कांकेर
पुण्य भूमि कांकेर की, वंदन शत शत बार।
महानदी सिंदूर तुरु, हटकुल दूष निहार।।
काल पुरा पाषाण के, चित्र चकित हो देख।
गोटीटोला चँदेली, खैरखेड़ा अभिलेख।।
लोमश शृंगी अंगिरा, कंक तपस्वी श्रेष्ठ।
कर ईश्वर आराधना, मिटा सके हर नेष्ठ।।
रहे सातवाहन यहाँ, नाग-गुप्त-चालुक्य।
वाकाटक राजाओं का, रहा यहाँ था राज्य।।
सोम-कन्दरा-चंद्र भी, फूल-फल सके वंश।
बौद्ध धर्म के भी रहे, काभी यहाँ थे अंश।।
गढ़िया पर्वत पर करें, धर्मदेव नृप वास।
जनगण था राजी-खुशी, कहता है इतिहास।।
समय चक्र बदला हुआ, भारत देश गुलाम।
परलकोट विद्रोह में, जूझा खासो-आम।।
गेंद सिंह फाँसी चढ़े, आंग्ल-मराठे क्रुद्ध।
मूल निवासी ने किया, परदेसी से युद्ध।।
बस्तर के गाँधी हुए, ठाकुर राम प्रसाद।
प्रथम सांसद बने जब, देश हुआ आजाद।।
कोदो-कुटकी धान अरु, मक्का फसल प्रधान।
तुअर-कुलथी मूँगफली, पैदा करें किसान।।
जिमीकंद हल्दी कुसुम, लतासेमिया लाख।
मरहम-डिप्पा कृषि करें, कृषक बनाई साख।।
चर्रे-मर्रे मलांजकुडुम,झरने हैं अभिराम।
काली-दुर्गा शिवानी, मंदिर करें प्रणाम।।
परसू तोला में करें, नौकायन विश्राम।
देख महल कांकेर का, करिए झट आराम।।
'आनंदम्' में 'सर्जना', कर 'चित रंजन' धन्य।
एक साथ 'शशि'-'अरुण' पा, यह दिन हुआ अनन्य।।
गीता जी ही तारतीं, दें कृपालु आशीष।
विहँस शालिनी देव धर, कर दें हमें मनीष।।
सीमा की सीमा नहीं, कहते निगम बखान।
पुण्य भूमि कांकेर की, सचमुच है रस-खान।।
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