मंगलवार, 9 जुलाई 2019

दोहा सलिला

दोहा:
तुलसी सदा समीप हो, नागफनी हो दूर 
इससे मंगल कष्ट दे, वह सबको भरपूर 
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दोहा सलिला:

गुरु न किसी को मानिये, अगर नहीं स्वीकार 
आधे मन से गुरु बना, पछताएँ मत यार 
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गुरु पर श्रद्धा-भक्ति बिन, नहीं मिलेगा ज्ञान
निष्ठा रखे अखंड जो, वही शिष्य मतिमान
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गुरु अभिभावक, प्रिय सखा, गुरु माता-संतान
गुरु शिष्यों का गर्व हर, रखे आत्म-सम्मान
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गुरु में उसको देख ले, जिसको चाहे शिष्य
गुरु में वह भी बस रहा, जिसको पूजे नित्य
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गुरु से छल मत कीजिए, बिन गुरु कब उद्धार?
गुरु नौका पतवार भी, गुरु नाविक मझधार
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गुरु को पल में सौंप दे, शंका भ्रम अभिमान
गुरु से तब ही पा सके, रक्षण स्नेह वितान
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गुरु गुरुत्व का पुंज हो, गुरु गुरुता पर्याय
गुरु-आशीषें तो खुले, ईश-कृपा-अध्याय
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प्रभा लाल लख उषा की, अनिल रहा है झूम
भोर सुहानी हो गई, क्यों बतलाये कौन?

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श्वास सुनीता हो सदा, आस रहे शालीन
प्यास पुनीता हो अगर, त्रास न कर दे दीन

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वही पूर्णिमा निरूपमा, जो दे जग उजियार
चंदा तारे नभ धरा,  उस पर हों बलिहार

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जो दे सबको प्रेरणा, उसका जीवन धन्य
गुप्त रहे या हो प्रगट, है अवदान अनन्य 

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खिल बसन्त में मंजरी, देती है पैगाम
देख आम में खास तू, भला करेंगे राम

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देख अरुण शर्मा हुई, उषा  शर्म से लाल
आसमान के गाल पर, जैसे लगा गुलाल

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चन्द्र कांता खोजता, कांति सूर्य के साथ
अग्नि होत्री सितारे, करते दो दो हाथ

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श्री वास्तव में साथ ले, तम हरता आलोक
पैर जमाकर धरा पर, नभ हाथों पर रोक

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आ दिनेश संग चंद्र जब, छू लेता आकाश
धूप चाँदनी हों भ्रमित, किसको बाँधे पाश

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नहीं रमा का, दिलों पर, है रमेश का राज
दौड़े तेवरी कार पर,  पहने ताली ताज 

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९-७-२०१७

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