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रविवार, 27 जनवरी 2013

भोजपुरी दोहा सलिला : संजीव 'सलिल'

भोजपुरी दोहा सलिला :
संजीव 'सलिल'
*
रउआ आपन देस में, हँसल छाँव सँग धूप।
किस्सा आपन देस का, इत खाई उत कूप।।
*
रखि दिहली झकझोर के, नेता भाषण बाँच।
चमचे बदे बधाई बा, 'सलिल' न देखल साँच।।
*
चिउड़ा-लिट्टी ना रुचे, बिरयानी की चाह।
चली बहुरिया मेम बन, घर फूंकन की राह।।
*
रोटी की खातिर 'सलिल', जिनगी भयल रखैल।
कुर्सी के खातिर भइल, हाय! सियासत गैल।।
*
आजु-काल्हि के रीत बा, कर औसर से प्यार।
कौनौ आपन देस में, नहीं किसी का यार।।
*
खाली चउका देखि के, दिहले मूषक भागि।
चौंकि परा चूल्हा निरख, आपन मुँह में आगि।।
*
रउआ रख संसार में, सबकी खातिर प्रेम।
हर पियास हर किसी की, हर से चाहल छेम।।
***

मुक्तिका: मचलते-मचलते संजीव 'सलिल'

मुक्तिका:
मचलते-मचलते
संजीव 'सलिल'
*
ग़ज़ल गाएगा मन मचलते-मचलते..
बहल जाएगा दिल बहलते-बहलते..

न चूकेगा अवसर, न पायेगा मौक़ा.
ठिठक जाएगा हाथ मलते न मलते..

तनिक मुस्कुरा दो इधर देखकर तुम
सम्हल जायेगा फिर फिसलते-फिसलते..

लाली रुखों की लगा लौ लगन की.
अरमां जगाती है जलते न जलते..

न भूलेगा तुमको चाहो जो हमको.
बदल जायेगा सब बदलते-बदलते..

दलो दाल छाती पे निश-दिन हमारी.
रहो बाँह में साँझ ढलते न ढलते..

पकड़ में न आये, अकड़ भी छुड़ाए.
जकड़ ले पलों में मसलते-मसलते..

'सलिल' स्नेह सागर न माटी की गागर.
सदियों पलेगा ये पलते न पलते..

***

शनिवार, 26 जनवरी 2013

गणतंत्र दिवस पर विशेष गीत: ध्वजा तिरंगी... संजीव 'सलिल'

गणतंत्र दिवस पर विशेष गीत:
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ध्वजा तिरंगी...

संजीव 'सलिल'
*
ध्वजा तिरंगी मात्र न झंडा
जन गण का अभिमान है.
कभी न किंचित झुकने देंगे,
बस इतना अरमान है...
*
वीर शहीदों के वारिस हम,
जान हथेली पर लेकर
बलिदानों का पन्थ गहेंगे,
राष्ट्र-शत्रु की बलि देकर.
सरे जग को दिखला देंगे
भारत देश महान है...
*
रिश्वत-दुराचार दानव को,
अनुशासन से मारेंगे.
पौधारोपण, जल-संरक्षण,
जीवन नया निखारेंगे.
श्रम-कौशल को मिले प्रतिष्ठा,
कण-कण में भगवान है...
*
हिंदी ही होगी जग-वाणी,
यह अपना संकल्प है.
'सलिल' योग्यता अवसर पाए,
दूजा नहीं विकल्प है.
सारी दुनिया कहे हर्ष से,
भारत स्वर्ग समान है...
****

गणतंत्र दिवस पर विशेष गीत: लोकतंत्र की वर्ष गांठ पर संजीव 'सलिल'

गणतंत्र दिवस पर विशेष गीत: 
लोकतंत्र की वर्ष गांठ पर
संजीव 'सलिल'
*
लोकतंत्र की वर्ष गांठ पर
भारत माता का वंदन...

हम सब माता की संतानें,
नभ पर ध्वज फहराएंगे.
कोटि-कोटि कंठों से मिलकर
'जन गण मन' गुन्जायेंगे.
'झंडा ऊंचा रहे हमारा',
'वन्दे मातरम' गायेंगे.
वीर शहीदों के माथे पर
शोभित हो अक्षत-चन्दन...

नेता नहीं, नागरिक बनकर
करें देश का नव निर्माण.
लगन-परिश्रम, त्याग-समर्पण,
पत्थर में भी फूंकें प्राण.
खेत-कारखाने, मन-मन्दिर,
स्नेह भाव से हों संप्राण.
स्नेह-'सलिल' से मरुथल में भी
हरिया दें हम नन्दन वन... 

दूर करेंगे भेद-भाव मिल,
सबको अवसर मिलें समान.
शीघ्र और सस्ता होगा अब
सतत न्याय का सच्चा दान.
जो भी दुश्मन है भारत का
पहुंचा देंगे उसे मसान.
सारी दुनिया लोहा मने
विश्व-शांति का हो मंचन...

***

शुक्रवार, 25 जनवरी 2013

छंद सलिला: तीन बार हो भंग त्रिभंगी संजीव 'सलिल'

छंद सलिला:
तीन बार हो भंग त्रिभंगी 
संजीव 'सलिल'
*
त्रिभंगी 32 मात्राओं का छंद है जिसके हर पद की गति तीन बार भंग होकर चार चरणों (भागों) में विभाजित हो जाती है। प्राकृत पैन्गलम के अनुसार:
पढमं दह रहणं, अट्ठ विरहणं, पुणु वसु रहणं, रस रहणं।
अन्ते गुरु सोहइ, महिअल मोहइ, सिद्ध सराहइ, वर तरुणं।
जइ पलइ पओहर, किमइ मणोहर, हरइ कलेवर, तासु कई।
तिब्भन्गी छंदं, सुक्खाणंदं, भणइ फणिन्दो, विमल मई।   
 (संकेत: अष्ट वसु = 8, रस = 6)      
सारांश: प्रथम यति 10 मात्रा पर, दूसरी 8 मात्रा पर, तीसरी 8 मात्रा पर तथा चौथी 6 मात्रा पर हो। हर पदांत में गुरु हो तथा जगण (ISI लघु गुरु लघु ) कहीं न हो।

केशवदास की छंद माला में वर्णित लक्षण:
विरमहु दस पर, आठ पर, वसु पर, पुनि रस रेख। 
करहु त्रिभंगी छंद कहँ, जगन हीन इहि वेष।।
(संकेत: अष्ट वसु = 8, रस = 6)

भानुकवि के छंद-प्रभाकर के अनुसार:
दस बसु बसु संगी, जन रसरंगी, छंद त्रिभंगी, गंत भलो।
सब संत सुजाना, जाहि बखाना, सोइ पुराना, पन्थ चलो।
मोहन बनवारी, गिरवरधरी, कुञ्जबिहारी, पग परिये।
सब घट घट वासी मंगल रासी, रासविलासी उर धरिये।
(संकेत: बसु = 8, जन = जगण नहीं, गंत = गुरु से अंत)

सुर काज संवारन, अधम उघारन, दैत्य विदारन, टेक धरे।
प्रगटे गोकुल में, हरि छिन छिन में, नन्द हिये में, मोद भरे।

त्रिभंगी का मात्रिक सूत्र निम्नलिखित है
"बत्तिस कल संगी, बने त्रिभंगी, दश-अष्ट अष्ट षट गा-अन्ता"

लय सूत्र: धिन ताक धिना धिन, ताक धिना धिन, ताक धिना धिन, ताक धिना।

नाचत जसुदा को, लखिमनि छाको, तजत न ताको, एक छिना। 

उक्त में आभ्यंतर यतियों पर अन्त्यानुप्रास इंगित नहीं है किन्तु जैन कवि राजमल्ल ने 8 चौकल, अंत गुरु, 10-8-8-6 पर विरति, चरण में 3 यमक (तुक) तथा जगण निषेध इंगित कर पूर्ण परिभाषा दी है।

गुजराती छंद शास्त्री दलपत शास्त्री कृत दलपत पिंगल में 10-8-8-6 पर यति, अंत में गुरु, तथा यति पर तुक (जति पर अनुप्रासा, धरिए खासा) का निर्देश दिया है।

सारतः: त्रिभंगी छंद के लक्षण निम्न हैं:
1. त्रिभंगी 32 मात्राओं का (मात्रिक) छंद है।
2. त्रिभंगी समपाद छंद है। 
3. त्रिभंगी के हर चरणान्त (चौथे चरण के अंत) में गुरु आवश्यक है। इसे 2 लघु से बदलना नहीं चाहिए।  
4. त्रिभंगी के प्रत्येक चरण में 10-8-8-6 पर यति (विराम) आवश्यक है। मात्रा बाँट 8 चौकल अर्थात 8 बार चार-चार मात्रा के शब्द प्रावधानित हैं जिन्हें 2+4+4,  4+4, 4+4, 4+2 के अनुसार विभाजित किया जाता है। इस तरह 2 +  7x 4 +  2 = 32 सभी पदों में होती है।
5. त्रिभंगी के चौकल 7 मानें या 8 जगण का प्रयोग सभी में वर्जित है।
6. त्रिभंगी के हर पद में पहले दो चरणों के अंत में समान तुक हो किन्तु यह बंधन विविध पदों पर नहीं है।
7. त्रिभंगी के तीसरे चरण के अंत में लघु या गुरु कोई भी मात्रा हो सकती है किन्तु कुशल कवियों ने सभी पदों के तीसरे चरण की मात्रा एक सी रखी है।
8. त्रिभंगी के किसी भी मात्रिक गण में विषमकला नहीं है। सम कला के मात्रिक गण होने से मात्रिक मैत्री का नियम पालनीय है।
9. त्रिभंगी के प्रथम दो पदों के चौथे चरणों के अंत में समान तुक हो। इसी तरह अंतिम दो पदों के चौथे चरणों के अंत में सामान तुक हो। चारों पदों के अंत में समान तुक होने या न होने का उल्लेख कहीं नहीं मिला।  

उदाहरण:
1. महाकवि तुलसीदास रचित इस उदाहरण में तीसरे चरण की 8 मात्राएँ अगले शब्द के प्रथम अक्षर पर पूर्ण होती हैं, यह आदर्श स्थिति नहीं है किन्तु मान्य है।
धीरज मन कीन्हा, प्रभु मन चीन्हा, रघुपति कृपा भगति पाई।
पदकमल परागा, रस अनुरागा, मम मन मधुप करै पाना।
सोई पद पंकज, जेहि पूजत अज, मम सिर धरेउ कृपाल हरी।
जो अति मन भावा, सो बरु पावा, गै पतिलोक अनन्द भरी। 

2. तुलसी की ही निम्न पंक्तियों में हर पद का हर चरण आपने में पूर्ण है।
परसत  पद पावन, सोक नसावन, प्रगट भई तप, पुंज सही। 
देखत रघुनायक, जन सुख दायक, सनमुख हुइ कर, जोरि रही। 
अति प्रेम अधीरा, पुलक सरीरा, मुख नहिं आवै, वचन कही। 
अतिशय बड़भागी, चरनन लागी, जुगल नयन जल, धार बही।
यहाँ पहले 2 पदों में तीसरे चरण के अंत में 'प' तथा 'र' लघु (समान) हैं किन्तु अंतिम 2 पदों में तीसरे चरण के अंत में क्रमशः गुरु तथा लघु हैं।

3.महाकवि केशवदास की राम चन्द्रिका से एक त्रिभंगी छंद का आनंद लें:
सम सब घर सोभैं, मुनिमन लोभैं, रिपुगण छोभैं, देखि सबै।
बहु दुंदुभि बाजैं, जनु घन गाजैं, दिग्गज लाजैं, सुनत जबैं। 
जहँ तहँ श्रुति पढ़हीं, बिघन न बढ़हीं, जै जस मढ़हीं, सकल दिसा।
सबही सब विधि छम, बसत यथाक्रम, देव पुरी सम, दिवस निसा।
यहाँ पहले 2 पदों में तीसरे चरण के अंत में 'भैं' तथा 'जैं' गुरु (समान) हैं किन्तु अंतिम 2 पदों में तीसरे चरण के अंत में क्रमशः गुरु तथा लघु हैं। 

4. श्री गंगाप्रसाद बरसैंया कृत छंद क्षीरधि से तुलसी रचित त्रिभंगी छंद उद्धृत है:
रसराज रसायन, तुलसी गायन, श्री रामायण, मंजु लसी।
शारद शुचि सेवक, हंस बने बक, जन कर मन हुलसी हुलसी।
रघुवर रस सागर, भर लघु गागर, पाप सनी मति, गइ धुल सी।
कुंजी रामायण, के पारायण, से गइ मुक्ति राह खुल सी।
टीप: चौथे पद में तीसरे-चौथे चरण की मात्राएँ 14 हैं किन्तु उन्हें पृथक नहीं किया जा सकता चूंकि 'राह' को 'र'+'आह' नहीं लिखा जा सकता। यह आदर्श स्थिति  नहीं है। इससे बचा जाना चाहिए। इसी तरह 'गई' को 'गइ' लिखना अवधी में सही है किन्तु हिंदी में दोष माना जाएगा।

*** 

त्रिभंगी छंद के कुछ अन्य उदाहरण निम्नलिखित हैं

री शान्ति जिनेशं, नुतशक्रेशं, वृषचक्रेशं चक्रेशं |
हनि अरिचक्रेशं, हे गुनधेशं, दयाऽमृतेशं, मक्रेशं |
मंदार सरोजं, कदली जोजं, पुंज भरोजं, मलयभरं |
भरि कंचनथारी, तुमढिग धारी, मदनविदारी, धीरधरं ||    
--रचनाकार : ज्ञात नहीं

रस-सागर पाकर, कवि ने आकर, अंजलि भर रस-पान किया.
ज्यों-ज्यों रस पाया, मन भरमाया, तन हर्षाया, मस्त हिया..
कविता सविता सी, ले नवता सी, प्रगटी जैसे जला दिया.
सारस्वत पूजा, करे न दूजा, करे 'सलिल' ज्यों अमिय पिया..
-- संजीव 'सलिल'

साजै मन सूरा, निरगुन नूरा, जोग जरूरा, भरपूरा ,
दीसे नहि दूरा, हरी हजूरा, परख्या पूरा, घट मूरा
जो मिले मजूरा, एष्ट सबूरा, दुःख हो दूरा, मोजीशा
आतम तत आशा, जोग जुलासा, श्वांस ऊसासा, सुखवासा ||
--शम्भुदान चारण

जनश्रुति / क्षेपक- रामचरितमानस में बालकाण्ड में अहल्योद्धार के प्रकरण में चार (४) त्रिभङ्गी छंद प्रयुक्त हुए हैं. कहा जाता है कि इसका कारण यह है कि अपने चरण से अहल्या माता को छूकर प्रभु श्रीराम ने अहल्या के पाप, ताप और शाप को भङ्ग (समाप्त) किया था, अतः गोस्वामी जी की वाणी से सरस्वतीजी ने त्रिभङ्गी छन्द को प्रकट किया.
__________



गणतंत्र दिवस पर विशेष : गीत, कविता, लघु कथा, नव गीत

गणतंत्र दिवस पर विशेष :
गीत

सारा का सारा हिंदी है

आचार्य संजीव 'सलिल'
*
जो कुछ भी इस देश में है, सारा का सारा हिंदी है.

हर हिंदी भारत माँ के माथे की उज्जवल बिंदी है....
*
मणिपुरी, कथकली, भरतनाट्यम, कुचपुडी, गरबा अपना है.

लेजिम, भंगड़ा, राई, डांडिया हर नूपुर का सपना है.

गंगा, यमुना, कावेरी, नर्मदा, चनाब, सोन, चम्बल,

ब्रम्हपुत्र, झेलम, रावी अठखेली करती हैं प्रति पल.

लहर-लहर जयगान गुंजाये, हिंद में है और हिंदी है.

हर हिंदी भारत माँ के माथे की उज्जवल बिंदी है....
*
मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, गिरजा सबमें प्रभु एक समान.

प्यार लुटाओ जितना, उतना पाओ औरों से सम्मान.

स्नेह-सलिल में नित्य नहाओ निर्माणों के दीप जला.

बाधा, संकट, संघर्षों को गले लगाओ नित मुस्का.

पवन, वन्हि, जल, थल, नभ पावन, कण-कण तीरथ, हिंदी है.

हर हिंदी भारत माँ के माथे की उज्जवल बिंदी है....
*
जै-जैवन्ती, भीमपलासी, मालकौंस, ठुमरी, गांधार.

गजल, गीत, कविता, छंदों से छलक रहा है प्यार अपार.

अरावली, सतपुड़ा , हिमालय, मैकल, विन्ध्य, उत्तुंग शिखर.

ठहरे-ठहरे गाँव हमारे, आपाधापी लिए शहर.

कुटी, महल, अँगना, चौबारा, हर घर-द्वारा हिंदी है.

हर हिंदी भारत माँ के माथे की उज्जवल बिंदी है....
*
सरसों, मका, बाजरा, चाँवल, गेहूँ, अरहर, मूँग, चना.

झुका किसी का मस्तक नीचे, 'सलिल' किसी का शीश तना.

कीर्तन, प्रेयर, सबद, प्रार्थना, बाईबिल, गीता, ग्रंथ, कुरान.

गौतम, गाँधी, नानक, अकबर, महावीर, शिव, राम महान.

रास कृष्ण का, तांडव शिव का, लास्य-हास्य सब हिंदी है.

हर हिंदी भारत माँ के माथे की उज्जवल बिंदी है....
*
ट्राम्बे, भाखरा, भेल, भिलाई, हरिकोटा, पोकरण रतन.

आर्यभट्ट, एपल, रोहिणी के पीछे अगणित छिपे जतन.

शिवा, प्रताप, सुभाष, भगत, रैदास, कबीरा, मीरा, सूर.

तुलसी, रामकृष्ण, रामानुज, माँ, अरविन्द खुदाई नूर.
 
विवेक, रवींद्र, विनोबा, ओशो, जयप्रकाश भी हिंदी है.

हर हिंदी भारत माँ के माथे की उज्जवल बिंदी है....

****************************************

जनगण के मन में: -संजीव सलिल

जनतंत्र की सोच को समर्पित कविता           

-संजीव सलिल
*
जनगण के मन में जल पाया,
नहीं आस का दीपक.
कैसे हम स्वाधीन देश जब
लगता हमको क्षेपक?

हम में से
हर एक मानता,
निज हित सबसे पहले।
नहीं देश-हित कभी साधता
कोई कुछ भी कह ले।

कुछ घंटों 'मेरे देश की धरती'
फिर हो 'छैंया-छैंया'।
वन काटे, पर्वत खोदे,
भारत माँ घायल भैया।

किसको चिंता? यहाँ देश की?
सबको है निज हित की।
सत्ता पा- निज मूर्ति लगाकर,
भारत की दुर्गति की।
श्रद्धा, आस्था, निष्ठा बेचो
स्वार्थ साध लो अपना।
जाये भाड़ में किसको चिंता
नेताजी का सपना।

कौन हुआ आजाद?
भगत है कौन देश का बोलो?
झंडा फहराने के पहले
निज मन जरा टटोलो।

तंत्र न जन का
तो कैसा जनतंत्र तनिक समझाओ?
प्रजा उपेक्षित प्रजातंत्र में
क्यों कारण बतलाओ?

लोक तंत्र में लोक मौन क्यों?
नेता क्यों वाचाल?
गण की चिंता तंत्र न करता
जनमत है लाचार।

गए विदेशी, आये स्वदेशी,
शासक मद में चूर।
सिर्फ मुनाफाखोरी करता
व्यापारी भरपूर।

न्याय बेचते जज-वकील मिल
शोषित- अब भी शोषित।
दुर्योधनी प्रशासन में हो
सत्य किस तरह पोषित?

आज विचारें
कैसे देश हमारा साध्य बनेगा?
स्वार्थ नहीं सर्वार्थ
'सलिल' क्या हरदम आराध्य रहेगा?
****

लघु कथा: शब्द और अर्थ --संजीव वर्मा "सलिल "


शब्द कोशकार ने अपना कार्य समाप्त किया...कमर सीधी कर लूँ , सोचते हुए लेटा कि काम की मेज पर कुछ खटपट सुनायी दी... मन मसोसते हुए उठा और देखा कि यथास्थान रखे शब्दों के समूह में से निकल कर कुछ शब्द बाहर आ गए थे। चश्मा लगाकर पढ़ा , वे शब्द 'लोकतंत्र', प्रजातंत्र', 'गणतंत्र' और 'जनतंत्र' थे।

शब्द कोशकार चौका - ' अरे! अभी कुछ देर पहले ही तो मैंने इन्हें यथास्थान रखा रखा था, फ़िर ये बाहर कैसे...?'

'चौंको मत...तुमने हमारे जो अर्थ लिखे हैं वे अब हमें अनर्थ लगते हैं। दुनिया का सबसे बड़ा लोक तंत्र लोभ तंत्र में बदल गया है। प्रजा तंत्र में तंत्र के लिए प्रजा की कोई अहमियत ही नहीं है। गण विहीन गण तंत्र का अस्तित्व ही सम्भव नहीं है। जन गण मन गाकर जनतंत्र की दुहाई देने वाला देश सारे संसाधनों को तंत्र के सुख के लिए जुटा रहा है। -शब्दों ने एक के बाद एक मुखर होते हुए कहा


****************************
नव गीत
संजीव 'सलिल'
शहनाई बज रही ...
*
शहनाई बज रही
शहर में मुखिया आये...
*
जन-गण को कर दूर
निकट नेता-अधिकारी.
इन्हें बनायें सूर
छिपाकर कमियाँ सारी.
सबकी कोशिश
करे मजूरी
भूखी सुखिया
फिर भी गाये.
शहनाई बज रही
शहर में मुखिया आये...
*
है सच का आभास
कर रहे वादे झूठे.
करते यही प्रयास
वोट जन गण से लूटें.
लोकतंत्र की
लख मजबूरी,
लोभतंत्र
दुखिया पछताये.
शहनाई बज रही
शहर में
मुखिया आये...

*

आये-गये अखबार रँगे,
रेला-रैली में.
शामिल थे बटमार
कर्म-चादर मैली में.
अंधे देखें,
बहरे सुन,
गूंगे बोलें,
हम चुप रह जाएँ.
शहनाई बज रही
शहर में
मुखिया आये...
*

गुरुवार, 24 जनवरी 2013

शुभ कामना मनीषा कोइराला



Vande Mataram.

प्रसिद्ध  फिल्म अभिनेत्री मनीषा कोइराला को कैंसर के समाचार ने सभी कलाप्रेमियों को चिंतित किया है। दिव्यनर्मदा परिवार की और से उन्हें शुभ कामना प्रेषित की गई है।

Dear Mnisha ji!

May Lord Pashupatinath bless you with fast and full recovery. Don't loose heart... ultimately you will win.
I pray almighty for you.

हार न सकती मनीषा, पशुपति दें आशीष.
अपराजेय जिजीविषा, सदा साथ हों ईश..
सदा साथ हों ईश, कैंसर बाजी हारे.
आया है युवराज जीत, फिर ध्वज फहरा रे.
दुआ 'सलिल' की हिम्मत किंचित हार न सकती.
भारत माता साथ मनीष हार न सकती..

Sanjiv verma 'Salil'
salil.sanjiv@gmail.com
http://divyanarmada.blogspot.com
94251 83244 / 0761 2411131

सामयिक षटपदियाँ: संजीव 'सलिल'

सामयिक षटपदियाँ:
संजीव 'सलिल'
*
मानव के आचार का स्वामी मात्र विचार.
सद्विचार से पाइए, सुख-संतोष अपार..
सुख-संतोष अपार, रहे दुःख दूर आपसे.
जीवन होगा मुक्त, मोहमय महाताप से..
कहे 'सलिल' कुविचार, नाश करते दानव के.
भाग्य जागते निर्बल होकर भी मानव के..
***
हार न सकती मनीषा, पशुपति दें आशीष.
अपराजेय जिजीविषा, सदा साथ हों ईश..
सदा साथ हों ईश, कैंसर बाजी हारे.
आया है युवराज जीत, फिर ध्वज फहरा रे.
दुआ 'सलिल' की, मौत इस तरह मार न सकती.
भारत माता साथ, मनीषा हार न सकती..
*
शीश काटना उचित जब, रहे सामने युद्ध.
शीश झुकाना उचित यदि, मिलें सामने बुद्ध..
शुद्ध ह्रदय से कीजिए, मन में तनिक विचार.
शांति काल में शीश, क्यों काटें- अत्याचार..
दंड न अत्याचार का, दें- हों कुपित शशीश.
बदले में ले लीजिए, दुश्मन के सौ शीश..
*               
***

श्री राधा-कृष्ण लीला प्रसंग प्रो. राजेंद्र 'ऋषि'

ॐ श्री राधा-कृष्णाय नमः


श्री राधा-कृष्ण लीला प्रसंग
प्रो. राजेंद्र 'ऋषि'
*
नन्द बबा घर छोरो भयो, बृषभानु घरै इक छोरी भई. 
साँवरो रंग लला कौ दिपै, अरु गौरा के रंग की गोरी भई..
गोकुल मैं  नव चन्द्र उग्यौ, बरसाने में एक चकोरी भई..
प्रेम कौ पन्थ चलाइबै कों, श्री राधिका-कृष्ण की जोरी भई..
*
प्रेम के मीठे दो बोल कहौ, बढ़ कें सत्कार करौ नें करौ.
दधि-गागर कों कम भार करो, दूजौ उपकार करौ नें करौ..
ये जन्म में प्रीति प्रगाढ़ रखौ, ओ जन्म में प्यार करौ नें करौ.
अबै पार कराओ हमें जमुना, भव सागर पार करौ नें करौ..
*
घनश्याम कौ रूप कहा कहिये, कुल अंगना काम कला सौ गिरै.
बरसै जो झमाझम सावन सौ, कभि क्वांर के एक झला सो गिरै..
लरजै-गरजै चमकै-दमकै, चितचोर चपल चपला सो गिरै.
घुँघरू सौ गसै, करधन सौ कसै, मणिमाल सौ टूटे छला सौ गिरै..
*
ग्वालों में एक गुपाल रह्यो, रहि ग्वालिन में इक नोंनी सी राधा.
मोहन के मन भाये दोउ, एक माखन और सलोनी सी राधा..
खेत सरीखो हरी को हियो, रही प्रेम के बीज की बौनी सी राधा.
कृष्ण रहे मृग की तृष्णा, रही जीवन भर मृग-छौनी सी राधा..
*
कृष्ण कौ प्रेम पतंग समान, पतंग की डोर सी राधा रही.
कृष्ण रहे जमुना जल से. हर ओर हिलोर सी राधा रही..
कृष्ण रहे बंशी के समान, तो बाँस के पोर सी राधा रही.
कृष्ण को प्रेम असीम भयो, तौ असीम के छोर सी राधा रही..
*
श्याम शिला के समान रहे, अरु प्रेम-प्रपात सी राधा रही.
स्याम जू स्याही समान रहे, भरि पूरी दवात सी राधा रही..
छाया से स्याम रहे दिन में, खिली चाँदनी रात सी राधा रही. 
बेर के काँटों सी यादें रहीं, तऊ केर की पात सी राधा रही.. 
*
नजरों पै चढ़ीं ज्यों नटखट की, खटकी खटकी फिरतीं ललिता.
कछु जादूगरी श्यामल लट की, लटकी लटकी फिरतीं ललिता..
भई कुंजन मैं झूमा-झटकी, झटकी झटकी फिरतीं ललिता.
सिर पै धर कें दधि की मटकी, मटकी मटकी फिरतीं ललिता..
*
        प्रेषक         

मंगलवार, 22 जनवरी 2013

सामयिक गीत: पंच फैसला... संजीव 'सलिल'

सामयिक गीत:
पंच फैसला...
संजीव 'सलिल'
*
पंच फैसला सर-आँखों,
पर यहीं गड़ेगा लट्ठा...
*
नाना-नानी, पिता और माँ सबकी थी ठकुराई.
मिली बपौती में कुर्सी, क्यों तुम्हें जलन है भाई?
रोजगार है पुश्तों का, नेता बन भाषण देना-
फर्ज़ तुम्हारा हाथ जोड़, सर झुका करो पहुनाई.
सबको अवसर? सब समान??
सुन-कह लो, करो न ठट्ठा...
*
लोकतंत्र है लोभतन्त्र, दल दाम लगाना जाने,
भौंक तन्त्र को ठोंकतन्त्र ने दिया कुचल मनमाने.
भोंक पीठ में छुरा, भाइयों! शोक तन्त्र मुस्काये-
मृतकों के घर जा पैसे दे, वादे करें लुभाने..
संसद गर्दभ ढोएगी
सारे पापों का गट्ठा...  
*
उठा पनौती करी मौज, हो गए कहीं जो बच्चे.
हम देते नकार रिश्तों को, हैं निर्मोही सच्चे.
देश खेत है राम लला का, चिड़ियाँ राम लला की-
पंडा झंडा कोई हो, हम खेल न खेले कच्चे..
कहीं नहीं चाणक्य जड़ों में
डाल सके जो मट्ठा...
*
नेता जी-शास्त्री जी कैसे मरे? न पता लगाया..
अन्ना हों या बाबा, दिन में तारे दिखा भगाया.
घपले-घोटालों से फुर्सत, कभी तनिक पाई तो-
बंदर घुडकी दे-सुन कर फ़ौजी का सर कटवाया.
नैतिक जिम्मेदारी ले वह
जो उल्लू का पट्ठा...
*
नागनाथ गर हटा, बनेगा साँपनाथ ही नेता.
फैलाया दूजा तब हमने, पहला जाल समेटा.
केर-बेर का संग बना मोर्चा झपटेंगे सत्ता-
मौनी बाबा कोई न कोई मिल जाएगा बेटा.
जोकर लिए हाथ में हम
तुम सत्ता चलो या अट्ठा...
***

सोमवार, 21 जनवरी 2013

गजल: मनोहर चौबे 'आकाश'

गजल:
मनोहर चौबे 'आकाश'
*
कैसे उनको  अपना मानें, हैं जिनके विश्वास अलग।
आँखें आँसू अलग-अलग हैं, पीडायें संत्रास अलग।।

उनके आँगन बारिश लेकिन, हैं अपने आँगन सूखे।
अलग-अलग हैं सावन-बादल, हैं उनके मधुमास अलग।।

भोगी है हमने भी मुश्किल, भूख गरीबी बरबादी ।
लेकिन किये जा रहे हमसे, उनके प्रगति विकास अलग।।

हो चाहे अपराध एक ही, अलग सजा हमको उनको
हैं क्या थाना पुलिस अदालत, होते कारावास अलग।।

हम बलिपशु का भाग्य लिए हैं, वे खांडा जल्लादों का।
होते उनके त्योहारों के, सारे ही अंदाज़ अलग।।  

है हमको चुल्लू भर पानी, पर उनका पूरा सागर।
आखिर कौन बता सकता है, क्यों है उनकी प्यास अलग?

हमको रोते उनको भोजन, हम जीते हैं वे रहते।
उन्हें मिले वरदान समय के, हमें मिले अभिशाप अलग।।

कैसे बतलाएं हम कितना, है पीड़ादायक अनुभव।
होते उन जैसे लोगों के, क्यों धरती ''आकाश'' अलग।।

***

चिंतन: धर्म क्या है? नीरज श्रीवास्तव


·
क्या है सनातन धर्म ? 
 
(1) भगवान् राम की जीवनी देखे तो जीवन सदाचार निष्ठा त्याग से पूर्ण कर्म प्रधान है । जहाँ भगवन उनके सारे दायित्वों कुशलता पूर्वक निभाते है । एक धोबी द्वारा असंस्तुति जताने पर राजधर्म वश अपनी पत्नी सीता का त्याग कर देते हैं ।
(2) भगवान् कृष्ण ने जीवन को कर्म प्रधान बताने के साथ साथ धर्म, जाति आदि की उत्तम व्याख्या भी की है जैसे की बचपन में वो इंद्र की पूजा-हवन करना बंद करते हैं ।

भगवान कृष्ण द्वारा गीता में वेद और पंडितों पर कुछ कहे गए श्लोको को देखें:

विद्याविनयसंपन्ने ब्रह्माने गविहस्तनी । शुनि चैव श्रव्पाके च पंडिता समदर्शिनः ।।
इहैव तैर्जितः सर्गो येषाम समय स्थितम मनः । निर्दोषं ही समं ब्रहम तस्माद ब्रहाणी ते स्थिताः ।।

अर्थात सचमुच वही ऋषि और पंडित है जो विद्या तथा विनय से युक्त ब्राहमण, गाय, कुत्ते और चंडाल में समदृष्टि रखता है ।
जिसका अन्तः करण समता में अर्थात सब भूतों के अंतर्गत ब्रम्हरूप संभव में निश्छलता पूर्वक स्थित है, उसने जीवित
अवस्था में ही पृथ्वी स्वर्ग आदि समस्त लोकों पर विजय प्राप्त कर ली है चूंकि ब्रम्हा निर्दोष और सम है,  इसलिए जो समदर्शी (सबको सामान भाव से देखने वाला) एवं निर्दोष है वे ब्रहम में ही स्थित कहे जाते है । वेदांती नैतिकता का यही सारांश है - सबके प्रति साम्य ।

यामिमां पुस्पिताम वाचम प्रवद्न्त्यविपश्वितः । वेद वादरताः पार्थ नान्या स्थिति वादिनः ।।
कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रद्शाम ।क्रियाविश्लेशबहुलां भोगैश्वर्यगतिम् प्रति ।।

भावार्थ :- हे पृथा पुत्र अल्प ज्ञानी मनुष्य वेदों के उन अलंकारिक शब्दों के प्रति ज्यादा आसक्त रहते हैं जो स्वर्ग की प्राप्ति , उत्तम जन्म ऐश्वर्य आदि के प्राप्ति के लिए सकाम कर्म फल की ( यज्ञ , या किसी देव विशेष पूजा से इक्षित वास्तु की प्राप्ति ) विविध क्रियाओं  का वर्णन करते हैं , अपनी इन्द्रिय तृप्ति और ऐश्वर्यमय जीवन की कामना के कारण कहते हैं इससे बढ़कर कुछ भी नहीं, यही सर्वोपरि है ।

भोगैश्वर्यप्रस्क्ताना तयापह्रीतचेतशाम । व्यावासयात्मिका बुद्धिः सामधो ना विधीयते ।।

जो मनुष्य इन्द्रियों के भोग तथा भौतक ऐश्वर्य के प्रति आसक्त होने से ऐसी वस्तुओ से मोहग्रस्त हो जाते हैं उन मनुष्यों में भगवान् के प्रति दृढ संकल्पित बुद्धि नहीं होती है ।
(3) भगवान् बुद्ध -

बुद्ध के उपदेशों का सार इस प्रकार है -

सम्यक ज्ञान

बुद्ध के अनुसार धम्म यह है: (धम्म का अर्थ धर्म लें यहाँ)

जीवन की पवित्रता बनाए रखना
जीवन में पूर्णता प्राप्त करना
निर्वाण प्राप्त करना
तृष्णा का त्याग
यह मानना कि सभी संस्कार अनित्य हैं
कर्म को मानव के नैतिक संस्थान का आधार मानना

बुद्ध के अनुसार क्या अ-धम्म है-- (अधम्म का अधर्म लें यहाँ )

परा-प्रकृति में विश्वास करना
आत्मा में विश्वास करना
कल्पना-आधारित विश्वास मानना
धर्म की पुस्तकों का वाचन मात्र

बुद्ध के अनुसार सद्धम्म क्या है-- 1. जो धम्म प्रज्ञा की वृद्धि करे--

जो धम्म सबके लिए ज्ञान के द्वार खोल दे
जो धम्म यह बताए कि केवल विद्वान होना पर्याप्त नहीं है
जो धम्म यह बताए कि आवश्यकता प्रज्ञा प्राप्त करने की है

2. जो धम्म मैत्री की वृद्धि करे--

जो धम्म यह बताए कि प्रज्ञा भी पर्याप्त नहीं है, इसके साथ शील भी अनिवार्य है
जो धम्म यह बताए कि प्रज्ञा और शील के साथ-साथ करुणा का होना भी अनिवार्य है
जो धम्म यह बताए कि करुणा से भी अधिक मैत्री की आवश्यकता है.

3. जब वह सभी प्रकार के सामाजिक भेदभावों को मिटा दे

जब वह आदमी और आदमी के बीच की सभी दीवारों को गिरा दे
जब वह बताए कि आदमी का मूल्यांकन जन्म से नहीं कर्म से किया जाए
जब वह आदमी-आदमी के बीच समानता के भाव की वृद्धि करे

महावीर जैन ने भी वही कहा -

1. सत्य के बारे में भगवान महावीर स्वामी कहते हैं, हे पुरुष! तू सत्य को ही सच्चा तत्व समझ। जो बुद्धिमान सत्य की ही आज्ञा में रहता है, वह मृत्यु को तैरकर पार कर जाता है।
 
2. इस लोक में जितने भी त्रस जीव (एक, दो, तीन, चार और पाँच इंद्रिय वाले जीव) आदि की हिंसा मत कर, उनको उनके पथ पर जाने से न रोको। उनके प्रति अपने मन में दया का भाव रखो। उनकी रक्षा करो। यही अहिंसा का संदेश भगवान महावीर अपने उपदेशों से हमें देते हैं।
 
3. परिग्रह पर भगवान महावीर कहते हैं जो आदमी खुद सजीव या निर्जीव चीजों का संग्रह करता है, दूसरों से ऐसा संग्रह कराता है या दूसरों को ऐसा संग्रह करने की सम्मति देता है, उसको दुःखों से कभी छुटकारा नहीं मिल सकता। यही संदेश अपरिग्रह का माध्यम से भगवान महावीर दुनिया को देना चाहते हैं।
 
4. महावीर स्वामी ब्रह्मचर्य के बारे में अपने बहुत ही अमूल्य उपदेश देते हैं कि ब्रह्मचर्य उत्तम तपस्या, नियम, ज्ञान, दर्शन, चारित्र, संयम और विनय की जड़ है। तपस्या में ब्रह्मचर्य श्रेष्ठ तपस्या है। जो पुरुष स्त्रियों से संबंध नहीं रखते, वे मोक्ष मार्ग की ओर बढ़ते हैं। क्षमा के बारे में 
 
5. भगवान महावीर कहते हैं- 'मैं सब जीवों से क्षमा चाहता हूँ। जगत के सभी जीवों के प्रति मेरा मैत्रीभाव है। मेरा किसी से वैर नहीं है। मैं सच्चे हृदय से धर्म में स्थिर हुआ हूँ। सब जीवों से मैं सारे अपराधों की क्षमा माँगता हूँ। सब जीवों ने मेरे प्रति जो अपराध किए हैं, उन्हें मैं क्षमा करता हूँ।' वे यह भी कहते हैं 'मैंने अपने मन में जिन-जिन पाप की वृत्तियों का संकल्प किया हो, वचन से जो-जो पाप वृत्तियाँ प्रकट की हों और शरीर से जो-जो पापवृत्तियाँ की हों, मेरी वे सभी पापवृत्तियाँ विफल हों। मेरे वे सारे पाप मिथ्या हों।'
 
6. धर्म सबसे उत्तम मंगल है। अहिंसा, संयम और तप ही धर्म है। महावीरजी कहते हैं जो धर्मात्मा है, जिसके मन में सदा धर्म रहता है, उसे देवता भी नमस्कार करते हैं।

विवेकानंद जी ने धर्म पर व्याख्यान देते हुए कुछ यूँ कहा -

भाईयो! मैं आप लोगों को एक स्तोत्र की कुछ पंक्तियाँ सुनाता हूँ जिसकी आवृति मैं बचपन से कर रहा हूँ और जिसकी आवृति प्रतिदिन लाखों मनुष्य किया करते हैं:

रुचीनां वैचित्र्यादृजुकुटिलनानापथजुषाम्। नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव।।
 
(अर्थात जैसे विभिन्न नदियाँ भिन्न भिन्न स्रोतों से निकलकर समुद्र में मिल जाती हैं उसी प्रकार हे प्रभो! भिन्न-भिन्न 
रुचि के अनुसार विभिन्न टेढ़े-मेढ़े अथवा सीधे रास्ते से जानेवाले लोग अन्त में तुझमें ही आकर मिल जाते हैं।)
 
यह सभा, जो अभी तक आयोजित सर्वश्रेष्ठ पवित्र सम्मेलनों में से एक है, स्वतः ही गीता के इस अद्भुत उपदेश का प्रतिपादन एवं जगत के प्रति उसकी घोषणा करती है:

ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्। मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः।।

अर्थात जो कोई मेरी ओर आता है-चाहे किसी प्रकार से हो-मैं उसको प्राप्त होता हूँ। लोग भिन्न मार्ग द्वारा प्रयत्न करते हुए अन्त में मेरी ही ओर आते हैं।

साम्प्रदायिकता, हठधर्मिता और उनकी वीभत्स वंशधर धर्मान्धता इस सुन्दर पृथ्वी पर बहुत समय तक राज्य कर चुकी हैं। वे पृथ्वी को हिंसा से भरती रही हैं व उसको बारम्बार मानवता के रक्त से नहलाती रही हैं, सभ्यताओं को ध्वस्त करती हुई पूरे के पूरे देशों को निराशा के गर्त में डालती रही हैं। यदि ये वीभत्स दानवी शक्तियाँ न होतीं तो मानव समाज आज की अवस्था से कहीं अधिक उन्नत हो गया होता। पर अब उनका समय आ गया हैं और मैं आन्तरिक रूप से आशा करता हूँ कि आज सुबह इस सभा के सम्मान में जो घण्टा ध्वनि हुई है वह समस्त धर्मान्धता का, तलवार या लेखनी के द्वारा होनेवाले सभी उत्पीड़नों का तथा एक ही लक्ष्य की ओर अग्रसर होने वाले मानवों की पारस्पारिक कटुता का मृत्यु निनाद सिद्ध हो।

आदि शंकराचार्य जी ने भी वही किया और कहा -

शंकराचार्य एक महान समन्वयवादी थे। उन्हें हिन्दू धर्म को पुनः स्थापित एवं प्रतिष्ठित करने का श्रेय दिया जाता है। एक तरफ उन्होने अद्वैत चिन्तन को पुनर्जीवित करके सनातन हिन्दू धर्म के दार्शनिक आधार को सुदृढ़ किया, तो दूसरी तरफ उन्होंने जनसामान्य में प्रचलित मूर्तिपूजा का औचित्य सिद्ध करने का भी प्रयास किया।

सनातन हिन्दू धर्म को दृढ़ आधार प्रदान करने के लिये उन्होने विरोधी पन्थ के मत को भी आंशिक तौर पर अंगीकार किया। शंकर के मायावाद पर महायान बौद्ध चिन्तन का प्रभाव माना जाता है। इसी आधार पर उन्हें प्रछन्न बुद्ध कहा गया है।

शंकर के अद्वैत का दर्शन का सार-

ब्रह्म और जीव मूलतः और तत्वतः एक हैं। हमे जो भी अंतर नजर आता है उसका कारण अज्ञान है।
जीव की मुक्ति के लिये ज्ञान आवश्यक है। जीव की मुक्ति ब्रह्म में लीन हो जाने में  है।
 
***********

सामयिक व्यंग्य कविता : राजा नंगा है ॐ प्रकाश तिवारी

सामयिक व्यंग्य कविता : 
राजा नंगा है
ॐ प्रकाश तिवारी 
 
*
राजा जी को 
कौन बताए 
राजा नंगा है ।

आँखों पर मोटी सी पट्टी
मुँह में दही जमा
झूठी जयकारों में उसका
मन भी खूब रमा 

जिस नाले वह
डुबकी मारे 
वो ही गंगा है ।

रुचती हैं राजा के मन को
बस झूठी तारीफें
उसको कोसा करें बला से
आगे की तारीखें

उसके राजकाज में
सच कहना
बस पंगा है

पीढ़ी दर पीढ़ी उसने है
पाया या दर्जा 
ताका करती है उसका मुँह
पढ़ी-लिखी परजा

वह मुस्काए
मुल्क समझ लो
बिल्कुल चंगा है

- ओमप्रकाश तिवारी

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Om Prakash Tiwari
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मुक्तक: रूप की आरती संजीव 'सलिल'

मुक्तक


रूप की आरती
संजीव 'सलिल'
*
रूप की आरती उतारा कर.
हुस्न को इश्क से पुकारा कर.
चुम्बनी तिल लगा दे गालों पर-
तब 'सलिल' मौन हो निहारा कर..
*
रूप होता अरूप मानो भी..
झील में गगन देख जानो भी.
देख पाओगे झलक ईश्वर की-
मन में संकल्प 'सलिल' ठानो भी..
*
नैन ने रूप जब निहारा है,
सारी दुनिया को तब बिसारा है.
जग कहे वन्दना तुम्हारी थी-
मैंने परमात्म को गुहारा है..
*
झील में कमल खिल रहा कैसे.
रूप को रूप मिल रहा जैसे.
ब्रम्ह की अर्चना करे अक्षर-
प्रीत से मीत मिल रहा ऐसे..
*
दीप माटी से जो बनाता है,
स्वेद-कण भी 'सलिल' मिलाता है.
श्रेय श्रम को मिले  दिवाली का-
गौड़ धन जो दिया जलाता है.
*
भाव में डूब गया है अक्षर,
रूप है सामने भले नश्वर.
चाव से डूबकर समझ पाया-
रूप ही है अरूप अविनश्वर..
*
हुस्न को क्यों कहा कहो माया?
ब्रम्ह को क्या नहीं यही भाया?
इश्क है अर्चना न सच भूलो-
छिपा माशूक में वही पाया..
*

रविवार, 20 जनवरी 2013

गीत : भूल जा संजीव 'सलिल'

गीत :
भूल जा
संजीव 'सलिल'
*
आईने ने कहा: 'सत्य-शिव' ही रचो,
यदि नहीं, कौन 'सुन्दर' कहाँ है कहो?
लिख रहे, कह रहे, व्यर्थ दिन-रात जो-
ढाई आखर ही उनमें तनिक तुम तहो..'

ज़िन्दगी ने तरेरीं निगाहें तुरत,
कह उठी 'जो हकीकत नहीं भूलना.
स्वप्न तो स्वप्न हैं, सच समझकर उन्हें-
गिर पड़ोगे, निराधार मत झूलना.'

बन्दगी थी समर्पण रही चाहती,
शेष कुछ भी न बाकी अहम् हो कहीं.
जोड़ मत छोड़ सब, हाथ रीते रहें-
जान ले, साथ जाता कहीं कुछ नहीं.

हैं समझदार जो कह रहे: 'कुछ सुधर
कौन किसका कहाँ कब, इसे भूल जा.
भोगता है वही, जो बली है यहाँ-
जो धनी जेब में उसके सुख हैं यहाँ.'

मौन रिश्ते मुखर हो सगे बन गये,
दूर दुःख में रहे, सुख दिखा मिल गले.
कह रहे नर्मदा नेह की नित बहा-
'सूर्य यश का न किंचित कभी भी ढले.

मन भ्रमित, तन ज्वलित, है अमन खोजता,
चाह हर आह बनकर परखती रही.
हौसला-कोशिशें, श्रम-लगन नित 'सलिल'
ऊग-ढल भू-गगन पर बिखरती रही.

चहचहा पंछियों ने जगाया पुलक,
सोच कम, कर्म कर, भूल परिणाम जा.
न मिले मत तरस, जो मिले कर ग्रहण-
खीर खा बुद्ध बन, शेष सब भूल जा.

*****

शनिवार, 19 जनवरी 2013

रोचक रचना: ... क्लिक करूँ राहुल उपाध्याय

रोचक रचना:
... क्लिक करूँ
राहुल उपाध्याय
*
हे भगवन!
इतनी बड़ी दुनिया में
किस आईकॉन पे मैं क्लिक करूँ
ताकि हम और तुम क्लिक हो सकें
युगों-युगों के बंधन तोड़ के
एक दूसरे से जुड़ सकें


कैसे मैं खूद को रिबूट करूँ
ताकि सारे विकार मिट जाए
केश सारा क्लियर हो जाए
मन के पूर्वाग्रह छट जाए


ये दुनिया तेरी
ये सिस्टम तेरा
फिर क्यूँ न एक
विज़न भी हो
पाप हो तो
पॉप-अप भी हो
सपोर्ट का
कोई नम्बर भी हो
ऑनलाईन हो
ऑफ़लाईन हो
हेल्प का कोई प्रोविज़न भी हो


यूँ बार-बार
हमें रिसाईकल न कर
मोटा-पतला-छोटा न कर
जो हो गया सो हो गया
यूँ बार-बार
हमें दफ़ा न कर
काम क्या है
प्रयोजन क्या है
कुछ तो हमें बताया भी कर
*
Rahul Upadhyaya <upadhyaya@yahoo.com>

13 जनवरी 2013
सिएटल । 513-341-6798

==================
आईकॉन = icon
क्लिक = click
रिबूट = reboot
केश = cache
क्लियर = clear
सिस्टम = system
विज़न = vision
पॉप-अप = pop-up
सपोर्ट = support
ऑनलाईन = online
ऑफ़लाईन = offline
हेल्प = help
प्रोविज़न = provision
रिसाईकल = recycle
A picture may be worth a thousand words. But mere words can inspire millions

How To (and How Not To) Write Poetry Wisława Szymborska

How To (and How Not To) Write Poetry
 
Advice for blocked writers and aspiring poets from a Nobel Prize winner’s newspaper column.
 
To Heliodor from Przemysl: “You write, ‘I know my poems have many faults, but so what, I’m not going to stop and fix them.’ And why is that, oh Heliodor? Perhaps because you hold poetry so sacred? Or maybe you consider it insignificant? Both ways of treating poetry are mistaken, and what’s worse, they free the novice poet from the necessity of working on his verses…..”
 
To Mr.K.K from Byton: “You treat free verse as a free-for –all. But poetry (whatever we may say) is, was and will always be a game. And as every child knows, all games haves rules. So why do grown-ups forget?”
To Mr. Pal-Zet of Skarysko-Kam: “The poems you’ve sent suggest that you’ve failed to perceive a key difference between poetry and prose. For example, the poem entitled ‘Here’ is merely a modest prose description of a room and the furniture it holds. In prose such description perform a specific function: they set the stage for the action to come, In a moment the doors will open, someone will entre, and something will take place. In poetry the description itself must ‘take place’. Everything becomes significant, meaningful: the choice of images, their placement, the shape they take in words. The description of that room, and the emotion contained by that description must be shared by the readers. Otherwise, prose will stay prose, no matter how hard you work to break your sentences into lines of verse. Ans what’s worse, nothing happens afterwards.”
You can see whole article at:
 

ग़ज़ल: रहनुमा चाहिए - ओमप्रकाश तिवारी

ग़ज़ल:
रहनुमा चाहिए
 - ओमप्रकाश तिवारी 
*
(सीमा पर दो जवानों के सिर कटने के सप्ताह भर बाद हमारे प्रधानमंत्री ने मुंह खोले । उन्हें मुबारकबाद देते हुए एक तुकबंदी प्रस्तुत है)

रहनुमा चाहिए

रहनुमा चाहिए मुंह में ज़ुबान हो जिसके ,
दिल में थोड़ा ही सही पर ईमान हो जिसके ।

हम हैं तैयार बहाने को लहू भी अपना ,
सिर्फ दो बूंद पसीने की आन हो जिसके ।

हमारे साथ जो घर अपना जला सकता हो,
इस रिआया पे खुदा मेहरबान हों जिसके ।

नहीं है राम का युग ना यहां गांधी कोई ,
फिर भी दो-चार सही कद्रदान हों जिसके ।

कोई किसी को निवाले नहीं देता आकर ,
किंतु नीयत में तो अमनो-अमान हो जिसके ।

चलेगी जात-पांत बात-बुराई सारी ,
जेहन में घूमता हिंदोस्तान हो जिसके । 

--
Om Prakash Tiwari
Chief of Mumbai Bureau
Dainik Jagran
Om Prakash Tiwari <omtiwari24@gmail.com>
41, Mittal Chambers, Nariman Point, Mumbai- 400021Tel : 022 30234900 /30234913/39413000Fax : 022 30234901M : 098696 49598

शुक्रवार, 18 जनवरी 2013

लघु कथा: खुशामद भारतेंदु हरिश्चन्द्र

लघु कथा:
खुशामद






भारतेंदु हरिश्चन्द्र
*
एक नामुराद आशिक से किसी ने पूछा, 'कहो जी, तुम्हारी माशूका तुम्हें क्यों नहीं मिली।'

बेचारा उदास होकर बोला, 'यार कुछ न पूछो! मैंने इतनी खुशामद की कि उसने अपने को सचमुच ही परी समझ लिया और हम आदमियों से बोलने में भी परहेज किया।'

*****

गुरुवार, 17 जनवरी 2013

पाठक नामा- मेरी आपबीती: बेनज़ीर भुट्टो 2


पाठक नामा- मेरी आपबीती: बेनज़ीर भुट्टो 2  

संजीव 'सलिल'

*

१९७१ के बंगला देश समर पर बेनजीर :

==''...मैं नहीं देख पाई कि लोकतान्त्रिक जनादेश की पकिस्तान में अनदेखी हो रहे एही. पूर्वी पकिस्तान का बहुसंख्यक हिस्सा अल्पसंख्यक पश्चिमी पाकिस्तान द्वारा एक उपनिवेश की तरह रखा जा रहा है. पूर्वी पकिस्तान की ३१ अरब की निर्यात की कमाई से पश्चिमी पकिस्तान में सड़कें, स्कूल, यूनिवर्सिटी और अस्पताल बन रहे हैं और पूर्वी पकिस्तान में विकास की कोई गति नहीं है. सेना जो पकिस्तान की सबसे अधिक रोजगार देनेवाली संस्था रही, वहां ९० प्रतिशत भारती पश्चिमी पकिस्तान से की गयी. सरकारी कार्यालयों की ८० प्रतिशत नौकरियां प. पाकिस्तान के लोगों को मिलती हैं. केंद्र सरकार ने उर्दू को राष्ट्रीय भाषा बताया है जबकि पूर्वी पाकिस्तान के कुछ ही लोग उर्दू जानते हैं....
 
'पाकिस्तान एक अग्नि परीक्षा से गुजर रहा है' मेरे पिता ने मुझे एक लंबे पत्र में लिखा... 'एक पाकिस्तानी ही दुसरे पाकिस्तानी को मार रहा है, यह दु:स्वप्न अभी टूटा नहीं है. खून अभी भी बहाया जा रहा है. हिंदुस्तान के बीच में आ जाने से स्थिति और भी गंभीर हो गयी है...'

निर्णायक और मारक आघात ३ दिसंबर १९७१ को सामने आया...व्यवस्था ठीक करने के बहाने ताकि हिन्दुस्तान में बढ़ती शरणार्थियों की भीड़ वापिस भेजी जा सके, हिन्दुस्तान की फौज पूर्वी पकिस्तान में घुस आयी और उसने पश्चिमी पकिस्तान पर हमला बोल दिया.'
 
बेनजीर को सहेली समिया का पत्र 'तुम खुशकिस्मत हो जो यहाँ नहीं हो, यहाँ हर रात हवाई हमले होते हैं और हम लोगों ने अपनी खिडकियों पर काले कागज़ लगा दिए हैं ताकि रोशनी बाहर न जा सके... हमारे पास चिंता करने के अलावा कोई काम नहीं है... अखबार कुछ नहीं बता रहे हैं... सात बजे की खबर बताती है कि हम जीत रहे हैं जबकि बी.बी.सी. की खबर है कि हम कुचले जा रहे हैं... हम सब डरे हुए हैं... ३ बम सडक पर हमारे घर के ठीक सामने गिरे... हिन्दुस्तानी जहाज़ हमारी खिड़की के इतने पास इतने नीचे से गुजरते हैं कि हम पायलट को भी देख सकते हैं... ३ रात पहले विस्फोट इतने तेज़ थे कि मुझे लगा कि उन्होंने हमारे पड़ोस में ही बम गिर दिया है... आसमान एकदम गुलाबी हो रहा था. अगली सुबह पता चला कराची बंदरगाह पर तेल के ठिकाने पर मिसाइल दागी गयी थी....'
 
भुट्टो नीति:
 
'१२ दिसंबर मेरे पिता ने सुरक्षा परिषद् से युद्ध विराम करवाने की मांग की और कहा कि पकिस्तान की सीमा से भारतीय फौजें हटाई जाएं. वहां संयुक्त राष्ट्र की सेना भेजी जाए जिससे पूर्वी पकिस्तान में हिंसा रुके लेकिन मेरे पिता की इस बात का वहां कोई असर नहीं हुआ.... मैं अपने पिता के लिए याहिया खान को पाकिस्तान में फोन मिलाती हूँ... प्रेजिडेंट सो रहे हैं. मेरे पिता फोन मुझसे छीनकर जोर से बोलते हैं... 'प्रेजिडेंट को जगाओ... उन्हें तुरंत पश्चिमी सीमा पर हमला बोल देना चाहिए. हमें पूर्वी पकिस्तान में तुरंत दवाब हटाना है. एक पश्चिमी पत्रकार बताता है जनरल नियाजी ने पूर्वी पकिस्तान में भारत की फौज के आगे आत्मसमर्पण कर दिया है. याहया उपलब्ध नहीं हैं... एक शाम अमरीका से राज्य सचिव हेनरी कीसिंगर और पीपल्स रिपब्लिक के चेयरमैन चीन से हांग हुआ फोन करते हैं. कीसिंगर को लगता है चीन की सेना पाकिस्तान के पक्ष में खड़ी होगी. मेरे पिता का मानना है ऐसा नहीं होगा. जब पापा योजना बनाते हैं कि याह्या को बीजिंग जाने की सलाह दें तभी पता चलता है कि कीसिंगर न्यूयार्क में चीन के लोगों से बात कर रहे हैं. सोवियत रूस का प्रतिनिधि मंडल आकर जाता है. अमरीकी प्रतिनिधि मंडल की अगुवाई जोर्ज बुश कर रहे थे.... पूरी वार्ता के दौरान मैं बेड रूम में फोन के बगल में बैठी हुई झूठे-सच्चे संवाद ले रही हूँ...''

मेरे पिता मुझसे कहते हैं 'मीटिंग को ख़त्म कर दो, अगर रूसी दल हो तो मुझसे कहो कि चीन का दल लाइन पर है, अगर अमरीकन हो तो मुझे कहो कि रूसी या हिन्दुस्तानी लाइन पर है. सचमुच किसी को भी मत बताओ कि कौन है इधर. कूटनीति का एक पाठ समझ लो वह यह कि संदेह पैदा करो और अपने सारे पत्ते मेज पर मत फैला कर रखो.' मैं उनके निर्देश को मानती हूँ लेकिन यह पाठ नहीं मानती. मैं हमेशा अपने सारे पत्ते खोलकर रखती हूँ. कूटनीति का खेल न्यूयार्क में जारी है और सब कुछ अचानक थम जाता है. याहया पश्चिमी सीमा पर हमला नहीं करते. फ़ौजी हुकूमत ने मन ही मन पूर्वी पाकिस्तान का खो जाना स्वीकार कर लिया है और उम्मीद हार चुके हैं... हिन्दुस्तान जानता है पूर्वी पाकिस्तान में हमारा कमांडर मोर्चा छोड़ देना चाहता है... 

सुरक्षा परिषद् के सदस्य समझ गए हैं कि ढाका अब गिरने ही वाला है. मेरे पिता १५ दिसंबर को सुरक्षा परिषद् में ब्रिटेन और फ़्रांस की ओर उंगली उठाते हैं जिन्होंने अपने निजी स्वार्थों के कारण वोट नहीं दिया था 'उदासीन प्राणी जैसा कुछ नहीं होता, आपको किसी एक और अपनी राय रखनी होगी चाहे न्याय की ओर या अन्याय की ऑर. आपको किसी एक का पक्ष चुनना ही होगा, चाहे आक्रामक का या उसका जिस पर हमला किया गया है. उदासीनता जैसी कोई स्थिति नहीं होती.'... 

मैंने एक पाठ सीखा स्वीकृति या विरोध, महाशक्तियां जैसे हठपूर्वक पाकिस्तान के विरोध में हैं इसका मतलब कि इसमें उनकी स्वीकृति है जिसका मतलब है आक्रमण को न्यायसंगत मान लेना, कब्जे को उचित ठहराना, उस सबको मान्यता देना जो १५ दिसंबर १९७१ तक गैर कानूनी था. मेरे पिता फट पड़ते हैं 'मैं इस निर्णय में भागीदार नहीं हूँ. संभालिये अपनी सुरक्षा परिषद्. मैं जा रहा हूँ.' मेरे पिता उठते हैं और बाहर चल पड़ते हैं, मैं तेजी से सारे कागज़ बटोरती पीछे-पीछे चल पडती हूँ. वाशिंगटन पोस्ट ने मेरे पिता के सुरक्षा परिषद् में उठाये कदम को जीता-जागता नाटक बताया था.
 
'अगर हम ढाका में फ़ौजी आत्म-समर्पण करते भी हैं तब भी यह हमारा राजनैतिक रूप से हार मान लेना नहीं होना चाहिए.' मेरे पिता ने मुझे सुरक्षा परिषद् से बाहर निकलकर न्यूयार्क की सडकों पर चलते हुए कहा था. 'इस तरह वहां से बाहर निकल आने के जरिए मैंने यह संदेश छोड़ा कि हम भले ही भौतिक रूप से हार गए हों हमारी कौमी इज्जत इस तरह से कुचली नहीं जा सकती.' और ढाका हमारे हाथ से चला गया... हमारा  संयुक्त धर्म इस्लाम जिसे हम सोचते थे कि हिंदुस्तान के एक हज़ार मील तक फैलेगा... हमें एक बनाये रखने में नाकामयाब हो गया.
 
२० दिसंबर १९७१: ढाका पतन के ४ दिन बाद लोगों ने जबरन याह्या खान को गद्दी से उतार दिया, मेरे पिता जो संसदीय इकाई के चुने प्रतिनिधि थे पाकिस्तान के नए राष्ट्रपति बनाये गए... संविधान न होने की स्थिति में वे पहले नागरिक थे जो मार्शल ला प्रशासन के अध्यक्ष बने.
 
शिमला २८ जून १९७२:
 
'परिणाम चाहे जो हो यह वार्ता पाकिस्तान का भाग्य बदलनेवाली होगी.' मेरे पिता ने बताया. वे चाहते थे कि मैं वहाँ उनके साथ रहूँ. मेरे पिता निहत्थे बात करने जा रहे थे जबकि हिन्दुस्तान  के पास वे सरे पत्ते थे जिनसे वह सौदेबाजी कर सकता था हमारे युद्धबंदी, ५००० वर्गमील जमीन, आगे और लडाई की स्थिति. 'हर कोई इस बात के संकेत खोजने के चक्कर में रहेगा कि मीटिंग कैसी चल रही है इसलिए बहुत होशियार रहना.' मेरे पिता ने मुझे सलाह दी 'तुम हँसना-मुस्कुराना मत. कहीं यह न लगे कि हमारे फ़ौजी तो हिंदुस्तानी जेल में सड़ रहे हैं और हम मजे लूट रहे हैं... तुम उदास चेहरा भी मत बनाकर रखना... जो यह लगे कि हम मन में कोई उम्मीद नहीं रखते.'
 
'तो मुझे कैसा दिखना चाहिए?' मैंने पूछा.
 
'न तो बहुत खुश दिखो, न ही एकदम गमगीन.'
 
हमारा स्वागत करने के लिए श्रीमती इंदिरा गांधी मौजूद थीं. देखने में वह कितनी छोटी थीं... उससे भी कहीं ज्यादा छोटी जितनी हम उन्हें तस्वीरों में देखते रहे हैं. कितनी भव्य थीं वह उस बरसते एके बावजूद जो उन्होंने साड़ी के ऊपर उस बरसात में पहन रखी थी.
 
अपनी मजबूत स्थिति में बैठीं श्रीमती गांधी एक समूचे निर्णायक फैसले पर पहुँचाना चाहती थीं जिसमें कश्मीर का विवादित हिस्सा भी था. पाकिस्तानी प्रतिनिधि मंडल चाहता था कि एक-एक मुद्दे पर अलग-अलग फैसले लिए जाएं, जैसे सरहद के मामले, युद्ध बंदियों के मामले और कश्मीर का विवाद....'

शेष फिर ...