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सोमवार, 5 अक्टूबर 2026

अक्टूबर ५, दुर्गा, शरद, रास, चंद्रकला, पज्झटिका, सिंह, छंद, बाल, सूरज, लघुकथा, कुण्डलिया, गीत

सलिल सृजन अक्टूबर ५
*
शरद पूर्णिमा: १६ चंद्रकलाएँ एवं महारास
***
मुक्तक 
सरला तरला मति दे शारद, सफल साधना कर पाऊँ। 
कलकल नर्मद-धार सदृश नित गुण तेरे निश-दिन गाऊँ।। 
तुहिन-बिंदु सम श्रम सीकर से, माँ! पल-पल अभिषेक करूँ। 
मिले शक्ति कर भक्ति युक्ति तज, तुझमें ही लय हो जाऊँ।। 
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 दोहा सलिला
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दोहा में दो पंक्तियाँ, और चरण हैं चार।
विषम और सम चरण का, तेरह-ग्यारह भार।।
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तेरह मात्रिक विषम पद, रच भर भाव अनंत।
ग्यारह मात्रिक सम चरण, गुरु-लघु से कर अंत।।
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हो मात्रिक दोहराव तो, लय रहती है ठीक।
दोहा उल्टे सोरठा, सत्य सुपावन रीत।।
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दोहे की लय गुनगुना, रखिए उसमें शब्द।
सरस सरल दोहा रचें, श्रोता रहें निशब्द।।
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मात्रा गिनना सीखिए, बोल बोल उच्चार।
अ इ उ ऋ लघु गिनें, शेष रहे गुरु भार।।
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मात्रा को कहते कला, छंद शास्त्री जान।
द्विकल त्रिकल चौकल रखें, शब्द भार अनुमान।।
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विधि हरि हर बिन हो नहीं, भव से बेड़ा पार।
द्वि कल द्वि कल के बाद है, दोहे का आधार।।
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अकल शकल से श्रेष्ठ है, नकल नहीं अधिकार।
त्रिकल त्रिकल के बाद है, परख करें स्वीकार।।
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पनघट पनघट पर जुड़ा, नयनों का संबंध।
चौकल चौकल बाद ज्यों, श्वास-आस अनुबंध।।
५.१०.२०२६
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सॉनेट
शरत्चंद्र
*
शरत्चंद्र की शुक्ल स्मृति से
मन नीलाभ गगन हो हँसता
रश्मिरथी दे अमृत, झट से
कंकर हो शंकर भुज कसता
सलज उमा, गणपति आहट पा
मग्न साधना में हो जाती
ऋद्धि-सिद्धि माँ की चौखट आ
शीश नवा, माँ के जस गाती
हो संजीव, सलिल लहरें उठ
गौरी पग छू सकुँच ठिठकती
अंजुरी भर कर पान उमा झुक
शिव को भिगा रिझाकर हँसती
शुक्ल स्मृति पायस सब जग को
दे अमृत कण शरत्चंद्र का
(शेक्सपियरी शैली)
९-१०-२०२२, १५-४३
●●●
शरत पूर्णिमा का महापर्व वास्तव में 'श्री' प्राप्ति हित किया जानेवाला व्रत है। श्री का अर्थ सुख-समृद्धि-संतोष-सफलता और सायुज्य प्राप्ति से है। तदनुसार चंद्रमा की आराधना इसलिए की उपयुक्त है कि चंद्रमा सोलह कलाओं से युक्त अमृत का पर्याय और मन का स्वामी है। निम्न श्लोक विभिन्न वेदों और उपनिषदों में मिलता है, जैसे ऋग्वेद १०/९०/१३, यजुर्वेद ३१/१२ और अथर्ववेद १९/६ आदि।
चन्द्रमा मनसो जाताश्चक्षो सूर्यो अजायत।
श्रोत्रांवायुश्च प्राणश्च मुखादग्निरजायत।।
शरत पूर्णिमा का महापर्व 'कोजागरी पूनम' के नाम से भी जाना जाता है। यह त्योहार आश्विन शुक्ल १५ पूर्णिमा को मनाया जाता है। लोक मान्यता है कि इस दिनधन की देवी लक्ष्मी रात्रि में आकाश में विचरण करती हैं और नीचे जाग रहे लोगों को ढूँढ़ती हुई 'को जागर्ति' पूछती हैं। संस्कृत में, 'को जागर्ति' का अर्थ है, 'कौन जाग रहा है?' और जो जाग रहे हैं उन्हें वह धन का उपहार देती हैं।
सनत्कुमार संहिता में कोजागरी पूनम की कथा में वालखिल ऋषि बताते हैं कि प्राचीन काल में मगधदेश (बंगाल) में वलित नामक एक दीन ब्राह्मण रहता था। वह विद्वान और सदाचारी था किंतु उसकी पत्नी झगड़ालू थी और पति की इच्छा के विपरीत आचरण करती थी। एक बार उसके पिता के श्राद्ध के दिन उसने पिंड दान करते समय प्रथा के अनुसार पवित्र गंगा के बजाय, एक गंदे गड्ढे में फेंक दिया। इससे वलित क्रोधित हो गया। उसने धन की खोज में घर त्याग दिया। संयोग से वह रात आसो सुद पूनम की थी। जंगलों में उसकी भेंट कालिया नाग की कन्याओं से हुई। इन नागकन्याओं ने आसो सुद पूनम के दिन जागते हुए ‘कोजागरी व्रत’ किया था। उसी समय, भगवान विष्णु अपनी पत्नी लक्ष्मी सहित वहाँ से गुज़रे। वलित ने संयोगवश 'कोजागरी व्रत' रखा था, लक्ष्मी ने उन्हें प्रेम के देवता 'कामदेव' के समान रूप प्रदान किया। अब उनकी ओर आकर्षित होकर, नागकन्याओं ने वलित से विवाह किया और उन्हें अपना धन दान में दिया। फिर वह धन लेकर घर लौटे, जहाँ उनकी पत्नी ने उनका गर्मजोशी से स्वागत किया। इस घटना के बाद, संहिता में घोषणा की गई कि जो लोग इस पूनम के दिन जागते रहेंगे, उन्हें धन की प्राप्ति होगी।
इस रात, भगवान कृष्ण ने अपनी परमभक्त भक्त गोपियों, वृंदावन की गोपियों को अपने साथ महारास (पारंपरिक लोकनृत्य) खेलने के लिए आमंत्रित किया था। गोपियों ने सामाजिक और पारिवारिक वर्जना के विरुद्ध रास में सहभागिता की। श्री कृष्ण ने उन्हें अनन्य भक्ति प्रदान की। जब वे बृज में अपने घर छोड़कर वृंदावन पहुँचीं, तो श्रीकृष्ण ने उनका स्वागत किया। अपने प्रति उनके प्रेम की और परीक्षा लेने के लिए, उन्होंने कहा: 'तुम जैसी चरित्रवान स्त्रियों को आधी रात में किसी अन्य पुरुष से मिलने के लिए घर से बाहर नहीं जाना चाहिए।' तब गोपियों अत्यंत दुःखी होकर कहा- 'हमारे चरण आपके चरण-कमलों से तनिक भी अलग नहीं होते। अतः हम व्रज कैसे लौट सकें?' अपने प्रति अटूट प्रेम से प्रसन्न श्रीकृष्ण ने जितनी गोपियाँ थीं, उतने ही रूप धारण कर महारास का सूत्रपात किया। गोपियाँ गर्व से फूल उठीं कि 'भगवान ने हम पर जो कृपा की है, उससे बढ़कर किसी की भक्ति नहीं हो सकती।' महारास को भगवान की कृपा मानने के बजाय, अहंकार ने उनकी भक्ति को कलंकित कर दिया। अतः श्री कृष्ण तुरन्त रास मण्डल से अन्तर्धान हो गए।गोपियाँ श्रीकृष्ण की दिव्य लीलाओं का स्मरण कर विरह वेदना का विलाप करने लगीं और 'विरह गीत' -गाए-
'जयति ते-धिकम जन्मना व्रजहा.... (श्रीमद्भागवत १०/३१/०१)
भागवत (१-/३०/२५) में 'लीला' का वर्णन करते हुए शुकदेवजी राजा परीक्षित से कहते हैं- 'हे परीक्षित! सभी रात्रियों में से शरद पुनम की वह रात्रि सबसे अधिक शोभायमान हो गई। श्रीकृष्ण गोपियों के साथ यमुना के किनारे घूमते थे, मानों सभी को अपनी लीला में कैद कर रहे हों।'
भगवान स्वामीनारायण के परम भक्त अक्षरब्रह्म गुणातीतानंद स्वामी का जन्म शरद पूर्णिमा, संवत १८४१ को हुआ था। उन्होंने आध्यात्मिक रूप से जागृत भक्तों को ईश्वर-साक्षात्कार का आशीर्वाद देकर 'धन' प्रदान किया।
लोक कथा
शरद पूर्णिमा की लोक कथा के अनुसार एक साहूकार की दो बेटियाँ थीं। बड़ी बेटी हमेशा पूर्णिमा का व्रत पूरी श्रद्धा से करती थी, जबकि छोटी बेटी व्रत को अधूरा छोड़ देती थी। इस कारण बड़ी बेटी को स्वस्थ संतानें हुईं, पर छोटी बेटी की संतानें पैदा होते ही मर जाती थीं। पंडितों की सलाह पर छोटी बेटी ने विधि-विधान से व्रत पूरा किया, तो उसे भी संतान हुई पर कुछ दिनों बाद वह भी मर गई। शोक में लीन छोटी बेटी ने मृत शिशु को पीढ़े पर लिटाकर कपड़ा ढक दिया और अपनी बड़ी बहन को वहीं बैठने को कहा। बड़ी बहन के छूते ही बच्चा जीवित हो गया। छोटी बेटी को पता चला कि यह बड़ी बहन के पूर्ण व्रत के पुण्य से हुआ है। इस घटना से दोनों बहनों ने नगरवासियों को पूर्णिमा व्रत की महिमा बताई, जिससे सभी ने व्रत रखना शुरू कर दिया। यह कथा सिखाती है कि सच्चे और विधिपूर्वक किए गए व्रत का फल अवश्य मिलता है।
शरद पूर्णिमा के दिन चंद्रमा अपनी सभी १६ कलाओं से पूर्ण होता है। सोलह कलाओं का अर्थ संपूर्ण बोधपूर्ण ज्ञान से है। मनुष्‍य ने स्वयं को तीन अवस्थाओं से आगे कुछ नहीं जाना और न समझा। प्रत्येक मनुष्य में ये १६ कलाएँ सुप्त अवस्था में होती है। इणका संबंध अनुभूत यथार्थ ज्ञान की सोलह अवस्थाओं से है। इन सोलह कलाओं के नाम अलग-अलग ग्रंथों में भिन्न-भिन्न मिलते हैं।
प्रथम स्रोत- १.अन्नमय, २.प्राणमय, ३. मनोमय, ४.विज्ञानमय, ५.आनंदमय, ६.अतिशयिनी, ७.विपरिनाभिनी, ८.संक्रमिनी, ९.प्रभवि, १०.कुंथिनी, ११.विकासिनी, १२.मर्यादिनी, १३.सन्हालादिनी, १४.आह्लादिनी, १५.परिपूर्ण और १६.स्वरूपवस्थित।
द्वितीय स्रोत- १.श्री, २.भू, ३.कीर्ति, ४.इला, ५.लीला, ६.कांति, ७.विद्या, ८.विमला, ९.उत्कर्षणी , १०.ज्ञान, ११.क्रिया, १२.योग, १३.प्रहवि, १४.सत्य, १५.इसना और १६.अनुग्रह।
तृतीय स्रोत- १.प्राण, २.श्रधा, ३.आकाश, ४.वायु, ५.तेज, ६.जल, ७.पृथ्वी, ८.इन्द्रिय, ९.मन, १०.अन्न, ११.वीर्य, १२.तप, १३.मन्त्र, १४.कर्म, १५.लोक और १६. नाम।
वास्तव में १६ कलाएँ बोध प्राप्त योगी की भिन्न-भिन्न स्थितियाँ हैं। बोध की अवस्था के आधार पर आत्मा के लिए प्रतिपदा से लेकर पूर्णिमा तक चन्द्रमा के प्रकाश की १५ अवस्थाएँ ली गई हैं। अमावास्या अज्ञान का प्रतीक है तो पूर्णिमा पूर्ण ज्ञान का।
१९ अवस्थाएँ: भगवदगीता में भगवान् श्रीकृष्ण ने आत्म तत्व प्राप्त योगी के बोध की उन्नीस स्थितियों को प्रकाश की भिन्न-भिन्न मात्रा से बताया है। इसमें अग्निर्ज्योतिरहः बोध की ३ प्रारंभिक स्थिति हैं और शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम्‌ की १५ कला शुक्ल पक्ष की १ कल है। इनमें से आत्मा की १६ कलाएँ हैं। आत्मा की सबसे पहली कला ही विलक्षण है। इस पहली अवस्था या उससे पहली की तीन स्थिति होने पर भी योगी अपना जन्म और मृत्यु का दृष्टा हो जाता है और मृत्यु भय से मुक्त हो जाता है।
अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम्‌ ।
तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः ॥
अर्थात : जिस मार्ग में ज्योतिर्मय अग्नि-अभिमानी देवता हैं, दिन का अभिमानी देवता है, शुक्ल पक्ष का अभिमानी देवता है और उत्तरायण के छः महीनों का अभिमानी देवता है, उस मार्ग में मरकर गए हुए ब्रह्मवेत्ता योगीजन उपयुक्त देवताओं द्वारा क्रम से ले जाए जाकर ब्रह्म को प्राप्त होते हैं। - (भगवदगीता ८-२४ )
भावार्थ : श्रीकृष्ण कहते हैं जो योगी अग्नि, ज्योति, दिन, शुक्लपक्ष, उत्तरायण के छह माह में देह त्यागते हैं अर्थात जिन पुरुषों और योगियों में आत्म ज्ञान का प्रकाश हो जाता है, वह ज्ञान के प्रकाश से अग्निमय, ज्योर्तिमय, दिन के सामान, शुक्लपक्ष की चांदनी के समान प्रकाशमय और उत्तरायण के छह माहों के समान परम प्रकाशमय हो जाते हैं। अर्थात जिन्हें आत्मज्ञान हो जाता है। आत्मज्ञान का अर्थ है स्वयं को जानना या देह से अलग स्वयं की स्थिति को पहचानना।
'जागृति' का आध्यात्मिक अर्थ है सतर्क रहना। वचनामृत तृतीय-९ में, भगवान स्वामीनारायण इस सतर्कता की व्याख्या करते हैं। वे कहते हैं कि हृदय में जागृति ही भगवान के दिव्य धाम का प्रवेश द्वार है। भक्तों को धन, वासना आदि सांसारिक इच्छाओं को अपने हृदय में प्रवेश नहीं करने देना चाहिए। सफलता और असफलता, सुख और दुख, मान और अपमान जैसी बाधाओं का सामना करते समय, भक्तों को ईश्वर की भक्ति में अडिग रहना चाहिए। इस प्रकार, उन्हें ईश्वर के प्रवेश द्वार पर सतर्क रहना चाहिए और किसी भी सांसारिक वस्तु को प्रवेश नहीं करने देना चाहिए। जीवन में हर क्षण सतर्कता की आवश्यक है। यह अपने आप में एक सूक्ष्म तप बन जाता है। जिन लोगों ने बिना सतर्कता के कठोर तपस्या की, वे माया के वशीभूत हो गए। विश्वामित्र ने ६०,००० वर्षों तक तपस्या की, लेकिन मेनका के सान्निध्य में अपनी जागृति खो बैठे। इसी प्रकार, सतर्कता के अभाव ने सौभरि ऋषि, एकलशृंगी, पराशर आदि को भी परास्त कर दिया।
शरद पूर्णिमा की रात्रि का आकाश स्वच्छ और चंद्रप्रभा से परिपूर्ण होता है, साधक को भी अपने अंतःकरण को शुद्ध करने का प्रयास करना चाहिए। इसके लिए उसे देह-चेतना और सांसारिक इच्छाओं का उन्मूलन कर ब्रह्म-चेतना को आत्मसात करना होगा, ताकि परब्रह्म का निरंतर अनुभव हो सके। (गीता १८/५४, शिक्षापत्री ११६) इसके लिए साधक को गुणातीत साधु की खोज करनी होगी, जो मोक्ष (भगवान) का द्वार है, जैसा कि भागवत (३/२९/२०) में घोषित किया गया है:
प्रसंगमजारं पाशमात्मनहा कवयो विदुहु,
स एव साधुषु कृतो मोक्षद्वारं अपावृतम्।
ऋषियों का आदेश है कि यदि कोई जीव अपने शरीर और शारीरिक संबंधियों में अत्यधिक आसक्त है, उसी प्रकार गुणातीत साधु में आसक्त हो जाए, तो उसके लिए मोक्ष के द्वार खुल जाएंगे। भगवान को 'दूध-पायस' यानी दूध में भिगोए हुए भुने चावल का भोग लगाकर भक्तगण प्रसाद को ग्रहण करते हैं। इस प्रसाद के स्वास्थ्यवर्धक गुण दशहरे के प्रसाद के समान ही हैं; यह पित्त की गड़बड़ी को दूर करता है। स्वामीनारायण संस्था सभी मंदिरों में रात्रि में बड़े उत्साह के साथ यह उत्सव मनाती है। भक्त अक्षरब्रह्म गुणातीतानंद स्वामीकीर्तन गाते हैं और अक्षरब्रह्म गुणातीतानंद स्वामी की महिमा का गुणगान करते हैं। सभा के दौरान पाँच आरती की जाती हैं। प्रमुख स्वामी महाराज आमतौर पर गोंडल मंदिर में शरद पूर्णिमा मनाते हैं - जो गुणातीतानंद स्वामी के दाह संस्कार स्थल पर बना है।
जनश्रुति के अनुसार सिद्धार्थ ने वैशाख माह की पूर्णिमा को सुजाता से पायस ग्रहण करने के बाद ही बुद्धत्व पाया था। शरद पूर्णिमा आश्विन माह की पूर्णिमा को होती है किंतु पायस (दूध-चाँवल की खीर) का महत्व निर्विवाद है।
***
ॐ
छंदशाला ३५
पज्झटिका छंद
(इससे पूर्व- सुगती/शुभगति, छवि/मधुभार, गंग, निधि, दीप, अहीर/अभीर, शिव, भव, तोमर, ताण्डव, लीला, नित, चंद्रमणि/उल्लाला, धरणी/चंडिका, कज्जल, सखी, विजाति, हाकलि, मानव, मधुमालती, सुलक्षण, मनमोहन, सरस, मनोरम, चौबोला, गोपी, जयकारी/चौपई, भुजंगिनी/गुपाल, उज्जवला, पुनीत, पादाकुलक, पद्धरि, अरिल्ल व डिल्ला छंद)
•
विधान
प्रति पद १६ मात्रा, पदांत बंधन नहीं, ८+गुरु+४+गुरु, चौकल वर्जित।
लक्षण छंद-
पज्झटिका मात्रा सोलह है।
अठ पे फिर चौ पे गुरु शुभ है।।
जगण न चौकल में आ पाए।
काव्य कसौटी जीत दिलाए।।
उदाहरण-
जन गण का मन हो न अब दुखी।
काम करे सरकार बहुमुखी।।
भ्रष्टाचार न हो अब हावी।
वैमनस्य हो भाग्य न भावी।।
सद्भावों को मौका देंगे।
किस्मत अपनी आप लिखेंगे।।
नहीं सियासत के गुलाम हो।
नव आशा के बीज नए बो।।
स्वेद-परिश्रम की जय बोलें।
उन्नति का ताला झट खोलें।।
४-१०-२०२२
•••
ॐ
छंदशाला ३६
सिंह छंद
(इससे पूर्व- सुगती/शुभगति, छवि/मधुभार, गंग, निधि, दीप, अहीर/अभीर, शिव, भव, तोमर, ताण्डव, लीला, नित, चंद्रमणि/उल्लाला, धरणी/चंडिका, कज्जल, सखी, विजाति, हाकलि, मानव, मधुमालती, सुलक्षण, मनमोहन, सरस, मनोरम, चौबोला, गोपी, जयकारी/चौपई, भुजंगिनी/गुपाल, उज्जवला, पुनीत, पादाकुलक, पद्धरि, अरिल्ल, डिल्ला व पज्झटिका छंद)
•
विधान
प्रति पद १६ मात्रा, आदि II अंत IIS ।
लक्षण छंद-
लघु पदादि दो, अंत सगण हो।
समधुर छंद सरस शुभ प्रण हो।।
सिंह शुभ नाम छंद का रखिए।
रचिए कहिए सुनिए गुनिए।।
उदाहरण
हिलमिलकर रह साथ विहँसिए।
सुमन सदृश खिल, खूब महकिए।।
तितली निर्भय उड़कर रस ले।
जग-जीवन का मौन निरखिए।।
शंकर रहता है कंकर में
ठुकरा कभी न नाहक तजिए।।
विजयादशमी जीतें खुद को
बिन कुछ माँगे प्रभु को भजिए।।
जिसके मन में चाहें रखना
उसके मन में खुद भी बसिए।।
वह न कहाँ है? सभी जगह है।
नयन मूँद मन मंदिर लखिए।।
अपना कौन?, कौन नहिं अपना?
सबमें वह, सबके बन रहिए।।
विजयादशमी
५-१०-२०२२
•••
विमर्श : छंद - संकुचन और विस्तार १
*
- छंद क्या?
= जो छा जाए वह छंद।
- क्या सर्वत्र छा सकता है
= प्रकाश?
- प्रकाश सर्वत्र छा सकता तो छाया तथा ग्रहण न होते। सर्वत्र छा सकती है ध्वनि या नाद।
= क्या ध्वनि या नाद छंद है?
- नहीं, ध्वनि छंद का मूल है। जब नाद की बार-बार आवृत्ति हो तो निनाद जन्मता है।
निनाद में लयखंड समाहित होता है।
लयखंड की आवृत्ति कर छंद रचना की जाती है।
निनाद के उच्चार को उच्चार काल की दृष्टि से लघु उच्चार तथा गुरु उच्चार में वर्गीकृत किया गया है।
सर्वमान्य है कि वाक् का व्यवस्थित रूप भाषा है।
प्रकृति में सन् सन्, कलकल, गर्जन आदि ध्वनियाँ अंतर्निहित हैं।
सृष्टि का जन्म ही नाद से हुआ है।
जीव जन्मते ही ध्वनि का उच्चार कर अपने पदार्पण का जयघोष करता है।
कलरव, कूक, दहाड़ आदि में रस, लय तथा भाव की अनुभूति की जा सकती है।
क्रौंच-क्रंदन की पीर ही प्रथम काव्य रचना का मूल है।
वाक् के उच्चार काल के आवृत्तिजनित समुच्चय विविध लयखंडों को जन्म देते हैं।
सार्थक लयखंड एक की अनुभूति को अन्यों तक संप्रेषित करते हैं।
लोक इन लय खंडों को प्रकृति तथा परिवेश (जीव-जंतु) से ग्रहण कर उनका दोहराव कर बेतार के तार की तरह स्वानुभूति को अभिव्यक्त और प्रेषित करता है।
क्रमशः
विमर्श : रेफ युक्त शब्द
राकेश खंडेलवाल
रेफ़ वाले शब्दों के उपयोग में अक्सर गलती हो जाती हैं। हिंदी में 'र' का संयुक्त रूप से तीन तरह से उपयोग होता है। '
१. कर्म, धर्म, सूर्य, कार्य
२. प्रवाह, भ्रष्ट, ब्रज, स्रष्टा
३. राष्ट्र, ड्रा
जो अर्ध 'र' या रेफ़ शब्द के ऊपर लगता है, उसका उच्चारण हमेशा उस व्यंजन ध्वनि से पहले होता है, जिसके ऊपर यह लगता है। रेफ़ के उपयोग में ध्यान देने वाली महत्वपूर्ण बात यह है कि स्वर के ऊपर नहीं लगाया जाता। यदि अर्ध 'र' के बाद का वर्ण आधा हो, तब यह बाद वाले पूर्ण वर्ण के ऊपर लगेगा, क्योंकि आधा वर्ण में स्वर नहीं होता। उदाहरण के लिए कार्ड्‍‍स लिखना गलत है। कार्ड्‍स में ड्‍ स्वर विहीन है, जिस कारण यह रेफ़ का भार वहन करने में असमर्थ है। इ और ई जैसे स्वरों में रेफ़ लगाने की कोई गुंजाइश नहीं है। इसलिए स्पष्ट है कि किसी भी स्वर के ऊपर रेफ़ नहीं लगता।
ब्रज या क्रम लिखने या बोलने में ऐसा लगता है कि यह 'र' की अर्ध ध्वनि है, जबकि यह पूर्ण ध्वनि है। इस तरह के शब्दों में 'र' का उच्चारण उस वर्ण के बाद होता है, जिसमें यह लगा होता है ,
जब भी 'र' के साथ नीचे से गोल भाग वाले वर्ण मिलते हैं, तब इसके /\ रूप क उपयोग होता है, जैसे-ड्रेस, ट्रेड, लेकिन द और ह व्यंजन के साथ 'र' के / रूप का उपयोग होता है, जैसे- द्रवित, द्रष्टा, ह्रास।
संस्कृत में रेफ़ युक्त व्यंजनों में विकल्प के रूप में द्वित्व क उपयोग करने की परंपरा है। जैसे- कर्म्म, धर्म्म, अर्द्ध। हिंदी में रेफ़ वाले व्यंजन को द्वित्व (संयुक्त) करने का प्रचलन नहीं है। इसलिए रेफ़ वाले शब्द गोवर्धन, स्पर्धा, संवर्धन शुद्ध हैं।
''जो अर्ध 'र' या रेफ़ शब्द के ऊपर लगता है, उसका उच्चारण हमेशा उस व्यंजन ध्वनि से पहले होता है। '' के संबंध में नम्र निवेदन है कि रेफ कभी भी 'शब्द' पर नहीं लगाया जाता. शब्द के जिस 'अक्षर' या वर्ण पर रेफ लगाया जाता है, उसके पूर्व बोला या उच्चारित किया जाता है।
- संजीव सलिल:
''हिंदी में 'र' का संयुक्त रूप से तीन तरह से उपयोग होता है.'' के संदंर्भ में निवेदन है कि हिन्दी में 'र' का संयुक्त रूप से प्रयोग चार तरीकों से होता है। उक्त अतिरिक्त ४. कृष्ण, गृह, घृणा, तृप्त, दृष्टि, धृष्ट, नृप, पृष्ठ, मृदु, वृहद्, सृष्टि, हृदय आदि। यहाँ उच्चारण में छोटी 'इ' की ध्वनि समाविष्ट होती है जबकि शेष में 'अ' की।
यथा: कृष्ण = krishn, क्रम = kram, गृह = ग्रिह grih, ग्रह = grah, श्रृंगार = shringar, श्रम = shram आदि।
राकेश खंडेलवाल :
एक प्रयोग और: अब सन्दर्भ आप ही तलाशें:
दोहा:-
सोऽहं का आधार है, ओंकार का प्राण।
रेफ़ बिन्दु वाको कहत, सब में व्यापक जान।१।
बिन्दु मातु श्री जानकी, रेफ़ पिता रघुनाथ।
बीज इसी को कहत हैं, जपते भोलानाथ।२।
हरि ओ३म तत सत् तत्व मसि, जानि लेय जपि नाम।
ध्यान प्रकाश समाधि धुनि, दर्शन हों बसु जाम।३।
बांके कह बांका वही, नाम में टांकै चित्त।
हर दम सन्मुख हरि लखै, या सम और न बित्त।४।
रेफ का अर्थ:
-- वि० [सं०√रिफ्+घञवार+इफन्] १. शब्द के बीच में पड़नेवाले र का वह रूप जो ठीक बाद वाले स्वरांत व्यंजन के ऊपर लगाया जाता है। जैसे—कर्म, धर्म, विकर्ण। २. र अक्षर। रकार। ३. राग। ४. रव। शब्द। वि० १. अधम। नीच। २. कुत्सित। निन्दनीय। -भारतीय साहित्य संग्रह.
-- पुं० [ब० स०] १. भागवत के अनुसार शाकद्वीप के राजा प्रियव्रत् के पुत्र मेधातिथि के सात पुत्रों में से एक। २. उक्त के नाम पर प्रसिद्ध एक वर्ष अर्थात् भूखंड।
रेफ लगाने की विधि : डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक', शब्दों का दंगल में
हिन्दी में रेफ अक्षर के नीचे “र” लगाने के लिए सदैव यह ध्यान रखना चाहिए कि ‘र’ का उच्चारण कहाँ हो रहा है?
यदि ‘र’ का उच्चारण अक्षर के बाद हो रहा है तो रेफ की मात्रा सदैव उस अक्षर के नीचे लगेगी जिस के बाद ‘र’ का उच्चारण हो रहा है। यथा - प्रकाश, संप्रदाय, नम्रता, अभ्रक, चंद्र।
हिन्दी में रेफ या अक्षर के ऊपर "र्" लगाने के लिए सदैव यह ध्यान रखना चाहिए कि ‘र्’ का उच्चारण कहाँ हो रहा है ? “र्" का उच्चारण जिस अक्षर के पूर्व हो रहा है तो रेफ की मात्रा सदैव उस अक्षर के ऊपर लगेगी जिस के पूर्व ‘र्’ का उच्चारण हो रहा है । उदाहरण के लिए - आशीर्वाद, पूर्व, पूर्ण, वर्ग, कार्यालय आदि ।
रेफ लगाने के लिए जहाँ पूर्ण "र" का उच्चारण हो रहा है वहाँ उस अक्षर के नीचे रेफ लगाना है जिसके पश्चात "र" का उच्चारण हो रहा है। जैसे - प्रकाश, संप्रदाय , नम्रता, अभ्रक, आदि में "र" का पूर्ण उच्चारण हो रहा है ।
*
६३ ॥ श्री अष्टा वक्र जी ॥
दोहा:-
रेफ रेफ तू रेफ है रेफ रेफ तू रेफ ।
रेफ रेफ सब रेफ है रेफ रेफ सब रेफ ॥१॥
*
१५२ ॥ श्री पुष्कर जी ॥
दोहा:-
रेफ बीज है चन्द्र का रेफ सूर्य का बीज ।
रेफ अग्नि का बीज है सब का रेफैं बीज ॥१॥
रेफ गुरु से मिलत है जो गुरु होवै शूर ।
तो तनकौ मुश्किल नहीं राम कृपा भरपूर ॥२॥
*
चलते-चलते : अंग्रेजी में रेफ का प्रयोग सन्दर्भ reference और खेल निर्णायक refree के लिये होता है.
***
बाल गीत
सूरज
*
पर्वत-पीछे झाँके ऊषा
हाथ पकड़कर आया सूरज।
पूर्व प्राथमिक के बच्चे सा
धूप संग इठलाया सूरज।
*
योग कर रहा संग पवन के
करे प्रार्थना भँवरे के सँग।
पैर पटकता मचल-मचलकर
धरती मैडम हुईं बहुत तँग।
तितली देखी आँखमिचौली
खेल-जीत इतराया सूरज।
पूर्व प्राथमिक के बच्चे सा
नाक बहाता आया सूरज।
*
भाता है 'जन गण मन' गाना
चाहे दोहा-गीत सुनाना।
झूला झूले किरणों के सँग
सुने न, कोयल मारे ताना।
मेघा देख, मोर सँग नाचे
वर्षा-भीग नहाया सूरज।
पूर्व प्राथमिक के बच्चे सा
झूला पा मुस्काया सूरज।
*
खाँसा-छींका, आई रुलाई
मैया दिशा झींक-खिसियाई।
बापू गगन डॉक्टर लाया
डरा सूर्य जब सुई लगाई।
कड़वी गोली खा, संध्या का
सपना देख न पाया सूरज।
पूर्व प्राथमिक के बच्चे सा
कॉमिक पढ़ हर्षाया सूरज।
५.१०.२०२१
***
कार्य शाला: दोहा / रोला / कुण्डलिया
*
तुहिन कणों से सज गए,किसलय कोमल फूल।
"दीपा" कैसे दिख रहे, धूल सने सब शूल।। - माँ प्रदीपा
धूल सने सब शूल, त्रास दे त्रास पा रहे।
दे परिमल सब सुमन, जगत का प्यार पा रहे।।
सुलझे कोई प्रश्न, कभी कब कहाँ रणों से।
किसलय कोमल फूल सज गए तुहिन कणों से।। - संजीव
*
मन का डूबा डूबता , बोझ अचिन्त्य विचार ।
चिन्तन का श्रृंगार ही , देता इसे उबार ॥ -शंकर ठाकुर चन्द्रविन्दु देता इसे उबार, राग-वैराग साथ मिल। तन सलिला में कमल, मनस का जब जाता खिल।। चंद्रबिंदु शिव भाल, सोहता सलिल-धार बन। उन्मन भी हो शांत, लगे जब शिव-पग में मन।। -संजीव
*
शब्द-शब्द प्रांजल हुए, अनगिन सरस श्रृंगार।
सलिल सौम्य छवि से द्रवित, अंतर की रसधार।।-अरुण शर्मा
अंतर की रसधार, न सूखे स्नेह बढ़ाओ।
मिले शत्रु यदि द्वार, न छोड़ो मजा चखाओ।।
याद करे सौ बरस, रहकर वह बे-शब्द।
टेर न पाए खुदा को, बिसरे सारे शब्द।। - संजीव
५.१०.२०१८
***
लघुकथाएँ
सियाह लहरें
*
दस नौ आठ सात
उलटी गिनती आरम्भ होते ही सबके हृदयों की धड़कनें तेज हो गयीं। अनेक आँखें स्क्रीन पर गड गयीं। कुछ परदे पर दुःख रही नयी रेखा को देख रहे थे तो कुछ हाथों में कागज़ पकड़े परदे पर बदलते आंकड़ों के साथ मिलान कर रहे थे। कुछ अन्य कक्ष में बैठे अति महत्वपूर्ण व्यक्तियों को कुछ बता रहे थे।
दूरदर्शन के परदे पर अग्निपुंज के बीच से निकलता रॉकेट। नील गगन के चीरता बढ़ता गया और पृथ्वी के परिपथ के समीप दूसरा इंजिन आरम्भ होते ही परिपथ में प्रविष्ट हो गया। आनंद से उछल पड़े वे सब।
​
प्रधान मंत्री, रक्षा मंत्री आदि ने प्रमुख वैज्ञानिक, उनके पूरे दल और सभी कर्मचारियों को बधाई देते हुए अल्प साधनों, निर्धारित से कम समय तथा पहले प्रयास में यह उपलन्धि पाने को देश का गौरव बताया। आसमान पर इस उपलब्धि का डंका पीट रही थीं रहीं थीं रॉकेट के जले ईंधन से बनी फैलती जा रही सियाह लहरें।
*
टुकड़े स्पात के
*
धाँय धाँय धाँय
भारी गोलाबारी ने काली रात को और अधिक भयावह बना दिया था किन्तु वे रेगिस्तान की रेत के बगुलों से भरी अंधी में भी अविचलित दुश्मन की गोलियों का जवाब दे रहे थे। अन्तिम पहर में दहशत फैलाती भरी आवाज़ सुनकर एक ने झरोखे से झाँका और घुटी आवाज़ में चीखा 'उठो, टैंक दस्ता'। पल भर में वे सब अपनी मशीन गनें और स्टेन गनें थामे हमले के लिये तैयार थे। चौकी प्रभारी ने कमांडर से सम्पर्क कर स्थिति की जानकारी दी, सवेरे के पहले मदद मिलना असम्भव था।
कमांडर ने चौकी खाली करने को कहा लेकिन चौकी पर तैनात टुकड़ी के हर सदस्य ने मना करते हुए आखिरी सांस और खून की आखिरी बूँद तक संघर्ष का निश्चय किया। प्रभारी ने दोपहर तह मुट्ठी भर जवानों के साथ दुश्मन की टैंक रेजमेंट का सामना करने की रणनीति के तहत सबको खाई और बंकरों में छिपने और टैंकों के सुरक्षित दूरी तक आने के पहले के आदेश दिए।
पैदल सैनिकों को संरक्षण (कवर) देते टैंक सीमा के समीप तक आ गये। एक भी गोली न चलने से दुश्मन चकित और हर्षित था कि बिना कोई संघर्ष किये फतह मिल गयी। अचानक 'जो बोले सो निहाल' की सिंह गर्जना के साथ टुकड़ी के आधे सैनिक शत्रु के जवानों पर टूट पड़े, टैंक इतने समीप आ चुके थे कि उनके गोले टुकड़ी के बहुत पीछे गिर रहे थे। दुश्मन सच जान पाता इसके पहले ही टुकड़ी के बाकी जवान हथगोले लिए टैंकों के बिलकुल निकट पहुँच गए और जान की बाजी लगाकर टैंक चालकों पर दे मारे। धू-धू कर जलते टैंकों ने शत्रु के फौजियों का हौसला तोड़ दिया। प्राची में उषा की पहली किरण के साथ वायुयानों ने उड़ान भरी और उनकी सटीक निशानेबाजी से एक भी टैंक न बच सका। आसमान में सूर्य चमका तो उसे भी मुट्ठी भर जवानों को सलाम करना पड़ा जिनके अद्भुत पराक्रम की साक्षी दे रहे थे मरे हुए शत्रु जवान और जलते टैंकों के इर्द-गिर्द फैले स्पात के टुकड़े।
५.९.२०१६
***
दोहा:
(मात्रिक छंद, १३-११)
*
दर्शन कर कैलाश के, पढ़ गीता को नित्य
मात-पिता जब हों सदय, शिशु को मिलें अनित्य
५.९.२०१५
***
गीत:
आराम चाहिए...
*
हम भारत के जन-प्रतिनिधि हैं
हमको हर आराम चाहिए.....
*
प्रजातंत्र के बादशाह हम,
शाहों में भी शहंशाह हम.
दुष्कर्मों से काले चेहरे
करते खुद पर वाह-वाह हम.
सेवा तज मेवा के पीछे-
दौड़ें, ऊँचा दाम चाहिए.
हम भारत के जन-प्रतिनिधि हैं
हमको हर आराम चाहिए.....
*
पुरखे श्रमिक-किसान रहे हैं,
मेहनतकश इन्सान रहे हैं.
हम तिकड़मी,घोर छल-छंदी-
धन-दौलत अरमान रहे हैं.
देश भाड़ में जाए हमें क्या?
सुविधाओं संग काम चाहिए.
हम भारत के जन-प्रतिनिधि हैं
हमको हर आराम चाहिए.....
*
स्वार्थ साधते सदा प्रशासक.
शांति-व्यवस्था के खुद नाशक.
अधिनायक हैं लोकतंत्र के-
हम-वे दुश्मन से भी घातक.
अवसरवादी हैं हम पक्के
लेन-देन बेनाम चाहिए.
हम भारत के जन-प्रतिनिधि हैं
हमको हर आराम चाहिए.....
*
सौदे करते बेच देश-हित,
घपले-घोटाले करते नित.
जो चाहो वह काम कराओ-
पट भी अपनी, अपनी ही चित.
गिरगिट जैसे रंग बदलते-
हमको ऐश तमाम चाहिए.
हम भारत के जन-प्रतिनिधि हैं
हमको हर आराम चाहिए.....
*
वादे करते, तुरत भुलाते.
हर अवसर को लपक भुनाते.
हो चुनाव तो जनता ईश्वर-
जीत उन्हें ठेंगा दिखलाते.
जन्म-सिद्ध अधिकार लूटना
'सलिल' स्वर्ग सुख-धाम चाहिए.
हम भारत के जन-प्रतिनिधि हैं
हमको हर आराम चाहिए.....
५.९.२०१४
***
प्रतिपदा पर शुभकामना सहित
दोहा सलिला
दुर्गा दुर्गतिनाशिनी
*
दुर्गा! दुर्गतिनाशिनी, दक्षा दयानिधान
दुष्ट-दंडिनी, दध्यानी, दयावती द्युतिवान
*
दीपक दीपित दयामयि!, दिव्याभित दिनकांत
दर्प-दर्द-दुःख दमित कर, दर्शन दे दिवसांत
*
देह दुर्ग दुर्गम दिपे, दिनकरवत दिन-रात
दुश्मन&दल दहले दिखे, दलित&दमित जग&मात
*
दमन] दैत्य दुरित दनुज, दुर्नामी दुर्दांत
दयित दितिज दुर्दम दहक, दम तोड़ें दिग्भ्रांत
*
दंग दंगई दबदबा,देख देवि-दक्षारि
दंभी-दर्पी दग्धकर, हँसे शिव-दनुजारि
*
दर्शन दे दो दक्षजा, दयासिन्धु दातार
दीप्तिचक्र दीननाथ दे, दिप-दिप दीपाधार
*
दीर्घनाद-दुन्दुभ दिवा, दिग्दिगंत दिग्व्याप्त
दिग्विजयी दिव्यांगना, दीक्षा दे दो आप्त
*
दिलावरी दिल हारना, दिलाराम से प्रीत
दिवारात्रि -दीप्तान्गिनी, दिल हारे दिल जीत
*
दया&दृष्टि कर दो दुआ, दिल से सहित दुलार
देइ! देशना दिव्या दो, देश-धर्म उपहार
=========================
दध्यानी = सुदर्शन, दमनक = दमनकर्ता, त्य = दनुज= राक्षस, दुरित = पापी, दुर्दम =अदम्य, दातार = ईश्वर, दीर्घनाद = शंख, दुन्दुभ = नगाड़ा, दियना = दीपक, दिलावरी = वीरता, दिलाराम व प्रेमपात्र, दिवारात्रि = दिन-रात, देइ = देवी, देशना = उपदेश
***
नव गीत
*
हम सब
माटी के पुतले है...
*
कुछ पाया
सोचा पौ बारा.
फूल हर्ष से
हुए गुबारा.
चार कदम चल
देख चतुर्दिक-
कुप्पा थे ज्यों
मैदां मारा.
फिसल पड़े तो
सच जाना यह-
बुद्धिमान बनते,
पगले हैं.
हम सब
माटी के पुतले है...
*
भू पर खड़े,
गगन को छूते.
कुछ न कर सके
अपने बूते.
बने मिया मिट्ठू
अपने मुँह-
खुद को नाहक
ऊँचा कूते.
खाई ठोकर
आँख खुली तो
देखा जिधर
उधर घपले हैं.
हम सब
माटी के पुतले है...
*
नीचे से
नीचे को जाते.
फिर भी
खुद को उठता पाते.
आँख खोलकर
स्वप्न देखते-
फिरते मस्ती
में मदमाते.
मिले सफलता
मिट्टी लगती.
अँधियारे
लगते उजले हैं.
हम सब
माटी के पुतले है...
१-१०-२००९
***

रविवार, 4 अक्टूबर 2026

अक्टूबर ४, सॉनेट, सोरठा, कन्या भोज, छंद स्रग्विणी, दोहा, अर्थालंकार, अवधी हाइकु, नर्मदा, लघुकथा



सलिल सृजन अक्टूबर ४
*
दोहा
.
भाषा-गौ दोहा दुहे, गोरस  लय रस भाव।
अर्थ शिल्प पच तत्व मय, मेटे सकल अभाव।।
.
शब्द-शब्द में अर्थ भर, दो पद रस अरु भाव।
अलंकार लय चौ चरण, बिंब-प्रतीक स्वभाव।।
.
तेरह लहरों पर हुए, ग्यारह कमल सवार।
अड़तालिस की नाव में, दो पद हैं पतवार।।
.
चार चरण हैं चार युग, दो पद कोशिश-लक्ष्य।
अर्थ प्राण तन शब्द हैं, लय है श्वास अदृश्य।।
.
पंचायत है समय की, दोहा सत्य बयान।
अर्थ फैसले का करे, निश-दिन युग गुणगान।।
४.१०.२०२६
०००
सॉनेट
देह
•
देह पर अधिकार मेरा
यह अदालत कह रही है
गेह पर हक नहीं मेरा
धार कैसी बह रही है?
चोट मन की कौन देखे
लगीं कितनी कब कहाँ पर?
आत्मा को कौन लेखे
वेदना बिसरी तहा कर?
साथ फेरे जब लिए थे
द्वैत तज अद्वैत वरने
वचन भी देकर लिए थे
दूरियाँ किंचित न धरने।
उसे हक किंचित नहीं हो
साथ मेरे जो रहा हो।
४-१०-२०२२
•••
एक रचना
*
अदालत की अदा लत जैसे लुभाती
झूठ-सच क्या है, नहीं पहचान पाती
न्याय करना, कराना है काम जिनका
उन्हीं के हाथों गला सच का दबाती
अर्ज केवल अर्जियाँ ही यहाँ होतीं
फर्ज फर्जी मर्जियाँ ही फसल बोतीं
कोट काले सफेदी को धर दबाते
स्याह के हाथों उजाले मात खाते
गवाहों की गवाही बाजार बनती
कागजों की कागजी जय ख्वाब बुनती
सुपनखा की नाक काटी जेल होगी
एड़ियाँ घिरते रहो नहिं बेल होगी
गोपियों के वसन छीने चलो थाने
गड्डियाँ लाओ मिलेगा तभी जाने
बेच दो घर-खेत, दे दो घूस इसको
कर्ज लेकर चुका दो तुम फीस उसको
पेशियों पर पेशियाँ आगे बढ़ेंगी
पीढ़ियाँ दर पीढ़ियाँ लड़ती रहेंगी
न्याय का ले नाम नित अन्याय होगा
आस को, विश्वास को उपहार धोखा
वे करेंगे मौज, दीवाला हमारा
मर मिटे हम, पौ उन्हीं की हुई बारा
४-१०-२०२२
•••
सोरठा सलिला
•
रखें हमेशा ध्यान, ट्रेन रेल पर दौड़ती।
जाते हम लें मान, नगर न आ या जा सकें।।
•
मकां इमारत जान, घर घरवालों से बने।
जीव आप भगवान, मंदिर में मूरत महज।।
•
ब्रह्म कील पहचान, माया चक्की-पाट हैं।
दाना जीव समान, बचे कील से यदि जुड़े।।
४-१-२०२२
•••
विमर्श-
कन्या भोज
*
नव दुर्गा पर्व शक्ति आराधना का पर्व है। सृष्टि अथवा प्रकृति की जन्मदात्री शक्ति के ९ रूपों की उपसना पश्चात् ९ कन्याओं को उनका प्रतिनिधि मानकर पूजने तथा नैवेद्य ग्रहण करने की परंपरा चिरकालिक तथा सर्व मान्य है। कन्या रजस्वला होने के पूर्व तक की बालिकाओं के पूजन के पीछे कारण यह है की तब तक उनमें काम भावनाओं का विकास न होने से वे निष्काम होती हैं। कन्या की आयु तथा नाम: २- कुमारी, ३- त्रिदेवी, ४- कल्याणी, ५- रोहिणी, ६- कालिका, ७-चंडिका, ८- शांभवी, ९- दुर्गा, १० सुभद्रा। बालिका की आयु के अनुसार नाम लेकर प्रणाम करें ''ॐ .... देवी को प्रणाम''। स्नान कर स्वच्छ वस्त्रधारी कन्या के चरण धो-पोंछ कर, आसन पर बैठाकर माथे पर चंदन, रोली, अक्षत (बिना टूटे चावल), पुष्प आदि से तिलक कर चरणों का महावर से श्रृंगार कर भर पेट भोजन (खीर, पूड़ी, हलुआ, मेवा, फल आदि) कराएँ। खट्टी, कड़वी, तीखी, बासी सामग्री वर्जित है। कन्याओं के साथ लँगूरे (लांगुर) अर्थात अल्प वय के दो बालकों को भी भोजन कराया जाता है। कन्या के हाथ में मौली (रक्षा सूत्र) बाँधकर, तिलक कर उपहार (श्रृंगार अथवा शिक्षा संबंधी सामग्री, कुछ नगद राशि आदि ) देकर चरण स्पर्श कर, आशीर्वाद लेकर बिदा किया जाता है।
कन्या भोज का महत्त्व सामाजिकता, सौहार्द्र, समरसता तथा सुरक्षा भावना की वृद्धि है। मेरे पिता श्री चिरस्मरणीय राजबहादुर वर्मा जेलर तथा जेल अधीक्षक रहे। वे अपने निवास पर स्वयं अखंड रामायण, कन्या पूजन तथा कन्या भोज का आयोजन करते थे। अधिकारीयों व् कर्मचारियों की कन्याओं को समान आदर, भोजन व उपहार दिया जाता था। जाती, धर्म का भी भेद-भाव नहीं था। जेल कॉलोनी की सभी कन्याएँ संख्या कितनी भी हो आमंत्रित की जाती थीं। पिता जी जेल में बंद दुर्दांत अपराधियों को प्रहरियों की देख-रेख में बुलवाकर उनसे भी कन्या (मेरी बहिनें भी होती थीं) पूजन कराते थे। इस अवसर पर वे बंदी भावुक होकर फूट-फूटकर रोते थे, आगे कभी अपराध न करने की कसम खाते थे। उन बंदियों-प्रहरियों को भी प्रसाद दिया जाता था। सेवा निवृत्ति के पश्चात् माँ श्रीमती शांति देवी घर में कन्या भोज के साथ मंदिरों के बाहर बैठी भिक्षुणियों को भी प्रसाद भिजवाती थीं।
वास्तव में संपन्न परिवारों को हर दिन दरिद्र भोजन करना चाहिए। अनाथालय, वृद्धाश्रम, महिलाश्रम, अस्पताल आदि से समय तय कर दिनांक तथा समय तय कर हर माह एक बार भोजन कराएँ तो कोइ भूखा न रहे। शास्त्रों के अनुसार इससे मातृ-पितृ ऋण से मुक्ति मिलती तथा काल दोष शांत होता है। कन्या भोजन को धार्मिक के साथ-साथ सामाजिक सद्भाव के पर्व के रूप में नवाचारित किया जाना आवश्यक है।
***
कार्यशाला: ४ / १० / १८
एक गीत दो छंद
*
प्रस्तुत है माननीय सुधा अहलूवालिया जी द्वारा रचित एक गीत।
सुधा जी की अनुमति से इस गीत में छंद की पहचान का प्रयास किया जा रहा है।
छंद वाचिक स्रग्विणी ( सम मात्रिक ) मापनी - २१२ २१२ २१२ २१२
------------------
है नहीं आसरा अब दिवा-कोण का। २१२ २१२ १११२ २१२
धुन्ध छाई हुई रवि-किरण मौन है। २१२ २१२ १११११ २१२
कौन जाने कहाँ जा रही ये डगर- २१२ २१२ २१२ २१११
कौन जाने किधर अब खड़ा कौन है॥ २१२ १११११ १११२ २१२
है नहीं .....
आँख पानी भरी आज तर हो गई। २१२ २१२ २१११ २१२
चुप अधर हो गए गुम डगर हो गई। १११११ २१२ १११११ २१२
घर हुए आज कैसे किसे है पता- १११२ २१२ २१२ २१२
कौन छोटा यहाँ अब बड़ा कौन है॥ २१२ २१२ १११२ २१२
है नहीं .....
आ चलें प्रिय वहीं दूर कोई न हो। २१२ १११२ २१२ २१२
जागती हो दिशा, साँझ सोई न हो। २१२ २१२ २१२ २१२ *
है विरह वेदना जो मनों में दबी- २११११ २१२ २१२ २१२
आ प्रिये बाँट लें अब अड़ा कौन है॥ २१२ २१२ १११२ २१२
है नहीं .....
मैं पवन का प्रिये शुचि सजल वेग हूँ। २१११ २१२ २१२ २१२
तू सुमन मैं प्रिये बस सरस नेग हूँ। २१११ २१२ १११११ २१२
हैं समाहित सुनों प्रिय हुए एक हम- २१२ १११२ १११२ २१११
देख शुचिता सुभग अब लड़ा कौन है २१११ २१११ १११२ २१२
है नहीं .....
*
स्रग्विणी छन्द का विधान ४ x रगण अर्थात ४ (२१२) है.
तारांकित * पंक्ति के अलावा किसी भी पंक्ति में इस विधान का पूरी तरह पालन नहीं किया गया है।
स्रग्विणी का उदाहरण देखें -
अच्युतं केशवं रामनारायणं कृष्ण दामोदरं वासुदेवं हरिं.
इसकी मात्रा गणना देखें -
अच्युतं २१२ केशवं २१२ रामना २१२ रायणं२१२. कृष्ण दा २१२ मोदरं २१२ वासुदे २१२ वं हरिं २१२.
यहाँ गण-व्यवस्था का शत-प्रतिशत पालन किया गया है। स्पष्ट है कि दो लघु को गुरु या गुरु को दो लघु नहीं किया जा सकता किंतु गण का अंत या आरंभ शब्द के बीच में हो सकता है। ऐसे स्थिति में पढ़ते समय अल्प विराम गण के संधि स्थल पर होता है।
क्या हिंदी में छंद रचते समय भी ऐसा ही नहीं किया जाना चाहिए? आइए, उक्त गीत के प्रथम पद को स्रग्विणी छंद में रूपांतरित करें-
रे! नहीं आसरा है दिवा-कोण का।
धुन्ध छाई हुई सूर्यजा मौन है।
कौन जाने कहाँ जा रही राह ये-
कौन जाने कहाँ तू खड़ा कौन है॥
यदि रचनाकार आरम्भ से ही सजग हो तो शुद्ध छंद में रचना की जा सकती है।
यह सरस गीत अरुण छंद के भी निकट है। जिन्हें रुचि हो वे अरुण और स्रग्विणी छंदों का तुलनात्मक अध्ययन (समानता और असमानता) कर सकते हैं।
इस अध्ययन हेतु अपना गीत उपलब्ध करने के लिए सुधाजी के प्रति पुन: आभार।
***
दोहा सलिला
*
लिखा आज बिन लिखे कुछ, पढ़ा बिन पढ़े आज।
केर-बेर के संग से, सधे न साधे काज।।
*
अर्थ न रहे अनर्थ में, अर्थ बिना सब व्यर्थ।
समझ न पाया किस तरह, समझा सकता अर्थ।।
*
सजे अधर पर जब हँसी, धन्य हो गयी आप।
पैमाना कोई नहीं, जो खुशियाँ ले नाप।।
*
सही करो तो गलत क्यों, समझें-मानें लोग?
गलत करो तो सही, कह; बढ़ा रहे हैं रोग।।
*
दिल के दिल में क्या छिपा, बेदिल से मत बोल।
संग न सँगदिल का करो, रह जाएगी झोल।।
*
प्राण गए तो देह के, अंग दीजिए दान।
जो मरते जी सकेंगे, ऐसे कुछ इंसान।।
*
कंकर भी शंकर बने, कर विराट का संग।
रंग नहीं बदरंग हो, अगर करो सत्संग।।
*
कृष्णा-कृष्णा सब करें, कृष्ण हँस रहे देख।
काम मैं करूँ द्रौपदी, का होता उल्लेख?
*
मटक-मटक जो फिर रहे, अटक रहे हर ठौर।
फटक न; सटके सफलता, अटके; करिए गौर।।
*
३.८.२०१८
मुक्तक एक-रचनाकार दो
*
बुझी आग से बुझे शहर की, हों जो राख़ पुती सी रातें
दूर बहुत वो भोर नहीं अब, जो लाये उजली सौगातें - आभा खरे, लखनऊ
सभी परिंदों सावधान हो, बाज लगाए बैठे घातें
रोक सकें सरकारों की अब, कहाँ रहीं ऐसी औकातें? - संजीव, जबलपुर
***
: अलंकार चर्चा १६ :
अर्थालंकार :
*
रूपायित हो अर्थ से, वस्तु चरित या भाव
तब अर्थालंकार से, बढ़ता काव्य-प्रभाव
कारण-कार्य विरोध या, साम्य बने आधार
तर्क श्रृंखला से 'सलिल', अर्थ दिखे साकार
जब वस्तु, भाव, विचार एवं चरित्र का रूप-निर्धारण शब्दों के चमत्कार के स्थान पर शब्दों के अर्थ से किया जाता है तो वहाँ अर्थालंकार होता है. अर्थालंकार के निरूपण की प्रक्रिया का माध्यम सादृश्य, वैषम्य, साम्य, विरोध, तर्क, कार्य-कारण संबंध आदि होते हैं.
अर्थालंकार के प्रकार-
अर्थालंकार मुख्यत: ७ प्रकार के हैं
१. सादृश्यमूलक या साधर्म्यमूलक अर्थालंकार
२. विरोध या वैषम्य मूलक अर्थालंकार
३. श्रृंखलामूलक अर्थालंकार
४. तर्कन्यायमूलक अर्थालंकार
५. काव्यन्यायमूलक अर्थालंकार
६. लोकनयायमूलक अर्थालंकार
७. गूढ़ार्थप्रतीति अर्थालंकार
१. सादृश्यमूलक या साधर्म्यमूलक अर्थालंकार:
इस अलंकार का आधार किसी न किसी प्रकार (व्यक्ति, वस्तु, भाव,विचार आदि) की समानता होती है. सबसे अधिक व्यापक आधार युक्त सादृश्य मूलक अलंकार का उद्भव किसी व्यक्ति, वस्तु, विचार, भाव आदि का निरूपण करने के लिये समान गुण-धर्म युक्त अन्य व्यक्ति, वस्तु, विचार, भाव आदि से तुलना अथवा समानता बताने से होता है. प्रमुख साधर्म्यमूलक अलंकार उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, रूपकातिशयोक्ति, पटटीप, भ्रान्ति, संदेह, स्मरण, अपन्हुति, व्यतिरेक, दृष्टान्त, निदर्शना, समासोक्ति, अन्योक्ति आदि हैं. किसी वस्तु की प्रतीति कराने के लिये प्राय: उसके समान किसी अन्य वस्तु का वर्णन किया जाता है. किसी व्यक्ति, वस्तु, विचार, भाव आदि का वर्णन करने से इष्ट अन्य व्यक्ति, वस्तु, विचार, भाव आदि का चित्र स्पष्ट कराया जाता है. यह प्रक्रिया २ वर्गों में विभाजित की जा सकती है.
अ. गुणसाम्यता के आधार पर
आ. क्रिया साम्यता के आधार पर तथा
इनके विस्तार अनेक प्रभेद सदृश्यमूलक अलंकारों में देखे जा सकते हैं. गुण साम्यता के आधार पर २ रूप देखे जा सकते हैं:
१. सम साम्य-वैषम्य मूलक- समानता-असमानता की बराबरी हो. जैसे उपमा, उपमेयोपमा, अनन्वय, स्मरण, संदेह, प्रतीप आदि अलंकारों में.
२. साम्य प्रधान - अत्यधिक समानता के कारण भेदहीनता। यह भेद हीनता आरोप मूलक तथा समाहार मूलक दो तरह की होती है.
इनके २ उप वर्ग क. आरोपमूलक व ख समाहार या अध्यवसाय मूलक हैं.
क. आरोपमूलक अलंकारों में प्रस्तुत (उपमेय) के अंदर अप्रस्तुत (उपमान) का आरोप किया जाता है. जैसे रूपक, परिणाम, भ्रांतिमान, उल्लेख अपन्हुति आदि में.
समाहार या अध्यवसाय मूलक अलंकारों में उपमेय या प्रस्तुत में उपमान या अप्रस्तुत का ध्यवसान हो जाता है. जैसे: उत्प्रेक्षा, अतिशयोक्ति आदि.
ख. क्रिया साम्यता पर आधारित अलंकारों में साम्य या सादृश्य की चर्चा न होकर व्यापारगत साम्य या सादृश्य की चर्चा होती है. तुल्ययोगिता, दीपक, निदर्शना, अर्थान्तरन्यास, व्यतिरेक, शक्ति, विनोक्ति, समासोक्ति, परिकर, पर्यायोक्ति, व्याजस्तुति, आक्षेप आदि अलंकार इस वर्गान्तर्गत सम्मिलित किये जा सकते हैं. इन अलंकारों में सादृश्य या साम्य का स्वरुप क्रिया व्यापार के रूप में प्रगट होता है. इनमें औपम्य चमत्कार की उपस्थिति के कारण इन्हें औपम्यगर्भ भी कहा जाता है.
२. विरोध या वैषम्य मूलक अर्थालंकार-
इन अलंकारों का आधार दो व्यक्ति, वस्तु, विचार, भाव आदि का अंतर्विरोध होता है. वस्तु और वास्तु का, गुण और गुण का, क्रिया और क्रिया का कारण और कार्य का अथवा उद्देश्य और कार्य का या परिणाम का विरोध ही वैशान्य मूलक अलंकारों का मूल है. प्रमुख वैषम्यमूलक अलंकार विरोधाभास, असंगति, विभावना, विशेषोक्ति, विषम, व्याघात, अल्प, अधिक आदि हैं.
३. श्रृंखलामूलक अर्थालंकार-
इन अलंकारों का मूल आधार क्रमबद्धता है. एकावली, करणमाला, मालदीपक, सार आदि अलंकार इस वर्ग में रखे जाते हैं.
४. तर्कन्यायमूलक अर्थालंकार-
इन अलंकारों का उत्स तर्कप्रवणता में अंतर्निहित होती है. काव्यलिंग तथा अनुमान अलंकार इस वग में प्रमुख है.
५. काव्यन्यायमूलक अर्थालंकार-
इस वर्ग में परिसंख्या, यथा संख्य, तथा समुच्चय अलंकार आते हैं.
६. लोकन्यायमूलक अर्थालंकार-
इन अलंकारों की प्रतीति में लोक मान्यताओं का योगदान होता है. जैसे तद्गुण, अतद्गुण, मीलित, उन्मीलित, सामान्य ततः विशेषक अलंकार आदि.
७. गूढ़ार्थप्रतीति अर्थालंकार- किसी कथ्य के पीछे छिपे अन्य कथ्य की प्रतीति करने वाले इस अलंकार में प्रमुख सूक्षम, व्याजोक्ति तथा वक्रोक्ति हैं.
===
अवधी हाइकु सलिला:
**
सुखा औ दुखा
रहत है भइया
घर मइहाँ.
*
घाम-छांहिक
फूला फुलवारिम
जानी-अंजानी.
*
कवि मनवा
कविता किरनिया
झरझरात.
*
प्रेम फुलवा
ई दुनियां मइहां
महकत है.
*
रंग-बिरंगे
सपनक भित्तर
फुलवा हन.
*
नेह नर्मदा
हे हमार बहिनी
छलछलात.
*
अवधी बोली
गजब के मिठास
मिसरी नाई.
*
अवधी केर
अलग पहचान
हृदयस्पर्शी.
*
बेरोजगारी
बिखरा घर-बार
बिदेस प्रवास.
*
बोली चिरैया
झरत झरनवा
संगीत धारा.
*
मुक्तक एक-रचनाकार दो
*
बुझी आग से बुझे शहर की, हों जो राख़ पुती सी रातें
दूर बहुत वो भोर नहीं अब, जो लाये उजली सौगातें - आभा खरे, लखनऊ
सभी परिंदों सावधान हो, बाज लगाए बैठे घातें
रोक सकें सरकारों की अब, कहाँ रहीं ऐसी औकातें? - संजीव, जबलपुर
४.१०.१६
०००
कविता
एक शब्द:
*
एक कविता पंक्ति पढ़ी
'अधजली एक लाश चौराहे पर पडी...'
लाश तो निर्जीव होती है
जो बोल नहीं सकती,
यह कैसे बोल दी?
मेडिकल साइंस को चुनौती या
गलत मृत्यु प्रमाणपत्र का मामला?
सी बी आई जाँच जरूरी या
जाँच कमीशन?
समाचारी दुनिया के लिये
टी आर पी बढ़ाने का मौक़ा,
दलीय प्रवक्ताओं के लिये
बेसिर-पैर की आग उगलती
धाँसू छवि बनाने का सुनहरा अवसर,
संसद का काम-काज रुका,
धरना-प्रदर्शन,
पुलिसिया मार,
अख़बारों में सनसनीखेज ख़बरें,
सामाजिक न्याय की दुहाई,
निर्बलों के शोषण की व्यथा-कथा,
किसी ने कहा: 'लाश युवती की थी',
बहसों में नया मोड़,
महिला विमर्शवादी सक्रिय,
महिला आयोगों द्वारा पत्रकार वार्ताएँ,
जुलूस, नारे, पत्थरबाजी,
पुलिस कार्यवाही,
नेताओं के दौरे,
अशांति के पीछे
विदेशी शक्तियों का हाथ,
धार्मिक नेताओं के बयान-
'हिन्दू पर अत्याचार नहीं सहा जाएगा,
अल्पसंख्यक का शमन,
दलित का दमन,
मूलनिवासी की दुर्दशा,
प्रधान मंत्री मौन?
प्रति प्रशन ६७ साल का
हिसाब देगा कौन?
केंद्र की घोषणा:
लाख करोड़ का अनुदान.
राज्य सरकार प्रतिक्रिया:
मृतक और जनगण का अपमान.
चकित-दिग्भ्रमित आम आदमी
पैर में अधटूटी चप्पल
आँख में नमी
अटकता-भटकता
रुकता-झुकता, सँकुचता-सिसकता
निकला सत्य की खोज में.
पता चला अचल कवि कविता
साहित्य-संपादक की मेज के स्थान पर
गलती से पहुँच गयी थी
समाचार-संपादक की मेज पर
लिखा जाना था
'अधजली एक देह चौराहे पर पडी...'
अनजाने लिखा गया
'अधजली एक लाश चौराहे पर पडी...'
बन गया तिल का ताड़
खड़ा हो गया अफवाहों का झाड़
उठ गया बवंडर।
खोदा पहाड़ निकली चुहिया
सच जानकार रह गया निशब्द
सरे विवाद और फसाद की जड़
महज एक शब्द।
४.१०.२०१५
***
नवगीत:
लछमी मैया!
पैर तुम्हारे
पूज न पाऊँ
*
तुम कुबेर की
कोठी का
जब नूर हो गयीं
मजदूरों की
कुटिया से तब
दूर हो गयीं
हारा कोशिश कर
पल भर
दीदार न पाऊँ
*
लाई-बताशा
मुठ्ठी भर ले
भोग लगाया
मृण्मय दीपक
तम हरने
टिम-टिम जल पाया
नहीं जानता
पूजन, भजन
किस तरह गाऊँ?
*
सोना-चाँदी
हीरे-मोती
तुम्हें सुहाते
फल-मेवा
मिष्ठान्न-पटाखे
खूब लुभाते
माल विदेशी
घाटा देशी
विवश चुकाऊँ
*
तेज रौशनी
चुँधियाती
आँखें क्या देखें?
न्यून उजाला
धुँधलाती
आँखें ना लेखें
महलों की
परछाईं से भी
कुटी बचाऊँ
*
कैद विदेशी
बैंकों में कर
नेता बैठे
दबा तिजोरी में
व्यवसायी
खूबई ऐंठे
पलक पाँवड़े बिछा
राह हेरूँ
पछताऊँ
*
कवि मजदूर
न फूटी आँखों
तुम्हें सुहाते
श्रद्धा सहित
तुम्हें मस्तक
हर बरस नवाते
गृह लक्ष्मी
नन्हें-मुन्नों को
क्या समझाऊँ?
***
मुक्तक सलिला:
मंगल पर पग रख दिया
नाम देश का कर दिया
इस रो में कोई नहीं-
इसरो ने साबित किया।
रो = कतार, पंक्ति
*
शक्ति पर्व है, भक्ति पर्व है
सीमा पर जो घटित हो रहा
उसे देखकर दिल रोता है
क्यों निवेश ही साध्य-सर्व है?
*
कोई न ले चीनी सामान
'लो देशी' अब हो अभियान
घाटा करें समाप्त तुरत
लेन-देन हो एक समान
*
दोहा मुक्तक:
आये आकर चले गए, मिटी नहीं तकरार
दिलविहीन दिलवर रहा, बेदिल था दिलदार
समाचार-फोटो कहें, खूब मिले थे हाथ
धन्यवाद ये कह रहे, वे कहते आभार
*
लघुकथा:
मुखडा देख ले
*
कक्ष का द्वार खोलते ही चोंक पड़े संपादक जी. गाँधी जी के चित्र के ठीक नीचे विराजमान तीनों बंदर इधर-उधर ताकते हुए मुस्कुरा रहे थे. आँखें फाड़कर घूरते हुए पहले बंदर के गले में लटकी पट्टी पर लिखा था- ' बुरा ही देखो'.
हाथ में माइक पकड़े दिगज नेता की तरह मुंह फाड़े दूसरे बंदर का कंठहार बनी पट्टी पर अंकित था- 'बुरा ही बोलो'.
' बुरा ही सुनो' की पट्टी दीवार से कान सटाए तीसरे बंदर के गले की शोभा बढ़ा रही थी.
' अरे! क्या हो गया तुम तीनों को?' गले की पट्टियाँ बदलकर मुट्ठी में नोट थामकर मेज के नीचे हाथ क्यों छिपाए हो?] संपादक जी ने डपटते हुए पूछा.
'हमने हर दिन आपसे कुछ न कुछ सीखा है. कोई कमी रह गई हो तो बताएं.'
ठगे से खड़े संपादक जी के कानों में गूँज रहा था- 'मुखडा देख ले प्राणी जरा दर्पण में ...'
***
लघुकथा:
एकलव्य
- दूरदर्शन और सभाओं में नेताओं और संतों के वाग्विलास से ऊबे पोते ने कहा
- 'नानाजी! एकलव्य महान धनुर्धर था?'
- 'हाँ; इसमें कोई संदेह नहीं है.'
- उसने व्यर्थ ही भोंकते कुत्तों का मुंह तीरों से बंद कर दिया था ?'
-हाँ बेटा.'
- 'काश वह आज भी होता.'
४.१०.२०१४
***
नर्मदा स्तुति
शिवतनया सतपुड़ा-विन्ध्य की बहिना सुगढ़ सलौनी
गोद अमरकंटक की खेलीं, उछल-कूद मृग-छौनी
डिंडोरी में शैशव, मंडला में बचपन मुस्काया
अठखेली कैशोर्य करे, संयम कब मन को भाया?
गौरीघाट किया तप, भेड़ाघाट छलांग लगाई-
रूप देखकर संगमरमरी शिला सिहर सँकुचाई
कलकल धार निनादित हरती थकन, ताप पल भर में
सांकल घाट पधारे शंकर, धारण जागृत करने
पापमुक्त कर ब्रम्हा को ब्रम्हांड घाट में मैया
चली नर्मदापुरम तवा को किया समाहित कैंया
ओंकारेश्वर को पावन कर शूलपाणी को तारा
सोमनाथपूजक सागर ने जल्दी आओ तुम्हें पुकारा
जीवन दे गुर्जर प्रदेश को उत्तर गंग कहायीं
जेठी को करने प्रणाम माँ गंगा तुम तक आयीं
त्रिपुर बसे-उजड़े शिव का वात्सल्य-क्रोध अवलोका
बाणासुर-दशशीश लड़े चुप रहीं न पल भर टोका
अहंकार कर विन्ध्य उठा, जन-पथ रोका-पछताया
ऋषि अगस्त्य ने कद बौनाकर पल में मान घटाया
वनवासी सिय-राम तुम्हारा आशिष ले बढ़ पाये
कृष्ण और पांडव तव तट पर बार-बार थे आये
परशुराम, भृगु, जाबाली, वाल्मीक हुए आशीषित
मंडन मिश्र-भारती गृह में शुक-मैना भी शिक्षित
गौरव-गरिमा अजब-अनूठी जो जाने तर जाए
मैया जगततारिणी भव से पल में पार लगाए
कर जोड़े 'संजीव' प्रार्थना करे गोद में लेना
मृण्मय तन को निज आँचल में शरण अंत में देना
४-१०-२०१२
***
गीत:
आईने अब भी वही हैं
*
आईने अब भी वही हैं
अक्स लेकिन वे नहीं...
*
शिकायत हमको ज़माने से है-
'आँखें फेर लीं.
काम था तो याद की पर
काम बिन ना टेर कीं..'
भूलते हैं हम कि मकसद
जिंदगी का हम नहीं.
मंजिलों के काफिलों में
सम्मिलित हम थे नहीं...
*
तोड़ दें गर आईने
तो भी मिलेगा क्या हमें.
खोजने की चाह में
जो हाथ में है, ना गुमें..
जो जहाँ जैसा सहेजें
व्यर्थ कुछ फेकें नहीं.
और हिम्मत हारकर
घुटने कभी टेकें नहीं...
*
बेहतर शंका भुला दें,
सोचकर ना सिर धुनें.
और होगा अधिक बेहतर
फिर नये सपने बुनें.
कौन है जिसने कहे
सुनकर कभी किस्से नहीं.
और मौका मिला तो
मारे 'सलिल' घिस्से नहीं...
*
भूलकर निज गलतियाँ
औरों को देता दोष है.
सच यही है मन रहा
हरदम स्वयं मदहोश है.
गल्तियाँ कर कर छिपाईं
दण्ड खुद भरते नहीं.
भीत रहते किन्तु कहते
हम तनिक डरते नहीं....
*
आइनों का दोष क्या है?
पूछते हैं आईने.
चुरा नजरें, फेरकर मुँह
सिर झुकाया भाई ने.
तिमिर की करते शिकायत
मौन क्यों धरते नहीं?'सलिल' बनकर दिया जलकर
तिमिर क्यों हरते नहीं??...
४-१०-२०११
***
मुक्तिका :
सिखा गया
*
जिसकी उँगली थामी चुप रहना सिखा गया.
जिसने उँगली थामी चट चलना सिखा गया..
दर्पण से बात हुई तो खुद को खुद देखा.
कोई न पराया है, जग अपना सिखा गया..
जब तनी तर्जनी तो, औरों के दोष गिने.
तब तीन उँगलियों का सच जगना सिखा गया..
आते-जाते देखा, हर हाथ मिला खाली.
बोया-पाया-खोया ही तजना सिखा गया..
ढाई आखर का सच, कोई न पढ़ा पाया.
अनपढ़ न कबीरा था, मन पढ़ना सिखा गया..
जब हो विदेह तब ही, हो पात्र प्रेम के तुम.
यमुना रज का कण-कण, रस चखना सिखा गया.
जग नेह नर्मदा है, जग अवगाहन कर लो.
हर पंकिल पग-पंकज, उठ चलना सिखा गया..
नन्हा सा तिनका भी जब पड़ा नयन में तो.
सब वहम अहम् का धो, रो-चुपना सिखा गया..
रे 'सलिल' न वारी क्यों, बनवारी पर है तू?
सुन बाँस मुरलिया बन, बज सुनना सिखा गया..
***
मुक्तिका:
किस्मत को मत रोया कर.
*
किस्मत को मत रोया कर.
प्रति दिन फसलें बोया कर..
श्रम सीकर पावन गंगा.
अपना बदन भिगोया कर..
बहुत हुआ खुद को ठग मत
किन्तु, परन्तु, गोया कर..
मन-पंकज करना है तो,
पंकिल पग कुछ धोया कर..
कुछ दुनियादारी ले सीख.
व्यर्थ न पुस्तक ढोया कर..
'सलिल' देखने स्वप्न मधुर
बेच के घोड़ा सोया कर..
४-१०-२०१०
***
स्मृति गीत-
पितृव्य हमारे नहीं रहे
*
वे
आसमान की
छाया थे.
वे
बरगद सी
दृढ़ काया थे.
थे-
पूर्वजन्म के
पुण्य फलित
वे,
अनुशासन
मन भाया थे.
नव
स्वार्थवृत्ति लख
लगता है
भवितव्य हमारे
नहीं रहे.
पितृव्य हमारे
नहीं रहे....
*
वे
हर को नर का
वन्दन थे.
वे
ऊर्जामय
स्पंदन थे.
थे
संकल्पों के
धनी-धुनी-
वे
आशा का
नंदन वन थे.
युग
परवशता पर
दृढ़ प्रहार.
गंतव्य हमारे
नहीं रहे.
पितृव्य हमारे
नहीं रहे....
*
वे
शिव-स्तुति
का उच्चारण.
वे राम-नाम
भव-भय तारण.
वे शांति-पति
वे कर्मव्रती.
वे
शुभ मूल्यों के
पारायण.
परसेवा के
अपनेपन के
मंतव्य हमारे
नहीं रहे.
पितृव्य हमारे
नहीं रहे....
२२-९-२००९
***

विजय बागरी

आलेख -

नवगीतों में नवता के वाहक विजय बागरी 
- आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
    नवगीत हिंदी गीतिकाव्य ही नहीं, सकल हिंदी साहित्य की वह विधा है जो जन-मन से और जिससे जन-मन अभिन्न है। नवगीती कचनार की गझिन शाखाओं में दिन-ब-दिन गहरे सुर्ख फूलों को खिलते देखना सगोत्री विस्तार से मिलनेवाले सुख या 'गूँगे के गुड़' की तरह है। नर्मदांचल के बुंदेलखंड क्षेत्र में नवगीत की क्यारी में सृजन के पौधे रोपने निरंतर रोपने में सर्व श्री विनोद निगम, राम सेंगर, भोलानाथ, आचार्य भगवत दुबे, गिरिमोहन गुरु, जंगबहादुर श्रीवास्तव, जयप्रकाश श्रीवास्तव आदि का अवदान उल्लेखनीय हैं। यत्किंचित योगदान मुझ अकिंचन का भी रहा है। इस क्रम में अनुजवत राजा अवस्थी, आनंद तिवारी, रामकिशोर दाहिया, विजय बागरी, अविनाश ब्योहार,  का जुड़ाव स्वागतेय है। शीघ्र ही सर्वश्री बसंत शर्मा, अरुण अर्णव खरे, सुरेश तन्मय, राजकुमार महोबिया तथा अविनाश ब्योहार, छाया सक्सेनाआदि की सृजन सामर्थ्य  नवगएट में नवाचार के प्रति आश्वस्त करती है। 

    उल्लेखनीय है कि स्व. जवाहर लाल चौरसिया 'तरुण', स्व. श्याम श्रीवास्तव, श्री यतीन्द्र नाथ 'राही', श्री कृष्णकुमार 'पथिक', श्री शिव कुमार 'अर्चन' तथा कुछ अन्य गीतकारों के रचना संसार में कई रचनाएँ नवगीत और गीत की परिधि पर हैं किंतु नवगीतों में विशिष्ट विचारधारा और शब्दावली के प्रति आग्रह से असहमति ने इन्हें नवगीतकार मानने में संकोच किया। इस कारण इन श्रेष्ठ रचनाकारों को नवगीत के आँगन में अपनी वाणी सुनाने का अवसर न मिला तो नवगीत भी इनकी उपस्थिति से गौरवान्वित होने के क्षण न पा सका। इस दुर्योग के कारण गीत और नवगीत को पिता-पुत्र की तरह परिभाषित करने और पिता का प्रवेश पुत्र के आँगन में वर्जित बतानेवालों ने अपनी अहं तुष्टि भले ही कर ली हो, नवगीत की हानि होने को नहीं रोक सके। 

    गीत के मरने का मिथ्यानुमान कर गर्व के हिमालय पर जा खड़ी हुई प्रगतिवादी कविता को फिसलने में देर न लगी। 'नानक नन्हें यों रही जैसी नन्हीं दूब' और 'प्रभुता से लघुता भली, प्रभुता से प्रभु दूर' को जी रहा गीत नव वस्त्र धारण कर 'नव' विशेषण से अभिषिक्त होकर पुन: लहलहा रहा है। अब 'नवगीत के वैचारिक पक्ष को प्रगतिवादी कविता से व्युत्पन्न', 'छांदसिकता को उर्दू ग़ज़ल से आयातित', 'गेयता को पारंपरिक गीत की देन' और 'लोकगीतों को प्रतिरोधी बताने' की दुरभिसंधि नवगीत को उसकी अपनी जमीन से दूर कर उसके प्रासाद में सेंध लगाने का तथाकथित प्रगतिवादी विचारधारा प्रणीत कुत्सित प्रयास है। वरिष्ठ नवगीतकार हर खेमे में अपनी पूछ-परख का ध्यान रखते हुए भले ही मौन रहें किंतु विजय बागरी जैसे कलमकार जो नवगीत को गीत का वारिस मानते हुए दोनों को अभिन्न देखते, मानते और साँस-साँस में जीते हैं, अपनी रचनाओं से प्रमाणित करते हैं कि नवगीती वैचारिकता अपने समय को जीते हुए गीत से, गेयता पग-पग, डग-डग पर हर दिन गुनगुन करते लोकगीत से ग्रहण करती है। नवगीत छंद को कथ्य, लय और शैली के समायोजन से आवश्यकतानुसार बनाता-अपनाता है। इसीलिये नवगीत पारंपरिक छंदों के समान्तर विविध छंदों का सम्मिश्रण भी मुखड़े और अंतरे में स्वाभाविकता, सहजता और अधिकारपूर्वक कर पाता है। 

    विजय बागरी का वैशिष्ट्य गत ५ दशकों से निरंतर न केवल सृजन करना अपितु पूर्व से बेहतर और सुविचारित सृजन करना है। वे ७ अनमोल कृतियों मैं दरिया सा बहता पानी (काव्य संग्रह), प्राची की मुस्कान (दोहा संग्रह), मैंने तुमको व्याकुल पाया (गीत संग्रह), ओझल रहे उजाले (नवगीत संग्रह), राशमियों के सारथी (नवगीत संग्रह), गीतों की मकरंद वाटिका (गीत संग्रह) तथा दिव्यंगना (मुक्तक संग्रह) का सृजन कर चुके हैं और अब विदुर पर महाकाव्य के प्रणयन में व्यस्त हैं। नवगीत की सृजन सामर्थ्य जैसे कालजयी ग्रंथ में स्थान की सीमा होना स्वाभाविक है। तदनुसार इस समीक्षालेख में विजय बागरी के दो नवगीत संग्रहों पर विमर्श कर संतोष करना होगा। नवगीतकार विजय बागरी का वैशिष्ट्य अपने परिवेश, प्रकृति और पर्यावरण के प्रति सजग और संवेदनशील होना है।उनकी गीति रचनाएँ कपोल कल्पना से दूर स्वभोगे अथवा अन्यों द्वारा भोगे हुए को साक्षी भाव से ग्रहण किये गए अनुभवों से नि:सृत हैं। विजय ग्राम्य और नागर दोनों अंचलों से जुड़े हैं इसलिए उनकी दृष्टि के सामने सृष्टि का व्यापक रूप अपनी छटा बिखेरता है। वे पूँजी  द्वारा श्रम का शोषण होते देखकर चुप न रहकर अपनी कलम से शब्द-वार करते हैं-

आँखों में घड़ियाली आँसू / बगुले करते जाप।
रंग बदलते- / गिरगिट देखे, / आसमान में साँप।
चमक-दमक, / कीकर की लगती,/ जैसे हो सागौन।
.
मौसम गुंडा- / गर्दी करता / आदमखोर हवाएँ।
संवेदन की लाशें ढोतीं / कपटी शोकसभाएँ।
श्रम सीकर के / हरे घाव पर / लेपन करते लौन।

    विजय का युवा मन समस्याओं को सुलझाने का प्रयास करता है और समाधान के रास्तों पर अवरोधों को देखकर कुंठित नहीं होता, वह व्यवस्था परिवर्तन का उद्देश्य लेकर कमियों को निडरता से इंगित करता है-

समाधान के दरवाज़े पर / लटक रहे हैं ताले।
.
जिरह पेशियाँ, कूट दलीलें / ढोती रोज कचहरी।
कैद फाइलों की कारा में, / अर्जी गूँगी-बहरी।
छद्म गवाही देनेवाले / गुंडे डेरा डाले।
.
सजी वकीलों की दूकानें / प्रतिष्ठान पंडों के।
बड़े-बड़े दफ्तर फरेब के / लहराते झंडों के।
मुंशी चपरासी लगते हैं / जैसे जीजा-साले।

    जीवन के दरवाजे पर ताले लटकने के साथ-साथ दफ्तर की खिड़की भी बंद हो तो स्थिति बद से बदतर और गंभीर हो जाती है-

जीवन के / दफ़्तर की खिड़की
कब से नहीं खुली।
हठधर्मी के / ताले लटके, / सदियाँ बीत गईं।
मनुहारें करतीं / आँखों की / झीलें रीत गईं।
खुसुर-फुसुर / कर रहीं कुर्सियाँ, / मेजें मिलीं-जुलीं।
.
दीवारों पर / शीश पटकती, / मन की उथल-पुथल।
संदूकों में / बंद अपीलें, / कुंठित अगल-बगल।
टूट रही / बूढ़ी साँसों की, / हिम्मत नपी-तुली।

    तमाम विसंगतियों और विडंबनाओं के बावजूद ज़िंदगी दर्द का दस्तावेज मात्र नहीं है, उसमें अन्तर्निहित आनंद की अनुभूतियाँ उसे जीने योग्य बनाये रखती हैं। विजय इस जीवनानंद से निसृत रसानन्द से नवगीत की गागर को भरते हैं-

एक बदरिया / अँगना उतरी / छानी मार रही किलकारी।
.
कोयल मंगल- / गान सुनाती, / अमराई में रास रचाती।
चौमासे की- / शगुन पत्रिका / बाँच रही पुरवा लहराती।
बट-पीपर / आलिंगन करते, / पाँव-पखार रही फुलवारी।
.
भींज रही / पनघट पे गोरी, / उर अनुरागी चाँद-चकोरी।
ताँक-झाँक / कर रही बिजुरिया, / नैन मटक्का चोरा-चोरी।
बहुत दिनों के- / बाद दिखी हैं, / धरती की आँखें कजरारी।

    रस को नवगीत का प्राणतत्व माननेवाले विजय नीरसता को किनारे कर सरसता की गगरी नवगीतों की पंक्ति-पंक्ति में उड़ेलने की सामर्थ्य रखते हैं-

मेरे गीत, / तुम्हारे मन की- / गलियों से जब गुजर रहे थे।
कर सोलह- / श्रृंगार सुहाने, / सपन सलोने सँवर रहे थे।
अधर-अधर- / दोहा चौपाई, / नज़र-नज़र कुण्डलिया रागी।
धड़कन-धड़कन / राग बसंती, / कल्याणी कविता अनुरागी।
.
कंठ-कंठ से / कलकंठी के, / सरगम के स्वर उतर रहे थे।

    विजय के नवगीतों में मौलिक बिंबों की छटा देखते ही बनती है-

सूरज की / बूढ़ी आँखों में, / गहन मोतियाबिंद हुआ.
खेल रही है / धवल चाँदनी, / अँधियारे के साथ जुआ।
भिनसारे का / कुटिल कुहासा, / धुआँधार तेजाबी है।
मलय पवन / के, नैंन नशीले, / अटपट चाल शराबी है।
मौसम की / मादक नीयत से, / टपक रहा जैसे महुआ।

    आधुनिक समाज में छद्म मुखौटा लगाने का प्रचलन इतना बढ़ गया है कि खाने से अधिक फेंकनेवाले भुखमरी पर पोथियाँ भरे जा रहे हैं जबकि भुखमरी की कगार पर खड़ा कर दिया गया आम जन तमाम अभावों से घिरा हुआ होकर भी पर्व-त्यौहार का आनंद ले-दे पाता है। विजय 'आजकल / कितनी विकल है / सभ्यता की नव सदी' 'लिख रहा / इतिहास गोया / रुग्णता की नव सदी' और 'हो रही / पत्थर ह्रदय / स्वच्छंदता की नव सदी' लिखकर विसंगतियाँ मात्र उद्घाटित नहीं करते अपितु 'कब पुजेगी / उल्लसित / उत्कृष्टता की नव सदी' लिखकर मुखौटों को उतारकर अकृत्रिमता की प्रतिष्ठा किये जाने का आव्हान भी करते हैं। 
 
    नवगीत में कई बार मैंने अपने नाम या उपनाम का प्रयोग उनके शब्दकोशीय अर्थ में किया है। 'चुप्पियों के गाँव में' शीर्षक नवगीत में विसंगतियों को उद्घाटित करने के साथ विजय ने भी अपने नाम / उपनाम का प्रयोग अंतिम पंक्ति में किया है। कवि के नाम या उपनाम को रचना में प्रयोग करने की यह परंपरा लोकगीतों तथा भक्ति काव्य से होते हुए उर्दू ग़ज़ल में 'तखल्लुस' के रूप में अपनाई गयी।

थरथराते / मौसमी मनुहार के,
गीत घायल / चुप्पियों के गाँव में।
चूम रहे काँटे, / अंधेरों के कुटिल,
दिन दहाड़े, / रौशनी के पाँव में।
ऋतुमती पछुआ / हवा-आसक्त उर,
सिद्धपीठों के पुजारी हो गए....
.... सभ्यता के / आचरण बगुलामुखी,
संस्कारों के शिकारी हो गए।
राजमहलों के / उजाले भी 'विजय'
आजकल षड्यंत्रकारी हो गए।

    विजय के इन नवगीतों की भाषा बुंदेलखंड के कस्बों में प्रयुक्त हो रही आम बोलचाल की भाषा है। आधुनिक हिंदी का शुद्ध स्वरूप इनमें दृष्टव्य है। यह भाषा खड़ी हिंदी, अपभ्रंश, बुंदेली, पचेली, संस्कृत, देशज, उर्दू तथा अंगरेजी शब्दों के यथावश्यक शब्दों के मेल-जोल से बनती है जिसमें व्याकरणिक नियम हिंदी के प्रयोग किये जाते हैं। विजय ने अंगरेजी शब्दों का प्रयोग (अपवाद नैट-चैट, टी. वी., मोबाइल) लगभग नहीं किया है। यह उनका वैशिष्ट्य है। संस्कृत निष्ठ शब्दों में स्वच्छंद, उद्घोष, निर्वासन, उल्लसित, कुम्भज, उदधि, गन्तव्य, मर्माहत, अहर्निश, विहंगम, अगोचर, अविरल, अभ्युत्थान, प्रहर्षित, हेमवर्णी, अंतर्व्यथा, निदाघ, नयनोदक, स्वस्तिवाचन, अंतर्तिमिर, शब्दातीत, तमासावृत्त, संसृति, प्रभंजन, संकल्पनाएं, प्रक्षालित, प्रनिपतों, पुलकावली, वल्लरियाँ आदि में दृष्टव्य है। देशज बुन्देली शब्दों की छवि-छटा अवां, होरा, चौमासा, खुसुर-फुसुर, भिनसारा, बतकहाव, बदरिया, भींज, बिजुरिया, बखर, माटी, नेंगचार, बूंदाबारी, चिरैया, बिलोना, कुठारी, भिनसारे, पहरुए, बिछुआ, दुपहरिया, टकोरे, छतनारी, परपंच, लगैया, को है, समुहानी, सपन, बौराने, ठकुरसुहाती, कमरिया, ओसारे, गठरिया, धुंधुवाती, नदिया, राम रसोई, चौंतरा, रामजुहारें आदि गले मिलते हुए कथ्य को सरस और ह्रदयग्राही बनाती हैं। उर्दू शब्द इम्तिहान, दफ्तर, नजरें, ज़हर, दुआ-सलाम, वक्त, सैलाब, परवाज़, रौशनी, ज़िंदगी, गर्द-गुबार, तेजाबी, नुक्ताचीनी, सरेआम, मशहूर, पनाह, नागवार, दस्तूर, सबक, मगरूर, गुस्ताखी, बगावत, अदावत, मासूम, निशाना, दिल, अरमानों, नासूर, जिगर, गाफिल, सिरफिरे, मातमपुरसी, नफरत, फ़कीर, तस्वीर, दागी, महबूब, बड़ा, मुनादी, अहसासों, हुकूमत, पर्दाफाश, फरेबी, हलाकान, मगरूर, तहकीकातों, तबाही, सवालों, बाज़ार, आबरू, तनहाइयों, शोखियाँ वगैरह हमारी गंगो-जमुनी विरासत को आगे बढ़ाते हैं।

   विजय बागरी के गीतों-नवगीतों में हिंदी के व्याकरण नियमों का पालन किया गया है। उर्दू शब्दों के बहुवचन हिंदी व्याकरण के अनुसार हैं। जैसे- नजरें, अरमानों, अहसासों, तहकीकातों, सवालों, शोखियाँ आदि। कथ्य की सरसता में जन की जुबान पर चढ़े मुहावरों यथा- छाती पर होरा भूंजना, नैन मटक्का, घर का भेदी लंका ढाए, ठिकाने लगाना, जंगल में मंगल आदि वृद्धि की है। इस दशक के नवगीतकारों की भाषा शैली में में पूर्ववर्तियों की तुलना में दो नए रुझान बहुलता से शब्द-युग्मों का प्रयोग तथा शब्दावृत्तियों का प्रयोग देखने में आ रहे हैं। अपने नवगीत संग्रह 'काल है संक्रांति का' में मैंने शब्द-युग्मों तथा शब्दवृत्ति के प्रयोग किए हैं। इससे कथ्य के भाषिक-प्रवाह, लयात्मकता, सरसता तथा लोकरंजकता में वृद्धि होती है। विजय के नवगीत भी इन रुझानों से युक्त हैं। इस कृति में प्रयोग किये गए शब्द युग्मों में कुछ पारंपरिक किंतु अनेक सर्वथा नवीन हैं। मन-मतंग, हरा-भरा, धूल-धूसरित, सावन-भादों, दीन-हीन, खेतों-खलिहानों, राग-द्वेष, मान-मनौती, बाहर-भीतर, उथल-पुथल, सज-धज, पल-छिन, साँझ-सकारे, मेल-मुलाकातें, व्यथा-कथा, खेत-खलिहान, घाट-प्रतिघात, नेट-चैट, राम-रसोई, सुचिता-सच्चाई, रात-दिन, देह-पिंजरे, प्राण-पंछी, सुर-टाल, उमड़-घुमड़, दादुर-चातक, लपक-झपक, शब्द-अर्थ, लोक-लाज, हेल-मेल, रंग-बिरंगी, माया-मृग, मन-गन, तर्क-वितर्क, खंडन-मंडन, खेल-खिलौने, धरती-अम्बर, चाँद-सितारों, नदिया, पनघट, भूख-प्यास, चाँद-चकोरी, ताक-झाँक, चोरा-चोरी, मेघ-मल्हार, काल-कवलित, संगी-साथी, कुटुम-कबीले, पल-छिन, हरी-भारी, कोर-किनारे, हँसी-ठहाके, ठौर-ठिकाने, मन-मधुबन, सोलह-श्रृंगार, सपन-सलोने, दोहा-चौपाई, दुखी-निराश, सरित-सरोवर, उमड़-घुमड़, दर्द-पीर, वयः-कथा, गुना-भाग, रिश्ते-नातों, हर्ष-उल्लास, गर्द-गुबार, पुष्कर-पुण्डरीक, तुलसी-चौरे, विषय-वासना, नून-तेल, माखन-मिसरी, धक्का-मुक्की, भीड़-भाद, हाथा-पाई, ताना-बना, लुटे-पिटे, सृष्टि-दृष्टि, संत-कंत, गीत-प्रीत, नेह-गह, हेल-मेल, भूखी-प्यासी, हेरा-फेरी, जोड़-घटना, ज्ञान-ध्यान, पूजा निष्ठा, मन-मंदिर, रंग-भंग, छल-छंद, कुआँ-बावली, लू-लपट, भूखी-प्यासी, तट-तरुवर, मथुरा-काशी, माघ-पूस, जोगन-बैरागन, नाप-तौल, हँसी-खुशी, चाल-चलन, सुख-शांति, चाँद-तारे, घात-प्रतिघात, महकी-चहकी, कपट-कौशल, माघ-पूस, खात-बिछौना, छल-बल, संझा-बाती, गाँव-शहर, दावानल-पतझर, हानि-लाभ, सुख-दुःख, चहल-पहल, भूल-भूलैंया, नोंक-झोंक, रुदन-मुस्कान, छल-छंद-चतुरी, वर्ष-मास-दिन, सत्यं-शिवं-सुन्दरं आदि-आदि शब्द युग्म कथ्य की अर्थवत्ता तथा वाचिक सौन्दर्य की वृद्धि कर रहे हैं।

    यह कृति शब्दावृत्तियों के प्रयोग की दृष्टि से भी समृद्ध है। शब्दावृत्ति से आशय किसी शब्द के दो बार प्रयोग करने से है। ऐसा कथ्य पर अतिरिक्त जोर देने के लिए किया जाता है। इससे उत्पन्न पुनरावृत्ति अलंकार भाषिक तथा वाचिक सौन्दर्य वर्धक होता है। विजय ने अधर-अधर, नज़र-नज़र, धड़कन-धड़कन, कंठ-कंठ, लहर-लहर, अंग-अंग, छंद-छंद, रोम-रोम, किरण-किरण, अंग-अंग, गात-गात, कण-कण, पात-पात, पोर-पोर, पनघट-पनघट, धड़कन-धड़कन, पोर-पोर, फूंक-फूंक, लहर-लहर, घाट-घाट, कली-कली, दर-दर, धार-धार, लौट-लौट, पल-पल, चुपके-चुपके, रात-रात, करवट-करवट, शब्द-शब्द, उलट-उलट, अभी-अभी, जनम-जनम, सहते-सहते, कदम-कदम, कहीं-कहीं, किराचा-किराचा, सर-सर, पोर-पोर, जन-जन, चेहरे-चेहरे, तौबा-तौबा, प्रश्न-प्रशन, अक्षर-अक्षर, क्रंदन-क्रंदन, सींच-सींच, कुहू-कुहू, चुपके-चुपके, बूँद-बूँद, घाट-घाट, तिनका-तिनका, गली-गली, घर-घर, ऊँचे-ऊँचे, रिमझिम-रिमझिम, पोर-पोर, मंद-मंद, पट्टा-पट्टा, क्या-क्या, कभी-कभी, चूर-चूर, कण-कण, सांय-सांय, माखन-मिसरी, चाल-चरित्र आदि शब्दावृत्तियों का सार्थक-सटीक प्रयोग कर गीति रचनाओं को अर्थवत्ता प्रदान की है। 

     अपने परिवेश और पर्यावरण के प्रति सचेत हैं विजय बागरी। नवगीतों में वट, पीपल, अमराई, कचनार, केतकी, सरसों, हरसिंगार, पलाश, मोगरा, मंजरियाँ, फुलवारी आदि अपनी सुषमा यथास्थान बिखेर रहे हैं। कोयल, चिरैया, मैना, दादुर, चातक, बैल आदि पात्र ग्राम्यांचली परिवेश को जीवंत कर रहे हैं। यह नवगीतकार अपनी अभिव्यक्ति सामर्थ्य के बाल पर कम से कम शब्दों में अधिक से अधिक कहने की पारंपरिक विरासत को सम्हाल सका है। पंख थकावट ओढ़े / बैठे, परवाजें संकट में पारिस्थिक विवशता, धूप पसीना पोंछ रही में विरोधाभास, चटनी-रोटी / खाते-खाते गयी ज़िंदगी ऊब में निराशा, बीजों से / जब अंकुर फूटे /खेतों ने श्रृंगार किया तथा उम्मीदों की / खोल खिड़कियाँ / मुखरित हुईं मचाने में आशावाद, उठ भिनसारे / विहग-स्वरों ने / गीतों का गुंजार किया तथा छलक उठे प्यासे अधरों से / प्रीति पेय, नवगीत तुम्हारे में श्रृंगार, रौशनी के तामसी / बरताव पर, मैं चुप रहूँ में दुविधा, नेताओं के / बतकहाव से / झरने लगे बताशे में राजनैतिक हलचल, हेरा-फेरी / के चक्कर में / चोरों के सरदार में सामाजिक वातावरण, खोटे सिक्के / चाल-चलन से / हुए बहुत मगरूर में सटीक बिम्बात्मकता, बेशर्मी की / मोटी खालें / सत्ता का दस्तूर में शासन के प्रति घटती जनास्था, वक्त छोड़कर / चला गया कुछ / तहकीकातें नयी-नयी में राजनैतिक भ्रष्टाचार, रात काटती / जलती बीडी / टूटा छप्पर, टाट-बिछौना में ग्रामीण विपन्नता, रोज दिहाड़ी / मारी जाती / सरे-आम छल-बल से में श्रमिक शोषण, चले शहर की / ओर गाँव की / पगडंडी के पाँव में ग्रामीण पलायन, कहीं-कहीं / छल-छंद-चातुरी / भला करे भगवान् में पारंपरिक भाग्यवादिता, दहक रही है / अंगारों में / मधुमासी तरुणाई में युवाओं के समक्ष उपस्थित विषम परिस्थितियाँ, बदल रही / चिन्तन की भाषा / मूल्यों का अनुवाद में सतत बदलते मूल्य, कितनी बरसातों / ने आकर / पूछा कभी हिसाब में प्रकृति की उदारता, नैट-चैट / टी. वी., मोबाइल / का जूनून, लादे सर पर / राम-रसोई / अंतर्पुर तक / विज्ञापन की गिद्ध नज़र में हावी होता बाजारवाद, उमड़-घुमड़ / कर बदरा छाए / नाचन लागे मोर में ऋतु-परिवर्तन, बंदनवार / सजें गीतों के / आभूषित अनुप्रास से में लोक की उत्सवधर्मिता, ज़िंदगी ही/ जिंदगी का / आखिरी पैगाम में जिजीविषा शब्दित होकर पाठक को रचनाओं से एकात्मकता स्थापित करने में सहायक है।

    'रश्मियों  के सारथी' (२०२०, पृष्ठ १६०, आवरण पेपरबैक बहुरंगी, मूल्य २००/-, बोधि प्रकाशन सी ४६ सूदर्शनपुरा इंडस्ट्रियल एरिया एक्सटेंशन, नाला रोड, २२ गोदाम जयपुर) विजय बागरी का दूसरा नवगीत संग्रह है। इस संग्रह की भूमिका में आधुनिक नवगीतों में नवता के पुरोधा डॉ. राम सनेही लाल शर्मा 'यायावर' का कथन  ''विजय बागरी के नवगीतों की एक धतातव्य विशेषता यह है कि वे मिथकों का सुसहठू प्रयोग और उनका अर्थ-दोहन करने में अत्यंत कुशल हैं। मिथक का शिअल्पिक उपादान के रूप में प्रयोग वही व्यक्ति कर सकता है जो हमारे अर्थ-साहित्य की परंपरा से भली-भांति परिचित हो।'' विजय बागरी के नवगीतकार के निरंतर परिपक्व होने का प्रमाण है। 

    विजय बागरी का यह नवगीत संग्रह युगीन विमर्शों की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। वे लोक के कवि हैं। लोकपर्व होली को पर्यावरणीय विमर्श का अवसर बनाते हुए विजय कहते हैं- 

हाथों में जो / रंग-बिरंगी /जहरीली पिचकारी है ।  
 बूद-बूंद में, /  नए दौर की, / संक्रामक बीमारी है।। 
साँसों की / बुनियाद हिलाए, / ऐसी भी क्या होली है। 

    नगर और ग्राम दोनों में एक साथ रह रहे विजय नगरीय विमर्श और ग्राम्य विमर्श एक साथ साधते हैं- 

खोज रहे ठूँठों के जंगल / रुंड-मुंड आकर नगरों में। 
छलक रहीं सागर की आँखें / धुआँ-धुआँ नदिया की चितवन 
रूठ गया हर खेत-खेत के, / प्यासे कंठ-कंठ से पानी। 
फुलबगिया से अमराई तक, पतझर की चलती मनमानी।।  

    आधुनिक सभ्यता की सर्वाधिक दारुण त्रासदी अनगिनत मनुष्यों का जड़ों से उखड़कर बंजारा हो जाना है। विजय इस बंजर विमर्श को देख पाते हैं- 

उम्मीदों की / गठरी लादे, / कितने ठौर-ठिकाने बदले। 
विराहकूल / आँखों से पल-पल, / कितने रोज हिमालय पिघले।। 
कितने निष्ठुर / तूफ़ानों से / मेरी दुआ सलाम हो गई।। 

    विकास विमर्श को विजय तमाम सरकारी दावों और प्रचारों के बावजूद लक्ष्य से दूर पाते हैं-

राजपथ पर / सभ्यता की, /  रोशनी भरपूर है। 
किंतु अंधी / दौड़ से,/ गंतव्य कोसों दूर है।। 
झिलमिलाती / तितलियों सी वंचनाओं की नदी।। 

    राजनैतिक विमर्श इस संकलन के नवगीतों में यत्र-तत्र बिखरा हुआ सहज ही देखा जा सकता है। एक बानगी देखें- 

जोड़-तोड़ की / राजनीति के, चौतरफा व्यापारी 
बात मिठाई / जैसी करते, / चलते चाल शिकारी।। 
दीन-हीन / असहाय, अपाहिज / हैं ढाई आखर।।  

    प्रशासनिक विमर्श करते हुए विजय राजनीति और प्रशासन तंत्र की बीच की सूक्ष्म सीमा रेखा के प्रति सजग हैं-

समाधान के / दरवाजों पर, / लटक रहे हैं कब से ताले 
चोर-सिपाही / का गठबंधन, / चौपालों पर डेरा डाले।। 
कब तक / सहनशक्ति की छाती, / रौंदेगी धृतराष्ट्र व्यवस्था।।
कब तक / कुटिया मनरेगा की, / मजदूरी से पेट भरेगी। 
कब तक महँगाई सपनों की, / हरियाली की फसल चरेगी।। 
कब तक / मर्यादा की रेखा, / लाँघेगी धृतराष्ट्र व्यवस्था।।      

    नवगीत पर रुदन गीत, स्यापा गीत या नैराश्य प्रधान होने के आरोपों का उत्तर विजय बागरी अपने नवगीतों में प्रकृति सौन्दर्य, शृंगार और नवाशा का संकेत कर देते हैं।

सज-धज कर / प्राची से निकली, / उषा दिव्य अवतारी। 
लूट राही / वसुधा को स्वर्णिम, / प्रभापुनज, सुकुमारी।। 
पंछी गाते / राग भैरवी, / नर्तन करते मोर।। 
और 
ओस नहाई / धनी चूनर, / पहन धरा मुसकाती । 
महादेव को / गंगोदक से, / परबतिया नहलाती।। 
तटबंधों का / चुंबन लेती / नदिया की हिलकोर। 

    जो साहित्य सकल युगीन कलुषताओं के कीच में नव संकल्पों के कमल खिलाने की प्रेरणा न दे सके, वह अपनी मौत आप मरते है लेकिन देश और समाज को भी मरघर पहुँच देता है। विजय बागरी इस सनातन सत्य से सुपरिचित हैं। काल है संक्रांति का में '''जगो /  सूर्य लेकर आता है /  अच्छे दिन'', ''भोर होते ही उठाकर / फिर नये बस्ते हजारों / मैं बढ़ूँगा / मैँ लड़ूँगा।'' के स्वरों को आगे बढ़ाते हुए विजय बागरी लिखते हैं- 

संकल्पों के / पंख लगाकर,/ उड़न सीख रहा हूँ मैं। 
मैं, साहस की / शब्द-चेतन / का चैतन्य प्रणेता हूँ। 
रश्मिराठी / दिनकर की कविता, / गीतों का नचिकेता हूँ।। 
कालकूट / कटुता का पीकर, / हँसना सीख रहा हूँ मैं।   

  विजय बगारी के गीत समय-साक्षी गीति-रचनाओं (गीत-नवगीत) का गुलदस्ता हैं जिनमें नाना प्रकार के पुष्प अपने रूप, रंग, सुरभि की नैसर्गिक छटा से पाठक को मंत्र-मुग्ध कर जीवन की विषमताओं के चक्रव्यूह से उपजी पीड़ा और दर्द के संत्रास को सहने, उससे बाहर निकलने के आस्था-दीप को जलाये रखने तथा अभिमन्यु की तरह जूझने की प्रेरणा देता है। नर्मदांचली लोक जीवन की सहज-सरस बानगी समेटे गीत-पंक्तियों से स्वस्थ्य जन-मन-रंजन करने की दिशा में कलम चलाता युवा रचनाकार अपनी भाषिक सामर्थ्य, शैल्पिक कौशल, छान्दस नैपुण्य तथा अभिव्यक्ति क्षमता से अपने उज्जवल भविष्य के प्रति आश्वस्त करता है। 
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