सलिल सृजन जून १५
*
रैंप सौंग
०
सुनो सिकंदर
कहो कलंदर
०
कल समझौता, आज लड़ाई
गले न लगते भाई-भाई
नूरा कुश्ती हाथ मिलाई
आँख फिराते खोदें खाई।
शांति दूत सम्मान चाहते
धमकाते, झट भीख माँगते
नज़र तेल-मिनरल पर मैली
लूट, दबा दुम तुरंत भागते।
जोकर जैसी करते हरकत
चाहें केवल खुद की बरकत
दुनिया मना रही ईश्वर से
जल्दी से जल्दी हों रुखसत।
रौंदे घर घर
उठा बबंडर।
सुनो सिकंदर
कहो कलंदर
०
करें बुराई, कहें भलाई
दौने बाँटें, चाट मलाई
मन भाई संपदा पराई
करें जबरदस्ती कुड़माई।
दिखा रहे दम, पटक रहे बम
खुश होते फैलाकर मातम।
गला दबाकर करें दोस्ती
लूटें हरदम बनकर हमदम।
जन-गण मारे, हैं मदमाते
रोम जलाकर वेणु बजाते।
आत्म मुग्ध हैं अपनी छवि पर-
खुद ही खुद को श्रेष्ठ बताते।
नफ़रत के
पक्के सौदागर।
सुनो सिकंदर
कहो कलंदर
०
वक्त करेगा माफ न तुमको
फैलाते भू पर मातम को
मिटा उजाला, पाला तमको
नहीं देखते अँखिया नम को।
मरघट संस्कृति के उन्नायक
अमन-चैन के दुश्मन-भक्षक
करते हो नरमेध रोज ही-
अनय-अनाचारों के रक्षक।
बड़बोले वाग्मी हत्यारे
न्यायालय जब-तब फटकारे,
चेताती रहती है संसद
सुंदर न पाए लाख सुधारे।
बिन सत्ता तुम
मात्र छछूंदर।
सुनो सिकंदर
कहो कलंदर
०००
गीत
०
साथ डगर का
पैर दे रहे।
०
भवसागर से क्यों घबराना?
अनहोनी से क्यों भय खाना?
हर अपना हो जब बेगाना-
कोशिश को जी भर दुलराना।
बाधाओं से
बैर ले रहे।
साथ डगर का
पैर दे रहे।।
०
शूल चुभें तो कह स्वागत है।
भेंट पीर से जो आगत है।।
संकल्पों की पूँजी से कह-
मेहनत ही अपनी लागत है।।
मँझधारों में
नाव खे रहे।
साथ डगर का
पैर दे रहे।।
०
गिर-उठ-बढ़कर चलते जाएँ।
तूफानों को गले लगाएँ।।
संगाबित्ती करे सियासत-
अश्रु पोंछ हम ख्वाब दिखाएँ।।
कोयल-अंडे
काग से रहे।
साथ डगर का
पैर दे रहे।।
१५.६.२०२६
०
दोहा सलिला-
ब्रम्ह अनादि-अनन्त है, रचता है सब सृष्टि
निराकार आकार रच, करे कृपा की वृष्टि
*
परम सत्य है ब्रम्ह ही, चित्र न उसका प्राप्त
परम सत्य है ब्रम्ह ही, वेद-वचन है आप्त
*
ब्रम्ह-सत्य जो जानता, ब्राम्हण वह इंसान
हर काया है ब्रम्ह का, अंश सके वह मान
*
भेद-भाव करता नहीं, माने ऊँच न नीच
है समान हर आत्म को, प्रेम भाव से सींच
*
काया-स्थित ब्रम्ह ही, 'कायस्थ' ले जो जान
छुआछूत को भूलकर, करता सबका मान
*
राम श्याम रहमान हरि, ईसा मूसा एक
ईश्वर को प्यारा वही, जिसकी करनी नेक
*
निर्बल की रक्षा करे, क्षत्रिय तजकर स्वार्थ
तभी मुक्ति वह पा सके, करे नित्य परमार्थ
*
कर आदान-प्रदान जो, मेटे सकल अभाव
भाव ह्रदय में प्रेम का, होता वैश्य स्वभाव
*
पल-पल रस का पान कर, मनुज बने रस-खान
ईश तत्व से रास कर, करे 'सलिल' गुणगान
*
सेवा करता स्वार्थ बिन, सचमुच शूद्र महान
आत्मा सो परमात्मा, सेवे सकल जहान
*
चार वर्ण हैं धर्म के, हाथ-पैर लें जान
चारों का पालन करें, नर-नारी है आन
*
हर काया है शूद्र ही, करती सेवा नित्य
स्नेह-प्रेम ले-दे बने, वैश्य बात है सत्य
*
रक्षा करते निबल की, तब क्षत्रिय हों आप
ज्ञान-दान, कुछ सीख दे, ब्राम्हण हों जग व्याप
*
काया में रहकर करें, चारों कार्य सहर्ष
जो वे ही कायस्थ हैं, तजकर सकल अमर्ष
*
विधि-हरि-हर ही राम हैं, विधि-हरि-हर ही श्याम
जो न सत्य यह मानते, उनसे प्रभु हों वाम
***
नवगीत
एक-दूसरे को
*
एक दूसरे को छलते हम
बिना उगे ही
नित ढलते हम।
*
तुम मुझको 'माया' कहते हो,
मेरी ही 'छाया' गहते हो।
अवसर पाकर नहीं चूकते-
सहलाते, 'काया' तहते हो।
'साया' नहीं 'शक्ति' भूले तुम
मुझे न मालूम
सृष्टि बीज तुम।
चिर परिचित लेकिन अनजाने
एक-दूसरे से
लड़ते हम।
*
मैंने तुम्हें कह दिया स्वामी,
किंतु न अंतर्मन अनुगामी।
तुम प्रयास कर खुद से हारे-
संग न 'शक्ति' रही परिणामी।
साथ न तुमसे मिला अगर तो
हुई नाक में
मेरी भी दम।
हैं अभिन्न, स्पर्धी बनकर
एक-दूसरे को
खलते हम।
*
मैं-तुम, तुम-मैं, तू-तू मैं-मैं,
हँसना भूले करते पैं-पैं।
नहीं सुहाता संग-साथ भी-
अलग-अलग करते हैं ढैं-ढैं।
अपने सपने चूर हो रहे
दिल दुखते हैं
नयन हुए नम।
फेर लिए मुंह अश्रु न पोंछें
एक-दूसरे बिन
ढलते हम।
*
तुम मुझको 'माया' कहते हो,
मेरी ही 'छाया' गहते हो।
अवसर पाकर नहीं चूकते-
सहलाते, 'काया' तहते हो।
'साया' नहीं 'शक्ति' भूले तुम
मुझे न मालूम
सृष्टि बीज तुम।
चिर परिचित लेकिन अनजाने
एक-दूसरे से
लड़ते हम।
*
जब तक 'देवी' तुमने माना
तुम्हें 'देवता' मैंने जाना।
जब तुम 'दासी' कह इतराए
तुम्हें 'दास' मैंने पहचाना।
बाँट सकें जब-जब आपस में
थोड़ी खुशियाँ,
थोड़े से गम
तब-तब एक-दूजे के पूरक
धूप-छाँव संग-
संग सहते हम।
*
'मैं-तुम' जब 'तुम-मैं' हो जाते ,
'हम' होकर नवगीत गुञ्जाते ।
आपद-विपदा हँस सह जाते-
'हम' हो मरकर भी जी जाते।
स्वर्ग उतरता तब धरती पर
जब मैं-तुम
होते हैं हमदम।
दो से एक, अनेक हुए हैं
एक-दूसरे में
खो-पा हम।
१०-६-२०१६
TIET JABALPUR
***
नवगीत:
बेला
*
मगन मन महका
*
प्रणय के अंकुर उगे
फागुन लगे सावन.
पवन संग पल्लव उड़े
है कहाँ मनभावन?
खिलीं कलियाँ मुस्कुरा
भँवरे करें गायन-
सुमन सुरभित श्वेत
वेणी पहन मन चहका
मगन मन महका
*
अगिन सपने, निपट अपने
मोतिया गजरा.
चढ़ गया सिर, चीटियों से
लिपटकर निखरा
श्वेत-श्यामल गंग-जमुना
जल-लहर बिखरा.
लालिमामय उषा-संध्या
सँग 'सलिल' दहका.
मगन मन महका
१२.६.२०१५
४०१ जीत होटल बिलासपुर
***
छंद सलिला:
धारा छंद
*
छंद लक्षण: जाति महायौगिक, प्रति पद २९ मात्रा, यति १५ - १४, विषम चरणांत गुरु लघु सम चरणांत गुरु।
लक्षण छंद:
दे आनंद, न जिसका अंत , छंदों की अमृत धारा
रचें-पढ़ें, सुन-गुन सानंद , सुख पाया जब उच्चारा
पंद्रह-चौदह कला रखें, रेवा-धारा सदृश बहे
गुरु-लघु विषम चरण अंत, गुरु सम चरण सुअंत रहे
उदाहरण:
१. पूज्य पिता को करूँ प्रणाम , भाग्य जगा आशीष मिला
तुम बिन सूने सुबहो-शाम , 'सलिल' न मन का कमल खिला
रहा शीश पर जब तक हाथ , ईश-कृपा ने सतत छुआ
छाँह गयी जब छूटा साथ , तत्क्षण ही कंगाल हुआ
२. सघन तिमिर हो शीघ्र निशांत , प्राची पर लालिमा खिले
सूरज लेकर आये उजास , श्वास-श्वास को आस मिले
हो प्रयास के अधरों हास , तन के लगे सुवास गले
पल में मिट जाए संत्रास , मन राधा को रास मिले
३. सतत प्रवाहित हो रस-धार, दस दिश प्यार अपार रहे
आओ! कर सोलह सिंगार , तुम पर जान निसार रहे
मिली जीत दिल हमको हार , हार ह्रदय तुम जीत गये
बाँटो तो बढ़ता है प्यार , जोड़-जोड़ हम रीत गये
१५-६-२०१४
__________
पितृ दिवस पर-
पिता सूर्य सम प्रकाशक :
*
पिता सूर्य सम प्रकाशक, जगा कहें कर कर्म
कर्म-धर्म से महत्तम, अन्य न कोई मर्म
*
गृहस्वामी मार्तण्ड हैं, पिता जानिए सत्य
सुखकर्ता भर्ता पिता, रवि श्रीमान अनित्य
*
भास्कर-शशि माता-पिता, तारे हैं संतान
भू अम्बर गृह मेघ सम, दिक् दीवार समान
*
आपद-विपदा तम हरें, पिता चक्षु दें खोल
हाथ थाम कंधे बिठा, दिखा रहे भूगोल
*
विवस्वान सम जनक भी, हैं प्रकाश का रूप
हैं विदेह मन-प्राण का, सम्बल देव अनूप
*
छाया थे पितु ताप में, और शीत में ताप
छाता बारिश में रहे, हारकर हर संताप
*
बीज नाम कुल तन दिया, तुमने मुझको तात
अन्धकार की कोख से, लाकर दिया प्रभात
*
गोदी आँचल लोरियाँ, उँगली कंधा बाँह
माँ-पापा जब तक रहे, रही शीश पर छाँह
*
शुभाशीष से भरा था, जब तक जीवन पात्र
जान न पाया रिक्तता, अब हूँ याचक मात्र
*
पितृ-चरण स्पर्श बिन, कैसे हो त्यौहार
चित्र देख मन विकल हो, करता हाहाकार
*
तन-मन की दृढ़ता अतुल, खुद से बेपरवाह
सबकी चिंता-पीर हर, ढाढ़स दिया अथाह
*
श्वास पिता की धरोहर, माँ की थाती आस
हास बंधु, तिय लास है, सुता-पुत्र मृदु हास
१५-६-२०१४
***
गीत :
भाग्य निज पल-पल सराहूँ.....
*
भाग्य निज पल-पल सराहूँ,
जीत तुमसे, मीत हारूँ.
अंक में सर धर तुम्हारे,
एक टक तुमको निहारूँ.....
नयन उन्मीलित, अधर कम्पित,
कहें अनकही गाथा.
तप्त अधरों की छुअन ने,
किया मन को सरगमाथा.
दीप-शिख बन मैं प्रिये!
नीराजना तेरी उतारूँ...
हुआ किंशुक-कुसुम सा तन,
मदिर महुआ मन हुआ है.
विदेहित है देह त्रिभुवन,
मन मुखर काकातुआ है.
अछूते प्रतिबिम्ब की,
अँजुरी अनूठी विहँस वारूँ...
बाँह में ले बाँह, पूरी
चाह कर ले, दाह तेरी.
थाह पाकर भी न पाये,
तपे शीतल छाँह तेरी.
विरह का हर पल युगों सा,
गुजारा, उसको बिसारूँ...
बजे नूपुर, खनक कँगना,
कहे छूटा आज अँगना.
देहरी तज देह री! रँग जा,
पिया को आज रँग ना.
हुआ फागुन, सरस सावन,
पी कहाँ, पी कँह? पुकारूँ...
पंचशर साधे निहत्थे पर,
कुसुम आयुध चला, चल.
थाम लूँ न फिसल जाए,
हाथ से यह मनचला पल.
चाँदनी अनुगामिनी बन.
चाँद वसुधा पर उतारूँ...
भाग्य निज पल-पल सराहूँ.....
*
भाग्य निज पल-पल सराहूँ,
जीत तुमसे, मीत हारूँ.
अंक में सर धर तुम्हारे,
एक टक तुमको निहारूँ.....
नयन उन्मीलित, अधर कम्पित,
कहें अनकही गाथा.
तप्त अधरों की छुअन ने,
किया मन को सरगमाथा.
दीप-शिख बन मैं प्रिये!
नीराजना तेरी उतारूँ...
हुआ किंशुक-कुसुम सा तन,
मदिर महुआ मन हुआ है.
विदेहित है देह त्रिभुवन,
मन मुखर काकातुआ है.
अछूते प्रतिबिम्ब की,
अँजुरी अनूठी विहँस वारूँ...
बाँह में ले बाँह, पूरी
चाह कर ले, दाह तेरी.
थाह पाकर भी न पाये,
तपे शीतल छाँह तेरी.
विरह का हर पल युगों सा,
गुजारा, उसको बिसारूँ...
बजे नूपुर, खनक कँगना,
कहे छूटा आज अँगना.
देहरी तज देह री! रँग जा,
पिया को आज रँग ना.
हुआ फागुन, सरस सावन,
पी कहाँ, पी कँह? पुकारूँ...
पंचशर साधे निहत्थे पर,
कुसुम आयुध चला, चल.
थाम लूँ न फिसल जाए,
हाथ से यह मनचला पल.
चाँदनी अनुगामिनी बन.
चाँद वसुधा पर उतारूँ...
१५ .६ .२०१०
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