दिव्य नर्मदा : हिंदी तथा अन्य भाषाओँ के मध्य साहित्यिक-सांस्कृतिक-सामाजिक संपर्क हेतु रचना सेतु A plateform for literal, social, cultural and spiritual creative works. Bridges gap between HINDI and other languages, literature and other forms of expression.
कुल पेज दृश्य
रविवार, 31 दिसंबर 2017
haiku
दोहा दुनिया
शिव शुभ कर हरते अशुभ,
भोले रहते शांत.
शंकर शंका मिटा दें,
बम विश्वास प्रशांत.
.
निन्गा कहते पिंड से,
उपजे सारी सृष्टि.
बसे-लीन हो अंड में,
देखे सात्विक दृष्टि.
.
घट भीतर आकाश है,
घट बाहर आकाश.
बड़ादेव सर्वत्र हैं,
भज कट जाएँ पाश.
.
महादेव को पूजते,
सुर नर असुर हमेश.
शशि हैं शोभित शीश पर,
दीपक बने दिनेश.
.
मोह वासना लोभ की,
त्रिपुरी करते नष्ट.
त्रिपुरारी निज भक्त के,
पल में हरते कष्ट.
.
काम जीत कामारि हैं,
चंद्र-नाथ सोमेश.
नाग-इष्ट नागेश प्रभु,
गगन-व्याप्त व्योमेश.
.
उमा विवाहीं मिल गई,
संग्या नई उमेश.
हो सतीश प्रिय सती के,
भव-तारें भुवनेश.
...
31.12.2017
शनिवार, 30 दिसंबर 2017
samyika alha
*
मचा महाभारत भारत में, जन-गण देखें ताली पीट
दहशत में हैं सारे नेता, कैसे बचे पुरानी सीट?
.
हुई नोटबंदी, पैरों के नीचे, रही न हाय जमीन
कौन बचाए इस मोदी से?, नींद निठुर ने ली है छीन
.
पल भर चैन न लेता है खुद, दुनिया भर में करता धूम
कहे 'भाइयों-बहनों' जब भी, तभी सफलता लेता चूम
.
कहाँ गए वे मौनी बाबा?, घपलों-घोटालों का राज
मनमानी कर जोड़ी दौलत, घूस बटोरी तजकर लाज
.
हाय-हाय हैं कैसे दुर्दिन?, छापा पड़ता सुबहो-शाम
चाल न कोई काम आ रही, जब्त हुआ सब धन बेदाम
.
जनधन खातों में डाला था, रूपया- पीट रहे अब माथ
स्वर्ण ख़रीदा जाँच हो रही, बैठ रहा दिल खाली हाथ
.
पत्थर फेंक करेगा दंगा, कौन बिना धन? पिट रइ गोट
नकली नोट न रहे काम के, रोज पड़े चोटों पर चोट
.
ताले तोड़ आयकरवाले, खाते-बही कर रहे जब्त
कर चोरी की पोल खोलते, रिश्वत लेंय न कैसी खब्त?
.
बेनामी संपत्ति बची थी, उस पर ली है नजर जमाय
हाय! राम जी-भोले बाबा, हनुमत कहूँ न राह दिखाय
.
छोटे नोट दबाये हमीं ने, जनता को है बेहद कष्ट
चूं न कर रहा फिर भी कोई, समय हो रहा चाहे नष्ट
.
लगे कतारों में हैं फिर भी, कहते नीति यही है ठीक
शायर सिंह सपूत वही जो, तजे पुरानी गढ़ नव लीक
.
पटा लिया कुछ अख़बारों को, चैनल भरमाते हैं खूब
दोष न माने फिर भी जनता, लुटिया रही पाप की डूब
.
चचा-भतीजे आपस में भिड़, मोदी को करते मजबूत
बंद बोलती माया की भी, ममता को है कष्ट अकूत
.
पाला बदल नितिश ने मारा, दाँव न लालू जाने काट
बोल थके है राहुल भैया, खड़ी हुई मैया की खाट
.
जो मैनेजर ललचाये थे, उन पर भी गिरती है गाज
फारुख अब्दुल्ला बौराया, कमुनिस्टों का बिगड़ा काज
.
भूमि-भवन के भाव गिर रहे, धरे हाथ पर हाथ सुनार
चाहा करें तीन के तेरह, हुए सिर्फ दो खाते खार
.
सेठ अफसरों नेताओं के ठाठ, न बाकी- फँसे दलाल
.रो-रो सूख रहे हैं आँसू, पिचक गए हैं फूले गाल
.
जनता जय-जयकार कर रही, मोदी लिखे नया इतिहास मन मसोस दिन-रात रो रहे, घूसखोर सब पाकर त्रास
**
geet
*
सत्रह साला
सदी हुई यह
*
सपनीली आँखों में आँसू
छेड़ें-रेपें हरदिन धाँसू
बहू कोशिशी झुलस-जल रही
बाधा दियासलाई सासू
कैरोसीन ननदिया की जय
माँग-दाँव पर
लगी हुई सह
सत्रह साला
सदी हुई यह
*
मालिक फटेहाल बेचारा
नौकर का है वारा-न्यारा
जीना ही दुश्वार हुआ है
विधि ने अपनों को ही मारा
नैतिकता का पल-पल है क्षय
भाँग चाशनी
पगी हुई कह
सत्रह साला
सदी हुई यह
*
रीत पुरातन ज्यों की त्यों है
मत पूछो कैसी है?, क्यों है?
कहीं बोलता है सन्नाटा
कहीं चुप्प बैठी चिल्ल-पों है
अँधियारे की दीवाली में
ज्योति-कालिमा
सगी हुई ढह
सत्रह साला
सदी हुई यह
*
navgeet
*
न मैं सुधरूँ
न तुम सुधरो
कहो हो साल शुभ कैसे?
*
वही रफ़्तार बेढंगी
जो पहले थी, सो अब भी है
दिशा बदले न गति बदले
निकट हो लक्ष्य फिर कैसे?
न मैं सुधरूँ
न तुम सुधरो
कहो हो साल शुभ कैसे?
*
हरेक चेहरा है दोरंगी
न मेहनत है, न निष्ठा है
कहें कुछ और कर कुछ और
अमिय हो फिर गरल कैसे?
न मैं सुधरूँ
न तुम सुधरो
कहो हो साल शुभ कैसे?
*
हुई सद्भाव की तंगी
छुरी बाजू में मुख में राम
धुआँ-हल्ला दसों दिश है
कहीं हो अमन फिर कैसे?
न मैं सुधरूँ
न तुम सुधरो
कहो हो साल शुभ कैसे?
***
yaksha prashna 1
*
कहते हैं 'जो ब्रम्ह को जानता है वही ब्राम्हण होता है.'
ब्राम्हण सभाओं में कितने ब्राम्हण हैं?
क्या वे अन्यों को ब्रम्ह का ज्ञान कर ब्राम्हण बनाने में समर्थ और इच्छुक हैं?
यदि नहीं तो जन्मना जातिवाद की दुहाई देकर सनातन धर्मी समाज को विभाजित करना अनुचित नहीं है क्या?
***
आपके उत्तर की प्रतीक्षा है.
दोहा दुनिया
शिव रमते हैं भाव में,
शिव में रमता भाव.
शिवा चाह हैं, चाव हैं,
शून्य अभाव प्रभाव.
.
जटा-जूट शिव-शीश पर,
शोभित अगणित व्याल.
सोम संग अमृत-गरल,
चंदन चर्चित भाल.
.
शिव अपने में लीन हैं,
कहता विश्व समाधि.
जो जन शिव में लीन हो,
मिटती उसकी व्याधि.
.
शिव पर्वत-आकार हैं,
नभ-शशि शिखरासीन.
तरु-जड़ जटा, सलिल निरख,
वृषभ-सर्प तल्लीन.
.
दावानल शिव-कोप सा,
रौद्र रूप विकराल.
आँधी-तूफ़ां भयंकर,
मानो आया काल.
.
शान्त-स्निग्ध वातावरण,
ज्यों शिव परम प्रसन्न.
रुद्र अक्ष श्यामल छटा,
सुख-मंगल आसन्न.
.
आतप-वर्षा-शीत त्रय,
शूल हुए शिव-मीत.
दसों दिशाएँ निनादित,
कर डमरू से प्रीत.
.
सुमन सु-मन तितली भ्रमर,
पवन प्रवह दे शांति.
पर्वत-तनया सुंदरी,
प्रगटी ले शुचि कांति.
.
मन-मयूर शोभा निरख,
कार्तिक में कर नृत्य.
गज-मुख गणपति संग हो,
करे अलौकिक कृत्य.
.
शिवा प्रकृति, शिव मूल हैं,
जड़-चेतन संयुक्त.
सह जीवन ही पूर्णता,
होते शून्य वियुक्त.
.
शक्तिवान शिव तभी जब,
शक्ति नहीं हों दूर.
शक्ति ने अपने आपमें
पूर्ण- कहे जो सूर
...
30.12.2017
शुक्रवार, 29 दिसंबर 2017
om prakash yati
अभियंता कवि ओमप्रकाश यति संस्कारधानी में
laghukathaa
लघुकथा:
करनी-भरनी
*
अभियांत्रिकी महाविद्यालय में परीक्षा का पर्यवेक्षण करते हुए शौचालयों में पुस्तकों के पृष्ठ देखकर मन विचलित होने लगा। अपना विद्यार्थी काल में पुस्तकों पर आवरण चढ़ाना, मँहगी पुस्तकों की प्रति तैयार कर पढ़ना, पुस्तकों में पहचान पर्ची रखना ताकि पन्ने न मोड़ना पड़े, वरिष्ठ छात्रों से आधी कीमत पर पुस्तकें खरीदना, पढ़ाई कर लेने पर अगले साल कनिष्ठ छात्रों को आधी कीमत पर बेच अगले साल की पुस्तकें खरीदना, पुस्तकालय में बैठकर नोट्स बनाना, आजीवन पुस्तकों में सरस्वती का वास मानकर खोलने के पूर्व नमन करना, धोखे से पैर लग जाए तो खुद से अपराध हुआ मानकर क्षमाप्रार्थना करना आदि याद हो आया।
नयी खरीदी पुस्तकों के पन्ने बेरहमी से फाड़ना, उन्हें शौच पात्रों में फेंक देना, पैरों तले रौंदना क्या यही आधुनिकता और प्रगतिशीलता है?
रंगे हाथों पकड़ेजानेवालों की जुबां पर गिड़गड़ाने के शब्द पर आँखों में कहीं पछतावे की झलक नहीं देखकर स्तब्ध हूँ। प्राध्यापकों और प्राचार्य से चर्चा में उन्हें इसकी अनदेखी करते देखकर कुछ कहते नहीं बनता। उनके अनुसार वे रोकें या पकड़ें तो उन्हें जनप्रतिनिधियों, अधिकारियों या गुंडों से धमकी भरे संदेशों और विद्यार्थियों के दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ता है। तब कोई साथ नहीं देता। किसी तरह परीक्षा समाप्त हो तो जान बचे। उपाधि पा भी लें तो क्या, न ज्ञान होगा न आजीविका मिलेगी, जैसा कर रहे हैं वैसा ही भरेंगे।
***
दोहा दुनिया
शिव कलकल जलधार हैं,
डिमडिम डमरू-नाद.
शिव मन-घटता मौन हैं,
शिव सत् से संवाद.
.
कंठ काल से अलंकृत,
महाकाल हैं आप.
शिव विराटतम सूक्ष्मतम,
नाप न कोई माप.
.
शिव नयनों में इंदु हैं.
इंदु बिंदु का धाम.
इंदुमुखी मुस्का रहीं,
करता जगत प्रणाम.
.
शिव नयनों में शिवा के,
देख सकेगा कौन?
पलक मूँद छवि लें छिपा,
धुनी रमाए मौन.
.
लीला करते लास की,
हास अधर पर मंद.
एक दूसरे के लिए,
सुमन और मकरंद.
.
कांत कांति की कल्पना,
कांता को आमोद.
सलिल-धार में सत्यजित,
बिंब बढाए प्रमोद.
.
अर्णव अरुण अछिन-अगिन,
शिव अपरोक्ष अतीत.
शिवा अजीती अबीती,
अभिनव-पुरा प्रतीत.
.
पलक झपकते बीतते,
पल दिन युग कल्पान्त.
विनत जीव संजीव जी,
मन्वन्तर विक्रांत.
.
साध ने साधन, साधना
ही काटे भव-पाश.
पैर जमा कर जमीं पर,
भक्त छुए आकाश.
...
29.12.2017
गुरुवार, 28 दिसंबर 2017
samiksha
🔰 कृति चर्चा:'कशमकश' मन में झाँकती कविताएँ
नहीं,
मेरी ज़िन्दगी
तुमसे शुरू होकर
तुमपर ख़त्म नहीं होती....
... हाँ
मेरी ज़िंदगी
मुझसे शरू होती है
और ख़त्म वहीं होगी
जहाँ मैं चाहूँगी ...
स्त्री विमर्श के नाम पर अपने पारिवारिक दायित्वों से पलायन कर कृत्रिम हाय-तोबा और नकली आंसुओं से लबालब कविता करने के स्थान पर कवयित्री संक्षेप में अपने अस्तित्व और अस्मिता को सर्वोच्च मानते हुए कहती है-
अब बस
आज मैं घोषित करती हूँ
तुम्हें
एक आम आदमी
गलतियों का पुतला
और खुद को
पत्नी परमेश्वर
ये कविताएँ हवाई कल्पना जगत से नहीं आईं है। इन्हें यथार्थ के ठोस धरातल पर रचा गया है। स्वयं कवयित्री के शब्दों में-
मेरी कविता का
कचरा बीनता बच्चा
बूट पोलिश करता लड़का
संघर्ष करती लड़की
हाशिए पर खड़े लोग
कोइ काल्पनिक पात्र नहीं
दरअसल
मेरे भीतर का आसमान है
आशावाद श्रुति की कविताओं में खून की तरह दौड़ता है-
सूरज उगेगा एक दिन
आदत की तरह नहीं
दस्तूर की तरह नहीं....
.... एक क्रांति की तरह
.... जिस दिन
वो सूरज उगेगा
तो फिर नहीं होगी कभी कोई रात
'वक्त कितना कठिन है साथी' शीर्षक कविता में स्त्रियों पर हो रहे दैहिक हमलों की पड़ताल करती कवयित्री लीक से हटकर सीधे मूल कारण तलाशती है। वह सीधे सीधे सवाल उठाती है- मैं कैसे प्रेम गीत गाऊँ?, मैं कैसे घर का सपना संजोऊँ?, मैं कैसे विश्वास की नव चढ़ूँ? उसकी नज़र सीधे मर्म पर पहुँचती है कि जो पुरुष अपने घर की महिलाओं की आबरू का रखवाला है, वही घर के बाहर की महिलाओं के लिए खतरा क्यों है? कैसी विडम्बना है?
मर्द जो भाई पति प्रेमी है
वो दूसरी लड़कियों के लिए
भेदिया साबित हो सकता है कभी भी....
'क्या तुम जानते हो' में दुनिया के चर्चित स्त्री-दुराचार प्रकरणों का उल्लेख कर घरवाले से प्रश्न करती है कि वह घरवाली को कितना जानता है?
बताओ क्या तुम जानते हो
सालों से घर के भीतर रहनेवाली
अपनी पत्नी के बारे में
जो हर रात सोती है तुम्हारे बाद
हर सुबह उठती है तुमसे पहले
क्या उसने नींद पर विजय पा ली है?
जो हर वक्त पकाती है तुम्हरी पसंद का खाना
क्या उसे भी वही पसंद है हमेशा से
जो बिस्तर बन जाती है तुम्हारी कामना पर
क्या वो हर बार तैयार होती है देह के खेल के लिए
श्रुति की कविताओं का वैशिष्ट्य तिलमिला देनेवाले सवाल शालीन-शिष्ट भाषा में किंतु दृढ़ता और स्पष्टता के साथ पूछना है। वह न तो निरर्थक लाग-लपेट करते आवरण चढ़ाती है, न कुत्सित और अश्लील शब्दावली का प्रयोग करती है। राम-सीता प्रसंग में गागर में सागर की तरह चंद पंक्तियाँ 'कम शब्दों में अधिक कहने' की कला का अनुपम उअदाह्र्ण है-
सीता के लिए ही था ण
युद्ध
हे राम
फिर जीवित सीता को
क्यों कराया अग्नि-स्नान
श्रुति का आत्मविश्वास, अपने फैसले खुद करने का निश्चय और उनका भला या बुरा जो भी हो परिणाम स्वीकारने की तत्परता काबिले -तारीफ़ है। वह अन्धकार, से प्रेम करना, रावण को समझना तथा कुरूपता को पूजना चाहती है क्योंकि उन्होंने क्रमश: प्रकाश की महत्ता , सीता की दृढ़ता तथा सुन्दरता को उद्घाटित किया किंतु इन सबको भुला भी देना चाहती है कि प्रकाश, दृढ़ता और सुनदरता अधिक महत्वपूर्ण है। यह वैचारिक स्पष्टता और साफगोई इन कविताओं को पठनीय के साथ-साथ चिन्तनीय भी बनाती हैं।
'आशंका' इस संकलन की एक महत्वपूर्ण कविता है। यहाँ कवयित्री अपने पिटा के जन्मस्थान से जुड़ना चाहती है क्योंकि उसे यह आशंका है कि ऐसा ण करने पर कहीं उसके बच्चे भी उसके जन्म स्थान से जुड़ने से इंकार न कर दें। पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलने और पालने वाले जीवन-मूल्यों और परंपराओं की जमीन पर रची गयी इस रचना का स्वर अन्य से भिन्न किंतु यथार्थपूर्ण है।
एक और मार्मिक कविता है 'पापा का गुस्सा'। पापा के गुस्से से डरनेवाली बच्ची का सोचना स्वाभाविक है कि पापा को गुस्सा क्यों आता है? बड़े होने पर उसे प्रश्न का उत्तर मिलता है-
आज समझ पाई हूँ
उनके गुस्से का रहस्य
पापा दरअसल गुस्सा नहीं होते
दुखी होते हैं
जब वे डांटते
तो हमारे लिए ही नहीं
उनके लिए भी सजा होती
आत्मावलोकन और आत्मालोचन इन कविताओं में जहाँ-तहाँ अन्तर्निहित है। कवयित्री गुलाब को तोड़ कर गुल्दासे में सजती है पर खुद को चोट पहुँचाने वाले को क्षमा नहीं कर पाती, भूखे भिखारी को अनदेखा कर देती है, अशक्त वृद्ध को अपनी सीट नहीं देती, अभाव में मुस्कुरा नहीं पाती, सहज ही भूल नहीं स्वीकारती यह तो हम सब करते हैं पर हमसे भिन्न कवयित्री इसे कवि होने की अपात्रता मानती है-
नहीं, मैं कवि नहीं
मैं तो मात्र
रचयिता हूँ
कवि तो वह है
जो मेरी कविता को जीता है।
जिस कविता के शीर्षक से पुस्तक के नामकरण हुआ है, वह है 'कशमकश'। अजब विडम्बना है कि आदमी की पहचान उसके अस्तित्व, कार्यों या सुयश से नहीं दस्तावेजों से होती है-
मैंने
पेनकार्ड रखा
पासपोर्ट, आधार कार्ड
मतदाता प्रमाण पत्र
खुद से जुड़े तमाम दस्तावेज सहेजे
और निकल पडी
लेकिन यह क्या
खुद को रखना तो भूल हे एगी
मुड़कर देखा तो
दूर तक नज़र नहीं आई मैं
अजीब कशमकश है
खुद को तलाशने पीछे लौटूं
या खुद के बगैर आगे बढ़ जाऊँ...
ये कवितायेँ बाहर की विसंगतियों का आकलन कर भीतर झाँकती हैं। बाहर से उठे सवालों के हल भीतर तलाशती कविताओं की भाषा अकृत्रिम और जमीनी होना सोने में सुहागा है। ये कविताएं आपको पता नहीं रहने देती, आपके कथ्य का भोक्ता बना देती हैं, यही कवयित्री और उसकी कारयित्री प्रतिभा की सफलता है।
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संपर्क- विश्व वाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१
चलभाष ७९९९५५९६१८ / ९४२५१८३२४४, salil.sanjiv@gmail.com
doha karyashala
संशोधनोपरांत
सुन निज मन क्या कह रहा, देता क्या संदेश। सोच-विचारे पग बढ़े, भ्रमित हुए बिन लेश।।
पहले सोचा फिर किया, पर न सही परिणाम। मिले माथ पर जो लिखा, पीड़ा का क्या काम।। सबकी अपनी जिन्दगी, अपनी-अपनी राह। पर पथ अनुगामी बने, रहे न ऐसी चाह।। मिली आस दो पल रही, पुलक गयी फिर बीत। तड़ित उजाला रात में, तमस वही फिर रीत।। पुष्प सुवासित कर रहा, बगिया को चहुँओर। हवा तेज है क्या पता, कब त्रासद हो घोर।। भवसागर में चल रहा, लेकर भार अपार। पग-पग पर भँवरें खड़ीं, चल सब भार उतार। परत दर परत जम रही, हुई पीर हिमस्नात। पिघलाकर बारिश करो, धोकर मन आघात।। हस्ती सबकी है यहाँ, तारक, सूरज,चाँद। जिसकी जब बारी रही, छोड़ निकलता माँद।। जब विपदा मुश्किल- नहीं बचना हो आसान। राह भक्ति की तब चले, परा शक्ति को मान।। ह्रदय तोड़कर आपदा, कर दे जब मजबूर। मौन सफर भीतर हुआ, तब पहचाना नूर।। डूब गया अवसाद में, रहा दर्द से जूझ। मर्जी रब की ही चले , बात यही बस बूझ।। अंधकार दम घोंटता, प्राणवायु ही फाँस। पीर कलेजा चीरती, देता जुगनू झाँस।। प्राण निकलने को तड़े, अति से हो संत्रास। या फिर पीर पहाड़ सी, बने काल का ग्रास।। पीड़ा को वीणा बना, छेड़ दर्द के गीत। जो मिलना मिलकर रहे, विलन या विरह मीत।। द्वेष बढ़ाने से कभी, मिटे न निज मन क्लेश। दिया जला समभाव का, तब सुरभित संदेश । छाई धुंध कुहास की, राह धुएँ में लीन। भानु-डीप भी लापता, रहे थरथरा दीन।। कहे वचन शीतल सदा, घोलें शहद-मिठास। औरों से ज्यादा मिले, खुद को ही मधुमास।।
***
baal kavita
मुहावरा कौआ स्नान
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
कौआ पहुँचा नदी किनारे, शीतल जल से काँप-डरा रे!
कौवी ने ला कहाँ फँसाया, राम बचाओ फँसा बुरा रे!!
*
पानी में जाकर फिर सोचे, व्यर्थ नहाकर ही क्या होगा?
रहना काले का काला है, मेकप से मुँह गोरा होगा। .
*
पूछा पत्नी से 'न नहाऊँ, क्यों कहती हो बहुत जरूरी?'
पत्नी बोली आँख दिखाकर 'नहीं चलेगी अब मगरूरी।।'
*
नहा रहे या बेलन, चिमटा, झाड़ू लाऊँ सबक सिखाने
कौआ कहे 'न रूठो रानी! मैं बेबस हो चला नहाने'
*
निकट नदी के जाकर देखा पानी लगा जान का दुश्मन
शीतल जल है, करूँ किस तरह बम भोले! मैं कहो आचमन?
*
घूर रही कौवी को देखा पैर भिगाये साहस करके
जान न ले ले जान!, मुझे जीना ही होगा अब मर-मर के
*
जा पानी के निकट फड़फड़ा पंख दूर पल भर में भागा
'नहा लिया मैं, नहा लिया' चिल्लाया बहुत जोर से कागा
*
पानी में परछाईं दिखाकर बोला 'डुबकी आज लगाई
अब तो मेरा पीछा छोडो, ओ मेरे बच्चों की माई!'
*
रोनी सूरत देख दयाकर कौवी बोली 'धूप ताप लो
कहो नर्मदा मैया की जय, नाहक मुझको नहीं शाप दो'
*
गाय नर्मदा हिंदी भारत भू पाँचों माताओं की जय
भागवान! अब दया करो चैया दो तो हो पाऊँ निर्भय
*
उसे चिढ़ाने कौवी बोली' आओ! संग नहा लो-तैर'
कर ''कौआ स्नान'' उड़ा फुर, अब न निभाओ मुझसे बैर
*
बच्चों! नित्य नहाओ लेकिन मत करना कौआ स्नान
रहो स्वच्छ, मिल खेलो-कूदो, पढ़ो-बढ़ो बनकर मतिमान
-----------------------
chhand bahr ka mool hai 1
छंद बहर का मूल है- १.
*
उर्दू की १९ बहरें २ समूहों में वर्गीकृत की गयी हैं।
१. मुफरद बहरें-
इनमें एक ही अरकान या लय-खण्ड की पुनरावृत्ति होती है।
इनके ७ प्रकार (बहरे-हज़ज सालिम, बहरे-ऱज़ज सालिम, बहरे-रमल सालिम, बहरे-कामिल, बहरे-वाफिर, बहरे-मुतक़ारिब तथा बहरे-मुतदारिक) हैं।
२. मुरक्कब बहरें-
इनमें एकाधिक अरकान या लय-खण्ड मिश्रित होते हैं।
इनके १२ प्रकार (बहरे-मनसिरह, बहरे-मुक्तज़िब, बहरे-मुज़ारे, बहरे-मुजतस, बहरे-तवील, बहरे-मदीद, बहरे-बसीत, बहरे-सरीअ, बहरे-ख़फ़ीफ़, बहरे-जदीद, बहरे-क़रीब तथा बहरे-मुशाकिल) हैं।
*
क. बहरे-मनसिरह
बहरे-मनसिरह मुसम्मन मतबी मौक़ूफ़-
इस बहर में बहुत कम लिखा गया है। इसके अरकान 'मुफ़तइलुन फ़ायलात मुफ़तइलुन फ़ायलात' (मात्राभार ११११२ २१२१ ११११२ २१२१) हैं।
यह १८ वर्णीय अथधृति जातीय शारद छंद है जिसमें ९-९ पर यति तथा पदांत में जगण (१२१) का विधान है।
यह २४ मात्रिक अवतारी जातीय छंद है जिसमें १२-१२ मात्राओं पर यति तथा पदांत में १२१ है।
उदाहरण-
१.
थक मत, बोझा न मान, कदम उठा बार-बार
उपवन में शूल फूल, भ्रमर कली पे निसार
पगतल है भू-बिछान, सर पर है आसमान
'सलिल' नहीं भूल भूल, दिन-दिन होगा सुधार
२.
जब-जब तूने कहा- 'सच', तब झूठा बयान
सच बन आया समक्ष, विफल हुआ न्याय-दान
उर्दू व्याकरण के अनुसार गुरु के स्थान पर २ लघु या दो लघु के स्थान पर गुरु मात्रा का प्रयोग करने पर छंद का वार्णिक प्रकार बदल जाता है जबकि मात्रिक प्रकार तभी बदलता है जब यह सुविधा पदांत में ली गयी हो। हिंदी पिंगल-नियम यह छूट नहीं देते।
३.
अरकान 'मुफ्तइलुन फ़ायलात मुफ्तइलुन फ़ायलात' (मात्राभार २११२ २१२१ २११२ २१२१)
क्यों करते हो प्रहार?, झेल सकोगे न वार
जोड़ नहीं, छीन भी न, बाँट कभी दे पुकार
कायम हो शांति-सौख्य, भूल सकें भेद-भाव
शांत सभी हों मनुष्य, किस्मत लेंगे सुधार
४.
दिल में हम अप/ने नियाज़/रखते हैं सो/तरह राज़
सूझे है इस/को ये भेद/जिसकी न हो/चश्मे-कोर
प्रथम पंक्ति में ए, ओ, अ की मात्रा-पतन दृष्टव्य।
(सन्दर्भ ग़ज़ल रदीफ़-काफ़िया और व्याकरण, डॉ. कृष्ण कुमार 'बेदिल')
=============
laghkatha
सफ़ेद झूठ
*
गाँधी जयंती की सुबह दूरदर्शन पर बज रहा था गीत 'दे दी हमें आज़ादी बिना खड्ग बिना ढाल', अचानक बेटे ने उठकर टीवी बंद कर दिया। कारण पूछने पर बोला- '१८५७ से लेकर १९४६ में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के अज्ञातवास में जाने तक क्रांतिकारियों ने आत्म-बलिदान की अनवरत श्रंखला की अनदेखी कर ब्रिटेन संसद सदस्यों से में प्रश्न उठवानेवालों को शत-प्रतिशत श्रेय देना सत्य से परे है. सत्यवादिता के दावेदार के जन्म दिन पर कैसे सहन किया जा सकता है सफ़ेद झूठ?
***
दोहा दुनिया
शिव बाघाम्बर पहनकर,
होते वृषभ-सवार.
शिवा बाघ पर विराजें,
किंतु नहीं तकरार.
.
गणपति शिव के सुत नहीं
देहज- मानस पूत.
जननि न कार्तिक की शिवा,
माँ-सुत बंध अकूत.
.
गणपति मति का कोष हैं,
ऋद्धि-सिद्धि नित साथ.
विघ्न मूस-आसीन हो,
निष्कंटक गणनाथ.
.
कार्तिक संग मयूर है,
जिसे न सोहे सर्प.
संग-साथ हिलमिल रहें.
भुला शत्रुता-दर्प.
.
केर-बेर के संग सा,
है शिव का परिवार.
शिव हैं पशुपतिनाथ पर,
करें जगत्-उद्धार.
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रखें संतुलन-समन्वय,
भले-बुरे के बीच.
शिव सिखलाते जन्म दे,
शुभ को आदिम कीच.
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घृणा-द्वेष मत पालिए,
रखें नियंत्रित क्रोध.
सबका शुभ करते रहें,
करा रहे शिव बोध.
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28.12.2017
बुधवार, 27 दिसंबर 2017
laghukatha
कब्रस्तान
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महाविद्यालय के प्राचार्य मुख्य अतिथि को अपनी संस्था की गुणवत्ता और विशेषताओं की जानकारी दे रहे थे. पुस्तकालय दिखलाते हुए जानकारी दी की हमारे यहाँ विषयों की पाठ्य पुस्तकें तथा सन्दर्भ ग्रंथों के साथ-साथ अच्छा साहित्य भी है. हम हर वर्ष अच्छी मात्र में साहित्यिक पुस्तकें भी क्रय करते हैं.
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navgeet
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माया महा ठगिनी हम जानी
ममता मोहित राह भुलानी
मल्ल मुलायम कुम्हला रए रे!
मुल्ला मत भए दाना-पानी
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ठगे गए सिवपाल बिचारे
बेटा पड़ा बाप पर भारी
शकुनी लालू फेंकें पासा
नया महाभारत है जारी
रो-रो राहुल पगला रओ रे!
जैसे मर गई बाकी नानी
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फारुख अब्दुल्ला बर्रा रओ
घास न डाले तन्नक कोई
कमुनिस्टों खों नींद नें आ रई
सूल चुभें, जो फसलें बोई
पोल खुल गई सम्मानों की
लौटाने की करम कहानी
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काली रोकड़ जमा हो गई
काला मनुआ अब लौं बाकी
उगरे-निगरे पीर घनेंरी
खाली बोतल भरे नें साकी
सौ चूहे खा बिना डकारे
चैनल कर रए गलत बयानी
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२७-१२-१६
