दिव्य नर्मदा .......... Divya Narmada
दिव्य नर्मदा : हिंदी तथा अन्य भाषाओँ के मध्य साहित्यिक-सांस्कृतिक-सामाजिक संपर्क हेतु रचना सेतु A plateform for literal, social, cultural and spiritual creative works. Bridges gap between HINDI and other languages, literature and other forms of expression.
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जनवरी ६, सॉनेट, फ़साना, कोहरा, चक्की, सरस्वती, लघुकथा, मुक्तक, दोधक छंद,
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भारतीय स्वातंत्र्य समर में बंगालियों का अवदान
बाघा जतीन (जोतिन)
९ सितंबर १९१५ को पुलिस ने जतींद्र नाथ का गुप्त अड्डा 'काली पोक्ष' (कप्तिपोद) से राज महन्ती नमक अफसर ने गाँव के लोगों की मदद से उन्हें पकड़ने की कोशश की। बढ़ती भीड़ को तितर-बितर करने के लिए यतींद्र नाथ ने गोली चला दी। राज महन्ती वहीं ढेर हो गया। यह समाचार पाकर बालासोर का जिला मजिस्ट्रेट किल्वी दल-बल सहित वहाँ आ पहुंचा। यतीश नामक एक क्रांतिकारी बीमार था। जतींद्र उसे अकेला छोड़कर जाने को तैयार नहीं थे। चित्तप्रिय नामक क्रांतिकारी उनके साथ था। दोनों तरफ़ से गोलियाँ चली। चित्तप्रिय वहीं शहीद हो गया। वीरेन्द्र तथा मनोरंजन नामक अन्य क्रांतिकारी मोर्चा संभाले हुए थे। इसी बीच यतींद्र नाथ का शरीर गोलियों से छलनी हो चुका था। वह जमीन पर गिर कर 'पानी-पानी' चिल्ला रहे थे। मनोरंजन उन्हें उठा कर नदी की और ले जाने लगा। तभी अंग्रेज अफसर किल्वी ने गोलीबारी बंद करने का आदेश दे दिया। गिरफ्तारी देते वक्त जतींद्र नाथ ने किल्वी से कहा- 'गोली मैं और चित्तप्रिय ही चला रहे थे। बाकी के तीनों साथी बिल्कुल निर्दोष हैं। 'इसके अगले दिन भारत की आज़ादी के इस महान सिपाही ने अस्पताल में सदा के लिए आँखें मूँद लीं।
रास बिहारी बोस (२५ मई १८८६ सुबलदाहा, बर्धमान - २१ जनवरी १९४५) के पिता बिनोद बिहारी बोस और माता भुवनेश्वरी अपने चाचा कालीचरण बोस की विधवा बिधुमुखी के घर में रहते थे। टिंकोरी दासी रास बिहारी बोस की पालक माता थीं। बोस और उनकी बहन सुशीला की प्रारंभिक शिक्षा कालीचरण की देखरेख में हुई। अपने दादा और शिक्षक (बक्केश्वर) से क्रांतिकारी आंदोलन की कहानियाँ सुनकर बोस इस ओर आकर्षित हुए। वे पूरे गांव के चहेते थे और अपने जिद्दी स्वभाव के लिए जाने जाते थे। उनका उपनाम रसू था। गांव वालों से पता चलता है कि वे 12 या 14 साल की उम्र तक सुबलदाहा में रहे। पिता की हुगली जिले में तैनाती के समय बोस चंदननगर स्थित अपने ननिहाल में रहे और चचेरे भाई श्रीश चंद्र घोष के साथ डुप्लेक्स कॉलेज में पढ़े । प्रधानाचार्य चारु चंद्र रॉय ने उन्हें क्रांतिकारी राजनीति के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कलकत्ता के मॉर्टन स्कूल में दाखिला लिया। उन्होंने चिकित्सा विज्ञान और इंजीनियरिंग में डिग्री प्राप्त की। १९०८ के अलीपुर बम कांड के मुकदमों से बचने के लिए वे बंगाल छोड़कर वन अनुसंधान संस्थान देहरादून में मुख्य क्लर्क हो गए। वहाँ, जुगंतर के अमरेंद्र चटर्जी के माध्यम से वे गुप्त रूप से बंगाल के क्रांतिकारियों से जुड़े। १९१२में लॉर्ड हार्डिंग पर जानलेवा हमला में, उन्होंने अनुशीलन समिति के बसंत कुमार बिस्वास के साथ मिलकर लॉर्ड हार्डिंग के काफिले पर एक स्वयंनिर्मित बम फेंका, जिससे वायसराय गंभीर रूप से घायल हो गए। वे रात की ट्रेन से देहरादून लौटकर अगले दिन कार्यालय में ऐसे शामिल हो गए जैसे कुछ हुआ ही न हो। उन्होंने वायसराय पर हुए इस कायरतापूर्ण हमले की निंदा करने के लिए नागरिकों की एक बैठक आयोजित की। १९१३ में बंगाल में बाढ़ राहत कार्य के दौरान, बोस का संपर्क जतिन मुखर्जी से हुआ, जिनमें उन्हें "एक सच्चा नेता" नज़र आया, जिसने बोस के कम होते उत्साह को "एक नई प्रेरणा" दी। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान वे गदर विद्रोह १९१५ के प्रमुख क्रांतिकारियों में से एक थे। क्रांति विफल रही और अधिकांश क्रांतिकारी किध किए गए। बोस ब्रिटिश खुफिया एजेंसियों से बचकर वींद्रनाथ टैगोर के रिश्तेदार प्रियनाथ ठाकुर के छद्म नाम सेजापान पहुँच गए। वहाँ बोस ने विभिन्न अखिल एशियाई समूहों के साथ शरण ली। ब्रिटिश सरकार उनके प्रत्यर्पण के लिए जापानी सरकार पर लगातार दबाव डाल रही थी। बचने के लिए उन्होंने टोक्यो में नाकामुराया बेकरी के मालिक और अखिल एशियाई समर्थक आइज़ो सोमा और कोक्को सोमा की बेटी तोशिको सोमा (निधन १९२४) से शादी की और १९२३ में जापानी नागरिक बनकर पत्रकार और लेखक के रूप में रहने लगे। उन्होंने जापान में भारतीय करी को लोकप्रिय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके दो बच्चे बेटा मसाहिदे बोस (भरतचंद्र जन्म १९२०, द्वितीय विश्व युद्ध में २४ वर्ष की आयु में मृत्यु) तथा बेटी तेत्सुको (जन्म १९२२)थे। बोस ने ए.एम. नायर के साथ मिलकर जापानी अधिकारियों को भारतीय क्रांतिकारियों का समर्थन करने के लिए राजी करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने २८-३० मार्च १९४२ को टोक्यो में एक सम्मेलन आयोजित कर भारतीय स्वतंत्रता लीग की स्थापना तथा भारतीय स्वतंत्रता के लिए एक सेना गठित करने का प्रस्ताव रखा। उन्होंने २२ जून १९४२ को बैंकॉक में लीग के दूसरे सम्मेलन में सुभाष चंद्र बोस को लीग में शामिल होने और अध्यक्ष के रूप में कमान संभालने के लिए आमंत्रित करने का प्रस्ताव पारित कराया। मलाया और बर्मा मोर्चों पर जापानियों द्वारा बंदी बनाए गए भारतीय युद्धबंदियों को भारतीय स्वतंत्रता लीग में शामिल होने और भारतीय राष्ट्रीय सेना (INA) के सैनिक बनने के लिए प्रोत्साहित किया गया था। १ सितंबर १९४२ को रास बिहारी बोस की भारतीय राष्ट्रीय लीग की सैन्य शाखा के रूप में भारतीय राष्ट्रीय सेना का गठन किया गया था। उन्होंने आज़ाद हिंद आंदोलन के लिए ध्वज का चयन किया और ध्वज तथा सत्ता सुभाष चंद्र बोस को सौंप दी जो 'आज़ाद हिंद फौज' बनी। तपेदिक से उनकी मृत्यु से पहले, जापानी सरकार ने उन्हें ऑर्डर ऑफ द राइजिंग सन (द्वितीय श्रेणी) से सम्मानित किया।
कन्हाई लाल दत्त (३० अगस्त १८८८ जन्माष्टमी चंदन नगर, हुगली - १० नवंबर १९०८, अलीपुर, मूल नाम सर्वतोष) का जन्म जन्माष्टमी को मामा के घर में हुआ। उनका आर्किशिक नाम सर्वतोष था। चंदन नगर टैब फ्रांसीसी उपनिवेश था। उनका पैतृक घर बंगाल के श्रीरामपुर में था। चार साल के कन्हाई को उनके पिता चुन्नीलाल दत्त जो सरकार की सेवा में थे, उन्हें बंबई ले गए। ५ साल मुंबई में रहने के बाद ९ साल की उम्र में वह वापस चंदन नगर आ गए और डुप्ले कॉलेज से स्नातक तक शिक्षा प्राप्त की। उनकी राजनीतिक गतिविधियों के चलते ब्रिटिश सरकार ने उनकी डिग्री रोक ली। चारु चन्द्र राय से गहनता के कारण कन्हाई को क्रांति पथ का परिचय प्राप्त हुआ था। चंदन नगर में क्रांति की योजना बनाने वाले ब्रम्ह बाँधव उपाध्याय के संपर्क में कन्हाई युगांतर कार्यालय में काम करने लगे, अपने घर में ही कोलकता की अनुशीलन समिति की एक शाखा बनाई और बाद में अपने क्षेत्र में पाँच अन्य संस्थाओं की भी स्थापना की। इनमें व्यायाम और लाठी आदि की शिक्षा दी गई थी। खुदीराम बोस द्वारा पुराने ज्वालामुखी बम कांड के कारण चौकन्ने अंग्रेजी शासन को मानिकतल्ला की एक गोदाम में क्रान्तिकारियों के अड्डे का पता चला। यह बागान अरविंद घोष के भाई सिविल सर्जन डॉक्टर वारिन्द्र घोष का था। दुर्भाग्य से क्रांतिकारी गुप्तचर विभाग की इस कारस्तानी से सर्वथा अनभिज्ञ रहे। १९०५ के बंगाल विभाजन विरोधी आन्दोलन में कनाईलाल ने भाग लिया तथा आन्दोलन के नेता सुरेन्द्रनाथ बनर्जी के सम्पर्क में आए। अप्रैल १९०८ को खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी ने मुजफ्फरपुर में किंग्सफ़ोर्ड पर हमला किया। इस हमले के आरोपी के रूप में कनाईलाल दत्त, अरविन्द घोष और बारीन्द्र कुमार आदि को गिरफ्तार किया गया। उन्हीं के बीच का एक साथी नरेन गोस्वामी सरकारी मुखबिर बन गया। इस मुखबिर से उसके बयान के पूर्व बदला लेने के लिए कनाईलाल दत्त और सत्येन बोस ने मुलाकात के समय कटहल और मछली में छिपकर गुप्त रूप से जेल में रिवाल्वर और कारतूस मँगवाए। योजनानुसार पहले सत्येन बोस, उसके बाद कनाईलाल बीमार होकर अस्पताल में भर्ती हुए। दोनों ने अस्पताल के स्टाफ का विश्वास जीता। सत्येन ने मुखबिर नरेन गोस्वामी के पास खुद को सरकारी गवाह बनने का संदेश भिजवाया। नरेन प्रसन्न होकर सत्येन से मिलने जेल अस्पताल पहुँचा। ३१ अगस्त सन १९०८ को कनाईलाल और सत्येन बोस ने उसे गोलियों से ढेर कर दिया। दोनों को मृत्युदंड मिला। कन्हाई को १० मार्च १९०८ को तथा सत्येन्द्र को दो दिन बाद प्राण दंड दिया गया। जन आक्रोश के भी से सरकार ने कन्हाई का अंतिम संस्कार जेल में ही कराया।
- भारतीय फिल्म निर्देशक आशुतोष गोवारिकर ने सेन के जीवन पर आधारित फिल्म 'खेलें हम जी जान से ' (२०१०) का निर्देशन किया। अभिनेता अभिषेक बच्चन ने सेन की भूमिका निभाई। एक अन्य फिल्म, 'चिट्टागोंग ' (२०१२), का निर्देशन बेदाब्रता पेन ने किया था , सेन के शस्त्रागार छापे पर आधारित थी। मनोज बाजपेयी ने मुख्य भूमिका निभाई। सूर्य सेन बांग्लादेश और भारत दोनों में एक अत्यंत सम्मानित व्यक्ति हैं। ढाका विश्वविद्यालय और चटगाँव विश्वविद्यालय दोनों में उनके नाम पर आवासीय हॉल का नाम रखा गया है । कोलकाता में एक मेट्रो रेलवे स्टेशन और एक सड़क का नाम भी उनके नाम पर रखा गया है।
सुभाष चन्द्र बोस
सुभाष चन्द्र बोस (२३ जनवरी १८९७ - ???) भारत के स्वतन्त्रता संग्राम के अग्रणी तथा सबसे बड़े नेता थे। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान, अंग्रेज़ों के खिलाफ लड़ने के लिए, उन्होंने जापान के सहयोग से आज़ाद हिन्द फ़ौज का गठन किया था।[3] उनके द्वारा दिया गया "जय हिन्द" का नारा। "तुम मुझे खून दो मैं तुम्हे आजादी दूंगा" का नारा भी उनका था जो उस समय अत्यधिक प्रचलन में आया।[4] भारतवासी उन्हें नेता जी के नाम से सम्बोधित करते हैं।
कुछ इतिहासकारों का मानना है कि जब नेता जी ने जापान और जर्मनी से सहायता लेने का प्रयास किया था, तो ब्रिटिश सरकार ने अपने गुप्तचरों को 1941 में उन्हें खत्म करने का आदेश दिया था।[5]
नेता जी ने 5 जुलाई 1943 को सिंगापुर के टाउन हाल के सामने 'सुप्रीम कमाण्डर' (सर्वोच्च सेनापति) के रूप में सेना को सम्बोधित करते हुए "दिल्ली चलो!" का नारा दिया और जापानी सेना के साथ मिलकर ब्रिटिश व कामनवेल्थ सेना से बर्मा, इम्फाल और कोहिमा में एक साथ जमकर मोर्चा लिया।
२१ अक्टूबर १९४३ को बोस ने आजाद हिन्द फौज के सर्वोच्च सेनापति की हैसियत से स्वतंत्र भारत की अस्थायी सरकार बनाई जिसे जर्मनी, जापान, फ़िलीपीन्स, कोरिया, चीन, इटली, मान्चुको और आयरलैंड सहित 11 देशो की सरकारों ने मान्यता दी थी। जापान ने अण्डमान और निकोबार द्वीपसमूह इस अस्थायी सरकार को दे दिए। सुभाष उन द्वीपों में गए और उनका नया नामकरण किया।
१९४४ को आजाद हिन्द फौज ने अंग्रेजों पर दोबारा आक्रमण किया और कुछ भारतीय प्रदेशों को अंग्रेजों से मुक्त भी करा लिया। कोहिमा का युद्ध ४ अप्रैल १९४४ से 22 जून १९४४ तक लड़ा गया एक भयंकर युद्ध था। इस युद्ध में जापानी सेना को पीछे हटना पड़ा था और यही एक महत्वपूर्ण मोड़ सिद्ध हुआ।
६ जुलाई १९४४ को उन्होंने रंगून रेडियो स्टेशन से महात्मा गांधी के नाम एक प्रसारण जारी किया जिसमें उन्होंने इस निर्णायक युद्ध में विजय के लिए उनका आशीर्वाद और शुभ कामनाएँ मांगी।[6]
सुभाष चन्द्र बोस की मृत्यु को लेकर आज भी विवाद है।[7] जापान में प्रतिवर्ष 18 अगस्त को उनका शहीद दिवस मनाया जाता है परन्तु भारत में रहने वाले उनके परिवार के लोगों का आज भी यह मानना है कि सुभाष की मौत १९४५ में नहीं हुई। वे उसके बाद रूस में नज़रबन्द थे। यदि ऐसा नहीं है तो भारत सरकार ने उनकी मृत्यु से संबंधित दस्तावेज अब तक सार्वजनिक नहीं किए क्योंकि नेता जी की मृत्यु नहीं हुई थी। [8]
16 जनवरी 2014 (गुरुवार) को कलकत्ता उच्च न्यायालय ने नेता जी के लापता होने के रहस्य से जुड़े खुफिया दस्तावेजों को सार्वजनिक करने की मांग वाली जनहित याचिका पर सुनवाई के लिए विशेष पीठ के गठन का आदेश दिया।[9]
आज़ाद हिन्द सरकार के 75 वर्ष पूर्ण होने पर इतिहास में पहली बार वर्ष 2018 में भारत के प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी ने लाल क़िला पर तिरंगा फहराया। 23 जनवरी 2021 को नेताजी की 125वीं जयंती थी जिसे भारत सरकार के निर्णय के तहत पराक्रम दिवस के रूप में मनाया गया। 8 सितम्बर 2022 को नई दिल्ली में राजपथ, जिसका नामकरण कर्तव्यपथ किया गया है , पर नेताजी की विशाल प्रतिमा का अनावरण किया गया।
नेताजी सुभाषचन्द्र बोस (२३ जनवरी १८९७ कटक उड़ीसा - ???) के पिता रायबहादुर जानकीनाथ बोस और माँ प्रभावती कुलीन कायस्थ परिवार से थे। प्रभावती और जानकीनाथ बोस की ६ बेटियों और ८ बेटों में सुभाष ९वीं सन्तान और ५ वें बेटे थे। कटक के प्रोटेस्टेण्ट स्कूल से प्राइमरी शिक्षा पूर्ण कर १९०९ में उन्होंने रेवेनशा कॉलेजियेट स्कूल में दाखिला लिया तथा १५ वर्ष की आयु में विवेकानन्द साहित्य का पूर्ण अध्ययन कर लिया। १९१६ में जब वे दर्शनशास्त्र (ऑनर्स) में बी.ए. के छात्र थे अध्यापकों और छात्रों के झगड़े में सुभाष ने छात्रों का नेतृत्व संभाला, उन्हें एक साल के लिये निकालकर परीक्षा देने पर प्रतिबन्ध लगा दिया। गया। वे १९१९ में बीए (ऑनर्स) की परीक्षा प्रथम श्रेणी कलकत्ता विश्वविद्यालय में द्वितीय आए। आईसीएस परीक्षा हेतु १५ सितम्बर १९१९ को वे इंग्लैण्ड चले गये था १९२०में वरीयता सूची में चौथा स्थान प्राप्त करते हुए पास कर ली किन्तु अंग्रेजों की गुलामी असह्य होने के कारण २२ अप्रैल १९२१ को भारत सचिव ई०एस० मान्टेग्यू को आईसीएस से त्यागपत्र देने का पत्र लिखा तथा जून १९२१ में मानसिक एवं नैतिक विज्ञान में ट्राइपास (ऑनर्स) की डिग्री के साथ स्वदेश वापस लौट आए ।रवींद्रनाथ ठाकुर की सलाह के अनुसार वे २० जुलाई १९२१ को महात्मा गाँधी से मुंबई में मिले। गाँधी द्वारा ५ फरवरी १९२२को चौरीचौरा घटना के बाद असहयोग आंदोलन बंद करने के विरोध में १९२२ में देशबंधु चितरंजन दास ने स्वराज पार्टी बनाकर कोलकाता महापालिका का चुनाव जीता, वे कोलकाता के मेयर तथा सुभाष प्रमुख कार्यकारी अधिकारी बने। जवाहरलाल नेहरू के साथ सुभाष ने इण्डिपेण्डेंस लीग बनकर १९२७ में साइमन कमीशन को काले झण्डे दिखाइ। भारत का भावी संविधान बनाने हेतु गठित आठ सदस्यीय आयोग के मोतीलाल नेहरू अध्यक्ष और सुभाष एक सदस्य थे। इस आयोग ने नेहरू रिपोर्ट पेश की। कांग्रेस वार्षिक अधिवेशन १९२८ में अंग्रेज़ सरकार को डोमिनियन स्टेटस देने के लिये एक साल का वक्त दिया जाये। अगर एक साल में अंग्रेज़ सरकार ने यह माँग पूरी नहीं की तो कांग्रेस पूर्ण स्वराज की माँग करेगी। परन्तु अंग्रेज़ सरकार ने यह माँग पूरी नहीं की। इसलिये 1930 में जब कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में लाहौर में हुआ तब ऐसा तय किया गया कि 26 जनवरी का दिन स्वतन्त्रता दिवस के रूप में मनाया जायेगा।
26 जनवरी 1931 को कोलकाता में राष्ट्र ध्वज फहराकर सुभाष एक विशाल मोर्चे का नेतृत्व कर रहे थे तभी पुलिस ने उन पर लाठी चलायी और उन्हें घायल कर जेल भेज दिया। जब सुभाष जेल में थे तब गाँधी जी ने अंग्रेज सरकार से समझौता किया और सब कैदियों को रिहा करवा दिया। लेकिन अंग्रेज सरकार ने भगत सिंह जैसे क्रान्तिकारियों को रिहा करने से साफ इन्कार कर दिया। भगत सिंह की फाँसी माफ कराने के लिये गाँधी जी ने सरकार से बात तो की परन्तु नरमी के साथ ऐसा बताया जाता है परंतु सत्य कुछ और ही है। सुभाष चाहते थे कि इस विषय पर गाँधीजी अंग्रेज सरकार के साथ किया गया समझौता तोड़ दें। लेकिन गांधीजी अपनी ओर से दिया गया वचन तोड़ने को राजी नहीं थे। अंग्रेज सरकार अपने स्थान पर अड़ी रही और भगत सिंह व उनके साथियों को फाँसी दे दी गयी। भगत सिंह को न बचा पाने पर सुभाष गाँधी और कांग्रेस के तरीकों से बहुत नाराज हो गये।
कारावास
अपने सार्वजनिक जीवन में सुभाष को कुल 11 बार कारावास हुआ। सबसे पहले उन्हें 16 जुलाई 1921 में छह महीने का कारावास हुआ।
1925 में गोपीनाथ साहा नामक एक क्रान्तिकारी कोलकाता के पुलिस अधीक्षक चार्लस टेगार्ट को मारना चाहता था। उसने गलती से अर्नेस्ट डे नामक एक व्यापारी को मार डाला। इसके लिए उसे फाँसी की सजा दी गयी। गोपीनाथ को फाँसी होने के बाद सुभाष फूट फूट कर रोये। उन्होंने गोपीनाथ का शव माँगकर उसका अन्तिम संस्कार किया। इससे अंग्रेज़ सरकार ने यह निष्कर्ष निकाला कि सुभाष ज्वलन्त क्रान्तिकारियों से न केवल सम्बन्ध ही रखते हैं अपितु वे उन्हें उत्प्रेरित भी करते हैं। इसी बहाने अंग्रेज़ सरकार ने सुभाष को गिरफ़्तार किया और बिना कोई मुकदमा चलाये उन्हें अनिश्चित काल के लिये म्याँमार के माण्डले कारागृह में बन्दी बनाकर भेज दिया।
5 नवम्बर 1925 को देशबंधु चित्तरंजन दास कोलकाता में चल बसे। सुभाष ने उनकी मृत्यु की खबर माण्डले कारागृह में रेडियो पर सुनी। माण्डले कारागृह में रहते समय सुभाष की तबियत बहुत खराब हो गयी। उन्हें तपेदिक हो गया। परन्तु अंग्रेज़ सरकार ने फिर भी उन्हें रिहा करने से इन्कार कर दिया। सरकार ने उन्हें रिहा करने के लिए यह शर्त रखी कि वे इलाज के लिये यूरोप चले जायें। लेकिन सरकार ने यह स्पष्ट नहीं किया कि इलाज के बाद वे भारत कब लौट सकते हैं। इसलिए सुभाष ने यह शर्त स्वीकार नहीं की। आखिर में परिस्थिति इतनी कठिन हो गयी कि जेल अधिकारियों को यह लगने लगा कि शायद वे कारावास में ही न मर जायें। अंग्रेज़ सरकार यह खतरा भी नहीं उठाना चाहती थी कि सुभाष की कारागृह में मृत्यु हो जाये। इसलिये सरकार ने उन्हें रिहा कर दिया। उसके बाद सुभाष इलाज के लिये डलहौजी चले गये।
1930 में सुभाष कारावास में ही थे कि चुनाव में उन्हें कोलकाता का महापौर चुना गया। इसलिए सरकार उन्हें रिहा करने पर मजबूर हो गयी। 1932 में सुभाष को फिर से कारावास हुआ। इस बार उन्हें अल्मोड़ा जेल में रखा गया। अल्मोड़ा जेल में उनकी तबियत फिर से खराब हो गयी। चिकित्सकों की सलाह पर सुभाष इस बार इलाज के लिये यूरोप जाने को राजी हो गये।
यूरोप प्रवास
सन् 1933 से लेकर 1936 तक सुभाष यूरोप में रहे। यूरोप में सुभाष ने अपनी सेहत का ख्याल रखते हुए अपना कार्य बदस्तूर जारी रखा। वहाँ वे इटली के नेता मुसोलिनी से मिले, जिन्होंने उन्हें भारत के स्वतन्त्रता संग्राम में सहायता करने का वचन दिया। आयरलैंड के नेता डी वलेरा सुभाष के अच्छे दोस्त बन गये। जिन दिनों सुभाष यूरोप में थे उन्हीं दिनों जवाहरलाल नेहरू की पत्नी कमला नेहरू का ऑस्ट्रिया में निधन हो गया। सुभाष ने वहाँ जाकर जवाहरलाल नेहरू को सान्त्वना दी।
बाद में सुभाष यूरोप में विठ्ठल भाई पटेल से मिले। विठ्ठल भाई पटेल के साथ सुभाष ने मन्त्रणा की जिसे पटेल-बोस विश्लेषण के नाम से प्रसिद्धि मिली। इस विश्लेषण में उन दोनों ने गान्धी के नेतृत्व की जमकर निन्दा की। उसके बाद विठ्ठल भाई पटेल जब बीमार हो गये तो सुभाष ने उनकी बहुत सेवा की। मगर विठ्ठल भाई पटेल नहीं बचे, उनका निधन हो गया।
विठ्ठल भाई पटेल ने अपनी वसीयत में अपनी सारी सम्पत्ति सुभाष के नाम कर दी। मगर उनके निधन के पश्चात् उनके भाई सरदार वल्लभ भाई पटेल ने इस वसीयत को स्वीकार नहीं किया। सरदार पटेल ने इस वसीयत को लेकर अदालत में मुकदमा चलाया। यह मुकदमा जीतने पर सरदार वल्लभ भाई पटेल ने अपने भाई की सारी सम्पत्ति गान्धी के हरिजन सेवा कार्य को भेंट कर दी।
1934 में सुभाष को उनके पिता के मृत्युशय्या पर होने की खबर मिली। खबर सुनते ही वे हवाई जहाज से कराची होते हुए कोलकाता लौटे। यद्यपि कराची में ही उन्हे पता चल गया था कि उनके पिता की मृत्त्यु हो चुकी है फिर भी वे कोलकाता गये। कोलकाता पहुँचते ही अंग्रेज सरकार ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया और कई दिन जेल में रखकर वापस यूरोप भेज दिया
सन् 1934 में जब सुभाष ऑस्ट्रिया में अपना इलाज कराने हेतु ठहरे हुए थे उस समय उन्हें अपनी पुस्तक लिखने हेतु एक अंग्रेजी जानने वाले टाइपिस्ट की आवश्यकता हुई। उनके एक मित्र ने एमिली शेंकल (अं: Emilie Schenkl) नाम की एक ऑस्ट्रियन महिला से उनकी मुलाकात करा दी। एमिली के पिता एक प्रसिद्ध पशु चिकित्सक थे। सुभाष एमिली[12] की ओर आकर्षित हुए और उन दोनों में स्वाभाविक प्रेम हो गया। नाजी जर्मनी के सख्त कानूनों को देखते हुए उन दोनों ने सन् 1942 में बाड गास्टिन नामक स्थान पर हिन्दू पद्धति से विवाह रचा लिया। वियेना में एमिली ने एक पुत्री को जन्म दिया। सुभाष ने उसे पहली बार तब देखा जब वह मुश्किल से चार सप्ताह की थी। उन्होंने उसका नाम अनिता बोस रखा था। अगस्त 1945 में ताइवान में हुई तथाकथित विमान दुर्घटना में जब सुभाष की मौत हुई, अनिता पौने तीन साल की थी।[13][14] अनिता अभी जीवित है। उसका नाम अनिता बोस फाफ (अं: Anita Bose Pfaff) है। अपने पिता के परिवार जनों से मिलने अनिता फाफ कभी-कभी भारत भी आती है।
1938 में कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन हरिपुरा में होना तय हुआ। इस अधिवेशन से पहले गान्धी जी ने कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए सुभाष को चुना। यह कांग्रेस का 51 वाँ अधिवेशन था। इसलिए कांग्रेस अध्यक्ष सुभाष चन्द्र बोस का स्वागत 51 बैलों द्वारा खींचे हुए रथ में किया गया।
इस अधिवेशन में सुभाष का अध्यक्षीय भाषण बहुत ही प्रभावी हुआ। किसी भी भारतीय राजनीतिक व्यक्ति ने शायद ही इतना प्रभावी भाषण कभी दिया हो। अपने अध्यक्षीय कार्यकाल में सुभाष ने योजना आयोग की स्थापना की। जवाहरलाल नेहरू इसके पहले अध्यक्ष बनाये गये। सुभाष ने बंगलौर में मशहूर वैज्ञानिक सर विश्वेश्वरय्या की अध्यक्षता में एक विज्ञान परिषद की स्थापना भी की।
1937 में जापान ने चीन पर आक्रमण कर दिया। सुभाष की अध्यक्षता में कांग्रेस ने चीनी जनता की सहायता के लिये डॉ॰ द्वारकानाथ कोटनिस के नेतृत्व में चिकित्सकीय दल भेजने का निर्णय लिया। आगे चलकर जब सुभाष ने भारत के स्वतन्त्रता संग्राम में जापान से सहयोग किया तब कई लोग उन्हे जापान की कठपुतली और फासिस्ट कहने लगे। मगर इस घटना से यह सिद्ध होता हैं कि सुभाष न तो जापान की कठपुतली थे और न ही वे फासिस्ट विचारधारा से सहमत थे।
कांग्रेस के अध्यक्ष पद से इस्तीफा
1938 में गांधीजी ने कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए सुभाष को चुना तो था मगर उन्हें सुभाष की कार्यपद्धति पसन्द नहीं आयी। इसी दौरान यूरोप में द्वितीय विश्वयुद्ध के बादल छा गए थे। सुभाष चाहते थे कि इंग्लैंड की इस कठिनाई का लाभ उठाकर भारत का स्वतन्त्रता संग्राम अधिक तीव्र किया जाये। उन्होंने अपने अध्यक्षीय कार्यकाल में इस ओर कदम उठाना भी शुरू कर दिया था परन्तु गांधीजी इससे सहमत नहीं थे।
1939 में जब नया कांग्रेस अध्यक्ष चुनने का समय आया तब सुभाष चाहते थे कि कोई ऐसा व्यक्ति अध्यक्ष बनाया जाये जो इस मामले में किसी दबाव के आगे बिल्कुल न झुके। ऐसा किसी दूसरे व्यक्ति के सामने न आने पर सुभाष ने स्वयं कांग्रेस अध्यक्ष बने रहना चाहा। लेकिन गान्धी उन्हें अध्यक्ष पद से हटाना चाहते थे। गान्धी ने अध्यक्ष पद के लिये पट्टाभि सीतारमैया को चुना। कविवर रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने गान्धी को पत्र लिखकर सुभाष को ही अध्यक्ष बनाने का निवेदन किया। प्रफुल्लचन्द्र राय और मेघनाद साहा जैसे वैज्ञानिक भी सुभाष को ही फिर से अध्यक्ष के रूप में देखना चाहते थे। लेकिन गान्धीजी ने इस मामले में किसी की बात नहीं मानी। कोई समझौता न हो पाने पर बहुत बरसों बाद कांग्रेस पार्टी में अध्यक्ष पद के लिये चुनाव हुआ।
सब समझते थे कि जब महात्मा गान्धी ने पट्टाभि सीतारमैय्या का साथ दिया है तब वे चुनाव आसानी से जीत जायेंगे। लेकिन वास्तव में सुभाष को चुनाव में 1580 मत और सीतारमैय्या को 1377 मत मिले। गान्धीजी के विरोध के बावजूद सुभाषबाबू 203 मतों से चुनाव जीत गये। मगर चुनाव के नतीजे के साथ बात खत्म नहीं हुई। गान्धीजी ने पट्टाभि सीतारमैय्या की हार को अपनी हार बताकर अपने साथियों से कह दिया कि अगर वें सुभाष के तरीकों से सहमत नहीं हैं तो वें कांग्रेस से हट सकतें हैं। इसके बाद कांग्रेस कार्यकारिणी के 14 में से 12 सदस्यों ने इस्तीफा दे दिया। जवाहरलाल नेहरू तटस्थ बने रहे और अकेले शरदबाबू सुभाष के साथ रहे।
1939 का वार्षिक कांग्रेस अधिवेशन त्रिपुरी में हुआ। इस अधिवेशन के समय सुभाषबाबू तेज बुखार से इतने बीमार हो गये थे कि उन्हें स्ट्रेचर पर लिटाकर अधिवेशन में लाना पड़ा। गान्धीजी स्वयं भी इस अधिवेशन में उपस्थित नहीं रहे और उनके साथियों ने भी सुभाष को कोई सहयोग नहीं दिया। अधिवेशन के बाद सुभाष ने समझौते के लिए बहुत कोशिश की लेकिन गान्धीजी और उनके साथियों ने उनकी एक न मानी। परिस्थिति ऐसी बन गयी कि सुभाष कुछ काम ही न कर पाये। आखिर में तंग आकर 29 अप्रैल 1939 को सुभाष ने कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया।
फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना
3 मई 1939 को सुभाष ने कांग्रेस के अन्दर ही फॉरवर्ड ब्लॉक के नाम से अपनी पार्टी की स्थापना की। कुछ दिन बाद सुभाष को कांग्रेस से ही निकाल दिया गया। बाद में फॉरवर्ड ब्लॉक अपने आप एक स्वतन्त्र पार्टी बन गयी। द्वितीय विश्वयुद्ध शुरू होने से पहले से ही फॉरवर्ड ब्लॉक ने स्वतन्त्रता संग्राम को और अधिक तीव्र करने के लिये जन जागृति शुरू की।
3 सितम्बर 1939 को मद्रास में सुभाष को ब्रिटेन और जर्मनी में युद्ध छिड़ने की सूचना मिली। उन्होंने घोषणा की कि अब भारत के पास सुनहरा मौका है उसे अपनी मुक्ति के लिये अभियान तेज कर देना चहिये। 8 सितम्बर 1939 को युद्ध के प्रति पार्टी का रुख तय करने के लिये सुभाष को विशेष आमन्त्रित के रूप में काँग्रेस कार्य समिति में बुलाया गया। उन्होंने अपनी राय के साथ यह संकल्प भी दोहराया कि अगर काँग्रेस यह काम नहीं कर सकती है तो फॉरवर्ड ब्लॉक अपने दम पर ब्रिटिश राज के खिलाफ़ युद्ध शुरू कर देगा।
अगले ही वर्ष जुलाई में कलकत्ता स्थित हालवेट स्तम्भ[15] जो भारत की गुलामी का प्रतीक था सुभाष की यूथ ब्रिगेड ने रातोंरात वह स्तम्भ मिट्टी में मिला दिया। सुभाष के स्वयंसेवक उसकी नींव की एक-एक ईंट उखाड़ ले गये। यह एक प्रतीकात्मक शुरुआत थी। इसके माध्यम से सुभाष ने यह सन्देश दिया था कि जैसे उन्होंने यह स्तम्भ धूल में मिला दिया है उसी तरह वे ब्रिटिश साम्राज्य की भी ईंट से ईंट बजा देंगे।
इसके परिणामस्वरूप अंग्रेज सरकार ने सुभाष सहित फॉरवर्ड ब्लॉक के सभी मुख्य नेताओं को कैद कर लिया। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान सुभाष जेल में निष्क्रिय रहना नहीं चाहते थे। सरकार को उन्हें रिहा करने पर मजबूर करने के लिये सुभाष ने जेल में आमरण अनशन शुरू कर दिया। हालत खराब होते ही सरकार ने उन्हें रिहा कर दिया। मगर अंग्रेज सरकार यह भी नहीं चाहती थी कि सुभाष युद्ध के दौरान मुक्त रहें। इसलिये सरकार ने उन्हें उनके ही घर पर नजरबन्द करके बाहर पुलिस का कड़ा पहरा बिठा दिया।[16]
नजरबन्दी से पलायन
नजरबन्दी से निकलने के लिये सुभाष ने एक योजना बनायी। 16 जनवरी 1941 को वे पुलिस को चकमा देते हुए एक पठान मोहम्मद ज़ियाउद्दीन के वेश में अपने घर से निकले। शरदबाबू के बड़े बेटे शिशिर ने उन्हे अपनी गाड़ी से कोलकाता से दूर झारखंड राज्य के धनबाद जिले (गोमोह) तक पहुँचाया। गोमोह रेलवे स्टेशन(वर्तमान में नेता जी सुभाष चंद्र बोस जंक्शन, गोमोह) से फ्रण्टियर मेल पकड़कर वे पेशावर पहुँचे। पेशावर में उन्हें फॉरवर्ड ब्लॉक के एक सहकारी, मियाँ अकबर शाह मिले। मियाँ अकबर शाह ने उनकी मुलाकात, किर्ती किसान पार्टी के भगतराम तलवार से करा दी। भगतराम तलवार के साथ सुभाष पेशावर से अफगानिस्तान की राजधानी काबुल की ओर निकल पड़े। इस सफर में भगतराम तलवार रहमत खान नाम के पठान और सुभाष उनके गूँगे-बहरे चाचा बने थे। पहाड़ियों में पैदल चलते हुए उन्होंने यह सफर पूरा किया।
काबुल में सुभाष दो महीनों तक उत्तमचन्द मल्होत्रा नामक एक भारतीय व्यापारी के घर में रहे। वहाँ उन्होने पहले रूसी दूतावास में प्रवेश पाना चाहा। इसमें नाकामयाब रहने पर उन्होने जर्मन और इटालियन दूतावासों में प्रवेश पाने की कोशिश की। इटालियन दूतावास में उनकी कोशिश सफल रही। जर्मन और इटालियन दूतावासों ने उनकी सहायता की। आखिर में आरलैण्डो मैजोन्टा नामक इटालियन व्यक्ति बनकर सुभाष काबुल से निकलकर रूस की राजधानी मास्को होते हुए जर्मनी की राजधानी बर्लिन पहुँचे।
बर्लिन में सुभाष सर्वप्रथम रिबेन ट्रोप जैसे जर्मनी के अन्य नेताओं से मिले। उन्होंने जर्मनी में भारतीय स्वतन्त्रता संगठन और आज़ाद हिन्द रेडियो की स्थापना की। इसी दौरान सुभाष नेताजी के नाम से जाने जाने लगे। जर्मन सरकार के एक मन्त्री एडॅम फॉन ट्रॉट सुभाष के अच्छे दोस्त बन गये।
आखिर 29 मई 1942 के दिन, सुभाष जर्मनी के सर्वोच्च नेता एडॉल्फ हिटलर से मिले। लेकिन हिटलर को भारत के विषय में विशेष रुचि नहीं थी। उन्होने सुभाष को सहायता का कोई स्पष्ट वचन नहीं दिया।
कई साल पहले हिटलर ने माईन काम्फ नामक आत्मचरित्र लिखा था। इस किताब में उन्होने भारत और भारतीय लोगों की बुराई की थी। इस विषय पर सुभाष ने हिटलर से अपनी नाराजगी व्यक्त की। हिटलर ने अपने किये पर माफी माँगी और माईन काम्फ के अगले संस्करण में वह परिच्छेद निकालने का वचन दिया।
अन्त में सुभाष को पता लगा कि हिटलर और जर्मनी से उन्हें कुछ और नहीं मिलने वाला है। इसलिये 8 मार्च 1943 को जर्मनी के कील बन्दरगाह में वे अपने साथी आबिद हसन सफरानी के साथ एक जर्मन पनडुब्बी में बैठकर पूर्वी एशिया की ओर निकल गये। वह जर्मन पनडुब्बी उन्हें हिन्द महासागर में मैडागास्कर के किनारे तक लेकर गयी। वहाँ वे दोनों समुद्र में तैरकर जापानी पनडुब्बी तक पहुँचे। द्वितीय विश्वयुद्ध के समय किन्हीं भी दो देशों की नौसेनाओं की पनडुब्बियों के द्वारा नागरिकों की यह एकमात्र अदला-बदली हुई थी। यह जापानी पनडुब्बी उन्हें इंडोनेशिया के पादांग बन्दरगाह तक पहुँचाकर आयी।
पूर्व एशिया में अभियान

पूर्वी एशिया पहुँचकर सुभाष ने सर्वप्रथम वयोवृद्ध क्रान्तिकारी रासबिहारी बोस से भारतीय स्वतन्त्रता परिषद का नेतृत्व सँभाला। सिंगापुर के एडवर्ड पार्क में रासबिहारी ने स्वेच्छा से स्वतन्त्रता परिषद का नेतृत्व सुभाष को सौंपा था।
जापान के प्रधानमन्त्री जनरल हिदेकी तोजो ने नेताजी के व्यक्तित्व से प्रभावित होकर उन्हें सहयोग करने का आश्वासन दिया। कई दिन पश्चात् नेताजी ने जापान की संसद (डायट) के सामने भाषण दिया।
21 अक्टूबर 1943 के दिन नेताजी ने सिंगापुर में आर्जी-हुकूमते-आज़ाद-हिन्द (स्वाधीन भारत की अन्तरिम सरकार) की स्थापना की। वे खुद इस सरकार के राष्ट्रपति, प्रधानमन्त्री और युद्धमन्त्री बने। इस सरकार को कुल नौ देशों ने मान्यता दी। नेताजी आज़ाद हिन्द फौज के प्रधान सेनापति भी बन गये।
आज़ाद हिन्द फौज में जापानी सेना ने अंग्रेजों की फौज से पकड़े हुए भारतीय युद्धबन्दियों को भर्ती किया था। आज़ाद हिन्द फ़ौज में औरतों के लिये झाँसी की रानी रेजिमेंट भी बनायी गयी।
पूर्वी एशिया में नेताजी ने अनेक भाषण देकर वहाँ के स्थायी भारतीय लोगों से आज़ाद हिन्द फौज में भर्ती होने और उसे आर्थिक मदद देने का आह्वान किया। उन्होंने अपने आह्वान में यह सन्देश भी दिया - "तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा।"
द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान आज़ाद हिन्द फौज ने जापानी सेना के सहयोग से भारत पर आक्रमण किया। अपनी फौज को प्रेरित करने के लिये नेताजी ने " दिल्ली चलो" का नारा दिया। दोनों फौजों ने अंग्रेजों से अंदमान और निकोबार द्वीप जीत लिये। यह द्वीप आर्जी-हुकूमते-आज़ाद-हिन्द के अनुशासन में रहे। नेताजी ने इन द्वीपों को "शहीद द्वीप" और "स्वराज द्वीप" का नया नाम दिया। दोनों फौजों ने मिलकर इंफाल और कोहिमा पर आक्रमण किया। लेकिन बाद में अंग्रेजों का पलड़ा भारी पड़ा और दोनों फौजों को पीछे हटना पड़ा।
जब आज़ाद हिन्द फौज पीछे हट रही थी तब जापानी सेना ने नेताजी के भाग जाने की व्यवस्था की। परन्तु नेताजी ने झाँसी की रानी रेजिमेंट की लड़कियों के साथ सैकड़ों मील चलते रहना पसन्द किया। इस प्रकार नेताजी ने सच्चे नेतृत्व का एक आदर्श प्रस्तुत किया।
6 जुलाई 1944 को आज़ाद हिन्द रेडियो पर अपने भाषण के माध्यम से गान्धीजी को सम्बोधित करते हुए नेताजी ने जापान से सहायता लेने का अपना कारण और आर्जी-हुकूमते-आज़ाद-हिन्द तथा आज़ाद हिन्द फौज की स्थापना के उद्देश्य के बारे में बताया। इस भाषण के दौरान नेताजी ने गान्धीजी को राष्ट्रपिता कहा तभी गांधीजी ने भी उन्हे नेताजी कहा।
दुर्घटना और मृत्यु का समाचार
द्वितीय विश्वयुद्ध में जापान की हार के बाद, नेताजी को नया रास्ता ढूँढना जरूरी था। उन्होने रूस से सहायता माँगने का निश्चय किया था। 18 अगस्त 1945 को नेताजी हवाई जहाज से मंचूरिया की तरफ जा रहे थे। इस सफर के दौरान वे लापता हो गये। इस दिन के बाद वे कभी किसी को दिखायी नहीं दिये।[17]
23 अगस्त 1945 को टोकियो रेडियो ने बताया कि सैगोन में नेताजी एक बड़े बमवर्षक विमान से आ रहे थे कि 18 अगस्त को ताइहोकू (जापानी भाषा: 臺北帝國大學, Taihoku Teikoku Daigaku) हवाई अड्डे के पास उनका विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया। विमान में उनके साथ सवार जापानी जनरल शोदेई, पाइलेट तथा कुछ अन्य लोग मारे गये। नेताजी गम्भीर रूप से जल गये थे। उन्हें ताइहोकू सैनिक अस्पताल ले जाया गया जहाँ उन्होंने दम तोड़ दिया। कर्नल हबीबुर्रहमान के अनुसार उनका अन्तिम संस्कार ताइहोकू में ही कर दिया गया। सितम्बर के मध्य में उनकी अस्थियाँ संचित करके जापान की राजधानी टोकियो के रैंकोजी मन्दिर में रख दी गयीं।[18] भारतीय राष्ट्रीय अभिलेखागार से प्राप्त दस्तावेज़ के अनुसार नेताजी की मृत्यु 18 अगस्त 1945 को ताइहोकू के सैनिक अस्पताल में रात्रि 21.00 बजे हुई थी।[19]
स्वतन्त्रता के पश्चात् भारत सरकार ने इस घटना की जाँच करने के लिये 1956 और 1977 में दो बार आयोग नियुक्त किया। दोनों बार यह नतीजा निकला कि नेताजी उस विमान दुर्घटना में ही शहीद हो गये।
1999 में मनोज कुमार मुखर्जी के नेतृत्व में तीसरा आयोग बनाया गया। 2005 में ताइवान सरकार ने मुखर्जी आयोग को बता दिया कि 1945 में ताइवान की भूमि पर कोई हवाई जहाज दुर्घटनाग्रस्त हुआ ही नहीं था। 2005 में मुखर्जी आयोग ने भारत सरकार को अपनी रिपोर्ट पेश की जिसमें उन्होंने कहा कि नेताजी की मृत्यु उस विमान दुर्घटना में होने का कोई सबूत नहीं हैं। लेकिन भारत सरकार ने मुखर्जी आयोग की रिपोर्ट को अस्वीकार कर दिया।
देश के अलग-अलग हिस्सों में आज भी नेताजी को देखने और मिलने का दावा करने वाले लोगों की कमी नहीं है। फैजाबाद के गुमनामी बाबा से लेकर छत्तीसगढ़ राज्य में जिला रायगढ़ तक में नेताजी के होने को लेकर कई दावे पेश किये गये लेकिन इन सभी की प्रामाणिकता संदिग्ध है। छत्तीसगढ़ में तो सुभाष चन्द्र बोस के होने का मामला राज्य सरकार तक गया। परन्तु राज्य सरकार ने इसे हस्तक्षेप के योग्य न मानते हुए मामले की फाइल ही बन्द कर दी।
कलकत्ता हाई कोर्ट ने नेताजी के लापता होने के रहस्य से जुड़े खुफिया दस्तावेजों को सार्वजनिक करने की माँग पर सुनवाई के लिये स्पेशल बेंच के गठन का आदेश दे दिया है। यह याचिका सरकारी संगठन इंडियाज स्माइल द्वारा दायर की गयी है। इस याचिका में भारत संघ, राष्ट्रीय सलाहकार परिषद, रॉ, खुफिया विभाग, प्रधानमंत्री के निजी सचिव, रक्षा सचिव, गृह विभाग और पश्चिम बंगाल सरकार सहित कई अन्य लोगों को प्रतिवादी बनाया गया है।
हिरोशिमा और नागासाकी के विध्वंस के बाद सारे संदर्भ ही बदल गये। आत्मसमर्पण के उपरान्त जापान चार-पाँच वर्षों तक अमेरिका के पाँवों तले कराहता रहा। यही कारण था कि नेताजी और आजाद हिन्द सेना का रोमहर्षक इतिहास टोकियो के अभिलेखागार में वर्षों तक पड़ा धूल खाता रहा।
नवम्बर 1945 में दिल्ली के लाल किले में आजाद हिन्द फौज पर चलाये गये मुकदमे ने नेताजी के यश में वर्णनातीत वृद्धि की और वे लोकप्रियता के शिखर पर जा पहुँचे। अंग्रेजों के द्वारा किए गये विधिवत दुष्प्रचार तथा तत्कालीन प्रमुख राजनीतिक दलों द्वारा सुभाष के विरोध के बावजूद सारे देश को झकझोर देनेवाले उस मुकदमे के बाद माताएँ अपने बेटों को ‘सुभाष’ का नाम देने में गर्व का अनुभव करने लगीं। घर–घर में राणा प्रताप और छत्रपति शिवाजी महाराज के जोड़ पर नेताजी का चित्र भी दिखाई देने लगा।
आजाद हिन्द फौज के माध्यम से भारत को अंग्रेजों के चंगुल से आजाद करने का नेताजी का प्रयास प्रत्यक्ष रूप में सफल नहीं हो सका किन्तु उसका दूरगामी परिणाम हुआ। सन् १९४६ के नौसेना विद्रोह इसका उदाहरण है। नौसेना विद्रोह के बाद ही ब्रिटेन को विश्वास हो गया कि अब भारतीय सेना के बल पर भारत में शासन नहीं किया जा सकता और भारत को स्वतन्त्र करने के अलावा उनके पास कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा।
आजाद हिन्द फौज को छोड़कर विश्व-इतिहास में ऐसा कोई भी दृष्टांत नहीं मिलता जहाँ तीस-पैंतीस हजार युद्धबन्दियों ने संगठित होकर अपने देश की आजादी के लिए ऐसा प्रबल संघर्ष छेड़ा हो।
जहाँ स्वतन्त्रता से पूर्व विदेशी शासक नेताजी की सामर्थ्य से घबराते रहे, तो स्वतन्त्रता के उपरान्त देशी सत्ताधीश जनमानस पर उनके व्यक्तित्व और कर्तृत्व के अमिट प्रभाव से घबराते रहे। स्वातन्त्र्यवीर सावरकर ने स्वतन्त्रता के उपरान्त देश के क्रांतिकारियों के एक सम्मेलन का आयोजन किया था और उसमें अध्यक्ष के आसन पर नेताजी के तैलचित्र को आसीन किया था। यह एक क्रान्तिवीर द्वारा दूसरे क्रान्ति वीर को दी गयी अभूतपूर्व सलामी थी।
अपने संघर्षपूर्ण एवं अत्यधिक व्यस्त जीवन के बावजूद नेताजी सुभाष चन्द्र बोस स्वाभाविक रूप से लेखन के प्रति भी उत्सुक रहे हैं। अपनी अपूर्ण आत्मकथा एक भारतीय यात्री (ऐन इंडियन पिलग्रिम) के अतिरिक्त उन्होंने दो खंडों में एक पूरी पुस्तक भी लिखी भारत का संघर्ष (द इंडियन स्ट्रगल), जिसका लंदन से ही प्रथम प्रकाशन हुआ था।[20] यह पुस्तक काफी प्रसिद्ध हुई थी। उनकी आत्मकथा यद्यपि अपूर्ण ही रही, लेकिन उसे पूर्ण करने की उनकी अभिलाषा रही थी, जिसका पता मूल पांडुलिपि के प्रथम पृष्ठ पर बनायी गयी योजना से स्पष्ट रूपेण चलता है।[21]
इसके अतिरिक्त नेताजी ने अपने बहुआयामी स्वतंत्रता संघर्ष के संदर्भ में अगणित पत्र लिखे, भाषण दिये एवं रेडियो के माध्यम से भी उनके व्याख्यान प्रसारित हुए। पत्रों की एक बड़ी मात्रा उनके निजी जीवन से भी सम्बद्ध है।
दिसंबर 1940 से नेताजी के अंतिम समय तक उनके पूर्ण विश्वासपात्र तथा निकट सहयोगी रहे डॉ० शिशिर कुमार बोस ने नेताजी रिसर्च ब्यूरो की स्थापना कर नेताजी के 'समग्र साहित्य' के प्रकाशन का विशाल कार्य मुख्यतः विनोद सी० चौधरी के साथ मिलकर 1961 ईस्वी में आरंभ किया था[22] और 1980 में 12 खंडों में संकलित रचनाओं के प्रकाशन का काम शुरू हुआ। आरंभिक योजना 10 खंडों में 'समग्र साहित्य' के प्रकाशन की थी, परंतु बाद में यह योजना 12 खंडों की हो गयी। अप्रैल 1980 में सर्वप्रथम बांग्ला में इसके प्रथम खंड का प्रकाशन हुआ था और नवंबर 1980 में अंग्रेजी में। हिंदी में इसका प्रथम खंड 1982 में प्रकाशित हुआ और फिर इन तीनों भाषाओं में समग्र साहित्य का प्रकाशन होते रहा। इसका अंतिम (12वाँ) खंड 2011 ई० में छप कर आ पाया; हालांकि इसकी सामग्री पहले से ही तैयार थी। इस 'समग्र वाङ्मय' के संकलन एवं प्रकाशन कार्य से आरंभ से ही सुगत बोस भी जुड़े हुए थे और अंतिम दो खंडों का प्रकाशन डॉ० शिशिर कुमार बोस के दुःखद निधन के कारण मुख्यतः सुगत बोस के ही संपादन में हुआ।
इस 'समग्र वाङ्मय' के प्रथम खंड में उनकी 'आत्मकथा' के साथ कुछ पत्रों का प्रकाशन हुआ है और द्वितीय खंड में उनकी सुप्रसिद्ध पुस्तक 'भारत का संघर्ष' (द इंडियन स्ट्रगल) का प्रकाशन हुआ है। फिर अन्य खंडों में उनके द्वारा लिखित पत्रों, टिप्पणियों एवं भाषणों आदि समग्र उपलब्ध साहित्य का क्रमबद्ध प्रकाशन हुआ है। इस प्रकार यथासंभव उपलब्ध नेताजी का लिखित एवं वाचिक 'समग्र वाङ्मय' अध्ययन हेतु सुलभ हो गया है और यह युगीन आवश्यकता भी है कि महात्मा गांधी की तरह नेताजी के सन्दर्भ में भी अनेकानेक संदर्भ-रहित कथनों एवं अपूर्ण जानकारियों के आधार पर राय कायम करने की बजाय उपयुक्त मुद्दे को उसके उपयुक्त एवं सम्यक् संदर्भों में देखते हुए सटीक एवं प्रामाणिक राय कायम की जाय। वे बहुत ही सरल थे।
| पत्नी अंजली और पुत्री भारती के साथ बटुकेश्वर दत्त |
पाठशाला की नौकरी करते हुए उनकी भेंट अज्ञातवास में रह रहे प्रसिद्ध क्रांतिकारी सूर्य सेन से हुई। प्रीतिलता उनके दल की सक्रिय सदस्य बनी। सूर्य सेन का एक साथी रामकृष्ण विश्वास कलकत्ता के अलीपुर जेल में था जिसे फाँसी की सज़ा सुनाई गई थी। उससे मिलना आसान नहीं था लेकिन प्रीतिलता उनसे कारागार में लगभग चालीस बार मिली और किसी अधिकारी को उन पर संशय भी नहीं हुआ। यह था, उनकी बुद्धिमत्ता और बहादुरी का प्रमाण। इसके बाद वे सूर्यसेन के नेतृत्त्व कि इन्डियन रिपब्लिकन आर्मी में महिला सैनिक बनी। पूर्वी बंगाल के घलघाट में क्रान्तिकारियो को पुलिस ने घेर लिया था घिरे हुए क्रान्तिकारियों में अपूर्व सेन, निर्मल सेन, प्रीतिलता और सूर्यसेन आदि थे। सूर्यसेन ने लड़ाई करने का आदेश दिया। अपूर्वसेन और निर्मल सेन शहीद हो गये। सूर्यसेन की गोली से कैप्टन कैमरान मारा गया। सूर्यसेन और प्रीतिलता लड़ते-लड़ते भाग गए। क्रांतिकारी सूर्यसेन पर १० हजार रुपये का इनाम घोषित था। दोनों एक सावित्री नाम की महिला के घर गुप्त रूप से रहे। वह महिला क्रान्तिकारियों को आश्रय देने के कारण अंग्रेजों का कोपभाजन बनी। सूर्यसेन ने अपने साथियों का बदला लेने की योजना बनाई कि पहाड़ी की तलहटी में यूरोपीय क्लब पर धावा बोलकर नाच-गाने में मग्न अंग्रेजो को मृत्यु का दंड देकर बदला लिया जाए। प्रीतिलता के नेतृत्त्व में कुछ क्रांतिकारी २४ सितम्बर १९३२ की रात इस काम के लिए गए। हथियारों से लैस प्रीतिलता ने आत्म रक्षा के लिए पोटेशियम साइनाइड नामक विष भी रख लिया था। क्लब की खिड़की में बाहर से बम लगाया, क्लब की इमारत बम फटने और पिस्तौल की आवाज़ से काँप उठी। नाच-रंग के वातावरण में एकाएक चीखें सुनाई देने लगी। १३ अंग्रेज जख्मी हुए, बाकी भाग गए, एक यूरोपीय महिला मारी गई। क्लब से हुई गोलीबारी में प्रीतिलता के शरीर में एक गोली लगी। वे घायल अवस्था में भागीं लेकिन गिरते ही और पोटेशियम सायनाइड खा लिया। मात्र २१ साल की उम्र में उन्होंने झाँसी की रानी की तरह अंतिम समय तक अंग्रेजों से लड़ते हुए स्वयं ही मृत्यु का वरण कर लिया। प्रीतिलता के आत्म बलिदान के बाद तलाशी में अंग्रेज अधिकारियों को मिले पत्र में छपा था कि चटगाँव शस्त्रागार काण्ड के बाद जो मार्ग अपनाया जाएगा, वह भावी विद्रोह का प्राथमिक रूप होगा। यह संघर्ष भारत को पूरी स्वतंत्रता मिलने तक जारी रहेगी।
वीणा दास
वीणा दास (२४ अगस्त १९११ - २६ दिसम्बर १९८६) बीणा दास सुप्रसिद्ध ब्रह्म समाजी शिक्षक वेणीमाधव दास और सामाजिक कार्यकर्त्ता सरला देवी की पुत्री थीं। वे सेंट जॉन डोसेसन गर्ल्स हायर सैकण्डरी स्कूल की छात्रा रहीं। वे कोलकाता में महिलाओं के संचालित अर्ध-क्रान्तिकारी संगठन छात्री संघ की सदस्या थीं। ६ फरवरी १९३२ को कलकत्ता विश्वविद्यालय के समावर्तन उत्सव (दीक्षान्त समारोह) में बंगाल के अंग्रेज लाट सर स्टैनले जैकसन मुख्य अतिथि थे। उस अवसर पर उपाधि लेने आई कुमारी वीणादास ने गवर्नर स्टनली जैक्शन पर गोली चला दी। गोली गवर्नर के कान के पास से निकल गई, वह मंच पर लेट गया। लेफ्टिनेन्ट कर्नल सुहरावर्दी ने दौड़कर वीणादास का गला एक हाथ से दबा लिया और दूसरे हाथ से पिस्तोलवाली कलाई पकड़ कर सीनेट हाल की छत की तरफ कर दी। वीणादास गोली चलाती गई, लेकिन पाँचों गोलियाँ निशाना चूक गईं। उन्होंने पिस्तौल फेंक दी। अदालत में वीणादास ने एक साहसपूर्ण बयान दिया। अखबारों पर रोक लगा दिये जाने के कारण वह बयान प्रकाशित न हो सका। इसके लिए उन्हें नौ वर्षों के लिए सख़्त कारावास की सजा दी गई। १९३९ में रिहा होने के बाद दास ने कांग्रेस पार्टी की सदस्य बनकर सन् १९४२ में भारत छोड़ो आन्दोलन में भाग लिया और १९४२ से १९४५ तक कारावास भोगा। वे १९४६-४७ में बंगाल प्रान्त विधान सभा और १९४७ से १९५१ तक पश्चिम बंगाल प्रान्त विधान सभा की सदस्या रहीं। उन्होंने १९४७ में युगान्तर समूह के स्वतन्त्रता कार्यकर्ता साथी ज्योतिष चन्द्र भौमिक से विवाह किया। बीणा दास ने बंगाली में 'शृंखल झंकार' और 'पितृधन' नामक दो आत्मकथाएँ लिखीं। पति की मृत्यु के बाद वे कलकत्ता छोड़कर ऋषिकेश के एक छोटे से आश्रम में एकान्त में रहने लगीं । अपना गुज़ारा करने के लिए उन्होंने शिक्षिका के तौर पर काम किया और सरकार द्वारा दी जानेवाली स्वतंत्रता सेनानी पेंशन लेने से इंकार कर दिया। भारतमाता के लिए स्वयं को समर्पित कर देने वाली इस वीरांगना का अन्त बहुत ही दुखद था। महान स्वतंत्रता सेनानी, प्रोफेसर सत्यव्रत घोष ने अपने लेख 'फ्लैश बैक: बीना दास – रीबोर्न' में उनकी मार्मिक मृत्यु के बारे में लिखा- ''उन्होंने सड़क के किनारे अपना जीवन समाप्त किया। उनका मृत शरीर बहुत ही छिन्न-भिन्न अवस्था में था। रास्ते से गुज़रने वाले लोगों को उनका शव मिला। पुलिस को सूचित किया गया और महीनों की तलाश के बाद पता चला कि यह शव बीना दास का है। यह सब उसी आज़ाद भारत में हुआ जिसके लिए इस अग्नि-कन्या ने अपना सब कुछ ताक पर रख दिया था। देश को इस मार्मिक कहानी को याद रखते हुए, देर से ही सही, लेकिन अपनी इस महान स्वतंत्रता सेनानी को सलाम करना चाहिए।''
शांति सेन (२५ दिसंबर १९१३ मालदा - १६ सितंबर १९९६) एक भारतीय क्रांतिकारी और तेज निशानेबाज थे, अंग्रेजों ने उन्हें शांति क्रैकशूट सेन नाम दिया। मालदा जिला स्कूल से मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण कर वे अपने पिता के साथ मिदनापुर चले गए और कॉलेज में दाखिला लिया। बाद में वे ब्रिटिश भारत के एक क्रांतिकारी संगठन, बंगाल वॉलंटियर्स में शामिल हो गए । दो पिछले जिला मजिस्ट्रेट जेम्स पेडी और रॉबर्ट डगलस की हत्या के बाद, कोई ब्रिटिश अधिकारी मिदनापुर जिले का प्रभार लेने के लिए तैयार नहीं था। पूर्व सैनिक बर्नार्ड ईजे बर्गे को तब मिदनापुर जिले में तैनात किया गया था । बंगाल स्वयंसेवकों के सदस्यों रामकृष्ण रॉय , ब्रजकिशोर चक्रवर्ती, प्रभांशु शेखर पाल, कामाख्या चरण घोष, सोनातन रॉय, नंदा दुलाल सिंह, सुकुमार सेन गुप्ता, बिजॉय कृष्ण घोष, पूर्णानंद सान्याल, मणिंद्र नाथ चौधरी, सरोज रंजन दास कानूनगो, शांति गोपाल सेन, शैलेश चंद्र घोष, अनाथ बंधु पांजा और मृगेंद्र दत्ता ने बरगे की हत्या करने का फैसला किया। रॉय, चक्रवर्ती, निर्मल जिबोन घोष और दत्ता ने मिदनापुर पुलिस मैदान में मिदनापुर मोहम्मडन स्पोर्टिंग क्लब (मोहम्मडन एससी (कोलकाता) का एक फैन क्लब ) और मिदनापुर टाउन क्लब ( ब्रैडली-बर्ट चैलेंज कप कॉर्नर शील्ड प्रतियोगिता) के बीच फुटबॉल मैच खेलते समय बर्ज की गोली मारकर हत्या करने की योजना बनाई। २ सितंबर १९३३ को पुलिस परेड ग्राउंड में फुटबॉल मैच के हाफ टाइम के दौरान, बर्ज की पांजा और दत्ता ने गोली मारकर हत्या कर दी। पांजा को बर्ज के एक अंगरक्षक ने मौके पर ही मार डाला। दत्ता को भी गोली लगी और अगले दिन अस्पताल में उसकी मौत हो गई। गोलीबारी के बाद शांति गोपाल सेन साइकिल लेकर सालबानी जंगल भाग गया। वहाँ उसने गोदापियासल रेलवे स्टेशन से ट्रेन पकड़ी। गोदापियासल गाँव के बिनोद सेन उर्फ बिनोद बिहारी सेन नामक एक क्रांतिकारी ने इस मामले में उसकी मदद की। एक साल बाद शांति गोपाल को कोलकाता से गिरफ्तार कर लिया गया। ब्रिटिश सरकार की विशेष अदालत ने उसे और छह अन्य लोगों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई और उसे अंडमान द्वीप समूह भेज दिया। वह १९४६ में जेल से रिहा हुआ। भारत की स्वतंत्रता के बाद सेन ने १९५७, १९६२ और १९६७ में पश्चिम बंगाल विधानसभा की इंग्लिश बाजार सीट से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के उम्मीदवार के रूप में विधानसभा चुनाव जीते। अपने शेष जीवन में सेन ने एक समाजसेवी के रूप में काम किया।उन्हें १९७२ में भारत सरकार द्वारा ताम्रपत्र से सम्मानित किया गया। उन्होंने मालदा महिला महाविद्यालय और मालदा बालिका विद्यालय (शांति सेन बालिका विद्यालय) की स्थापना के लिए विभिन्न प्रकार से दान दिया । उनके नाम पर 'शांति सेन सरणि' नामक एक सड़क का नामकरण किया गया।
वीर क्रांतिकारियों, आजाद हिंद फौज के सैनिकों तथा सत्याग्रहियों के सम्मिलित प्रयासों के फलस्वरूप भारत को १५ अगस्त १९४७ को स्वतंत्रता मिली। हमारा कर्तव्य है कि हम इन सबको याद कर देश के प्रति समर्पित होने का संकल्प करें। इस एक लेख में सब सेनानियों की जनक्री दे पान संभव नहीं है। अनेक सेनानी विशेषकर महिलाओं का योगदान अनदेखा-अनसुना है। हमें इतिहास में पैठकर वास्तविक सेनानियों के अवदान पर साहित्य लेखन, उनके समरक बनाने, उनके वंशजों के प्रति आभार व्यक्त करने के कर्तव्य का पालन करना चाहिए।