सोमवार, 29 अप्रैल 2013

बाङ्ग्ला-हिंदी सेतु : स्वप्नहीन दिनेर वेदना मानवेंदु राय हिंदी काव्यानुवाद हिंदी काव्यानुवाद

बाङ्ग्ला-हिंदी  सेतु :

स्वप्नहीन दिनेर वेदना

मानवेंदु राय

*

सबुज सकाल एसे कड़ा नाड़े

दरजाय  आलोर आंगुल।

चोख तुले देखे निइ-ए

जीबने कतटुकु भुल?

आर कतटुकु क्षति

स्वप्नहीन दिनेर बेदना

मानुषेर निसर्गेर काछे

जमा जतटुकु देना-

शोध करे चले जाबो

अनंत जात्रार पथे,

जे पथे रयेछे पड़े

अप्सरीदेर कालो चुल,

बेदना रांगानो सादा खई,

बिबर्ण तामार मुद्रा

पापडि  छेंडा  एकटि दु टि

शीर्ण जुइ फूल।

***

हिंदी काव्यानुवाद

संजीव 'सलिल'

*

सबह किरण सांकल खटकाती

जब द्वारे की ओट से।

भूल-हानि कितनी जीवन में

देखूं आँखें खोल के।

मैं बेस्वप्न दिवस की पीड़ा

कर निसर्ग के पास जमा-

अप्सराओं के कृष्ण-केश से

पथ अनंत तक जाऊँ चला।

पीड़ा सहकर है सफ़ेद या

रंगरहित ताम्बे की मुद्रा

या है फूल जूही का कोमल

जिसकी पंखुड़ियों को कुचला।

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