मुक्तक
बात हो बेबात तो 'क्या बात' कहा जाता है.
को ले गर दिल को तो ज़ज्बात कहा जाता है.
घटती हैं घटनाएँ तो हर पल ही बहुत सी लेकिन-
गहरा हो असर तो हालात कहा जाता है.
७-५-२०१०
७-५-२०१०
दिव्य नर्मदा : हिंदी तथा अन्य भाषाओँ के मध्य साहित्यिक-सांस्कृतिक-सामाजिक संपर्क हेतु रचना सेतु A plateform for literal, social, cultural and spiritual creative works. Bridges gap between HINDI and other languages, literature and other forms of expression.

[पुस्तक विवरण- आँख ये धन्य है, कविता संग्रह (काव्यानुवाद), मूल कवि नरेन्द्र मोदी, काव्यानुवादक डॉ. अंजना संधीर, ISBN ९७८-९३-८२६९५-१७-२ प्रथम संस्करण, वर्ष २०१६, आकार २१.५ से.मी. x १४ से.मी., आवरण पेपरबैक बहुरंगी, पृष्ठ १०४, मूल्य १००/-, विकल्प प्रकाशन २२२६ बी प्रथम तल, गली ३३, पहला पुस्ता, सोनिया विहार, दिल्ली ११००९४, चलभाष ९२११५५९८८६, अनुवादक संपर्क Anjana_Sandhir@yahoo.com]
'आँख ये धन्य है' एक असाधारण काव्य संग्रह है। यह असाधारणता कई अर्थों में है। वैदिक मान्यतानुसार 'ऋषय: मन्त्रदृष्टार: कवय: क्रान्तदर्शिन:' अर्थात ऋषि मन्त्रदृष्टा और कवि क्रान्तदर्शी होता है। जब सामाजिक क्रांति के स्वप्न देखनेवाला समर्पित समाजसेवी खुली आँखों से देखे हुई सपनों को शब्द देता है तो कविता लिखी नहीं जाती, कविता हो जाती है। 'आँख ये धन्य है' की काव्य रचनाएँ काव्य शास्त्र के मानकों के अनुसार लिखी गयी कविताएँ नहीं हैं, ये उससे बहुत आगे जाकर भावनाओं के साथ एकाकार हो चुके एक कर्मव्रती के मन से निकले उच्छवास हैं जो नियमों के मोहताज नहीं होते, जिनका पारायण कर नियमों की संरचना की जाती है। ऐसी रचनाओं के कथ्य इतने सहज ग्रहणीय होते हैं कि उनके आगे भाषा, क्षेत्र, वाद आदि की सीमायें बौनी हो जाती हैं।