शोधालेख
कृष्ण-दर्शन युगीन विसंगतियाँ और सम कालिक प्रासंगिकता
आचार्य संजीव वर्मा ''सलिल''
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प्रस्तावना:
भारतीय वांग्मय में भगवान श्री कृष्ण मात्र एक ऐतिहासिक या पौराणिक पुरुष नहीं हैं, बल्कि वे सोलह कलावातारी पूर्ण पुरुषोत्तम, चेतना के सर्वोच्च शिखर और जीवन के पूर्णत्व के जीवंत विग्रह हैं। आज का मानव इतिहास एक अत्यंत संवेदनशील और संक्रमणकालीन दौर से गुजर रहा है। एक ओर जहाँ विज्ञान और तकनीक ने भौतिक समृद्धि के नए प्रतिमान गढ़े हैं, वहीं दूसरी ओर मानवीय मूल्य, आत्मिक शांति और सामाजिक समरसता का निरंतर क्षरण हुआ है। वर्तमान युग की त्रासदियाँ वैश्विक विद्वेष, राजनैतिक टकराव, युवा वर्ग की दिशाहीनता या व्यवस्था (तंत्र) द्वारा आम जनता (लोक) की उपेक्षा ठीक वैसी ही हैं जैसी द्वापर युग के अवसान काल में विद्यमान थीं। श्री कृष्ण का संपूर्ण जीवन और उनका दर्शन (विशेषकर श्रीमद्भगवद्गीता) किसी एक कालखंड के लिए नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता के लिए हर युग में मार्गदर्शक है।
कृष्ण न द्वापर के लिए जिए-मरे लें मान।
देश-काल हर युग उन्हें ले अपने हित जान।।
समकालिक जो मुश्किलें कृष्ण उनके उत्तर आप-
पा सकते हैं कृष्ण में, अगर सकें पहचान।।
श्री कृष्ण का जीवन दर्शन: विरोधाभासों का अनुपम सामंजस्य:
श्री कृष्ण का चरित्र अत्यंत अनूठा है क्योंकि वे जीवन को टुकड़ों में नहीं, बल्कि उसकी संपूर्णता में देखते हैं। वे एक ओर गोकुल में माखन चुराने वाले निश्छल बालक हैं, तो दूसरी ओर कुरुक्षेत्र के मैदान में काल का चक्र घुमाने वाले योगेश्वर हैं। वे राधा के निष्काम प्रेम के आराध्य होते हुए भी रुक्मिणी के सकाम प्रेम के इष्ट, द्रौपदी के सख्य भाव के रक्षक, कुब्जा के तारक और सुदामा के संकट मोचक एक साथ हैं। श्री कृष्ण दुष्टों के संहारक की नहीं उनके मोक्षकर्ता भी हैं।
बालक, रक्षक, मारक, तारक नटखट कृष्ण कन्हैया है
गो पालक, माखन चोरी कर नाचे ताताथैया है
वेणु बजाए, रास रचाए, व्यसन चुराए लुक-छिपकर
पल-पल रूप बदलता मनहर, सबका चित्त चुरैया है
पूर्णत्व के साक्षी :
श्री कृष्ण जीवन के किसी भी पक्ष को नकारते नहीं हैं। वे संसार से भागने (वैराग्य) का उपदेश नहीं देते, बल्कि संसार में रहकर, उसके थपेड़ों को झेलते हुए अनासक्त भाव से जीने की कला सिखाते हैं। स्थितप्रज्ञता अर्थात सुख-दुख, जय-पराजय, लाभ-हानि में समभाव रखना ही कृष्ण दर्शन का मूल तत्व है। आज का मनुष्य छोटी-छोटी असफलताओं से टूट जाता है। कृष्ण का दर्शन हमें सिखाता है कि युद्ध केवल मैदान में नहीं, मनुष्य के मन में भी चलता है, और मन के इस युद्ध को वैचारिक स्थिरता (स्थितप्रज्ञता) से ही जीता जा सकता है।
बिना नकारे, सच स्वीकारे, कान्हा तनिक न लज्जित हो
सच के साथ खड़ा हो हरदम, मगर झूठ से सज्जित हो
जैसे को तैसा का हामी, विचलित कभी न होता है-
आम बालकों जैसा रहता, महिमा से भी मण्डित हो
कृष्ण-लीलाएँ: प्रतीकात्मकता और सामाजिक संदेश
श्री कृष्ण की बाल-लीलाओं से लेकर महाभारत के सूत्रधार बनने तक की प्रत्येक लीला में गहरा सामाजिक और आध्यात्मिक संदेश छिपा है, जिसे समकालीन परिप्रेक्ष्य में समझना अनिवार्य है।
करे लीला नित्य नटखट, जुड़ें सब जन खुद-ब-खुद
रोकना चाहें, न रोकें, देखते चुप खुद-ब-खुद
कौन ऊँचा कौन नीचा, नहीं कोई देखता-
साथ सबके हाथ सबका, देखते सब खुद-ब-खुद
माखन चोरी और सामूहिक चेतना: कृष्ण द्वारा गोप-बालकों के साथ मिलकर माखन चुराना और खाना वास्तव में संसाधनों के केंद्रीकरण के विरुद्ध एक प्रतीकात्मक विद्रोह था। कंस के राज्य में जनता का शोषण कर सारा पोषण (माखन) मथुरा भेजा जा रहा था। कृष्ण ने उसे रोककर स्थानीय बच्चों में वितरित किया। यह वर्तमान के आर्थिक असमानता और पूँजी के विकेंद्रीकरण के सिद्धांत का प्रागैतिहासिक रूप है। माखन चुराने-खाने में जन्मना जाति, छुआछूत या ऊँच-नीच को कोई स्थान न था। यह समाज में समानता लाने का अद्वितीय और सफल प्रयास सिद्ध हुआ।
कालिया नाग मर्दन: यमुना नदी के जल को प्रदूषित कर उस पर एकाधिकार करने वाले नाग राज्य कालिया का दमन कर कृष्ण ने पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ जल जैसे प्रकृति प्रदूतत और जीवन के लिए अपरिहार्य संसधान पर सार्वजनिक स्वामित्व का संदेश दिया। आज जब वैश्विक पर्यावरण संकट चरम पर है, नदियाँ प्रदूषित हो रही हैं और अगला विश्व युद्ध पानी को लेकर होने की संभावना व्यक्त की जा रही है तब कृष्ण का यह कृत्य हमें प्रकृति के साथ तादात्म्य बिठाने की प्रेरणा देता है।
गोवर्धन पूजा: इंद्र की रूढ़िवादी पूजा को बंद करवाकर गोवर्धन पर्वत (प्रकृति, गाय और कृषि) की पूजा शुरू करवाना इस बात का प्रमाण है कि कृष्ण अंधविश्वास के विरोधी थे। वे प्रत्यक्ष प्रकृति और कर्म की सत्ता को प्रधानता देते थे। यही नहीं वे राज्य और समाज के उन्नति में हर आम नागरिक को श्रेय देने के पक्षधर थे, इसलिए गोवर्धन उठाते समय हर ग्वाले की लाठी लगवाते हैं।
सत्य और असत्य का शाश्वत संघर्ष
आज का समाज नैतिक पतन के उस मोड़ पर है जहाँ सत्य और असत्य की परिभाषाएँ धुंधली हो गई हैं। 'सत्य' को सत्ता और सुविधा के अनुसार परिभाषित किया जा रहा है। कुरुक्षेत्र का युद्ध केवल दो परिवारों की लड़ाई नहीं थी, वह 'धर्म' (न्याय, सत्य, कर्तव्य) और 'अधर्म' (अन्याय, असत्य, अहंकार) का महासंग्राम था।सत्य की रक्षा हेतु लचीलापन: कृष्ण रूढ़िवादी या जड़वादी सत्य के पक्षधर नहीं थे। वे जानते थे कि यदि बड़े सत्य (धर्म और मानवता की रक्षा) के लिए किसी छोटे या औपचारिक सत्य की बलि देनी पड़े, तो वह न्यायसंगत है। अश्वत्थामा के वध की घोषणा या युधिष्ठिर द्वारा "नरो वा कुंजरो वा" कहना इसी का उदाहरण है।
सतासत संघर्ष हर युग-देश में होता सदा
ईर्ष्या वक्ष द्वेष मन में मनुज ही बोता सदा
भूल नाते मधुर रिश्ते, घात करता स्वार्थवश
मिटाने जा मिटे खुद ही, और फिर रोता सदा
वर्तमान संवेदनशील समय में जब सकल खबर तंत्र सत्ता का साथ खड़ा ही नहीं स्वरथ के हाथों बिका हुआ भी है, असत्य ने सोशल मीडिया, फेक न्यूज़ और भ्रामक प्रचार (प्रोपेगैंडा) का चोगा पहन लिया है, तब कृष्ण का यह दृष्टिकोण हमें सिखाता है कि सत्य की रक्षा के लिए केवल सीधे खड़े रहना पर्याप्त नहीं है, बल्कि कूटनीतिक चातुर्य और रणनीतिक सूझबूझ भी उतनी ही आवश्यक है।
वैश्विक विद्वेष और राजनैतिक टकराव का समाधान
वर्तमान विश्व तीसरे विश्वयुद्ध के मुहाने पर खड़ा प्रतीत होता है। भू-राजनैतिक स्वार्थों, विस्तारवादी नीतियों और वैचारिक कट्टरता ने वैश्विक शांति को छिन्न-भिन्न कर दिया है। राजनीति आज जनसेवा का माध्यम न रहकर केवल सत्ता हथियाने और उसे बनाए रखने का क्रूर खेल बन चुकी है।शांतिदूत कृष्ण की कूटनीति: महाभारत युद्ध से पहले कृष्ण स्वयं शांतिदूत बनकर दुर्योधन की सभा में गए थे। उन्होंने केवल पाँच गाँव माँगकर युद्ध टालने का हरसंभव प्रयास किया। स्पष्ट है कि कृष्ण शांति के प्रबल समर्थक थे। वे युद्ध को अंतिम विकल्प मानते थे। आज की संयुक्त राष्ट्र (UN) जैसी संस्थाओं और वैश्विक नेताओं को कृष्ण की इस शांति-कूटनीति से सीखना चाहिए कि अहंकार को त्यागकर ही संवाद के रास्ते तलाशे जा सकते हैं।
राजनैतिक शुचिता का अभाव: आज राजनीति में सिद्धांतों का मरुस्थलीकरण हो चुका है। कृष्ण ने शिशुपाल की सौ गालियों को क्षमा किया, जो सहिष्णुता की पराकाष्ठा है, किंतु जब पानी सिर से ऊपर गुजर गया, तो सुदर्शन चक्र उठाने में देर नहीं की। यह आज के शासकों के लिए सीख है कि दुष्टता और आतंकवाद के प्रति 'जीरो टॉलरेंस' (शून्य सहनशीलता) की नीति ही लोकहित में है।
तंत्र द्वारा लोक की उपेक्षा: लोकतांत्रिक मूल्यों का क्षरण
आधुनिक लोकतंत्रों में एक बहुत बड़ी विसंगति उभरकर आई है—'तंत्र' (Bureaucracy/Establishment) का मजबूत होना और 'लोक' (Common Man) का हाशिए पर चले जाना। नीतियां बंद कमरों में बनती हैं, जिनका धरातल से कोई जुड़ाव नहीं होता।सखा भाव और लोक-जुड़ाव: कृष्ण राजाओं के राजा थे, द्वारकाधीश थे, लेकिन उनकी पहचान हमेशा गोप-गोपियों, ग्वालों और सुदामा के 'सखा' के रूप में रही। वे सत्ता के शीर्ष पर बैठकर भी समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति के लिए सुलभ थे। सुदामा के आने पर सिंहासन छोड़कर दौड़ना और उनके फटे पैर धोना, शासक और प्रजा के बीच के भेद को समाप्त करने की पराकाष्ठा है।
जयी होकर भी न सत्ता कृष्ण ने चाही कभी
अन्य को राजा बनाया, चाह कुर्सी की न की
हुए जन-मन के महानायक तनिक संशय नहीं-
चाह मन में सिर्फ राधा की रहीं वह भी तजी
लोक-कल्याण सर्वोपरि: कृष्ण का पूरा जीवन 'बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय' को समर्पित था। आज के 'तंत्र' को अपनी संवेदनशीलता वापस पाने के लिए कृष्ण के 'सखा भाव' को अपनाना होगा, जहाँ जनता याचक नहीं, बल्कि सत्ता की वास्तविक साझीदार हो।
युवा वर्ग की दिशाहीनता और मानसिक अवसाद
आज का युवा वर्ग सूचनाओं के विस्फोट, अत्यधिक प्रतिस्पर्धा, एकाकीपन और जीवन के उद्देश्यों की स्पष्टता न होने के कारण गहरे अवसाद (डिप्रेशन) और दिशाहीनता का शिकार है। कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन की जो स्थिति थी, वह आज के आधुनिक युवा की मानसिक स्थिति का सटीक प्रतिबिंब है।विषाद से प्रसाद तक की यात्रा: अर्जुन युद्ध के मैदान में शस्त्र डाल देता है, भ्रमित हो जाता है, उसके हाथ से गांडीव गिर जाता है और वह अवसाद से घिर जाता है (अर्जुन विषाद योग)। कृष्ण उसे डांटते नहीं हैं, न ही उस पर कोई निर्णय थोपते हैं। वे एक कुशल मनोवैज्ञानिक की तरह अर्जुन की शंकाओं का समाधान कर स्वधर्म का सिद्धांत प्रतिपादित करते हैं:
"श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।"
अर्थात दूसरों के देखा-देखी किसी अन्य के रास्ते पर चलने से बेहतर है कि व्यक्ति अपनी प्रकृति (Aptitude) को पहचाने और अपने 'स्वधर्म' का पालन करे। आज का युवा सोशल मीडिया के दिखावे और दूसरों की सफलता से प्रभावित होकर अपनी मौलिकता खो रहा है। कृष्ण का यह उपदेश युवाओं को अपनी आंतरिक क्षमता को पहचानने और मानसिक दृढ़ता प्राप्त करने का अचूक मंत्र प्रदान करता है।
श्रम की अप्रतिष्ठा और कर्म का गौरव
आधुनिक उपभोक्तावादी संस्कृति ने एक नई विसंगति को जन्म दिया है- शारीरिक श्रम को हेय दृष्टि से देखना। आज मानसिक श्रम या चालाकी से धन कमाने वालों को समाज में ऊँचा स्थान मिलता है, जबकि पसीना बहाने वाले श्रमिक, किसान और शिल्पकार उपेक्षित हैं। ऋषि-कृषि संस्कृति के संवाहक: कृष्ण गायों को चराते थे, जिसे 'गोचारण' कहा गया। वे चाहते तो महलों में रह सकते थे, लेकिन उन्होंने श्रम को चुना। महाभारत युद्ध के दौरान, ब्रह्मांड के नायक होने के बावजूद, उन्होंने अर्जुन के रथ के घोड़ों को हाँकने और युद्ध के बाद उनके घावों को धोने (सूत का काम) का कार्य सहर्ष स्वीकार किया। इतना ही नहीं, राजसूय यज्ञ में उन्होंने मेहमानों के जूठे पत्तल उठाने का कार्य अपने जिम्मे लिया। कर्मण्येवाधिकारस्ते: कृष्ण का यह अमर उद्घोष कि "कर्म पर ही तुम्हारा अधिकार है, फल पर नहीं", श्रम की महत्ता को स्थापित करता है। जब तक समाज में शारीरिक श्रम को प्रतिष्ठा नहीं मिलेगी, तब तक एक संतुलित और आत्मनिर्भर समाज का निर्माण असंभव है। कृष्ण श्रम को ही ईश्वर की सच्ची पूजा मानते हैं।
कृष्ण ही शाश्वत समाधान
भगवान श्री कृष्ण का जीवन दर्शन किसी एक युग की सीमा में आबद्ध नहीं है। वे भूत, वर्तमान और भविष्य के शाश्वत सेतु हैं। आज की वैश्विक विसंगतियों, युद्धोन्माद, सामाजिक बिखराव और व्यक्तिगत अवसाद का एकमात्र निदान कृष्ण के सामंजस्यवादी दर्शन में निहित है। वे हमें सिखाते हैं कि जीवन एक संघर्ष है, और इस संघर्ष से भागना नहीं, बल्कि इसमें मुस्कुराते हुए उतरना है। वे अधर्म के विरुद्ध शस्त्र उठाने की प्रेरणा देते हैं, तो बाँसुरी की तान पर प्रेम का साम्राज्य स्थापित करने का मार्ग भी दिखाते हैं। वर्तमान युग की भटकी हुई मानवता को यदि विनाश से बचना है, तो उसे कुरुक्षेत्र के उस रथ की ओर देखना होगा जहाँ योगेश्वर कृष्ण आज भी गीता के अमर संदेश के साथ मानवता का मार्गदर्शन करने के लिए तत्पर खड़े हैं।
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संपर्क : सभापति विश्व वाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१
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