ॐ
सलिल सृजन मई ४
०
गीत
०
अधर हँसे तो
झरा मोगरा
मन महका, तन चहका...
.
लय नवगीतों के मन भाई
करे ग़ज़ल रस से कुड़माई।
नचा सवैया झूम-झूमकर-
कुंडलिया थामे शहनाई।।
आँख तरेरे
दंडक बब्बा
सँभल छंद अब बहका,
अधर हँसे तो
झरा मोगरा
मन महका, तन चहका...
.
रूपक खींच रूपमय रेखा,
कहे यमक से मिथक अदेखा
उपमा-श्लेष डाल गलबहियाँ-
कहते बिंब कहाँ क्या देखा?
नयन मिले तो
हृदय डोलता
ज़र्रा-ज़र्रा दहका,
अधर हँसे तो
झरा मोगरा
मन महका, तन चहका...
.
सत्य उपनिषद पूछ-बताते
कौन सयाना खोज न पाते।
हारे देव न ब्रह्म मिल सका-
चित्र गुप्त छवि कैसे पाते।।
आत्म शुद्धि हित
हवन किया
परमात्म आप ही लहका,
अधर हँसे तो
झरा मोगरा
मन महका, तन चहका...
४.६.२०२६
०००
गीत
०
अपना बसना है
ममता के गाँव में...
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नेह नर्मदा कलकल बहती
शीतल अस्थि हुई हर दहती
कलकल करती लहर-लहर हँस-
श्वेत-श्याम पत्थर से कहती
कंकर को शंकर कर दूँ मैं
मेरा रहना
अमरकंटकी ठाँव में,
मेरा बसना है
ममता के गाँव में...
.
सरला तरला मेरी धारा
पग-पग मठ मंदिर गुरुद्वारा
धुनी रमाए तीर कबीरा-
बंबुलिया दस दिश गुंजारा।
बहा पसीना
लक्ष्य मिलेगा पाँव में,
मेरा बसना है
ममता के गाँव में...
.
वन-वन में भटके रघुवीर
दीन-दुखी की हर ली पीर
कान्हा पांडव का वनवास-
कहता चुके न संयम-धीर।
द्रुपद-सुता हर रक्षित
स्नेहिल दाँव में,
मेरा बसना है
ममता के गाँव में...
.
धान-कटोरा भरे बिलासा
बैलाडीला रहे न प्यासा
बमलेश्वरि-दंतेश्वरि की जय-
राम ते अधिक राम का दासा
जन-मन रमता
गौ-गौरैया-काँव में,
मेरा बसना है
ममता के गाँव में...
०००
छंद शाला
दोहा+रोला=कुंडलिया
१
प्रेम नयन का मित्र है, शत्रु नयन का क्रोध।
बात पते की है यही, यही नयन का शोध।। -अशोक व्यग्र
यही नयन का शोध, बोध हो जिसे सत्य का।
व्याप न सकता उसे, भाव कोई असत्य का।।
सब प्रति रख समभाव, वह चाहे सबकी क्षेम।
नयन नयन में झाँक, चुप करे सभी से प्रेम।।
२
प्रेम नयन का मित्र है, शत्रु नयन का क्रोध।
बात पते की है यही, यही नयन का शोध।। -अशोक व्यग्र
यही नयन का शोध, न कोई यहाँ किसी का।
पल दो पल का साथ, निभाएँ सभी अभी का।।
देखें स्वप्न हजार, न मानें सत्य शयन का।
सत्य सनातन जान, पुरातन प्रेम नयन का।।
३
प्रेम नयन का मित्र है, शत्रु नयन का क्रोध।
बात पते की है यही, यही नयन का शोध।। -अशोक व्यग्र
यही नयन का शोध, क्रोध का गरल पान कर।
रहें न आप अबोध, शत्रु को क्षमा दान कर।।
नयनों में रक्षित रहे, सदा सत्य का चित्र।
व्यग्र-सलिल मत भूलिए, प्रेम नयन का मित्र।।
४
प्रेम नयन का मित्र है, शत्रु नयन का क्रोध।
बात पते की है यही, यही नयन का शोध।। -अशोक व्यग्र
यही नयन का शोध, क्रोध तज शांत रहे मन।
काम करे निष्काम, न किंचित भ्रांत रहे मन।।
ताना-बाना जान, तन-मन बात विचित्र है।
'सलिल' सत्य पहचान, प्रेम नयन का मित्र है।।
४.५.२०२६
०००
छंद सलिला:
दृढ़पद (दृढ़पत/उपमान) छंद
*
छंद-लक्षण: जाति रौद्राक, प्रति चरण मात्रा २३ मात्रा, यति १३ - १०, चरणान्त गुरु गुरु (यगण, मगण) ।
लक्षण छंद:
तेईस मात्रा प्रति चरण / दृढ़पद रचें सुजान
तेरह-दस यति अन्त में / गुरु गुरु- है उपमान
कथ्य भाव रस बिम्ब लय / तत्वों का एका
दिल तक सीधे पहुँचता / लगा नहीं टेका
उदाहरण:
१. हरि! अवगुण से दूरकर / कुछ सद्गुण दे दो
भक्ति - भाव अर्पित तुम्हें / दिक् न करो ले लो
दुनियादारी से हुआ / तंग- शरण आया-
एक तुम्हारा आसरा / साथ न दे साया
२. स्वेद बिन्दु से नहाकर / श्रम से कर पूजा
फल अर्पित प्रभु को करे / भक्त नहीं दूजा
काम करो निष्काम सब / बतलाती गीता
जो आत्मा सच जानती / क्यों हो वह भीता?
३. राम-सिया के रूप हैं / सच मानो बच्चे
बेटी-बेटे में करें / फर्क नहीं सच्चे
शक्ति-लक्ष्मी-शारदा / प्रकृति रूप तीनो
जो न सत्य पहचानते / उनसे हक़ छीनो
***
हरि छंद
*
छंद-लक्षण: जाति रौद्राक, प्रति चरण मात्रा २३ मात्रा, चरणारंभ गुरु, यति ६ - ६ - ११, चरणान्त गुरु लघु गुरु (रगण) ।
लक्षण छंद:
रास रचा / हरि तेइस / सखा-सखी खेलते
राधा की / सखियों के / नखरे हँस झेलते
गुरु से शुरु / यति छह-छह / ग्यारह पर सोहती
अंत रहे / गुरु लघु गुरु / कला 'सलिल' मोहती
उदाहरण:
१. राखो पत / बनवारी / गिरधारी साँवरे
टेर रही / द्रुपदसुता / बिसरा मत बावरे
नंदलाल / जसुदासुत / अब न करो देर रे
चीर बढ़ा / पीर हरो / मेटो अंधेर रे
२. सीता को / जंगल में / भेजा क्यों राम जी?
राधा को / छोड़ा क्यों / बोलो कुछ श्याम जी??
शिव त्यागें / सती कहो / कैसे यह ठीक है?
नारी भी / त्यागे नर / क्यों न उचित लीक है??
३. नेता जी / भाषण में / जो कुछ है बोलते
बात नहीं / अपनी क्यों / पहले वे तोलते?
मुकर रहे / कह-कहकर / माफी भी माँगते
देश की / फ़िज़ां में / क्यों नफरत घोलते?
४. कौन किसे / बिना बात / चाहता-सराहता?
कौन जो न / मुश्किलों से / आप दूर भागता?
लोभ, मोह / क्रोध द्रोह / छोड़ सका कौन है?
ईश्वर से / कौन और / अधिक नहीं माँगता?
***
दोहा गाथा : २.ललित छंद दोहा अमर
*
ललित छंद दोहा अमर, भारत का सिरमौर.
हिन्दी माँ का लाड़ला, इस सा छंद न और.
देववाणी संस्कृत तथा लोकभाषा प्राकृत से हिन्दी को गीति काव्य का सारस्वत कोष विरासत में मिला। दोहा विश्ववाणी हिन्दी के काव्यकोश का सर्वाधिक मूल्यवान रत्न है। दोहा का उद्गम संस्कृत से है। नारद रचित गीत मकरंद में कवि के गुण-धर्म वर्णित करती निम्न पंक्तियाँ वर्तमान दोहे के निकट हैं-
शुचिर्दक्षः शान्तः सुजनः विनतः सूनृत्ततरः।
कलावेदी विद्वानति मृदुपदः काव्य चतुरः।।
रसज्ञौ दैवज्ञः सरस हृदयः सतकुलभवः।
शुभाकारश्ददं दो गुण विवेकी सच कविः।।
अर्थात-
नम्र निपुण सज्जन विनत, नीतिवान शुचि शांत।
काव्य-चतुर मृदु पद रचें, कहलायें कवि कान्त।।
जो रसज्ञ-दैवज्ञ हैं, सरस हृदय सुकुलीन।
गुणी विवेकी कुशल कवि, का यश हो न मलीन।।
काव्य शास्त्र है पुरातन :
काव्य शास्त्र चिर पुरातन, फिर भी नित्य नवीन।
झूमे-नाचे मुदित मन, ज्यों नागिन सुन बीन।।
लगभग ३००० साल प्राचीन भारतीय काव्यशास्त्र के अनुसार काव्य ऐसी रचना है जिसके शब्दों-अर्थों में दोष कदापि न हों, गुण अवश्य हों चाहे अलंकार कहीं-कहीं पर भी न हों१। दिग्गज काव्याचार्यों ने काव्य को रमणीय अर्थमय२ चित्त को लोकोत्तर आनंद देने में समर्थ३, रसमय वाक्य४, काव्य को शोभा तथा धर्म को अलंकार५, रीति (गुणानुकूल शब्द विन्यास/ छंद) को काव्य की आत्मा६, वक्रोक्ति को काव्य का जीवन७, ध्वनि को काव्य की आत्मा८, औचित्यपूर्ण रस-ध्वनिमय९, कहा है। काव्य (ग्रन्थ} या कविता (पद्य रचना) श्रोता या पाठक को अलौकिक भावलोक में ले जाकर जिस काव्यानंद की प्रतीति कराती हैं वह वस्तुतः शब्द, अर्थ, रस, अलंकार, रीति, ध्वनि, वक्रोक्ति, वाग्वैदग्ध्य, तथा औचित्य की समन्वित-सम्मिलित अभिव्यक्ति है।
दोहा उतम काव्य है :
दोहा उत्तम काव्य है, देश-काल पर्याय।
राह दिखाता मनुज को, जब हो वह निरुपाय।।
आरम्भ में हर काव्य रचना 'दूहा' (दोहा) कही जाती थी१०। फिर संस्कृत के द्विपदीय श्लोकों के आधार पर केवल दो पंक्तियों की काव्य रचना 'दोहड़ा' कही गयी। कालांतर में संस्कृत, पाली, प्राकृत, अपभ्रंश भाषाओं की पूर्वपरता एवं युगपरकता में छंद शास्त्र के साथ-साथ दोहा भी पला-बढ़ा।
दोहा छंद अनूप :
जन-मन-रंजन, भव-बाधा-भंजन, यश-कीर्ति-मंडन, अशुभ विखंडन तथा सर्व शुभ सृजन में दोहा का कोई सानी नहीं है। विश्व-वांग्मय का सर्वाधिक मारक-तारक-सुधारक छंद दोहा छंद शास्त्र की अद्भुत कलात्मक देन है११।
नाना भाषा-बोलियाँ, नाना जनगण-भूप।
पंचतत्व सम व्याप्त है, दोहा छंद अनूप।।
दोग्ध्क दूहा दूहरा, द्विपदिक दोहअ छंद।
दोहक दूहा दोहरा, दुवअह दे आनंद।।
द्विपथा दोहयं दोहड़ा, द्विपदी दोहड़ नाम।
दुहे दोपदी दूहड़ा, दोहा ललित ललाम।।
दोहा मुक्तक छंद है :
संस्कृत वांग्मय के अनुसार 'दोग्धि चित्तमिति दोग्धकम्' अर्थात जो श्रोता/पाठक के चित्त का दोहन करे वह दोग्धक (दोहा) है किंतु हिन्दी साहित्य का दोहा चित्त का ही नहीं वर्ण्य विषय के सार का भी दोहन करने में समर्थ है१२। दोहा अपने अस्तित्व-काल के प्रारम्भ से ही लोक परम्परा और लोक मानस से संपृक्त रहा है१३। संस्कृत साहित्य में बिना पूर्ववर्ती या परवर्ती प्रसंग के एक ही छंद में पूर्ण अर्थ व चमत्कार प्रगट करनेवाले अनिबद्ध काव्य को मुक्तक कहा गया है- ' मुक्तक श्लोक एवैकश्चमत्कारः क्षमः सतां'। अभिनव गुप्त के शब्दों में 'मुक्ता मन्यते नालिंकित तस्य संज्ञायां कन। तेन स्वतंत्रया परिसमाप्त निराकांक्षार्थमपि, प्रबंधमध्यवर्ती मुक्तक मिनमुच्यते'।
हिन्दी गीति काव्य के अनुसार मुक्तक पूर्ववर्ती या परवर्ती छंद या प्रसंग के बिना चमत्कार या अर्थ की पूर्ण अभिव्यक्ति करनेवाला छंद है। मुक्तक का प्रयोग प्रबंध काव्य के मध्य में भी किया जा सकता है। रामचरित मानस महाकाव्य में चौपाइयों के बीच-बीच में दोहा का प्रयोग मुक्तक छंद के रूप में सर्व ज्ञात है। मुक्तक काव्य के दो भेद १. पाठ्य (एक भावः या अनुभूति की प्रधानता यथा कबीर के दोहे) तथा गेय (रागात्मकता प्रधान यथा तुलसी के दोहे) हैं।
छंद :
अक्षर क्रम संख्या तथा, गति-यति के अनुसार।
छंद सुनिश्चित हो 'सलिल', सही अगर पदभार।।
छंद वह साँचा या ढाँचा है जिसमें ढलने पर ही शब्द कविता कहलाते हैं। छंद कविता का व्याकरण तथा अविच्छेद्य अंग है। छंद का जन्म एक विशिष्ट क्रम में वर्ण या मात्राओं के नियोजन, गति (लय) तथा यति (विराम) से होता है। वर्णों की पूर्व निश्चित संख्या एवं क्रम, मात्र तथा गति-यति से सम्बद्ध विशिष्ट नियोजित काव्य रचना छंद कहलाती है।
दोहा :
दोहा दो पंक्तियों (पदों) का मुक्तक काव्य है। प्रत्येक पद में २४ मात्राएँ होती हैं। हर पद दो चरणों में विभाजित रहता है। विषम (पहले, तीसरे) चरण में तेरह तथा सम (दूसरे, चौथे) चरण में ग्यारह कलाएँ (मात्राएँ) होना अनिवार्य है।
दोहा और शेर :
दोहा की अपने आप में पूर्ण एवं स्वतंत्र होने की प्रवृत्ति कालांतर में शे'र के रूप में उर्दू काव्य में भिन्न भावः-भूमि में विकसित हुई। दोहा और शे'र दोनों में दो पंक्तियाँ (पद) होती हैं, किंतु 'शे'र में चुलबुलापन होता है तो दोहा में अर्थ गौरव'१४। शेर बहर (उर्दू छंद) में कहे जाते हैं जबकि दोहा कहते समय हिन्दी के 'गण' (रुक्न) संबंधी नियमों का ध्यान रखना होता है। शे'रों का वज़्न (पदभार) भिन्न हो सकता है किंतु दोहा में पदभार हमेशा समान होता है। शे'र में पद (पंक्ति या मिसरा) का विभाजन एक सा नहीं होता जबकि दोहा के दोनों पद दो-दो चरणों में निर्धारित स्थान पर यति (विराम) द्वारा विभक्त होते हैं।
हमने अब तक भाषा, व्याकरण, वर्ण, स्वर, व्यंजन, तथा शब्द को समझने के साथ दोहा की उत्पत्ति लगभग ३००० वर्ष पूर्व संस्कृत, अपभ्रंश व् प्राकृत से होने तथा मुक्तक छंद की जानकारी ली। दोहा में दो पद, चार चरण तथा विषम चरणों में १३-१३ और सम चरणों में ११-११ मात्राएँ होना आवश्यक है। दोहा व शेर के साम्य एवं अन्तर को भी हमने समझा। अगले पाठ में हम छंद के अंगों, प्रकारों, मात्राओं तथा गण की चर्चा करेंगे। तब तक याद रखें-
भाषा-सागर मथ मिला, गीतिकाव्य रस कोष।
समय शंख दोहा करे, सदा सत्य का घोष।।
गीति काव्य रस गगन में, दोहा दिव्य दिनेश।
अन्य छंद शशि-तारिका, वे सुर द्विपदि सुरेश।।
गौ भाषा को दूह कर, कवि कर अमृत पान।
दोहों का नवनीत तू, पाकर बन रसखान।।
सन्दर्भ :
१. तद्दोशौ शब्दार्थो सगुणावनलंकृति पुनः क्वापि -- मम्मट, काव्य प्रकाश,
२. रमणीयार्थ प्रतिपादकः शब्दः काव्यम -- पं. जगन्नाथ,
३. लोकोत्तरानंददाता प्रबंधः काव्यनामभाक -- अम्बिकादत्त व्यास,
४. रसात्मकं वाक्यं काव्यं -- महापात्र विश्वनाथ,
५. काव्यशोभाकरान धर्मान अलंकारान प्रचक्षते -- डंडी, काव्यादर्श,
६. रीतिरात्मा काव्यस्य -- वामन, ९०० ई., काव्यालंकार सूत्र,
७. वक्रोक्तिः काव्य जीवितं -- कुंतक, १००० ई., वक्रोक्ति जीवित,
८. काव्यस्यात्मा ध्वनिरितिः, आनंदवर्धन, ध्वन्यालोक,
९. औचित्यम रस सिद्धस्य स्थिरं काव्यं जीवितं -- क्षेमेन्द्र, ११०० ई., औचित्य विचार चर्चा,
१०. बरजोर सिंह 'सरल', हिन्दी दोहा सार, पृ. ३०,
११. आचार्य पूनम चाँद तिवारी, समीक्षा दृष्टि, पृ. ६४,
१२. डॉ. नागेन्द्र, हिन्दी साहित्य का इतिहास, पृ. ७७,
१३. डॉ. देवेन्द्र शर्मा 'इन्द्र' की भूमिका - शब्दों के संवाद- आचार्य भगवत दुबे,
१४. डॉ. देवेन्द्र शर्मा 'इन्द्र', भूमिका- जैसे, हरेराम 'समीप'.
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