बुधवार, 26 जून 2019

दोहा

दोहा सलिला
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खेत ख़त्म कर बना लें, सडक शहर सरकार
खेती करने चाँद पर, जाओ कहे दरबार
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पल-पल पल जीता रहा, पल-पल मर पल मौन
पल-पल मानव पूछता, पालक से तू कौन?
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प्रथम रश्मि रवि की हँसी, लपक धरा को चूम
धरा-पुत्र सोता रहा, सुख न उसे मालूम
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दल के दलदल में फँसा, नेता देता ज्ञान
जन की छाती पर दले, दाल- स्वार्थ की खान
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खेल रही है सियासत, दलित-दलित का खेल
भूल सिया-सत छल रही, देश रहा चुप झेल
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काम और आराम में, ताल-मेल ले सीख
जो वह ही मंजिल वरे, सबसे आगे दीख
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सुबह उषा फिर साँझ से, खूब लड़ाया लाड़
छिपा निशा की गोद में, सूरज लेकर आड़
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तर्क वितर्क कुतर्क से, ठगा गया विश्वास
बिन श्रद्धा के ज्ञान का, कैसे हो आभास?
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लगा-लगा दम, आदमी, हो बेदम मजबूर
कोई न कहता आ दमी, सभी भागते दूर
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अपने अपने है नहीं, गैर नहीं हैं गैर
खुद को खुद ही परख लें, तभी रहेगी खैर
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पेड़ कभी लगते नहीं, रोपी जाती पौध
अब जमीन ही है नहीं, खड़े सहस्त्रों सौध
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