जीव हो।
शंभुनाथ योगेंद्र जगद्गुरु
चंद्रभूषण अमरेंद्र सत्य निधि।
अंजुरी मुकुल सरोज लिए हो
करे नमन कैलाश शिखर को।
सरला तरला, अमला विमला
नेह नर्मदा-पवन प्रवाहित।
अग्नि अनिल वसुधा सलिलांबर
राम नाम की छाया पाएँ।
नए साल में, नए हाल में,
बढ़े राष्ट्र-अस्मिता विश्व में।
रानी हो सब जग की हिंदी
हिंद रश्मि की विभा निरुपमा।
श्वास बसंती हो संगीता,
आकांक्षा हर दिव्य पुनीता।
निशि आलोक अरुण हँस झूमे
श्रीधर दे संतोष-मंजरी।
श्यामल शोभित हरि सहाय हो,
जय प्रकाश की हो जीवन में।
मानवता की जय जय गाएँ।
राम नाम हर पल गुंजाएँ।।
३१-१२-२०२२
●●●
।। ॐ ।।
गीत
चित्र गुप्त है नए काल का हे माधव!
गुप्त चित्र है कर्म जाल का हे माधव!
स्नेह साधना हम कर पाएँ श्री राधे!
जीवन की जय जय गुंजायें श्री राधे!
मानव चाहे बनना भाग्य विधाता पर
स्वार्थ साधकर कहे बना जगत्राता पर
सुख-सपनों की खेती हित दुख बोता है
लेख भाल का कब पढ़ पाया हे माधव!
नेह नर्मदा निर्मल कर दो श्री राधे!
रासलीन तन्मय हों वर दो श्री राधे!
रस-लय-भाव तार दे भव से सदय रहो
शारद-रमा-उमा सुत हम हों श्री राधे!
खुद ही वादों को जुमला बता देता
सत्ता हित जिस-तिस को अपने सँग लेता
स्वार्थ साधकर कैद करे संबंधों को
न्यायोचित ठहरा छल करता हे माधव!
बंधन में निर्बंध रहें हम श्री राधे!
स्वार्थरहित संबंध वरें हम श्री राधे!
आए हैं तो जाने की तैयारी कर
खाली हाथों तारकर तरें श्री राधे!
बिसरा देता फल बिन कर्म न होता है
व्यर्थ प्रसाद चढ़ा; संशय मन बोता है
बोये शूल न फूल कभी भी उग सकते
जीने हित पल पल मरता मनु हे माधव!
निजहित तज हम सबहित साधें श्री राधे!
पर्यावरण शुद्धि आराधें श्री राधे!
प्रकृति पुत्र हों, संचय-भोग न ध्येय बने
सौ को दें फिर लें कुछ काँधे श्री राधे!
माधव तन में राधा मन हो श्री राधे!
राधा तन में माधव मन हो हे माधव!
बिंदु सिंधु में, सिंधु बिंदु में हे माधव!
हो सहिष्णु सद्भाव पथ वरें श्री राधे!
१-१-२०२०
***
नवगीत
शिव-शिव कह उठ हर सुबह,
सुमिर शिवा सो रात.
हर बिगड़ी को ले बना,
कर न बात बेबात.
.
समय-शिला पर दे बना,
कोशिश के नव चित्र.
समय-रेत से ले बना,
नया घरौंदा मित्र.
मिला आँख से आँख तू,
समय सुनेगा बात.
हर बिगड़ी को ले बना,
कर न बात बेबात.
.
समय सिया है, सती भी,
तजें राम-शिव जान.
यशोधरा तज बुद्ध बन,
सही समय अनुमान.
बंध रहे सम तो उचित
अनुचित उचित न तात.
हर बिगड़ी को ले बना,
कर न बात बेबात.
.
समय सत्य-सुंदर वरो,
पूज शिवा-शिव संग.
रंग न हों बदरंग अब,
साध्य न बने अनंग.
सतत सजग रह हर समय,
समय न करे दे घात.
हर बिगड़ी को ले बना,
कर न बात बेबात.
१.१.२०१८
...
नवगीत
*
नए साल!
आजा कतार में
आगे मत जा।
*
देश दिनों से खड़ा हुआ है,
जो जैसा है अड़ा हुआ है,
किसे फ़िक्र जनहित का पेड़ा-
बसा रहा है, सड़ा हुआ है।
चचा-भतीजा ताल ठोंकते,
पिता-पुत्र ज्यों श्वान भौंकते,
कोई काट न ले तुझको भी-
इसीलिए कहता हूँ-
रुक जा।
*
वादे जुमले बन जाते हैं,
घपले सारे धुल जाते हैं,
लोकतंत्र के मूल्य स्वार्थ की-
दीमक खाती, घुन जाते हैं।
मौनी बाबा बोल रहे हैं
पप्पू जहँ-तहँ डोल रहे हैं
गाल बजाते जब-तब लालू
मत टकराना
बच जा झुक जा।
*
एक आदमी एक न पाता,
दूजा लाख-करोड़ जुटाता,
मार रही मरते को दुनिया-
पिटता रोये, नहीं सुहाता।
हुई देर, अंधेर यहाँ है,
रही अनसुनी टेर यहाँ है,
शुद्ध दलाली, न्याय कहाँ है?
जलने से पहले
मत बुझ जा।
***
नए साल की पहली रचना-
कलह कथा
*
कुर्सी की जयकार हो गयी, सपा भाड़ में भेजें आज
बेटे के अनुयायी फाड़ें चित्र बाप के, आये न लाज
स्वार्थ प्रमुख, निष्ठा न जानते, नारेबाजी शस्त्र हुआ
भीड़तंत्र ही खोद रहा है, लोकतंत्र के लिए कुआं
रंग बदलता है गिरगिट सम, हुआ सफेद पूत का खून
झुका टूटने के पहले ही बाप, देख निज ताकत न्यून
पोल खुली नूरा कुश्ती की, बेटे-बाप हो गए एक
चित्त हुए बेचारे चाचा, दिए गए कूड़े में फेंक
'आजम' की जाजम पर बैठे, दाँव आजमाते जो लोग
नींव बनाई जिनने उनको ठुकराने का पाले रोग
'अमर' समर में हों शहीद पछताएँ, शत्रु हुए वे ही
गोद खिलाया जिनको, भोंका छुरा पीठ में उनने ही
जे.पी., लोहिया, नरेन्द्रदेव की, आत्माएँ करतीं चीत्कार
लालू, शरद, मुलायम ने ही सोशलिज्म पर किया प्रहार
घर न घाट की कोंग्रेस के पप्पू भाग चले अवकाश
कहते थे भूकम्प आएगा, हुआ झूठ का पर्दाफाश
अम्मा की पादुका उठाये हुईं शशिकला फिर आगे
आर्तनाद ममता का मिथ्या, समझ गए जो हैं जागे
अब्दुल्ला कर-कर प्रलाप थक-चुप हो गए, बोलती बन्द
कमल कर रहा आत्मप्रशंसा, चमचे सुना रहे हैं छंद
सेनापति आ गए नए हैं, नया साल भी आया है
समय बताएगा दुश्मन कुछ काँपा या थर्राया है?
इनकी गाथा छोड़ चलें हम,घटीं न लेकिन मिटीं कतार
बैंकों में कुछ बेईमान तो मिले मेहनती कई हजार
श्री प्रकाश से नया साल हो जगमग करिये कृपा महेश
क्यारी-क्यारी कुसुम खिलें नव, काले धन का रहे न लेश
गुप्त न रखिये कोई खाता, खुला खेल खेलें निर्भीक
आजीवन अध्यक्ष न होगा, स्वस्थ्य बने खेलों में लीक
१.१.२०१७
***
लघुकथा
नया साल
*
चंद कदमों के फासले पर एक बूढ़े और एक नवजात को सिसकते-कराहते देखकर चौंका, सजग हो धीरज बँधाकर कारण पूछा तो दोनों एक ही तकलीफ के मारे मिले। उनकी व्यथा-कथा ने झकझोर दिया।
वे दोनों समय के वंशज थे, एक जा रहा था, दूसरा आ रहा था, दोनों को पहले से सत्य पता था, दोनों अपनी-अपनी भूमिकाओं के लिये तैयार थे। फिर उनके दर्द और रुदन का कारण क्या हो सकता था? बहुत सोचने पर भी समझ न आया तो उन्हीं से पूछ लिया।
हमारे दर्द का कारण हो तुम, तुम मानव जो खुद को दाना समझने वाले नादान हो। कुदरत के कानून के मुताबिक दिन-रात, मौसम, ऋतुएँ आते-जाते रहते हैं। आदमियों को छोड़कर कोई दूसरी नस्ल कुदरत के काम में दखल नहीं देती। सब अपना-अपना काम करते हैं। तुम लोग बदलावों को खुद से जोड़कर और सबको परेशान करते हो।
कुदरत के लिये सुबह दोपहर शाम रात और पैदा होने-मरने का क्रम का एक सामान्य प्रक्रिया है। तुमने किसी आदमी से जोड़कर समय को साल में गिनना आरंभ कर दिया, इतना ही नहीं अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग आदमियों के नाम पर साल बना लिये।
अब साल बदलने की आड़ में हर कुछ दिनों में नये साल के नाम पर झाड़ों को काट कर कागज़ बनाकर उन पर एक दूसरे को बधाई कामना देते हो जबकि इसमें तुम्हारा कुछ नहीं होता। कितना शोर मचाते हो?, कितनी खाद्य सामग्री फेंकते हो?, कितना धुआँ फैलाते हो? पशु-पक्षियों का जीना मुश्किल कर देते हो। तुम्हारी वज़ह से दोनों जाते-आते समय भी चैन से नहीं रह सकते। सुधर जाओ वरना भविष्य में कभी नहीं देख पालोगे कोई नया साल। समय के धैर्य की परीक्षा मत लो, काल को महाकाल बनने के लिये मजबूर मत करो।
इतना कहकर वे दोनों तो ओझल हो गये लेकिन मेरी आँख खुल गयी, उसके बाद सो नहीं सका क्योंकि पड़ोसी जोर-शोर से मना रहे थे नया साल।
***
मुक्तिका:
रहें साल भर
*
रहें साल भर हँस चाहों में
भले न रह पाएँ बाँहों में
*
कोशिश, कशिश, कदम का किस्सा
कह-सुन, लिख-पढ़-गढ़ राहों में
*
बहा पसीना, चाय बेचकर
कुछ की गिनती हो शाहों में
*
संगदिली या तंगदिली ने
कसर न छोड़ी है दाहों में
*
भूख-निवाला जैसे हम-तुम
संग रहें चोटों-फाहों में
*
अमर हुई है 'सलिल' लगावट
ज़ुल्म-जुदाई में, आहों में
*
परवाज़ों ने नाप लिया है
आसमान सुन लो वाहों में
***
दोहा सलिला:
साल रहा है दर्द यह, कैसा आया साल?
जा बैठा है चीन की, गोद अनुज नेपाल
*
बड़ा न होकर सगा हो, अपना भारत देश
रहें पडोसी संग तो, होगी शक्ति विशेष
*
सैन्य कटाकर मिल रहे, नायक गले सहास
नर मुंडों पर सियासत, जनगण को संत्रास
*
साल मिसाल बने 'सलिल', घटे प्रदूषण रोज
नेता लूटें देश को, गिद्ध करें ज्यों भोज
*
अफसरशाही ने किया, लोकतंत्र को कैद
मना रहा रंगरेलियाँ, लोभ तन्त्र नापैद
१.१.२०१६
***
नवगीत २०१५
.
हे साल नये!
मेहनत के रच दे गान नये
.
सूरज ऊगे
सब तम पीकर खुद ही डूबे
शाम हँसे, हो
गगन सुनहरा, शशि ऊगे
भूचाल नये
थक-हार विफल तूफ़ान नये
.
सामर्थ्य परख
बाधा-मुश्किल वरदान बने
न्यूनता दूर कर
दृष्टि उठे या भृकुटि तने
वाचाल न हो
पुरुषार्थ गढ़े प्रतिमान नये
.
कंकर शंकर
प्रलयंकर, बन नटराज नचे
अमृत दे सबको
पल में सारा ज़हर पचे
आँसू पोंछे
दस दिश गुंजित हों गान नये
.
१-१-२०१५, ०१.१०
***
नवगीत:
भाल उठा...
*
बहुत झुकाया अब तक तूने
अब तो अपना भाल उठा...
*
समय श्रमिक!
मत थकना-रुकना.
बाधा के सम्मुख
मत झुकना.
जब तक मंजिल
कदम न चूमे-
माँ की सौं
तब तक
मत चुकना.
अनदेखी करदे छालों की
गेंती और कुदाल उठा...
*
काल किसान!
आस की फसलें.
बोने खातिर
एड़ी घिस ले.
खरपतवार
सियासत भू में-
जमी- उखाड़
न न मन-बल फिसले.
पूँछ दबा शासक-व्यालों की
पोंछ पसीना भाल उठा...
*
ओ रे वारिस
नए बरस के.
कोशिश कर
क्यों घुटे तरस के?
भाषा-भूषा भुला
न अपनी-
गा बम्बुलिया
उछल हरष के.
प्रथा मिटा साकी-प्यालों की
बजा मंजीरा ताल उठा...
***
२०१४ का अंतिम नवगीत:
कब आया, कब गया
साल यह
.
रोजी-रोटी रहे खोजते
बीत गया
जीवन का घट भरते-भरते
रीत गया
रो-रो थक, फिर हँसा
साल यह
.
आये अच्छे दिन कब कैसे?
खोज रहे
मतदाता-हित नेतागण को
भोज रहे
छल-बल कर ढल गया
साल यह
.
मत रो रोना, चैन न खोना
धीरज धर
सुख-दुःख साथी, धूप-छाँव सम
निशि-वासर
सपना बनकर पला
साल यह
.
३१.१२. २०१४, २३.५५
***
गीत:
झाँक रही है...
*
झाँक रही है
खोल झरोखा
नए वर्ष में धूप सुबह की...
*
चुन-चुन करती चिड़ियों के संग
कमरे में आ.
बिन बोले बोले मुझसे
उठ! गीत गुनगुना.
सपने देखे बहुत, करे
साकार न क्यों तू?
मुश्किल से मत डर, ले
उनको बना झुनझुना.
आँक रही
अल्पना कल्पना
नए वर्ष में धूप सुबह की...
*
कॉफ़ी का प्याला थामे
अखबार आज का.
अधिक मूल से मोह पीला
क्यों कहो ब्याज का?
लिए बांह में बांह
डाह तज, छह पल रही-
कशिश न कोशिश की कम हो
है सबक आज का.
टाँक रही है
अपने सपने
नए वर्ष में धूप सुबह की...
१.१.२०१४
***
बाल गीत :
ज़िंदगी के मानी
*
खोल झरोखा, झाँक-
ज़िंदगी के मानी मिल जायेंगे.
मेघ बजेंगे, पवन बहेगा,
पत्ते नृत्य दिखायेंगे.....
*
बाल सूर्य के संग ऊषा आ,
शुभ प्रभात कह जाएगी.
चूँ-चूँ-चूँ-चूँ कर गौरैया
रोज प्रभाती गायेगी..
टिट-टिट-टिट-टिट करे टिटहरी,
करे कबूतर गुटरूं-गूं-
कूद-फाँदकर हँसे गिलहरी
तुझको निकट बुलायेगी..
आलस मत कर, आँख खोल,
हम सुबह घूमने जायेंगे.
खोल झरोखा, झाँक-
ज़िंदगी के मानी मिल जायेंगे.....
*
आई गुनगुनी धूप सुनहरी
माथे तिलक लगाएगी.
अगर उठेगा देरी से तो
आँखें लाल दिखायेगी..
मलकर बदन नहा ले जल्दी,
प्रभु को भोग लगाना है.
टन-टन घंटी मंगल ध्वनि कर-
विपदा दूर हटाएगी.
मुक्त कंठ-गा भजन-आरती,
सरगम-स्वर सध जायेंगे.
खोल झरोखा, झाँक-
ज़िंदगी के मानी मिल जायेंगे.....
*
मेरे कुँवर कलेवा कर फिर,
तुझको शाला जाना है.
पढ़ना-लिखना, खेल-कूदना,
अपना ज्ञान बढ़ाना है..
अक्षर,शब्द, वाक्य, पुस्तक पढ़,
तुझे मिलेगा ज्ञान नया.
जीवन-पथ पर आगे चलकर
तुझे सफलता पाना है..
सारी दुनिया घर जैसी है,
गैर स्वजन बन जायेंगे.
खोल झरोखा, झाँक-
ज़िंदगी के मानी मिल जायेंगे.....
***
गीत
नया पृष्ठ
*
महाकाल के महाग्रंथ का
नया पृष्ठ फिर आज खुल रहा....
*
वह काटोगे,
जो बोया है.
वह पाओगे,
जो खोया है.
सत्य-असत, शुभ-अशुभ तुला पर
कर्म-मर्म सब आज तुल रहा....
*
खुद अपना
मूल्यांकन कर लो.
निज मन का
छायांकन कर लो.
तम-उजास को जोड़ सके जो
कहीं बनाया कोई पुल रहा?...
*
तुमने कितने
बाग़ लगाये?
श्रम-सीकर
कब-कहाँ बहाए?
स्नेह-सलिल कब सींचा?
बगिया में आभारी कौन गुल रहा?...
*
स्नेह-साधना करी
'सलिल' कब.
दीन-हीन में
दिखे कभी रब?
चित्रगुप्त की कर्म-तुला पर
खरा कौन सा कर्म तुल रहा?...
*
खाली हाथ?
न रो-पछताओ.
कंकर से
शंकर बन जाओ.
ज़हर पियो, हँस अमृत बाँटो.
देखोगे मन मलिन धुल रहा...
***
गीत
साल नया
*
कुछ ऐसा हो साल नया
*
कुछ ऐसा हो साल नया,
जैसा अब तक नहीं हुआ.
अमराई में मैना संग
झूमे-गाए फाग सुआ...
*
बम्बुलिया की छेड़े तान.
रात-रात जग जगा किसान.
कोई खेत न उजड़ा हो-
सूना मिले न कोई मचान.
प्यासा खुसरो रहे नहीं
गैल-गैल में मिले कुआ...
*
पनघट पर पैंजनी बजे,
बीर दिखे, भौजाई लजे.
चौपालों पर झाँझ बजा-
दास कबीरा राम भजे.
तजें सियासत राम-रहीम
देख न देखें कोई खुआ...
*
स्वर्ग करे भू का गुणगान.
मनुज देव से अधिक महान.
रसनिधि पा रसलीन 'सलिल'
हो अपना यह हिंदुस्तान.
हर दिल हो रसखान रखे
हरेक हाथ में मालपुआ...
१.१.२०११
***
नये साल की दोहा सलिला:
*
उगते सूरज को सभी, करते सदा प्रणाम.
जाते को सब भूलते, जैसे सच बेदाम..
*
हम न काल के दास हैं, महाकाल के भक्त.
कभी समय पर क्यों चलें?, पानी अपना रक्त..
*
बिन नागा सूरज उगे, सुबह- ढले हर शाम.
यत्न सतत करते रहें, बिना रुके निष्काम..
*
अंतिम पल तक दिये से, तिमिर न पाता जीत.
सफर साँस का इस तरह, पूर्ण करें हम मीत..
*
संयम तज हम बजायें, व्यर्थ न अपने गाल.
बन संतोषी हों सुखी, रखकर उन्नत भाल..
*
ढाई आखर पढ़ सुमिर, तज अद्वैत वर द्वैत.
मैं-तुम मिट, हम ही बचे, जब-जब खेले बैत..
*
जीते बाजी हारकर, कैसा हुआ कमाल.
'सलिल'-साधना सफल हो, सबकी अबकी साल..
*
भुला उसे जो है नहीं, जो है उसकी याद.
जीते की जय बोलकर, हो जा रे नाबाद..
*
नये साल खुशहाल रह, बिना प्याज-पेट्रोल..
मुट्ठी में समान ला, रुपये पसेरी तौल..
*
जो था भ्रष्टाचार वह, अब है शिष्टाचार.
नये साल के मूल्य नव, कर दें भव से पार..
*
भाई-भतीजावाद या, चचा-भतीजावाद.
राजनीति ने ही करी, दोनों की ईजाद..
*
प्याज कटे औ' आँख में, आँसू आयें सहर्ष.
प्रभु ऐसा भी दिन दिखा, 'सलिल' सुखद हो वर्ष..
*
जनसँख्या मंहगाई औ', भाव लगाये होड़.
कब कैसे आगे बढ़े, कौन शेष को छोड़..
*
ओलम्पिक में हो अगर, लेन-देन का खेल.
जीतें सारे पदक हम, सबको लगा नकेल..
*
पंडित-मुल्ला छोड़ते, मंदिर-मस्जिद-माँग.
कलमाडी बनवाएगा, मुर्गा देता बांग..
*
आम आदमी का कभी, हो किंचित उत्कर्ष.
तभी सार्थक हो सके, पिछला-अगला वर्ष..
*
गये साल पर साल पर, हाल रहे बेहाल.
कैसे जश्न मनायेगी. कुटिया कौन मजाल??
*
धनी अधिक धन पा रहा, निर्धन दिन-दिन दीन.
यह अपने में लीन है, वह अपने में लीन..
१-१-२०११
***

बुधवार, 31 दिसंबर 2025

दिसंबर ३१, नया साल, सॉनेट, भर्तृहरि, लघुकथा, गीत, व्यंग्य, दोहा, भवन, चित्रगुप्त, हाइकु गीत,

सलिल सृजन दिसंबर ३१
*
गीत आता रवि ले आए हँसियाँ जाता साल लुटाए खुशियाँ . अपने अपनापन दे पाएँ सपने सारे सच हो जाएँ कच्चा-पक्का जो जब खाएँ बिना देर झट विहँस पचाएँ मिलें दोस्तों की गलबहियाँ जाता साल लुटाए खुशियाँ . साथ रह सकें फूल-शूल मिल रहे निरापद कली सके खिल तितली-भँवरे नाचें-गाएँ रहे न कोई होंठों को सिल श्रम तरु पर झूलें सुख फलियाँ जाता साल लुटाए खुशियाँ . पथ पर बढ़े कदम की जय हो आखर-काव्य-कलम निर्भय हो आँसू पोंछ सकें मुस्कानें जीवट का जयकारा तय हो मन-मंदिर महकें सुख-कलियाँ जाता साल लुटाए खुशियाँ ३१.१२.२०२५ ०००
गीत
साल जाएगा
साल आएगा
क्या इंसान बदल पाएगा?
अगर नहीं तो केक काटकर
जला पटाखे, सुरा पानकर
इससे पिटकर, उससे पीटकर
क्या पाएगा?
.
नौ दिन पूज; शेष दिन शोषण
उसका जो जाये; दे पोषण।
अँगुली पकड़ काँध पर जिसके
बैठा; सेवा करी नहीं क्षण।
ऋण पुरखों का नहीं उतारा
कैसे अमन-चैन पाएगा?
साल जाएगा
साल आएगा
क्या इंसान बदल पाएगा?
.
जिसकी राखी सजी कलाई
उसको कहता हुई पराई।
गृह लक्ष्मी कह जिसको लाया
सेवा करे न; सिर्फ कराई।
भुला भाई को भाईचारा
किससे कैसे कब पाएगा?
साल जाएगा
साल आएगा
क्या इंसान बदल पाएगा?
.
जिनके सुत से ब्याह रचाया
उनके सपनों को बिखराया।
कुल मर्यादा नहीं निभाई
रिश्ता रिसता घाव बनाया।
कपड़ों जैसे बदले नाते
कोई किस तरह अपनाएगा?
साल जाएगा
साल आएगा
क्या इंसान बदल पाएगा?
.
धरा-नदी को कहता मैया
छीन रहा उनसे ही छैया।
भुला देश-हित स्वार्थ साधता
कैसे खुश हो राम रमैया?
जोड़-जोड़ कर मरा जा रहा
काम न कुछ तेरे आएगा
साल जाएगा
साल आएगा
क्या इंसान बदल पाएगा?
३१-१२-२०२४
०००
सॉनेट
कल-आज-कल
*
जाने वाला राह बनाता आने वाला चलता है,
पलता है सपना आँखों में तब ही जब हम सोए हों,
फसल काटता केवल वह ही जिसने बीजे बोए हों,
उगता सूरज तब ही जब वह नित संझा में ढलता है।
वह न पनपता जिसको सुख-सौभाग्य अन्य का खलता है,
मुस्कानों की कीमत जानें केवल वे जो रोए हों,
अपनापन पाते हैं वे जो अपनेपन में खोए हों,
लोहा हो फौलाद आग में तप जब कभी पिघलता है।
कल कल करता निर्झर बहता कल पाता मन बैठ निकट,
किलकिल करता जो हो बेकल उसमें सचमुच नहीं अकल,
दास न होना कल का मानव कल-पुर्जों का स्वामी बन।
ठोकर मार न कंकर को तू शंकर उससे हुए प्रगट,
काट न जंगल खोद न पर्वत मिटा न नदी बचा ले जल,
कल से कल को जोड़ आज तू होकर नम्र न नाहक तन।।
३१.१२.२०२३
***
भर्तृहरि का कथन है --
'को लाभो गुणिसंगमः' अर्थात् ( लाभ क्या है? गुणियों का साथ) ।
अंतर्जाल ने मुझे इस लाभ से परिचित करवाया है।
आशा करता हूँ नये साल में मैं इससे और भी ज्यादा लाभान्वित हो सकूँगा।
नये साल में हम सभी एक दूसरे के विचारों लाभ प्राप्त कर सके इसी आशा के साथ इस पुराने साल को हार्दिक विदाई । डॉ. राधाकृष्णन के अनुसार- 'सब से अधिक आनंद इस भावना में है कि हमने मानवता की प्रगति में कुछ योगदान दिया है। भले ही वह कितना कम, यहाँ तक कि बिल्कुल ही तुच्छ क्यों न हो?'
अपने रचे को इस कसौटी पर परखें और लिखें, लिखते रहें।
नव वर्ष मंगलमय हो ।
***
सॉनेट
राग दरबारी
*
मेघ आच्छादित गगन है, रवि न दिखता खोज लाएँ।
लॉकडाउन कर चुनावी भीड़ बन हम गर्व करते।
खोद कब्रें, हड्डियों को अस्थियाँ कह मार मरते।।
राग दरबारी निरंतर सुनाकर नव वर्ष लाएँ।।
आम्रपाली के पुजारी, आपका बंटी सिरजते।
एक था चंदर सुधा को विवाहे, फिर छोड़ जाए।
थाम सत्ता सुंदरी की बाँह, जाने किसे ध्याए?
अब न दिव्या रही भव्या, चित्रलेखा सँग थिरकते।।
लक्ष्य मुर्दे उखाड़ें परिधान पहना नाम बदलें।
दुश्मनों के हाथ खाकर मात, नव उपलब्धि कह लें।।
असहमत को खोज कुचलें, देख दिल अपनों के दहलें।।
प्रदूषित कर हर नदी, बन अंधश्रद्धा सुमन बह लें।।
जड़ें खोदें रात-दिन, जड़मति न बोलें, अनय सह लें।।
अधर क्या कहते न सुनकर, लाठियाँ को हाथ धर लें।।
१-१-२०२२
***
गीत
काल चक्र का
महाकाल के भक्त
करो अगवानी
.
तपूँ , जड़ाऊँ या बरसूँ
नाखुश होंगे बहुतेरे
शोर-शांति
चाहो ना चाहो
तुम्हें रहेंगे घेरे
तुम लड़कर जय वरना
चाहे सूखा हो या पानी
बहा पसीना
मेहनत कर
करना मेरी अगवानी
.
चलो, गिरो उठ बढ़ो
शूल कितने ही आँख तरेरे
बाधा दें या
रहें सहायक
दिन-निशि, साँझ-सवेरे
कदम-हाथ गर रहे साथ
कर लेंगे धरती धानी
कलम उठाकर
करें शब्द के भक्त
मेरी अगवानी
.
शिकवे गिले शिकायत
कर हल होती नहीं समस्या
सतत साधना
से ही होती
हरदम पूर्ण तपस्या
स्वार्थ तजो, सर्वार्थ साधने
बोलो मीठी बानी
फिर जेपी-अन्ना
बनकर तुम करो
मेरी अगवानी
...
गीत
सूरज उगाएँ
*
चलो! हम सूरज उगाएँ...
सघन तम से क्यों डरें हम?
भीत होकर क्यों मरें हम?
मरुस्थल भी जी उठेंगे-
हरितिमा मिल हम उगाएँ....
विमल जल की सुनें कल-कल।
भुला दें स्वार्थों की किल-किल।
सत्य-शिव-सुंदर रचें हम-
सभी सब के काम आएँ...
लाए क्या?, ले जाएँगे क्या?,
किसी के मन भाएँगे क्या?
सोच यह जीवन जिएँ हम।
हाथ-हाथों से मिलाएँ...
आत्म में विश्वात्म देखें।
हर जगह परमात्म लेखें।
छिपा है कंकर में शंकर।
देख हम मस्तक नवाएँ...
तिमिर में दीपक बनेंगे।
शून्य में भी सुनेंगे।
नाद अनहद गूँजता जो
सुन 'सलिल' सबको सुनाएँ...
***
नवगीत:
नए साल
मत हिचक
बता दे क्या होगा?
.
सियासती गुटबाजी
क्या रंग लाएगी?
'देश एक' की नीति
कभी फल पाएगी?
धारा तीन सौ सत्तर
बनी रहेगी क्या?
गई हटाई
तो क्या
घटनाक्रम होगा?
.
काशी, मथुरा, अवध
विवाद मिटेंगे क्या?
नक्सलवादी
तज विद्रोह
हटेंगे क्या?
पूर्वांचल में
अमन-चैन का
क्या होगा?
.
धर्म भाव
कर्तव्य कभी
बन पाएगा?
मानवता की
मानव जय
गुंजाएगा?
मंगल छू
भू के मंगल
का क्या होगा?
***
नव वर्ष हाइकु
*
हो नया हर्ष
हर नए दिन में
नया उत्कर्ष
.
प्राची के गाल
रवि करता लाल
है नया साल
.
हाइकु लिखो
हर दिवस एक
इरादा नेक
३१-१२-२०१७
***
नवगीत
*
पुनर्जन्म हर सुबह हो रहा
पुनर्मरण हर रात।
चलो बैठ पल दो पल कर लें
मीत! प्रीत की बात।
*
गौरैयों ने खोल लिए पर
नापें गगन विशाल।
बिजली गिरी बाज पर
उसका जीना हुआ मुहाल।
हमलावर हो लगा रहा है
लुक-छिपकर नित घात
पुनर्जन्म हर सुबह हो रहा
पुनर्मरण हर रात।
*
आ बुहार लें मन की बाखर
कहें न ऊँचे मोल।
तनिक झाँक लें अंतर्मन में
निज करनी लें तोल।
दोष दूसरों के मत देखें
खुद उजले हों तात!
पुनर्जन्म हर सुबह हो रहा
पुनर्मरण हर रात।
*
स्वेद-'सलिल' में करें स्नान नित
पूजें श्रम का दैव।
निर्माणों से ध्वंसों को दें
मिलकर मात सदैव।
भूखे को दें पहले, फिर हम
खाएँ रोटी-भात।
पुनर्जन्म हर सुबह हो रहा
पुनर्मरण हर रात।
*
साक्षी समय न हमने मानी
आतंकों से हार।
जैसे को तैसा लौटाएँ
सरहद पर इस बार।
नहीं बात कर बात मानता
जो खाए वह लात।
पुनर्जन्म हर सुबह हो रहा
पुनर्मरण हर रात।
*
लोकतंत्र में लोभतंत्र क्यों
खुद से करें सवाल?
कोशिश कर उत्तर भी खोजें
दें न हँसी में टाल।
रात रहे कितनी भी काली
उसके बाद प्रभात।
पुनर्जन्म हर सुबह हो रहा
पुनर्मरण हर रात।
*****
२४-९-२०१६
गीत
देश हमारा है
सरकार हमारी है,
क्यों न निभाई
हमने जिम्मेदारी है?
*
नियम व्यवस्था का
पालन हम नहीं करें,
दोष गैर पर-
निज, दोषों का नहीं धरें।
खुद क्या बेहतर
कर सकते हैं, वही करें।
सोचें त्रुटियाँ कितनी
कहाँ सुधारी हैं?
देश हमारा है
सरकार हमारी है,
क्यों न निभाई
हमने जिम्मेदारी है?
*
भाँग कुएँ में
घोल, हुए मदहोश सभी,
किसके मन में
किसके प्रति आक्रोश नहीं?
खोज-थके, हारे
पाया सन्तोष नहीं।
फ़र्ज़ भुला, हक़ चाहें
मति गई मारी है।
देश हमारा है
सरकार हमारी है,
क्यों न निभाई
हमने जिम्मेदारी है?
*
एक अँगुली जब
तुम को मैंने दिखलाई।
तीन अंगुलियाँ उठीं
आप पर, शरमाईं
मति न दोष खुद के देखे
थी भरमाई।
सोचें क्या-कब
हमने दशा सुधारी है?
देश हमारा है
सरकार हमारी है,
क्यों न निभाई
हमने जिम्मेदारी है?
*
जैसा भी है
तन्त्र, हमारा अपना है।
यह भी सच है
बेमानी हर नपना है।
अँधा न्याय-प्रशासन,
सत्य न तकना है।
कद्र न उसकी
जिसमें कुछ खुद्दारी है।
देश हमारा है
सरकार हमारी है,
क्यों न निभाई
हमने जिम्मेदारी है?
*
कौन सुधारे किसको?
आप सुधर जाएँ।
देखें अपनी कमी,
न केवल दिखलायें।
स्वार्थ भुला,
सर्वार्थों की जय-जय गायें।
अपनी माटी
सारे जग से न्यारी है।
देश हमारा है
सरकार हमारी है,
क्यों न निभायी
हमने जिम्मेदारी है?
*
११-८-२०१६
***
गीत
कौन?
*
कौन रचेगा राम-कहानी?
कौन कहेगा कृष्ण-कथाएँ??
खुशियों की खेती अनसिंचित,
सिंचित खरपतवार व्यथाएँ।
*
खेत
कारखाने-कॉलोनी
बनकर, बिना मौत मरते हैं।
असुर हुए इंसान,
न दाना-पानी खा,
दौलत चरते हैं।
वन भेजी जाती सीताएँ,
मन्दिर पुजतीं शूर्पणखाएँ।
कौन रचेगा राम-कहानी?
कौन कहेगा कृष्ण-कथाएँ??
*
गौरैयों की देखभाल कर
मिली बाज को जिम्मेदारी।
अय्यारी का पाठ रटाती,
पैठ मदरसों में बटमारी।
एसिड की शिकार राधाएँ
कंस जाँच आयोग बिठाएँ।
कौन रचेगा राम-कहानी?
कौन कहेगा कृष्ण-कथाएँ??
*
रिद्धि-सिद्धि, हरि करें न शिक़वा,
लछमी पूजती है गणेश सँग।
'ऑनर किलिंग' कर रहे दद्दू
मूँछ ऐंठकर, जमा रहे रंग।
ठगते मोह-मान-मायाएँ
घर-घर कुरुक्षेत्र-गाथाएँ।
कौन रचेगा राम-कहानी?
कौन कहेगा कृष्ण-कथाएँ??
*
हर कर्तव्य तुझे करना है,
हर अधिकार मुझे वरना है।
माँग भरो, हर माँग पूर्ण कर
वरना रपट मुझे करना है।
देह मात्र होतीं वनिताएँ
घर को होटल मात्र बनाएँ।
कौन रचेगा राम-कहानी?
कौन कहेगा कृष्ण-कथाएँ??
*
दोष न देखें दल के अंदर,
और न गुण दिखते दल-बाहर।
तोड़ रहे कानून बना, सांसद,
संसद मंडी-जलसा घर।
बस में हो तो साँसों पर भी
सरकारें अब टैक्स लगाएँ।
कौन रचेगा राम-कहानी?
कौन कहेगा कृष्ण-कथाएँ??
९-८-२०१६
गोरखपुर दंत चिकित्सालय जबलपुर
***
गीत
कौन हैं हम?
**
कौन हैं हम?
देह नश्वर,
या कि हैं आत्मा चिरन्तन??
*
स्नेह सलिला नर्मदा हैं।
सत्य-रक्षक वर्मदा हैं।
कोई माने या न माने
श्वास सारी धर्मदा हैं।
जान या
मत जान लेकिन
मित्र है साहस-प्रभंजन।
कौन हैं हम?
देह नश्वर,
या कि हैं आत्मा चिरन्तन??
*
सभ्यता के सिंधु हैं हम,
भले लघुतम बिंदु हैं हम।
गरल धारे कण्ठ में पर
शीश अमृत-बिंदु हैं हम।
अमरकंटक-
सतपुड़ा हम,
विंध्य हैं सह हर विखण्डन।
कौन हैं हम?
देह नश्वर,
या कि हैं आत्मा चिरन्तन??
*
ब्रम्हपुत्रा की लहर हैं,
गंग-यमुना की भँवर हैं।
गोमती-सरयू-सरस्वति
अवध-ब्रज की रज-डगर हैं।
बेतवा, शिव-
नाथ, ताप्ती,
हमीं क्षिप्रा, शिव निरंजन।
कौन हैं हम?
देह नश्वर,
या कि हैं आत्मा चिरन्तन??
*
तुंगभद्रा पतित पावन,
कृष्णा-कावेरी सुहावन।
सुनो साबरमती हैं हम,
सोन-कोसी-हिरन भावन।
व्यास-झेलम,
लूनी-सतलज
हमीं हैं गण्डक सुपावन।
कौन हैं हम?
देह नश्वर,
या कि हैं आत्मा चिरन्तन??
*
मेघ बरसे भरी गागर,
करी खाली पहुँच सागर।
शारदा, चितवन किनारे-
नागरी लिखते सुनागर।
हमीं पेनर
चारु चंबल
घाटियाँ हम, शिखर- गिरिवन
कौन हैं हम?
देह नश्वर,
या कि हैं आत्मा चिरन्तन??
१०-९-२०१६
***
नवगीत
*
सिया हरण को देख रहे हैं
आँखें फाड़ लोग अनगिन।
द्रुपद सुता के चीरहरण सम
घटनाएँ होतीं हर दिन।
*
'गिरि गोपाद्रि' न नाम रहा क्यों?
'सुलेमान टापू' क्यों है?
'हरि पर्वत' का 'कोह महाजन'
नाम किया किसने क्यों है?
नाम 'अनंतनाग' को क्यों हम
अब 'इस्लामाबाद' कहें?
घर में घुस परदेसी मारें
हम ज़िल्लत सह आप दहें?
बजा रहे हैं बीन सपेरे
राजनीति नाचे तिक-धिन
द्रुपद सुता के चीरहरण सम
घटनाएँ होतीं हर दिन।
*
हम सबका 'श्रीनगर' दुलारा
क्यों हो शहरे-ख़ास कहो?
'मुख्य चौक' को 'चौक मदीना'
कहने से सब दूर रहो
नाम 'उमा नगरी' है जिसका
क्यों हो 'शेखपुरा' वह अब?
'नदी किशन गंगा' को 'दरिया-
नीलम' कह मत करो जिबह
प्यार न जिनको है भारत से
पकड़ो-मारो अब गईं-गईं
द्रुपद सुता के चीरहरण सम
घटनाएँ होतीं हर दिन।
*
पण्डित वापिस जाएँ बसाए
स्वर्ग बनें फिर से कश्मीर
दहशतगर्द नहीं बच पाएं
कायम कर दो नई नज़ीर
सेना को आज़ादी दे दो
आज नया इतिहास बने
बंगला देश जाए दोहराया
रावलपिंडी समर ठने
हँस बलूच-पख्तून संग
सिंधी आज़ाद रहें हर दिन
द्रुपद सुता के चीरहरण सम
घटनाएँ होतीं हर दिन।
(कश्मीर में हिन्दू नामों को बदलकर योजनाबद्ध तरीके से मुस्लिम नाम रखे जानेके विरोध में)
***
गीत
*
नए साल!
आजा कतार में
आगे मत जा।
*
देश दिनों से खड़ा हुआ है,
जो जैसा है अड़ा हुआ है,
किसे फ़िक्र जनहित का पेड़ा-
बसा रहा है, सड़ा हुआ है।
चचा-भतीजा ताल ठोंकते,
पिता-पुत्र ज्यों श्वान भौंकते,
कोई काट न ले तुझको भी-
इसीलिए
कहता हूँ-
रुक जा।
नए साल!
आजा कतार में
आगे मत जा।
*
वादे जुमले बन जाते हैं,
घपले सारे धुल जाते हैं,
लोकतंत्र के मूल्य स्वार्थ की-
दीमक खाती, घुन जाते हैं।
मौनी बाबा बोल रहे हैं
पप्पू जहँ-तहँ डोल रहे हैं
गाल बजाते जब-तब लालू
मत टकराना
बच जा झुक जा।
नए साल!
आजा कतार में
आगे मत जा।
*
एक आदमी एक न पाता,
दूजा लाख-करोड़ जुटाता,
मार रही मरते को दुनिया-
पिटता रोये, नहीं सुहाता।
हुई देर, अंधेर यहाँ है,
रही अनसुनी टेर यहाँ है,
शुद्ध दलाली, न्याय कहाँ है?
जलने से
पहले मत
बुझ जा।
नए साल!
आजा कतार में
***
नवगीत
समय वृक्ष है
*
समय वृक्ष है
सूखा पत्ता एक झरेगा
आँखें मूँदे.
नव पल्लव तब
एक उगेगा
आँखे खोले.
*
कहो अशुभ या
शुभ बोलो
कुछ फर्क नहीं है.
चिरजीवी होने का
कोई अर्क नहीं है.
कितने हुए?
होएँगे कितने?
कौन बताये?
किसका कितना वजन?
तराजू कोई न तोले.
ठोस दिख रहे
लेकिन हैं
भीतर से पोले.
नव पल्लव
किस तरह उगेगा
आँखें खोले?
*
वाम-अवाम
न एक साथ
मिल रह सकते हैं.
काम-अकाम
न एक साथ
खिल-दह सकते हैं.
पूरब-पश्चिम
उत्तर-दक्षिण
ऊपर-नीचे
कर परिक्रमा
नव संकल्प
अमिय नित घोले.
श्रेष्ठ वही जो
श्रम-सीकर की
जय-जय बोले.
बिन प्रयास
किस तरह कर्मफल
आँखें खोले?
*
जाग,
छेड़ दे, राग नया
चुप से क्या हासिल?
आग
न बुझने देना
तू मत होना गाफिल.
आते-जाते रहें
साल-दर-साल
नए कुछ.
कौन जानता
समय-चक्र
दे हिम या शोले ?
नोट बंद हों या जारी
नव आशा बो ले.
उसे दिखेगी उषा
जाग जो
आँखें खोले
३१-१२-२०१६
***
गीत
साल निराला हो
*
बहुत हो चुके
होएँगे भी
पर यह साल निराला हो
*
सुख पीड़ा के आँसू पोंछे
हर्ष दर्द से गले मिले
जिनसे शिकवे रहे उम्र भर
उन्हें न तिल भर रहें गिले
मुखर हो सकें वही वैखरी
जिसके लब थे रहे सिले
जिनके पद तल
सत्ता उनके
उर में कंठी माला हो
बहुत हो चुके
होएँगे भी
पर यह साल निराला हो
*
पग-ठोकर में रहे मित्रता
काँटा साझा साखी हो
शाख-गगन के बीच सेतु बन
भोर-साँझ नव पाखी हो
शासक और विपक्षी के कर
संसद में अब राखी हो
अबला सबला बने
अनय जब मिले
आँख में ज्वाला हो
बहुत हो चुके
होएँगे भी
पर यह साल निराला हो
*
मानक तोड़ पुराने नव रच
जो कह चुके, न वह कह कवि बच
बाँध न रचना को नियमों में
दिल की, मन की बातें कह सच
नचा समय को हँस छिन्गुली पर
रे सत्ता! जनमत सुन कर नच
समता-सुरा
पिलानेवाली
बाला हो, मधुशाला हो
बहुत हो चुके
होएँगे भी
पर यह साल निराला हो
***
काम न काज
*
काम न काज
जुबानी खर्चा
नये वर्ष का कोरा पर्चा
*
कल सा सूरज उगे आज भी
झूठा सच को ठगे आज भी
सरहद पर गोलीबारी है
वक्ष रक्त से सने आज भी
किन्तु सियासत कहे करेंगे
अब हम प्रेम
भाव की अर्चा
*
अपना खून खून है भैया
औरों का पानी रे दैया!
दल दलबंदी के मारे हैं
डूबे लोकतंत्र की नैया
लिये ले रहा जान प्रशासन
संसद करती
केवल चर्चा
*
मत रोओ, तस्वीर बदल दो
पैर तले दुःख-पीर मसल दो
कृत्रिम संवेदन नेता के
लौटा, थोड़ी सीख असल दो
सरकारों पर निर्भर मत हो
पायें आम से
खास अनर्चा
***
लघु कथा -
आदमी जिंदा है
*
साहित्यिक आयोजन में वक्ता गण साहित्य की प्रासंगिकता पर चिंतन कम और चिंता अधिक व्यक्त कर रहे थे। अधिकांश चाहते थे कि सरकार साहित्यकारों को आर्थिक सहयोग दे क्योंकि साहित्य बिकता नहीं, उसका असर नहीं होता।
भोजन काल में मैं एक वरिष्ठ साहित्यकार से भेंट करने उनके निवास पर जा ही रहा था कि हरयाणा से पधारे अन्य साहित्यकार भी साथ हो लिये। राह में उन्हें आप बीती बताई- 'कई वर्ष पहले व्यापार में लगातार घाटे से परेशं होकर मैंने आत्महत्या का निर्णय लिया और रेल स्टेशन पहुँच गया, रेलगाड़ी एक घंटे विलंब से थी। मरता क्या न करता प्लेटफ़ॉर्म पर टहलने लगा। वहां गीताप्रेस गोरखपुर का पुस्तक विक्रय केंद्र खुला देख तो समय बिताने के लिये एक किताब खरीद कर पढ़ने लगा। किताब में एक दृष्टान्त को पढ़कर न जाने क्या हुआ, वापिस घर आ गया। फिर कोशिश की और सफलता की सीढ़ियाँ चढ़कर आज सुखी हूँ। व्यापार बेटों को सौंप कर साहित्य रचता हूँ। शायद इसे पढ़कर कल कोई और मौत के दरवाजे से लौट सके। भोजन छोड़कर आपको आते देख रुक न सका, आप जिनसे मिलाने जा रहे हैं, उन्हीं की पुस्तक ने मुझे नवजीवन दिया।
साहित्यिक सत्र की चर्चा से हो रही खिन्नता यह सुनते ही दूर हो गयी। प्रत्यक्ष को प्रमाण की क्या आवश्यकता? सत्य सामने था कि साहित्य का असर आज भी बरकरार है, इसीलिये आदमी जिंदा है।
***
नवगीत
काम न काज
*
काम न काज
जुबानी खर्चा
नये वर्ष का कोरा पर्चा
*
कल सा सूरज उगे आज भी
झूठा सच को ठगे आज भी
सरहद पर गोलीबारी है
वक्ष रक्त से सने आज भी
किन्तु सियासत कहे करेंगे
अब हम प्रेम
भाव की अर्चा
*
अपना खून खून है भैया
औरों का पानी रे दैया!
दल दलबंदी के मारे हैं
डूबे लोकतंत्र की नैया
लिये ले रहा जान प्रशासन
संसद करती
केवल चर्चा
*
मत रोओ, तस्वीर बदल दो
पैर तले दुःख-पीर मसल दो
कृत्रिम संवेदन नेता के
लौटा, थोड़ी सीख असल दो
सरकारों पर निर्भर मत हो
पायें आम से
खास अनर्चा
३१-१२-२०१५
***
गीत
चलो हम सूरज उगायें
आचार्य संजीव 'सलिल'
चलो! हम सूरज उगायें...
सघन तम से क्यों डरें हम?
भीत होकर क्यों मरें हम?
मरुस्थल भी जी उठेंगे-
हरितिमा मिल हम उगायें....
विमल जल की सुनें कल-कल।
भुला दें स्वार्थों की किल-किल।
सत्य-शिव-सुंदर रचें हम-
सभी सब के काम आयें...
लाये क्या?, ले जायेंगे क्या?,
किसी के मन भाएंगे क्या?
सोच यह जीवन जियें हम।
हाथ-हाथों से मिलायें...
आत्म में विश्वात्म देखें।
हर जगह परमात्म लेखें।
छिपा है कंकर में शंकर।
देख हम मस्तक नवायें...
तिमिर में दीपक बनेंगे।
शून्य में भी सुनेंगे।
नाद अनहद गूँजता जो
सुन 'सलिल' सबको सुनायें...
***
नवगीत:
.
कुण्डी खटकी
उठ खोल द्वार
है नया साल
कर द्वारचार
.
छोडो खटिया
कोशिश बिटिया
थोड़ा तो खुद को
लो सँवार
.
श्रम साला
करता अगवानी
मुस्का चहरे पर
ला निखार
.
पग द्वय बाबुल
मंज़िल मैया
देते आशिष
पल-पल हजार
***
नवगीत:
नए साल
मत हिचक
बता दे क्या होगा?
.
सियासती गुटबाजी
क्या रंग लाएगी?
'देश एक' की नीति
कभी फल पायेगी?
धारा तीन सौ सत्तर
बनी रहेगी क्या?
गयी हटायी
तो क्या
घटनाक्रम होगा?
.
काशी, मथुरा, अवध
विवाद मिटेंगे क्या?
नक्सलवादी
तज विद्रोह
हटेंगे क्या?
पूर्वांचल में
अमन-चैन का
क्या होगा?
.
धर्म भाव
कर्तव्य कभी
बन पायेगा?
मानवता की
मानव जय
गुंजायेगा?
मंगल छू
भू के मंगल
का क्या होगा?
*
***
दोहा सलिला :
भवन माहात्म्य
*
[इंस्टिट्यूशन ऑफ़ इंजीनियर्स, लोकल सेंटर जबलपुर द्वारा गगनचुम्बी भवन (हाई राइज बिल्डिंग) पर १०-११ अगस्त २०१३ को आयोजित अखिल भारतीय संगोष्ठी की स्मारिका में प्रकाशित कुछ दोहे।]
*
भवन मनुज की सभ्यता, ईश्वर का वरदान।
रहना चाहें भवन में, भू पर आ भगवान।१।
*
भवन बिना हो जिंदगी, आवारा-असहाय।
अपने सपने ज्यों 'सलिल', हों अनाथ-निरुपाय।२।
*
मन से मन जोड़े भवन, दो हों मिलकर एक।
सब सपने साकार हों, खुशियाँ मिलें अनेक।३।
*
भवन बचाते ज़िन्दगी, सड़क जोड़ती देश।
पुल बिछुडों को मिलाते, तरु दें वायु हमेश।४।
*
राष्ट्रीय संपत्ति पुल, सड़क इमारत वृक्ष।
बना करें रक्षा सदा, अभियंतागण दक्ष।५।
*
भवन सड़क पुल रच बना, आदम जब इंसान।
करें देव-दानव तभी, मानव का गुणगान।६।
*
कंकर को शंकर करें, अभियंता दिन-रात।
तभी तिमिर का अंत हो, उगे नवल प्रभात७।
*
भवन सड़क पुल से बने, देश सुखी संपन्न।
भवन सेतु पथ के बिना, होता देश विपन्न।८।
*
इमारतों की सुदृढ़ता, फूंके उनमें जान।
देश सुखी-संपन्न हो, बढ़े विश्व में शान।९।
*
भारत का नव तीर्थ है, हर सुदृढ़ निर्माण।
स्वेद परिश्रम फूँकता, निर्माणों में प्राण।१०।
*
अभियंता तकनीक से, करते नव निर्माण।
होता है जीवंत तब, बिना प्राण पाषाण।११।
*
भवन सड़क पुल ही रखें, राष्ट्र-प्रगति की नींव।
सेतु बना- तब पा सके, सीता करुणासींव।१२।
*
करे इमारत को सुदृढ़, शिल्प-ज्ञान-तकनीक।
लगन-परिश्रम से बने, बीहड़ में भी लीक।१३।
*
करें कल्पना शून्य में, पहले फिर साकार।
आंकें रूप अरूप में, यंत्री दे आकार।१४।
*
सिर्फ लक्ष्य पर ही रखें, हर पल अपनी दृष्टि।
अभियंता-मजदूर मिल, रचें नयी नित सृष्टि।१५।
*
सडक देश की धड़कनें, भवन ह्रदय पुल पैर।
वृक्ष श्वास-प्रश्वास दें, कर जीवन निर्वैर।१६।
*
भवन सेतु पथ से मिले, जीवन में सुख-चैन।
इनकी रक्षा कीजिए, सब मिलकर दिन-रैन।१७।
*
काँच न तोड़ें भवन के, मत खुरचें दीवार।
याद रखें हैं भवन ही, जीवन के आगार।१८।
*
भवन न गन्दा हो 'सलिल', सब मिल रखें खयाल।
कचरा तुरत हटाइए, गर दे कोई डाल।१९।
*
भवनों के चहुँ और हों, ऊँची वृक्ष-कतार।
शुद्ध वायु आरोग्य दे, पायें ख़ुशी अपार।२०।
*
कंकर से शंकर गढ़े, शिल्प ज्ञान तकनीक।
भवन गगनचुम्बी बनें, गढ़ सुखप्रद नव लीक।२१।
*
वहीं गढ़ें अट्टालिका जहाँ भूमि मजबूत।
जन-जीवन हो सुरक्षित, खुशियाँ मिलें अकूत।२२।
*
ऊँचे भवनों में रखें, ऊँचा 'सलिल' चरित्र।
रहें प्रकृति के मित्र बन, जीवन रहे पवित्र।२३।
*
रूपांकन हो भवन का, प्रकृति के अनुसार।
अनुकूलन हो ताप का, मौसम के अनुसार।२४।
*
वायु-प्रवाह बना रहे, ऊर्जा पायें प्राण।
भवन-वास्तु शुभ कर सके, मानव को सम्प्राण।२५।
***
चित्रगुप्त वंदना:
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
हे चित्रगुप्त भगवान आपकी जय-जय
हे परमेश्वर मतिमान आपकी जय-जय
हे अक्षर अजर अमर अविनाशी अक्षय
हे अजित अमित गुणवान आपकी जय-जय
हे तमहर शुभकर विधि-हरि-हर के स्वामी
हे आत्मा-प्राण निधान आपकी जय-जय
हे चारु ललित शालीन सौम्य शुचि सुंदर
हे अविकारी संप्राण आपकी जय-जय
हे चिंतन मनन सृजन रचना वरदानी
हे सृजनधर्मिता-खान आपकी जय-जय
बेटे को कहती बाप बाप का दुनिया
विधि-पिता ब्रम्ह संतान आपकी जय-जय
विधि-हरि-हर को प्रगटाकर, विधि से प्रगटे
दिन संध्या निशा विहान आपकी जय-जय
सत-शिव-सुंदर सत-चित-आनंद हो देवा
श्री क्ली ह्री कीर्तिवितान आपकी जय-जय
तुम कारण-कार्य तुम्हीं परिणाम अनामी
हे शून्य सनातन गान आपकी जय-जय
सब कुछ तुमसे सब कुछ तुममें अविनाशी
हे कण-कण के भगवान आपकी जय-जय
हे काया-माया-छाया-पति परमेश्वर
हे सृष्टि-सृजन अभियान आपकी जय-जय
३१-१२-२०१४
***
नवगीत:
.
बहुत-बहुत आभार तुम्हारा
ओ जाते मेहमान!
.
पल-पल तुमने
साथ निभाया
कभी रुलाया
कभी हँसाया
फिसल गिरे, आ तुरत उठाया
पीठ ठोंक
उत्साह बढ़ाया
दूर किया हँस कष्ट हमारा
मुरझाते मेहमान
.
भूल न तुमको
पायेंगे हम
गीत तुम्हारे
गायेंगे हम
सच्ची बोलो कभी तुम्हें भी
याद तनिक क्या
आयेंगे हम?
याद मधुर बन, बनो सहारा
मुस्काते मेहमान
.
तुम समिधा हो
काल यज्ञ की
तुम ही थाती
हो भविष्य की
तुमसे लेकर सतत प्रेरणा
मन:स्थिति गढ़
हम हविष्य की
'सलिल' करेंगे नहीं किनारा
मनभाते मेहमान
३१-१२-२०१४
***
हाइकु गीत:
रूप अपना
*
रूप अपना / सराहती रही है / रूपसी आप
किसे बताये / प्रिय के नयनों में / गयी है व्याप...
*
है विधु लता / सी चंचल-चपल / अल्हड कौन
बोले अबोले / दे निशा निमंत्रण / प्रिय को मौन
नेह नर्मदा / ले रही हिलोरें ज्यों / मन्त्र का जाप...
*
कुसुम कली / किरण की कोर सी / है मुस्कुराई
आशा-आकांक्षा / मन में बसी पर / हाथ न आई
धर अधर / अधर में, अधर / अंकित छाप...
*
जीभ चिढ़ाये / नवोढ़ा सी लजाये / ठेंगा दिखाये
हरेक पल / समुद से सलिला / दूरी मिटाये
अरूणाभित / सिन्दूरी कपोलों को / छिपाये काँप...
*
अमराई में / कूकती कोकिला सी / देती आनंद
मठा-महेरी / पुरवैया-पछुआ / साँसों के छंद
समय देव ! / मनौती, नहीं देना / विरह शाप...
*
राग-रागिनी / सुर-सरगम सा / अटूट नाता
कभी न टूटे / हे सत्य नारायण! / भाग्य विधाता!!
हे नये वर्ष! / मिले अनंत हर्ष / रहें निष्पाप...
३१-१२-२०१३
***
व्यंग्य रचना:
हो गया इंसां कमीना...
*
गली थी सुनसान, कुतिया एक थी जाती अकेली.
दिखे कुछ कुत्ते, सहम संकुचा रही थी वह नवेली..
कहा कुत्तों ने: 'न डरिए, श्वान हैं इंसां नहीं हम.
आँच इज्जत पर न आएगी, भरोसा रखें मैडम..
जाइए चाहे जहाँ सर उठा, है खतरा न कोई.
आदमी से दूर रहिए, शराफत उसने है खोई..'
कहा कुतिया ने:'करें हड़ताल लेकर एक नारा.
आदमी खुद को कहे कुत्ता नहीं हमको गवारा..'
'ठीक कहती हो बहिन तुम, जानवर कुछ तुरत बोले.
माँग हो अब जानवर खुद को नहीं इंसां बोले.
थे सभी सहमत, न अब इन्सान को मुँह लगाएँगे.
आदमी लुच्चा कमीना 'बचो' सब को बताएँगे..
***
नए वर्ष का गीत:
झाँक रही है...
*
झाँक रही है
खोल झरोखा
नए वर्ष में धूप सुबह की...
*
चुन-चुन करती चिड़ियों के संग
कमरे में आ.
बिन बोले बोले मुझसे
उठ! गीत गुनगुना.
सपने देखे बहुत, करे
साकार न क्यों तू?
मुश्किल से मत डर, ले
उनको बना झुनझुना.
आँक रही
अल्पना कल्पना
नए वर्ष में धूप सुबह की...
*
कॉफ़ी का प्याला थामे
अखबार आज का.
अधिक मूल से मोह पीला
क्यों कहो ब्याज का?
लिए बांह में बांह
डाह तज, छह पल रही-
कशिश न कोशिश की कम हो
है सबक आज का.
टाँक रही है
अपने सपने
नए वर्ष में धूप सुबह की...
***
नया वर्ष
हम नया वर्ष जरूर मनाएंगे
दामिनी के आंसुओं, चीखों और कराहों को
याद करने के लिए
और यह संकल्प करने के लिए
कि हम अपनी ज़िंदगी में
किसी नारी का अपमान नहीं करेंगे
अपने बच्चों को ऐसे संस्कार देंगे
कि वह नारी को सिर्फ भोग्या न माने।
हम अपने शहर के हर थाने में
नारी का सम्मान करने और
तत्काल ऍफ़. आई. आर.दर्ज करने
सम्ब्नाधी पोस्टर चिपकाएँ।
सरकार से मांग करें कि
पुलिस विभाग को
अपराध-संख्या बढ़ने पर
दण्डित न किया जाए क्योंकि
संख्या घटने के लिए ही
अपराध दर्ज नहीं किये जाते।
हम एक दिन ही नहीं हर दिन
दामिनी वर्ष मनाएं।
नारी सम्मान की अलख जलाएं
३१-१२-२०१२
***
नव वर्ष पर नवगीत:
महाकाल के महाग्रंथ का
महाकाल के महाग्रंथ का
नया पृष्ठ फिर आज खुल रहा....
*
वह काटोगे,
जो बोया है.
वह पाओगे,
जो खोया है.
सत्य-असत, शुभ-अशुभ तुला पर
कर्म-मर्म सब आज तुल रहा....
*
खुद अपना
मूल्यांकन कर लो.
निज मन का
छायांकन कर लो.
तम-उजास को जोड़ सके जो
कहीं बनाया कोई पुल रहा?...
*
तुमने कितने
बाग़ लगाये?
श्रम-सीकर
कब-कहाँ बहाए?
स्नेह-सलिल कब सींचा?
बगिया में आभारी कौन गुल रहा?...
*
स्नेह-साधना करी
'सलिल' कब.
दीन-हीन में
दिखे कभी रब?
चित्रगुप्त की कर्म-तुला पर
खरा कौन सा कर्म तुल रहा?...
*
खाली हाथ?
न रो-पछताओ.
कंकर से
शंकर बन जाओ.
ज़हर पियो, हँस अमृत बाँटो.
देखोगे मन मलिन धुल रहा...
***
नये साल का गीत
*
कुछ ऐसा हो साल नया,
जैसा अब तक नहीं हुआ.
अमराई में मैना संग
झूमे-गाये फाग सुआ...
*
बम्बुलिया की छेड़े तान.
रात-रातभर जाग किसान.
कोई खेत न उजड़ा हो-
सूना मिले न कोई मचान.
प्यासा खुसरो रहे नहीं
गैल-गैल में मिले कुआ...
*
पनघट पर पैंजनी बजे,
बीर दिखे, भौजाई लजे.
चौपालों पर झाँझ बजा-
दास कबीरा राम भजे.
तजें सियासत राम-रहीम
देख न देखें कोई खुआ...
स्वर्ग करे भू का गुणगान.
मनुज देव से अधिक महान.
रसनिधि पा रसलीन 'सलिल'
हो अपना यह हिंदुस्तान.
हर दिल हो रसखान रहे
हरेक हाथ में मालपुआ...
***
दोहा सलिला
सुबह बिना नागा उगे, सूर्य ढले हर शाम।
यत्न सतत करते रहें, बिना रुके निष्काम।।
*
अंतिम पल तक तिमिर से, दिया न माने हार।
'सलिल' न कोशिश तज कभी, करो हार जयहार।।
*
संयम तज मत बजाएँ, मीत कभी भी गाल।
बन संतोषी हो सुखी, उन्नत रखकर भाल।।
*
ढाई आखर सीखकर, वर अद्वैत तज द्वैत।
मैं-तुम मिल हम हो सकें, जब जब खेलें बैत।।
*
गए हार कर जीत हम, ऐसा हुआ कमाल।
गए जीत कर हार भी, अद्भुत है नव साल।।
३१-१२-२०१०

***