गुरुवार, 11 जुलाई 2019

लेख शंभुनाथ सिंह -बुद्धिनाथ मिश्र

स्मृति आलेख -
हिंदी नवगीत प्रवर्तक डॉ. शम्भुनाथ सिंह
डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र
*
हिन्दी नवगीत परंपरा के शीर्ष प्रवर्तक होने के कारण आधुनिक भरत मुनि की प्रतिष्ठा पानेवाले प्रगतिशील कवि डॉ. शम्भुनाथ सिंह का यह शताब्दी वर्ष है | उनके साहित्यिक महत्त्व को सम्मान देते हुए केन्द्रीय साहित्य अकादमी ने 8 जुलाई को उनकी कर्मभूमि वाराणसी में राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की है,जिसमें देश के अनेक जाने-माने साहित्यकार भाग लेंगे | इसके अलावा देश के विभिन्न नगरों और संस्थानों में शम्भुनाथ शती समारोह मनाने की तैयारी चल रही है | वे ऐसे जुझारू रचनाकार थे,जिन्होने जीवन भर विपरीत परिस्थितियों से लोहा लिया और अपने दम पर हारी हुई बाजी को हमेशा जीत में बदलकर दिखाया। वे परवर्ती पीढ़ियों के संरक्षक भी थे और सहभागी भी। वे एक साथ सृजन की कई दिशाओं पर राज करते थे। वे कवि थे, कहानीकार थे, समीक्षक थे, नाटककार थे, प्राध्यापक थे, पुरातत्वविद थे और आगे बढ़कर, हर किसी की मदद करनेवाले नेक इन्सान थे। इसलिए, आज पूरा हिन्दी जगत उस महान कृती पुरुष के सम्मान में खड़ा है | 
शम्भुनाथ जी ने न केवल नवगीत के स्वरूप और सीमान्त का निर्धारण किया, बल्कि अपने `नवगीत दशकों’ के माध्यम से उन्होंने समकालीन हिंदी कविता में नवगीत को `डीही’ का स्थान दिलाने की पुरजोर कोशिश की,जिससे आज नवगीत विधा विभिन्न विश्वविद्यालयों में शिक्षण और शोध के विषय के रूप में प्रतिष्ठित है | काशी में शिक्षा-दीक्षा प्राप्त कर, उन्होंने जिस समय काव्ययात्रा शुरू की, उस समय काशी साहित्य-सृजन के क्षेत्र में चरमोत्कर्ष पर थी | उसका लाभ डॉक्टर साहब को भी मिला और वे `कुछ कर गुजरने के लिए’ निरंतर सृजनशील रहे |

प्रथम संग्रह `रूपरश्मि’ से `समय की शिला’ के प्रकाशन तक डॉक्टर साहब सही अर्थों में राहों के अन्वेषी थे | इसी मोड़ पर (1969) मैं उनसे मिला था | तबतक उन्होंने नवगीत विधा को शैक्षणिक जगत की उपेक्षा और अवहेलना से उबारने के लिए कमर कस ली थी | उसके बाद उनके जो संग्रह आये, चाहे वह `जहां दर्द नीला है’ हो या `माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः’ या `वक्त के मीनार पर’,सबमें उन्होंने अपनी अपार सृजन-क्षमता से नवगीत के नए प्रतिमान स्थापित किये |
उनके एक गीत ने हिन्दी काव्यमंचों पर वैश्विक प्रसिद्धि पाई :
समय की शिला पर मधुर चित्र कितने
किसीने बनाये, किसीने मिटाये।
एक और गीत था, जो लोकगीतों की प्रश्नोत्तर शैली में लिखा गया था और जिसे वे उन काव्यमंचों पर जरूर सुनाते थे, जो ग्रामीण शिक्षालयों में होते थे:
टेर रही प्रिया, तुम कहाँ? किसकी यह छाँह और किसके ये गीत रे/ बरगद की छाँह और चैता के गीत रे। सिहर रहा जिया, तुम कहाँ?
लेकिन उनके जिस नवगीत ने एक नया वैज्ञानिक गवाक्ष खोला ,वह था ‘दिग्विजय’:
बादल को बाँहों में भर लो/ एक और अनहोनी कर लो। अंगों में बिजलियाँ लपेटो/ चरणों में दूरियाँ समेटो/ नभ को पदचापों से भर दो/ ओ दिग्विजयी मनु के बेटो! इन्द्रधनुष कंधों पर धर लो /एक और अनहोनी कर लो।
इसी प्रकार का उनका एक और गीत ‘अन्तर्यात्रा’ शीर्षक से है:
टूट गये बन्धन सब टूट गये घेरे/ और कहाँ तक ले जाओगे मन मेरे! छूट गयीं नीचे धरती की दीवारें/आँगन के फूल बने,चाँद और तारे/घुल-मिलकर एक हुए रोशनी-अँधेरे/और कहाँ तक ले जाओगे मन मेरे!
शम्भुनाथ जी मूलतः देवरिया के ग्रामीण परिवार के थे। देवरिया जनपद के रावतपार गाँव में संवत्‌(सन्‌1916) की ज्येष्ठ शुक्ला एकादशी यानी 17 जून को उनका जन्म हुआ था। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से हिन्दी में एम.ए. और पीएच.डी. करने के बाद उन्होने कुछ दिनो तक पत्रकारिता भी की थी, मगर जल्द ही वे अपने रचना-कर्म के लिए अनुकूल अध्यापन-कार्य से जुड़ गये और काशी विद्यापीठ में व्याख्याता(1948-59),वाराणसेय संस्कृत विश्वविद्यालय में हिन्दी विभागाध्यक्ष (1959-70), फिर काशी विद्यापीठ में हिन्दी विभागाध्यक्ष (1970-76) रहने के बाद पाँच वर्षों तक(1975- 80) विद्यापीठ के तुलसी संस्थान के निदेशक रहे। सन्‌से वे विधिवत्‌लिखने लगे थे। 1941 में उनका पहला गीत संग्रह ‘रूप रश्मि’ प्रकाशित हुआ था और दूसरा संग्रह ‘छायालोक’ 1945 में। ये दोनो उनके पारम्परिक गीतों के संग्रह थे। इसके बाद वे नयी कविता के आकर्षण में आये,जिसकी उपज है ‘उदयाचल’(1946) मन्वन्तर (1948),माध्यम मैं और खण्डित सेतु|

`खण्डित सेतु’ मात्र एक टूटा हुआ पुल नहीं था, बल्कि नयी कविता के पक्षधर समीक्षकों की गोलैसी के कारण मुक्तछन्द कविता में अपनी पहचान न बना पाने के कारण शम्भुनाथ जी का खण्डित विश्वास भी था,जिसने उन्हें फिर से गीतों की ओर मुड़ने को बाध्य किया। उसके बाद उनके दो नवगीत संग्रह ‘समय की शिला पर’(1968) और ‘जहाँ दर्द नीला है’(1977)प्रकाशित हुए,जिनमें उनके नये तेवर के गीत संकलित हैं| परवर्ती काल में उनके दो और संग्रह आये-‘वक्त की मीनार पर'(1986) और `माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः'(1991) जो हिन्दी नवगीत के प्रतिमान बने। प्रारम्भिक दौर में उनके दो कहानी संग्रह ‘रातरानी’(1946) और ‘विद्रोह’(1948) भी छपे थे,लेकिन कवि के अतिरिक्त जिस सर्जनात्मक विधा ने उन्हें विशेष प्रतिष्ठा , वह थी नाट्य-विधा। उनके नव नाटक ‘धरती और आकाश’(1950) और ‘अकेला शहर’ (1975) को हिन्दी के प्रतिनिधि नाटकों में रखा जा सकता है। काशी की प्रतिष्ठित नाट्य संस्था ‘श्रीनाट्यम’ ने जब ‘अकेला शहर’ को नगर में मंचित किया,तो उसमें एक छोटी-सी भूमिका मेरी भी थी।यदि इन नाटकों की चर्चा हिंदी कक्षाओं में नहीं होती है, तो इसे हिंदी अध्यापकों का जन्मान्धत्व ही माना जाए |
मूलतः हिन्दी का छात्र न होने के कारण काशी के अन्य रचनाकारों की तरह शम्भुनाथ जी से भी मेरा कोई परिचय नहीं था। सन्‌में अंग्रेजी से एम.ए. करने के बाद मैं कविगोष्ठियों में जाने लगा था और दो-एक कविगोष्ठी से ही मुझे वह पहचान मिल गयी थी,जो अन्य कवियों को वर्षों बाद भी नसीब नहीं होती। ऐसी ही एक मराठियों के गणेशोत्सव वाली गोष्ठी में शम्भुनाथ जी ने मेरा गीत ‘नाच गुजरिया नाच! कि आयी कजरारी बरसात री’ सुनी,तो मुझे बहुत प्यार से रिक्शे पर बैठाकर अपने घर ले गये और रास्ते भर मुझे पारम्परिक गीत और नवगीत में अन्तर बताते हुए नवगीत लिखने के लिए प्रेरित करते रहे।
मैं मिश्र पोखरा मुहाल में रहता था,जो उनके सोनिया स्थित घर के पास ही था; और मेरे पास कोई खास काम भी नहीं था,इसलिए मैं अक्सर उनके घर जाने लगा और उस परिवार में ऐसा शामिल हुआ कि डॉक्टर साहब कभी-कभी व्यंग्य भी कर देते थे कि ‘तुम पूर्व जन्म में जरूर चूहा रहे होगे’। जैसे चूहा रसोई घर के कोना –कोना छान मारता है, वैसे ही मैं भी सीधे रसोई घर तक जाकर गृहस्वामिनी से, जिन्हें मैं ‘सन्तोषी माता’ कहा करता था, कुछ न कुछ खाद्य पदार्थ प्राप्त कर लेता था। उनके तीनो बेटे और दोनो बेटियों से मेरी जो प्रगाढ़ आत्मीयता बन गयी थी, वह आज भी तरोताजा है।
उस परिवार से, मुझसे पूर्व श्रीकृष्ण तिवारी, उमाशंकर तिवारी और मेरे बाद डॉ. सुरेश (व्यथित) भी उसी तरह जुड़े थे। उमाशंकर काशी विद्यापीठ के छात्र थे । छात्र के रूप में ही एक बार उन्होंने उस मंच से एक गीत पढा, जो फिल्मी धुन पर था। डॉक्टर साहब ने उसे रोक दिया। छात्रों ने हंगामा कर दिया,लेकिन वे टस से मस नहीं हुए। काव्यमंच पर वे किसी प्रकार की अनुशासनहीनता या गन्दगी बर्दाश्त नहीं कर पाते थे। काश! यही दृढ़ता यदि उस समय के अन्य अग्रणी गीतकारों ने दिखायी होती, तो कविसम्मेलनों की आज इतनी दुर्दशा नहीं होती। उस समय उमाशंकरजी को उन्होने डाँट दिया,मगर बाद में उन्हें अपने घर बुलाकर गीत लिखने की कला सिखाते रहे, जिसके कारण उमाशंकर नवगीत के सशक्त हस्ताक्षर बन गये। इसी प्रकार ,श्रीकृष्ण तिवारी को भी उन्होने हाथ पकड़कर नवगीत लिखना सिखाया। मैं गंडा बँधवाकर उनका शिष्य तो नहीं बन सका, लेकिन उनकी दिवालोक में अपना पथ निर्माण करने में मुझे भरपूर सम्बल मिला था।
उन्होंने मूर्तिकला की कोई शिक्षा नहीं पाई थी,मगर काशी में राय कृष्णदास के बाद मूर्तिकला के वही विशेषज्ञ थे | उन्होंने मिर्जापुर के वनांचलों से अनेक दुर्लभ मूर्तियों का उद्धारकर पहले अपने घर पर,बाद में काशी विद्यापीठ में उन्हें संग्रहालय का अंग बनाया |
धारा के विरुद्ध चलकर,नवगीत विधा को प्रतिष्ठित करने में उन्होने जीवन के अन्तिम चरण में जो अहर्निश संघर्ष किया, वह स्वतन्त्रता सेनानी बाबू कुँवर सिंह के बलिदान की याद दिलाता है। 1980 के दशक में उन्होने अज्ञेय-सम्पादित ‘सप्तकों’ के जवाब में न केवल तीन खण्डों में ‘नवगीत दशक’ (पराग प्रकाशन,दिल्ली) निकाले, बल्कि हर खण्ड में लम्बी भूमिका लिखकर नवगीत की परती जमीन को नयी फसल के लिए तैयार किया। इतना ही नहीं, इन ‘दशकों’ के प्रचार-प्रसार के लिए नगर-नगर में उन्होने, अपने सम्बन्धों का उपयोग करते हुए, ऐतिहासिक आयोजन भी किये, जिनमें दिल्ली में तत्कालीन प्रधान मंत्री श्रीमती इन्दिरा गांधी के आवास पर हुई काव्यगोष्ठी चिरस्मरणीय है। 3 सितम्बर 1991 को उनके निधन से नवगीत की वह विजय-यात्रा एक प्रकार से थम-सी गयी,क्योंकि उनके बाद रथ पर चढ़नेवाले तो बहुत थे, मगर रथ में जुतनेवाला कोई नहीं। तथापि, उन्होंने जो नवगीत की अमराई लगायी है,वह अच्छी तरह फल-फूल रही है और हर साल नयी कलमें पुराने बीजू वृक्षों का स्थान ले रही हैं |
आज शताब्दी वर्ष में उनकी ही गीत-पंक्तियों से उन्हें नमन करता हूँ:
मैं वह पतझर,जिसके ऊपर से/धूल भरी आँधियाँ गुजर गयी/दिन का खँडहर जिसके माथे पर/अँधियारी साँझ-सी ठहर गयी/जीवन का साथ छुटा जा रहा/ पुरवैया धीरे बहो। मन का आकाश उड़ा जा रहा/ पुरवैया धीरे बहो।
डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र

देवधा हाउस,गली-5, वसन्त विहार एन्क्लेव, देहरादून-248006
मो.-9412992244 buddhinathji@yahoo.co.in

साभार सृजनगाथा


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