बुधवार, 26 जून 2019

संसमरण सलिल -विजय नेमा 'अनुज'

नर्मदा सलिल सी निर्मलता के पर्याय आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
विजय नेमा 'अनुज'
*
व्यक्ति के विकास में  परिवार, समाज तथा परिवेश की महती भूमिका होती है। सनातन सलिला नर्मदा तट  स्थित संस्कारधानी जबलपुर के यशस्वी साहित्यकार आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' के व्यक्तित्व में नर्मदा मैया के निर्मल शीतल सलिल की सी निर्मलता का होना उन्हें असाधारण बनाता है। जन्म स्थली मंडला तथा कर्मस्थली जबलपुर दोनों ही स्थानों को माँ नर्मदा का आशीष प्राप्त है। सलिल जी ने राग-द्वेष से दूर रहना तथा हर पिपासु की ज्ञान-पिपासा को बुझाने का प्रवृत्ति माँ नर्मदा से ही पाई है। ऊँचे-पूरे कद-काठी, आभापूर्ण मुख मंडल, हँसमुख स्वभाव, स्पष्टवादिता, सरलता तथा मिलनसारिता के संगम सलिल जी प्रथम दृष्टी में ही प्रभावित और आकर्षित करते हैं। वे जाति, धर्म, साम्प्रदायिकता, क्षेत्रीयता की संकीर्ण सीमाओं से परे टूटते हुए सामाजिक मूल्यों को हो रही क्षति  भरपाई करने के लिए सजग हैं। अवसरवादिता, मुँहदेखी खुशामद, लल्लो-चप्पो से कोसों दूर रहकर समर्पित भाव से लगातार साहित्य सृजन में निमग्न रहनेवाले सलिल जी विद्वान्, ईमानदार और समर्पित समाजसेवी हैं। उनका तकनीकी अभियांत्रिकीय ज्ञान भी व्यवसाय नहीं समाज सेवा और नव निर्माण का माध्यम है। जो भी व्यक्ति एक बार सलिल जे ेके संपर्क में आता है वह उन्हें भूल नहीं पाता। वे अभियांत्रिकी, विज्ञान, दर्शन शास्त्र, समाजशास्त्र, मनोविज्ञान, राजनीती, नाट्यशास्त्र, सौंदर्य शास्त्र, भषा विज्ञान, व्याकरण। छंद शास्त्र और न जाने कितने विषयों के जानकार है।वे निरंतर पढ़ते हैं। उनकी विशेषता मौलिक चिंतन करना है। वे अंधानुकरण नहीं करते, पढ़े हुए को तथ्यों और तर्कों की कसौटी पर कसते हैं। परंपरा को ज्यों का त्यों न स्वीकारने के कारण परंपरावादी और निराधार बदलाव को न मानने के कारण तथाकथित प्रगतिवादी उनसे रुष्ट भले ही रहे आयें, उन्हें नकार नहीं पाते। पाखंड और बनावटीपन पर प्रहार करते हुए सलिल जी 'मनुष्य वही है कि जो मनुष्य के लिए जिए' को जीवन में जीते हैं। अपने विरोधियों को भी आवश्यकता होने पर मदद करने से वे पीछे नहीं हटते। उनकी संवेदनाओं में अनुभूतियाँ, धारणाएं, भावनाएँ और संवेग गहरे उतर कर नूके कर्मठ व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं जिसके फलस्वरूप उनमें व्यक्ति चेतना और समाज चेतना का विकास होता है जो अंतत: उन्हें 'आत्मनेपदी से परस्मैपदी' की यात्रा का यात्री बना देता है। उनके छंद साधना चकित करती है। नव छंदों के अन्वेषण और सृजन में उनका सानी नहीं है। संस्कारधानी ही नहीं प्रदेश और प्रदेश के बाहर अनेक संस्थाओं और मंचाओं को उन्होंने सुशोभित, संबोधित किया है और उन्हें सम्मनित कर संस्थाएँ और मंच गौरवान्वित हुए हैं। प्रभु से प्रार्थना है की सलिल जी का सतसंग और सहयोग मुझे सदा मिलता रहे। 
===
संपर्क: २४ बी शंकर कुटी, विवेकानंद वार्ड, जानकी नगर, जबलपुर चलभाष: ९८२६५०६०२५, ०७६१२६४०७६९ 

कोई टिप्पणी नहीं: