रविवार, 7 जुलाई 2019

अखिलेश खरे

अखिलेश खरे 'अखिल'
















आत्मज: स्व.श्री आनंदीलाल खरे। 

जन्म: ​३०.६.१९७१, कछारगाँव बड़ा, कटनी ४८३३३४। 
शिक्षा: परास्नातक। 

​​संप्रति: मुख्य सलाहकार जीवन बीमा निगम।
​लेखन विधा: दोहा, बालगीत, सजलकुण्डलिया। 

संपर्क:  अखिलेश खरे 'अखिल', कछारगाँव(बड़ा), द्वारा मझगवां सरौली, तहसील ढीमरखेड़ा, जिला कटनी ४८३३३४। चलभाष: ९७५२८६३३६९। ईमेल: sumitkhare2003@gmail.com 

*
ॐ 
दोहा शतक 
*
गोरी बैठी भोर में, ओढ़ पूष की धूप
मौसम कुछ बेशर्म सा, ताके सुघर स्वरूप
*
भोर भाल पर अधर जब, धरे पूष की धूप।
दरिया का मन कुनकुना, मौसम देख अनूप।।
*

पत्थर धोबी घाट का, दिखलाता औकात।                                                          

मेरे पीछे ही सदा, करता दो-दो बात।।
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धूप करोंटा ले गई, सुन जाड़े की बात।                                                        
दिवस ठिठुरता रह गया, बनी बिछौना रात।।
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नदिया विधवा हो गई, वन मुँडवाए बाल।                                                          
प्यास बैठकर दल रही, हर पनघट पर दाल।।
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चूल्हा,चकिया, ओखली, छानी मकां दुकान।                                              
कस्बा-बस्ती के इन्हें, दादा-दादी जान।।
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झाड़-फूँक की जड़ें हैं, जनगण में मजबूत।
दवा बाद में ले रहे, पहले चली भभूत।।
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नपना बदले आदमी, देश-काल अनुसार।
पतला-मोटा देखकर, बदले नाप सुनार।।
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आँख दिखाती जेठ में, ननद सास सी लाल।
उसी धूप के पूष में, झरे पूँछ के बाल।।
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बूँद- बूँद जल मिल चला, पाषाणों की ओर।
राह रोक पाए नहीं, गिरि-जंगल घनघोर।।
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राहों के कंकर चुभें, परखें मन की धीर।
सागर सा व्यवधान भी, चीर गए रघुबीर।।
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मंजिल सीता माँ सरिस, सुरसा सी मग पीर।
पवनपुत्र सा हौसला, भरे सफलता नीर।।
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घर की फ़ूट समझ 'अखिल', ज्यों हांडी में छेद।
खोल बिभीषण ने दिया, लंकापति का भेद।।
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पालागी-जय राम जी, हुई नदारत आज।
मोबाइल के जाल में, उलझा सकल समाज।।
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कर्जा ले घी पी गये, रहन हुए घर-द्वार।
बैठी विपदा आँगने, फैलाए बाजार।।
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श्याम सलौनी निशा के, केश सितारे टाँक।
पहन नदी की पायलें, रही भोर भू झाँक।।
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धूप-दुशाला ओढ़ कर, भोर ढाँकती अंग।
मौसम प्यासा प्यार का, रंग रँगीले ढंग।।
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पीत चुनरिया ओढ़कर, लजती सरसों मौन।                                                        
टेसू पागल प्यार में, किसके बोले कौन?।
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खेतों से डोली चली ,खलिहानों में शोर।
पिता गेह से ज्यों बिदा, पिया गेह की ओर।।
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बर्षा का सुन आगमन, खुशियों की बौछार।                                                        ​
ज्यों रूठी प्रियतमा जा, मैके से ससुरार।       
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देख सजीला नभ विहँस, दिशा सुनाती गीत।                                                      
हरा घाघरा ले धरा, साध रही संगीत।।
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पैसे से है बंदगी, पैसे से पहचान।
बिन पैसे के स्वजन भी, बन जाता अनजान।।
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वर्षा लगी निकालने, छानी की सब खोट।
ज्यों विपक्ष पर कर रहे, सत्ताधारी चोट।।
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जंगल के सिर पर उगे, पावस पाकर बाल।
सत्ताधारी दल 'अखिल', ज्यों हो मालामाल।।
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पावस आने का नदी, बाँधे मन-विश्वास।
अस्पताल ज्यों देखकर, बढ़ जाती है आस।।
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दस में बिकती थी कभी, दो रूपये में आज।
अरे टमाटर साठ के, हो मत जाना प्याज।।
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ब्याह रचाने आ गई,पावस मेरे गाँव।                                                           
दादुर मंत्र उचारते, बैठ सुहानी ठाँव।।
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व्योम,बिजुरिया,बाजने, पायल सी छनकार।
पवन बाँसुरी पावसी, मौसम है फनकार।।
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शहर सहर सा सुघर है, उससे सुंदर गाँव।
सुदिन बाँचता भोर से, कागा कर-कर काँव।।
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भोर खड़ी मज्जन किये,आज नदी के तीर।
बूँद बूँद नहला गई,धरनी मले शरीर।।
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धवल धवल सी चाँदनी, धवल काँस के फूल।
पावस माया जाल ज्यों, गया कबीरा भूल।।
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भरी तिजोरी खेत की, कहिं कुटकी कहुँ धान।
लेखा-जोखा कर रहा, बूढ़ा मेड़ मचान।।
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हिरण चाल नदिया चली, सर, मन उठी हिलोर।
पावस पायल पहन पग, नाचे अँगने खोर।।
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बिद्यालय खुलने लगे,मौसम की मनुहार।
फीस,किताबें,कापियाँ, गर्म हुआ बाजार।।
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छानीवाले हैं कहाँ, अब कोई स्कूल।
बदल गए है आजकल, 'अखिल' पुराने रूल।।
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दुल्हिन सी खेती सजी, हरी ओढ़नी तान।
अकड़ दिखाता मेड़ पर, टूटा हुआ मचान।।
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ताँक-झाँक चंदा करे, छुपे बदरिया ओट।
सजी धरा को देख कर, मन में दिखती खोट।।
*
गाँव, शहर जबसे बना, दुआ सलामी गोल।
गलियों-गलियों पर चढ़े, कंकरीट के खोल।।
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पावस की लगती 'अखिल', सुखदाई  सी भोर।
हरा घाघरा पहन कर, धरा सजी हर पोर।।
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सुखदाई माँ गोद सी, पावस की बौछार।
सज-धज धरनी कर रही, अम्बर की।।
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सारे जग में श्रेष्ठ है, अम्मा तेरा नाम।
तेरे सुखद चरण लगें, मुझको चारों धाम।।
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रामचरित मानस अवध, तू ही सीता-राम।
तू गीता ही गीता द्वारिका, तू ही राधा-श्याम।।
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जबसे सिर से उठ गया, पूज्य पिता का नेह।
जेठ दोपहर सी तपे, 'अखिल' झुलसती देह।।
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बिन माँगे माँ पेट भर, बेटों को आशीष।
भूखी रखती है उसे, हर दिनांक इकतीस।।
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आँगन-आँगन उग रहीं ,काँटों की दीवार।
अम्मा की ममता 'अखिल',द्वार खड़ी लाचार।।
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खेत बँटे आँगन बँटे, खिड़की आँगन द्वार।
बिन बँटवारे के मिले, जग को माँ का प्यार।।
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मंदिर, मस्जिद, चर्च सब, बाँट रहे इंसान।
पञ्च तत्व निर्मित सभी, हिंदू , मुगल, पठान।।
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वात, पित्त ,कफ का 'अखिल', उचित रहे जब योग।
तब तक कभी शरीर को, क्या छू पाये रोग।।
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मिले योग से आयु सुख, योग ज्ञान  का सार।
अज्ञानी का धन 'अखिल', दुःख का है आधार।।
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जिम्मेदारी शीश पर, आँखों में है प्यार।
सीना ममता से भरा, जय भारत की नार।।
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सच से आँखे जब मिली, दिया पसीना छोड़।
पुरुष संयमी कभी भी, चले न रस्ता तोड़।।
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बिना समर्पण कब मिला, ज्ञान-भक्ति का दान।
हुए समर्पण से 'अखिल' तुलसी, सूर, महान।।
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धूल पात पर उड़ जमे, ले मन में दुर्भाव।
कभी न बदला पत्र ने, अपना सहज सुभाव।।
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मंत्री बन बैटर  रहो, बाबा जीवन बेस्ट।
साधारण के कब हुए, बाबाओं से टेस्ट?
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आज बदलता आदमी, पल-पल कितने रंग।
गिरगिट भी हैरान है, देख अजब सा ढंग।।
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दबे रहे जो ग्रीष्म में, छानी के कुछ होल।
वर्षा में खुलने लगे, ज्यों विपक्ष की पोल।।
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गुल गुलशन, वन जीव सब, तब-तब हुए उदास।
खास जश्न की खबर जब, पहुँची उनके पास।।
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पुत्र जन्म नर-नाथ घर, देख डरे पशु भीत।
बकरे से बकरी कहे, भाग चलो अब मीत।।
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चीरहरण सा चल रहा, द्रुपदी हुआ किसान।
भीष्म पितामह मूक हैं, आ भी जा भगवान।।
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कूटनीति की चक्कियाँ, खेती हुई पिसान।
फंदा कर्जा का गले, कैसे हँसे किसान?
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श्रम-सीकर पी श्रमिक का, ताजमहल सी शान।                                             
बदले में दो कौड़ियाँ, जय हो हिंदुस्तान।।
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श्रम सीकर से बन गया, कुर्ते पर जो चित्र।
भारत का नक्शा बना, कुर्ता हुआ पवित्र।।
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पेड़ पथिक को दे रहे, मात गोद सा प्यार।
भेद-भाव बिन छाँह का, बाँट रहे उपहार।।
*                                        
कहो मोल माँगें कभी, पावक, गगन, समीर?
मातु-पिता, भाई-बहिन, धरा, समंदर, नीर।।
*
पेड़ न जाने भेद कुछ, हिंदू, मुगल, पठान।
आया जो भी पास में, दे फल-छाँह सामान।।
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नैन पलक तरकस लगें, नजरें तीखे तीर।
प्रेम जंग रणबाँकुरी, अंग-अंग शमशीर।।
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केश घने घन साँवरे, विमल चंद्र सम भाल।
घूँघट पट नैना छिपें, 'अखिल' चित्त बेहाल।।
*
कनक रंग सी देह है, कजरारे हैं नैन।
चाल फागुनी पवन सी, कोयल जैसे बैन।।
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कूटनीति के घाट पर, सत्य हुआ बदनाम।
झूठ कपट के मंत्र से, गुँजित आठों याम।। 

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भौजाई सी छाँह है, तेज ननद सी धूप।
जेठ दहाड़े द्वार पर, पिता गेह का कूप।।
*
दरिया दुल्हिन सी सहम, रही जेठ घर मौन।
पवन ननद सी चुलबुली, छेड़े उलझे कौन।।
*
नशे-नशे में हो गई, बहुत नशीली बात।
घूँसों की होने लगी, बेमौसम बरसात।।
*
थाने में दस की 'अखिल', देता थानेदार।
बीस रुपैया पैक पर, रोज बचेंगे यार।।
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निपट नशीले मूड में, साहब लौटे गेह।
अटपट-लटपट चाल है, सनी कीच से देह।।
*
मधुशाला सी जिंदगी, पैमाने सी साँस।
कुछ हाथों तक मय गई, वरना रिक्त गिलास।।
*
हल से लिखता खेत पर, कृषक अनोखे छंद।
बरखा रानी बाँचती, लिखे हुए नव बंद।।
*
पाँसों जैसे हाथ में, हँसिया और कुदाल।
खेती-चौपड़ खेल सा, चलो सोचकर चाल।।
*
मँहगाई के सामने, खड़ा कृषक करजोर।
ज्यों कपिला है शेर के, आगे अति कमजोर।।
*
खेत बिछौना हो गया, चादर है आकाश।
पेट पकड़ कर सो गया, फिर भी नहीं निराश ।
*
चातक जैसी टकटकी, नेता जी से आस।
आश्वासन की पातियाँ, रही कुँवारी प्यास।।
*
भारत देश महान अति, हिमगिरि जिसका शीश।
कंकर-कंकर में विहँस, रमते शंकर ईश।।
*
गोरे काले का यहाँ, शेष नहीं मतभेद।
ज्यों सरिता सागर मिली, जाकर भूली भेद।।
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दरिया जैसी जिंदगी, घाट-घाट विश्राम।
कहीं जागरण की सुबह, कहीं चैन की शाम।।
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प्रीत, रीत के गीत भी, संस्कारी तटबंध।
मर्यादा की मूल से, भारत का अनुबंध।।
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नेताजी की चाकरी, बरगद जैसी छाँव।
चापलूस मल्लाह की, लगी किनारे नाव।।
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बाजी खेले जान की, खेतों बीच किसान।
जैसे सीमा पर डटा, आठों पहर जवान।।
*
उपजाता है अन्न जब, पेट भरें सब लोग।
पर किसान ही देश का, भूखा करता सोग।।
*
गिरगिट जैसी चाल है, चींटी जैसी जान।
चोरों जैसी हरकतें, पाजी पाकिस्तान।।
*
नैनों से छुरियाँ चलें, करें दिलों पर घात।
नैनों-नैनों में हुई, प्रेम भरी बरसात।।
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नैना खुली किताब से, छुपा राज कह मौन।
महक छिपे कब इत्र की, कहो लगे कौन?
*
श्रम सीकर बोने लगे, खेतों  बीच किसान।
गीता के संदेश का, मन में करके ध्यान।।
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खेतों की हर माँग को, पूरा करे किसान।
इम्तिहान देता रहा, बलि लेते भगवान।।
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फागुन सरसों सज गई, गेंहूँ बदले रंग।
पी कर बैठा खेत में, चना जरा सी भंग।।
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पवन भांग पी कर चली, मौसम देखे ख्वाब।
कलियाँ भौरों से कहें, बाँचो नेह किताब।।
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टेसू-मन रंगीन है, महके अमुआ अंग।
सरसों पीली देखकर, महुआ का मन दंग।।
*
गोरी फागुन में सजी, विमल चंद्र सा भाल।
पग पायल नूपुर बजें, पुरवाई सी चाल।।
*
मन सावन-भादों हुआ, हरियाकर दिन दून।
प्रियतम परदेशी हुए, कर सपनों का खून।।
*
प्रेम पुजारी देश यह, पवन सुनाती तान।
तुलसी, सूर, रहीम, घन, प्रेम पगे रसखान।।
*
भादों गर्जे द्वार पर, पवन झकोरा मार।
बुँदिया नाचत आँगने, धरा करे श्रृंगार।।
*
'अखिल' अनंदी लाल सुत, फूलवती माँ जान।
ग्राम कछार सुहावना, है निवास अस्थान।। १०० 

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ॐ 
अनिल कुमार मिश्र 






आत्मज: श्रीमती कलावती-स्व. रामनरेश मिश्रा। ​
जीवन संगिनी: श्रीमती रजनी मिश्रा। 

जन्म: ३१ मार्च १९५८, इलाहाबाद (उ. प्र.)
शिक्षा: एम. ए. ( समाजशास्त्र, हिंदी
लेखन विधा: नुक्ताचीनी, गीत, व्यंग, दोहे आदि 
प्रकाशन: दृष्टि (यात्रा संस्मरण), इन्द्रधनुष (काव्य संकलन)
संप्रति: विद्युत पर्यवेक्षक, उमरिया कालरी। सचिव वातायन साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्था उमरिया (म.प्र.)
सचिव हिंदी साहित्य सम्मेलन म. प्र.  भोपाल (उमरिया इकाई)

​संपर्क: ​आवास क्रमांक बी ५८, ​९ वीं कालोनी उमरिया ४८४६६१।  

​चलभाष: ९४२५८९१७५६ , ९०३९०२५५१०, व्हाटस एप: ७७७३८७०७५७। ईमेल: mishraakumr@gmail.com

​*
​ॐ 
दोहा शतक 
अष्टभुजी जगदंबिके, लुटा रहीं आशीष।

आदि शक्ति की अर्चना, करते हैं जगदीश।। 

मोक्षदायनी अंब हैं, महाशक्ति विख्यात।
पाप-शाप देतीं गला, शुभाशीष विख्यात।।  
*
मातु-चरण जब-जब पड़े, होते मंगल काज।
विघ्नहरण वरदायनी, चढ़ आईं मृगराज।। 
*  
रखूँ भरोसा राम का ,क्या करना कुछ और? 
राघव पद रज बन रहूँ, और न चाहूँ ठौर।। 
राम नाम महिमा बड़ी, पाहन जाते तैर। 
छोड़ जगत जंजाल तू, पाल न राग, न बैर।।  
पूरे जग में राम सा, नहीं अन्य ​आदर्श।
राम भजन-अनुकरण दे, जीवन में उत्कर्ष।। 
धन्य भूमि साकेत पा, राघव नंगे पाँव। 

निरख हँसे माता-पिता, विहँस उठे पुर-गाँव।। 

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राम नाम शर साधिये, मिटते कष्ट समूल। 
सारे जग के मूल में, राम नाम है मूल।। 
गुणाधीश हनुमंत हैं, पंडित परम सुजान।
आर्तनाद सुन दौड़ते, महावीर हनुमान।।  
*
मर्यादामय राम है, सतत कर्ममय श्याम।
जिस ढिग ये दोनों रहे, जीवन चरित ललाम।। 
*
धन बल यश का क्या करूँ?, साथ न हों जब राम।
व्यर्थ हुईं अक्षौहिणी, सँग नहीं यदि श्याम।।  
*
मन में रखिये राम को, कर में रखिये श्याम।
मर्यादामय राम हैं, कर्मयोग घनश्याम।। 
*
देवी के मन शिव रमे, सीता के मन राम।
राधा के मन श्याम हैं, मानव के मन दाम।। 
*
कुञ्ज गली कान्हा फिरें, ग्वाल-बाल के साथ।
सच बड़भागी हैं बहुत, मोहन पकड़े हाथ।। 
*
मायापति क्रीड़ा करें, चकित हुआ ब्रज धाम। 
पञ्च तत्व भजते रहे, राधे-राधेश्याम।। 
*
पाँव डुबोये जमुन-जल, छेड़े मुरली तान।
कालिंदी पुलकित मुदित, धरकर प्रभु का ध्यान।। 
*
धेनु चराई ग्वाल बन, दधि लूटा बिन दाम। 
बने द्वारिकाधीश जब, फिरे नहीं फिर श्याम।। 
*
श्याम विरह में तरु सभी, खड़े हुए निष्पात। 
शरद पूर्णिमा भी हुई, स्याह अमावस रात।।
गोवर्धन सूना खड़ा, कुञ्ज मौन बिन वेणु। 
राह श्याम की ताकते, कालिंदी तट-रेणु।। 
*
लोभ मोह मद स्वार्थ के, ताले लगे अनेक।
ईश-कृपा सब लौटतीं ,बंद द्वार पट देख।।  
*
लोभ मोह मद हम फँसे, लो प्रभु हमें निकाल। 
जीवन में शुचिता रहे, उन्नत हो मम भाल।। 
*
महासमर तम कर रहा, लोभ-मोह ले साथ।
लड़ने में सक्षम करो, प्रभु थामा तव हाथ।। 
*
ईश कृपा जिसको मिली, उसको व्यर्थ कुबेर। 
​ शुचिता की आभा रहे, थमे अमावस फेर।। 
सहज सरल को प्रभु मिलें, करें न पल की देर। 
हेम कुण्ड में हरि नहीं, अथक थके सब हेर।। 
मन वातायन खोलिए, निर्मल मन संसार। 
प्रभु-छवि आँखों में बसा, होगा बेड़ा पार।।   
*
तुम साधन अरु साधना, मन चित भाव विचार। 
ध्यान योग प्रभु आप हो, अवगुण के उपचार।। 
*
मायापति की शरण जा, छूटे बंधन-मोह। 
मानव मन भटका हुआ, है विराट जग खोह।। 
*
मिट जाएगी दीनता, भज ले  मारुति-नाम। 
​ यश-वैभव पौरुष मिले, बिन कौड़ी बिन दाम।। 
*
सत्कर्मो से कीजिये , कलुषित मन को साफ। 
​ करते हैं प्रभु ही सदा, त्रुटियाँ सारी माफ़।। 
*
मन में प्रभु कैसे रहें, बसी मलिन यदि सोच।
जैसे गति आती नहीं, अगर पाँव में मोच।। 
*
पुष्कर में ब्रह्मा बसे, अवधपुरी में राम। 
कान्हा गोकुल में रहे, शिव जी काशी धाम।। 
*
सागर में हरि रम रहे, रमा रहें नित संग। 
देव सभी मम हिय बसें, हो निश-दिन सत्संग।। 
*
मन में रख श्रद्धा अनिल, प्रभु दिखलाते राह।  
प्रभु के द्वारे एक हैं, दीन कौन, क्या शाह।। 
*
कर्मठता कब देखती, नक्षत्रों की चाल। 
श्रम पूँजी जिसको मिली, वह है मालामाल।। 
*​ 
रहें न गृह वक्री कभी, रहें राशि शुभ वार। 
नखत सभी अनुचर बने, राम कृपा आगार।। 
*​ 
राम चषक पी लीजिये, करिए तन-मन चंग।
धर्म-ध्वजा फहराइए, नीति-सुयश की गंध।। 
*​ 
अंधकार मन में रहा, बुझा ज्ञान का दीप।
प्रभु अंतर ऐसे छिपे, ज्यों मोती में सीप ।। 
*​ 
श्वास-श्वास यह तन फुका, जली न इच्छा एक। 
राम-नाम धूनी जला, लोभ चदरिया फेंक।। 
*​ 
राम नाम तरु पर लगे, मर्यादा के फूल।
बल पौरुष दृढ़ तना हो, चरित सघन जड़-मूल।। 
*​ 
उहा-पोह में क्यों फसें?, पूछे नवल विहान। 
कर्मठता के साथ ही, सदा रहें भगवान।। 
*​ 
दीप पर्व अरि तमस का, देता जग उजियार।
पाप मिटे हरि-भक्ति से, हो शुचि-शुभ संसार।। 
*​ 
प्रेम वह्नि दहकाइए, बैर-शत्रुता फूक। 
​ माना यह पथ कठिन है, राम उपाय अचूक।।  
*​ 
जीवन में मत कीजिये, मिथ्या से गठजोड़।
क्षमा,शील, तप, सत्य का, कहीं न कोई तोड़।। 
*​ 
भक्ति-भाव से सींचिये, मन का रेगिस्तान ।
महक उठेगा हरित हो, जीवन का उद्यान।। 
*​ 
मन में शुचिता धार ले, त्याग लोभ मद काम।
स्वर्ग-नर्क हैं यहीं पर, मोक्ष यहीं सब धाम।। 
*​ 
छठ मैया जी आ गईं, बहती भक्ति बयार।
भूख-प्यास तिनका हुईं, श्रद्धा अपरम्पार।।  
*​ 
पाई-पाई में हुई, हाय! अकारथ श्वास। 
गिनते बीती जिंदगी, राम न आये पास।। 
*​ 
नींद खुली जब भोर में, खड़ा सामने पूस।
भानु महोदय हो गये, ज्यादा ही कंजूस।।

*


कौड़ा और अलाव से, रखिये अब सद्भाव। 
इनके ही बल शिशिर के, घट पाएँगे भाव।।

*

पूस बाँटने चल पड़े, पाला शीत कुहास
कूकुर चूल्हा में घुसा, साध रहा है साँस।।
*
शुभ विचार शुभ भाव हों, हो शुभ ही मन-चित्त  
शुभ आचार-विचार हों, शुभ हो जीवन-वृत्त।।
* 
नई नवेली सोचती, काश न आये भोर।
पड़ी प्रीत ले पाश में, टूट रहे हैं पोर।।
*
चादर ओढ़े धवल सी, खेत खपड़ खलिहान।
ठिठुरे-​ठिठुरे से दिखे, मचिया मेड़ मचान।।

*
स्वेटर शाल रजाइयाँ, ताप रहीं हैं धूप। 
कल तक सारे बंद थे, मंजूषा के कूप।।
*
चना-चबेना-गुड़ बहुत, पूस माँगता खोज।
बजरे की रोटी रहे, चटनी भरता रोज।।
*
हीर कनी तृण कोर पर, पूस रखे हर रात।
बिन लेतीं हैं रश्मियाँ, आकर संग प्रभात।।
*
भानु न धरणी पग रखे, देख शिशिर का जोर।
जा दुबके हैं नीड़ में, शान्त पड़ा खग शोर।।
*
खल हो सूरज जेठ में​, और समीरण यार।
माघ मास सब उलट है, मानव का व्यवहार।।  
*
कज्जल, वेणी,हार,नथ, सन हुए​ बेहाल।
दहकी प्रिय संग बाँह गह, भूली सभी मलाल।।

​ *
शिशिर यातना दे रहा, भूल सभी व्यवहार। 
पृष्ठ भरे हैं जुल्म से, बाँच सुबह अखबार।। 
*
कुछ सोए फुटपाथ पर, कुछ ऊँचे प्रासाद
सबके अपने भाग हैं, नहीं शिशिर अवसाद।।
*
रखे मृत्यु सम दृष्टि ही, करे न कोई भेद

सत्कर्मी जब भी गया, जग को होता खेद।। 
*
हत्या हिंसा से रँगी, दिखी पंक्तियाँ ढेर
डरा रहे अख़बार हैं, आकर देर सबेर।। 
*

सीता को ​सब खोजते, किंतु न बनते राम
शर्त सरल पर कठिन है, पहले हों निष्काम।।
*
रिश्ते-नाते टाँकिये, नेह​-​सूत ले हाथ
साँसें जो छिटकी रहीं, चल देंगी सब साथ।।
​ *
हम मानव अति हीन हैं, तरु हैं हमसे श्रेष्ठ
छाया ,पानी, फल दिया, माँगा नहीं अभीष्ट।।

*

साँसों का मेला लगा, पिंजर है मैदान
इच्छाएँ ग्राहक बनी, मोल करे नादान।। 
*

गिनती की साँसें मिलीं, क्यों खर्चे बेमोल?
मिट्टी में मिल जागा, अस्थि चाम का खोल।।

​ *
हाँ - हाँ , हूँ - हूँ कर रहा, करके नीचे माथ
लालच कब करने दिया, ऊपर अपना हाथ।।

*
कृषकायी सरिता हुई, शोक मग्न हैं कूल
सांस जगत की फूलती, होता सब प्रतिकूल।।

*​
बेला बिकता विवश हो,​ ​सोच रहा निज भाग। 
मंदिर या कोठा रहूँ, या दुल्हिन की माँग।।  

*
बेला कभी न सोचता, कौन लिए है हाथ
उसको ही महका रहा, जो रखता है साथ।।
​*
बेला जब गजरा बनेउपजें​ भाव अनेक
वेणी बन जूड़ा गुथे, मन न रहे फिर नेक।।

*
खोलो मन की साँकली, झाँके अन्दर भोर।
भागे तम डेरा लिए, सम्मुख देख अँजोर।।

*
भास्कर नभ पर आ कहे, उठ जाओ सब लोग। 

तन-मन नित प्रमुदित रहे , काया रहे निरोग।।

*
धमनी-धमनी में बहे, नूतन शोणित धार। 

तन-मन यदि हुलसित ​रहे, भुला बैद का द्वार।। 

*
पायल ​सहमी पाँव में, चूड़ी है बेहाल। 

सावन ​सूना हो नहीं, जैसे पिछले साल।।

​*
आएगा जब गाँव में, कागा ले संदेश। 
पल में ही कट जायगा, शाप बना परदेश।।
​*
सावन पापी ठहर तो ,मत बरसा रे!आग।
विधि ने खुशियाँ कम लिखीं, मैं ठहरी हत भाग।।
*​

पावक से लिपटे हुए, अंग-अंग श्रृंगार। 

​​पावस में रजनी हुई, जैसे सौतन नार।।
*
दर्पण हैं चंचल नयन, बाहुपाश हैं हार।
प्रियतम से अनुपम भला ,कब कोई श्रृंगार।।
*
पावस बूँदें छेड़तीं, जाने किस अधिकार। 
प्रियतम!​ निज थाती गहो, यौवन बोझिल भार।।  

​*

प्रीतम बरसें मेघ बन, तन भिसके ज्यों भीत।
पोर-पोर टूटन कहे, हा! पावस की रीत।।

*
प्रियतम की आहट मिली, पायल बोली कूक। 

​​मध्य भाल टिकली हँसी, कंगन रहा न मूक।।
*
दिवा हुआ है शिशिर सा, और ग्रीष्म की रात। 

​​नयन-नयन संवाद ​सुन, अधर-अधर की बात।।

*
अंग-अंग वाचाल लख, काँधा आँचल छोड़।
आँखें प्रियतम को तके,निज मर्यादा तोड़।।

*
गोरी ने खुद को किया, प्रियतम के अनुकूल।
​आँचल में भी फूल हैं, चोटी में भी फूल।।

*
नथ अधरों से कर रही, गुपचुप कुछ संवाद। 
मैं शोभा की पात्र बस, तुम हरदम आबाद।।

*
तुम हो किस रस में पगे, पूछे नथ यह राज।
अधर कहे हम मित्र हैं,मिलें त्याग कर लाज।।

​*
पग आलक्तक से रंगे, नयन हुए अरुणाभ।

अंग-अंग हँसकह रहे, जगे हमारे भाग।।   

*
फेंक न जूता मारिए, इनका भी है मान। 

​नेता को पड़ रो रहा, आज हुआ अपमान।।

*
बेटा से माता कहे, बेटा! गारी बोल। 

​​संसद की भाषा यही, बोल बजाकर ढोल।।
*
चोर द्वार से है घुसे, लड़ते नहीं चुनाव।  

लोकतंत्र के पीठ पर, नेता ​करते घाव।।

*
हिंदी का निज देश में, हम करते अपमान।
एक दिवस के रूप में, लेते जब संज्ञान।।

​*
कैसे कुछ सौ वर्ष में,बदल गया ​है रूप। 

​​हिंदी दासी रह गई, अंगरेजी है भूप।।
*
हिंदी को अपनाइए, तनिक न करिये लाज।

इस से अपना कल रहा, इससे ही है आज।।
*

दोहा छंद कवित्त हैं, हिंदी के श्रृंगार।
​चिरगौरव से युक्त हैं, हिंदी के युग चार।।
*
सारी लज्जा छोड़ दें, हो हिंदी व्यवहार।
अगर पराई सी रही, हमको है धिक्कार।।
​​*
धीरे-धीरे झाँकती,जा सागर के पार।
​हिंदी की है छवि मृदुल, मिलता नेह-दुलार।।
*
शील क्षमा साहस दया, उन्नति के सोपान।
इसी मार्ग चल मिलेंगे, कृपासिंधु भगवान।। १०० 
***********
अरुण अर्णव खरे

















आत्मज: स्व.
 शांति देवी-स्व. गयाप्रसाद खरे।
जीवन संगिनी: श्रीमती माला खरे

जन्म: २४ मई ​१९५६, इलाहाबाद (उ. प्र.)
शिक्षा: बी.ई. यांत्रिकी।

​लेखन विधा: व्यंग, दोहे, गजल आदि

​प्रकाश: रात अभी स्याह नहीं (गजल संकलन)
सम्प्रति: सेवा निवृत्त मुख्य अभियंता, लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग मध्य प्रदेश।

संपर्क: डी-१/३५ दानिश नगर, होशंगाबाद मार्ग, भोपाल म. प्र. ४६२०२६।
चलभाष: ९८९३००७७४४, ई मेल: arunarnaw@gmail.com।
*
​ॐ
दोहा शतक ​

*
पता नहीं किस देव का, ऐसा है अभिशाप। खेल करोड़ों में रहे, नेता पैसा छाप
* असंतुष्ट हैं सब यहाँ, क्या किसान, क्या छात्र संवेदी सरकार ह​, करती वादे मात्र
* पुत्र हुआ सरपंच का, फिर दसवीं में फेल
ख़ास योग्यता खेलता, राजनीति के खेल
* टिकट उसे ही मिल गया, देखा-समझ रिज्यूम रेप, घूस का अनुभवी, खाते में दो खून * गया रामलीला किया, लछमन जी का रोल था अपात्र अब हो गया, वह नेता अनमोल | * जनमेजय के यज्ञ से, बचे रहे जो नाग अब कुर्सी पर बैठकर, उगल रहे हैं आग * बिगुल चुनावी क्या बजा, लगें नित्य आरोप मन व्याकुल है देखकर, मर्यादा का लोप * लाई है ऋतु चुनावी, आरोपों की बाढ़ झूठ बोलते ना दुखे, नेताओं की दाढ़ * नेता जी हैरान हैं, सख्त बड़ा आयोग। कम्बल, दारू सब रखे, कैसे हो उपयोग? * जनसेवा चर्चित हुई, मंत्री की श्रीमान। साले जी को मिल गईं, सारी रेत खदान
* पूस-अंत की सुबह के, अलबेले हैं ढंग। सूरज है निस्तेज सा, कुहरा हुआ दबंग।। * सूरज काँपे ठण्ड से, कुहरा ओढ़े भोर।
हवा तीर जैसी रही, अंदर तक झकझोर।।
* शरद हमेशा की तरह, लाया है सौगात। जलतरंग सी नासिका, किट-किट करते दाँत।। * आँखें मलता रवि उगा, ले अलसाई धूप। ठिठुर-ठिठुर छाया हुई, कुबड़ी और कुरूप।। * दूभर सूरज का दरस, पारा जीरो पास। हम अपने घर ही सिमट, भोग रहे ​वनवास।।
* कहो कहाँ प्रियतम खड़े, कुहरा है घनघोर। आँखें मल-मल देखते, चले नहीं कुछ जोर।। * जलती रही अलाव में, ठण्डी-ठण्डी आग। जाड़ा-जाड़ा मन जपे, तन ने लिया ​विराग।।
* प्रियतम दूर, न आ रहे, आती उनकी याद। धुआँ-धुआँ सब शब्द हैं, कैसे हो संवाद।। * पूस अंत की सुबह का, धूसर-धूसर रंग। पाखी बैठे घोंसले, कैसे हो सत्संग।। * सहमा सूरज झाँकता, नभ से कम्बल ओढ़। सर्द हवाओं से किया, उसने ज्यों गठजोड़
*
आभासी रिश्ते हुए, अपनेपन से दूर। लाइक गिन दिन कट रहे, हैं इतने मजबूर।। * जलता रावण कह रहा, सुन लो मेरा हाल। क़द मेरा दो चार फ़ुट, बढ़ जाता हर साल
* राम नाम रखकर करें, रावण जैसे काम। चाहे रामरहीम हों, चाहे आसाराम
* जलता रावण पूछता, बतलाओ हे राम! क्या कलयुग में फूँकना, पुतले केवल काम।। *


ऊँची हुईं ​अटारियाँ, फक्कड़ रहे कबीर।
लेशमात्र बदली नहीं, होरी की तक़दीर।। * काला धन आया नहीं, इसका सबको खेद। माल्या लेकर उड़ गया, सारा माल सफ़ेद
*
संत कलंकित कर रहे, हम सबका संसार।

त्याग-तपस्या ​भूलकर, करते यौनाचार।।

*
समरसता पथ-पर नहीं, हैं विकास के पाँव।
होरी की है झोपड़ी, अब तक बाहर-गाँव।।
* विनती राजन आपसे, करो निरंकुश राज। बस हमको मिलती रहे, सूखी-रोटी प्याज।। * चौंसठ खानों में छुपा, राजनीति का सार। नेताओं ने सीख लीं, चालें कई हजार
*
रँगने को लाया तुम्हें, भाँति-भाँति के रंग। बचा सको तो लो बचा, अपने अंग अनंग
* अंदर-बाहर रँग दिया, होली में इस बार। मन बस से बाहर हुआ, कौन करे उपचार
* मुट्ठी लगे गुलाल ने, जोड़े मन के तार। बाँध गया सत जन्म को, होली का त्योहार
* पाती लिखी बसंत ने, जब गुलशन के नाम। माली को करने लगे, तितली-भ्रमर प्रणाम
*
पहली-पहली फाग का, अनुपम है आकाश
नैन हुए कचनार से, अधरों खिले पला।।
*
फूलों की वेणी पहिन, पायल बाँधे पाँव। पूछे पता बसंत का, फागुन आकर गाँव
* रितु बसंत प्रिय दूर तो, मन है बड़ा उदास। हरसिंगार खिल यों लगे, उड़ा रहा उपहास।। * फूलों के घर आ गई, खुशबू लेकर डाक। लगीं तितलियाँ झूमने, बदल-बदल कर फ्रॉक।। * बाँचें गीत गोविंद जू, ढोलक देती थाप। फागुन लेकर आ गया, घर उमंग चुपचाप। * पोर-पोर खुशबू लिए, भीनी-भीनी छाँव। सिर महुए के घट धरे, फागुन आया गाँव।। *
होरी-धनिया हैं दुखी, बिटिया स्यानी ​जान।
घात लगाकर हैं खड़े, लोमड़, गीदड़, श्वान।।
* पटवारिन की छोकरी, मिर्ची तीखी-लाल। चर्चा उसकी हर तरफ, गाँव, गली, चौपाल
*
दिल में करुणा प्रेम है, अधरों पर मुस्कान
मेरी इस संसार में, बस इतनी पहिचान
*
शेर लिखे मैंने बहुत, हो मस्ती में चूर
तुम्हें देखकर जो लिखे, हुए वही मशहूर
*
वेद-पुराण पढ़े मगर, रहा अधूरा ज्ञान
तुमसे मिलकर ही मिली, दुनिया में पहिचान
*
भावहीन सब शब्द हैं, बुझे-बुझे से गीत
इसका कारण एक ही, तुमसे दूरी मीत
*
बिन बोले मनुहार का, ऐसे दिया जवाब
नजर चुराई लाज से, गालों खिले गुलाब
*
साँस-साँस केसर घुली, अंग-अंग मकरंद
अनपढ़ मन कहने लगा, गीत, गजल, नव छंद
*
अधिक और भी खिल गई, पूनम की वह रात
होंठ दबा जब बोल दी, उने मन की बात
*
केन नदी के तट मिला, अनुपम उनका साथ
बिन बोले बस देखते, बीती सारी रात
*
कहो इसे दीवानगी, या सच्चा अनुराग
उनकी मृदु मुस्कान पर, हमने लिखी किताब
*
सुंदर सारा जग लगे, मन में जागे प्रीत
हारे दिल फिर भी लगे, मिली निराली जीत
*
उपवन, मौसम, चाँदनी, तुमसे मेरे छंद
तुमसे अधरों पर हँसी, तुमसे सब आनंद
*
सात समंदर पार वे, करो सखी उपचार
होरी-फागें बाँचता, फागुन आया द्वार
*
साँस-साँस केसर घुली, अंग-अंग मकरंद
अनपढ़ मन की बात भी, लगती है गुलकंद
*
जवाकुसुम सा रूप है, वाणी घुली मिठास।
तन चंदन-तरु सुवासित, मन में हुआ उजास
*
बारिश की पहली झड़ी, हुआ विरोधाभास
धरती का ज्वर कम करे, देह तपे आभास
*
पानी लेकर आ गए, कारे-कारे मेघ
खेतों में हलधर लिखें, ले हल नव आलेख
*
सबको बारिश कर गई, इतना मालामाल
सूखी नदिया बह चली, हुए लबालब ताल
*
जेठ माह में देखिये, कैसा है अंधेर?
लगे सुबह से घूरने, सूरज आँख तरेर
*
भ्रमर, सुरभि, कोयल, कुसुम, हैं ये सभी गवाह
तुम मस्ती में जब चलीं, मौसम भटका राह
*
सूरज पानी ले उड़ा, किया नहीं संकोच​
पानी हमसे माँगती, गौरैया की चोंच
*

बिटिया स्यानी हो गई, बढ़ा हृदय पर बोझ
पीपल हर दिन पूजते, कृपा माँगते रोज

सबकी अपनी मण्डली, सबका अपना हाल

​अरसा ​बीता गाँव में, नहीं जमी चौपाल

छज्जे पर कबसे खड़ा, लेकर मन में आस
तुमको मुझसे प्यार है, कुछ तो दो आभास

रोम-रोम है धरा का​, गरमी से बेहाल
खुद भी प्यासे हो गए, नदिया, पोखर, ताल। ​

फूलों बीच छिड़ी बहस, किसका मोहक रूप
कौन-कौन श्रृंगार के, पूजा के अनुरूप। ​
*
​ मन कविता करने लगा, झलक तुम्हारी देख।
गीत हजारों रच दिए, ग़ज़लें लिखी अनेक​।

नफरत-नफरत बो रहे, जहरीले हैं बोल
बाबा, साधू, मौलवी, सबके मन में झोल। ​
*
भरमाने को आ गए, फिर से मेरे ​गाँव।
आने वाले जल्द ही, लगता नए चुनाव। ​

साम्प्रदायिकता बढ़ी, बढ़ा धर्म उन्माद

फिर आ गए चुनाव क्या, हर दिन नया विवाद। ​

त्रेता रावण एक था, कलियुग में हर ओर।  
इसलिए तो फैल रहा, रक्ष-राज पुरज़ोर
महिला सशक्तिकरण की, देखी नई मिसाल
सरपंच-पति बाहुबली, बनकर करें कमाल। 
नेता जी आने लगे, घोषित हुए चुनाव

​ख़त्म कर रहे मदरसे, लाए हैं प्रस्ताव
प्रियवर इस संसार में, पढ़ना-लिखना व्यर्थ
यदि तुमने सीखा नहीं, मानवता का अर्थ
है इतिहास गलत अगर, बदलें बिन संकोच
गाँधी से नाथू बड़े, दूषित ऐसी सोच

घर में शाँति अगर नहीं, सही नहीं ​संदेश
कितनी कोशिश कीजिए, भागे दूर निवेश
*
​ आशाएँ थी आपसे, सच में बड़ी विशाल
वादों से मिटती नहीं, भूख विकट विकराल
*
दिवस सुहाना बीत​कर, होने आई शाम
सपने बहुत दिखा दिए, करिए कुछ अब काम
*
कटु निंदा ​कर ली बहुत, ​अब जगिए सरकार
दुश्मन सुधरेगा नहीं, हो निर्णायक वार। 
*
सीमा पर हो रहे हैं​, सैनिक रोज शहीद

​घर में घुस कर मारिए, लौटे फिर उम्मीद
*
अच्छे दिन आए नहीं, सभी दुखी हैं आज
कभी रुलाती दाल है, कभी रुलाती प्याज
*
मँहगाई सच हो गई, डायन सी विकराल
बनती है अब घरों में, यदा-कदा ही दाल
*
तुम बिन सब बेरंग सा, चाँद, नदी, कचनार
पेरिस लगे प्रयाग सम, होनोलुलु हरिद्वार
*
पाहुन बादल आ गए, उमड़-घुमड़ कर ठाँव
आँचल में जलनिधि लिए, बिजली बाँधे पाँव
*
पावस में ऐसे लगीं, झड़ियाँ अबकी साल
शुष्क धरा हरिताभ है, हुए लबालब ताल।
*
ऐसी मची बसंत की​​वन-उपवन में धूम
देवदार करने लगे, बातें ऊँची झूम
*
बूँदों की नव ताल पर, ताल हुए मदहोश
आतुर सागर नदी को, लेने निज आगोश। 
*
जुड़ा रहे ​जो धरा से, निर्मल संत स्वभाव

दुनिया उसको पूजती, रख आत्मीय जुड़ा।।
*
बड़े-बड़ों की सीख यह, रखना इसका मान
जीवन में भी दिन सभी, रहते नहीं समान।   
* 
पहुँचो तुम जब शिखर पर, रहें जमीं पर पाँव
अपनों को भूलो नहीं, याद ​रखो घर​-​गाँव
*
चलते रहते ​नदी के​,​ सदा किनारे साथ
पर सुख-दुख की तरह वे, नहीं मिलाते हाथ
*
शशि सा ​सुंदर रूप है, फूलों सा मृदु गात
बनकर ​ग़ज़ल ​उतर गए, कागज पर जज्बात
*
अगर ​न मन में न राग हो, सुन कोयल की कूक

​सच मानिए ​बसंत से, हुई अयाचित चूक
*
नैन झुके सुन लाज से, हुए अधर भी मूक
जब रति से कहने लगे, कामदेव दो टूक।  
*
देख-देख पीड़ा बहुत, मर्यादा का लोप
आँखों में नफरत बढ़ी, चलती जिव्हा-तोप
*
सुख-सुविधाएँ ज्यों बढ़ी, घटा प्रेम-विश्वास
छूटा मेल-मिलाप भी, घटाहास-परिहास
*
है आपत्ति जिसे ​सखे, खुलकर दे वह बोल

शान यहाँ की तिरंगा​, जीवन सा अनमोल
*
​ पाना ही होता नहीं, देना परम सुभाग
परवाने भी प्यार में​, जीवन देते त्याग
*
​धर्म ​पढ़ाने में कहें​, हुई कहाँ पर चूक​?

​आए ​मजहब सिखाने, कर ​लेकर बंदूक।१०० 
*

अरुण 
शर्मा ​














जन्म: १०.८.१९७५, मोकामाघाट, पटना
आत्मज: श्रीमती सुशीला देवी-श्री श्यामबिहारी शर्मा


पत्नी: प्रतिमा शर्मा शिक्षा: इंटरमीडिएट
लेखन विधा: दोहा, गीत, मुक्तक
आजिविका: प्राइवेट जाब
प्रकाशित: साझा काव्य संग्रह
संपर्क: मानसरोवर हाउसिंग सोसायटी, फ्लैट न• ३०१,बिल्डिंग न• ए/२ वराला देवी तालाब के पास, भिवंडी, जिला ठाणे, महाराष्ट्र ४२१३०२
चलभाष ९६८९३०२५७२ / ९०२२० ९०३८७ ईमेल: arun968930@gmail.com
*
ॐ 
दोहा शतक 

मिट्टी की इस देह से, पाल रहे अनुराग।

जब तक साँसें मित्रता, टूट गई तब आग।। 
*
अगर-मगर में क्यों प्रिये, जीवन रहीं गुजार?
जब तक साँसें चल रही, तब तक यह संसार।। 
*
अब कहने को शेष क्या?, तुमसे दिल की बात।
मौन हुए अहसास सब, सुप्त हुए जज्बात।। 
*
कथनी-करनी पर मुझे, खूब मिला उपदेश।
वही हलाहल बाँटता, जो खुद है अमरेश।। 
*
शीत मौसमी भेंट है, घना कोहरा, ओस।
सर्दी के कारण हुआ, तरल जलाशय ठोस।। 
*
इस विस्तृत संसार की, सोच हुई संकीर्ण।
सिमट गये सब आज में, कल जो रहे प्रकीर्ण।। 
*
वैधानिक चेतावनी, सिर्फ कागजी काम।
धूम्र-मद्य-मद पान कर, मरता रोज अवाम।। 
*
ढूँढ़ रहा हूँ आज भी, नगमों वाली रात।
हम-तुम दोनों ठीक थे, बहके थे जज्बात।। 
*
अंतर में छल-छद्म है, बाह्य आवरण शुद्ध।
ऐसे कैसे तुम भला, बन पाओगे बुद्ध।। 
*
अति ही व्याकुलता भरे, अति करती मजबूर।
प्रेम करें अनिवार्य से, अति से रहना दूर।।
*
खौफ न है कानून का, और न है अनुराग।
इसीलिए है देश में, पाकिस्तानी राग।।
*
आशाओं के बीज से, निकले हैं कुछ खार।
हम तो भूखे रह गये, व्यंग्य करे संसार।। 
*
क्रोध कभी मत कीजिए, यह दुर्गुण की खान।
हरता बुद्धि, विवेक भी, नहीं छोड़ता ज्ञान।।
*
छप्पन इंची वक्ष में, दुनिया का परिमाप।
तब क्यों भूखी देहरी, पेट रही है नाप।। 
*
लाए वर्ष नवीनता, पाएँ हर पल हर्ष।
सुखमय हो जीवन सदा, मिले नित्य उत्कर्ष।। 
*
गत ने आगत से कहा, खुश रखना हर हाल।
हाथ तुम्हारे दे दिया, मैंने पूरा साल।।
*
अंतर के संताप ने, कलम थमा दी हाथ।
शब्द न रोटी बन सका, बस आँसू का साथ।।
*
ऐसे-कैसे तुम मुझे, कहते हो कंगाल?
अंतरघट में छुपाकर, माया का जंजाल।। 
*
आँसू तेरा मोल क्या, तुझमें ऐब हजार।
जग क्या जाने पीर को, नीर दिखे हर बार।। 
*
जिसने पाई ज़िंदगी, निश्चित है अवसान।
फिर भी  माया-मोह में, डूब रहा इंसान।। 
*
ढल जाएगी एक दिन, उम्र, समय यह देह।
नश्वर तन प्रेम क्यों, जो मिट्टी का गेह।।
*
कर्कश स्वर है काग का, करता दूर विछोह।
कोयल काली है मगर, वाणी लेती मोह।।
*
दिल को जो अच्छा लगे, कर लेना निष्काम।
कल की चिंता में कहाँ,खत्म हुआ सब काम।।
*
इस कलियुग ने आजकल, किस्से सुने तमाम।
दशरथ जैसे पिता सौ, पुत्र न पाया राम।। 
*
खुशबू बसी गुलाब में, पीर छुपाये शूल।
जैसी जिसकी कामना, मिला उसे अनुकूल।।
*
विनती करना प्रेम से, करना नहीं दहाड़।
चंद मिनट में आजकल, राई बने पहाड़।।
*
ढल जाएँगे एक दिन, उम्र, रूप, मृदु देह।
तन पर इतना प्रेम क्यों, है मिट्टी का गेह।। 
*
अगर चाहिए जिंदगी, सेहत भी भरपूर।
परामर्श मेरा यही, हों व्यसनों से दूर।। 
*
राहों में बिखरे पड़े, बैर-भाव के शूल।
सोच-समझकर पैर रख, राह नहीं माकूल।। 
*
एक पंक्ति में हैं खड़े, तुलसी, नीम बबूल।
अलग-अलग तासीर को, जाने वही रसूल।।
*
मौत सत्य है जान लें, जीवन कपट सलीब।
जीना चाहे जिंदगी, आती मौत करीब।। 
*
सुखद सुभग सानिन्ध्य को, नमन करूँ कर जोर।
चिरकालिक हो बंधुता, सहज मैत्री डोर।। 
*
रखना सदा कुटुंब में, समरसता का भाव।
नियम बने समुदाय को, अपनों में सद्भाव।। 
*
जाना सबको एक दिन, राजा रंक फकीर।
सुखद कर्म करते रहें, जब तक रहे शरीर।। 
*
रूपवती के रूप में, मैं खोया दिन-रात।
बुद्धिमती समझी नहीं, मेरे मन की बात।। 
*
पराधीन को बेड़ियाँ, कर देतीं मजबूर।
आज़ादी संग जिंदगी, जी ले मित्र जरूर।। 
*
कुछ क्यारी में पुष्प हैं, कुछ में उगे बबूल।
सोच-समझ अनुबंध कर, काँटे,खुशबू, फूल।। 
*
मौन भला कब राह दे, मार्ग न दे वाचाल।
नियत काल की उक्ति ही, करती मालामाल।। 
*
रे! मन क्यों होता रहा, जग में नित्य अधीर।
वही कर रहा कर्म तू, जो कहती तकदीर।। 
*
स्वयं सिद्धि का मंत्र जो, जपता सुबहो-शाम।
अंत समय में क्या उसे, मिल जाता सुखधाम।। 
*
कौन उजाला बाँटता, कौन घनेरी रात?
अपने-अपने कर्म ही, देते फल-सौगात।। 
*
अणुवत जन्मा जो वही, होगा आप विलीन।
कद बढ़ना निस्सार है, मानस अगर मलीन।। 
*
विषधर विष धारे सदा, कभी न करता पान।
दशन करे वह अन्य का, नहीं गँवाता जान।। 
*
चादर छोटी हो गई, या बढ़ गया शरीर।
चला सांत्वना ओढ़कर, जब से हुआ फकीर।। 
*
लेखा-जोखा कर्म का, दिया तराजू डाल।
कलयुग बैठा तौलने, सद्गुण दिया निकाल।। 
*
जीवन भर परिहास को, रहा तौलता रोज।
अंत हुआ जब सन्निकट, करे स्वयं की खोज।। 
*
चंदन घिस-घिस कर मनुज, मस्तक लेता थोप।
पाएगा क्या सत्य को, करे अकारण कोप।। 
*
हाथ जोड़कर ज्ञान पा, हाथ पसारे दान।
इज्जत मिलती प्रेम से, भक्ति-मिले भगवान।। 
*
जीवन के परिप्रेक्ष्य में, आँखें रखना चार।
दो आँखें सत्कर्म पर, दो रोकें व्यभिचार।। 
*
जीवन में प्रभु के लिए, रखें समर्पण-भाव।
भवसागर तारे यही, बनकर सुंदर नाव।। 
*
कंकर में शंकर मिले, शंकर में शमशान।
अंतरपट को स्वच्छ रख, पा जाएगा ज्ञान।। 
*
काल प्रवर्तित आज में, बदले रोज स्वरूप।
ढाई आखर छोड़कर, कुछ न रहा अनुरूप।। 
*
हमने उनसे आज तक, की केवल फरियाद।
और उन्हें लगता रहा, बातें हैं अपवाद।। 
*
हार हृदय की हार है, हार यथार्थ, अतीत।
हार मान ले हार जब, तब बेहतर हो जीत।। 
*
ठंडक इतनी बढ़ गयी, काँपे नित्य शरीर।
मौन हो गए सूर्य भी, कौन हरे अब पीर।। 
*
दिवा स्वप्न जैसी हुई, सुखद सुनहरी धूप।
आग, अँगीठी ही लगे, सुखमय दिव्य अनूप।।  
*
आभूषण निर्मित किया, स्वर्ण तपाकर आग।
स्वर्णकार गुरू तुल्य है, शिष्य विसर्जित भाग।।
*
दहन होलिका हो रहा, भेद हृदय में पाल।
समरसता को दफ्न कर, कौन यहाँ खुशहाल।।
*
उपकारक रख भावना, तरु से लें संज्ञान
खा पत्थर जिसने दिए, गैरों को उपदान।।
*
हाथों से प्रतिरूप पा, मन यह करे विचार।
मोल हमारा तब मिले, जब सुंदर आकार।।
*
हाथों के आक्षेप से, पायें सुखद स्वरूप।
गीली मिट्टी मन रहा, ज्ञान मिला बन धूप।।
*
कुंभकार के चाक का, किस्सा सुने तमाम।
पल में वह आकार दे, कल जो थे गुमनाम।।
*
नश्वर यह संसार है, नश्तर इसके ख्वाब।
चंद दिनों की जिंदगी, प्रेम सभी का आब।।
*
प्रेम हमारा तब प्रिये, हो सकता परिमेय।
जब अवगुंठन में कहीं, जाग उठा हो ध्येय।।
*
गीत, गजल है वाटिका, मन उसके हैं बंद।
आलिंगन करना सखे, तन मादक मकरंद
*
लूट रहा रस माधुरी, मधुकर चूम कपोल।
अनभिज्ञों के बाग में, करते विज्ञ किलोल।।
*
बाज़ बड़े जांबाज है, बाज़ न आते बाज।
जीते बाजी बाजकर, नहीं बहानेबाज।।
*
दिन अच्छे उनके हुए, जो हैं सदा समीप।
बाकी तो बस ढूढ़ते, फोड़-फोड़ के सीप।।
*
धीरे-धीरे हो रहा, रिश्तों में बिखराव।
दो जन का परिवार है, बाकी सिर्फ लगाव।।
*
बँटवारे के नाम से, भूल न जाना क्षेम।।
आँगन में दीवार पर, रखना दिल में प्रेम।
*
मिट्टी की इस देह से, खूब रहा अनुराग।
साँसें जब तक दोस्ती, टूट गई तब आग।।
*
अगर-मगर में क्यों प्रिये, जीवन रही गुजार।
जब तक साँसें चल रही, तब तक यह संसार।।
*
अब कहने को है कहाँ, तुमसे दिल की बात।
अहसासें शय्या पड़ी, सुप्त हुए जज्बात।।
*
हम-तुम दोनों ठीक थे,बहके थे जज्बात।
ढूँढ रहा हूँ आज भी, नगमों वाली रात।।
*
कथनी-करनी पर मुझे, खूब मिला उपदेश।
वही हलाहल धारता, जिसका नाम उमेश।।
*
शीत ऋतु ने दे दिया, घना कोहरा, ओस।
सर्दी के कारण हुआ, तरल जलाशय ठोस।।
*
सिमट गए सब आज में, कल जो रहे प्रकीर्ण।।
इस विस्तृत संसार की, सोच हुई संकीर्ण।
*
आशाओं के बीज से, निकले है कुछ खार।
हम तो भूखे रह गये, खुश होता संसार।।
*
जीवन पथ को कर्म से,सुगम करें हर राह।
माँ गंगा देती प्रिये, सबको सुखद पनाह।।
*
धीरे-धीरे सुख रहा, माँ गंगे की पाट।
मौजूदा हालात में,कूड़ा कचरा घाट।।
*
गंगा नद सा नद नहीं, ना गंगे सा नीर।
दर्जा पाया मातु का,फिर भी गंदे तीर।।
*
करते गंगा आरती, लेकर मन संताप।
मन मैला धोये नहीं, कहाँ मिटेगें पाप।।
*
ज्ञान बाँटते आजकल, माँ गंगे पर लोग।
सिर्फ दिखावा प्रेम या, करते है अनुयोग।।
*
माता माता सब कहे, सबकी सुनती बात।
कब कूड़े से आम जन,देंगे इन्हें निजात।।
*
जीवन पा निर्जीव रहे, मृत्यु मिला तब ज्ञान।
माते तेरी घाट पर, सच का सबको भान।।
*
साफ-सफाई को अगर, समझेंगे हम युद्ध।।
मिलकर कोशिश गर करें, माँ होयेंगी शुद्ध।
*
धीरे-धीरे हो रही, माँ गंगे अब दूर।
दोष समय का नहीं है, मनुज-दोष भरपूर।।
*
कर्म-कांड सह अर्चना,सब में गंगा-नीर।
पर कोई समझे नहीं, माँ गंगे की पीर।।
*
पेट भरे, झोली भरे, अगिन मिटाये रोग।
माँ गंगे की नीर से, जीते कितने लोग
*
मने दिवाली धूम से, होंठ सजे मुस्कान।
जले दीप, न हृदय जले, इसका रखना ध्यान
*
गले लगाएँ प्रेम से, भूल सभी प्रतिवाद।
झूमर, झाँझर, झाँझरी, झूम करे संवाद
*
जली हुई हर वर्तिका, देती यह संदेश।।
दीप जलाता आत्म को, रौशन करता देश
*
पूजन-अर्चन से सदा, सफल हुआ हर काम।
रौशन मन-मंदिर करे, प्रेम अगर निष्काम।।
*
अमन शांति का पाठ है, खुशियाँ मिले तमाम।
एक दीप रौशन करें, नित शहीद के नाम।।
*
अस्थि विसर्जित कर मुझे, दो माते का संग।।
करे दिवंगत लालसा, अंतिम दर्शन गंग।
*
रंग-बिरंगे रंग है, क्यों मन रखे सफेद।
कण-कण है रंगीन जब, क्यों रखता आच्छेद।।
*
पर्वत भी राई बने, अगर हृदय ले ठान।
कोशिश से इस जगत में,बनते लोग महान।।
*
तुम टेसू के फूल सम, मैं स्वाति की बूँद।
जग जाहिर है प्रेम क्यों, चलते आँखें मूँद।।
*
रिश्तों में दीवार है, पर अपनों की खोज।
यही सिलसिला चल रहा, वर्षों से हर रोज।।
*
एक-एक मत कीमती, खोले सबकी पोल।

संवैधानिक धर्म को, मत रुपये से तोल।। १००
*
उदयभानु तिवारी 'मधुकर'










आत्मज: स्व. गिरिजा बाई-स्व. लखनलाल तिवारी
जीवन संगिनी: स्व. वंदना तिवारी। 
जन्म१८.८.१९४६, बरही, जिला कटनी
शिक्षा​: डिप्लोमा सिविल इंजी., डी.एच.एम.एस., आयुर्वेद रत्न
​संप्रति:​ सेवानिवृत्त उपअभियंता, जल संसाधन विभाग मध्य प्रदेश।

​​विधा: दोहा, चौपाई, सवैया, सोरठा आदि छंद
प्रकाशित: गीता मानस (श्रीमद्भगवद्गीता काव्यानुवाद), महारानी दुर्गावती काव्यगाथा।   
संपर्क:  फ्लैट क्र. ५०१, दत्त एवेन्यू, नेपियर टाउन जबलपुर ४८२००१। चलभाष: ९४२४३२३२९७  ईमेल: dr.u.b.tiwari1946@gmail.com।     

दोहा शतक 
महारास लीला 

बोले श्री शुकदेव जी, राजन! हरि मृदु बैन
सुन सखियाँ प्रमुदित हुईं, मन को आया चैन
*
सुंदरता निधि संग से, हुआ मनोरथ पूर्ण   
परस करें प्रिय को हुईं, सर्व सखी संपूर्ण    
*
कृष्ण सेविका गोपियाँ, और प्रेयसी संग   
गलबहियाँ डाले खड़ीं, हिय उठ रही तरंग   
*
सखिरत्नों के संग में, गोपेश्वर भगवान  
रमणा रेती पर रचा, रास नृत्य अभियान   
*
हर दो गोपी मध्य हरि, बाँह गले में डाल  
प्रगटे, रहे रहस्यमय, गोपी हुईं निहाल  
*
यद्यपि प्रगटे कृष्ण जी, सखि-संख्या अनुरूप   
सब सखियों को दिख रहा, केवल एक स्वरूप।।  
*
सखियों के मन में यही, होता था आभास  
उनके प्यारे कृष्ण हैं, केवल उनके पास।।   
*
हुए सहस्त्रों गोपियों, मध्य सुशोभित श्याम   
रासबिहारी ने किया, दिव्य रास आयाम।।   
*
सुर-यानों की लग गई, नभमंडल में भीर 
निज देवी सँग देवगण, प्रकटे दिव्य शरीर।।  
*
रासोत्सव को देखने, नैना हुए अधीर  
मन उनके वश था नहीं, बने देव कुछ कीर।।  
*
लता, हिरण, हिरणी बने, कुछ सुर पक्षी वृंद 
बजीं दुंदुभी स्वर्ग की, उमगा हिय आनंद।। 
*
देव पुष्प-वर्षा करें, छिड़ा मधुर संगीत 
भार्या सह गंधर्व मिल, गाते मंगल गीत।। 
*
लगा कृष्ण सँग नाचने, सारा गोपी वृंद
करतल ध्वनियाँ गूँजतीं, छलक रहा आनंद।। 
*
कंगन, करधन, पायलें, करतीं छुन्नक छुन्न 
मंजीरे स्वर-ताल में, करते किन्नक किन्न।। 
*
अगणित सखि आभूषणों, की ध्वनि करे विभोर 
कृष्ण मुरलिया खींचती, अंतर्मन निज ओर 
*
स्वर्णाभित मणि मध्य मणि, नीली शोभावान 
ज्यों हों ब्रज-सखि मध्य में, शोभित कृपानिधान।। 
*
मगन सृष्टि के जीव सब, सुन मुरली की  तान  
सखि फिरकी सी घूमतीं, तन का भूला भान।।     
*
कभी पैर आगे धरें, फिर पीछे हो घूम  
झूम-झूम कर नाचतीं, लट बल खा कटि चूम।।
*
कभी नचातीं नैन वे, कभी चलातीं सैन 
करके तिरछी भौंह से, बोल रही थीं बैन।। 
*
पवन लटों सँग खेलती, झुमके चूमें गाल 
जब झूमें कुच द्वय हिले, पग द्वय देते ताल।।      
*
बूँदें झलकीं स्वेद की, मुखमंडल छवि नव्य  
थकीं गोपियाँ टिकाया, सिर हरि कन्धा भव्य।।  
*
जैसे जलनिधि में उठें, रह-रह नीर तरंग 
वैसे सखियों के हृदय, उठती नृत्य उमंग।। 
*
टूट-टूट गजरे झरें, बिखरी सुमन-सुगंध 
रस लोभी भँवरे उड़ें, छूटें नीवी बंध।।    
*
श्याम घटायें चाँद पर, छाकर चमकें आप   
गालों पर छा केश लट, देतीं मद्धम थाप।।             
*
अधर मधुर मुस्कान भर, देखें हरि की ओर 
ज्यों रजनी में चाँद को, अपलक लखे चकोर।। 
*
नृत्यलीन गोपाल जी, लगते घन सम श्याम 
गोरी सखियाँ दामिनी, सोहें रजनी-याम।। 
*
गोपी जीवन प्रेम है, कान्हा परमानंद 
मोहे खग, नर, नाग सब, फैला सर्वानंद।। 
*
नृत्य गान में कृष्ण से, सट सखि पातीं हर्ष 
हुईं परम आनंदमय, पाकर कृष्ण स्पर्श।।  
*
वही राग अरु रागिनी, गान और स्वर, साज 
भक्ति-भाव रस से निकल,गूँज रहे हैं आज।। 
*
कृष्ण संग कुछ गा रहीं, ऊँचे स्वर में गीत 
उनके स्वर आलाप सुन, वाह करें मनमीत।। 
*
अन्य सखी का भी छिड़ा, ध्रुपद राग संगीत  
'वाह-वाह' श्री कृष्ण ने, कहा: 'लिया मन जीत।। 
*
एक सखी को नृत्य से, लगने लगी थकान 
कंगन, गजरे पड़ गये, ढीले रहा न भान।। 
*
वेणी से झरने लगे, बेला के मृदु फूल 
नृत्य गान में गिर गया, तन से खिसक दुकूल।। 
*
बगल खड़े श्रीकृष्ण की, सखि ने थामी बाँह 
एक अन्य को दे रखी, पहले ही निज  छाँह।। 
*
उनकी सुंदर बाँह थीं, दोनों चंदन युक्त     
वे सखियाँ भी हो गईं, प्रभु-सुगंध से सिक्त।। 
*
तन अरु मन पुलकित हुए, लपक बाँह लें चूम 
'मधुकर' जिनकी चाह में, भक्त रहे हैं झूम।। 
*
एक लीन थी नृत्य में, झूलें कुंडल लोल 
दर्शक रीझें देख छवि, सुंदर लगें कपोल।। 
*
उसने कृष्ण-कपोल से, सटा दिया निज गाल 
हरि ने मुख में पान दे, हुल्साया तत्काल।। 
*
नाच रही थी एक सखी, कर नूपुर झंकार 
थकी, बगल में थे खड़े, उसके प्राणाधार।। 
*
हरिके तन से टिक गई, फिर ले उनका हाथ 
निज कुच पर झट रख लिया, झुका लिया लज माथ।।  
*
राजन! मिला न लक्ष्मी, को वह परमानंद
जैसा सखियाँ पा रहीं, हरि के सँग स्वच्छंद।। 
*
लक्ष्मी जी से श्रेष्ठ है, सखियों का संयोग 
प्रेम तत्व रस पा रहीं, जिसका बने न योग।। 
*
हरि को प्रियतम रूप में, पाकर हो स्वच्छंद  
करने लगीं विहार सब, मुखरित होते छंद।।   
*
सारी सखियों के गले, पड़ी कृष्ण-कर-माल 
अद्भुत शोभा हो गई, उनकी हे महिपाल! 
*
सरसिज कुंडल कान में, लगते अति कमनीय 
घुँघराली लट गाल पर, झलक रहीं रमणीय।। 
*
सखि मुख मंडल पर चले, छलक स्वेद के बिंदु 
छटा निराली हो गई, हुआ मलिन ज्यों इंदु।।  
*
सब सखियाँ थीं नृत्य में, लीन कृष्ण के संग  
ध्वनि नूपुर, कंगन करें, चढ़ा रास-रस-रंग।। 
*
वेणी से बेला झरें, बिखरी सुमन सुगंध 
पुलिन मंच सुरभित हुआ, खुले केश के बंध।। 
*  
उस अदभुत स्वर-ताल में, मिला रहे निज राग 
झूम-झूम हर कली पर, मधुकर बने सुहाग।। 
*
परछाईं से खेलता, शिशु ज्यों रहित विकार 
वैसे सब सखि संग में, हरि करते खिलवार।।  
*
हृदय लगाते थे कभी, करते थे अंगस्पर्श 
तिरछी चितवन कर विहँस, उपजाते हिय हर्ष।। 
*
इस प्रकार हरि ने किया, सखियों संग विहार  
सुनो परीक्षित! देवगण, वह छवि रहे निहार।। 
*
हरि के अंगस्पर्श से, सखियाँ  हुईं निहाल 
केश खुले, तन पर नहीं, चोली सकीं सँभाल।। 
*
अस्त-व्यस्त गहने वसन, तन-सुधि जातीं भूल                 
मालाओं से गिर गए, टूट-टूटकर फूल।।
कृष्ण रास लीला निरख, भाव हुए हुए उन्मुक्त 
देवि स्वर्ग की  हो गईं, मिलन कामना युक्त।।  
*
दृश्य देख यह चंद्रमा, ग्रह, उपग्रह समुदाय 
हुए अचंभित छवि कहें, कह न सके निरुपाय।।
*
कृष्ण स्वयं में पूर्ण हैं, सुनो परीक्षित भूप 
तब भी जितनी गोपियाँ, उतने धरे स्वरूप।। 
*
श्रम कण झलके नृत्य से, बीती सारी रैन 
मनमोहन  मुख पोंछते, मूँदें सखियाँ नैन।। 
*
हरि करकमलस्पर्श से, तन की मिटी थकान 
आनंदित सखियाँ हुईं, खिली अधर मुस्कान।।  
*
सोने के कुण्डल ललित, रह-रह करें किलोल 
घुँघराली अलकावली, रहीं गाल पर डोल।। 
*
तिरछी चितवन से किया, सखियों ने सम्मान 
सब मिलकर करने लगीं, हरि-लीला गुण-गान।।  
*
थका हुआ गजराज ज्यों, सरित तीर कर भंग 
कर प्रवेश जल राशि में, खेले हथिनी संग।।   
*
वैसे वेदों से परे, गोपेश्वर अखिलेश  
सब सखियों के संग में, जल में करें प्रवेश।। 
*
सखि घर्षण से कृष्ण की, चिपट गई वन-माल 
वक्षस्थल से लग हुई, वह केशर सी लाल।। 
*
मन्नाते भौंरे उड़ें, ऐसा होता भान 
गाते हों गंधर्व ज्यों, बनवारी यश-गान।।  
*
जल-क्रीड़ा करने लगीं, सखियाँ हे भूपाल! 
हरि पर नीर उलीचतीं, हँसी न सकीं सँभाल।। 
*
चढ़े यान सुर ले रहे, हरि-लीला-आनंद 
बरसाते नभ से सुमन, गाते मनहर छंद।। 
*
इस प्रकार श्रीकृष्ण ने, जल में किया विहार 
ज्यों हथिनी के वृंद सँग, गज करता खिलवार।।  
*
सखियों, भौरों से घिरे, पूर्णकाम योगेश  
फिर यमुना जल से निकल, वन में करें प्रवेश।। 
*
दृश्य बड़ा रमणीय था, जल, थल में थे फूल    
सुमन सुगंध बिखेरती, चले पवन अनुकूल।।  
*
जैसे हथिनी वृंद सँग, वन विचरे गजराज  
वैसे ही हरि शोभते, सुनो परीक्षित राज।।      
*
शरद पूर्णिमा में हुईं, बहुत रात्रियाँ एक  
जिसका वर्णन आज तक, करते काव्य अनेक।।  
*
हुई रजत सी चाँदनी, शोभा अति कमनीय 
उपमा दे-दे कवि थके, वह छवि थी रमणीय।।  
*
उस रजनी में प्रेयसी, सखियों सँग भगवान 
चिन्मय लीला से करें, पूर्णकाम सज्ञान।।  
काम भाव अरु चेष्टा, कर हरि ने आधीन 
सब सखियों को कर लिया, बंशी धुन में लीन।। 
*
                 परीक्षित उवाच 
प्रश्न परीक्षित ने किया, हे भगवन शुकदेव! 
एकमात्र श्रीकृष्ण ही, हैं त्रिभुवन के देव।। 
*
निज अंशी बलराम सँग, हरने भुवि का भार 
धर्मस्थापन के लिए, लिया पूर्ण अवतार।। 
*
कृष्ण स्वयं में पूर्ण हैं, नहीं किसी की चाह 
सर्वात्मा भी हैं वही, कोई न पाए थाह।।     
*
मर्यादा अरु धर्म के, रक्षक श्री भगवान्  
स्वयं धर्म विपरीत क्यों, कर्म किया श्रीमान?  
*
पर नारी तन छू कहें, प्रभु क्यों तोड़ें आन? 
मम संदेह मिटाइये, विप्र देव! मतिमान।।   
*
                शुकदेव उवाच 

सुन राजन के ये वचन, बोले श्री शुकदेव 
ब्रम्हा, विष्णु, महेश हैं, त्रिभुवन के त्रय देव।।   
*
सूर्य, अग्नि अरु देवता, जो सब भाँति समर्थ 
जन-हित कारण धर्म से, रखें न कोई अर्थ।। 
*
इस साँसारिक कर्म से, उन्हें न लगता दोष 
ज्यों पावक सब भस्मकर, रहता है निर्दोष।। 
*
हरि के प्रति यह सोचना, भी है राजन पाप 
सूर्य अग्नि में व्याप्त है, जिनका प्रखर प्रताप।। 
*
निज माया संयोग से, धर कर भिन्न स्वरूप 
लीला करते कृष्ण जी, सुनो परीक्षित भूप! 
*
जहर हलाहल पी गए, शिव की शक्ति महान  
हो जाएगा भस्म नर, अन्य करे यदि पान।।
*
जिसमें है सामर्थ्य वह, रहता अहम विहीन 
स्वारथ नाता विश्व से, रखता नहीं प्रवीन।। 
*
दोष उन्हें लगता नहीं, जो कर्तत्वविहीन 
वे निमित्त सब कर्म में, रहें राग से हीन।।  
*
अचर,सचर सबमें वही, सर्वेश्वर भगवान 
मानव कर्मों से परे, उसकी सत्ता जान।। 
*
वे अविकारी ब्रम्ह हैं, धरे मनुज का रूप 
वही व्यक्त-अव्यक्त हैं, वे ही विश्व-स्वरूप।।    
*
जिनकी पद रज प्राप्त कर, मिले तृप्ति आनंद 
योग क्रिया से योगि जन, काटें भव के फंद।। 
*
तत्व रूप हों ज्ञानि जन, जिनका तत्व विचार 
कर्मबंध की कल्पना, उनकी है बेकार।। 
*  
जीवों पर करने कृपा, लेते हरि अवतार 
लीलाएँ लख भक्तगण, निज को देते वार।। 
*
वे ही आत्मा रूप में, सबमें रहे विराज 
गोप-गोपियों में वही, सुनो परीक्षित राज।। 
*
गोप देखते कृष्ण को, दोषबुद्धि से हीन 
उनको दिखतीं गोपियाँ, गृह कार्यों में लीन।। 
*
हरि की माया ही  उन्हें, करा रही आभास 
उनकी प्यारी पत्नियाँ, दिखतीं उन्हें सकाश।। 
*
ब्रम्ह रात्रिे सम हो गए, उस रजनी के याम 
भोर हुआ गोपी सभी, हरि भेजें ब्रज धाम।।  
*
सुनो परीक्षित! जो करे, रास नृत्य गुणगान 
अरु हरिलीला भक्त जो, श्रवण करे धर ध्यान।। 

परा भक्ति में कृष्ण की, वह होता संयुक्त 
फिर 'मधुकर' भवसिंधु से, हो जाता है मुक्त।।९९
***

कालीपद ‘प्रसाद’  

कालीपद प्रसाद के लिए इमेज परिणाम
  
जन्म: ०८/०७/१९४७, धोपादि, जिला खुलना (बांग्ला देश)
आत्मज: स्व. श्रीमती छाया रानी देवी-स्व. श्री महादेव मंडल
जीवन संगिनी: स्व. श्रीमती प्रभावती देवी   
शिक्षाबी.एससी., बी.एड, एम. एससी.(गणित); एम.ए.(अर्थशास्त्र)
संप्रति: अध्यापन राष्ट्रीय भारतीय सैन्य कालेज (आर.आई.एम.सी.) देहरादून, प्राचार्य केंद्रीय विद्यालय संगठन
प्रकाशन: शैक्षणिक लेख केंद्रीय विद्यालय संगठन पत्रिका में, Value Based Education” पुस्तक, काव्य संग्रह काव्य सौरभ, मुक्तक व काव्य संग्रह अँधेरे से उजाले की ओर, उपन्यास कल्याणी माँ, साझा- ‘गीतिका है मनोरम सभी के लिए’, साझा दोहा-मुक्तक संग्रह २०१७
उपलब्धि: गीतिका प्रदीप सम्मान
संपर्क: साईं सृष्टि,बी ५०२, खराडी, पुणे, महाराष्ट्र ४११०१४, ४०३,ज्योति मीडास,(राममंदिर) कोंडापुर,हैदराबाद -५०००८४ चलभाष:०९६५७९२७९३१ ; ईमेल: kalipadprasad@gmail.com

दोहा शतक 
एक दीप ऐसा जले, मन का तम हो दूर
अंतर्मन का तम मिटे, मिले ख़ुशी भरपूर
*
सबकी इच्छा पूर्ण हो, दैव योग परिव्याप्त
हँसी-ख़ुशी आनंद हो, ऋद्धि-सिद्धि हो प्राप्त
*
घट-घट में ईश्वर बसे, जैसे तन में श्वास
दिखा नहीं भगवान पर, जीवित है विश्वास
*
करूँ प्रार्थना-अर्चना, दिन में शत-शत बार
सजदा पूजा रस्म भी, स्वीकारो सरकार
*
‘काली’, दुर्गा, शक्ति या, विधि हरि भोलानाथ
रूप कई पर एक है, घट-घट में जगनाथ
*
अपनी ही आलोचना, मुक्ति प्राप्ति की राह
गलती देखे और की, जो ण गहे वह थाह
*
अगर क्षमा ही श्रेष्ठ है, जिद्दी क्यों है संत?
सभी लड़ाई व्यर्थ है, नहीं किसी का अंत
*
ईसाई हिन्दू यवन, नहीं किसी की भूमि
देव अवतरण भूमि है, करो नहीं बध-भूमि
*
सूद सहित है भोगना, तुझको तेरा कर्म
जाँच-परख कर फल मिले, समझ कर्म का मर्म
*
वाइज़ हो या साधु हो, रखें सभी यह याद
जो झगड़े हर कौम वह, हुई नष्ट-बर्बाद
*
राम नाम की बाँसुरी, करे राम मनुहार
जनता माँगे नौकरी, हो जीवन-आधार
*
जात-पांत की नीति से, राजनीति हो दूर
जातविहीन समाज हो, दीन न हो मजबूर
*
भड़काना जन-भावना, नेता का व्यापार
लूट-लूट कर खा गए, नहीं देश से प्यार
*
राजनीति व्यापार है, आश्वासन हथियार
पार्टी सभी दलाल है, अद्वितीय बाज़ार
*
सीधी-साधी बात है, नहीं मानते यार
सच्चे की तारीफ़ कर, खुदगर्जी को मार
*
निर्वाचन का है समय, उछला तीन तलाक
पका न इसको सकेगा, होगा यह गुरु पाक
*
नहीं सत्य को बताना, जनता हो न सचेत
वोट बैंक का स्रोत है, वोटर रहे अचेत
*
केर-बेर का संग है, मिले स्वार्थ वश हाथ
हाथी चलता है अलग, जनता किसके साथ
*
एक बार फिर राम जी, नाव लगा दो पार
यू. पी. में सरकार दो, मंदिर हो तैयार
*
झूठ नहीं हम बोलते, पार्टी है मजबूर
हमें करो विजयी अगर, बाधा होगी दूर
*
रोकी सुप्रीम कोर्ट ने, जाती-धर्म की खोट
कुछ आधार कुछ बचा नहीं, कैसे माँगें वोट
*
तुम ही हो माता-पिता, भगिनी-भ्राता यार
साम दाम या भेद से, ले जाओ उस पार
*
मंदिर ज़िंदा जीत है, मृत मुद्दा है हार
राम राम जपते रहो, होगा बेड़ा पार
*
हरा-भरा यह देश है, भारत जिसका नाम
सुन्दर है मेरा वतन, अमर यही है धाम
*
अरुणाचल से कच्छ तक, फैला है यह देश
उत्तर-हिम पर्वत खड़ा, दख्खिन सिंहल देश
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गंगा जमुना दरमियाँ, रिश्ते सालों-साल
धर्म-धर्म में एकता, सचमुच बड़ा कमाल
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सरहद पर तैनात हैं, भारत माँ के लाल
चुटकी में कर व्यर्थ दें, सभी शत्रु की चाल
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चीन पाक दोनों अभी, बने स्वार्थ-वश मित्र
जल्दी होंगे दूर फिर, दोनों घृणित चरित्र
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काम, क्रोध, मद, लोभ औ, अहंकार दे त्याग
हिंसा ईर्ष्या मोह का, सदा उचित परित्याग
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प्रीत स्नेह अनुराग हो, घर-घर में हो प्यार
कोई हो नाराज तो, करो प्रेम मनुहार
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भ्रश्ताचत समाप्त हो, बंद पापमय कर्म
सत्य अहिंसा व्याप्त हो, सब पालें निज धर्म
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नौ दुर्गा नौ रात्रि में, चन्दन फूल कपूर
माँ की सज्जा पूर्ण कर, माँग भरें सिंदूर
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विजयादशमी में गमन, होता है हर वर्ष
आनेवाले साल तक, मैया देना हर्ष
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विनती इतनी मान लो, हो मेरा उत्कर्ष
इंतज़ार पलकें बिछा, करून मातु प्रति वर्ष
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समावेश है शक्ति का, दुर्ग सिद्धि है नाम
करें सफल हर काम में, कभी न बिगड़े काम
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ईर्ष्या तृष्णा वृत्ति जो, उन सबका हो नाश
नष्ट न होती साधुता, रहता सत्य अनाश
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भक्ति शक्ति माँगे सभी, माँगे आशीर्वाद
कष्ट हरो इस जन्म का, सुन माँ अंतर्नाद
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अर्ज करो भगवान से, वे हैं कृपा निधान
सफ़ल करें हर काम को, सबको देकर ज्ञान
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विद्यालय जाते न क्यों, आओ मेरे पास
विकसित करना बुद्धि को, छोडो मत तुम आस
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अंक-वर्ण परिचय प्रथम, बाकी उसके बाद
याद करो गिनती सही, होगे तुम नाबाद
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पढ़ो लिखो आगे बढ़ो, करो देश का नाम
पढ़ लिख कर सब योग्य बन, करना दुष्कर काम
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कभी नष्ट होती नहीं, विद्या ले तू जान
अनपढ़ लोगों के लिए, दुर्लभ होता ज्ञान
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मौन साध बातें करो, मन की गाँठें खोल
सुनता रब बातें वही, होतीं जो अनबोल
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आत्म-तत्व का ज्ञान ही, आता सबके काम
गूढ़ तत्व सब जान के, मन होता निष्काम
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वचन-कर्म में संतुलन, करता भय से मुक्त
मिथ्या भाषी हों सदा, खुद ही भय से युक्त
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न्यायालय पर भी पड़ी, राजनीति की शिकार
सरकारों के स्वार्थ-हित, न्याय हुआ लाचार
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दिखे नहीं अन्याय तो, इसे कहे जग न्याय
हुई न्याय में देर तो, हो जाता अन्याय
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बेचो मत ईमान को, खुद का है अपकर्ष
न्यायालय सम्मान में, सबका है उत्कर्ष
जाति धर्म की शान में, बख्श बाल की जान
बच्चे तो मासूम हैं, वो क्यों बने निशान?
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उनकी है यह घोषणा, सुनो खोलकर कान
पद्मावत गर देखना, जाओ पाकिस्तान
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सभी देश के भक्त को, साबित करना भक्ति
पद्मावत प्रतिरोध में, तनिक ण हो आसक्ति
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राजतंत्र चुपचाप है, सबके मुँह में बर्फ
वोट बैंक की नीति है, मुँह से गायब हर्फ
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भाव-भक्ति की भूख है, नहीं चाहिए दान
भक्ति बिना कुछ भी नहीं, लेते हैं भगवान
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भिक्षुक हैं सारा जगत, दाता हैं भगवान
दाता कब मुहताज से, लेता है कुछ दान
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वृथा सभी धन-दान है, है फ़िज़ूल हर खर्च
जिसके संग श्रृद्धा न हो, मंदिर मस्जिद चर्च
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श्रद्धा से ही रब मिले, कौरव सका न मोल
विदुर अन्न सादा सरल, शाक भात अनमोल
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पैसा है तो मोल लो, टका सेर है न्याय
इसको मानो मत कभी, दीनों पर अन्याय
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तू तो छूटा कालिया, तुझ पर भी इलज़ाम
मुझसे कहे वकील अब, जल्दी दे दो दाम
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टू जी में सब मुक्त हैं, हमको भी थी आस
झूठ सभी इलज़ाम हैं, कौन चरेगा घास
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समझौता है जिंदगी, जान मध्य यह मार्ग 
चन्दा में भी दाग है, कोई नहीं अदाग
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समझौते में शांति है, छोड़ हठीले क्लेश
हठ से कुछ मिलता नहीं, बढ़ता केवल द्वेष
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जीवन जैसा है मिला, उसे करो स्वीकार
दोष हुनर आधार पर, अब न करो इन्कार
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सिंधु सदृश संसार है, गहरा पाराबार
यह जिंदगी है  नाव सम, जाना सागर पार
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मिटटी का मानव बना, मिटटी का भगवान
कंकड़-पत्थर जोड़कर, कौन हुआ धनवान
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क्यों है अपराधीकरण, राजनीति नासूर
रुकता अब तक क्यों नहीं, वजह प्रशासन सूर
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टिकट दागियों को न दो, बंद करो सब द्वार
दागी को दल में न लो, मिटे भ्रष्ट आचार
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बंद करें सब पार्टियाँ, अपराधी हित द्वार
जिस दल में दागी रहें, मतदाता दे हार
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आँखे रख अंधा न बन, आँख खोल कर देख
कौन चोर डाकू यहाँ, सबका खता लेख
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अपराधी अब हो गए, भारत के करतार
चौतरफ़ा कर रहे हैं, सबका बंटाधार
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स्वार्थ कील में हैं फँसे, नेता साधू संत
सीधा-सादा मामला, किन्तु नहीं है अंत
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राम कृष्ण दुर्गा कभी, शंकर तारणहार
जिसके दल ईश्वर नहीं, उसका बंटाधार
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जुमले बाज़ी रात-दिन, लूट लिया सुख-चैन
कब किस पर बिजली गिरे, किस पर होगा बैन
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उनको नहीं पसंद है, भारत का इतिहास
बात-बात आलोचना, करते हैं उपहास
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कठिन डगर गुजरात की, नेता सब बेचैन
गली-गली मारे फिरे, चैन नहीं दिन रैन
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ओज नहीं अब बात में, बोले कडुआ बोल
नोट बंद की नीति को, झूठ कहे अनमोल
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हिंदीभाषी! सीखिए, दक्खिन भाषा एक
अदला-बदली सोच की, हो प्रयत्न तब नेक
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उत्तर भारत में पढ़ें, तमिल-तेलुगु छात्र
केरल में पढ़ बिहारी, हों भारत के मात्र
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छोडो भाषा द्वन्द को, बनो न अब अनुदार
सब भाषा की श्रेष्ठता, हिन्दी को उपहार
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भावी पीढ़ी चाहती, आस-पास हो स्वच्छ
निर्मल हो भारत सकल, अरुणाचल से कच्छ
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हवा नीर सब स्वच्छ हो, मिटटी हो निर्दोष
अग्नि और आकाश भी, करे आत्म आघोष
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नदी पेड़ गिरि वादियाँ, विचरण करते शेर
हिरण सिंह वृक तेंदुआ, जंगल भरा बटेर
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पाखी का कलरव जहाँ, करते नृत्य मयूर
अनुपम दृश्य निहार कर, है मदहोशित ऊर
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सागर की लहरें उठी, छूना चाहे चाँद
खूबसूरती सृष्टि की, भाव रूप आबाद
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मानव जीवन में सदा, कोशिश अच्छा कर्म
मात-पिता सेवा यहाँ, सदा श्रेष्ठ है धर्म
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कर्म, नहीं प्रारब्ध है, भाग्य बनाता कर्म
पाप-पुण्य होता नहीं, जान कर्म का मर्म
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आग छुएगा हाथ से, क्या होगा अंजाम
सभी कर्म फल भोगते, पाप-पुण्य दे नाम
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बुरे काम का जो असर, उसे जान तू पाप
नेक कर्म का पुण्य-फल, करे दूर संताप
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जीवन का यह राज है, शांति ख़ुशी की चाह
सुखानंद की खोज में, सतत खोजते राह
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संयम जैसा तप नहीं, शान्ति सदृश संयोग
तृष्णा से बढ़कर नहीं, जग में कोई रोग
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सत्य अहिंसा मार्ग है, शांति-सौख्य आरंभ
निर्मल मन में शांति जब, गायब मन का दंभ
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बसे बीच संतोष-सुख, बने वासना रोग
योगी करता त्याग है, भोगी करता भोग
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बीत गई है जिंदगी, ख़त्म हुई जग राह
देखो परखो जाँच लो, पग होते गुमराह
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प्रेम प्रीति है शान्ति पथ, बैरी हिंसा द्वेष
गीता, कुरान, धम्मपद, देते सीख विशेष
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नाम, रूप, सब शास्त्र हैं, हैं विधान कुछ भिन्न
चन्द्र सूर्य भू हैं वही, देते बारिश-अन्न
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जीवन की सब सिद्धि का, सूत्र धर्म है काम
मुँह में राम सदैव हो, हाथों में हों दाम
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सदा सिखाती गलतियाँ, बिना फीस दें सीख
बिन माँगे चेतावनी, माँगे मिले न भीख
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बार-बार गलती नहीं, की जाती है माफ़
सम्हाले-सुधारे यदि नहीं, गिरे भाग्य का ग्राफ
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कुआँ खोद पानी पिए, उद्यम पर अधिकार
ऐसे नर करते नहीं, बारिष की मनुहार
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उद्यम हिम्मत हौसला, जिसमें है भरपूर
मुश्किल क्या उसके लिए, लक्ष्य नहीं है दूर
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करें मोक्ष हित साधना, दुनिया में सब लोग
योग कर्म देते भुला, अगर सामने भोग
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मोहक कंचन-कामिनी, मिथ्या माया-मोह
सोच-समझ पा सत्य को, किया बुद्ध ने द्रोह। १००
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