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रविवार, 31 दिसंबर 2017

haiku

हाइकु
*
हो नया हर्ष
हर नए दिन में
नया उत्कर्ष
.
प्राची के गाल
रवि करता लाल
है नया साल
.
हाइकु लिखो
हर दिवस् एक
इरादा नेक
.

नवगीत

दोहा दुनिया

शिव शुभ कर हरते अशुभ,
भोले रहते शांत.
शंकर शंका मिटा दें,
बम विश्वास प्रशांत.
.
निन्गा कहते पिंड से,
उपजे सारी सृष्टि.
बसे-लीन हो अंड में,
देखे सात्विक दृष्टि.
.
घट भीतर आकाश है,
घट बाहर आकाश.
बड़ादेव सर्वत्र हैं,
भज कट जाएँ पाश.
.
महादेव को पूजते,
सुर नर असुर हमेश.
शशि हैं शोभित शीश पर,
दीपक बने दिनेश.
.
मोह वासना लोभ की,
त्रिपुरी करते नष्ट.
त्रिपुरारी निज भक्त के,
पल में हरते कष्ट.
.
काम जीत कामारि हैं,
चंद्र-नाथ सोमेश.
नाग-इष्ट नागेश प्रभु,
गगन-व्याप्त व्योमेश.
.
उमा विवाहीं मिल गई,
संग्या नई उमेश.
हो सतीश प्रिय सती के,
भव-तारें भुवनेश.
...
31.12.2017

शनिवार, 30 दिसंबर 2017

samyika alha

सामयिक आल्हा,  
*
मचा महाभारत भारत में, जन-गण देखें ताली पीट 
दहशत में हैं सारे नेता, कैसे बचे पुरानी सीट? 
.
हुई नोटबंदी, पैरों के नीचे, रही न हाय जमीन 
कौन बचाए इस मोदी से?, नींद निठुर ने ली है छीन
.

पल भर चैन न लेता है खुद, दुनिया भर में करता धूम
कहे 'भाइयों-बहनों' जब भी, तभी सफलता लेता चूम
.

कहाँ गए वे मौनी बाबा?, घपलों-घोटालों का राज
मनमानी कर जोड़ी दौलत, घूस बटोरी तजकर लाज
.

हाय-हाय हैं कैसे दुर्दिन?, छापा पड़ता सुबहो-शाम
चाल न कोई काम आ रही, जब्त हुआ सब धन बेदाम
.

जनधन खातों में डाला था, रूपया- पीट रहे अब माथ
स्वर्ण ख़रीदा जाँच हो रही, बैठ रहा दिल खाली हाथ
.

पत्थर फेंक करेगा दंगा, कौन बिना धन? पिट रइ गोट
नकली नोट न रहे काम के, रोज पड़े चोटों पर चोट
.

ताले तोड़ आयकरवाले, खाते-बही कर रहे जब्त
कर चोरी की पोल खोलते, रिश्वत लेंय न कैसी खब्त?
.

बेनामी संपत्ति बची थी, उस पर ली है नजर जमाय
हाय! राम जी-भोले बाबा, हनुमत कहूँ न राह दिखाय
.

छोटे नोट दबाये हमीं ने, जनता को है बेहद कष्ट
चूं न कर रहा फिर भी कोई, समय हो रहा चाहे नष्ट
.

लगे कतारों में हैं फिर भी, कहते नीति यही है ठीक
शायर सिंह सपूत वही जो, तजे पुरानी गढ़ नव लीक
.

पटा लिया कुछ अख़बारों को, चैनल भरमाते हैं खूब
दोष न माने फिर भी जनता, लुटिया रही पाप की डूब
.

चचा-भतीजे आपस में भिड़, मोदी को करते मजबूत
बंद बोलती माया की भी, ममता को है कष्ट अकूत
.

पाला बदल नितिश ने मारा, दाँव न लालू जाने काट
बोल थके है राहुल भैया, खड़ी हुई मैया की खाट
.

जो मैनेजर ललचाये थे, उन पर भी गिरती है गाज
फारुख अब्दुल्ला बौराया, कमुनिस्टों का बिगड़ा काज
.

भूमि-भवन के भाव गिर रहे, धरे हाथ पर हाथ सुनार 
चाहा करें तीन के तेरह, हुए सिर्फ दो खाते खार
.

सेठ अफसरों नेताओं के ठाठ, न बाकी- फँसे दलाल
.
रो-रो सूख रहे हैं आँसू, पिचक गए हैं फूले गाल 
.
जनता जय-जयकार कर रही, मोदी लिखे नया इतिहास मन मसोस दिन-रात रो रहे, घूसखोर सब पाकर त्रास 
**

geet

गीत :
*
सत्रह साला
सदी हुई यह
*
सपनीली आँखों में आँसू
छेड़ें-रेपें हरदिन धाँसू
बहू कोशिशी झुलस-जल रही
बाधा दियासलाई सासू
कैरोसीन ननदिया की जय
माँग-दाँव पर
लगी हुई सह
सत्रह साला
सदी हुई यह
*
मालिक फटेहाल बेचारा
नौकर का है वारा-न्यारा
जीना ही दुश्वार हुआ है
विधि ने अपनों को ही मारा
नैतिकता का पल-पल है क्षय
भाँग चाशनी
पगी हुई कह
सत्रह साला
सदी हुई यह
*
रीत पुरातन ज्यों की त्यों है
मत पूछो कैसी है?, क्यों है?
कहीं बोलता है सन्नाटा
कहीं चुप्प बैठी चिल्ल-पों है
अँधियारे की दीवाली में
ज्योति-कालिमा
सगी हुई ढह
सत्रह साला
सदी हुई यह
*  

navgeet

नवगीत  
*
न मैं सुधरूँ
न तुम सुधरो 
कहो हो साल शुभ कैसे?
*
वही रफ़्तार बेढंगी
जो पहले थी, सो अब भी है
दिशा बदले न गति बदले
निकट हो लक्ष्य फिर कैसे?
न मैं सुधरूँ
न तुम सुधरो
कहो हो साल शुभ कैसे?
*
हरेक चेहरा है दोरंगी
न मेहनत है, न निष्ठा है
कहें कुछ और कर कुछ और
अमिय हो फिर गरल कैसे?
न मैं सुधरूँ
न तुम सुधरो
कहो हो साल शुभ कैसे?
*
हुई सद्भाव की तंगी
छुरी बाजू में मुख में राम
धुआँ-हल्ला दसों दिश है
कहीं हो अमन फिर कैसे?
न मैं सुधरूँ
न तुम सुधरो
कहो हो साल शुभ कैसे?
***

yaksha prashna 1

यक्ष प्रश्न १ 
*
कहते हैं 'जो ब्रम्ह को जानता है वही ब्राम्हण होता है.' 
ब्राम्हण सभाओं में कितने ब्राम्हण हैं? 
क्या वे अन्यों को ब्रम्ह का ज्ञान कर ब्राम्हण बनाने में समर्थ और इच्छुक हैं? 
यदि नहीं तो जन्मना जातिवाद की दुहाई देकर सनातन धर्मी समाज को विभाजित करना अनुचित नहीं है क्या?

***
आपके उत्तर की प्रतीक्षा है. 

दोहा दुनिया

शिव रमते हैं भाव में,
शिव में रमता भाव.
शिवा चाह हैं, चाव हैं,
शून्य अभाव प्रभाव.
.
जटा-जूट शिव-शीश पर,
शोभित अगणित व्याल.
सोम संग अमृत-गरल,
चंदन चर्चित भाल.
.
शिव अपने में लीन हैं,
कहता विश्व समाधि.
जो जन शिव में लीन हो,
मिटती उसकी व्याधि.
.
शिव पर्वत-आकार हैं,
नभ-शशि शिखरासीन.
तरु-जड़ जटा, सलिल निरख,
वृषभ-सर्प तल्लीन.
.
दावानल शिव-कोप सा,
रौद्र रूप विकराल.
आँधी-तूफ़ां भयंकर,
मानो आया काल.
.
शान्त-स्निग्ध वातावरण,
ज्यों शिव परम प्रसन्न.
रुद्र अक्ष श्यामल छटा,
सुख-मंगल आसन्न.
.
आतप-वर्षा-शीत त्रय,
शूल हुए शिव-मीत.
दसों दिशाएँ निनादित,
कर डमरू से प्रीत.
.
सुमन सु-मन तितली भ्रमर,
पवन प्रवह दे शांति.
पर्वत-तनया सुंदरी,
प्रगटी ले शुचि कांति.
.
मन-मयूर शोभा निरख,
कार्तिक में कर नृत्य.
गज-मुख गणपति संग हो,
करे अलौकिक कृत्य.
.
शिवा प्रकृति, शिव मूल हैं,
जड़-चेतन संयुक्त.
सह जीवन ही पूर्णता,
होते शून्य वियुक्त.
.
शक्तिवान शिव तभी जब,
शक्ति नहीं हों दूर.
शक्ति ने अपने आपमें
पूर्ण- कहे जो सूर
...
30.12.2017

शुक्रवार, 29 दिसंबर 2017

om prakash yati

अभियंता कवि ओमप्रकाश यति संस्कारधानी में

मेरे नज़दीक शायरी भी एक तपस्या है - यति 
Image result for ॐ प्रकाश यति
अभियन्ता साहित्य संगोष्ठी
जबलपुर. नये वर्ष की पूर्व संध्या पर इंस्टीटयूशन ऑफ़ इन्जीनियर्स, अभियान तथा इंडियन जिओ टेकनिकल सोसायटी के संयुक्त तत्वावधान में इन्स्टीट्यूशन कार्यालय, सिविल लाइन, गोविन्द भवन के सामने जबलपुर में ग़ज़ल विधा के देशव्यापी ख्याति प्राप्त अभियंता कवि ओम प्रकाश यति नोएडा के सम्मान तथा मुख्यातिथ्य में काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया है। श्री यति के ग़ज़ल संग्रह 'बाहर छाया भीतर धूप' तथा 'सच कहूँ तो' साहित्य जगत में बहु चर्चित रहे हैं। 
कार्यक्रम की अध्यक्षता संस्थाध्यक्ष अभियंता वीरेन्द्र कुमार साहू तथा सञ्चालन अभियंता संजीव वर्मा 'सलिल' करेंगे। अभियंता ओम प्रकाश यति के साथ नगर के अभियंता कवियों सर्व अभियंता अमरेन्द्र नारायण, आर.आर. फौजदार, देवेन्द्र गोंटिया 'देवराज', आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल', गोपाल कृष्ण चौरसिया 'मधुर', विवेक रंजन श्रीवास्तव, डी. सी. जैन, के. सी. जैन, सुरेन्द्र सिंह पंवार, उदयभानु तिवारी 'मधुकर', बसंत मिश्रा, संजय वर्मा, शोभित वर्मा, गजेंद्र कर्ण तथा अभियंता-परिजनों श्रीमती सुमन श्रीवास्तव, श्रीमती राजलक्ष्मी शिवहरे, श्रीमती मिथलेश बड़गैया आदि द्वारा काव्य पाठ किया जाएगा। 
पूर्ण होते वर्ष की विदाई तथा नए वर्ष का स्वागत सारस्वत अनुष्ठान से करने की नव परम्परा अभियन्ताओं द्वारा की जा रही है।  इंस्टीटयूशन ऑफ़ इन्जीनियर्स के सदस्यों, अभियंता-परिवारों तथा काव्य प्रेमियों से उपस्थिति हेतु सर्व अभियंता तरुण कुमार आनंद, राकेश राठोड़, मुक्ता भटेले, मधुसुदन दुबे, अरुण खर्द, प्रवीण ब्योहार ने अनुरोध किया है। 
***
ओम प्रकाश यती न केवल शब्दों के जादूगर हैं बल्कि शब्दों के भीतर अपने समय को जिस तरलता से पकड़ते हैं वह निश्चय ही उनके जैसे कवि के लिए ही संभव है। अपने आस-पास जिंदगी की दुश्वारियाँ उन्हें मथती हैं और यही मंथन उनकी ग़ज़लों की शकल लेकर बाहर आता है। उनकी रचनाओं में बेशक कथ्य की प्रौढ़ता और शिल्प की गहराई दिखायी पड़ती है। वे समय के ताप को उसकी समग्रता में महसूस करते हैं और उसे पूरी ताकत से व्यक्त भी करते हैं। उनको पढ़ते हुए कोई भी अपने भीतर झांकता हुआ महसूस कर सकता है। 
''ओम प्रकाश यति के कलाम में बड़ा तीखापन, ज़िंदगी की सच्चाइयां और कड़वाहटे हैं" - शायरेआज़म कृष्ण बिहारी 'नूर' 
Front Coverप्रस्तुत हैं यति की कुछ ग़ज़लें....
१.
तुम्हें कल की कोई चिन्ता नहीं है

तुम्हारी आँख में सपना नहीं है।

ग़लत है ग़ैर कहना ही किसी को
कोई भी शख्स जब अपना नहीं है।

सभी को मिल गया है साथ ग़म का 
यहाँ अब कोई भी तनहा नहीं है।

बँधी हैं हर किसी के हाथ घड़ियाँ
पकड़ में एक भी लम्हा नहीं है।

मेरी मंज़िल उठाकर दूर रख दो
अभी तो पाँव में छाला नहीं है।
*
२. 
स्वार्थ की अंधी गुफ़ाओं तक रहे

लोग बस अपनी व्यथाओं तक रहे।

काम संकट में नहीं आया कोई
मित्र भी शुभकामनाओं तक रहे।

क्षुब्ध था मन देवताओं से मगर
स्वर हमारे प्रार्थनाओं तक रहे।

लोक को उन साधुओं से क्या मिला
जो हमेशा कन्दराओं तक रहे।

सामने ज्वालामुखी थे किन्तु हम
इन्द्रधनुषी कल्पनाओं तक रहे।
*
३. 
दुख तो गाँव–मुहल्ले के भी हरते आए बाबूजी

पर जिनगी की भट्ठी में खुद जरते आए बाबूजी।

कुर्ता,धोती,गमछा,टोपी सब जुट पाना मुश्किल था 
पर बच्चों की फ़ीस समय से भरते आए बाबूजी।

बड़की की शादी से लेकर फूलमती के गौने तक
जान सरीखी धरती गिरवी धरते आए बाबूजी।

एक नतीजा हाथ न आया,झगड़े सारे जस के तस
पूरे जीवन कोट–कचहरी करते आए बाबूजी।

रोज़ वसूली कोई न कोई,खाद कभी तो बीज कभी
इज्ज़त की कुर्की से हरदम डरते आए बाबूजी।


नाती–पोते वाले होकर अब भी गाँव में तन्हा हैं
वो परिवार कहाँ है जिस पर मरते आए बाबूजी।
*
४.
आदमी क्या, रह नहीं पाए सम्हल के देवता
रूप के तन पर गिरे अक्सर फिसल के देवता

बाढ़ की लाते तबाही तो कभी सूखा विकट
किसलिए नाराज़ रहते हैं ये जल के देवता

भीड़ भक्तों की खड़ी है देर से दरबार में
देखिए आते हैं अब कब तक निकल के देवता

की चढ़ावे में कमी तो दण्ड पाओगे ज़रूर
माफ़ करते ही नहीं हैं आजकल के देवता

लोग उनके पाँव छूते हैं सुना है आज भी
वो बने थे ‘सीरियल’ में चार पल के देवता

भीड़ इतनी थी कि दर्शन पास से सम्भव न था
दूर से ही देख आए हम उछल के देवता

कामना पूरी न हो तो सब्र खो देते हैं लोग
देखते हैं दूसरे ही दिन बदल के देवता

है अगर किरदार में कुछ बात तो फिर आएंगे
कल तुम्हारे पास अपने आप चल के देवता

शाइरी सँवरेगी अपनी हम पढ़ें उनको अगर
हैं पड़े इतिहास में कितने ग़ज़ल के देवता
*
५. 
नज़र में आज तक मेरी कोई तुझ सा नहीं निकला
तेरे चेहरे के अन्दर दूसरा चेहरा नहीं निकला

कहीं मैं डूबने से बच न जाऊँ, सोचकर ऐसा
मेरे नज़दीक से होकर कोई तिनका नहीं निकला

ज़रा सी बात थी और कशमकश ऐसी कि मत पूछो
भिखारी मुड़ गया पर जेब से सिक्का नहीं निकला

सड़क पर चोट खाकर आदमी ही था गिरा लेकिन
गुज़रती भीड़ का उससे कोई रिश्ता नहीं निकला

जहाँ पर ज़िन्दगी की, यूँ कहें खैरात बँटती थी
उसी मन्दिर से कल देखा कोई ज़िन्दा नहीं निकला
***
प्रस्तुति:आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल', ९४२५१८३२४४ 

laghukathaa

लघुकथा:
करनी-भरनी
*
अभियांत्रिकी महाविद्यालय में परीक्षा का पर्यवेक्षण करते हुए शौचालयों में पुस्तकों के पृष्ठ देखकर मन विचलित होने लगा। अपना विद्यार्थी काल में पुस्तकों पर आवरण चढ़ाना, मँहगी पुस्तकों की प्रति तैयार कर पढ़ना, पुस्तकों में पहचान पर्ची रखना ताकि पन्ने न मोड़ना पड़े, वरिष्ठ छात्रों से आधी कीमत पर पुस्तकें खरीदना, पढ़ाई कर लेने पर अगले साल कनिष्ठ छात्रों को आधी कीमत पर बेच अगले साल की पुस्तकें खरीदना, पुस्तकालय में बैठकर नोट्स बनाना, आजीवन पुस्तकों में सरस्वती का वास मानकर खोलने के पूर्व नमन करना, धोखे से पैर लग जाए तो खुद से अपराध हुआ मानकर क्षमाप्रार्थना करना आदि याद हो आया।

नयी खरीदी पुस्तकों के पन्ने बेरहमी से फाड़ना, उन्हें शौच पात्रों में फेंक देना, पैरों तले रौंदना क्या यही आधुनिकता और प्रगतिशीलता है?

रंगे हाथों पकड़ेजानेवालों की जुबां पर गिड़गड़ाने के शब्द पर आँखों में कहीं पछतावे की झलक नहीं देखकर स्तब्ध हूँ। प्राध्यापकों और प्राचार्य से चर्चा में उन्हें इसकी अनदेखी करते देखकर कुछ कहते नहीं बनता। उनके अनुसार वे रोकें या पकड़ें तो उन्हें जनप्रतिनिधियों, अधिकारियों या गुंडों से धमकी भरे संदेशों और विद्यार्थियों के दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ता है। तब कोई साथ नहीं देता। किसी तरह परीक्षा समाप्त हो तो जान बचे। उपाधि पा भी लें तो क्या, न ज्ञान होगा न आजीविका मिलेगी, जैसा कर रहे हैं वैसा ही भरेंगे।
***

दोहा दुनिया

शिव कलकल जलधार हैं,
डिमडिम डमरू-नाद.
शिव मन-घटता मौन हैं,
शिव सत् से संवाद.
.
कंठ काल से अलंकृत,
महाकाल हैं आप.
शिव विराटतम सूक्ष्मतम,
नाप न कोई माप.
.
शिव नयनों में इंदु हैं.
इंदु बिंदु का धाम.
इंदुमुखी मुस्का रहीं,
करता जगत प्रणाम.
.
शिव नयनों में शिवा के,
देख सकेगा कौन?
पलक मूँद छवि लें छिपा,
धुनी रमाए मौन.
.
लीला करते लास की,
हास अधर पर मंद.
एक दूसरे के लिए,
सुमन और मकरंद.
.
कांत कांति की कल्पना,
कांता को आमोद.
सलिल-धार में सत्यजित,
बिंब बढाए प्रमोद.
.
अर्णव अरुण अछिन-अगिन,
शिव अपरोक्ष अतीत.
शिवा अजीती अबीती,
अभिनव-पुरा प्रतीत.
.
पलक झपकते बीतते,
पल दिन युग कल्पान्त.
विनत जीव संजीव जी,
मन्वन्तर विक्रांत.
.
साध ने साधन, साधना
ही काटे भव-पाश.
पैर जमा कर जमीं पर,
भक्त छुए आकाश.
...
29.12.2017

गुरुवार, 28 दिसंबर 2017

samiksha

चित्र में ये शामिल हो सकता है: पाठ और बाहर🔰 कृति चर्चा:
'कशमकश' मन में झाँकती कविताएँ
[कृति विवरण: कशमकश, कविता संग्रह, ISBN ९७८-९३-८५०१३-६५-२, श्रुति कुशवाहा, वर्ष २०१६, आकार डिमाई, आवरण सजिल्द बहुरंगी जैकेट सहित, पृष्ठ ११२, मूल्य २५०/-, अंतिका प्रकाशन, सी ५६ / यूजीएफ़ ४, शालीमार बाग़, विस्तार २, गाज़ियाबाद २०१००५, ०१२० २६४८२१२, ९८७१८५६०५३, antika56@gmailcom, कवयत्री संपर्क बी १०१ महानंदा ब्लोक, विराशा हाईटस, दानिश कुञ्ज पुल के समीप, कोलर मार्ग, भोपाल ४६२०४२, shrutyindia@gmail.com]
*
                        मूल्यों के संक्रमण और आधुनिक कविता के पराभव काल में जब अच्छे-अच्छे पुरोधा कविता का अखाड़ा और ग़ज़ल का मजमा छोड़कर दिनानुदिन अधिकाधिक लोकप्रिय होते नवगीत की पिचकारी थामे कबीरा गाने की होड़ कर रहे हैं, तब अपनी वैचारिक प्रबद्धता, आनुभूतिक मार्मिकता और अभिव्यक्तात्मक बाँकपन की तिपाई पर सामाजिक परिदृश्य का जायजा लेते हुए अपने भीतर झाँककर, बाहर घटते घटनाक्रम के प्रति आत्मीयता रखते हुए भी पूरी शक्ति से झकझोरने का उपक्रम करती कविता को जस- का तस हो जाने देने के दुस्साहस का नाम है 'श्रुति'। 'श्रुति' की यह नियति तब भी थी जब लिपि, लेखनी और कागज़ का आविष्कार नहीं हुआ था और अब भी है जब नित नए गैजेट्स सामने आकर कागज़ और पुस्तक के अस्तित्व के लिए संकट की घोषणा कर रहे हैं। 'श्रुति' जन-मन की अभिव्यक्ति है जो बिना किसी नकाब के जन के मन को जन के मन के सामने अनावृत्त करती है, निर्वसन नहीं। कायदों और परंपराओं के पक्षधर कितनी भी परदेदारी कर लें 'श्रुति' को साँसों का सच और आसों की पीड़ा जानने और कहने से रोक नहीं पाते। जब 'श्रुति' अबाध हो तो 'स्मृति' को अगाध होने से कौन रोक सकता है? जब कविता स्मृति में सुरक्षित हो तो वह समय का दस्तावेज हो जाती है। 

                        'कशमकश' चेतनता, जीवंतता और स्वतंत्रता का लक्षण है। जड़ या मृत में 'कशमकश' कैसे हो सकती है? किसी पिछलग्गू में केवल अनुकरण भाव होता है। 'कशमकश' वैचारिक आन्दोलन का दूसरा नाम है। आंदोलित होती 'श्रुति' जन-गण के मन में घट रहे या जन-मन को घटा रहे घटनाक्रम के प्रति आक्रोशित हो, यह स्वाभाविक है। एक जन की पीड़ा दूसरा न सुने तो उस पर प्रतिक्रया और कुछ करने या न करने की कशमकश कैसे हो? इस रूप में 'श्रुति' ही 'कशमकश' को जन्म देती है। संयोगवश विवेच्य काव्य संग्रह 'कशमकश' की जननी का नाम भी 'श्रुति' है। यह 'श्रुति' सामान्य नहीं 'कुशवाहा' अर्थात कुश धारण करनेवाली है। कुश धारण किया जाता है 'संकल्प' के समय। जब किसी कृत्य को निष्पादित करने का निश्चय कर लिया, संसाधन जुटा लिए, कृत्य संपादित करने के लिए पुरोहित अर्थात मार्गदर्शक भी आ गया तो हाथ में कुश लेकर भूमि पर जल छोड़ते हुए संकल्प में सहायक होता है 'कुश'। जन-मन की 'कशमकश' को कविता रूपी 'कुश' के माध्यम से उद्घाटित ही नहीं यथासंभव उपचारित करने का संकल्प करती 'श्रुति' की यह कृति सिर्फ पठनीय नहीं चिंतनीय भी है। 

                        'श्रुति' की सत्तर कविताओं का यह संकलन 'कशमकश' असाधारण है। असाधारण इस अर्थ में कि यह अपने समय की 'प्रवृत्तियों' का निषेध करते हुए भी 'निवृत्ति' का पथ प्रशस्त नहीं करता। समय की परख कर पाना हर रचनाकार के लिए आवश्यक है। श्रुति कहती है- 
'जब बिकने लगता है धर्म 
और घायल हो जाती है आस्था 
चेहरे हो जाते हैं पत्थर 
दिखने में आदमी जैसा 
जब नहीं रह जाता आदमी 
जब चरों ओर मंडराता है संकट 
वही होता है 
कविता लिखने का सबसे सही वक़्त'

                        श्रुति की कविताएँ इस बात की साक्षी हैं कि उसे समय की पहचान है। वह लिजलिजी भावनाओं में नहीं बहती। ज़िन्दगी शीर्षक कविता में कवयित्री का आत्म विश्वास पंक्ति-पंक्ति में झलकता है-
नहीं,
मेरी  ज़िन्दगी
तुमसे शुरू होकर
तुमपर ख़त्म नहीं होती....
... हाँ
मेरी ज़िंदगी
मुझसे शरू होती है
और ख़त्म वहीं होगी
जहाँ मैं चाहूँगी ...

                        स्त्री विमर्श के नाम पर अपने पारिवारिक दायित्वों से पलायन कर कृत्रिम हाय-तोबा और नकली आंसुओं से लबालब कविता करने के स्थान पर कवयित्री संक्षेप में अपने अस्तित्व और अस्मिता को सर्वोच्च मानते हुए कहती है-
अब बस
आज मैं घोषित करती हूँ
तुम्हें
एक आम आदमी
गलतियों का पुतला
और खुद को
पत्नी परमेश्वर

                        ये कविताएँ हवाई कल्पना जगत से नहीं आईं है। इन्हें यथार्थ के ठोस धरातल पर रचा गया है। स्वयं कवयित्री के शब्दों में-
मेरी कविता का
कचरा बीनता बच्चा
बूट पोलिश करता लड़का
संघर्ष करती लड़की
हाशिए पर खड़े लोग 
कोइ काल्पनिक पात्र नहीं
दरअसल
मेरे भीतर का आसमान है

                        आशावाद श्रुति की कविताओं में खून की तरह दौड़ता है-
सूरज उगेगा एक दिन
आदत की तरह नहीं
दस्तूर की तरह नहीं....
.... एक क्रांति की तरह
.... जिस दिन
वो सूरज उगेगा
तो फिर नहीं होगी कभी कोई रात

                        'वक्त कितना कठिन है साथी' शीर्षक कविता में स्त्रियों पर हो रहे दैहिक हमलों की पड़ताल करती कवयित्री लीक से हटकर सीधे मूल कारण तलाशती है। वह सीधे सीधे सवाल उठाती है- मैं कैसे प्रेम गीत गाऊँ?, मैं कैसे घर का सपना संजोऊँ?, मैं कैसे विश्वास की नव चढ़ूँ? उसकी नज़र सीधे मर्म पर पहुँचती है कि जो पुरुष अपने घर की महिलाओं की आबरू का रखवाला है, वही घर के बाहर की महिलाओं के लिए खतरा क्यों है? कैसी विडम्बना है?
मर्द जो भाई पति प्रेमी है
वो दूसरी लड़कियों के लिए
भेदिया साबित हो सकता है कभी भी....

                        'क्या तुम जानते हो' में दुनिया के चर्चित स्त्री-दुराचार प्रकरणों का उल्लेख कर घरवाले से प्रश्न करती है कि वह घरवाली को कितना जानता है?
बताओ क्या तुम जानते हो
सालों से घर के भीतर रहनेवाली
अपनी पत्नी के बारे में
जो हर रात सोती है तुम्हारे बाद
हर सुबह उठती है तुमसे पहले
क्या उसने नींद पर विजय पा ली है?
जो हर वक्त पकाती है तुम्हरी पसंद का खाना
क्या उसे भी वही पसंद है हमेशा से
जो बिस्तर बन जाती है तुम्हारी कामना पर
क्या वो हर बार तैयार होती है देह के खेल के लिए

                        श्रुति की कविताओं का वैशिष्ट्य तिलमिला देनेवाले सवाल शालीन-शिष्ट भाषा में किंतु दृढ़ता और स्पष्टता के साथ पूछना है। वह न तो निरर्थक लाग-लपेट करते आवरण चढ़ाती है, न कुत्सित और अश्लील शब्दावली का प्रयोग करती है। राम-सीता प्रसंग में गागर में सागर की तरह चंद पंक्तियाँ 'कम शब्दों में अधिक कहने' की कला का अनुपम उअदाह्र्ण है-
सीता के लिए ही था ण
युद्ध
हे राम
फिर जीवित सीता को
क्यों कराया अग्नि-स्नान
                     
                        श्रुति का आत्मविश्वास, अपने फैसले खुद करने का निश्चय और उनका भला या बुरा जो भी हो परिणाम स्वीकारने की तत्परता काबिले -तारीफ़ है। वह अन्धकार, से प्रेम करना, रावण को समझना तथा कुरूपता को पूजना चाहती है क्योंकि उन्होंने क्रमश: प्रकाश की महत्ता , सीता की दृढ़ता तथा सुन्दरता को उद्घाटित किया किंतु इन सबको भुला भी देना चाहती है कि  प्रकाश, दृढ़ता और सुनदरता अधिक महत्वपूर्ण है। यह वैचारिक स्पष्टता और साफगोई इन कविताओं को पठनीय के साथ-साथ चिन्तनीय भी बनाती हैं।

                        'आशंका' इस संकलन की एक महत्वपूर्ण कविता है। यहाँ कवयित्री अपने पिटा के जन्मस्थान से जुड़ना चाहती है क्योंकि उसे यह आशंका है कि ऐसा ण करने पर कहीं उसके बच्चे भी उसके जन्म स्थान से जुड़ने से इंकार न कर दें। पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलने और पालने वाले जीवन-मूल्यों और परंपराओं की जमीन पर रची गयी इस रचना का स्वर अन्य से भिन्न किंतु यथार्थपूर्ण है।

                        एक और मार्मिक कविता है 'पापा का गुस्सा'। पापा के गुस्से से डरनेवाली बच्ची का सोचना स्वाभाविक है कि पापा को गुस्सा क्यों आता है? बड़े होने पर उसे प्रश्न का उत्तर मिलता है-
आज समझ पाई हूँ
उनके गुस्से का रहस्य
पापा दरअसल गुस्सा नहीं होते
दुखी होते हैं
जब वे डांटते
तो हमारे लिए ही नहीं
उनके लिए भी सजा होती

                        आत्मावलोकन और आत्मालोचन इन कविताओं में जहाँ-तहाँ अन्तर्निहित है। कवयित्री गुलाब को तोड़ कर गुल्दासे में सजती है पर खुद को चोट पहुँचाने वाले को क्षमा नहीं कर पाती, भूखे भिखारी को अनदेखा कर देती है,  अशक्त वृद्ध को अपनी सीट नहीं देती, अभाव में मुस्कुरा नहीं पाती, सहज ही भूल नहीं स्वीकारती यह तो हम सब करते हैं पर हमसे भिन्न कवयित्री इसे कवि होने की अपात्रता मानती है-
नहीं, मैं कवि नहीं
मैं तो मात्र
रचयिता हूँ
कवि तो वह है
जो मेरी कविता को जीता है।

                        जिस कविता के शीर्षक से पुस्तक के नामकरण हुआ है, वह है 'कशमकश'। अजब विडम्बना है कि आदमी की पहचान उसके अस्तित्व, कार्यों या सुयश से नहीं दस्तावेजों से होती है-
मैंने
पेनकार्ड रखा
पासपोर्ट, आधार कार्ड
मतदाता प्रमाण पत्र
खुद से जुड़े तमाम दस्तावेज सहेजे
और निकल पडी
लेकिन यह क्या
खुद को रखना तो भूल हे एगी
मुड़कर देखा तो
दूर तक नज़र नहीं आई मैं
अजीब कशमकश है
खुद को तलाशने पीछे लौटूं
या खुद के बगैर आगे बढ़ जाऊँ...

                       ये कवितायेँ बाहर की विसंगतियों का आकलन कर भीतर झाँकती हैं।  बाहर से उठे सवालों के हल भीतर तलाशती कविताओं की भाषा अकृत्रिम और जमीनी होना सोने में सुहागा है। ये कविताएं आपको पता नहीं रहने देती, आपके कथ्य का भोक्ता बना देती हैं, यही कवयित्री और उसकी कारयित्री प्रतिभा की सफलता है।
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doha karyashala

नव लेखन कार्य शाला:
दोहा सलिला
सुनीता सिंह
*
पीड़ा मे क्यो डूबता, बैठ करे संताप।
ले बीड़ा उपचार का, अपना रहबर आप।।
.
क्यों पीड़ा से हारकर, करे मनुज संताप?
ले बीड़ा उपचार का, बन निज रहबर आप।।
*
देती कुदरत राह भी , निर्भय देख प्रयास।
कातर नयना क्यो खड़ा, ढूँढ तमस मे आस।।
.
कुदरत देती राह यदि, हो अनवरत प्रयास।
नयन झ्ककर क्यों खड़ा?, ढूँढ तमस में आस।।
*
रात अंधियारी घनी, लगे प्राण ले जाय।
भोर सुहानी सी कभी, रोक नहीं पर पाय।।
.
घोर अँधेरी रात से, भीत न हो नादान।
भोर सुहानी कब रुके?, ऊगे अभय विहान।।
*
रोक सके कोई नहीं, होनी हो सो होय।
घटती अनहोनी कहीं, जिजीविषा न खोय।।
.
रोक न सकता कोई भी, होनी होती मीत।
अनहोनी होती नहीं, यही जगत की रीत।।
*
खेवनहार सँवारता, खेवत जो सब नाव।
ईश नाम मरहम रहा, फिर चाहे जो घाव।।
.
खेवनहार लगा रहा, पार सभी की नाव।
ईश नाम मरहम लगा, चाहे जो हो घाव।।
*
राधा मोहन को जपे, मोहन राधा नाम।
अनहोनी फिर भी रही, पीड़ा रही तमाम।।
.
राधा मोहन को जपे, मोहन राधा नाम।
अनहोनी फिर भी हुई, पीड़ित उम्र तमाम।।
*
चाहो जो मिलता नहीं, मिले नहीं जो चाह।
देने वाला जानता, कौन सही है राह।
.
मनचाहा मिलता नहीं, किंतु तजो मत चाह।
देनेवाला दे-न दे, चलता चल निज राह।।
*
मोल चाहने का हुआ, चाह बिना बेकार।
नजर नजर का फेर है, नेह नजर दरकार ।।
.
मोल चाह का कौन दे?, चाह सदा अनमोल।
नजर-नजर का फेर है, नजर न बोली बोल।।
*
नीड़ नयन में नीर का, नहीं नजर का नूर।
संग नाम भगवान का, नजर न हो बेनूर।।
.
नीड़ नयन में नीर का, नहीं नजर का नूर। नयन बसे भगवान तो, नजर न हो बेनूर।
*
जीवन समझत युग गया, समझ सका ना कोय।
मन का भार उतारिए, जो होनी सो होय।।
.
जीवन जीते युग गया, जी पाया कब कौन?
क्या होगा मत सोचिए, होने दें रह मौन।।
*
@सुनीता सिंह (27-12-2017)

संशोधनोपरांत

सुन निज मन क्या कह रहा, देता क्या संदेश। सोच-विचारे पग बढ़े, भ्रमित हुए बिन लेश।।
पहले सोचा फिर किया, पर न सही परिणाम। मिले माथ पर जो लिखा, पीड़ा का क्या काम।। सबकी अपनी जिन्दगी, अपनी-अपनी राह। पर पथ अनुगामी बने, रहे न ऐसी चाह।। मिली आस दो पल रही, पुलक गयी फिर बीत। तड़ित उजाला रात में, तमस वही फिर रीत।। पुष्प सुवासित कर रहा, बगिया को चहुँओर। हवा तेज है क्या पता, कब त्रासद हो घोर।। भवसागर में चल रहा, लेकर भार अपार। पग-पग पर भँवरें खड़ीं, चल सब भार उतार। परत दर परत जम रही, हुई पीर हिमस्नात। पिघलाकर बारिश करो, धोकर मन आघात।। हस्ती सबकी है यहाँ, तारक, सूरज,चाँद। जिसकी जब बारी रही, छोड़ निकलता माँद।। जब विपदा मुश्किल- नहीं बचना हो आसान। राह भक्ति की तब चले, परा शक्ति को मान।। ह्रदय तोड़कर आपदा, कर दे जब मजबूर। मौन सफर भीतर हुआ, तब पहचाना नूर।। डूब गया अवसाद में, रहा दर्द से जूझ। मर्जी रब की ही चले , बात यही बस बूझ।। अंधकार दम घोंटता, प्राणवायु ही फाँस। पीर कलेजा चीरती, देता जुगनू झाँस।। प्राण निकलने को तड़े, अति से हो संत्रास। या फिर पीर पहाड़ सी, बने काल का ग्रास।। पीड़ा को वीणा बना, छेड़ दर्द के गीत। जो मिलना मिलकर रहे, विलन या विरह मीत।। द्वेष बढ़ाने से कभी, मिटे न निज मन क्लेश। दिया जला समभाव का, तब सुरभित संदेश । छाई धुंध कुहास की, राह धुएँ में लीन। भानु-डीप भी लापता, रहे थरथरा दीन।। कहे वचन शीतल सदा, घोलें शहद-मिठास। औरों से ज्यादा मिले, खुद को ही मधुमास।।
***

baal kavita

बाल कविता 
मुहावरा कौआ स्नान 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
कौआ पहुँचा नदी किनारे, शीतल जल से काँप-डरा रे! 
कौवी ने ला कहाँ फँसाया, राम बचाओ फँसा बुरा रे!!
*
पानी में जाकर फिर सोचे, व्यर्थ नहाकर ही क्या होगा?
रहना काले का काला है, मेकप से मुँह गोरा होगा। .
*
पूछा पत्नी से 'न नहाऊँ, क्यों कहती हो बहुत जरूरी?'
पत्नी बोली आँख दिखाकर 'नहीं चलेगी अब मगरूरी।।'
*
नहा रहे या बेलन, चिमटा, झाड़ू लाऊँ सबक सिखाने
कौआ कहे 'न रूठो रानी! मैं बेबस हो चला नहाने'
*
निकट नदी के जाकर देखा पानी लगा जान का दुश्मन
शीतल जल है, करूँ किस तरह बम भोले! मैं कहो आचमन?
*
घूर रही कौवी को देखा पैर भिगाये साहस करके
जान न ले ले जान!, मुझे जीना ही होगा अब मर-मर के
*
जा पानी के निकट फड़फड़ा पंख दूर पल भर में भागा
'नहा लिया मैं, नहा लिया' चिल्लाया बहुत जोर से कागा
*
पानी में परछाईं दिखाकर बोला 'डुबकी आज लगाई
अब तो मेरा पीछा छोडो, ओ मेरे बच्चों की माई!'
*
रोनी सूरत देख दयाकर कौवी बोली 'धूप ताप लो
कहो नर्मदा मैया की जय, नाहक मुझको नहीं शाप दो'
*
गाय नर्मदा हिंदी भारत भू पाँचों माताओं की जय
भागवान! अब दया करो चैया दो तो हो पाऊँ निर्भय
*
उसे चिढ़ाने कौवी बोली' आओ! संग नहा लो-तैर'
कर ''कौआ स्नान'' उड़ा फुर, अब न निभाओ मुझसे बैर
*
बच्चों! नित्य नहाओ लेकिन मत करना कौआ स्नान
रहो स्वच्छ, मिल खेलो-कूदो, पढ़ो-बढ़ो बनकर मतिमान
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chhand bahr ka mool hai 1

कार्यशाला-
छंद बहर का मूल है- १.
*
उर्दू की १९ बहरें २ समूहों में वर्गीकृत की गयी हैं।
१. मुफरद बहरें-
इनमें एक ही अरकान या लय-खण्ड की पुनरावृत्ति होती है।
इनके ७ प्रकार (बहरे-हज़ज सालिम, बहरे-ऱज़ज सालिम, बहरे-रमल सालिम, बहरे-कामिल, बहरे-वाफिर, बहरे-मुतक़ारिब तथा बहरे-मुतदारिक) हैं।
२. मुरक्कब बहरें-
इनमें एकाधिक अरकान या लय-खण्ड मिश्रित होते हैं।
इनके १२ प्रकार (बहरे-मनसिरह, बहरे-मुक्तज़िब, बहरे-मुज़ारे, बहरे-मुजतस, बहरे-तवील, बहरे-मदीद, बहरे-बसीत, बहरे-सरीअ, बहरे-ख़फ़ीफ़, बहरे-जदीद, बहरे-क़रीब तथा बहरे-मुशाकिल) हैं।
*
क. बहरे-मनसिरह
बहरे-मनसिरह मुसम्मन मतबी मौक़ूफ़-
इस बहर में बहुत कम लिखा गया है। इसके अरकान 'मुफ़तइलुन फ़ायलात मुफ़तइलुन फ़ायलात' (मात्राभार ११११२ २१२१ ११११२ २१२१) हैं।
यह १८ वर्णीय अथधृति जातीय शारद छंद है जिसमें ९-९ पर यति तथा पदांत में जगण (१२१) का विधान है।
यह २४ मात्रिक अवतारी जातीय छंद है जिसमें १२-१२ मात्राओं पर यति तथा पदांत में १२१ है।
उदाहरण-
१.
थक मत, बोझा न मान, कदम उठा बार-बार
उपवन में शूल फूल, भ्रमर कली पे निसार
पगतल है भू-बिछान, सर पर है आसमान
'सलिल' नहीं भूल भूल, दिन-दिन होगा सुधार
२.
जब-जब तूने कहा- 'सच', तब झूठा बयान
सच बन आया समक्ष, विफल हुआ न्याय-दान
उर्दू व्याकरण के अनुसार गुरु के स्थान पर २ लघु या दो लघु के स्थान पर गुरु मात्रा का प्रयोग करने पर छंद का वार्णिक प्रकार बदल जाता है जबकि मात्रिक प्रकार तभी बदलता है जब यह सुविधा पदांत में ली गयी हो। हिंदी पिंगल-नियम यह छूट नहीं देते।
३.
अरकान 'मुफ्तइलुन फ़ायलात मुफ्तइलुन फ़ायलात' (मात्राभार २११२ २१२१ २११२ २१२१)
क्यों करते हो प्रहार?, झेल सकोगे न वार
जोड़ नहीं, छीन भी न, बाँट कभी दे पुकार
कायम हो शांति-सौख्य, भूल सकें भेद-भाव
शांत सभी हों मनुष्य, किस्मत लेंगे सुधार
४.
दिल में हम अप/ने नियाज़/रखते हैं सो/तरह राज़
सूझे है इस/को ये भेद/जिसकी न हो/चश्मे-कोर
प्रथम पंक्ति में ए, ओ, अ की मात्रा-पतन दृष्टव्य।
(सन्दर्भ ग़ज़ल रदीफ़-काफ़िया और व्याकरण, डॉ. कृष्ण कुमार 'बेदिल')
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laghkatha

लघुकथा-
सफ़ेद झूठ
*
गाँधी जयंती की सुबह दूरदर्शन पर बज रहा था गीत 'दे दी हमें आज़ादी बिना खड्ग बिना ढाल', अचानक बेटे ने उठकर टीवी बंद कर दिया। कारण पूछने पर बोला- '१८५७ से लेकर १९४६ में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के अज्ञातवास में जाने तक क्रांतिकारियों ने आत्म-बलिदान की अनवरत श्रंखला की अनदेखी कर ब्रिटेन संसद सदस्यों से में प्रश्न उठवानेवालों को शत-प्रतिशत श्रेय देना सत्य से परे है. सत्यवादिता के दावेदार के जन्म दिन पर कैसे सहन किया जा सकता है सफ़ेद झूठ?
***

दोहा दुनिया

शिव बाघाम्बर पहनकर,
होते वृषभ-सवार.
शिवा बाघ पर विराजें,
किंतु नहीं तकरार.
.
गणपति शिव के सुत नहीं
देहज- मानस पूत.
जननि न कार्तिक की शिवा,
माँ-सुत बंध अकूत.
.
गणपति मति का कोष हैं,
ऋद्धि-सिद्धि नित साथ.
विघ्न मूस-आसीन हो,
निष्कंटक गणनाथ.
.
कार्तिक संग मयूर है,
जिसे न सोहे सर्प.
संग-साथ हिलमिल रहें.
भुला शत्रुता-दर्प.
.
केर-बेर के संग सा,
है शिव का परिवार.
शिव हैं पशुपतिनाथ पर,
करें जगत्-उद्धार.
.
रखें संतुलन-समन्वय,
भले-बुरे के बीच.
शिव सिखलाते जन्म दे,
शुभ को आदिम कीच.
.
घृणा-द्वेष मत पालिए,
रखें नियंत्रित क्रोध.
सबका शुभ करते रहें,
करा रहे शिव बोध.
...
28.12.2017

बुधवार, 27 दिसंबर 2017

laghukatha

लघुकथा -
कब्रस्तान
*
महाविद्यालय के प्राचार्य मुख्य अतिथि को अपनी संस्था की गुणवत्ता और विशेषताओं की जानकारी दे रहे थे. पुस्तकालय दिखलाते हुए जानकारी दी की हमारे यहाँ विषयों की पाठ्य पुस्तकें तथा सन्दर्भ ग्रंथों के साथ-साथ अच्छा साहित्य भी है. हम हर वर्ष अच्छी मात्र में साहित्यिक पुस्तकें भी क्रय करते हैं.
आतिथि ने उनकी जानकारी पर संतोष व्यक्त करते हुए पुस्तकालय प्रभारी से जानना चाहा कि गत २ वर्षों में कितनी पुस्तकें क्रय की गयीं, विद्यार्थियों ने कितनी पुस्तकें पढ़ने हेतु लीं तथा किन पुस्तकों की माँग अधिक थी? उत्तर मिला इस वर्ष क्रय की गयी पुस्तकों की आदित जांच नहीं हुई है, गत वर्ष खरीदी गयी पुस्तकें दी नहीं जा रहीं क्योंकि विद्यार्थी या तो विलम्ब से वापिस करते हैं या पन्ने फाड़ लेते हैं.
नदी में बहते पानी की तरह पुस्तकालय से प्रतिदिन पुस्तकों का आदान-प्रदान न हो तो उसका औचित्य और सार्थकता ही क्या है? तब तो वह किताबों का कब्रस्तान ही हो जायेगा, अतिथि बोले और आगे चल दिए.
***

navgeet

नवगीत
*
माया महा ठगिनी हम जानी 
ममता मोहित राह भुलानी 
मल्ल मुलायम कुम्हला रए रे!
मुल्ला मत भए दाना-पानी
*
ठगे गए सिवपाल बिचारे
बेटा पड़ा बाप पर भारी
शकुनी लालू फेंकें पासा
नया महाभारत है जारी
रो-रो राहुल पगला रओ रे!
जैसे मर गई बाकी नानी
*
फारुख अब्दुल्ला बर्रा रओ
घास न डाले तन्नक कोई
कमुनिस्टों खों नींद नें आ रई
सूल चुभें, जो फसलें बोई
पोल खुल गई सम्मानों की
लौटाने की करम कहानी
*
काली रोकड़ जमा हो गई
काला मनुआ अब लौं बाकी
उगरे-निगरे पीर घनेंरी
खाली बोतल भरे नें साकी
सौ चूहे खा बिना डकारे
चैनल कर रए गलत बयानी
***
२७-१२-१६