कुल पेज दृश्य

शुक्रवार, 6 नवंबर 2026

शोधालेख 
कृष्ण-दर्शन युगीन विसंगतियाँ और सम कालिक प्रासंगिकता 
आचार्य संजीव वर्मा ''सलिल''
० 
प्रस्तावना: 

    भारतीय वांग्मय में भगवान श्री कृष्ण मात्र एक ऐतिहासिक या पौराणिक पुरुष नहीं हैं, बल्कि वे सोलह कलावातारी पूर्ण पुरुषोत्तम, चेतना के सर्वोच्च शिखर और जीवन के पूर्णत्व के जीवंत विग्रह हैं। आज का मानव इतिहास एक अत्यंत संवेदनशील और संक्रमणकालीन दौर से गुजर रहा है। एक ओर जहाँ विज्ञान और तकनीक ने भौतिक समृद्धि के नए प्रतिमान गढ़े हैं, वहीं दूसरी ओर मानवीय मूल्य, आत्मिक शांति और सामाजिक समरसता का निरंतर क्षरण हुआ है। वर्तमान युग की त्रासदियाँ वैश्विक विद्वेष, राजनैतिक टकराव, युवा वर्ग की दिशाहीनता या व्यवस्था (तंत्र) द्वारा आम जनता (लोक) की उपेक्षा ठीक वैसी ही हैं जैसी द्वापर युग के अवसान काल में विद्यमान थीं। श्री कृष्ण का संपूर्ण जीवन और उनका दर्शन (विशेषकर श्रीमद्भगवद्गीता) किसी एक कालखंड के लिए नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता के लिए हर युग में मार्गदर्शक है।

कृष्ण न द्वापर के लिए जिए-मरे लें मान।  
देश-काल हर युग उन्हें ले अपने हित जान।।  
समकालिक जो मुश्किलें कृष्ण उनके उत्तर आप-
पा सकते हैं कृष्ण में, अगर सकें पहचान।।   



श्री कृष्ण का जीवन दर्शन: विरोधाभासों का अनुपम सामंजस्य: 

    श्री कृष्ण का चरित्र अत्यंत अनूठा है क्योंकि वे जीवन को टुकड़ों में नहीं, बल्कि उसकी संपूर्णता में देखते हैं। वे एक ओर गोकुल में माखन चुराने वाले निश्छल बालक हैं, तो दूसरी ओर कुरुक्षेत्र के मैदान में काल का चक्र घुमाने वाले योगेश्वर हैं। वे राधा के निष्काम प्रेम के आराध्य होते हुए भी रुक्मिणी के सकाम प्रेम के इष्ट, द्रौपदी के सख्य भाव के रक्षक, कुब्जा के तारक और सुदामा के संकट मोचक एक साथ हैं। श्री कृष्ण  दुष्टों के संहारक की नहीं उनके मोक्षकर्ता भी हैं। 

बालक, रक्षक, मारक, तारक नटखट कृष्ण कन्हैया है 
गो पालक, माखन चोरी कर नाचे ताताथैया है 
वेणु बजाए, रास रचाए, व्यसन चुराए लुक-छिपकर 
पल-पल रूप बदलता मनहर, सबका चित्त चुरैया है    

पूर्णत्व के साक्षी : 

    श्री कृष्ण जीवन के किसी भी पक्ष को नकारते नहीं हैं। वे संसार से भागने (वैराग्य) का उपदेश नहीं देते, बल्कि संसार में रहकर, उसके थपेड़ों को झेलते हुए अनासक्त भाव से जीने की कला सिखाते हैं। स्थितप्रज्ञता अर्थात सुख-दुख, जय-पराजय, लाभ-हानि में समभाव रखना ही कृष्ण दर्शन का मूल तत्व है। आज का मनुष्य छोटी-छोटी असफलताओं से टूट जाता है। कृष्ण का दर्शन हमें सिखाता है कि युद्ध केवल मैदान में नहीं, मनुष्य के मन में भी चलता है, और मन के इस युद्ध को वैचारिक स्थिरता (स्थितप्रज्ञता) से ही जीता जा सकता है।

बिना नकारे, सच स्वीकारे, कान्हा तनिक न लज्जित हो 
सच के साथ खड़ा हो हरदम, मगर झूठ से सज्जित हो 
जैसे को तैसा का हामी, विचलित कभी न होता है-
आम बालकों जैसा रहता, महिमा से भी मण्डित हो   

कृष्ण-लीलाएँ: प्रतीकात्मकता और सामाजिक संदेश

    श्री कृष्ण की बाल-लीलाओं से लेकर महाभारत के सूत्रधार बनने तक की प्रत्येक लीला में गहरा सामाजिक और आध्यात्मिक संदेश छिपा है, जिसे समकालीन परिप्रेक्ष्य में समझना अनिवार्य है। 

करे लीला नित्य नटखट, जुड़ें सब जन खुद-ब-खुद 
रोकना चाहें, न रोकें, देखते चुप खुद-ब-खुद
कौन ऊँचा कौन नीचा, नहीं कोई देखता- 
साथ सबके हाथ सबका, देखते सब खुद-ब-खुद

माखन चोरी और सामूहिक चेतना: कृष्ण द्वारा गोप-बालकों के साथ मिलकर माखन चुराना और खाना वास्तव में संसाधनों के केंद्रीकरण के विरुद्ध एक प्रतीकात्मक विद्रोह था। कंस के राज्य में जनता का शोषण कर सारा पोषण (माखन) मथुरा भेजा जा रहा था। कृष्ण ने उसे रोककर स्थानीय बच्चों में वितरित किया। यह वर्तमान के आर्थिक असमानता और पूँजी के विकेंद्रीकरण के सिद्धांत का प्रागैतिहासिक रूप है। माखन चुराने-खाने में जन्मना जाति, छुआछूत या ऊँच-नीच को कोई स्थान न था। यह समाज में समानता लाने का अद्वितीय और सफल प्रयास सिद्ध हुआ। 

कालिया नाग मर्दन: यमुना नदी के जल को प्रदूषित कर उस पर एकाधिकार करने वाले नाग राज्य कालिया का दमन कर कृष्ण ने पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ जल जैसे प्रकृति प्रदूतत और जीवन के लिए अपरिहार्य संसधान पर सार्वजनिक स्वामित्व का संदेश दिया। आज जब वैश्विक पर्यावरण संकट चरम पर है, नदियाँ प्रदूषित हो रही हैं और अगला विश्व युद्ध पानी को लेकर होने की संभावना व्यक्त की जा रही है तब कृष्ण का यह कृत्य हमें प्रकृति के साथ तादात्म्य बिठाने की प्रेरणा देता है।

गोवर्धन पूजा: इंद्र की रूढ़िवादी पूजा को बंद करवाकर गोवर्धन पर्वत (प्रकृति, गाय और कृषि) की पूजा शुरू करवाना इस बात का प्रमाण है कि कृष्ण अंधविश्वास के विरोधी थे। वे प्रत्यक्ष प्रकृति और कर्म की सत्ता को प्रधानता देते थे। यही नहीं वे राज्य और समाज के उन्नति में हर आम नागरिक को श्रेय देने के पक्षधर थे, इसलिए गोवर्धन उठाते समय हर ग्वाले की लाठी लगवाते हैं। 


सत्य और असत्य का शाश्वत संघर्ष

    आज का समाज नैतिक पतन के उस मोड़ पर है जहाँ सत्य और असत्य की परिभाषाएँ धुंधली हो गई हैं। 'सत्य' को सत्ता और सुविधा के अनुसार परिभाषित किया जा रहा है। कुरुक्षेत्र का युद्ध केवल दो परिवारों की लड़ाई नहीं थी, वह 'धर्म' (न्याय, सत्य, कर्तव्य) और 'अधर्म' (अन्याय, असत्य, अहंकार) का महासंग्राम था।सत्य की रक्षा हेतु लचीलापन: कृष्ण रूढ़िवादी या जड़वादी सत्य के पक्षधर नहीं थे। वे जानते थे कि यदि बड़े सत्य (धर्म और मानवता की रक्षा) के लिए किसी छोटे या औपचारिक सत्य की बलि देनी पड़े, तो वह न्यायसंगत है। अश्वत्थामा के वध की घोषणा या युधिष्ठिर द्वारा "नरो वा कुंजरो वा" कहना इसी का उदाहरण है।

सतासत संघर्ष हर युग-देश में होता सदा 
ईर्ष्या वक्ष द्वेष मन में मनुज ही बोता सदा
भूल नाते मधुर रिश्ते, घात करता स्वार्थवश 
मिटाने जा मिटे खुद ही, और फिर रोता सदा  

    वर्तमान संवेदनशील  समय में जब सकल खबर तंत्र सत्ता का साथ खड़ा ही नहीं स्वरथ के हाथों बिका हुआ भी है, असत्य ने सोशल मीडिया, फेक न्यूज़ और भ्रामक प्रचार (प्रोपेगैंडा) का चोगा पहन लिया है, तब कृष्ण का यह दृष्टिकोण हमें सिखाता है कि सत्य की रक्षा के लिए केवल सीधे खड़े रहना पर्याप्त नहीं है, बल्कि कूटनीतिक चातुर्य और रणनीतिक सूझबूझ भी उतनी ही आवश्यक है।

वैश्विक विद्वेष और राजनैतिक टकराव का समाधान

    वर्तमान विश्व तीसरे विश्वयुद्ध के मुहाने पर खड़ा प्रतीत होता है। भू-राजनैतिक स्वार्थों, विस्तारवादी नीतियों और वैचारिक कट्टरता ने वैश्विक शांति को छिन्न-भिन्न कर दिया है। राजनीति आज जनसेवा का माध्यम न रहकर केवल सत्ता हथियाने और उसे बनाए रखने का क्रूर खेल बन चुकी है।शांतिदूत कृष्ण की कूटनीति: महाभारत युद्ध से पहले कृष्ण स्वयं शांतिदूत बनकर दुर्योधन की सभा में गए थे। उन्होंने केवल पाँच गाँव माँगकर युद्ध टालने का हरसंभव प्रयास किया।  स्पष्ट है कि कृष्ण शांति के प्रबल समर्थक थे। वे युद्ध को अंतिम विकल्प मानते थे। आज की संयुक्त राष्ट्र (UN) जैसी संस्थाओं और वैश्विक नेताओं को कृष्ण की इस शांति-कूटनीति से सीखना चाहिए कि अहंकार को त्यागकर ही संवाद के रास्ते तलाशे जा सकते हैं।

    राजनैतिक शुचिता का अभाव: आज राजनीति में सिद्धांतों का मरुस्थलीकरण हो चुका है। कृष्ण ने शिशुपाल की सौ गालियों को क्षमा किया, जो सहिष्णुता की पराकाष्ठा है, किंतु जब पानी सिर से ऊपर गुजर गया, तो सुदर्शन चक्र उठाने में देर नहीं की। यह आज के शासकों के लिए सीख है कि दुष्टता और आतंकवाद के प्रति 'जीरो टॉलरेंस' (शून्य सहनशीलता) की नीति ही लोकहित में है।


तंत्र द्वारा लोक की उपेक्षा: लोकतांत्रिक मूल्यों का क्षरण

    आधुनिक लोकतंत्रों में एक बहुत बड़ी विसंगति उभरकर आई है—'तंत्र' (Bureaucracy/Establishment) का मजबूत होना और 'लोक' (Common Man) का हाशिए पर चले जाना। नीतियां बंद कमरों में बनती हैं, जिनका धरातल से कोई जुड़ाव नहीं होता।सखा भाव और लोक-जुड़ाव: कृष्ण राजाओं के राजा थे, द्वारकाधीश थे, लेकिन उनकी पहचान हमेशा गोप-गोपियों, ग्वालों और सुदामा के 'सखा' के रूप में रही। वे सत्ता के शीर्ष पर बैठकर भी समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति के लिए सुलभ थे। सुदामा के आने पर सिंहासन छोड़कर दौड़ना और उनके फटे पैर धोना, शासक और प्रजा के बीच के भेद को समाप्त करने की पराकाष्ठा है।

जयी होकर भी न सत्ता कृष्ण ने चाही कभी 
अन्य को राजा बनाया, चाह कुर्सी की न की 
हुए जन-मन के महानायक तनिक संशय नहीं- 
चाह मन में सिर्फ राधा की रहीं वह भी तजी 
 
लोक-कल्याण सर्वोपरि: कृष्ण का पूरा जीवन 'बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय' को समर्पित था। आज के 'तंत्र' को अपनी संवेदनशीलता वापस पाने के लिए कृष्ण के 'सखा भाव' को अपनाना होगा, जहाँ जनता याचक नहीं, बल्कि सत्ता की वास्तविक साझीदार हो।


युवा वर्ग की दिशाहीनता और मानसिक अवसाद

    आज का युवा वर्ग सूचनाओं के विस्फोट, अत्यधिक प्रतिस्पर्धा, एकाकीपन और जीवन के उद्देश्यों की स्पष्टता न होने के कारण गहरे अवसाद (डिप्रेशन) और दिशाहीनता का शिकार है। कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन की जो स्थिति थी, वह आज के आधुनिक युवा की मानसिक स्थिति का सटीक प्रतिबिंब है।विषाद से प्रसाद तक की यात्रा: अर्जुन युद्ध के मैदान में शस्त्र डाल देता है, भ्रमित हो जाता है, उसके हाथ से गांडीव गिर जाता है और वह अवसाद से घिर जाता है (अर्जुन विषाद योग)। कृष्ण उसे डांटते नहीं हैं, न ही उस पर कोई निर्णय थोपते हैं। वे एक कुशल मनोवैज्ञानिक की तरह अर्जुन की शंकाओं का समाधान कर स्वधर्म का सिद्धांत प्रतिपादित करते हैं:

"श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।"

    अर्थात दूसरों के देखा-देखी किसी अन्य के रास्ते पर चलने से बेहतर है कि व्यक्ति अपनी प्रकृति (Aptitude) को पहचाने और अपने 'स्वधर्म' का पालन करे। आज का युवा सोशल मीडिया के दिखावे और दूसरों की सफलता से प्रभावित होकर अपनी मौलिकता खो रहा है। कृष्ण का यह उपदेश युवाओं को अपनी आंतरिक क्षमता को पहचानने और मानसिक दृढ़ता प्राप्त करने का अचूक मंत्र प्रदान करता है।

श्रम की अप्रतिष्ठा और कर्म का गौरव

    आधुनिक उपभोक्तावादी संस्कृति ने एक नई विसंगति को जन्म दिया है- शारीरिक श्रम को हेय दृष्टि से देखना। आज मानसिक श्रम या चालाकी से धन कमाने वालों को समाज में ऊँचा स्थान मिलता है, जबकि पसीना बहाने वाले श्रमिक, किसान और शिल्पकार उपेक्षित हैं। ऋषि-कृषि संस्कृति के संवाहक: कृष्ण गायों को चराते थे, जिसे 'गोचारण' कहा गया। वे चाहते तो महलों में रह सकते थे, लेकिन उन्होंने श्रम को चुना। महाभारत युद्ध के दौरान, ब्रह्मांड के नायक होने के बावजूद, उन्होंने अर्जुन के रथ के घोड़ों को हाँकने और युद्ध के बाद उनके घावों को धोने (सूत का काम) का कार्य सहर्ष स्वीकार किया। इतना ही नहीं, राजसूय यज्ञ में उन्होंने मेहमानों के जूठे पत्तल उठाने का कार्य अपने जिम्मे लिया। कर्मण्येवाधिकारस्ते: कृष्ण का यह अमर उद्घोष कि "कर्म पर ही तुम्हारा अधिकार है, फल पर नहीं", श्रम की महत्ता को स्थापित करता है। जब तक समाज में शारीरिक श्रम को प्रतिष्ठा नहीं मिलेगी, तब तक एक संतुलित और आत्मनिर्भर समाज का निर्माण असंभव है। कृष्ण श्रम को ही ईश्वर की सच्ची पूजा मानते हैं।


कृष्ण ही शाश्वत समाधान

    भगवान श्री कृष्ण का जीवन दर्शन किसी एक युग की सीमा में आबद्ध नहीं है। वे भूत, वर्तमान और भविष्य के शाश्वत सेतु हैं। आज की वैश्विक विसंगतियों, युद्धोन्माद, सामाजिक बिखराव और व्यक्तिगत अवसाद का एकमात्र निदान कृष्ण के सामंजस्यवादी दर्शन में निहित है। वे हमें सिखाते हैं कि जीवन एक संघर्ष है, और इस संघर्ष से भागना नहीं, बल्कि इसमें मुस्कुराते हुए उतरना है। वे अधर्म के विरुद्ध शस्त्र उठाने की प्रेरणा देते हैं, तो बाँसुरी की तान पर प्रेम का साम्राज्य स्थापित करने का मार्ग भी दिखाते हैं। वर्तमान युग की भटकी हुई मानवता को यदि विनाश से बचना है, तो उसे कुरुक्षेत्र के उस रथ की ओर देखना होगा जहाँ योगेश्वर कृष्ण आज भी गीता के अमर संदेश के साथ मानवता का मार्गदर्शन करने के लिए तत्पर खड़े हैं।
००० 
संपर्क : सभापति विश्व वाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१ 
वाट्सऐप ९४२५१८३२४४, ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com 

नवंबर ६, दोहा गीत, हाइकु गीत, सोरठा गीत, कृष्णमोहन, अमरकंटक छंद, धन-तेरस, मुक्तक, गजल,

सलिल सृजन नवंबर ६
*
दोहा गीत
धन-तेरस
.
धन-तेरस सच कह रही, धन-ते-रस मत भूल।
तन-मन धन का मूल है, निर्धन जीवन शूल।।
.
माँ या तो धन दे नहीं, या मत लेना छीन।
धन्वंतरि करिए कृपा, बजे चैन की बीन।।
श्रम-कोशिश से धन बने, वह जो दिखती धूल।
धन-तेरस सच कह रही, धन-ते-रस मत भूल।।
.
मिटा सदा जड़-मूल से, रोग न जड़ को छोड़।
आलस जड़ हर व्याधि की, श्रम करने कर होड़।।
कह आ राम! न दे अधिक, हो आराम न शूल।
धन-तेरस सच कह रही, धन-ते-रस मत भूल।।
.
धन श्रम का सम्मान कर, हो जाता है धन्य।
निर्धन का धन राम कह, मत कह दैन्य अनन्य।।
सच्चा धन संतोष कह, दुख को कर निर्मूल।
धन-तेरस सच कह रही, धन-ते-रस मत भूल।।
.
धन कम हो तो कष्ट दे, ज्यादा कर दे भ्रष्ट।
उतना धन दे लक्ष्मी!, मन पाकर हो शिष्ट।।
धन-तेरस सच कह रही, धन-ते-रस मत भूल।।
साधन हो मत साध्य कर, दें मत धन को तूल।।
.
लाए थे बहुमूल्य हम, श्वासें अगिन अमूल्य।
गिनती की बाकी रहीं, जग माने निर्मूल्य।।
धन को सलिल न मानना, नेह नर्मदा कूल।
धन-तेरस सच कह रही, धन-ते-रस मत भूल।।
धनतेरस ६.११.२००२६
०००
हाइकु गीत
धन तेरस
०
धन तेरस / सबसे सबको हो / सुख-संतोष।
रहे हमेशा / तन-मन जीवन / अक्षय कोष।।
.
सबका सुख / हो साध्य सर्व हित / तब त्योहार।
आओ लुटाएँ / पल-पल निर्मल / निश्छल प्यार।।
करिए क्षमा / न शेष रह सके / मन में रोष।
धन तेरस / सबसे सबको हो / सुख-संतोष।।
.
कब किसके / संग-साथ हमेशा / रहता धन?
आकर जाता / दूर न रहकर / बने स्वजन।।
तज घमंड / कर सलिल नम्रता / युत जयघोष।
धन तेरस / सबसे सबको हो / सुख-संतोष।।
.
धन साधन / मत साध्य मानना / पाकर बाँट।
बन कबीर / सब बाँट शोक-सुख / व्यर्थ न छाँट।।
नहीं अन्य के / नित अपने सब / तज दें दोष।
धन तेरस / सबसे सबको हो / सुख-संतोष।।
०००
दोहा सलिला
दोहा झूठ न बोलता
०
दोहा झूठ न बोलता, करें न सत्य बखान।
मनचाहा लेते समझ, मतिविहीन मतिमान।।
.
झूठ बयानों से मिली, जीत कहें सच लोग।
सच झूठे से हारता, लाइलाज है रोग।।
.
झूठ मूठ में झूठ कह, हुआ पराजित कौन? 
सचमुच में सच कह किया, किसने धारण मौन?? 
.
झूठों के सरताज ने, संसद में कर शोर।
सच को बाहर कर दिया, झूठ बोल पुरजोर।।
.
झूठ रत्न सम्मान पा, सच क्यों भाव विभोर? 
सत्य रत्न सम्मान ले, झूठ हुआ चितचोर।।
.
चले नहीं बाजार में, सिक्के खरे, न झूठ।
खोटे सिक्के चल रहे, सच सुनकर मत रूठ।।
.
झूठ गवाही दे रहे, हरिश्चंद्र ले दाम।
सत्य हुआ बाजार में, बिना दाम नीलाम।।
.
सत्ता ने सत सिया को, सुना दिया वनवास।
बिना सिया-सत सियासत, देखें राम उदास।।
.
श्याम बदरिया झूठ की, आच्छादित सच सूर्य।
पवन परीक्षा में विफल, मेघ  निनादित तूर्य।।
६.११.२०२६
००० 
सोरठा गीत
कली रखे यदि शूल, कुसुम वीर हो देश में।
कोई सके न भूल, देख बदनीयत से उसे।।
*
तम का करते अंत, तभी रहें जब साथ मिल।
दीपक बाती तेल, ज्योति न होते जब अलग।।
मार मिलातीं धूल, असुरों को दुर्गा शुभे।
सिंह देता रद हूल, कर गर्जन अरि वक्ष में।।
*
चाह रहा है देश, नारी बदले भूमिका।
धारे धारिणी वेश, शुभ-मंगल कर भूमि का।।
वन हों नदिया कूल, शांति स्वच्छता पा विहग।
नभ-सागर मस्तूल, फहराए निज परों के।।
*
पंचतत्व रख शुद्ध, पंच पर्व हम मनाएँ।
करें अनय से युद्ध, विजय विनय को दिलाएँ।।
सुख सपनों में झूल, समय गँवाएँ व्यर्थ मत।
जमा जमीं में मूल, चलो!छुएँ आकाश हम।।
६-११-२०२१
***
हिन्दी के नये छंद १३
अमरकंटक छंद
विधान-
1. प्रति पंक्ति 7 मात्रा
2. प्रति पंक्ति मात्रा क्रम लघु लघु लघु गुरु लघु लघु
गीत
नरक चौदस
.
मनुज की जय
नरक चौदस
.
चल मिटा तम
मिल मिटा गम
विमल हो मन
नयन हों नम
पुलकती खिल
विहँस चौदस
मनुज की जय
नरक चौदस
.
घट सके दुःख
बढ़ सके सुख
सुरभि गंधित
दमकता मुख
धरणि पर हो
अमर चौदस
मनुज की जय
नरक चौदस
.
विषमता हर
सुसमता वर
दनुजता को
मनुजता कर
तब मने नित
विजय चौदस
मनुज की जय
नरक चौदस
.
मटकना मत
भटकना मत
अगर चोटिल
चटकना मत
नियम-संयम
वरित चौदस
मनुज की जय
नरक चौदस
.
बहक बादल
मुदित मादल
चरण नर्तित
बदन छागल
नरमदा मन
'सलिल' चौदस
मनुज की जय
नरक चौदस
६-११-२०१८
.......
मुक्तक
*
स्नेह का उपहार तो अनमोल है
कौन श्रद्धा-मान सकता तौल है?
भोग प्रभु भी आपसे ही पा रहे
रूप चौदस भावना का घोल है
*
स्नेह पल-पल है लुटाया आपने।
स्नेह को जाएँ कभी मत मापने
सही है मन समंदर है भाव का
इष्ट को भी है झुकाया भाव ने
*
'फूल' अंग्रेजी का मैं, यह जानता
'फूल' हिंदी की कदर पहचानता
इसलिए कलियाँ खिलाता बाग़ में
सुरभि दस दिश हो यही हठ ठानता
*
उसी का आभार जो लिखवा रही
बिना फुरसत प्रेरणा पठवा रही
पढ़ाकर कहती, लिखूँगी आज पढ़
साँस ही मानो गले अटका रही
२९.१०.२०१७
***
हिंदी के नए छंद १२
कृष्णमोहन छन्द
विधान-
1. प्रति पंक्ति 7 मात्रा
2. प्रति पंक्ति मात्रा क्रम गुरु लघु गुरु लघु लघु
गीत
रूप चौदस
.
रूप चौदस
दे सदा जस
.
साफ़ हो तन
साफ़ हो मन
हों सभी खुश
स्वास्थ्य है धन
बो रहा जस
काटता तस
बोलती सच
रूप चौदस.
.
है नहीं धन
तो न निर्धन
हैं नहीं गुण
तो न सज्जन
ईश को भज
आत्म ले कस
मौन तापस
रूप चौदस.
.
बोलना तब
तोलना जब
राज को मत
खोलना अब
पूर्णिमा कह
है न 'मावस
रूप चौदस
.
मैल दे तज
रूप जा सज
सत्य को वर
ईश को भज
हो प्रशंसित
रूप चौदस
.
वासना मर
याचना मर
साथ हो नित
साधना भर
हो न सीमित
हर्ष-पावस
साथ हो नित
रूप चौदस
.......
१८-१०-२०१७
***
कार्यशाला
रचना-प्रतिरचना
*
रचना
ग़ज़ल - प्राण शर्मा
----------
देश में छाएँ न ये बीमारियाँ
लोग कहते हैं जिन्हें गद्दारियाँ
+
ऐसे भी हैं लोग दुनिया में कई
जिनको भाती ही नहीं किलकारियाँ
+
क्या ज़माना है बुराई का कि अब
बच्चों पर भी चल रही हैं आरियाँ
+
राख में ही तोड़ दें दम वो सभी
फैलने पाएँ नहीं चिंगारियाँ
+
`प्राण`तुम इसका कोई उत्तर तो दो
खो गयी हैं अब कहाँ खुद्दारियाँ
+
प्रतिरचना
मुक्तिका - संजीव
*
हैं चलन में आजकल अय्यारियाँ
इसलिए मुरझा रही हैं क्यारियाँ
*
पश्चिमी धुन पर थिरकती है कमर
कौन गाये अब रसीली गारियाँ
*
सूक्ष्म वसनों का चलन ऐसा चला
बदन पर खीचीं गयीं ज्यों धारियाँ
*
कान काटें नरों के बचकर रहो
अब दुधारी हो रही हैं नारियाँ
*
कौन सोचे देश-हित की बात अब
खेलते दल आत्म-हित की पारियाँ
*
***
गीत
*
जीवन की बगिया में
महकाये मोगरा
पल-पल दिन आज का।
*
श्वास-श्वास महक उठे
आस-आस चहक उठे
नयनों से नयन मिलें
कर में कर बहक उठे
प्यासों की अँजुरी में
मुस्काये हरसिंगार
छिन-छिन दिन आज का।
*
रूप देख गमक उठे
चेहरा चुप चमक उठे
वाक् हो अवाक 'सलिल'
शब्द-शब्द गमक उठे
गीतों की मंजरी में
खिलखलाये पारिजात
गिन -गिन दिन आज का।
*
चुप पलाश दहक उठे
महुआ सम बहक उठे
गौरैया मन संझा
कलरव कर चहक उठे
मादक मुस्कानों में
प्रमुदित हो अमलतास
खिल-खिल दिन आज का।
***
मुक्तक
नींद उड़ानेवाले तेरे सपनों में सँग-साथ रहूँ
जो न किसी ने कह पायी हो, मन ही मन वह बात कहूँ
मजा तभी बिन कहे समझ ले, वह जो अब तक अनजाना
कही-सुनी तो आनी-जानी, सोची-समझी बात तहूँ
६-११-२०१६
***
कुण्डलिया
मन से मन रखते मिले, जनगण करें न भेद.
नेता भ्रम फैला रहे, नाहक- है यह खेद..
नाहक है यह खेद, पचा वे हार न पाये
सहनशीलता भूल और पर दोष लगाएं
पोल खुल रही फिर भी सबक न लें जीवन से
गयीं सोनिया उतर ' सलिल' जनता के मन से
६-११-२०१५
***
मुक्तक:
हमको फ़ख़्र आप पर है, हारिए हिम्मत नहीं
दूरियाँ दिल में नहीं, हम एक हैं रखिये यकीं
ज़िन्दगी ज़द्दोज़हद है, जीतना ही है हमें
ख़त्म कर सब फासले, हम एक होंगे है यकीं
६-११-२०१४
***
अनुवाद-अर्थ सहित नासदीय सूक्त (ऋग्वेद, मण्डल १०, १२९ वाँ सूक्त)
सृष्टि उत्पत्ति का रहस्य
*
पश्चिम के वैज्ञानिकों ने आज से कुछ दशक पूर्व बिग बैंग अर्थात्‌ महा विस्फोट के सिद्धांत का प्रतिपादन किया जबकि भारतीयों के पास यह ज्ञान हज़ारों वर्षों पहले से ही था। विज्ञान के अनुसार लगभग १५ अरब वर्ष पूर्व समस्त भौतिक जगत और ऊर्जा एक बिंदु के रूप में थी। इस बिंदु ने धीरे-धीरे फैलना आरंभ किया तो ब्रह्मांड का निर्माण हुआ। यह एक महाविस्फोट (बिग बैंग) की तरह है जो आज भी जारी है। नासदीय सूक्त बताता है कि सृष्टि की उत्पत्ति से पहले सत, असत, रज, अंतरिक्ष कुछ भी नहीं थाऔर उसके परे जो कुछ भी है वह भी नहीं था। न ही मृत्यु थी और ना ही अमृत था। प्रारंभ में तो सिर्फ़ अंधकार में लिपटा हुआ अंधकार ही था। एक प्रकार का अनादि पदार्थ था जिसका कोई रूप नहीं था। तत्पश्चात् इस अनादि पदार्थ से एक महान निरंतर तप से वह रचयिता अर्थात्‌ ईश्वर प्रकट हुआ। रचयिता ने सृष्टि की रचना की कामना की जो कि उत्पत्ति का पहला बीज बना। इस कामना रूपी बीज से चारों ओर अनेकों सूर्य किरणों ने समान ऊर्जा की तरंगे निकली जिन्होंने उस अनादि पदार्थ अर्थात्‌ प्रकृति से मिलकर सृष्टि की रचना की। यह एक दार्शनिक विचार है जिसमें कई प्रतीकों का प्रयोग किया गया है। और यदि सरलता पूर्वक इसे समझने का प्रयास करें तो यह कुछ नहीं होने से कुछ होने की प्रक्रिया कही जा सकती है। केवल ऋग्वेद में ही नहीं अपितु इसके अलावा अनेक भारतीय ग्रंथों में वर्णन है कि सृष्टि का उद्भव शून्य से हुआ है। संपूर्ण सनातन धर्म के जीवन का आधार यही है। सर्व मान्य है कि संपूर्ण सृष्टि का जन्म एक ही सर्वोच्च शक्ति से हुआ है। ‘द गॉड पार्टिकल’ के लेखक डिक थेरेसी ने लिखा है कि भारतीय ब्रह्मांड विज्ञानी पहले थे जिन्होंने पृथ्वी की आयु चार अरब वर्ष से अधिक होने की बात कही थी। आधुनिक ब्रह्मांड विज्ञान और प्राचीन भारतीय ग्रंथों में मिलने वाले वर्णन की समानताएँ केवल संयोग मात्र नहीं है।
०
नासदासींनॊसदासीत्तदानीं नासीद्रजॊ नॊ व्यॊमापरॊ यत् ।
किमावरीव: कुहकस्यशर्मन्नभ: किमासीद्गहनं गभीरम् ॥१॥
असत या सत न था तब, न थे तब व्योम, रज, उससे परे कुछ।
कहाँ था आवरण, था कौन रक्षक, गहन-गंभीर कुछ था या नहीं था।।
Then even nothingness was not, nor existence,
There was no air then, nor the heavens beyond it.
What covered it? Where was it? In whose keeping
Was there then cosmic water, in depths unfathomed?
अर्थ: उस समय अर्थात्‌ सृष्टि की उत्पत्ति से पहले प्रलय दशा में असत् अर्थात्‌ अभावात्मक तत्त्व नहीं था। सत्= भाव तत्त्व भी नहीं था, रजः= स्वर्गलोक मृत्युलोक और पाताल लोक नहीं थे, अन्तरिक्ष नहीं था और उससे परे जो कुछ है वह भी नहीं था, वह आवरण करने वाला तत्त्व कहाँ था और किसके संरक्षण में था। उस समय गहन= कठिनाई से प्रवेश करने योग्य गहरा क्या था, अर्थात्‌ वे सब नहीं थे।
न मृत्युरासीदमृतं न तर्हि न रात्र्या।आन्ह।आसीत् प्रकॆत: ।
आनीदवातं स्वधया तदॆकं तस्माद्धान्यन्नपर: किंचनास ॥२॥
न थी मृत्यु, न अमृत, न रजनी या ऊषा थी।
हवा बिन आप लेता श्वास, न था उससे परे कुछ।।
Then there was neither death nor immortality
nor was there then the torch of night and day.
The One breathed windlessly and self-sustaining.
There was that One then, and there was no other.
अर्थ: उस प्रलय कालिक समय में मृत्यु नहीं थी और अमृत-मृत्यु का अभाव भी नहीं था। रात्रि और दिन का ज्ञान भी नहीं था। उस समय वह ब्रह्म तत्त्व ही केवल प्राण युक्त, क्रिया से शून्य और माया के साथ जुड़ा हुआ एक रूप में विद्यमान था, उस माया सहित ब्रह्म से कुछ भी नहीं था और उस से परे भी कुछ नहीं था।
तम।आअसीत्तमसा गूह्ळमग्रॆ प्रकॆतं सलिलं सर्वमा।इदम् ।
तुच्छॆनाभ्वपिहितं यदासीत्तपसस्तन्महिना जायतैकम् ॥३॥
अँधेरे से अँधेरा ही घिरा था, व्याप्त सर्वत्र था केवल सलिल ही।
'गुप्त' था शून्य, कर तप आप प्रगटा, तत्व वह एक जो निज 'चित्र' बिन था।
At first there was only darkness wrapped in darkness.
All this was only unillumined water.
That One which came to be, enclosed in nothing,
arose at last, born of the power of heat.
अर्थ: सृष्टि उत्पन्न होने से पहले जगत् अन्धकार से आच्छादित था और यह जगत् तमस रूप मूल कारण में विद्यमान था। आज्ञायमान यह सम्पूर्ण जगत् सलिल (जल) रूप में था। उस समय कार्य और कारण दोनों मिले हुए थे। यह जगत् व्यापक एवं निम्न स्तरीय अभाव रूप अज्ञान से आच्छादित था। इसीलिए कारण के साथ कार्य एकरूप होकर यह जगत् ईश्वर के संकल्प और तप की महिमा से उत्पन्न हुआ।
कामस्तदग्रॆ समवर्तताधि मनसॊ रॆत: प्रथमं यदासीत् ।
सतॊबन्धुमसति निरविन्दन्हृदि प्रतीष्या कवयॊ मनीषा ॥४॥
हुई इच्छा मनस में वीर्यवत तब, सृष्टि ने चित्र या आकार पाया।
सत्य जो असत में था 'गुप्त' उसको, गहन चिंतन से कवि ने खोज पाया।।
In the beginning desire descended on it -
that was the primal seed, born of the mind.
The sages who have searched their hearts with wisdom
know that which is kin to that which is not.
अर्थ: सृष्टि की उत्पत्ति होने के समय सब से पहले काम (सृष्टि रचना की इच्छा शक्ति) उत्पन्न हुई, जो परमेश्वर के मन में पहला बीज रूप कारण हुआ। भौतिक रूप से विद्यमान जगत् के बन्धन-कामरूप कारण को ऋषियों ने चिंतन कर भाव से विलक्षण अभाव में खोज लिया।
तिरश्चीनॊ विततॊ रश्मीरॆषामध: स्विदासी ३ दुपरिस्विदासीत् ।
रॆतॊधा।आसन्महिमान् ।आसन्त्स्वधा ।आवस्तात् प्रयति: परस्तात् ॥५॥
उजाला ज्ञान का तिरछी किरण सम, व्याप्त सर्वत्र ऊपर या कि नीचे।
सृष्टि कारण प्रकृति जड़ पुरुष चेतन, भोग्य-भोक्ता रहे नीचे व ऊपर।।
And they have stretched their cord across the void,
and know what was above, and what below.
Seminal powers made fertile mighty forces.
Below was strength, and over it was impulse.
अर्थ: सृष्टि बीज-कारण में सूर्य-किरणों के समान बहुत व्यापकता थी। यह सबसे पहले तिरछा था या मध्य में या अन्त में? वह तत्त्व नीचे विद्यमान था या ऊपर? वह सर्वत्र समान भाव से भाव उत्पन्न था इस उत्पन्न जगत् में कुछ पदार्थ बीज रूप कर्म को धारण करने वाले जीव रूप में थे और कुछ तत्त्व आकाशादि महान् रूप में प्रकृति रूप थे; स्वधा=भोग्य पदार्थ निम्नस्तर के होते हैं और भोक्ता पदार्थ उत्कृष्टता से परिपूर्ण के।
कॊ ।आद्धा वॆद क‌।इह प्रवॊचत् कुत ।आअजाता कुत ।इयं विसृष्टि: ।
अर्वाग्दॆवा ।आस्य विसर्जनॆनाथाकॊ वॆद यत ।आबभूव ॥६॥
ज्ञात किसको, कौन कह सकता कि कैसे सृष्टि की उत्पत्ति होती।
देव जन्मे बाद में, वे भी न जानें, कौन-कैसे जान सकता क्या हुआ कब।।
But, after all, who knows, and who can say
Whence it all came, and how creation happened?
the gods themselves are later than creation,
so who knows truly whence it has arisen?
अर्थ: कौन इसे वास्तविक रूप से जानता है और कौन इस लोक में सृष्टि के उत्पन्न होने का विवरण बता सकता है कि यह विविध प्रकार की सृष्टि किस उपादान कारण से और किस निमित्त कारण से सब ओर से उत्पन्न हुई। देवता भी इस विविध प्रकार की सृष्टि उत्पन्न होने से बाद के हैं। देवगण भी अपने से पहले की बात नहीं बता सकते इसलिए कौन मनुष्य जानता है किस कारण यह सारा संसार उत्पन्न हुआ।
इयं विसृष्टिर्यत ।आबभूव यदि वा दधॆ यदि वा न ।
यॊ ।आस्याध्यक्ष: परमॆ व्यॊमन्त्सॊ आंग वॆद यदि वा न वॆद ॥७॥
बनी यह सृष्टि कैसे-कहाँ से, कब, कौन जाने?
'परम प्रभु' करें धारण, मात्र वे जानें, न जानें।।
Whence all creation had its origin,
he, whether he fashioned it or whether he did not,
he, who surveys it all from highest heaven,
he knows - or maybe even he does not know. RV 10.130
अर्थ: यह विविध प्रकार की सृष्टि जिस प्रकार के उपादान और निमित्त कारण से उत्पन्न हुई इसका मुख्य कारण है ईश्वर के द्वारा इसे धारण करना। इसके अतिरिक्त अन्य कोई धारण नहीं कर सकता। इस सृष्टि का जो स्वामी ईश्वर है, अपने प्रकाश या आनंद स्वरूप में प्रतिष्ठित है। हेवह आनंद स्वरूप परमात्मा ही इस विषय को जानता है उस के अतिरिक्त (इस सृष्टि उत्पत्ति तत्त्व को) कोई नहीं जानता है।
The Nasadiya Sukta (after the incipit ná ásat "not the non-existent") also known as the Hymn of Creation is the 129th hymn of the 10th Mandala of the Rigveda (10:129). It is concerned with cosmology and the origin of the universe
***
दोहा
जड़ पकड़े चेतन तजे, हो खयाल या माल
'सलिल' खलिश आनंद दे, झूमो दे-दे ताल
यमकीय दोहा
फेस न करते फेस को, छिपते फिरते नित्य
बुक न करें बुक फुकटिया, पाठक 'सलिल' अनित्य
६-११-२०१३
***

गुरुवार, 5 नवंबर 2026

नवंबर ५, ग़ज़ल, हाइकु गीत, बारहमासा, सरस्वती, लघुकथा, भूगोलीय मुक्तक, नर्मदा, नवगीत

सलिल सृजन नवंबर ५
०
दोहा गीत 
०  
नभ आच्छादित नीलिमा, जब तब ही हो भोर। 
अधर हँसें तो लालिमा, प्रगटे करे विभोर।। 
. 
''अमिय'' पिलाकर सृष्टि को, देतीं जीवन दान। 
''युगे युगे शिशुपाल'' रच, पातीं  नित सम्मान।। 
''नैरंतर्य''न एक पल, चुप होता है शोर। 
नभ आच्छादित नीलिमा, जब तब ही हो भोर।। 
. 
''लॉर्ड कृष्ण स्पीक्स'' ट्रुथ, डू यू फॉलो फ्रेंड्स। 
डू ड्यूटी ऑनेस्टली, इफ नॉट एंप्टी हैंडस।। 
बी सैटिस्फाइड 'सलिल', डोंट आस्क फॉर मोर। 
नभ आच्छादित नीलिमा, जब तब ही हो भोर।। 
. 
जन-मन-रंजन हित सृजन, जीवन का पाथेय। 
मन मंथन चिंतन सतत, करो कहें जसुदेय।। 
शत वर्षी जीवन मिले, ईश्वर से उपहार। 
नभ आच्छादित नीलिमा, जब तब ही हो भोर।
००० 
ग़ज़ल
अवकाश
.
आस चाहे श्वास से अवकाश।
श्वास माँगे आस से आकाश।।
.
मोह-माया से न होती मुक्ति।
स्नेह ही संबंध का शुचि पाश।।
.
मैं न तू, हम हो रहें यदि संग।
हो नहीं अपनत्व का तब नाश।।
.
हाथ में हैं हाथ, मन भी साथ।
हो विधाता संगिनी का काश।।
.
जेन जी बदलाव लाए शुभ,
फेंटती बदलाव के नित ताश।।
.
हो रही सत्ता न जन के संग।
ढो रहा जनतंत्र अपनी लाश।।
.
"सलिल" जो बदरंग चाल-चरित्र
कर न दे क्यों आज पर्दाफाश।।
०००
हाइकु गीत
सुनामी 
०
सियासत से / नफ़रत की सुनामी / आई औ' छाई
.
मैं-तुम हम / मिलकर न रहे / हुई सुनामी।
सुनामी आई / शहरी जीवन में / हुई अनामी।।
बगावत ही / आंदोलन की सुनामी / है न पराई
.
अवमूल्यन / सुनामी से मूल्यों का / जानें न जानें
दोषी छिपा है/ हमारे ही अंदर / मानें न मानें 
जेन जी हमें / सुनामी से बचाती / हो पहुनाई
.
घबराता है / शासन-प्रशासन / है असुरक्षा
किससे कहें / सुनामी से भीतर है / न्याय व्यवस्था
सुनामी घटे / बदलावी गुहार / गूँजी है भाई
५.११.२०२६
०००

पूर्णिका
.
आज तन्हा शोर है बातें करो
लगावट पुरजोर है बातें करो
.
दिल गरेबां चाक दिल का कर रहा
बनावट शहजोर है बातें करो
.
दोस्ती भी फेसबुक पर हो रही
नसीहत भरपूर है बातें करो
.
मुरझ नीलोफर न जाए ध्यान दो
फजीहत घनघोर है बातें करो
.
वर्ल्ड कप ले आईं हैं लड़ बेटियाँ
बगावत की भोर है बातें करो
.
कान हैं दीवार के कुछ मत कहो
सखावत कमजोर हैं बातें करो
.
कौन है संजीव मुर्दे पुरस्कृत
इनायत सरकार की बातें करो
५.११.२०२५
०००
बारहमासा : सांसारिक और आध्यात्मिक मिलन-विरह का काव्य
वस्तुतः मानव का प्रकृति के साथ बुनियादी सम्बन्ध का भारतीय दृष्टिकोण विश्व- प्रसिद्ध है। यही सम्बन्ध हमारे देश की काव्यकला, चित्रकला, मूर्तिकला और संगीत आदि ललित कलाओं में परिलक्षित होता है। प्रकृति के नैसर्गिक वातावरण में रहते हुए हमारे भविष्यदर्शी ऋषि-मुनियों ने प्रतिदिन होने वाले उषाः काल, संध्या, रात्रि, प्रकाश और अंधकार आदि प्राकृतिक उपादानों की शाश्वत लय का गहन अध्ययन किया। सतत चिंतन, मनन और सूक्ष्म निरीक्षण द्वारा उन्होंने जाना कि धरती- आकाश, सूर्य-चन्द्रमा, ग्रह-नक्षत्र, प्रकृति- वनस्पति आदि सभी का आपसी तारतम्य है और ये सभी एक लय से बंधे हुए हैं। इस तरह हमारे जागरूक और सूक्ष्मदर्शी मनीषियों ने कुदरत की दैनिक लय और ऋतु परिवर्तन को वार्षिक चक्र में परिवर्तित कर दिया । धीरे-धीरे निश्चित व शुद्ध रूप में ऋतुओं का आध्यात्मिक व दार्शनिक महत्त्व और कार्यप्रणाली की भौतिक स्थितिके लक्षण और आध्यात्मिक दर्शन की जानकारी विदित हुई । वर्ष के बारह महीनों में सभी ऋतुएँ नियमित बारी-बारी से आ जाती हैं। इन सभी ऋतुओं का अपनी-अपनी जगह महत्त्व है। इन सभी ऋतुओं का वर्णन कविता, साहित्य व ललित कलाओं में कितने प्राचीन काल से हो रहा है।
बारहमासा (पंजाबी में बारहमाहा) मूलतः विरह प्रधान लोकसंगीत है। वह पद्य या गीत जिसमें बारह महीनों की प्राकृतिक विशेषताओं का वर्णन किसी विरही या विरहनी के मुँह से कराया गया हो। मलिक मुहम्मद जायसी द्वारा रचित पद्मावत तथा बीसल देव रासो में सबसे पहले बारहमासा मिलता है। वर्ष भर के बारह माहों में नायक-नायिका की शृंगारिक विरह एवं मिलन की क्रियाओं के चित्रण को बारहमासा कहा जाता है। श्रावण मास में हरे-भरे वातावरण में नायक-नायिका के काम-भावों को वर्षा के भींगते हुए रूपों में, ग्रीष्म के वैशाख एवं ज्येष्ठ मास की गर्मी में पंखों से नायिका को हवा करते हुए नायक-नायिकाओं के स्वरूप आदि उल्लेखनीय है। जब किसी स्त्री का पति परदेश चला जाता है और वह दुखी मन से अपने सखी को बारह महीने की चर्चा करती हुई कहती है कि पति के बिना हर मौसम व्यर्थ है। इस गीत में वह अपनी दशा को हर महीने की विशेषता के साथ पिरोकर रखती है। ऐतिहासिक दृष्टि से बारहमासा, संस्कृत साहित्य के षडऋतु वर्णन की राह का काव्य है।कालिदास का ऋतुसंहार षडऋतुवर्णन ही है। हिन्दी में मलिक मोहम्मद जायसी कृत पद्मावत में 'नागमती वियोग-वर्णन' बारहमासा का प्रसिद्ध उदाहरण है।
अगहन दिवस घटा निसि बाढ़ी। दूभर रैनि जाइ किमि काढ़ी॥
अब यहि बिरह दिवस भा राती। जरौं बिरह जस दीपक बाती॥
काँपै हिया जनावै सीऊ। तो पै जाइ होइ सँग पीऊ॥
घर-घर चीर रचे सब का। मोर रूप रंग लेइगा ना॥
पलटि न बहुरा गा जो बिछाई। अबँ फिरै फिरै रँग सोई॥
बज्र-अगिनि बिरहिनि हिय जारा। सुलुगि-सुलुगि दगधै होइ छारा॥
यह दु:ख-दगध न जानै कंतू। जोबन जनम करै भसमंतू॥
पिउ सों कहेहु संदेसडा हे भौरा! हे काग!
जो घनि बिरहै जरि मुई तेहिक धुवाँ हम्ह लाग॥
पूस जाड थर-थर तन काँपा। सूरुज जाइ लंकदिसि चाँपा॥
बिरह बाढ दारुन भा सीऊ। कँपि-कँपि मरौं लेइ-हरि जीऊ ॥
कंत कहा लागौ ओहि हियरे। पंथ अपार सूझ नहिं नियरे॥
सौंर सपेती आवै जूडी। जानहु सेज हिवंचल बूडी॥
चकई निसि बिछुरै दिन मिला। हौं दिन रात बिरह कोकिला॥
रैनि अकेलि साथ नहिं सखी। कैसे जियै बिछोही पँखी॥
बिरह सचान भयउ तन जाडा। जियत खाइ और मुए न छाँडा॥
रकत ढुरा माँसू गरा हाड भएउ सब संख।
धनि सारस होइ ररि मुई आई समेटहु पंख॥
लागेउ माघ परै अब पाला। बिरहा काल भएउ जड काला॥
पहल-पहल तन रुई जो झाँपै। हहरि-हहरि अधिकौ हिय काँपै॥
नैन चुवहिं जस माहुटनीरू। तेहि जल अंग लाग सर-चीरू॥
टप-टप बूँद परहिं जस ओला। बिरह पवन होई मारै झोला॥
केहिक सिंगार को पहिरु पटोरा? गीउ न हार रही होई होरा॥
तुम बिनु काँपौ धनि हिया तन तिनउर-भा डोल।
तेहि पर बिरह जराई कै चहै उडावा झोल॥
फागुन पवन झकोरा बहा। चौगुन सीउ जाई नहिं सहा॥
तन जस पियर पात भा मोरा। तेहि पर बिरह देइ झझकोरा॥
परिवर झरहि झरहिं बन ढाँखा। भई ओनंत फूलि फरि साखा॥
करहिं बनसपति हिये हुलासू। मो कह भा जग दून उदासू।
फागु करहिं सब चाँचरि जोरी। मोहि तन लाइ दीन्हि जस होरी॥
जौ पै पीउ जरत अस पावा। जरत मरत मोहिं रोष न आवा॥
राति-दिवस बस यह जिउ मोरे। लगौं निहोर कंत अब तोरे॥
यह तन जारौं छार कै कहौ कि "पवन उडाउ।
मकु तेहि मारग उडि पैरों कंत धरैं जहँ पाँउ॥
*
बारहमासा- तुलसी साहब
सत सावन बरषा भई, सुरत बही गंगधार।
गगन गली गरजत चली, उतरी भौजल पार॥
भादौं भजन बिचारिया, शब्दहि सुरत मिलाप।
आप अपनपौ लख पड़े, छूटे छल बल पाप॥
कुसल क्वार सतसंग में, रंग रँगो सतनाम।
और काम आवें नहीं, तिरिया सुत धन धाम॥
कातिक करतब जब बने, मन इन्द्री सुख त्याग।
भोग भरम भवरस तजै, छूटै तब लव लाग॥
अगहन अमी रस बस रहौ, अमृत चुवत अपार।
पाँइ परसि गुरु को लखौ, होय परम पद पार॥
पूस ओस जल बुंद ज्यों, बिनसत बदन विचार।
तन बिनसे पावे नहीं, नर तन दुर्लभ छार॥
माह महल पिया को लखो, चखो अमर रस सार।
वार पार पद पेखिया, सत्त सुरत की लार॥
फिर फागुन सुन में तको, शब्दा होत रसाल।
निरख लखौ दुरबीन से, ज्यों मत मीन निहाल॥
चैत चेत जग झूठ है, मत भरमो भव जाल।
काल हाल सिर पर खड़ा, छूटे तन धन माल॥
सुनो साख बैसाख की, भाषि गुरुन गति गाय।
सब संतन मत की कहूँ, बूझें सत मत पाय॥
जबर जेठ जग रीति है, प्रीति परस रस जान।
आन बात बस ना रहौ, सब मति गति पहिचान॥
जो असाढ़ अरजी करौ, धरो संत श्रुति ध्यान।
ज्ञान मान मति छांड़ के, बूझौ अकथ अनाम॥
बारह मास मत भापिया, जानें संत सुजान।
तुलसिदास विधि सब कही, छूटै चारौ खान॥
सत्त यानी सत साहेब (तुलसी साहब) फ़रमाते हैं कि सावन में वर्षा होती है और सुरत की धार गंगा की धार की तरह गरजती हुई गगन की गली की ओर चलती है और भव जल के पार पहुँचती है। भादों का महीना भजन में लगने का जिससे सुरत अपने पिया से मिलती है और अपने रूप को लखती है। सब छल बल और पाप नष्ट हो जाते हैं। अश्विन के महीने में जीव का भला इसी में है कि सतसंग करे और सत्तनाम के रंग में रंग जावे। सत्तनाम के अलावा और कोई जैसे तिरिया, सुत, धन-धाम इत्यादि काम नहीं आएगा। इनमें नहीं फँसना चाहिए। कार्तिक के महीने में इसका काम पूरा होगा, जब यह मन और इंद्रियों के सुखों का परित्याग कर देगा। जब यह दुनिया के भरम और रस को छोड़ेगा तब इसकी संसार की लाग छूटेगी। अगहन में अमृत की अपार धार टपक रही है। उसके आनंद में मगन रहो। गुरु के दर्शन पाकर और चरण स्पर्श कर भवसागर के पार परम पद में पहुँचोगे। पूस मास में इस बात को समझो कि शरीर पानी के ओले की तरह नाश होने वाला है। जब तन नाश हो जाएगा तो अपना उद्देश्य कैसे पाओगे? यह नर शरीर जो अति दुर्लभ है, वृथा बरबाद जाएगा। माघ में पिया के महल को लखो और सच्चा अमर आनंद प्राप्त करो। तब तुम्हें सुरत से वह देश जो भवसागर के पार है, दिखलाई पड़ेगा। फिर फागुन मास में सुन्न में पहुँचकर उसे लखो जहाँ मधुर शब्द हो रहा है। दूरबीन से उसको निरखो और जैसे मछली पानी में मगन होती है उस तरह मगन होओ। चैत के महीने में चेतो और समझो कि यह जगत झूठा है। इसके जाल में मत फँसो और मत भरमो। काल तुम्हारे सिर पर घात करने को खड़ा है और एक दिन तुम्हारा तन और धन माल सब छूट जाएगा। बैसाख में जीवों की साख का हाल सुनो जो संत दया करके फ़रमाते हैं। मैं सब संतों के मत का वर्णन करता हूँ। अगर कोई संत मत को धारण करे तो वह मेरी बात समझ सकता है। जगत का हाल जेठ महीने की तरह तपन देने वाला और दुखदाई है। तुम इस बात को जानो कि शब्द के परस से प्रेम का सुख प्राप्त होता है। अन्य बातों के वशीभूत मत होओ और सत्त मत की गति को पहचानो यानी संत मत को बूझो। असाढ़ महीने में प्रार्थना करो और सुरत से संतों का ध्यान करो। वाचक ज्ञान में अहंकार की मति छोड़कर अकथ और अनाम मालिक को बूझो। मैंने जो कुछ बारहमास का वर्णन किया है उसे संत जानते हैं। तुलसी साहब फ़रमाते हैं कि मैंने सब विधि बयान की है। उसके अनुसार जो चले, उसका चारों खान में भरमना छूट जाएगा।
***
रुकें और दूसरों के बारे में सोचें
"कौन बनेगा करोड़पति" के एक एपिसोड में, "फास्टेस्ट फिंगर" राउंड में सबसे तेज जवाब देकर नीरज सक्सेना ने हॉट सीट पर जगह बनाई। वह बहुत शांति से बैठे रहे, न चिल्लाए, न नाचे, न रोए, न हाथ उठाए और न ही अमिताभ को गले लगाया। नीरज एक वैज्ञानिक, पी-एच. डी., कोलकाता में एक विश्वविद्यालय के कुलपति हैं। उनका व्यक्तित्व सरल और सौम्य है। उन्होंने खुद को सौभाग्यशाली माना कि उन्हें डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम के साथ काम करने का अवसर मिला। उन्होंने बताया कि शुरू में वे केवल खुद के बारे में सोचते थे, लेकिन कलाम के प्रभाव में उन्होंने दूसरों और राष्ट्र के बारे में भी सोचना शुरू किया।
नीरज ने खेलते हुए एक बार ऑडियंस पोल का उपयोग किया, लेकिन उनके पास "डबल डिप" लाइफलाइन होने के कारण उसे दोबारा इस्तेमाल करने का मौका मिला। उन्होंने सभी सवालों का आसानी से जवाब दिया। उनकी बुद्धिमत्ता प्रभावित करने वाली थी। उन्होंने ₹ ३,२०,००० और इसके बराबर बोनस राशि जीती, फिर एक ब्रेक हुआ। ब्रेक के बाद, अमिताभ ने घोषणा की, "आइए आगे बढ़ते हैं, डॉक्टर साहब। यह रहा ग्यारहवाँ सवाल..." तभी नीरज ने कहा, "सर, मैं क्विट करना चाहूँगा।" अमिताभ चौंक गए। इतना अच्छा खेल, तीन लाइफलाइन बची हुईं, एक करोड़ रुपए जीतने का अच्छा मौका , फिर भी नीरज खेल छोड़ रहे थे? अमिताभ ने कारण पूछते हुए कहा- ऐसा पहले कभी नहीं हुआ।
नीरज ने शांतिपूर्वक उत्तर दिया, "अन्य खिलाड़ी इंतजार कर रहे हैं और वे मुझसे छोटे हैं। उन्हें भी एक मौका मिलना चाहिए। मैंने पहले ही काफी पैसा जीत लिया है। मुझे लगता है 'जो मेरे पास है, वह पर्याप्त है।' मुझे और की चाह नहीं है।" अमिताभ स्तब्ध रह गए, और कुछ समय के लिए सन्नाटा छा गया। फिर सभी खड़े होकर उनके लिए लंबे समय तक तालियाँ बजाते रहे। अमिताभ ने कहा- "आज हमने बहुत कुछ सीखा। ऐसा व्यक्ति दुर्लभ होता है।'' सच कहूँ तो, पहली बार मैंने किसी को ऐसे मौके के सामने देखा है, जो दूसरों को मौका देने और जो उसके पास है उसे पर्याप्त मानने की सोच रखता है। मैंने उन्हें मन ही मन सलाम किया।
आज के समय में लोग केवल पैसे के पीछे भाग रहे हैं। चाहे जितना भी कमा लें, संतोष नहीं मिलता और लालच कभी खत्म नहीं होता। वे पैसे के पीछे परिवार, नींद, खुशी, प्यार, और दोस्ती खो रहे हैं। ऐसे समय में, डॉ. नीरज सक्सेना जैसे लोग एक याद दिलानेवाले बनकर आते हैं। इस दौर में संतुष्ट और निस्वार्थ लोग मिलना कठिन है। नीरज के खेल छोड़ने के बाद, एक लड़की ने हॉट सीट पर जगह बनाई और अपनी कहानी साझा की: "मेरे पिता ने हमें, मेरी माँ सहित, सिर्फ इसलिए घर से निकाल दिया क्योंकि हम तीन बेटियाँ हैं। अब हम एक अनाथालय में रहते हैं..."
अगर नीरज ने खेल न छोड़ा होता, तो आखिरी दिन होने के कारण किसी और को मौका नहीं मिलता। उनके त्याग के कारण इस गरीब लड़की को कुछ पैसे कमाने का अवसर मिला। आज के समय में लोग अपनी विरासत में से एक पैसा भी छोड़ने को तैयार नहीं होते। हम संपत्ति के लिए झगड़े और यहां तक कि हत्याएं भी देखते हैं। स्वार्थ का बोलबाला है। लेकिन यह उदाहरण एक अपवाद है। भगवान नीरज जैसे लोगों में निवास करते हैं, जो दूसरों और देश के बारे में सोचते हैं।
***
● मधुकामिनी के पौधे को ६-७ घंटे धूप की आवश्यकता होती है।
● मधुकामिनी को अच्छी जल निकासी वाली मिट्टी में लगाए, पानी बिल्कुल एकत्र न हो। खेत की मिट्टी ५०%+ वर्मीकम्पोस्ट/ गोबर की खाद ३०% + बालू/ कोकोपीट २०%, एक मुट्ठी नीम खली, एक चम्मच बोनमील/राॅक फास्फेट और १-२ चम्मच जाइम (zyme) मिलाएँ।
● मधुकामिनी मार्च-अप्रैल से लेकर अक्टूबर-नवम्बर तक फूलती है। फूल खिलकर सूख जाए तो उसके टिप्स काट दें, इससे नई शाखाएँ और अधिक फूल निकलते हैं।
● फूल खिल चूकने के बाद मार्च-अप्रैल और बरसात में इसकी फुनगियाँ अलग (सेमी-हार्ड प्रूनिंग) कर दें, इससे पौधा सघन बनकर फूल ज्यादा आते हैं। दिसंबर-फरवरी तक डोरमेंसी पीरियड (सुप्तावस्था) में मधुकामिनी की प्रूनिंग न करें, न ही खाद दें।
● मधुकामिनी फूलने के लिए पोटैशियम रिच फर्टिलाइजर (आर्गेनिक फर्टिलाइजर: केले के छिलके, प्याज के छिलके और उपयोग के बाद धोई हुई चायपत्ती को एक लीटर पानी में डालकर ३-४ दिन तक सड़ने (डिकम्पोस्ट होने) के बाद छानकर २ लीटर पानी मिलाकर, हर १५ दिन बाद पौधों में डालें) या केमिकल फर्टिलाइजर( पोटेशियम नाइट्रेट, म्यूरेट ऑफ़ पोटाश या N:P:K ०:५२:३४ की २ ग्राम/ लीटर मात्रा पानी में मिलाकर पौधे की पत्तियों पर छिड़कें। कुछ समय बाद आपके मधुकामिनी में फूल आना शुरू हो जाएंगे।
● साल में दो बार मार्च-अप्रैल और सितंबर-अक्टूबर में सरसों की खली का लिक्विड फर्टिलाइजर (१०० ग्राम सरसों की खली १ लीटर पानी में अच्छे से मिलाकर ४-५ दिन सड़ने दें, तैयार घोल को १० लीटर पानी में मिलाकर पौधे की मिट्टी में डालें। ८-१० दिनों में आपके पौधे में कोंपलें और कलियाँ आने लगेंगी।
***
मुक्तक
हो जिनका कुल श्रेष्ठ, बाँधते संबंधों के बंध
हिलमिल रहते साथ, निभाते नातों के अनुबंध
सत्य सनातन प्रीति पुरातन, सदा साध्य हो उनको-
राज करें राजेन्द्र सदृश, तोड़ें कुरीति-तटबंध
५.११.२०२४
***
ॐ
हे हंसवाहिनी ज्ञानदायिनी, अम्ब विमल मति दे......
हे हंसवाहिनी ज्ञानदायिनी
अम्ब विमल मति दे।
अम्ब विमल मति दे ।।
जग सिरमौर बनाएँ भारत,
वह बल विक्रम दे।
वह बल विक्रम दे ।।
हे हंसवाहिनी ज्ञानदायिनी
अम्ब विमल मति दे। अम्ब विमल मति दे ।।१।।
साहस शील हृदय में भर दे,
जीवन त्याग-तपोमय कर दे,
संयम सत्य स्नेह का वर दे,
स्वाभिमान भर दे।
स्वाभिमान भर दे ।।२।।
हे हंसवाहिनी ज्ञानदायिनी
अम्ब विमल मति दे।
अम्ब विमल मति दे ।।
लव, कुश, ध्रुव, प्रहलाद बनें हम
मानवता का त्रास हरें हम,
सीता, सावित्री, दुर्गा माँ,
फिर घर-घर भर दे।
फिर घर-घर भर दे ।।३।।
हे हंसवाहिनी ज्ञानदायिनी
अम्ब विमल मति दे।
अम्ब विमल मति दे ।।
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
***
लघुकथा
मुस्कुराहट
*
साहित्यकारों की गोष्ठी में अखबारों तथा अंतर्जाल पर नकारात्मक समाचारों के बाहुल्य पर चिंता व्यक्त की गई। हर अखबार और चैनल की वैचारिक प्रतिबद्धता को स्वतंत्र चेतना हेतु घातक बताते हुए सभी विचारधाराओं और असहमत जनों के प्रति सहिष्णुता पर बल दिया गया।
नेताओं पर अपने विचारों के पिंजरे में कैद रहने की प्रवृत्ति की कटु आलोचना करते हुए, विविध विचारों के समन्वय पर बल दिया गया।
एक साहित्यकार ने पटल पर कुछ अन्य साहित्यकारों द्वारा भिन्न विधा संबंधी शंका-समाधान पर प्रश्न उठाते हुए निंदा प्रस्ताव प्रस्तुत कर दिया। प्रश्नकर्ता कहता ही रह गया कि एक विधा मुख्य होते हुए भी भिन्न विधाओं की चर्चा करना, जानकारी लेना-देना अपराध नहीं है। सब विधाएँ एक-दूसरे की पूरक हैं किंतु आपत्तिकर्ता शांत होने के स्थान पर अधिकाधिक उग्र होते गए। विवश संयोजक ने शांति स्थापित करने हेतु एक को छोड़कर अन्य विधाओं को प्रतिबंधित कर दिया।
कोने में रखी, मकड़जाल में कैद सरस्वती प्रतिमा के अधरों पर विचार और आचार के विरोधाभास को देख, झलक रही थी व्यंग्यपरक मुस्कुराहट।
५-११-२०१९
***
भूगोलीय मुक्तक
*
धरती गोल-गोल हैं, बातें धत्तेरे की।
वादे-पर्वत पोले हैं, घातें धत्तेरे की।।
लोकहितों की नदिया, करे सियासत गंदी
अमावसी पूनम की रातें धत्तेरे की।।
*
आसमान में ग्रह-उपग्रह करते हैं दंगा।
बने नवग्रह-पति जो नाचे होकर नंगा।।
दावानल-बड़वानल पक्ष-विपक्ष बने हैं-
भाटा-ज्वार समुद-संसद में लेते पंगा।।
*
पत्रकारिता भूकंपी सनसनी बन गई।
ज्वालामुखी सियासत जनता झुलस-भुन गई।।
धूमकेतु बोफोर्स-रफाल न पिंड छूटता-
धर्म-ध्वजा झुक काम-लोभ के पंक सन गई।।
*
महासागरी तूफानों सा जनाक्रोश है।
आइसबर्गों सम पिघलेगा किसे होश है?
दिग-दिगंत काँपेंगे, जब प्रकृति रौंदेगी-
तिनके सम मिट जाएगा जो उठा जोश है।।
*
सूर्य-चंद्र नैतिक मूल्यों पर लगा ग्रहण है।
आय और आवश्यकता में भीषण रण है।।
सच अभिमन्यु शहीद, स्वार्थ-संशप्तक विजयी-
तंत्र-प्रशासन दांव सम्मुख मानव तृण है।।
५.११.२०१८
***
एक रचना:
जमींदार
*
जमींदार नवगीत के
ठोंको इन्हें सलाम
.
इन्हें किया था नामजद
किसी शाह ने रीझ.
बख्शी थी जागीर कह
'कर मनमानी खूब.
पाल-पोस चेले बढ़ा
कह औरों को दूब.
बदल समय के साथ मत
खुद पर खुद ही खीझ.
लँगड़ा करता है सफर
खुद की बाजू थाम.
जमींदार नवगीत के
ठोंको इन्हें सलाम
.
बँधवाया, अब बाँधना
तू गंडा-ताबीज़.
शब्द न समझें लोग जो
लिखना खोज अजूब.
गलत और का सही भी
कहना मद में डूब.
निज पीड़ा संवेदना
दर्द अन्य का चीज.
दाम-नाम के लिये कर
शब्दों का व्यायाम.
जमींदार नवगीत के
ठोंको इन्हें सलाम
*
पंक्ति एक की तीन कर
तुक को मान कनीज़
तोड़ छंद को, सुनाते
निज प्रशस्ति बिन ऊब.
खामी को खूबी कहें
मठाधीश मंसूब।
पेट पूज कोई करे
जैसे पूजन तीज.
श्रेष्ठ बताते आप को
आप, अन्य बेनाम
जमींदार नवगीत के
ठोंको इन्हें सलाम
***
मुक्तिका:
*
ज़िंदगी जीते रहे हम पुस्तकों के बीच में
होंठ हँस सीते रहे हम पुस्तकों के बीच में
.
क्या कहे? कैसे कहें? किससे कहें? बहरा समय
अश्रु चुप पीते रहे हम पुस्तकों के बीच में
.
तुहिन, ओले, आग, बरखा, ठंड, गर्मी या तुषार
झेलते रीते रहे हम पुस्तकों के बीच में
.
मिल तो अंगूर मीठे, ना मिले खट्टे हुए
फेंकते तीते रहे हम पुस्तकों के बीच में
.
सत्य से साक्षात् कर ये ज़िंदगी दूभर हुई
राम तज सीते रहे हम पुस्तकों के बीच में
.
नहीं अबला, ना बला, सबला लगाते पार हम
पल नहीं बीते रहे हम पुस्तकों के बीच में?
.
माँगकर जिनको लिया, लौटा रहे नाहक ईनाम
जीत को जीते रहे हम पुस्तकों के बीच में
५-११-२०१५
***
द्विपदियाँ :
मैं नर्मदा तुम्हारी मैया, चाहूँ साफ़ सफाई
माँ का आँचल करते गंदा, तुम्हें लाज ना आई?
भरो बाल्टी में जल- जाकर, दूर नहाओ खूब
देख मलिन जल और किनारे, जाओ शर्म से डूब
कपड़े, पशु, वाहन नहलाना, बंद करो तत्काल
मूर्ति सिराना बंद करो, तब ही होगे खुशहाल
पौध लगाकर पेड़ बनाओ, वंश वृद्धि तब होगी
पॉलीथीन बहाया तो, संतानें होंगी रोगी
दीपदान तर्पण पूजन, जलधारा में मत करना
मन में सुमिरन कर, मेरा आशीष सदा तुम वरना
जो नाले मुझमें मिलते हैं, उनको साफ़ कराओ
कीर्ति-सफलता पाकर, तुम मेरे सपूत कहलाओ
जो संतानें दीन उन्हें जब, लँहगा-चुनरी दोगे
ग्रहण करूँगी मैं, तुमको आशीष अपरिमित दूँगी
वृद्ध अपंग भिक्षुकों को जब, भोजन करवाओगे
तृप्ति मिलेगी मुझको, सेवा सुत से तुम पाओगे
पढ़ाई-इलाज कराओ किसी का, या करवाओ शादी
निश्चय संकट टल जाये, रुक जाएगी बर्बादी
पथवारी मैया खुश हो यदि रखो रास्ते साफ़
भारत माता, धरती माता, पाप करेंगी माफ़
हिंदी माता की सेवा से, पुण्य यज्ञ का मिलता
मात-पिता की सेवा कर सुत, भाव सागर से तरता
***
हास्य दोहा गजल :
अवगुन चित न धरो
*
सुन भक्तों की प्रार्थना, प्रभुजी हैं लाचार
भक्तों के बस में रहें, करें गैर-उद्धार
कोई न चुने चुनाव में, करें नहीं तकरार
संसद टीवी से हुए, बाहर बहसें हार
मना जन्म उत्सव रहे, भक्त चढ़ा-खा भोग
टुकुर-टुकुर ताकें प्रभो,हो बेबस-लाचार
सब मतलब से पूजते, सब चाहें वरदान
कोई न कन्यादान ले, दुनिया है मक्कार
ब्याह गयी पर माँगती, है फिर-फिर वर दान
प्रभु की मति चकरा रही, बोले:' है धिक्कार'
वर माँगे वर-दान- दें कैसे? हरि हैरान
भला बनाया था हुआ, है विचित्र संसार
अवगुन चित धरकर कहे, 'अवगुन चित न धरो
प्रभु के विस्मय का रहा, कोई न पारावार
***
नवगीत:
धैर्य की पूँजी
न कम हो
मनोबल
घटने न देना
जंग जीवट- जिजीविषा की
मौत के आतंक से है
आस्था की कली कोमल
भेंटती शक-डंक से है
नाव निज
आरोग्य की
तूफ़ान में
डिगने न देना
मूल है किंजल्क का
वह पंक जिससे भागते हम
कमल-कमला को हमेशा
मग्न हो अनुरागते हम
देह ही है
गेह मन का
देह को
मिटने न देना
चिकित्सा सेवा अधिक
व्यवसाय कम है ध्यान रखना
मौत के पंजे से जीवन
बचाये बिन नहीं रुकना
लोभ को,
संदेह को
मन में तनिक
टिकने न देना
___
***
मुक्तिका:
हाथ मिले
माथ उठे
मन अनाम
देह बिके
कौन कहाँ
पत्र लिखे?
कदम बढ़े
बाल दिये
वसन न्यून
आँख सिके
द्रुपद सुता
सती रहे
सत्य कहे
आप दहे
_____
***
बाल कविता
हम बच्चे हैं मन के सच्चे सबने हमें दुलारा है
देश और परिवार हमें भी सचमुच लगता प्यारा है
अ आ इ ई, क ख ग संग ए बी सी हम सीखेंगे
भरा संस्कृत में पुरखों ने ज्ञान हमें उपकारा है
वीणापाणी की उपासना श्री गणेश का ध्यान करें
भारत माँ की करें आरती, यह सौभाग्य हमारा है
साफ-सफाई, पौधरोपण करें, घटायें शोर-धुआं
सच्चाई के पथ पग रख बढ़ना हमने स्वीकारा है
सद्गुण शिक्षा कला समझदारी का सतत विकास करें
गढ़ना है भविष्य मिल-जुलकर यही हमारा नारा है
५-११-२०१४
***
एक दोहा
लोकतंत्र में लोभ तंत्र की, मची हुई है धूम
कोकतंत्र से शोकतंत्र तक, बम बम बम बम बूम
५.११.२०१३
***
नवगीत:
महका-महका :
*
महका-महका
मन-मंदिर रख सुगढ़-सलौना
चहका-चहका
*
आशाओं के मेघ न बरसे
कोशिश तरसे
फटी बिमाई, मैली धोती
निकली घर से
बासन माँजे, कपड़े धोए
काँख-काँखकर
समझ न आए पर-सुख से
हरसे या तरसे
दहका-दहका
बुझा हौसलों का अंगारा
लहका-लहका
*
एक महल, सौ यहाँ झोपड़ी
कौन बनाए
ऊँच-नीच यह, कहो खोपड़ी
कौन बताए
मेहनत भूखी, चमड़ी सूखी
आँखें चमकें
कहाँ जाएगी मंजिल
सपने हों न पराए
बहका-बहका
सम्हल गया पग, बढ़ा राह पर
ठिठका-ठहका
*
लख मयंक की छटा अनूठी
तारे हरषे.
नेह नर्मदा नहा चन्द्रिका
चाँदी परसे.
नर-नरेंद्र अंतर से अंतर
बिसर हँस रहे.
हास-रास मधुमास न जाए-
घर से, दर से.
दहका-दहका
सूर्य सिंदूरी, उषा-साँझ संग
धधका-दहका...
५.११.२०१०
***

बुधवार, 4 नवंबर 2026

नवंबर ४, हाइकु, गणितीय दोहा, लक्ष्मी १०८ नाम, एकाक्षरी श्लोक, दोही, पैरोडी, नवगीत,

सलिल सृजन नवंबर ४
0
नवंबर : कब - क्या?
०१ मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ दिवस, भारतीय खनन दिवस, गुरु गोविंद सिंह पुण्यतिथि,
०४ गणितविद् शकुंतला देवी जयंती १९९९, प्रतिदत्त ब्रह्मचारी जन्म
०६ अभिनेता संजीव कुमार निधन
०७ भौतिकीविद् चंद्रशेखर वेंकटेश्वर रमण जन्म १८८८
०८ संत नामदेव जयंती, महाकवि कालिदास जयंती।
१० महाप्रसाद अग्निहोत्री निधन।
१२ गुरु नानक देव जयंती, म. सुदर्शन जयंती, महामना मालवीय निधन १९४६।
१३ भेड़ाघाट मेला।
१४ बाल दिवस, जवाहरलाल नेहरू जयंती, विश्व मधुमेह दिवस।
१५ बिरला मुंडा जयंती, समय विनोबा दिवस, जयशंकर प्रसाद निधन १९३७।
१६ विश्व सहिष्णुता दिवस, सचिव तेंदुलकर रिटायर २०१३।
१७ लाला लाजपतराय बलिदान दिवस १९२८, बाल ठाकरे दिवंगत २०१२, तुकड़ोजी जयंती, भ. मायानंद चैतन्य जयंती।
१८ काशी विश्वनाथ प्रतिष्ठा दिवस।
१९ म. लक्ष्मीबाई जयंती १८२८, इंदिरा गाँधी जयंती १९१७, मातृ दिवस
२१- भौतिकीविद् चंद्र शेखर वेंकट रमण निधन १९७०
२२ झलकारी बाई जयंती, दुर्गादास पुण्यतिथि।
२३ सत्य साई जयंती, जगदीश चंद्र बलि निधन १९३७।
२४ गुरु तेगबहादुर बलिदान, अभिनेता महीपाल जन्म १९१९, अभिनेत्री टुनटुन निधन २००३, साहित्यकार महीप सिंह २०१५, ।
२६ डॉ. हरि सिंह गौर जयंती।
२७ बच्चन निधन १९०७।
२८ जोतीबा फूले निधन १८९०।
२९ शरद सिंह १९६३।
३० जगदीश चंद्र बसु जन्म १८५८, मायानंद चैतन्य जयंती, मैत्रेयी पुष्पा जन्म।
***
हाइकु सलिला
पेड़
०
पेड़- वृक्ष दे
यदि पौधे को छाँव
बचेगा गाँव।
.
सलिल सींचो
रूख न रूखा रहे
हरा-भरा हो।
.
नव पल्लव
हुआ है अंकुरित
पेड़ बनेगा।
.
आशा-अंकुर
कोशिश की जमीन
पेड़ विश्वास।
.
शहरवासी
पेड़ों की हत्या कर
रहेंगे दुखी।
.
पेड़ काटते
उगाते बोनसाई
बौने चरित्र।
.
पंछी-घरौंदे
पेड़ के आभूषण
आदमी शत्रु।
.
काटता रहा
जिन्हें जिंदगी भर
जलाए पेड़।
.
फूल या फल
पेड़ बन लुटा दे
जा खाली हाथ।
०००
दोहा सलिला
वसन
०
पंच तत्व का वहन जब, पहने आत्मा मौन।
हो सचेत यह जड़ जगत, पूछे परिचय कौन?
.
वसन हरितिमा का पहन, वसुधा लगे अनूप।
सूर्य रश्मि गोटा-जरी, है अनिंद्य भू-रूप।।
.
वसन दिगंबर के बने, दिक्-अंबर हो धन्य।
धरा कर रही है नमन, साधक-साध्य अनन्य।।
.
वसन व्यसन है मनुज का, हो न निर्वसन देह।
जिसे न चिंता वसन की, हो वह देह विदेह।।
.
वन्य वसन पहने नहीं, लेते जीत अनंग।
नागर पहनें वसन पर, उन सा कहीं न नंग।।
. 
वंश न आप पर आप का, न दें वसन को दोष।
वसन कीमती भिक्षु क्यों?, कबिरा को संतोष।।
.
जटा-जूट धारण किए, हुए लला श्री राम।
वसन कीमती पहनकर, रहे कुँवर वे आम।।
.
जगत्पिता जगपूज्य को, नहीं वसन का मोह।
राष्ट्र पिता हो सके कर, वसनों से विद्रोह।।
.
वसन व्यर्थ मत मानिए, केवल वसन न साध्य।
साधन मानें वसन को, मुक्ति लक्ष्य आराध्य।।
४.११.२०२६
०००
लक्ष्मी जी के १०८ नाम
१. प्रकृति, २. विकृति, ३. विद्या, ४. सर्वभूतहितप्रदा, ५. श्रद्धा,६. विभूति, ७. सुरभि, ८. परमात्मिका, ९. वाचि, १०. पद्मालया, ११. पद्मा, १२. शुचि, १३. स्वाहा, १४. स्वधा, १५. सुधा, १६. धन्या, १७. हिरण्मयी, १८. लक्ष्मी, १९. नित्यपुष्टा, २०. विभा, २१. आदित्या, २२. दित्या, २३. दीपायै, २४. वसुधा, २५. वसुधारिणी, २६. कमलसम्भवा, २७. कान्ता, २८. कामाक्षी, २९. क्ष्रीरोधसंभवा, ३०क्रोधसंभवा, ३१. अनुग्रहप्रदा, ३२. बुध्दि, ३३. अनघा, ३४. हरिवल्लभा, ३५. अशोका, ३६. अमृता, ३७. दीप्ता, ३८. लोकशोकविनाशि, ३९. धर्मनिलया, ४०. करुणा, ४१. पद्मप्रिया, ४२. पद्महस्ता, ४३. पद्माक्ष्या, ४४. पद्मसुन्दरी, ४५. पद्मोद्भवा, ४६. पद्ममुखी, ४७. पद्मनाभाप्रिया, ४८. रमा, ४९. पद्ममालाधरा, ५०. देवी, ५१. पद्मिनी, ५२. पद्मगन्धिनी, ५३. पुण्यगन्धा, ५४. सुप्रसन्ना, ५५. प्रसादाभिमुखी, ५६. प्रभा, ५७. चन्द्रवदना, ५८. चन्द्रा, ५९. चन्द्रसहोदरी, ६०. चतुर्भुजा, ६१. चन्द्ररूपा, ६२. इन्दिरा, ६३. इन्दुशीतला, ६४. आह्लादजननी, ६५. पुष्टि, ६६. शिवा, ६७. शिवकरी, ६८. सत्या, ६९. विमला, ७०. विश्वजननी, ७१. तुष्टि, ७२. दारिद्र्यनाशिनी, ७३. प्रीतिपुष्करिणी, ७४. शान्ता, ७५. शुक्लमाल्यांबरा, ७६. श्री, ७७. भास्करी, ७८. बिल्वनिलया, ७९. वरारोहा, ८०. यशस्विनी, ८१. वसुन्धरा, ८२. उदारांगा, ८३. हरिणी, ८४. हेममालिनी, ८५. धनधान्यकी, ८६. सिध्दि, ८७. स्त्रैणसौम्या, ८८. शुभप्रदा, ८९. नृपवेश्मगतानन्दा, ९०. वरलक्ष्मी, ९१. वसुप्रदा, ९२. शुभा, ९३. हिरण्यप्राकारा, ९४. समुद्रतनया, ९५. जया, ९६. मंगला देवी, ९७. विष्णुवक्षस्स्थलस्थिता, ९८. विष्णुपत्नी, ९९. प्रसन्नाक्षी, १००. नारायणसमाश्रिता, १०१. दारिद्र्यध्वंसिनी, १०२. देवी, १०३. सर्वोपद्रव वारिणी, १०४. नवदुर्गा, १०५. महाकाली, १०६. ब्रह्माविष्णुशिवात्मिका, १०७. त्रिकालज्ञानसम्पन्ना, १०८. भुवनेश्वरी ।
***
हिंदी वैभव - समानार्थी शब्द : हाथी
कुञ्जरः,गजः,हस्तिन्, हस्तिपकः,द्विपः, द्विरदः, वारणः, करिन्, मतङ्गः, सुचिकाधरः, सुप्रतीकः, अङ्गूषः, अन्तेःस्वेदः, इभः, कञ्जरः, कञ्जारः, कटिन्, कम्बुः, करिकः, कालिङ्गः, कूचः, गर्जः, चदिरः, चक्रपादः, चन्दिरः, जलकाङ्क्षः, जर्तुः, दण्डवलधिः, दन्तावलः, दीर्घपवनः, दीर्घवक्त्रः, द्रुमारिः, द्विदन्तः, द्विरापः, नगजः, नगरघातः, नर्तकः, निर्झरः, पञ्चनखः, पिचिलः, पीलुः, पिण्डपादः, पिण्डपाद्यः, पृदाकुः, पृष्टहायनः, पुण्ड्रकेलिः, बृहदङ्गः, प्रस्वेदः, मदकलः, मदारः, महाकायः, महामृगः, महानादः, मातंगः, मतंगजः, मत्तकीशः, राजिलः, राजीवः, रक्तपादः, रणमत्तः, रसिकः, लम्बकर्णः, लतालकः, लतारदः, वनजः, वराङ्गः, वारीटः, वितण्डः, षष्टिहायनः, वेदण्डः, वेगदण्डः, वेतण्डः, विलोमजिह्वः, विलोमरसनः, विषाणकः।
(आभार - जमुना कृष्णराज)
***
संस्कृत - चमत्कारी भाषा
*
एकाक्षरी श्लोक
महाकवि माघ ने अपने महाकाव्य 'शिशुपाल वध' में एकाक्षरी श्लोक दिया है -
दाददो दुद्ददुद्दादी दाददो दूददीददोः ।
दुद्दादं दददे दुद्दे दादाददददोऽददः ॥ १४४
अर्थ - वरदाता, दुष्टनाशक, शुद्धक, आततायियों के अंतक क्षेत्रों पर पीड़क शर का संधान करें।
विलोम पद
माघ विलोमपद रचने में भी निपुण थे।
वारणागगभीरा सा साराभीगगणारवा ।
कारितारिवधा सेना नासेधा वारितारिका ॥४४
पर्वतकारी हाथियों से सुसज्ज सेना का सामना करना अति दुष्कर है। यह विराट सेना है, त्रस्त-भयभीत लोगों की चीत्कार सुनाई दे रही है। इसने अपने शत्रुओं को मार दिया है।
विलोम काव्य
श्री राघव यादवीयं - बाएँ से दाएँ रामकथा, दाएँ से बाएँ कृष्णकथा
बाएँ से दाएँ
वन्देऽहं देवं तं श्रीतं रन्तारं कालं भासा यः ।
रामो रामाधीराप्यागो लीलामारायोध्ये वासे ॥
मैं श्री राम का वंदन करता हूँ जो सीता जी के लिए धड़कते हुए ह्रदय के साथ
रावण और उसके सहायकों का वधकर, सह्याद्रि पर्वतों को पार कर, रावण तथा उसके सहायकों का वध कर, लंबे समय बाद, सीता सहित अयोध्या वापिस आए हैं।
I pay my obeisance to Lord Shri Rama, who with his heart pining for Sita, travelled across the Sahyadri Hills and returned to Ayodhya after killing Ravana and sported with his consort, Sita, in Ayodhya for a long time.
दाएँ से बाएँ
सेवाध्येयो रामालाली गोप्याराधी मारामोरा ।
यस्साभालंकारं तारं तं श्रीतं वन्देहं देवं ॥
मैं श्री कृष्ण का वंदन करता हूँ जिनका ह्रदय श्री लक्ष्मी का निवास है, जो त्याग-तप से ध्यान करने योग्य हैं, जो रुक्मिणी तथा अन्य संगणियों को दुलारते हैं, जो गोपियों द्वारा पूजित हैं तथा जगनागाते हुए रत्नों से शोभायमान हैं।
I bow to Lord Shri Krishna, whose chest is the sporting resort of Shri Lakshmi; who is fit to be contemplated through penance and sacrifice, who fondles Rukmani and his other consorts and who is worshipped by the gopis, and who is decked with jewels radiating splendour.
आभार: श्रीमती जमुना कृष्णराज
०००
कार्य शाला
छंद सलिला ;
दोही छंद
*
लक्षण छंद -
चंद्र कला पंद्रह शुभ मान, रचें विषम पद आप।
एक-एक ग्यारह सम जान, लघु पद-अंत सुमाप।।
*
उदहारण -
स्नेह सलिल अवगाहन करे, मिट जाए भव ताप।
मदद निबल की जो नित करे, हो जाए प्रभु जाप।।
***
नवगीत:
महका-महका
संजीव
महका-महका
मन-मंदिर रख सुगढ़-सलौना
चहका-चहका
आशाओं के मेघ न बरसे
कोशिश तरसे
फटी बिमाई, मैली धोती
निकली घर से
बासन माँजे, कपड़े धोए
काँख-काँखकर
समझ न आए पर-सुख से
हरसे या तरसे
दहका-दहका
बुझा हौसलों का अंगारा
लहका-लहका
एक महल, सौ यहाँ झोपड़ी
कौन बनाए
ऊँच-नीच यह, कहो खोपड़ी
कौन बताए
मेहनत भूखी, चमड़ी सूखी
आँखें चमकें
कहाँ जाएगी मंजिल
सपने हों न पराए
बहका-बहका
सम्हल गया पग, बढ़ा राह पर
ठिठका-ठहका
लख मयंक की छटा अनूठी
सज्जन हरषे.
नेह नर्मदा नहा नवेली
पायस परसे.
नर-नरेंद्र अंतर से अंतर
बिसर हँस रहे.
हास-रास मधुमास न जाए-
घर से, दर से.
दहका-दहका
सूर्य सिंदूरी, उषा-साँझ संग
धधका-दहका...
४.८.२०१९
***
एक गीत -एक पैरोडी
*
ये रातें, ये मौसम, नदी का किनारा, ये चंचल हवा ३१
कहा दो दिलों ने, कि मिलकर कभी हम ना होंगे जुदा ३०
*
ये क्या बात है, आज की चाँदनी में २१
कि हम खो गये, प्यार की रागनी में २१
ये बाँहों में बाँहें, ये बहकी निगाहें २३
लो आने लगा जिंदगी का मज़ा १९
*
सितारों की महफ़िल ने कर के इशारा २२
कहा अब तो सारा, जहां है तुम्हारा २१
मोहब्बत जवां हो, खुला आसमां हो २१
करे कोई दिल आरजू और क्या १९
*
कसम है तुम्हे, तुम अगर मुझ से रूठे २१
रहे सांस जब तक ये बंधन न टूटे २२
तुम्हे दिल दिया है, ये वादा किया है २१
सनम मैं तुम्हारी रहूंगी सदा १८
फिल्म –‘दिल्ली का ठग’ 1958
*****
पैरोडी
है कश्मीर जन्नत, हमें जां से प्यारी, हुए हम फ़िदा ३०
ये सीमा पे दहशत, ये आतंकवादी, चलो दें मिटा ३१
*
ये कश्यप की धरती, सतीसर हमारा २२
यहाँ शैव मत ने, पसारा पसारा २०
न अखरोट-कहवा, न पश्मीना भूले २१
फहराये हरदम तिरंगी ध्वजा १८
*
अमरनाथ हमको, हैं जां से भी प्यारा २२
मैया ने हमको पुकारा-दुलारा २०
हज़रत मेहरबां, ये डल झील मोहे २१
ये केसर की क्यारी रहे चिर जवां २०
*
लो खाते कसम हैं, इन्हीं वादियों की २१
सुरक्षा करेंगे, हसीं घाटियों की २०
सजाएँ, सँवारें, निखारेंगे इनको २१
ज़न्नत जमीं की हँसेगी सदा १७
४-११-२०१९
***
***
दोहा गीत:
दीपक लेकर हाथ
*
भक्त उतारें आरती,
दीपक लेकर हाथ।
हैं प्रसन्न माँ भारती,
जनगण-मन के साथ।।
*
अमरनाथ सह भवानी,
कार्तिक-गणपति झूम।
चले दिवाली मनाने,
भायी भारत-भूम।।
बसे नर्मदा तीर पर,
गौरी-गौरीनाथ।
भक्त उतारें आरती,
दीपक लेकर हाथ।।
*
सरस्वती सिंह पर हुईं,
दुर्गा सदृश सवार।
मेघदूत सम हंस उड़,
गया भुवन के पार।।
ले विरंचि को आ गया,
कर प्रणाम नत माथ।
भक्त उतारें आरती,
दीपक लेकर हाथ।।
*
सलिल लहर संजीव लख,
सफल साधना धन्य।
त्याग पटाखे, शंख-ध्वनि,
दस दिश गूँज अनन्य।।
श्रम-सीकर से स्नानकर,
मानव हुआ सनाथ।
भक्त उतारें आरती,
दीपक लेकर हाथ।।
*
गणितीय दोहा मुक्तक:
*
बिंदु-बिंदु रखते रहे, जुड़ हो गयी लकीर।
जोड़ा किस्मत ने घटा, झट कर दिया फकीर।।
कोशिश-कोशिश गुणा का, आरक्षण से भाग-
रहे शून्य के शून्य हम, अच्छे दिन-तकदीर।।
*
खड़ी सफलता केंद्र पर, परिधि प्रयास अनाथ।
त्रिज्या आश्वासन मुई, कब कर सकी सनाथ।।
छप्पन इंची वक्ष का निकला भरम गुमान-
चाप सिफारिश का लगा, कभी न श्रम के हाथ।।
*
गुणा अधिक हो जोड़ से, रटा रहे तुम पाठ।
उल्टा पा परिणाम हम, आज हुए हैं काठ।।
एक गुणा कर एक से कम, ज्यादा है जोड़-
एक-एक ग्यारह हुए जो उनके हैं ठाठ।।
४.११.२०१८
***
मुक्तक:
सह सकें जितना वही है परिधि अपनी
कह सकें जिससे विधा-विधि वही अपनी
बह सके उस अंजुरि तक जो तृषित है-
तह सके चादर अमल सिधि यही अपनी
(सिधि = सिद्धि)
४.११.२०१५
***
गीत:
उत्तर, खोज रहे...
*
उत्तर, खोज रहे प्रश्नों को, हाथ न आते।
मृग मरीचिकावत दिखते, पल में खो जाते।
*
कैसा विभ्रम राजनीति, पद-नीति हो गयी।
लोकतन्त्र में लोभतन्त्र, विष-बेल बो गयी।।
नेता-अफसर-व्यापारी, जन-हित मिल खाते...
*
नाग-साँप-बिच्छू, विषधर उम्मीदवार हैं।
भ्रष्टों से डर मतदाता करता गुहार है।।
दलदल-मरुथल शिखरों को बौना बतलाते...
*
एक हाथ से दे, दूजे से ले लेता है।
संविधान बिन पेंदी नैया खे लेता है।।
अँधा न्याय, प्रशासन बहरा मिल भरमाते...
*
लोकनीति हो दलविमुक्त, संसद जागृत हो।
अंध विरोध न साध्य, समन्वय शुचि अमृत हो।।
'सलिल' खिलें सद्भाव-सुमन शत सुरभि लुटाते...
*
जो मन भाये- चुनें, नहीं उम्मीदवार हो।
ना प्रचार ना चंदा, ना बैठक उधार हो।।
प्रशासनिक ढाँचे रक्षा का खर्च बचाते...
*
जन प्रतिनिधि निस्वार्थ रहें, सरकार बनायें।
सत्ता और समर्थक, मिलकर सदन चलायें।।
देश पड़ोसी देख एकता शीश झुकाते...
*
रोग हुई दलनीति, उखाड़ो इसको जड़ से।
लोकनीति हो सबल, मुक्त रिश्वत-झंखड़ से।।
दर्पण देख न 'सलिल', किसी से आँख चुराते...
४-११-२०१२
***
नरक चौदस / रूप चतुर्दशी पर विशेष रचना:
*
असुर स्वर्ग को नरक बनाते
उनका मरण बने त्यौहार.
देव सदृश वे नर पुजते जो
दीनों का करते उपकार..
अहम्, मोह, आलस्य, क्रोध, भय,
लोभ, स्वार्थ, हिंसा, छल, दुःख,
परपीड़ा, अधर्म, निर्दयता,
अनाचार दे जिसको सुख..
था बलिष्ठ-अत्याचारी
अधिपतियों से लड़ जाता था.
हरा-मार रानी-कुमारियों को
निज दास बनाता था..
बंदीगृह था नरक सरीखा
नरकासुर पाया था नाम.
कृष्ण लड़े, उसका वधकर
पाया जग-वंदन कीर्ति, सुनाम..
रजमहिषियाँ कृष्णाश्रय में
पटरानी बन हँसी-खिलीं.
कहा 'नरक चौदस' इस तिथि को
जनगण को थी मुक्ति मिली..
नगर-ग्राम, घर-द्वार स्वच्छकर
निर्मल तन-मन कर हरषे.
ऐसा लगा कि स्वर्ग सम्पदा
धराधाम पर खुद बरसे..
'रूप चतुर्दशी' पर्व मनाया
सबने एक साथ मिलकर.
आओ हम भी पर्व मनाएँ
दें प्रकाश दीपक बनकर..
'सलिल' सार्थक जीवन तब ही
जब औरों के कष्ट हरें.
एक-दूजे के सुख-दुःख बाँटें
इस धरती को स्वर्ग करें..
४-११-२०१०
***