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रविवार, 28 जून 2020

हिंदी व्याकरण :पहले स्वर - वर्ण से आरंभ मुहावरे


हिंदी व्याकरण :पहले स्वर - वर्ण से आरंभ मुहावरे :-
अ - अपने मुँह मियाँ मिट्ठु बनना - अपनी तारीफ स्वयं करना - कुछ लोगों को अपने मुँह मियाँ मिट्ठु बनने की आदत होती है।
आ - आँख का तारा होना - बहुत प्यारा होना, क्षितिज अपने नाना- नानी के आँखों का तारा है।
इ - इस कान से सुनकर उस कान से उड़ा देना - ध्यान न देना, सुखी रहने का यह अच्छा तरीका है कि जहाँ झगड़े वाली बात हो तो, उसे इस कान से सुनकर उस कान से उड़ा देना चाहिए।
ई - ईद का चाँद होना - बहुत कम नजर आना, अपने दोस्त से बहुत दिनों बाद मिलने पर राजू अपने दोस्त से कहा कि तुम तो ईद का चाँद हो गए हो।
उ -उन्नीस बीस का फर्क होना - थोड़ा का अंतर होना, दोनों जुड़वां भाईयों में बस उन्नीस बीस का ही अंतर है।
ऊ - ऊँट के मुँह में जीरा - ज़रुरत से बहुत कम मिलना, रामू के सारा दिन मेहनत करने के बाद भी उसे खाने के लिए दो ही रोटी मिलती थी, जो उसके लिए ऊँट के मुँह में जीरे के समान लगता था।
ऋ - ऋण चुकाना - कर्ज उतारना, किसी का भी ऋण हमें जरूर वापस कर देना चाहिए।
ए - एक और एक ग्यारह होना- एकता में शक्ति होती है, पति पत्नी मुसीबत के समय साथ हों तो वे एक और एक ग्यारह बन जाते हैं।
ऐ - ऐसी की तैसी करना - हालत बिगाड़ना, राम ने अपने दोस्त से थप्पड़ खाने के बाद उसकी ऐसी की तैसी हालत कर दी।
ओ - ओखली में सिर देना - मुसीबत मोल लेना, जब ओखली में सर डाल ही दिया है तो परिणाम से क्या डरना।
औ - औंधे मुँह गिरना - बुरी तरह से असफल होना, बिना तैयारी के प्रतियोगिता में भाग लेने से रोहित टेनिस के मैच में औंधे मुँह गिर गया।
अं - अंग लगाना- गले लगाना, बेटे को बहुत दिनों के बाद देखते ही माँ ने उसे अंग लगा लिया।
अ: - यह विसर्ग कहलाता है, इससे कोई मुहावरा नहीं बनता है।
व्यंजन से शुरू होने वाले मुहावरे :-
क - कलई खुलना - रहस्य खुल जाना, हमेशा झूठ बोलने वालों की कभी न कभी कलई खुल ही जाती है।
ख - खून पसीना एक करना - कड़ी मेहनत करना, देश के किसान अनाज उपजाने के लिए अपना खून पसीना एक कर देते हैं।
ग - गंगा नहा लेना - कोई बड़ा काम कर लेना, बेटी की शादी हो गई तो ऐसा लगा जैसे गंगा नहा ली।
घ - घी के दिए जलाना - बहुत खुश होना, श्री राम जी के सालों बाद अयोध्या लौटने पर सारे नगर बासी ने घी के दिए जलाए थे।
ङ - यह क वर्ग का पंचम वर्ण है जिससे किसी शब्द की शुरुआत नहीं होती है।
च - चंपत होना - भाग जाना, दीनू अपने मालिक के घर से रुपये चोरी करके चंपत हो गया।
छ - छाती पर साँप लोटना - जलन होना, मेहता जी की नयी कार देखते ही पड़ोसियों के छाती पर साँप लोटने लगा।
ज - जले पर नमक छिड़कना - दुखी को और दुखी करना, संजू परीक्षा में फेल हो गया, उसके दोस्त बार बार परिणाम पूछकर उसके जले पर नमक छिड़कने का काम कर रहे थे।
झ - झक मारना - समय बर्बाद करना, जिन्हें कोई काम नहीं रहता है वो सारा दिन झक मारते रहते हैं।
ञ - यह वर्ण शुरुआत के किसी शब्द में नहीं आता है।
ट - टस से मस न होना - अपनी बात पर अड़े रहना, कितना समझाने पर भी रोहित टस से मस नहीं हुआ और पैर में चोट लगने के बावजूद भी क्रिकेट का मैच खेलने चला गया।
 - ठनठन गोपाल होना- पैसे की कमी होना, इस मंहगाई के जमाने में तो किसानों की हालत हमेशा ठनठन गोपाल जैसी बनी रहती है।
 - डंके की चोट पर - बिना किसी डर के, रोहित, सीमा से ही शादी करेगा, यह बात उसने अपने माता पिता को डंके की चोट पर कह डाली।
 - ढाक के तीन पात - हमेशा दीन हीन रहना, रमेश के इतने पढ़े लिखे होने के बावजूद भी कोई ढंग की नौकरी नहीं मिल पाती थी और नतीजा हमेशा ढाक के तीन पात ही रहता।
ण - हिंदी में ण से किसी अक्षर की शुरुआत नहीं होती है, इसलिए इस अक्षर से भी कोई मुहावरा नहीं है।
त - तलवे चाटना - चापलूसी करना, तरक्की पाने के लिए कई लोग अपने अधिकारियों के तलवे चाटते रहते हैं।
थ - थोथा चना बाजे घना - जो आदमी कुछ नहीं है वो बढ़कर दिखावा करता है, राहुल गाँधी की बातें थोथा चना बाजे घना जैसी होती हैं।
द - दिल का हीरा होना- बहुत अच्छा इंसान होना, मेरे पिताजी बिल्कुल दिल का हीरा हैं, वो हमेशा प्यार से ही बातें करते हैं।
ध - धरती पर पाँव न पड़ना - हमेशा घमंड में रहना, शर्मा जी का बेटा अमरीका पढ़ने क्या चला गया ,उनके तो धरती पर पाँव ही नहीं पड़ रहे हैं।
न - नौ दो ग्यारह होना- भाग जाना, पुलिस को देखते ही चोरी करने आया चोर सब कुछ छोड़कर नौ दो ग्यारह हो गया।
प - पगड़ी उछालना- इज़्ज़त उछालना, गलत काम करते हुए पकड़े जाने पर इंसान की पगड़ी उछलने में देर नहीं लगती है।
फ - फूँक फूँक कर कदम रखना- किसी काम को काफी सोच विचार कर करना, अपना नया व्यापार शुरू करने के बाद सोहन कोई भी निर्णय लेने में फूँक फूँक कर कदम रखता है।
ब - बाग- बाग होना- बहुत खुश होना, बारिश के मौसम में हरियाली देखकर मन बाग बाग हो जाता है।
भ -भीगी बिल्ली बनना - डर कर घर में बैठना, दोस्तों से झगड़ा हो जाने के बाद रोहन घर में भीगी बिल्ली बन कर बैठ गया है।
म - मन में लड्डू फूटना- बहुत प्रसन्न होना, शादी का ख्याल आते ही सबके मन में लड्डू फूटने लगते हैं।
य - युक्ति लगाना- उपाय लगाना, किसी भी काम में सफलता पाने के लिए हमेशा कुछ न कुछ युक्ति लगानी पड़ती है।
र - रात दिन एक करना- बहुत मेहनत करना, मेडीकल की परीक्षा में उतीर्ण होने के लिए विद्यार्थी रात दिन एक कर देते हैं।
 - लकीर का फकीर होना- निर्देश अनुसार ही काम करना, बेहतर सुझाव देने के बाद भी कुछ लोग लकीर के फकीर बने रहते हैं।
 - वारे- न्यारे होना - घन संपत्ति से भरपूर होना, अनुज की अमरीका में अच्छी जगह नौकरी लगते ही उसके वारे न्यारे हो गए।
 - शेखी बघारना - डींगे हाकना, कुछ लोगों की आदत होती है बिना मतलब की शेखी बधारने की।
षड्यंत्र रचना - किसी के खिलाफ साजिश करना, जिनकी आपस में दुश्मनी होती है वो हमेशा एक दूसरे को नीचा दिखाने के लिए कुछ न कुछ षड्यंत्र रचते रहते हैं।
सोने पे सुहागा होना- लाभ पर लाभ होना, राहुल को नौकरी में बोनस के साथ तरक्की मिलना सोने पर सुहागा वाली बात हो गयी।
हवा से बातें करना- बहुत तेज भागना, रवि अपनी नयी कार लेकर घर से बाहर निकला और उसकी कार थोड़ी देर में ही हवा से बातें करने लगी।
क्ष- क्षति पहुँचाना - नुकसान पहुँचाना, कुछ लोग बिना कुछ सोते हुए दूसरे को नीचा दिखाने के लिए क्षति पहुँचाने से बाज नहीं आते हैं।
त्र- त्राहि-त्राहि होना- बहुत परेशान होना, मुंबई में लगातार बारिस होने से लोग त्राहि त्राहि करने लगते हैं।
ज्ञ - ज्ञान बाँटना - सीख देना, आजकल काफी संत लोग अपना ज्ञान बांटते हुए नजर आते हैं।
श्री - श्री गणेश करना- काम की शुरुआत करना, आज से हमारे घर बनने के काम का श्री गणेश हो गया है।

हिंदी व्याकरण : ड.ञ,ण,न,म वर्णों का प्रयोग

हिंदी व्याकरण :  ड.ञ,ण,न,म वर्णों का प्रयोग
ये वर्ण अपने-अपने वर्गों के पंचम अर्थात अन्तिम वर्ण हैं। ये पाँचों अनुनासिक वर्ण हैं। इन के सही प्रयोग जानने के लिए हम कुछ उदाहरण देखेंगे -
पंक = पङ्क ; पंजा = पञ्जा ; खंड = खण्ड ; दंत = दन्त ; दंभ = दम्भ।
नियम यह है कि अनुस्वार अपने बाद के वर्ण के वर्ग के पंचम अनुनासिक वर्ण में बदल जाएगा। 'पंक' में अनुस्वार के बाद 'क्' है। कवर्ग का पाँचवाँ वर्ण 'ङ्' है, अतः अनुस्वार 'ङ्' में बदल जाएगा। इस प्रकार शब्द बना 'पङ्क'। इसी तरह 'पंजा' में अनुस्वार 'ञ्' में बदलेगा क्यों कि 'ज' चवर्ग का है और इस वर्ग का अन्तिम वर्ण 'ञ्' है। अतः शब्द बना - पञ्जा। यही नियम सर्वत्र लागू होता है।
पहले हिन्दी में भी इस नियम का पालन होता था, क्यों कि यह उच्चारण सम्मत है। परन्तु अब छपाई की सुविधा के नाम पर केवल अनुस्वार दिया जाता है। लेकिन अब यह तो अनुस्वार के पैरोकारों से कोई पूछे कि 'संबंध' में पहले अनुस्वार का उच्चारण 'म्' तथा दूसरे अनुस्वार का उच्चारण 'न्' क्यों होता है।

हिंदी व्याकरण : तालव्य

हिंदी व्याकरण : तालव्य 
जैसा कि हम सभी जानते हैं कि हिंदी में स्वर और व्यंजन दोनों को मिलाकर 52 वर्ण हैं।
स्वर एवम् व्यंजन दोनों को मिलाकर ही वर्ण बनते हैं। वर्णों के उच्चारण में मुख से अलग-अलग ध्वनियां निकलती हैं।
हिंदी भाषा में उन सभी ध्वनियों को अलग- अलग नामों से जाना जाता है।
कुछ ध्वनियां कंठ से,
तो कुछ होठ से,
कुछ जिह्वा और तालु के स्पर्श से,
तो कुछ होंठ ओर दंत के स्पर्श से निकलती हैं।
इनका वृहत वर्णन हिंदी व्याकरण में किया गया है।
आपका यह प्रश्न, तालव्य का प्रयोग कैसे करते हैं; इसके लिए तालव्य की परिभाषा क्या है; यह जानना जरूरी है।
तालव्य (palatal) की परिभाषा- जिन ध्वनियों के उच्चारण में जिह्वा का मध्य - भाग तालु से स्पर्श करता है उन्हें तालव्य कहते हैं। इन ध्वनियों से निकलने वाले वर्णों का वर्णन इस प्रकार से है
  1. इ, ई ( स्वर)
  2. च, छ, ज, झ, ञ,श, य ( व्यंजन)
आप इन वर्णों को खुद बोल कर देखिए, आप महसूस करेंगे कि इन सभी वर्णो के उच्चारण में आपके जिह्वा का मध्य - भाग तालु को स्पर्श कर रहा है ।
तालव्य का प्रयोग और इनके उच्चारण से बने वर्णो का वर्णन तो हो गया।
मैं बाकी वर्णों के उच्चारण के बारे में जिन ध्वनियों का प्रयोग होता है, उसका संक्षिप्त वर्णन करना चाहती हूँ ताकि यह उत्तर पूरा हो जाए।
कंठ्य - क, ख, ग, ध, ङ
तालव्य - च, छ, ज, झ, ञ
मूर्धन्य - ट, ठ, ड, ढ, ण
दंत्य - त, थ, द, ध, न
ओष्ठ्य - प, फ, ब, भ, म
अन्तस्थ - य, र, ल, व'
ऊष्म - 'श, ष, स' ह
क्ष त्र ज्ञ और श्र ये चारो संयुक्त व्यंजन है। इनका उच्चारण दो वर्णों को मिलाकर ही किया जा सकता है।
क्ष = क्+ ष
त्र = त्+र
ज्ञ = ज्+ ञ
श्र = श् + र
इनके अलावा दो व्यंजन द्विगुण व्यंजन भी कहलाते हैं।
ड के नीचे बिंदु लगाकर ड़ बनता है। इससे खड़ा, कपड़ा जैसे शब्द लिखे जा सकते हैं।
ढ के नीचे बिंदु लगाकर ढ़ बनता है। इससे पढ़ाई, कढ़ाई, चढ़ाई जैसे कई शब्द लिखे जा सकते हैं।

हिंदी व्याकरण : ऋ और रि

हिंदी व्याकरण : ऋ और रि 
ऋ वर्ण संस्कृत का मूल वर्ण है जिसे हिंदी देवनागरी लिपि में भी उसी रूप मे लिखा जाता है। ऋ को स्पष्ट रूप से बताने के लिए कुछ बातों का उल्लेख करना चाहती हूँ।
  • ऋ एक स्वर है और घोष ध्वनि है।
  • ऋ का उच्चारण मूर्धन्य वर्ग में आता है जिसमें ट, ठ, ड, ढ, ण आता है। इसमें जिह्वा का अग्र भाग तालु के मध्य भाग को स्पर्श करता है।
  • ऋ की मात्रा (ृ ) होती है ।जैसे गृ और शब्द बनेगा गृह । मृ से मृग। पृ से पृथ्वी ।
  • ऋ में कोई मात्रा नहीं लगाई जाती है। ऋी या ऋि लिखना सर्वथा गलत होगा। संस्कृत का मूल रूप होने के कारण इसे ऋ ही लिखते हैं। इससे बनने वाले शब्द हैं : ऋषि , ऋतु, ऋण, ऋचा ,ऋग्वेद आदि ।
रि एक व्यंजन है जिसका उच्चारण र + इह्रस्व) है।
र में ह्रस्व इ की मात्रा लगाने से रि बनता है। जैसे : रिवाज, रिझाना।
र में दीर्घ ई की मात्रा लगाएंगे तो री बनता है। जैसे : रीति, रीता ।
इसलिए ऋ और रि दोनों ही बिल्कुल अलग हैं। अत: ऋषि की जगह रिषी लिखना गलत होगा। सबने पढ़ा भी होगा किताबों में ऋ से ऋषि शब्द ही बताया जाता है।

शुक्रवार, 26 जून 2020

सत्यमित्रानंद सवैया

अभिनव प्रयोग
नवान्वेषित सवैया
सत्यमित्रानंद सवैया
*
विधान -
गणसूत्र - य न त त र त र भ ल ग।
पदभार - १२२ १११ २२१ २२१ २१२ २२१ २१२ २११ १२ ।
यति - ७-६-६-७ ।
*
गए हो तुम नहीं, हो दिलों में बसे, गई है देह ही, रहोगे तुम सदा।
तुम्हीं से मिल रही, है हमें प्रेरणा, रहेंगे मोह से, हमेशा हम जुदा।
तजेंगे हम नहीं, जो लिया काम है, करेंगे नित्य ही, न चाहें फल कभी।
पुराने वसन को, है दिया त्याग तो, नया ले वस्त्र आ, मिलेंगे फिर यहीं।
*
तुम्हारा यश सदा, रौशनी दे हमें, रहेगा सूर्य सा, घटेगी यश नहीं।
दिये सा तुम जले, दी सदा रौशनी, बँधाई आस भी, न रोका पग कभी।
रहे भारत सदा, ही तुम्हारा ऋणी, तुम्हीं ने दी दिशा, तुम्हीं हो सत्व्रती।
कहेगा युग कथा, ये सन्यासी रहे, हमेशा कर्म के, विधाता खुद जयी।
*
मिला जो पद तजा, जा नई लीक पे, लिखी निर्माण की, नयी ही पटकथा।
बना मंदिर नया, दे दिया तीर्थ है, नया जिसे कहें, सभी गौरव कथा।
महामानव तुम्हीं, प्रेरणास्रोत हो, हमें उजास दो, गढ़ें किस्मत नयी।
खड़े हैं सुर सभी, देवतालोक में, प्रशस्ति गा रहे, करें स्वागत सभी।
*
२६-६-२०१९

पुस्तक सलिला: 'अंधी पीले कुत्ते खाएँ'


फ़ोटो का कोई वर्णन उपलब्ध नहीं है.पुस्तक सलिला:
'अंधी पीले कुत्ते खाएँ' खोट दिखाती हैं क्षणिकाएँ
समीक्षक: आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
(पुस्तक विवरण: 'अंधी पीसे कुत्ते खाएँ' क्षणिका संग्रह, अविनाश ब्यौहार, प्रथम संस्करण २०१७, आकार डिमाई, आवरण पेपरबैक बहुरंगी, पृष्ठ १३७, मूल्य १००/-, प्रज्ञा प्रकाशन २४ जगदीशपुरम्, रायबरेली, कवि संपर्क: ८६,रॉयल एस्टेट कॉलोनी, माढ़ोताल, जबलपुर, चलभाष: ९८२६७९५३७२, ९५८४०५२३४१।)
*
सुरवाणी संस्कृत से विरासत में काव्य-परंपरा ग्रहण कर विश्ववाणी हिंदी उसे सतत समृद्ध कर रही है। हिंदी व्यंग्य काव्य विधा की जड़ें संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश तथा लोक-भाषाओं के लोक-काव्य में हैं। व्यंग्य चुटकी काटने से लेकर तिलमिला देने तक का कार्य कुछ शब्दों में कर देता है। गागर में सागर भरने की तरह दुष्कर क्षणिका विधा में पाठक-मन को बाँध लेने की सामर्थ्य है। नवोदित कवि अविनाश ब्यौहार की यह कृति 'पूत के पाँव पालने में दिखते हैं' कहावत को चरितार्थ करती है। कृति का शीर्षक उन सामाजिक कुरीतियों को लक्ष्य करता है जो नेत्रहीना द्वारा पीसे गए को कुत्ते द्वारा खाए जाने की तरह निष्फल और व्यर्थ हैं।
बुद्धिजीवी कायस्थ परिवार में जन्मे और उच्च न्यायालय में कार्यरत कवि में औचित्य-विचार सामर्थ्य होना स्वाभाविक है। अविनाश पारिस्थितिक वैषम्य को 'सर्वजनहिताय' के निकष पर कसते हैं, भले ही 'सर्वजनसुखाय' से उन्हें परहेज नहीं है किंतु निज-हित या वर्ग-हित उनका इष्ट नहीं है। उनकी क्षणिकाएँ व्यवस्था के नाराज होने का खतरा उठाकर भी; अनुभूति को अभिव्यक्त करती हैं। भ्रष्टाचार, आरक्षण, मँहगाई, राजनीति, अंग प्रदर्शन, दहेज, सामाजिक कुरीतियाँ, चुनाव, न्याय प्रणाली, चिकित्सा, पत्रकारिता, बिजली, आदि का आम आदमी के दैनंदिन जीवन पर पड़ता दुष्प्रभाव अविनाश की चिंता का कारण है। उनके अनुसार 'आजकल/लोगों की / दिमागी हालत / कमजोर पड़ / गई है / शायद इसीलिए / क्षणिकाओं की / माँग बढ़ / गई है।' विनम्र असहमति व्यक्त करना है कि क्षणिका रचना, पढ़ना और समझना कमजोर नहीं सजग दिमाग से संभव होता है। क्षणिका, दोहा, हाइकु, माहिया, लघुकथा जैसी लघ्वाकारी लेखन-विधाओं की लोकप्रियता का कारण पाठक का समयाभाव हो सकता है।अविनाश की क्षणिकाएँ सामयिक, सटीक, प्रभावी तथा पठनीय-मननीय हैं। उनकी भाषा प्रवाहपूर्ण, प्रसाद गुण संपन्न, सहज तथा सटीक है किंतु अनुर्वर और अनुनासिक की गल्तियाँ खीर में कंकर की तरह खटकती हैं। 'हँस' क्रिया और 'हंस' पक्षी में उच्चारण भेद और एक के स्थान पर दूसरे के प्रयोग से अर्थ का अनर्थ होने के प्रति सजगता आवश्यक है चूँकि पुस्तक में प्रकाशित को पाठक सही मानकर प्रयोग करता है।
इन क्षणिकाओं का वैशिष्ट्य मुहावरे का सटीक प्रयोग है। इससे भाषा जीवंत, प्रवाहपूर्ण, सहज ग्राह्य तथा 'कम में अधिक' कह सकी है। 'पक्ष हो /या विपक्ष / दोनों एक / थैली के / चट्टे-बट्टे हैं। / जीते तो / आँधी के आम / हारे तो / अंगूर खट्टे हैं।' यहाँ कवि दो प्रचलित मुहावरे का प्रयोग करने के साथ 'आँधी के आम' एक नए मुहावरे की रचना करता है। इस कृति में कुछ और नए मुहावरे रच-प्रयोगकर कवि ने भाषा की श्रीवृद्धि की है। यह प्रवृत्ति स्वागतेय है।
'चित्रगुप्त ने यम-सभा से / दे दिया स्तीफा / क्योंकि उन्हें मुँह / चिढ़ा रहा था / आतंक का खलीफा।' पंगु सिद्ध हो रही व्यवस्था पर कटाक्ष है। 'मैं अदालत / गया तो / मैंने ऐसा / किया फील / कि / झूठे मुकदमों / की पैरवी / बड़ी ईमानदारी / से करते / हैं वकील।' यहाँ तीखा व्यंग्य दृष्टव्य है। अंग्रेजी शब्द 'फील' का प्रयोग सहज है, खटकता नहीं किंतु 'ईमानदारी' के साथ 'बड़ी' विशेषण खटकता है। ईमानदारी कम-अधिक तो हो सकती है, छोटी-बड़ी नहीं।
अविनाश ने अपनी पहली कृति से अपनी पैठ की अनुभूति कराई है, इसलिए उनसे 'और अच्छे' की आशा है।
*
समीक्षक संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, 401 विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर 482001,
चलभाष: 7999559618/ 9425183244, ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

मुक्तक

मुक्तक:
दर्द हों मेहमां तो हँसकर मेजबानी कीजिए
मेहमानी का मजा कुछ ग़मों को भी दीजिए
बेजुबां हो बेजुबानों से करें कुछ गुफ्तगू
जिंदगी की बंदगी का मजा हँसकर लीजिए
***
दाना देते परीक्षा, नादां बाँटे ज्ञान
रट्टू तोते आ रहे, अव्वल हैं अनजान
समझ-बूझ की है कमी, सिर्फ किताबी लोग
चला रहे हैं देश को, मनमर्जी भगवान
***
गौ माता के नाम पर, लड़-मरते इंसान
गौ बेबस हो देखती, आप बहुत हैरान
शरण घोलकर पी गया, भूल गया तहजीब
पूत आप ही लूटते भारत माँ की आन
***

२६-६-२०१७ 

दोहा सलिला

एक द्विपदी:
मैं सपनों में नहीं जी रहा, सपने मुझमें जीते हैं
कोशिश की बोतल में मदिरा, संघर्षों की पीते हैं.
*
दोहा सलिला
*
मीरा मत आ दौड़कर, ये तो हैं कोविंद
भूल भई तूने इन्हें, समझ लिया गोविन्द
*
लाल कृष्ण पीछे हुए, सम्मुख है अब राम
मीरा-यादव दुखी हैं, भला करेंगे राम
*
जो जनता के वक्ष पर दले स्वार्थ की दाल
वही दलित कलिकाल में, बनता वही भुआल
*
हिंदी घरवाली सुघड़, हुई उपेक्षित मीत
अंग्रेजी बन पड़ोसन, लुभा रही मन रीत
*
चाँद-चाँदनी नभ मकां, तारे पुत्र हजार
हम दो, दो हों हमारे, भूले बंटाढार
*
काम और आराम में, ताल-मेल ले सीख
जो वह ही मंजिल वारे, सबसे आगे दीख
*
अधकचरा मस्तिष्क ही, लेता शब्द उधार
निज भाषा को भूलकर, परभाषा से प्यार
*
मन तक जो पहुँचा सके, अंतर्मन की बात
'सलिल' सफल साहित्य वह, जिसमें हों ज़ज्बात
*
हिंदी-उर्दू सहोदरी, अंग्रेजी है मीत
राम-राम करते रहे, घुसे न घर में रीत
*
घुसी वजह बेवजह में, बिना वजह क्यों बोल?
नामुमकिन मुमकिन लिए, होता डाँवाडोल
*
खुदी बेखुदी हो सके, खुद के हों दीदार
खुदा न रहता दूर तब, नफरत बनती प्यार
*
खेत ख़त्म कर बना लें, सडक शहर सरकार
खेती करने चाँद पर, जाओ कहे दरबार
*
पल-पल पल जीता रहा, पल-पल मर पल मौन
पल-पल मानव पूछता, पालक से तू कौन?
*
प्रथम रश्मि रवि की हँसी, लपक धरा को चूम
धरा-पुत्र सोता रहा, सुख न उसे मालूम
*
दल के दलदल में फँसा, नेता देता ज्ञान
जन की छाती पर दले, दाल- स्वार्थ की खान
*
खेल रही है सियासत, दलित-दलित का खेल
भूल सिया-सत छल रही, देश रहा चुप झेल
*
काम और आराम में, ताल-मेल ले सीख
जो वह ही मंजिल वरे, सबसे आगे दीख
*
सुबह उषा फिर साँझ से, खूब लड़ाया लाड़
छिपा निशा की गोद में, सूरज लेकर आड़
*
तर्क वितर्क कुतर्क से, ठगा गया विश्वास
बिन श्रद्धा के ज्ञान का, कैसे हो आभास?
*
लगा-लगा दम, आदमी, हो बेदम मजबूर
कोई न कहता आ दमी, सभी भागते दूर
*
अपने अपने है नहीं, गैर नहीं हैं गैर
खुद को खुद ही परख लें, तभी रहेगी खैर
*
पेड़ कभी लगते नहीं, रोपी जाती पौध
अब जमीन ही है नहीं, खड़े सहस्त्रों सौध
*
२६-६-२०१७ 

नवगीत

नवगीत 
संजीव
*
नहा रहे हैं
बरसातों में
हरे-भरे बतियाते झाड़
अपनी जगह
हमेशा ठांड़े
झूम-झूम मस्ताते झाड़
*
सूर्य-बल्ब
जब होता रौशन
मेक'प करते बिना छिपे.
शाखाओं,
कलियों फूलों से
मिलते, नहीं लजाते झाड़
नहा रहे हैं
बरसातों में
हरे-भरे बतियाते झाड़
अपनी जगह
हमेशा ठांड़े
झूम-झूम मस्ताते झाड़
*
बऊ धरती
आँखें दिखलाये
बहिना हवा उड़ाये मजाक
पर्वत दद्दा
आँख झुकाये,
लता संग इतराते झाड़
नहा रहे हैं
बरसातों में
हरे-भरे बतियाते झाड़
अपनी जगह
हमेशा ठांड़े
झूम-झूम मस्ताते झाड़
*
कमसिन सपने
देख थिरकते
डेटिंग करें बिना हिचके
बिना गये
कर रहे आउटिंग
कभी नहीं पछताते
नहा रहे हैं
बरसातों में
हरे-भरे बतियाते झाड़
अपनी जगह
हमेशा ठांड़े
झूम-झूम मस्ताते झाड़
*

२६-६-२०१७ 

शुद्ध ध्वनि छंद


छंद सलिला:
शुद्ध ध्वनि छंद
संजीव
*
छंद-लक्षण: जाति लाक्षणिक, प्रति चरण मात्रा ३२ मात्रा, यति १८-८-८-६, पदांत गुरु
लक्षण छंद:
लाक्षणिक छंद है / शुद्धध्वनि पद / अंत करे गुरु / यश भी दे
यति रहे अठारह / आठ आठ छह, / विरुद गाइए / साहस ले
चौकल में जगण न / है वर्जित- करि/ए प्रयोग जब / मन चाहे
कह-सुन वक्ता-श्रो/ता हर्षित, सम / शब्द-गंग-रस / अवगाहे
उदाहरण:
१. बज उठे नगाड़े / गज चिंघाड़े / अंबर फाड़े / भोर हुआ
खुर पटकें घोड़े / बरबस दौड़े / संयम छोड़े / शोर हुआ
गरजे सेनानी / बल अभिमानी / मातु भवानी / जय रेवा
ले धनुष-बाण सज / बड़ा देव भज / सैनिक बोले / जय देवा
कर तिलक भाल पर / चूड़ी खनकीं / अँखियाँ छलकीं / वचन लिया
'सिर अरि का लेना / अपना देना / लजे न माँ का / दूध पिया'
''सौं मातु नरमदा / काली मैया / यवन मुंड की / माल चढ़ा
लोहू सें भर दौं / खप्पर तोरा / पिये जोगनी / शौर्य बढ़ा''
सज सैन्य चल पडी / शोधकर घड़ी / भेरी-घंटे / शंख बजे
दिल कँपे मुगल के / धड़-धड़ धड़के / टँगिया सम्मुख / प्राण तजे
गोटा जमाल था / घुला ताल में / पानी पी अति/सार हुआ
पेड़ों पर टँगे / धनुर्धारी मा/रें जीवन दु/श्वार हुआ
वीरनारायण अ/धार सिंह ने / मुगलों को दी / धूल चटा
रानी के घातक / वारों से था / मुग़ल सैन्य का / मान घटा
रूमी, कैथा भो/ज, बखीला, पं/डित मान मुबा/रक खां लें
डाकित, अर्जुनबै/स, शम्स, जगदे/व, महारख सँग / अरि-जानें
पर्वत से पत्थर / लुढ़काये कित/ने हो घायल / कुचल मरे-
था नत मस्तक लख / रण विक्रम, जय / स्वप्न टूटते / हुए लगे
बम बम भोले, जय / शिव शंकर, हर / हर नरमदा ल/गा नारा
ले जान हथेली / पर गोंडों ने / मुगलों को बढ़/-चढ़ मारा
आसफ खां हक्का / बक्का, छक्का / छूटा याद हु/ई मक्का
सैनिक चिल्लाते / हाय हाय अब / मरना है बिल/कुल पक्का
हो गयी साँझ निज / हार जान रण / छोड़ शिविर में / जान बचा
छिप गया: तोपखा/ना बुलवा, हो / सुबह चले फिर / दाँव नया
रानी बोलीं "हम/ला कर सारी / रात शत्रु को / पीटेंगे
सरदार न माने / रात करें आ/राम, सुबह रण / जीतेंगे
बस यहीं हो गयी / चूक बदनसिंह / ने शराब थी / पिलवाई
गद्दार भेदिया / देश द्रोह कर / रहा न किन्तु श/रम आई
सेनानी अलसा / जगे देर से / दुश्मन तोपों / ने घेरा
रानी ने बाजी / उलट देख सो/चा वन-पर्वत / हो डेरा
बारहा गाँव से / आगे बढ़कर / पार करें न/र्रइ नाला
नागा पर्वत पर / मुग़ल न लड़ पा/येंगे गोंड़ ब/नें ज्वाला
सब भेद बताकर / आसफ खां को / बदनसिंह था / हर्षाया
दुर्भाग्य घटाएँ / काली बनकर / आसमान पर / था छाया
डोभी समीप तट / बंध तोड़ मुग/लों ने पानी / दिया बहा
विधि का विधान पा/नी बरसा, कर / सकें पार सं/भव न रहा
हाथी-घोड़ों ने / निज सैनिक कुच/ले, घबरा रण / छोड़ दिया
मुगलों ने तोपों / से गोले बर/सा गोंडों को / घेर लिया
सैनिक घबराये / पर रानी सर/दारों सँग लड़/कर पीछे
कोशिश में थीं पल/टें बाजी, गिरि / पर चढ़ सकें, स/मर जीतें
रानी के शौर्य-पराक्रम ने दुश्मन का दिल दहलाया था
जा निकट बदन ने / रानी पर छिप / घातक तीर च/लाया था
तत्क्षण रानी ने / खींच तीर फें/का, जाना मु/श्किल बचना
नारायण रूमी / भोज बच्छ को / चौरा भेज, चु/ना मरना
बोलीं अधार से / 'वार करो, लो / प्राण, न दुश्मन / छू पाये'
चाहें अधार लें / उन्हें बचा, तब / तक थे शत्रु नि/कट आये
रानी ने भोंक कृ/पाण कहा: 'चौरा जाओ' फिर प्राण तजा
लड़ दूल्हा-बग्घ श/हीद हुए, सर/मन रानी को / देख गिरा
भौंचक आसफखाँ / शीश झुका, जय / पाकर भी थी / हार मिली
जनमाता दुर्गा/वती अमर, घर/-घर में पुजतीं / ज्यों देवी
पढ़ शौर्य कथा अब / भी जनगण, रा/नी को पूजा / करता है
जनहितकारी शा/सन खातिर नित / याद उन्हें ही / करता है
बारहा गाँव में / रानी सरमन /बग्घ दूल्ह के / कूर बना
ले कंकर एक र/खे हर जन, चुप / वीर जनों को / शीश नवा
हैं गाँव-गाँव में / रानी की प्रति/माएँ, हैं ता/लाब बने
शालाओं को भी , नाम मिला, उन/का- देखें ब/च्चे सपने
नव भारत की नि/र्माण प्रेरणा / बनी आज भी / हैं रानी
रानी दुर्गावति / हुईं अमर, जन / गण पूजे कह / कल्याणी
नर्मदासुता, चं/देल-गोंड की / कीर्ति अमर, दे/वी मैया
जय-जय गाएंगे / सदियों तक कवि/, पाकर कीर्ति क/था-छैंया
*********
२६-६-२०१४
टिप्पणी: २४ जून १५६४ रानी दुर्गावती शहादत दिवस, कूर = समाधि,
दूरदर्शन पर दिखाई जा रही अकबर की छद्म महानता की पोल रानी की संघर्ष कथा खोलती है.
(अब तक प्रस्तुत छंद: अखण्ड, अग्र, अचल, अचल धृति, अरुण, अवतार, अहीर, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रवज्रा, उड़ियाना, उपमान, उपेन्द्रवज्रा, उल्लाला, एकावली, कुकुभ, कज्जल, कामिनीमोहन, काव्य, कीर्ति, कुण्डल, कुडंली, गंग, घनाक्षरी, चौबोला, चंडिका, चंद्रायण, छवि, जग, जाया, तांडव, तोमर, त्रिलोकी, दिक्पाल, दीप, दीपकी, दोधक, दृढ़पद, नित, निधि, निश्चल, प्लवंगम्, प्रतिभा, प्रदोष, प्रभाती, प्रेमा, बाला, भव, भानु, मंजुतिलका, मदन,मदनावतारी, मधुभार, मधुमालती, मनहरण घनाक्षरी, मनमोहन, मनोरम, मानव, माली, माया, माला, मोहन, मृदुगति, योग, ऋद्धि, रसामृत, रसाल, राजीव, राधिका, रामा, रूपमाला, लीला, वस्तुवदनक, वाणी, विरहणी, विशेषिका, शक्तिपूजा, शशिवदना, शाला, शास्त्र, शिव, शुद्ध ध्वनि, शुभगति, शोभन, सरस, सार, सारस, सिद्धि, सिंहिका, सुखदा, सुगति, सुजान, सुमित्र, संपदा, हरि, हेमंत, हंसगति, हंसी)

आल्हा - बुंदेली के नीके बोल

छंद सलिला:
आल्हा/वीर/मात्रिक सवैया छंद
संजीव
*
लक्षण छंद:
आल्हा मात्रिक छंद सवैया, सोलह-पन्द्रह यति अनिवार्य.
गुरु-लघु चरण अंत में रखिये, सिर्फ वीरता हो स्वीकार्य..
अलंकार अतिशयता करता बना राई को 'सलिल' पहाड़.
ज्यों मिमयाती बकरी सोचे, गुँजा रही वन लगा दहाड़..
उदाहरण:
१. बुंदेली के नीके बोल... संजीव 'सलिल'
*
तनक न चिंता करो दाऊ जू, बुंदेली के नीके बोल.
जो बोलत हैं बेई जानैं, मिसरी जात कान मैं घोल..
कबू-कबू ऐसों लागत ज्यौं, अमराई मां फिररै डोल.
आल्हा सुनत लगत हैं ऐसो, जैसें बाज रए रे ढोल..
अंग्रेजी खों मोह ब्याप गौ, जासें मोड़ें जानत नांय.
छींकें-खांसें अंग्रेजी मां, जैंसें सोउत मां बर्रांय..
नीकी भासा कहें गँवारू, माँ खों ममी कहत इतरांय.
पाँव बुजुर्गों खें पड़ने हौं, तो बिनकी नानी मर जांय..
फ़िल्मी धुन में टर्राउट हैं, आँय-बाँय फिर कमर हिलांय.
बन्ना-बन्नी, सोहर, फागें, आल्हा, होरी समझत नांय..
बाटी-भर्ता, मठा-महेरी, छोड़ केक बिस्कुट बें खांय.
अमराई चौपाल पनघटा, भूल सहर मां फिरें भुलांय..
*
२. कर में ले तलवार घुमातीं, दुर्गावती करें संहार.
यवन भागकर जान बचाते गिर-पड़ करते हाहाकार.
सरमन उठा सूँढ से फेंके, पग-तल कुचले मुगल-पठान.
आसफ खां के छक्के छूटे, तोपें लाओ बचे तब जान.
३. एक-एक ने दस-दस मारे, हुआ कारगिल खूं से लाल
आये कहाँ से कौन विचारे, पाक शिविर में था भूचाल
या अल्ला! कर रहम बचा जां, छूटे हाथों से हथियार
कैसे-कौन निशाना साधे, तजें मोर्चा हो बेज़ार
२६-६-२०१४ __________
*********
(अब तक प्रस्तुत छंद: अखण्ड, अग्र, अचल, अचल धृति, अरुण, अवतार, अहीर, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रवज्रा, उड़ियाना, उपमान, उपेन्द्रवज्रा, उल्लाला, एकावली, कुकुभ, कज्जल, कमंद, कामिनीमोहन, काव्य, कीर्ति, कुण्डल, कुडंली, गंग, घनाक्षरी, चौबोला, चंडिका, चंद्रायण, छवि, जग, जाया, तांडव, तोमर, त्रिलोकी, दिक्पाल, दीप, दीपकी, दोधक, दृढ़पद, नित, निधि, निश्चल, प्लवंगम्, प्रतिभा, प्रदोष, प्रभाती, प्रेमा, बाला, भव, भानु, मंजुतिलका, मदन,मदनावतारी, मधुभार, मधुमालती, मनहरण घनाक्षरी, मनमोहन, मनोरम, मानव, माली, माया, माला, मोहन, मृदुगति, योग, ऋद्धि, रसामृत, रसाल, राजीव, राधिका, रामा, रूपमाला, लीला, वस्तुवदनक, वाणी, विरहणी, विशेषिका, शक्तिपूजा, शशिवदना, शाला, शास्त्र, शिव, शुभगति, शोभन, सरस, सार, सारस, सिद्धि, सिंहिका, सुखदा, सुगति, सुजान, सुमित्र, संपदा, हरि, हेमंत, हंसगति, हंसी)

हाइकु गीत आँख का पानी

हाइकु गीत:
आँख का पानी
संजीव 'सलिल'
*रोक न पाये
जनक जैसे ज्ञानी
आँसू अपने.
मिट्टी में मिला
रावण जैसा ध्यानी
टूटे सपने.
आँख से पानी
न बहे, पर रहे
आँख का पानी...
*
पल में मरे
हजारों बेनुगाह
गैस में घिरे.
गुनहगार
हैं नेता-अधिकारी
झूठे-मक्कार.
आँख में पानी
देखकर रो पड़ा
आँख का पानी...
*
२६-६-२०१० 

गुरुवार, 25 जून 2020

समीक्षा के भेदक तत्व

समीक्षा के भेदक तत्व
डॉ०आलोक रंजन कुमार

शास्त्रीय समीक्षा तथा स्वच्छंदतावादी समीक्षा के भेदक तत्व--

शास्त्रीय समीक्षाशास्त्र के रूप में समीक्षा की परंपरा अति प्राचीन है। "शास्त्र" शब्द को परिभाषित करते हुए "शासनात शास्त्रम्" तथा "शंसनात शास्त्रम्" दोनों बातें कही गई हैं। वस्तुतः शास्त्र शासन भी करता है और अनुशंसा (संस्तुति) भी। भारतवर्ष में आचार्य भरत के समय विक्रम संवत दूसरी सदी तथा पाश्चात्य जगत में प्लेटो के काल से ही क्रमशः काव्य और कला के रूप में साहित्य के लिए निकष की स्थापना होती रही है। परवर्ती रचनाकार उनका अनुसरण करते रहे हैं। आज भी कुछ तथावत् तथा कुछ परिवर्तित रूपों में आलोचनाशास्त्र साहित्य रूपों का नियमन तथा उसका परीक्षण करता है। हां , इतनी बात अवश्य है कि आचार्य भरत के शब्दों में- लोक जीवन का अनुकरण है "लोकानुकरणम् नाट्यम्" तथा प्लेटो के शब्दों में - "वह प्रकृति का अनुकरण है"- (इमिटेशन ऑफ नेचर)। लोक मान्यताओं की परिवर्तनशीलता तथा पाश्चात्य मान्यताओं के प्रभाव स्वरूप भारतीय मान्यताएं भी बदलती रही हैं। तदनुसार साहित्य की समीक्षा भी भिन्न-भिन्न ढंग से होती रही हैं।
संस्कृत वांग्मय में प्रतिभा के दो रूप माने गए हैं --
(१).कारयित्रि प्रतिभा तथा, (२).भावयित्री प्रतिभा ।

(१). कारयित्री प्रतिभा के बल पर रचनाकार सृजन करता है।
(२).भावयित्री प्रतिभा के बल पर पाठक तथा आलोचक उसका मूल्यांकन करते हैं । आलोचक इस तथ्य को उद्घाटित करता है कि कोई रचनाकार मानव हृदय की अनुभूतियों को किस सौंदर्य और सीमा के साथ उद्घाटित करने में सफल हुआ है।
आलोचना के दो रूप माने जाते हैं --
(1). सैद्धांतिक आलोचना,
(2). व्यावहारिक आलोचना।

(1). सैद्धांतिक आलोचना के अंतर्गत साहित्य रचना के सिद्धांतों का निरूपण होता है। इसके अंतर्गत रचनाओं के प्रतिमान गठित किए जाते हैं।
(2). व्यावहारिक आलोचना के अंतर्गत उन सिद्धांतों के आधार पर किसी कृतिकार अथवा उसकी कृति विशेष का परीक्षण किया जाता है।
संस्कृत में सैद्धांतिक समीक्षा की तो सुदीर्घ परंपरा मिलती है । परंतु व्यावहारिक आलोचना /समीक्षा का कोई रूप वहां नहीं मिलता। व्यवहारिक समीक्षा का विकास हिंदी में शुक्ल युग से प्रारंभ हुआ। हिंदी में इसकी दीर्घ परंपरा है ।
सैद्धांतिक समीक्षा के अंतर्गत शास्त्रीय - समन्वयात्मक, स्वच्छंदतावादी, उपयोगितावादी, मनोविश्लेषणात्मक तथा समाजशास्त्रीय इत्यादि कई प्रकार की समीक्षा पद्धतियों का विकास हुआ है।
हिंदी आलोचना के जनक के रूप में आचार्य रामचंद्र शुक्ल को प्रायः सभी विद्वान् स्वीकारते हैं। इन्होंने सैद्धांतिक तथा व्यावहारिक दोनों प्रकार की समीक्षा की है।
सैद्धांतिक समीक्षा के अंतर्गत ये शास्त्रीय समीक्षक माने जाते हैं । उनकी "रस- मीमांसा" तथा "चिंतामणि" में "कविता क्या है?" शीर्षक निबंध शास्त्रीय समीक्षा के उदाहरण हैं । आगे भी शास्त्रीय समीक्षा से संबंधित जो भी ग्रंथ लिखे गए हैं, उसके शलाका पुरुष के रूप में आचार्य रामचंद्र शुक्ल को ही स्वीकार किया गया है। वैसे तो हिंदी साहित्य में आचार्य रामचंद्र शुक्ल के पूर्व भी रीतिकालीन कवि - आचार्यों ने लक्षण ग्रंथ की रचना की है, जिसे शास्त्रीय समीक्षा के रूप में स्वीकार किया जाता है। किंतु वह परंपरा डॉ० राम विनोद सिंह के शब्दों में - "अनगढ़-सी" है। वस्तुतः हिंदी में शास्त्रीय समीक्षा के पुरोधा आचार्य शुक्ल जी ही हैं , जिनका आगमन द्विवेदी युग के अंत में हुआ है। हिंदी आलोचना के इतिहास में शुक्ल जी को स्वमेव एक युग मानना समीचीन होगा।
आचार्य शुक्ल के पूर्व रीतिकालीन आचार्यों ने संस्कृत की शास्त्रीय समीक्षा के छ: संप्रदायों में से केवल चार अर्थात रस, छंद, अलंकार और ध्वनि संप्रदायों का अनुसरण करने का प्रयास किया। द्विवेदी युग में इसका विस्तार हुआ किंतु यहां भी शास्त्रीय समीक्षा संस्कृत के प्रभाव से मुक्त एवं आत्मनिर्भर नहीं है। शुक्ल जी ने साहित्य के नवबोध के साथ ही बदलती हुई भारतीय सामाजिकता से प्रभाव ग्रहण किया तथा साहित्य को लोकमंगल से जोड़कर उसके स्वरूप को लोचदार और कारण सापेक्ष बनाया ।
आचार्य शुक्ल जी की शास्त्रीय समीक्षा अपने काल के साहित्य आदर्शों तथा पारंपरिक साहित्य सिद्धांतों के समीकरण से निर्मित है। शुक्ल जी यह महसूस करते हैं कि शास्त्रीय समीक्षा अपने देश की समस्त सांस्कृतिक परंपरा से जुड़कर ही अधिक सार्थक एवं संगत बन गई है। परंतु कुछ विद्वानों का आरोप है कि आचार्य शुक्ल तथा ,उनकी समीक्षा नैतिक वादी है जो पारंपरिक भाव ।बोध का अंध समर्थन और नवबोध का प्रतिकार करती है। नैतिकता वादी दृष्टि प्रायः जीवन के व्यवहार पक्ष की अवहेलना करती है तथा यथार्थ से दूर वह आदर्शों में जीती है। साथ ही स्वरूप उपदेशात्मक हो जाता है। कुल मिलाकर हिंदी की शास्त्रीय समीक्षा साहित्य के पारंपरिक प्रतिमानों, प्राचीन एवं अर्वाचीन भावबोधों तथा पाश्चात्य एवं प्राचीन तथा नवीन मान्यताओं के समीकरण से निर्मित है। जीवन आदर्शों का पोषक तथा उससे जुड़ कर चलने वाली समीक्षा पद्धति है।
आचार्य शुक्ल जी की समीक्षा पद्धति रसवादी है। इन्होंने रस को ही काव्य की आत्मा के रूप में स्वीकार किया है। रीति काल में प्राय: अलंकारवादी समीक्षा की होड़ सी रही है। किंतु आचार्य शुक्ल के काल में तथा शुक्लोत्तर हिंदी समीक्षा का स्वरूप प्राय: रसवादी तथा लोक मांगलिक रहा है।
शास्त्रीय समीक्षकों की परंपरा में आचार्य शुक्ल के पश्चात् गुलाब राय( काव्य के रूप: सिद्धांत और अध्ययन), चंद्रबली पांडे, पीतांबर दत्त बड़थ्वाल, लक्ष्मीनारायण सुधांशु (काव्य में अभिव्यंजनावाद ,जीवन के तत्व एवं काव्य के सिद्धांत), रामकृष्ण सिलीमुख, आचार्य विश्वनाथ प्रताप मिश्र( वांग्मय विमर्श), पंडित रमाशंकर शुक्ल रसाल, हरिऔध , माधव प्रसाद मिश्र, डॉ श्यामसुंदर दास, डॉ नगेंद्र आदि की सुदीर्घ परंपरा आती है।
स्वच्छंदतावादी समीक्षा-
आचार्य शुक्ल की शास्त्रीय समीक्षा के परंपरावादी एवं आदर्श परक दृष्टिकोण की प्रतिक्रिया रूप में विकसित स्वच्छंदतावादी समीक्षा पद्धति प्रकाश में आई । शुक्ल जी का रसवादी दृष्टिकोण इतिवृत्तात्मक साहित्य के अभिव्यंजना कौशल तथा मूल्यांकन की नैतिकतावादी दृष्टि स्वच्छंदतावादी समीक्षकों को मान्य नहीं । प्रथम विश्व युद्ध के पश्चात् (1914 से 1919) भारतीय जीवन में एक बहुत बड़ा बदलाव आया तथा उसमें प्रभावित नए ढंग के काव्य का सूत्रपात हुआ तथा काव्य कला संबंधी नई धारणाएं सामने आईं। पारंपरिक मान्यताओं से हटकर साहित्यकारों ने आत्मानुभूति को साहित्य में अभिव्यक्ति प्रदान की। 1920 के आसपास दार्शनिक आभा से अभिमंडित, नूतन कोमल कल्पनाओं से सुसज्जित, आत्मपरक साहित्य के प्रणयन होने लगे, जो आगे चलकर छायावादी साहित्य के नाम से अभिहित हुआ।इनके मूल्यांकन में आचार्य शुक्ल द्वारा स्थापित शास्त्रीय समीक्षा पद्धति असमर्थ रही। इन समीक्षकों ने न तो वैसे साहित्यकारों के प्रति सहानुभूति दिखलाई और ना तो उन्हें इसकी सही परख ही हो सकी । फलत: छायावादी साहित्य को अनेक तरह के आरोपों का शिकार होना पड़ा। फलत: वैसे साहित्यकारों को अपने विरोधियों का उत्तर देने के लिए आलोचना के क्षेत्र में उतरना पड़ा और उन्होंने साहित्य के नए प्रतिमान गठित किए।
स्वच्छंदतावादी समीक्षा काव्य और शिल्प दोनों ही क्षेत्रों में नवीन मार्ग का अनुसरण करती है। यहां समष्टिगत अनुभूतियों और मान्यताओं की जगह व्यक्तिगत अनुभूतियों को साहित्य में स्थान दिया गया। स्वतंत्रता की भावना तथा विद्रोह की प्रवृत्ति स्वच्छंदतावाद की मुख्य विशेषता है । साहित्यकार अपनी रचना में व्यक्तिगत अनुभूतियों की अभिव्यक्ति के लिए पूर्णत: स्वतंत्र है। वस्तुतः एक सफल कलाकार की व्यष्टिपरक अनुभूति साहित्य जगत में आकर स्वमेव व्यष्टिगत हो जाती है और समग्र लोक जीवन को प्रभावित करती है ।
पंत, प्रसाद, निराला तथा महादेवी ने स्वयं अपनी रचनाओं में छायावादी साहित्य पर लगाए गए आरोपों के उत्तर देते हुए लंबी-लंबी भूमिकाएं लिखी तथा स्वतंत्र रचनाओं के रूप में युगीन काव्य की प्रेरणा , अनुभूति , अभिव्यक्ति एवं काव्य सौष्ठव पर विचार किया। यहीं से हिंदी साहित्य में स्वच्छंदतावादी समीक्षा का विकास हुआ।
हिंदी में स्वच्छंदतावादी समीक्षा के उद्भावक के रूप में सुमित्रानंदन पंत को माना जाता है । इन्होंने सर्वप्रथम 1926 ईस्वी में "पल्लव* की भूमिका में स्वच्छंदतावादी काव्य-शिल्प पर विचार किया। पंत जी के अनुसार-" कविता की भाषा चित्रात्मक होनी चाहिए । काव्य में शब्द और अर्थ का अभिन्न संबंध होता है तथा भावों की अभिव्यक्ति और भाषा सौष्ठव मुक्त छंद में अधिक सुघड़ता से व्यक्त किया जा सकता है।" पंत जी ने साहित्य और जीवन में अन्योन्याश्रय संबंध माना है ।
स्वच्छंदतावादी समीक्षकों की परंपरा में छायावाद चतुष्टय के कवियों के अतिरिक्त आचार्य नंददुलारे वाजपेयी का नाम अग्रगण्य है। इन्होंने शुक्ल जी की आलोचना को सीमित बतलाया तथा छायावाद के सौंदर्य बोध एवं भाषा शिल्प पर भी नूतन दृष्टि डाली। आचार्य वाजपेई के पश्चात् शांतिप्रिय द्विवेदी , आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, डॉ० नागेंद्र प्रवृत्ति आलोचकों के नाम इसी परंपरा में आते हैं।

शास्त्रीय एवं स्वच्छंदतावादी समीक्षा के भेदक तत्व-
१). सैद्धांतिक समीक्षा के अंग होते हुए भी जहां शास्त्रीय समीक्षा परंपरावादी है वहां स्वच्छंदतावादी समीक्षा परंपरा मुक्त है । वह परंपराओं और रूढ़ियों के प्रति विद्रोहात्मक है।
२). शास्त्रीय समीक्षा जहां परंपराओं और आदर्शों के प्रति मोह ग्रस्त है वहां स्वच्छंदतावादी समीक्षा पारंपरिक मान्यताओं से हटकर नवीन उद्भावनाओं का आग्रह है। फलत: कविवर प्रसाद कहते हैं-
"पुरातनता का यह निर्भीक
सहन करती न प्रकृति पल एक,
नित्य नूतनता का आनंद
किए हैं परिवर्तनों में टेक।"
३). शास्त्रीय समीक्षा जहां आदर्शवादी है वहां स्वच्छंदतावादी समीक्षा यथार्थवादी।
४). शास्त्रीय समीक्षा साहित्य में समष्टिपरक अनुभूतियों को अभिव्यक्ति प्रदान करने का आग्रही है, वहां स्वच्छंदतावादी मान्यताएं व्यक्तिगत अनुभूतियों विचारों तथा कल्पनाओं की अभिव्यक्ति की पूरी छूट देती है।
५). स्वच्छंदता वादी समीक्षक कला को साहित्य का बाह्य रूप मानते हैं तथा जीवन को उसका अंतः स्वरूप । अतः साहित्य में कृतिकार की निजी संवेदना ही अभिव्यक्ति पाएगी। डॉ०शांति प्रिय द्विवेदी के शब्दों में -"कला साहित्य का बाह्य रूप है, जीवन उसका अंत रूप। कला अभिव्यक्ति है जीवन अभिव्यक्त।"
६). शास्त्रीय समीक्षा के उद्भावक आचार्य शुक्ल ने जहां अपनी समीक्षा का केंद्रबिंदु तुलसी और उनके रामचरितमानस को माना है वहां स्वच्छंदतावादी समीक्षकों का केंद्रबिंदु छायावादी साहित्य है।
७).स्वच्छंदतावादी समीक्षा साहित्य में व्यक्ति का उदात्त कल्पना, कलात्मक उत्कर्ष, प्रकृति चित्रण आदि की पूरी छूट देते हैं तथा कवि को शास्त्र एवं परंपरा के हर बंधन से उन्मुक्त । जबकि शास्त्रीय समीक्षक आदर्श के मोह का त्याग नहीं करते, वे सामाजिक अनुभूतियों, लोक मर्यादाओं तथा परंपराओं के प्रति आग्रही हैं।
समग्रत: हम कह सकते हैं कि स्वच्छंदतावादी समीक्षा सैद्धांतिक समीक्षा के क्षेत्र में एक आंदोलन है जो प्राचीन रूढ़ियों का विरोध कर हर क्षण नवीन उद भावनाओं तथा उन्मुक्त भावनाओं का स्वागत करती है।

त्रिप्रमाणिका सवैया

अभिनव प्रयोग-
नवान्वेषित त्रिप्रमाणिका सवैया
*
गणसूत्र - ज र ल ग, ज र ल ग, ज र ल ग।
*
चलो ध्वजा उठा चलें, प्रयाण गीत गा चलें, सभी सुलक्ष्य पा सकें।
कहीं नहीं कमी रहे, विकास की हवा बहे, गरीब सौख्य पा सकें।
नया उगे विहान भी, नया तने वितान भी, न भेद-भाव भा सकें।
उठो! उठो!! न हारना, जहां हमें सुधारना, सुछंद नित्य गा सकें।
*

२५-६-२०१९
संजीव वर्मा 'सलिल'
७९९९५५९६१८

दोहा सलिला

दोहा सलिला
*
लाक्षणिकता हो प्रबल, सहज व्यंजना साध्य।
गति-यति-लय पच तत्वमय दोहा ही आराध्य।
*
दोहा-सुषमा सहजता, भाषिक सलिल प्रवाह।
पाठक करता वाह हो, श्रोता भरता आह।।
*
भाव बिंब रस भाव दें, दोहा के माधुर्य।
मिथक-प्रतीक सटीक हों, किन हो क्लिष्ट-प्राचुर्य।।
*
२५-६-२०१९

विमर्श: पुरुष सामंती हैं और स्त्री?

विमर्श:
कृष्णा अग्निहोत्री: ९०% पुरुष सामंती धारणा के हैं. आपकी क्या राय है?
*
और स्त्रियाँ? शत प्रतिशत... विवाह होते ही स्वयं को हरः स्वामिनी मानकर पति के पूरे परिवार को बदलने या बेदखल करने की कोशिश, सफल न होने पर शोषण का आरोप, सम्बन्ध न निभा पाने पर खुद को न सुधार कर शेष सब को दंडित करने की कोशिश. जन्म से मरण तक खुद को पुरुष से मदद पाने का अधिकारी मानेंगी और उसी पर निराधार आरोप भी लगाएँगी. पिता की ममता, भाई का साथ, मित्र का अपनापन, पति का संरक्षण, ससुराल की धन-संपत्ति, बच्चों का लाड़, दामाद का आदर सब स्त्री का प्राप्य है किन्तु यह देनेवाला सामन्ती, शोषक, दुर्जन और न जाने क्या-क्या है. पुरुष प्रधान समाज में एक अकेली स्त्री आकर पति गृह की स्वामिनी हो जाती है जबकि पुरुष अपनी ससुराल में केवल अतिथि ही हो पाता है. यदि स्त्री प्रधान समाज हो तो स्त्री पुरु को जन्म ही न लेने दे या जन्मते ही दफना दे. इसी लिए प्रकृति ने पुरुष का अस्तित्व बचाए रखने के लिए प्राणी जगत में पुरुष को सबल बनाया.
२५-६-२०१७