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गुरुवार, 8 जून 2017

smruti geet

प्रख्यात भूविद डॉ. एस.एस. श्रीवास्तव लखनऊ दिवंगत
गत २ जून २०१७ को प्रख्यात भूविद डॉ. एस. एस. श्रीवास्तव का लम्बी - जटिल बीमारी के पश्चात् देहावसान हो गया. सहधर्मिणी श्रीमती सुमन श्रीवास्तव (कवयित्री-लघुकथाकार) ने जिस समर्पण, कुशलता, धैर्य, निष्ठा तथा निरंतरतापूर्वक अपने जीवनसाथ की श्वासें बचाने के लिए काल से लोहा लिया वह असाधारण है। डॉ. श्रीवास्तव के अल्प सानिंध्य में उनकी जिजीविषा, जीवट और मानवीयता के जिन पहलुओं से परिचित हो सका वह प्रणम्य है। माननीय सुमन जी, स्वजनों-परिजनों के शोक में सहभागी होते हुए दिवंगत महाप्राण की स्मृतियों को नतशिर नमन.
विश्व वाणी हिंदी भाषा-साहित्य संस्थान डॉ. एस. एस. श्रीवास्तव के परलोक प्रस्थान जनित पीड़ा के क्षणों में आत्मीय सुमन जी, पुत्र डॉ. सुधांशु तथा स्वजनों के प्रति संवेदना व्यक्त करता है। दिवंगत की पुण्य स्मृति में शान्ति पाठ तथा हवन ९ जून २०१७ को प्रात: ९ बजे श्रीवास्तव निवास बी. जी. २, विंकन होम्स, ६ फान ब्रेक अवेन्यु, सरोजिनी नायडू मार्ग लखनऊ में है।
***
स्मृति गीत-
दादा नहीं रहे...
*
कैसे हो विश्वास
हमारे दादा नहीं रहे?
*
दुर्बल तन
मन वज्र सरीखा।
तेज आत्म का
मुख पर देखा।
तन दधीचि सा
मुस्काते लब-
कितना कुछ
कह डाला पल में
लेकिन बिना कहे
कैसे हो विश्वास
हमारे दादा नहीं रहे?
*
भूविद थे
उदार धरती सम।
सु-मन मना
अँखियाँ चमकीं नम।
सुमन-सुवासित
श्वास-श्वास तव,
अस्फुट ध्वनियों के
वर्तुल बुन
किस्से अगिन कहे?
कैसे हो विश्वास
हमारे दादा नहीं रहे?
*
यादें मन में
अमिट-अमर शत।
फिर-फिर जीवित
होता है गत।
भीष्म पितामह
शर-शैया पर.
अविचल लेटे
मन ही मन में
नव संकल्प तहे
कैसे हो विश्वास
हमारे दादा नहीं रहे?
*
अब भी जगत
वही-वैसा है।
किन्तु न कुछ
पहले जैसा है।
सुमन-भाल का
सूर्य ग्रहण से
अस्त हुआ न दहे.
कैसे हो विश्वास
हमारे दादा नहीं रहे?
*
अक्षय निधि है
कर्म विरासत।
हम सब गहें
न तजें सिया-सत।
दर्द सुमन-मन का
सहभागी हो मन
मौन तहे.
कैसे हो विश्वास
हमारे दादा नहीं रहे?
****

बुधवार, 7 जून 2017

sagar sikata seep















चित्र पर रचना
** सिकता, सागर, सीप **
----------------------
सिकता हूँ वसुधा की बिटिया मेरी गोदी में सागर.
मेरे आँचल में नद-निर्झर जिनसे भरते घट-गागर.
अहं शिलाओं का खंडित हो मुझको देता जन्म रहा.
गले लगाते रही पंक मैं पंकज जग ने तभी गहा.
मेरी संतानें घोंघे हैं सीपी जिनका कड़ा कवच.
मोती-मुक्ता पलते जिनमें शंख न मनु से पाते बच.
बच्चे फैला पैर बनाते घरघूला मैं मुस्काती.
छोटी हरकत बड़े बड़ों की देख कहूँ सच दुःख पाती.
लोभ तुम्हारा दंशित करता,खोद-बेचते करते लोभ.
भवन बना संतोष न पाते, कभी न जाता मन का क्षोभ.
थपक-थपक सागर की लहरें, मुझे सांत्वना देती हैं.
तुम मनुजों सी नहीं स्वार्थी, दाम न कुछ भी लेती हैं.
दिनकर आता, खूब तपाता, चन्दा शीतल करता है.
क्रीडा करती शुभ्र ज्योत्सना, रूप देख शशि मरता है.
प्रकृति-पुत्र हम,नियति नटी के, ऋतु-चक्रों अनुसार ढलें.
मनुज सीख ले, प्रकृति वक्ष पर निज हित हेतु न दाल दले.
मलिन न सिकता-सलिल को करे, स्वच्छ रखे सारे जग को.
पर्यावरण न दूषितकर, मंगल जगती का तनिक करे.
***

geeta chhand, kaampoop chhand

छंद सलिला:
गीता छंद
संजीव
*
छंद-लक्षण: जाति महाभागवत, प्रति पद - मात्रा २६ मात्रा, यति १४ - १२, पदांत गुरु लघु.
लक्षण छंद:
चौदह भुवन विख्यात है , कुरु क्षेत्र गीता-ज्ञान
आदित्य बारह मास नित , निष्काम करे विहान
अर्जुन सदृश जो करेगा , हरी पर अटल विश्वास
गुरु-लघु न व्यापे अंत हो , हरि-हस्त का आभास
संकेत: आदित्य = बारह
उदाहरण:
१. जीवन भवन की नीव है , विश्वास- श्रम दीवार
दृढ़ छत लगन की डालिये , रख हौसलों का द्वार
ख्वाबों की रखें खिड़कियाँ , नव कोशिशों का फर्श
सहयोग की हो छपाई , चिर उमंगों का अर्श
२. अपने वतन में हो रहा , परदेश का आभास
अपनी विरासत खो रहे , किंचित नहीं अहसास
होटल अधिक क्यों भा रहा? , घर से हुई क्यों ऊब?
सोचिए! बदलाव करिए , सुहाये घर फिर खूब
३. है क्या नियति के गर्भ में , यह कौन सकता बोल?
काल पृष्ठों पर लिखा क्या , कब कौन सकता तौल?
भाग्य में किसके बदा क्या , पढ़ कौन पाया खोल?
कर नियति की अवमानना , चुप झेल अब भूडोल।
४. है क्षितिज के उस ओर भी , सम्भावना-विस्तार
है ह्रदय के इस ओर भी , मृदु प्यार लिये बहार
है मलयजी मलय में भी , बारूद की दुर्गंध
है प्रलय की पदचाप सी , उठ रोक- बाँट सुगंध
७-६-२०१४
*********
(अब तक प्रस्तुत छंद: अखण्ड, अग्र, अचल, अचल धृति, अरुण, अवतार, अहीर, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रवज्रा, उड़ियाना, उपमान, उपेन्द्रवज्रा, उल्लाला, एकावली, कुकुभ, कज्जल, कामिनीमोहन, काव्य, कीर्ति, कुण्डल, कुडंली, गीता, गीतिका, गंग, घनाक्षरी, चौबोला, चंडिका, चंद्रायण, छवि, जग, जाया, तांडव, तोमर, त्रिलोकी, दिक्पाल, दीप, दीपकी, दोधक, दृढ़पद, नित, निधि, निश्चल, प्लवंगम्, प्रतिभा, प्रदोष, प्रभाती, प्रेमा, बाला, भव, भानु, मंजुतिलका, मदनअवतार, मदनाग, मधुभार, मधुमालती, मनहरण घनाक्षरी, मनमोहन, मनोरम, मानव, माली, माया, माला, मोहन, मृदुगति, योग, ऋद्धि, रसामृत, रसाल, राजीव, राधिका, रामा, रूपमाला, रोला, लीला, वस्तुवदनक, वाणी, विरहणी, विशेषिका, शक्तिपूजा, शशिवदना, शाला, शास्त्र, शिव, शुभगति, शोभन, शंकर, सरस, सार, सारस, सिद्धि, सिंहिका, सुखदा, सुगति, सुजान, सुमित्र, संपदा, हरि, हेमंत, हंसगति, हंसी)

छंद सलिला:
कामरूप छंद
संजीव
*
लक्षण छंद:
कामरूप छंद , दे आनंद , रचकर खुश रहिए
मुँहदेखी नहीं , बात हमेशा , खरी-खरी कहिए
नौ निधि सात सुर , दस दिशाएँ , कीर्ति गाथा कहें
अंत में अंतर , भुला लघु-गुरु , तज- रिक्त कर रहें
संकेत: आदित्य = बारह
उदाहरण:
१. गले लग जाओ , प्रिये! आओ , करो पूरी चाह
गीत मिल गाओ , प्रिये! आओ , मिटे सारी दाह
दूरियाँ कम कर , मुस्कुराओ , छिप भरो मत आह
मन मिले मन से , खिलखिलाओ , करें मिलकर वाह
२. चलें विद्यालय , पढ़ें-लिख-सुन , गुनें रहकर साथ
करें जुटकर श्रम , रखें ऊँचा , हमेशा निज माथ
रोप पौधे कुछ , सींच हर दिन , करें भू को हरा
प्रदूषण हो कम , हँसे जीवन / हर मनुज हो खरा
३. ईमान की हो , फिर प्रतिष्ठा , प्रयासों की जीत
दुश्मनों की हो , पराजय ही / विजय पायें मीत
आतंक हो अब , खत्म नारी , पा सके सम्मान
मुनाफाखोरी , न रिश्वत हो , जी सके इंसान
४. है क्षितिज के उस ओर भी , सम्भावना-विस्तार
है ह्रदय के इस ओर भी , मृदु प्यार लिये बहार
है मलयजी मलय में भी , बारूद की दुर्गंध
है प्रलय की पदचाप सी , उठ रोक- बाँट सुगंध
७-६-२०१४
*********
(अब तक प्रस्तुत छंद: अखण्ड, अग्र, अचल, अचल धृति, अरुण, अवतार, अहीर, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रवज्रा, उड़ियाना, उपमान, उपेन्द्रवज्रा, उल्लाला, एकावली, कुकुभ, कज्जल, कामरूप, कामिनीमोहन, काव्य, कीर्ति, कुण्डल, कुडंली, गीता, गीतिका, गंग, घनाक्षरी, चौबोला, चंडिका, चंद्रायण, छवि, जग, जाया, तांडव, तोमर, त्रिलोकी, दिक्पाल, दीप, दीपकी, दोधक, दृढ़पद, नित, निधि, निश्चल, प्लवंगम्, प्रतिभा, प्रदोष, प्रभाती, प्रेमा, बाला, भव, भानु, मंजुतिलका, मदनअवतार, मदनाग, मधुभार, मधुमालती, मनहरण घनाक्षरी, मनमोहन, मनोरम, मानव, माली, माया, माला, मोहन, मृदुगति, योग, ऋद्धि, रसामृत, रसाल, राजीव, राधिका, रामा, रूपमाला, रोला, लीला, वस्तुवदनक, वाणी, विरहणी, विशेषिका, शक्तिपूजा, शशिवदना, शाला, शास्त्र, शिव, शुभगति, शोभन, शंकर, सरस, सार, सारस, सिद्धि, सिंहिका, सुखदा, सुगति, सुजान, सुमित्र, संपदा, हरि, हेमंत, हंसगति, हंसी)

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अंतरजाल पर पहली बार :
त्रिपदिक नवगीत :
नेह नर्मदा तीर पर
- संजीव 'सलिल' 
*
नेह नर्मदा तीर पर,
अवगाहन कर धीर धर,
पल-पल उठ-गिरती लहर...
*
कौन उदासी-विरागी,
विकल किनारे पर खड़ा?
किसका पथ चुप जोहता?
निष्क्रिय, मौन, हताश है.
या दिलजला निराश है?
जलती आग पलाश है.
जब पीड़ा बनती भँवर,
खींचे तुझको केंद्र पर,
रुक मत घेरा पार कर...
.
पग आये पौधे लिये,
ज्यों नव आशा के दिये.
नर्तित थे हुलसित हिये.
सिकता कण लख नाचते.
कलकल ध्वनि सुन झूमते.
पर्ण कथा नव बाँचते.
बम्बुलिया के स्वर मधुर,
पग मादल की थाप पर,
लिखें कथा नव थिरक कर...
*
७.६.२०१०

baal geet

बाल कविता :
तुहिना-दादी
संजीव 'सलिल'
*
तुहिना नन्हीं खेल कूदती.
खुशियाँ रोज लुटाती है.
मुस्काये तो फूल बरसते-
सबके मन को भाती है.
बात करे जब भी तुतलाकर
बोले कोयल सी बोली.
ठुमक-ठुमक चलती सब रीझें
बाल परी कितनी भोली.
दादी खों-खों करतीं, रोकें-
टोंकें सबको : 'जल्द उठो.
हुआ सवेरा अब मत सोओ-
काम बहुत हैं, मिलो-जुटो.
काँटें रुकते नहीं घड़ी के
आगे बढ़ते जायेंगे.
जो न करेंगे काम समय पर
जीवन भर पछतायेंगे.'
तुहिना आये तो दादी जी
राम नाम भी जातीं भूल.
कैयां लेकर, लेंय बलैयां
झूठ-मूठ जाएँ स्कूल.
यह रूठे तो मना लाये वह
वह गाये तो यह नाचे.
दादी-गुड्डो, गुड्डो-दादी
उल्टी पुस्तक ले बाँचें.
*
७-६-२०१०
तुहिना बिटिया अब आई. एच. ए. टी. हरदोई में डिस्ट्रिक्ट न्यूट्रीशन स्पेशलिस्ट है.

सोमवार, 5 जून 2017

navgeet

नवगीत
*
सच हर झूठ
झूठ हर सच है
*
तू-तू, मैं-मैं कर हम हारे
हम न मगर हो सके बेचारे
तारणहार कह रहे उनको
मत दे जिनके भाग्य सँवारे
ठगित देवयानी
भ्रम कच है
सच हर झूठ
झूठ हर सच है
*
काश आँख से चश्मा उतरे
रट्टू तोता यादें बिसरे
खुली आँख देखे क्या-कैसा?
छोड़ झुनझुना रोटी कस रे!
राग न त्याज्य
विराग न शुभ है
सच हर झूठ
झूठ हर सच है
*
'खुला' न खुला बंद है तब तक
तीन तलाक मिल रहे जब तक
एसिड डालो तो प्रचार हो
दूध मिले नागों को कब तक?
पत्थरबाज
न अपना कुछ है
सच हर झूठ
झूठ हर सच है
*


navgeet

नवगीत-
*
एसिड की 
शीशी पर क्यों हो 
नाम किसी का?
*
अल्हड, कमसिन, सपनों को 
आकार मिल रहा। 
 अरमानों का कमल 
यत्न-तालाब खिल रहा।
दिल को भायी कली 
भ्रमर गुंजार करे पर-
मौसम को खिलना-हँसना 
क्यों व्यर्थ खल रहा?
तेज़ाबी बारिश की जिसने 
पात्र मौत का-
एसिड की 
शीशी पर क्यों हो 
नाम किसी का?
*
व्यक्त असहमति करना 
क्या अधिकार नहीं है?
जबरन मनमानी क्या 
 पापाचार नहीं है? 
एसिड-अपराधी को 
 एसिड से नहला दो-
निरपराध की पीर 
 तनिक स्वीकार नहीं है।
क्यों न किया अहसास-
पीड़ितों की पीड़ा का? 
एसिड की 
शीशी पर क्यों हो 
नाम किसी का?
*
अपराधों से नहीं, 
आयु का लेना-देना।
नहीं साधना स्वार्थ, 
 सियासत-नाव न खेना।
दया नहीं सहयोग 
सतत हो, सबल बनाकर-
दण्ड करे निर्धारित 
पीड़ित जन की सेना।
बंद कीजिए नाटक 
खबरों की क्रीड़ा का
एसिड की 
शीशी पर क्यों हो 
नाम किसी का?
*

ankik upmaan

छंद शास्त्र में आंकिक उपमान:
संजीव
 *
छंद शास्त्र में मात्राओं या वर्णों संकेत करते समय ग्रन्थों में आंकिक शब्दों का प्रयोग किया गया है। ऐसे कुछ शब्द नीचे सूचीबद्ध किये गये हैं। इनके अतिरिक्त आपकी जानकारी में अन्य शब्द हों तो कृपया, जोड़िये।
*
एक - ॐ, परब्रम्ह 'एकोsहं द्वितीयोनास्ति', क्षिति, चंद्र, भूमि, नाथ, पति, गुरु।
 पहला - वेद ऋग्वेद, युग सतयुग, देव ब्रम्हा, वर्ण ब्राम्हण, आश्रम: ब्रम्हचर्य, पुरुषार्थ अर्थ,
 इक्का, एकाक्षी काना, एकांगी इकतरफा, अद्वैत एकत्व,
दो - देव: अश्विनी-कुमार। पक्ष: कृष्ण-शुक्ल। युग्म/युगल: प्रकृति-पुरुष, नर-नारी, जड़-चेतन। विद्या: परा-अपरा। इन्द्रियाँ: नयन/आँख, कर्ण/कान, कर/हाथ, पग/पैर। लिंग: स्त्रीलिंग, पुल्लिंग।
 दूसरा- वेद: सामवेद, युग त्रेता, देव: विष्णु, वर्ण: क्षत्रिय, आश्रम: गृहस्थ, पुरुषार्थ: धर्म,
 महर्षि: द्वैपायन/व्यास। द्वैत विभाजन,
 तीन/त्रि - देव / त्रिदेव/त्रिमूर्ति: ब्रम्हा-विष्णु-महेश। ऋण: देव ऋण, पितृ-मातृ ऋण, ऋषि ऋण। अग्नि: पापाग्नि, जठराग्नि, कालाग्नि। काल: वर्तमान, भूत, भविष्य। गुण: । दोष: वात, पित्त, कफ (आयुर्वेद)। लोक: स्वर्ग, भू, पाताल / स्वर्ग भूलोक, नर्क। त्रिवेणी / त्रिधारा: सरस्वती, गंगा, यमुना। ताप: दैहिक, दैविक, भौतिक। राम: श्री राम, बलराम, परशुराम। ऋतु: पावस/वर्षा शीत/ठंड ग्रीष्म।मामा:कंस, शकुनि, माहुल।
 तीसरा- वेद: यजुर्वेद, युग द्वापर, देव: महेश, वर्ण: वैश्य, आश्रम: वानप्रस्थ, पुरुषार्थ: काम,
 त्रिकोण, त्रिनेत्र = शिव, त्रिदल बेल पत्र, त्रिशूल, त्रिभुवन, तीज, तिराहा, त्रिमुख ब्रम्हा। त्रिभुज तीन रेखाओं से घिरा क्षेत्र।
 चार - युग: सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग, कलियुग। धाम: द्वारिका, बद्रीनाथ, जगन्नाथपुरी, रामेश्वरम धाम। पीठ: शारदा पीठ द्वारिका, ज्योतिष पीठ जोशीमठ बद्रीधाम, गोवर्धन पीठ जगन्नाथपुरी, श्रृंगेरी पीठ। वेद: ऋग्वेद, अथर्वेद, यजुर्वेद, सामवेद।आश्रम: ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यास। अंतःकरण: मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार। वर्ण: ब्राम्हण, क्षत्रिय, वैश्य शूद्र। पुरुषार्थ: अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष। दिशा: पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण। फल: । अवस्था: शैशव/बचपन, कैशोर्य/तारुण्य, प्रौढ़ता, वार्धक्य।धाम: बद्रीनाथ, जगन्नाथपुरी, रामेश्वरम, द्वारिका। विकार/रिपु: काम, क्रोध, मद, लोभ।
 अर्णव, अंबुधि, श्रुति,
चौथा - वेद: अथर्वर्वेद, युग कलियुग, वर्ण: शूद्र, आश्रम: सन्यास, पुरुषार्थ: मोक्ष,
 चौराहा, चौगान, चौबारा, चबूतरा, चौपाल, चौथ, चतुरानन गणेश, चतुर्भुज विष्णु, चार भुजाओं से घिरा क्षेत्र।, चतुष्पद चार पंक्ति की काव्य रचना, चार पैरोंवाले पशु।, चौका रसोईघर, क्रिकेट के खेल में जमीन छूकर सीमाँ रेखा पार गेंद जाना, चार रन।
 पाँच/पंच - गव्य: गाय का दूध, दही, घी, गोमूत्र, गोबर। देव: गणेश, विष्णु, शिव, देवी, सूर्य। तत्त्व: पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश। अमृत: दुग्ध, दही, घृत, मधु, नर्मदा/गंगा जल। अंग/पंचांग: । पंचनद: । ज्ञानेन्द्रियाँ: आँख, नाक, कान, जीभ, त्वचा। कर्मेन्द्रियाँ: हाथ, पैर,आँख, कान, नाक। कन्या: ।, प्राण ।, शर: ।, प्राण: ।, भूत: ।, यक्ष: ।,
 इशु: । पवन: । पांडव पाण्डु के ५ पुत्र युधिष्ठिर भीम अर्जुन नकुल सहदेव। शर/बाण: । पंचम वेद: आयुर्वेद।
पंजा, पंच, पंचायत, पंचमी, पंचक, पंचम: पांचवा सुर, पंजाब/पंचनद: पाँच नदियों का क्षेत्र, पंचानन = शिव, पंचभुज पाँच भुजाओं से घिरा क्षेत्र,
छह/षट - दर्शन: वैशेषिक, न्याय, सांख्य, योग, पूर्व मीसांसा, दक्षिण मीसांसा। अंग: ।, अरि: ।, कर्म/कर्तव्य: ।, चक्र: ।, तंत्र: ।, रस: ।, शास्त्र: ।, राग:।, ऋतु: वर्षा, शीत, ग्रीष्म, हेमंत, वसंत, शिशिर।, वेदांग: ।, इति:।, अलिपद: ।
 षडानन कार्तिकेय, षट्कोण छह भुजाओं से घिरा क्षेत्र,
सात/सप्त - ऋषि - विश्वामित्र, जमदग्नि, भारद्वाज, गौतम, अत्रि, वशिष्ठ एवं कश्यप। पुरी- अयोध्या, मथुरा, मायापुरी हरिद्वार, काशी वाराणसी , कांची (शिन कांची - विष्णु कांची), अवंतिका उज्जैन और द्वारिका। पर्वत: ।, अंध: ।, लोक: ।, धातु: ।, सागर: ।, स्वर: सा रे गा मा पा धा नी।, रंग: सफ़ेद, हरा, नीला, पीला, लाल, काला।, द्वीप: ।, नग/रत्न: हीरा, मोती, पन्ना, पुखराज, माणिक, गोमेद, मूँगा।, अश्व: ऐरावत,
सप्त जिव्ह अग्नि,
सप्ताह = सात दिन, सप्तमी सातवीं तिथि, सप्तपदी सात फेरे,
आठ/अष्ट - वसु- धर, ध्रुव, सोम, अह, अनिल, अनल, प्रत्युष और प्रभाष। योग- यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि। लक्ष्मी - आग्घ, विद्या, सौभाग्य, अमृत, काम, सत्य , भोग एवं योग लक्ष्मी ! सिद्धियाँ: ।, गज/नाग: । दिशा: पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, ईशान, आग्नेय, नैऋत्य, वायव्य।, याम: ।,
 अष्टमी आठवीं तिथि, अष्टक आठ ग्रहों का योग, अष्टांग: ।,
अठमासा आठ माह में उत्पन्न शिशु,
 नव दुर्गा - शैल पुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कुष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायिनी, कालरात्रि, महागौरी एवं सिद्धिदात्री। गृह: सूर्य/रवि , चन्द्र/सोम, गुरु/बृहस्पति, मंगल, बुध, शुक्र, शनि, राहु, केतु।, कुंद: ।, गौ: ।, नन्द: ।, निधि: ।, विविर: ।, भक्ति: ।, नग: ।, मास: ।, रत्न ।, रंग ।, द्रव्य ।,
नौगजा नौ गज का वस्त्र/साड़ी।, नौरात्रि शक्ति ९ दिवसीय पर्व।, नौलखा नौ लाख का (हार)।,
नवमी ९ वीं तिथि।,
 दस - दिशाएं: पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, ईशान, आग्नेय, नैऋत्य, वायव्य, पृथ्वी, आकाश।, इन्द्रियाँ: ५ ज्ञानेन्द्रियाँ, ५ कर्मेन्द्रियाँ।, अवतार - मत्स्य, कच्छप, वराह, नरसिंह, वामन, परशुराम, श्री राम, कृष्ण, बुद्ध, कल्कि।
दशमुख/दशानन/दशकंधर/दशबाहु रावण।, दष्ठौन शिशु जन्म के दसवें दिन का उत्सव।, दशमी १० वीं तिथि।, दीप: ।, दोष: ।, दिगपाल: ।
 ग्यारह रुद्र- हर, बहुरुप, त्र्यंबक, अपराजिता, बृषाकापि, शँभु, कपार्दी, रेवात, मृगव्याध, शर्वा और कपाली।
एकादशी ११ वीं तिथि,
बारह - आदित्य: धाता, मित, आर्यमा, शक्र, वरुण, अँश, भाग, विवस्वान, पूष, सविता, तवास्था और विष्णु।, ज्योतिर्लिंग - सोमनाथ राजकोट, मल्लिकार्जुन, महाकाल उज्जैन, ॐकारेश्वर खंडवा, बैजनाथ, रामेश्वरम, विश्वनाथ वाराणसी, त्र्यंबकेश्वर नासिक, केदारनाथ, घृष्णेश्वर, भीमाशंकर, नागेश्वर। मास: चैत्र/चैत, वैशाख/बैसाख, ज्येष्ठ/जेठ, आषाढ/असाढ़ श्रावण/सावन, भाद्रपद/भादो, अश्विन/क्वांर, कार्तिक/कातिक, अग्रहायण/अगहन, पौष/पूस, मार्गशीर्ष/माघ, फाल्गुन/फागुन। राशि: मेष, वृषभ, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुंभ, कन्यामेष, वृषभ, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या।, आभूषण: बेंदा, वेणी, नथ,लौंग, कुण्डल, हार, भुजबंद, कंगन, अँगूठी, करधन, अर्ध करधन, पायल. बिछिया।,
द्वादशी १२ वीं तिथि।, बारादरी ।, बारह आने।
तेरह - भागवत: ।, नदी: ।,विश्व ।
त्रयोदशी १३ वीं तिथि ।
चौदह - इंद्र: ।, भुवन: ।, यम: ।, लोक: ।, मनु: ।, विद्या ।, रत्न: ।
घतुर्दशी १४ वीं तिथि।
पंद्रह तिथियाँ - प्रतिपदा/परमा, द्वितीय/दूज, तृतीय/तीज, चतुर्थी/चौथ, पंचमी, षष्ठी/छठ, सप्तमी/सातें, अष्टमी/आठें, नवमी/नौमी, दशमी, एकादशी/ग्यारस, द्वादशी/बारस, त्रयोदशी/तेरस, चतुर्दशी/चौदस, पूर्णिमा/पूनो, अमावस्या/अमावस।
सोलह - कला: ।, श्रृंगार: ।, संस्कार: ।,
षोडशी सोलह वर्ष की, सोलह आने पूरी तरह, शत-प्रतिशत।, अष्टि: ।,
सत्रह -
अठारह -
उन्नीस -
बीस - कौड़ी, नख, बिसात, कृति ।
चौबीस स्मृतियाँ - मनु, विष्णु, अत्रि, हारीत, याज्ञवल्क्य, उशना, अंगिरा, यम, आपस्तम्ब, सर्वत, कात्यायन, बृहस्पति, पराशर, व्यास, शांख्य, लिखित, दक्ष, शातातप, वशिष्ठ।
पच्चीस - रजत, प्रकृति ।
पचीसी = २५, गदहा पचीसी, वैताल पचीसी।,
तीस - मास,
तीसी तीस पंक्तियों की काव्य रचना,
बत्तीस - बत्तीसी = ३२ दाँत ।,
तैंतीस - सुर: ।,
छत्तीस - छत्तीसा ३६ गुणों से युक्त, नाई।
चालीस - चालीसा ४० पंक्तियों की काव्य रचना।
पचास - स्वर्णिम, हिरण्यमय, अर्ध शती।
साठ - षष्ठी।
सत्तर -
पचहत्तर -
सौ -
एक सौ आठ - मंत्र जाप
सात सौ - सतसई।,
 सहस्त्र -
सहस्राक्ष इंद्र।,
एक लाख - लक्ष।,
करोड़ - कोटि।,
दस करोड़ - दश कोटि, अर्बुद।,
 अरब - महार्बुद, महांबुज, अब्ज।,
ख़रब - खर्व ।,
दस ख़रब - निखर्व, न्यर्बुद ।,
*
३३ कोटि देवता
*
देवभाषा संस्कृत में कोटि के दो अर्थ होते है, कोटि = प्रकार, एक अर्थ करोड़ भी होता। हिन्दू धर्म की खिल्ली उड़ने के लिये अन्य धर्मावलम्बियों ने यह अफवाह उडा दी कि हिन्दुओं के ३३ करोड़ देवी-देवता हैं। वास्तव में सनातन धर्म में ३३ प्रकार के देवी-देवता हैं:
० १ - १२ : बारह आदित्य- धाता, मित, आर्यमा, शक्रा, वरुण, अँश, भाग, विवस्वान, पूष, सविता, तवास्था और विष्णु।
१३ - २० : आठ वसु- धर, ध्रुव, सोम, अह, अनिल, अनल, प्रत्युष और प्रभाष।
२१ - ३१ : ग्यारह रुद्र- हर, बहुरुप, त्र्यंबक, अपराजिता, बृषाकापि, शँभु, कपार्दी, रेवात, मृगव्याध, शर्वा और कपाली।
३२ - ३३: दो देव- अश्विनी और कुमार।

शनिवार, 3 जून 2017

lekh: prayojanmulak hindi

प्रयोजनमूलक हिन्दी

 
प्रयोजनमूलक हिन्दी के संदर्र्भ में ‘प्रयोजन’ शब्द के साथ ‘मूलक’ उपसर्ग लगने से प्रयोजनमूलक पद बना है। प्रयोजन से तात्पर्य है उद्देश्य अथवा प्रयुक्ति। ‘मूलक’ से तात्पर्य है आधारित। अत: प्रयोजनमूलक भाषा से तात्पर्य हुआ किसी विशिष्ट उद्देश्य के अनुसार प्रयुक्त भाषा। इस तरह प्रयोजनमूलक हिन्दी से तात्पर्य हिन्दी का वह प्रयुक्तिपरक विशिष्ट रूप या शैली है जो विषयगत तथा संदर्भगत प्रयोजन के लिए विशिष्ट भाषिक संरचना द्वारा प्रयुक्त की जाती है। विकास के प्रारम्भिक चरण में भाषा सामाजिक सम्पर्क का कार्य करती है। भाषा के इस रूप को संपर्क भाषा कहते हैं। संपर्क भाषा बहते नीर के समान है। प्रौढा की अवस्था में भाषा के वैचारिक संदर्भ परिपुष्ट होते हैं औैर भावात्मक अभिव्यक्ति कलात्मक हो जाती है। भाषा के इन रूपों को दो नामों से अभिहित किया जाता है। प्रयोजनमूलक और आनन्दमूलक। आनन्द विधायक भाषा साहित्यिक भाषा है। साहित्येतर मानक भाषा को ही प्रयोजनमूलक भाषा कहते हैं, जो विशेष भाषा समुदाय के समस्त जीवन-संदर्भो को निश्चित शब्दों और वाक्य संरचना के द्वारा अभिव्यक्त करने में सक्षम हो। भाषिक उपादेयता एवं विशिष्टिता का प्रतिपादन प्रयोजनमूलक भाषा से होता है।
प्रयोजनमूलक हिन्दी का स्वरूप :
हिन्दी भारत की राष्ट्रभाषा है। इसके बोलने व समझने वालों की संख्या के अनुसार विश्व में यह तीसरे क्रम की भाषा है। यानी कि हिन्दी अंतर्राष्ट्रीय भाषा है। अत: स्वाभाविक ही है कि विश्व की चुनिंदा भाषाओं में से एक महत्वपूर्ण भाषा और भारत की अभिज्ञात राष्ट्रभाषा होने के कारण, देश के प्रशासनिक कार्यो में हिन्दी का व्यापक प्रयोग हो, राष्ट्रीयता की दृष्टि से ये आसार उपकारक ही है।
प्रयोजनमूलक हिन्दी हिन्दी के भाषिक अध्ययन का ही एक और नाम है, एक और रूप है एक समय था जबकि सरकारी-अर्द्धसरकारी या सामान्यत: कार्यालयीन पत्राचार के लिए अंग्रेजी एक मात्र सक्षम भाषा समझी जाती थी। अंग्रेजी की उक्त महानता आज, सत्य से टूटी चेतना की तरह बेकार सिद्ध हो रही है चूंकि हिन्दी में अत्यन्त बढ़िया, स्तरीय तथा प्रभावक्षम पत्राचार संभव हुआ है। अत: जो लोग हिन्दी को अविकसित भाषा कहते थे, कभी खिचड़ी तो कभी क्लिष्ट भाषा कहते थे या अंग्रेजी की तुलना में हिन्दी को नीचा दिखाने की मूर्खता करते थे उन्हें तक लगने लगा है कि हिन्दी वाकई संसार की एक महान भाषा है, हरेक दृष्टि से परिपूर्ण एक सम्पन्न भाषा है।

राजभाषा के अतिरिक्त अन्य नये-नये व्यवहार क्षेत्रों में हिन्दी का प्रचार तथा प्रसार होता है, जैसे रेलवे प्लेटफार्म, मंदिर, धार्मिक संस्थानों आदि में। जीवन के कई प्रतिष्ठित क्षेत्रों में भी अंग्रेजी के स्थान पर हिन्दी का प्रयोग किया जाता है। विज्ञान औैर तकनीकी शिक्षा, कानून और न्यायालय, उच्चस्तरीय वाणिज्य और व्यापार आदि सभी क्षेत्रों में हिन्दी का व्यापक प्रयोग होता है। व्यापारियों और व्यावसायियो के लिए भी हिन्दी का प्रयोग सुविधाजनक और आवश्यक बन गया है। भारतीय व्यापारी आज हिन्दी की उपेक्षा नहीं कर सकते, उनके कर्मचारी, ग्राहक सभी हिन्दी बोलते हैं। व्यवहार के अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग प्रयोजनों से हिन्दी का प्रयोग किया जाता है। बैंक मे हिन्दी के प्रयोग का प्रयोजन अलग है तो सरकारी कार्यालयो में हिन्दी के प्रयोग का प्रयोजन अलग है। हिन्दी के इस स्वरूप को ही प्रयोजनमूलक हिन्दी कहते हैं।
प्रयोजनमूलक रूप के कारण हिन्दी भाषा जीवित रही। आज तक साहित्यिक हिन्दी का ही अध्ययन किया जाता था, लेकिन साहित्यिक भाषा किसी भी भाषा को स्थित्यात्मक बनाती है और प्रयोजनमूलक भाषा उसको गत्यात्मक बनाती है। गतिमान जीवन में गत्यात्मक भाषा ही जीवित रहती है। प्रचलित रहती है। आज साहित्य तो संस्कृत में भी है, लेकिन उसका गत्यात्मक रूप-प्रयोजनमूलक रूप समाप्त हो गया है, अत: वह मृतवत हो गयी है। हिन्दी का प्रयोजनमूलक रूप अधिक शक्तिशाली तथा गत्यात्मक है। हिन्दी का प्रयोजनमूलक रूप न केवल उसके विकास में सहयोग देगा, बल्कि उसको जीवित रखने एवं लोकप्रिय बनाने में भी महत्वपूर्ण योगदान देगा।
इस प्रकार विभिन्न प्रयोजनों के लिए गठित समाज खंडों द्वारा किसी भाषा के ये विभिन्न रूप या परिवर्तन ही उस भाषा के प्रयोजनमूलक रूप हैं। अंग्रेजी शासन में यूरोपीय संपर्क से हमारा सामाजिक, आर्थिक और प्रशासनिक ढांचा काफी बदला, धीरे-धीरे हमारे जीवन में नई उद्भावनाएं (जैसे पत्रकारिता, इंजीनियरिंग, बैंकीय) पनपी और तदनुकूल हिन्दी के नए प्रयोजनमूलक भाषिक रूप भी उभरे। स्वतंत्रता के बाद तो हिन्दी भाषा का प्रयोग क्षेत्र बहुत बढ़ा है और तदनुरूप उसके प्रयोजनमूलक रूप भी बढे हैं औैर बढ़ते जा रहे हैं। साहित्यिक विधाओं, संगीत, कपड़ा-बाजार, सट्टाबाजारों, चिकित्सा, व्यवसाय, खेतों, खलिहानों, विभिन्न शिल्पों और कलाओं, कला व खेलों के अखाड़ों, कोर्टो कचहरियों आदि में प्रयुक्त हिन्दी पूर्णत: एक नहीं है। रूप-रचना, वाक्य रचना, मुहावरों आदि की दृष्टि से उनमें कभी थोड़ा कभी अधिक अंतर स्पष्ट है और ये सभी हिन्दी के प्रयोजनमूलक परिवर्त या उपरूप है।
प्रयोजनमूलक हिन्दी की विशेषताएं :
प्रयोजनमूलक भाषा की प्रमुख विशेषताएं इस प्रकार हैं –
1. वैज्ञानिकता :
प्रयोजनमूलक शब्द पारिभाषिक होते हैं। किसी वस्तु के कार्य-कारण संबंध के आधार पर उनका नामकरण होता है, जो शब्द से ही प्रतिध्वनित होता है। ये शब्द वैज्ञानिक तत्वों की भांति सार्वभौमिक होते हैं। हिन्दी की पारिभाषिक शब्दावली इस दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं।
2. अनुप्रयुक्तता :
उपसर्गो, प्रत्ययों और सामासिक शब्दों की बहुलता के कारण हिन्दी की प्रयोजनमूलक शब्दावली स्वत: अर्थ स्पष्ट करने में समर्थ है। इसलिए हिन्दी की शब्दावली का अनुप्रयोग सहज है।
3. वाच्यार्थ प्रधानता :
हिन्दी के पर्याय शब्दों की संख्या अधिक है। अत: ज्ञान-विज्ञान के विविध क्षेत्रों में उसके अर्थ को स्पष्ट करने वाले भिन्न पर्याय चुनकर नए शब्दों का निर्माण संभव है। इससे वाचिक शब्द ठीक वही अर्थ प्रस्तुत कर देता है। अत: हिन्दी का वाच्यार्थ भ्रांति नहीं उत्पन्न करता।
4. सरलता और स्पष्टता :
हिन्दी की प्रयोजनमूलक शब्दावली सरल औैर एकार्थक है, जो प्रयोजनमूलक भाषा का मुख्य गुण है। प्रयोजनमूलक भाषा में अनेकार्थकता दोष है। हिन्दी शब्दावली इस दोष से मुक्त है।
इस तरह प्रयोजनमूलक भाषा के रूप में हिन्दी एक समर्र्थ भाषा है। स्वतंत्रता के पश्चात प्रयोजनमूलक भाषा के रूप में स्वीकृत होने के बाद हिन्दी में न केवल तकनीकी शब्दावली का विकास हुआ है, वरन विभिन्न भाषाओं के शब्दों को अपनी प्रकृति के अनुरुप ढाल लिया है। आज प्रयोजनमूलक क्षेत्र में नवीनतम उपलब्धि इंटरनेट तक की शब्दावली हिन्दी में उलब्ध है, और निरंतर नए प्रयोग हो रह हैं।
प्रयोजनमूलक हिन्दी के अवरोध :
ब्रिटिश शासकों ने अपने उपनिवेशों में एक महत्वपूर्ण कार्य किया था, अंग्रेजी को प्रतिष्ठित करने का। उन्होंने जिस अंग्रेजी को आरोपित किया, उसका उद्देश्य अपने शासन के लिए योग्य कर्मचारियों को तैयार करना था। जनता से संपर्क के लिए वे हिन्दी सीखते थे और शासन के लिए भारतीय भाषाओं को हेय बताकर अंग्रेजी के एक व्यावहारिक रूप का प्रचार कर रहे थे। इसके लिए उन्होंने जीवन-यापन से जुड़े क्षेत्रों में अंग्रेजी को अनिवार्य कर दिया। 15 अगस्त 1947 को भारत को स्वतंत्रता मिली। राष्ट्रीयता की प्रबल भावना के कारण स्वदेश और स्वभाषा का समर्थन सभी राष्ट्र नेताओ ने किया। संविधान निर्माताओं ने बिना किसी संशय के हिन्दी को राजभाषा घोषित कर दिया। राजभाषा के साथ ही प्रयोजनमूलक भाषा का विकास प्रारंभ होता है। शासकीय प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त भाषा का संबंध समस्त सामाजिक प्रयोजनों से जुड़ जाता है। अत: 26 जनवरी 1950 से ही प्रयोजनमूलक हिन्दी की निर्माण प्रक्रिया प्रारंभ हुई और समस्त सरकारी और गैर सरकारी संगठनों, शिक्षालयों, संचार माध्यमों, उद्योगों और तकनीकी संस्थानों का उद्देश्य अपनी भाषा के माध्यम से कार्र्य करना था।
अंग्रेजी शासकों के इन कृत्यों ने ही कालान्तर में शब्दावली का रोना रोकर 15 वर्षो तक हिन्दी के विकास को अवरूद्ध किया और अंग्रेजी को बनाए रखा। सरकारी व्याप से बने कोश जन सामान्य तक नहीं पहुंचे। उन्हें प्रतीक्षा थी राष्ट्रीयता के जोश की समाप्ति की। उसमें वे सफल रहे औैर राष्ट्रीयता की लहर का स्थान वोट-बैंक की राजनीति ने ले लिया। क्षेत्रीय भाषाओं के विरोध का नया स्वर गूंजा औैर उत्तर बनाम दक्षिण, हिन्दी बनाम अहिन्दी के नाम पर अंग्रेजी का और अंग्रेजी के बल पर देशी अंग्रेजी का शासन बना रहा।
इस प्रकार राजभाषा के रूप में हिन्दी की प्रतिष्ठा का स्वप् अधूरा रहा। इसके बावजूद प्रयोजनमूलक हिन्दी का विकास अवरूद्ध नहीं हुआ। सरकारी तंत्र की उपेक्षा के बावजूद विश्व को उपभोक्ता बाजार मानने वाली विदेशी कंपनियों ने विज्ञान एवं सूचना के क्षेत्र में हिन्दी को महत्व दिया। भारतीय चैनलों से अधिक विदेशी कंपनियां हिन्दी प्रदेश में हिन्दी को अपनाकर आगे बढ़ रही हैं, क्योंकि उनकी दृष्टि वोट बैंक पर नहीं, पूंजी बैंक पर है और इस पर नियंत्रण करने के लिए चित्रपट जगत, वाणिज्यिक प्रतिष्ठान और सूचनातंत्र हिन्दी की उपेक्षा नहीं कर सकते।
इस तरह प्रयोजनमूलक हिन्दी के मार्ग में अनेक अवरोध स्वतंत्रता प्राप्ति से आ रह हैं औैर उनका सामना करते हुये भारत की यह भाषा अपना अस्तित्व अधिक प्रभावशाली बनाये जा रही है।
अंतत: और निष्कर्षत:  :-
निष्कर्ष के रूप में कह सकते हैं कि साहित्य भाषा को प्रतिष्ठा दे सकता है, लेकिन विस्तार नहीं देता। भाषा को विस्तार देता है, उसका प्रयोजनमूलक स्वरुप। प्रयोजनमूलक भाषा के रूप में हिन्दी को वैश्विक प्रसार मिला है। हिन्दी के प्रयोजनमूलक स्वरूप के विकास के कारण ही आज संपूर्ण भारत में हिन्दी को समझने और बोलने वाले मिल जाते हैं। यह आवश्यक है कि यदि सही अर्थो में राजभाषा का क्रियान्वयन होता तो आज हिन्दी का प्रसार विदेशों में भी हो गया होता, लेकिन हिन्दी का विकास राजकीय प्रयोजनेतर माध्यमों के द्वारा हा रहा है, जिनमें चलचित्र, दूरदर्शन और उद्योग व्यापार के विदेशी प्रतिष्ठानों का योगदान अधिक है। इसलिए आज हिन्दी के प्रयोजनमूलक संदर्भो से जो क्षेत्र जुड़े हैं वे हैं -1. राजभाषा और उससे सबंद्ध क्षेत्र (कामकाजी क्षेत्र)। 2. पत्रकारिता। 3. श्रव्य माध्यम। 4. दूरदर्शन और चलचित्र। 5. अनुवाद और उसके माध्यम के विज्ञान, तकनीक और व्यापार। इन क्षेत्रों में हिन्दी के प्रयोग का ज्ञान ही आज की उपभोक्तावादी सभ्यता में हिन्दी और हिन्दी भाषी को प्रतिष्ठित कर सकता है।

chhand bahar 16

छंद बहर का मूल है १६
अष्ट वार्णिक अनुष्टुप जातीय छंद
चौदह मात्रिक मानव जातीय मनोरम छंद
मुक्तिका
*
सूर्य ऊगा तो सवेरा ८/१४
सूर्य डूबा तो अँधेरा
.
प्रीत की जादूगरी है
नूर ऊषा ने बिखेरा
.
नींद तू भी जाग जा रे!
मुर्ग ने दे बाँग टेरा
.
भू न जाती सासरे को
सूर्य लेता संग फेरा
.
साँझ बाँधे रोज राखी
माँग तारे टाँक धीरा
.
है निशा बाँकी सहेली
बाँध-तोड़े मोह-घेरा
.
चाँदनी-चंदा लगाए
आसमां में प्रीत डेरा
***

chhand bahar 15

छंद बहर का मूल है १५
वार्णिक अनुष्टुप जातीय छंद
मात्रिक दैशिक जातीय एकावली छंद
*
मुक्तिका
*
नित इबादत करो
मत अदावत करो
.
कुछ शराफ़त रहे
कुछ शरारत करो
.
सो लिए तुम बहुत
उठ बगावत करो
.
मत नज़र फेरना
मिल इनायत करो
.
भूल शिकवे सभी
 मत शिकायत करो
.
बेहतर जो लगे
पग रवायत करो
.
छोड़ चलभाष दो
खत-किताबत करो
.
२४-४-२०१६
सी २५६ आवास-विकास हरदोई
***
३-६-२०१६
==============

chhand-bahar 14

छंद बहर का मूल है: १४
*
दस वार्णिक पंक्ति जातीय 
सत्रह मात्रिक महासंस्कारी जातीय, चन्द्र छंद 
छंद संरचना:२१२ २१२ २१२ २ 
सूत्र: र र र गा.
*
मुक्तक
*
आपका नूर है आसमानी
रूह है आपका शादमानी
आपका ही रहा बोलबाला
आपका रूप है जाफरानी
*
मुक्तिका- १
 आसमां छू रहीं कामनाएँ
आप ही खो रहीं भावनाएँ
.
कौन है जो नहीं चाहता है
शांत हों, जागती वासनाएँ
.
खूब हालात ने आजमाया
आज हालात को आजमाएँ
.
कोशिशों को मिली कामयाबी
हौसले ही सदा काम आएँ
.
आदमी के नहीं पास जाएँ
हैं विषैले न वो काट खाएँ
***
मुक्तिका- २
आप जो हैं वही तो नहीं हैं
दीखते हैं वही जो नहीं हैं
.
खोजते हैं खुदी को जहाँ पे
जानते हैं वहाँ तो नहीं हैं
.
जो न बोला वही बोलते हैं
बोलते, बोलते जो नहीं हैं
.
तौल को तौलते ही रहे जो
तौल को तौलते वो नहीं हैं
.
देश का वेश क्या हो बताएँ?
दश में शेष क्या जो नहीं है
.
आदमी देवता क्या बनेगा?
आदमी आदमी ही नहीं है
.
जोश में होश ही खो न देना
होश में जोश हो, क्यां नहीं है?
*** 
२०-४-२०१७
================