सलिल सृजन मार्च १
*
छंद शाला १
उच्चार काल
०
मनुष्य ही नहीं हर जीव जन्म लेने के पूर्व गर्भ में ही उच्चार (वाक्, बोल) से परिचित हो जाता है, जब माँ उसे दुलारते हुए कुछ कहती हैं।
कुछ कहने का माध्यम ध्वनि होती है।
उच्चार काल
उच्चार करने (बोलने) में लगे समय को 'उच्चार काल' कहते हैं।
लघु उच्चार
कम समय में कहे गए उच्चार को छोटा या 'लघु' कहा जाता है। जैसे- अ, इ, उ, ऋ तथा इन्हें मिलाकर कहे गए व्यंजन क, चि, तु, प्र, कृ आदि।
दीर्घ उच्चार
अधिक समय में कहे गए उच्चार को बड़ा, दीर्घ या 'गुरु' कहा जाता है। जैसे- आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ, अं, अ: तथा इन्हें मिलाकर कहे गए व्यंजन खा, जी, डू, थे, पै, बो, लौ, सं, व: आदि।
अर्थ की दृष्टि से उच्चार के दो प्रकार होते हैं।
निरर्थक उच्चार
ऐसे जिनका कोई अर्थ (मतलब) न हो। जैसे- ठ, टि, ढे आदि।
सार्थक उच्चार
ऐसे उच्चार जिनका कोई अर्थ हो सार्थक उच्चार कहे जाते हैं। जैसे- आ, थी, छू, ले, बो, सौ आदि।
वर्ण/अक्षर
सभ्यता के विकास के साथ मनुष्य ने लिखना सीखा। हर ध्वनि के उच्चार को विशेष संकेत द्वारा लिखा जाने लगा जिन्हें वर्ण या अक्षर कहते हैं।
शब्द
एक या अधिक उच्चारों, वर्णों या अक्षरों का सार्थक समूह शब्द कहलाता है।
तुक
समान उच्चार व लय के शब्दों को तुक कहते हैं। जैसे- तन-मन-धन, आम-दाम-नाम-राम, ईख-चीख, उधार-सुधार, ऊन-खून, एड़ी-बेड़ी, कैसा-जैसा-तैसा, होना-सोना, और-कौर-सौर-बौर, अंत-कंत-संत आदि।
तुकांत
पंक्ति के अंत में प्रयोग की गई तुक को तुकांत कहते हैं।
उदाहरण-
जप शिव जी का नाम
मुक्ति मिले बिन दाम
यहाँ नाम व दाम तुकांत है।
क्रमश:
०००
कार्यशाला
दोहा+रोला=कुंडलिया
०
लक्ष्य साध आकाश पर, मन में उच्च विचार।
कर्म मार्ग पर चल मनुज, नीचे नयन निहार।। -अशोक व्यग्र
नीचे नयन निहार, न ठोकर लगे पाँव में।
रूप धूप का देख, बैठकर मौन छाँव में।।
कभी न मिटता सत्य, है मात्र धर्म ही रक्ष्य।
नयन न पथ को भूल, रहे याद बस लक्ष्य।।
२८.२.२०२६
०००
इटेलियन सॉनेट
चाँद
# वार्णिक छन्द कला
# पदभार ४
# मापनी- गुरु लघु लघु गुरु
*
चाँद उगा,
सूर्य ढला,
स्वप्न पला,
दे न दगा।
मौन जगा,
श्याम मिला,
पुष्प खिला,
प्रेम पगा।
कृष्ण! हमें,
यूँ न छलो,
साथ रहो।
गोकुल में
रास, चलो
बाँह गहो।
१.३.२०२४
***
सॉनेट इंग्लिश शैली
भस्मासुर
*
भस्मासुर हर युग में होता।
अहंकार-मद-मोह ग्रस्त हो।
बीज नाश के निशि-दिन बोता।
करे और को; आप त्रस्त हो।
उन्नति देख न सके अन्य की।
चाहे सब को कर दे काना।
खुद अंधा चुन राह दैन्य की।
विष्ठा खाता काग सयाना।।
खुद अपने मुँह कालिख पोते।
देख आइना लज्जित होता।
दाग न मिटता चेहरा धोते।।
मान-प्रतिष्ठा पल में खोता।।
जाल सिंह का मूस काटता।
चींटी से गजराज हारता।।
१-३-२०२२
***
लघुकथा :
सवाल
शेरसिंह ने दुनिया का सर्वाधिक प्रभावी नेता तथा सबसे अधिक सुरक्षित जंगल बनाने का दावा कर चुनाव जीत लिया। जिन जगहों से उसका दल हारा। वहीं भीषण दंगा हो गया। अनेक छोटे-छोटे पशु-पक्षी मारे गए। बाद में हाथी ने बल प्रयोग कर शांति स्थापित की। बगुला भगत टी वी पर परिचर्चा में शासन - प्रशासन का गुणगान करने लगा तो पत्रकार उलूक ने पूछा 'दुनिया का सर्वाधिक असरदार सरदार दंगों के समय सामने क्यों नहीं आया? सबसे अधिक चुस्त-दुरुस्त पुलिस के ख़ुफ़िया तंत्र को हजारों दंगाइयों, सैकड़ों हथियारों तथा दंगे की योजना बनाने की खबर क्यों नहीं मिली? बिना प्रभावी योजना, पर्याप्त अस्त्र-शस्त्र और तैयारी के भेजे गए पुलिस जवानों और अफसरों को हुई क्षति की जिम्मेदारी किसकी है?
अगले दिन सत्ता के टुकड़ों पर पल रहे सियारों ने उस चैनल तथा संबंधित अख़बार के कार्यालयों पर पथराव किया, उनके विज्ञापन बंद कर दिये गए पर जंगल की हवा में अब भी तैर रहे थे सवाल।
१.३.२०२०
***
फागुन
[ चित्र अलंकार: झंडा ]
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ठंड के आलस्य को अलविदा कह
बसंती उल्लास को ले साथ, मिल-
बढ़ चलें हम ज़िदगी के रास्ते पर
आम के बौरों से जग में फूल-फल.
रुक
नहीं
जाएँ,
हमें
मग
देख
कर,
पग
बढ़ाना है.
जूझ बाधा से
अनवरत अकेले
धैर्य यारों आजमाना है.
प्रेयसी मंजिल नहीं मायूस हो,
कहीं भी हो, खोज उसको आज पाना है.
===
एक दोहा
श्याम-राम के गाल पर, सीता मलें गुलाल।
दुखी हो रहीं राधिका, मिले न श्याम मलाल।।
०००
छंदों की होली
*
चले आओ गले मिल लो, पुलक इस साल होली में
भुला शिकवे-शिकायत, लाल कर दें गाल होली में
बहाकर छंद की सलिला, भिगा दें स्नेह से तुमको
खिला लें मन कमल अपने, हुलस इस साल होली में
0
नहीं माया की गल पाई है अबकी दाल होली में
नहीं अखिलेश-राहुल का सजा है भाल होली में
अमित पा जन-समर्थन, ले कमल खिल रहे हैं मोदी
लिखो कविता बने जो प्रेम की टकसाल होली में
0
ईंट पर ईंट हो सहयोग की इस बार होली में
लगा सरिए सुदृढ़ कुछ स्नेह के मिल यार होली में
मिला सीमेंट सद्भावों की, बिजली प्रीत की देना
रचे निर्माण हर सुख का नया संसार होली में
0
न छीनो चैन मन का ऐ मेरी सरकार होली में
न रूठो यार लगने दो कवित-दरबार होली मे
मिलाकर नैन सारी रैन मन बेचैन फागुन में
गले मिल, बाॅंह में भरकर करो सत्कार होली में
0
करो जब कल्पना कवि जी रॅंगीली ध्यान यह रखना
पियो ठंडाई, खा गुझिया नशीली होश मत तजना
सखी, साली, सहेली या कि कवयित्री सुना कविता
बुलाती लाख हो, सॅंग सजनि के साजन सदा सजना
0
हुरियारों पे शारद मात सदय हों, जाग्रत सदा विवेक रहे
हैं चित्र जो गुप्त रहे मन में, साकार हों कवि की टेक रहे
हर भाल पे, गाल पे लाल गुलाल हो शोभित अंग अनंग बसे
मुॅंह काला हो नापाकों का, जो राहें खुशी की छेंक रहे
0
नैन पिचकारी तान-तान बान मार रही, देख पिचकारी मोहे बरजो न राधिका
आस-प्यास रास की न फागुन में पूरी हो तो मुॅंह ही न फेर ले साॅंसों की साधिका
गोरी-गोरी देह लाल-लाल हो गुलाल सी, बाॅंवरे से साॅंवरे की कामना भी बाॅंवरी
बैन से मना करे, सैन से न ना कहे, नायक के आस-पास घूम-घूम नायिका
0
लाल-पीले गाल, नीली नाक, माथा कच हरा, श्याम ठोड़ी, श्वेत केशों की छटा है मोहती
दंत हैं या दामिनी है, कौन कहें देख हँसी, फागुनी है सावनी भी, छवि-छटा सोहती
कहे दोहा पढ़े हरिगीतिका बौरा रही है, बाल शशि देख शशिमुखी,मुस्कुरा रही
झट बौरा बढ़े गौरा को लगाने रंग जब, चला पिचकारी गोरी रंग बरसा गई
१.३.२०१८
***
नवगीत:
तुम रूठीं
*
तुम रूठीं तो
मन-मंदिर में
घंटी नहीं बजी।
रहीं वन्दना,
भजन, प्रार्थना
सारी बिना सुनी।
*
घर-आँगन में
ऊषा-किरणें
बिन नाचे उतरीं।
ना चहके-
फुदके गौरैया
क्या खुद से झगड़ी?
गौ न रँभायी
श्वान न भौंका
बिजली गोल हुई।
कविताओं की
गति-यति-लय भी
अनजाने बिगड़ी।
सुड़की चाय
न लेकिन तन ने
सुस्ती तनिक तजी।
तुम रूठीं तो
मन-मंदिर में
घंटी नहीं बजी।
*
दफ्तर में
अफसर से नाहक
ठानी ठनाठनी ।
बहक चके-
यां के वां घूमे
गाड़ी फिसल भिड़ी.
राह काट गई
करिया बिल्ली
तनिक न रुकी मुई।
जेब कटी तो
अर्थव्यवस्था
लडखडाई तगड़ी।
बहुत हुआ
अनबोला अब तो
लो पुकार ओ जी!
तुम रूठीं तो
मन-मंदिर में
घंटी नहीं बजी।
*
१-३-२०१६
***
नवगीत
लौट घर आओ
*
लौट घर आओ.
मिल स्वजन से
सुख सहित पुनि
लौट घर आओ.
*
सुता को लख
बिलासा उमगी बहुत होगी
रतनपुर में
आशिषें माँ से मिली होंगी
शंख-ध्वनि सँग
आरती, घंटी बजी होगी
विद्यानगर में ख़ुशी की
महफ़िल सजी होगी
लौट घर आओ.
*
हवाओं में फिजाओं में
बस उदासी है.
पायलों के नूपुरों की
गूँज खासी है
कंगनों की खनक सुनने
आस प्यासी है
नर्मदा में बैठ आतीं
सुन हुलासी है
लौट घर आओ.
*
गुनगुनाहट धूप में मिल
खूब निखरेगी
चहचहाहट पंछियों की
मंत्र पढ़ देगी
लैम्ब्रेटा महाकौशल
पहुँच सिहरेगी
तुहिन-मन्वन्तर मिले तो
श्वास हँस देगी
लौट घर आओ.
*
२९-२-२०१६
***
नवगीत:
.
ठेठ जमीनी जिंदगी
बिता रहा हूँ
ठाठ से
.
जो मन भाये
वह लिखता हूँ.
नहीं और सा
मैं दीखता हूँ.
अपनी राहें
आप बनाता.
नहीं खरीदा,
ना बिकता हूँ.
नहीं भागता
ना छिपता हूँ.
डूबा तो फिर-
फिर उगता हूँ.
चारण तो मैं हूँ नहीं,
दूर रहा हूँ
भाट से.
.
कलकल बहता
निर्मल रहता.
हर मौसम की
यादें तहता.
पत्थर का भी
वक्ष चीरता-
सुख-दुःख सम जी,
नित सच कहता.
जीने खातिर
हँस मरता हूँ.
अश्रु पोंछकर
मैं तरता हूँ.
खेत गोड़ता झूमता
दूर रहा हूँ
खाट से.
नहीं भागता
ना छिपता हूँ.
डूबा तो फिर-
फिर उगता हूँ.
चारण तो मैं हूँ नहीं,
दूर रहा हूँ
भाट से.
.
रासो गाथा
आल्हा राई
पंथी कजरी
रहस बधाई.
फाग बटोही
बारामासी
ख्याल दादरा
गरी गाई.
बनरी सोहर
ब्याह सगाई.
सैर भगत जस
लोरी भाई.
गीति काव्य मैं, बाँध मुझे
मत मानक की
लाट से.
नहीं भागता
ना छिपता हूँ.
डूबा तो फिर-
फिर उगता हूँ.
चारण तो मैं हूँ नहीं,
दूर रहा हूँ
भाट से.
***
मुक्तक
नयन मूँद मेरी छवि देखो, किन्तु न मुझसे बात करो
मुझको छोड़ो अपने दिल पर, ऐसे मत आघात करो
दिल की मानो भरो बाँह में या बाँहों में आ जाओ
नेह-प्रेम की जय-जय बोलो, नयन मिलाकर मात करो
१.३.२०१५
***
छंद सलिला
गंग छंद
*
लक्षण: जाति आंक, पद २, चरण ४, प्रति चरण मात्रा ९, चरणान्त गुरु गुरु
लक्षण छंद:
नयना मिलाओ, हो पूर्ण जाओ,
दो-चार-नौ की धारा बहाओ
लघु लघु मिलाओ, गुरु-गुरु बनाओ
आलस भुलाओ, गंगा नहाओ
उदाहरण:
१. हे गंग माता! भव-मुक्ति दाता
हर दुःख हमारे, जीवन सँवारो
संसार की दो खुशियाँ हजारों
उतर आस्मां से आओ सितारों
ज़न्नत ज़मीं पे नभ से उतारो
हे कष्टत्राता!, हे गंग माता!!
२. दिन-रात जागो, सीमा बचाओ
अरि घात में है, मिलकर भगाओ
तोपें चलाओ, बम भी गिराओ
सेना अकेली न हो सँग आओ
३. बचपन हमेशा चाहे कहानी
हँसकर सुनाये अपनी जुबानी
सपना सजायें, अपना बनायें
हो ज़िंदगानी कैसे सुहानी?
(अब तक प्रस्तुत छंद: अखण्ड, अग्र, अचल, अचल धृति, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रवज्रा, उपेन्द्रवज्रा, उल्लाला, एकावली, ककुभ, कीर्ति, गंग, घनाक्षरी, चौबोला, चंडिका, छवि, जाया, तांडव, तोमर, दीप, दोधक, नित, निधि, प्रदोष, प्रेमा, बाला, मधुभार, मनहरण घनाक्षरी, माया, माला, ऋद्धि, रामा, लीला, वाणी, शक्तिपूजा, शशिवदना, शाला, शिव, शुभगति, सार, सिद्धि, सुगति, सुजान, हंसी)
१-३-२०१४
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छंदशास्त्र में लघु-गुरु
*
गुरु नानककबीर दास जी ने कहा-
"लघुता ते प्रभुता मिलै, प्रभुता ते प्रभु दूरि।
चींटी शक्कर लै चली, हाथी के सिर धूरि।"
छंद शास्त्र कि दृष्टि से 'लघुता से गुरुता मिले' लघुतम और विराटतम केवल एक परब्रह्म ही है। लघु उच्चारण से गुरु उच्चारण मिलता है। लघु 'एक' है जो गुरु दो (गुरु-शिष्य) की रचना करता है। भाषा के बाद लिपि का विकास होने पर भारतीय भाषाओं विशेषकर हिन्दी में उच्चार को वर्ण या अक्षर मान लिया गया। गुरु उच्चार लागू वर्ण में मात्रा लगाकर लिखा और पढ़ा जाता है।
मात्रा का संबंध माप या परिमाण से है। भाषा की लघुतम इकाई वर्ण है जिसकी मात्रा और परिमाण का ज्ञान उसके उच्चारण में लगने वाले समय से ही सकता है। अत: मात्रा को परिभाषित करते हुए हम कह सकते हैं-
“ वर्णों के उच्चारण में लगने वाले समय को मात्रा कहते हैं।“
(यह स्मरण अवश्य रहे कि उच्चारण का गुण केवल स्वर वर्णों में ही है, व्यंजन स्वत: उच्चरित नहीं हो सकते उनके उच्चारण के लिए स्वरों की सहायता लेनी पड़ती है। अत:, मात्रा गणना स्वरों के आधार पर ही की जाती है।)
लघु गुरु परिचय :-
जिस साहित्य की रचना मात्रा, वर्ण, यति, गति, लय आदि को ध्यान में रख कर की जाती है वह छंदोबद्ध होती है और उसे पद्य कहते हैं। छंद विचार करते समय केवल स्वरों पर ही ध्यान दिया जाता है ,क्योंकि स्वर ही ‘वर्ण’ और मात्रा का मुख्य आधार है। स्वरों के दो भेद हैं – १.ह्रस्व स्वर २. दीर्घ स्वर। छंद शास्त्र में इन्हें ही लघु और दीर्घ की संज्ञा दी गई है। वास्तव में सम्पूर्ण छंदशास्त्र का मूलाधार ये ही लघु और गुरु है। लघु की एक मात्रा और गुरु की दो मात्राएँ होती है। लघु का चिह्न '।' और गुरु का चिह्न 's' होता है।
लघु :-
१. ह्रस्व स्वर ( चाहे उनका उच्चारण निरनुनासिक हो चाहे सानुनासिक) यथा अ, इ, उ, ऋ, अँ, इँ, उँ, ऋँ, लघु होते है।
२. इनकी सहायता से जो व्यंजन बोले जाते हैं वे भी लघु होते है। जैसे 'सलिल' शब्द में तीनों व्यंजन ‘अ’ की सहायता ( स् + अ = स, ल + इ = लि, ल् + अ = ल ) से बोले जा रहे हैं। अत:, 'सलिल' शब्द में तीन लघु वर्णऔर कुल तीन मात्राएँ है।
३. किसी एक ह्रस्व स्वर के साथ यदि दो या दो से अधिक व्यंजन जुड़े हों तो भी उसे लघु ही माना जाएगा जैसे – स्वर यहाँ स्व = स् + व् + अ ( ‘स्’ और ‘व्’ के साथ एक ही स्वर ‘अ’ है इस लिए स्व लघु माना जाएगा। आप स्मरण रखने के लिए इस प्रकार भी कह सकते है कि यदि ह्रस्व स्वर से युक्त व्यंजन से पूर्व कोई अन्य स्वर रहित व्यंजन भी आए तो वह लघु ही रहेगा। इसका उच्चार काल ह्रस्व स्वर के समान ही है।
४. स्वर की लघुता अथवा गुरुता का प्रमुख आधार उसके उच्चारण में लगनेवाला समय है। यदि किसी छंद में दीर्घ स्वर के उच्चारण में लगनेवाला समय ह्रस्व की तरह लघु हो तो उसे लघु ही माना जाता है। जैसे – 'कबीरा खड़ा बाजार में' में 'बी' तथा 'बा' का उच्चारण क्रमश: ‘बि’ तथा 'ब' है इसलिए ‘इन्हें लघु माना जाएगा 'कबिरा खड़ा बजार में' १३ मात्राएँ।
गुरु :
१. दीर्घ स्वर और चाहे उनका उच्चारण निरनुनासिक हो या सानुनासिक गुरु होते है। यथा – आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ औ, आँ, ईँ, ऊँ, एँ, ऐँ, ओँ,औँ गुरु होते हैं।
२. अनुस्वार युक्त वर्ण गुरु माने जाते है। जैसे ‘संत’ का ‘सं’, ‘कंस’ का ‘कं’
३. विसर्ग युक्त वर्णों की गणना भी गुरु में की जाती है। जैसे ‘अत: ‘ में ‘त:
४. शब्द में स्वर रहित व्यंजन से पूर्व का वर्ण गुरु माना जाता है। जैसे संबंध में ‘स’ और ‘ब’, हंस में 'ह' ।
५. यदि स्वर रहित व्यंजन का का उच्चारण-बल बाद के वर्ण पर पड़ता हो तो वह गुरु माना जाता है और पहले वाला यदि ह्रस्व है तो ह्रस्व ही रहता है। जैसे 'युक्त' में 'क्' को 'त' के साथ बोला जा रहा है तो ‘यु’ ह्रस्व ही रहेगा।
६. यदि किसी लघु वर्ण का उच्चारण गुरु वर्ण की तरह होता है तो वह गुरु माना जाता है।
उपर्युक्त विधि से हम लघु और गुरु लगा कर किसी कविता के चरण में मात्रा और वर्णों की गणना कर सकते हैं।
***
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