सोमवार, 3 जून 2019

दोहा

दोहा सलिला:
संजीव
*
भँवरे की अनुगूँज को, सुनता है उद्यान 
शर्त न थककर मौन हो, लाती रात विहान 
*
धूप जलाती है बदन, धूल रही हैं ढांक
सलिल-चाँदनी साथ मिल, करते निर्मल-पाक
*
जाकर आना मोद दे, आकर जाना शोक
होनी होकर ही रहे, पूरक तम-आलोक
*
अब नालंदा अभय हो, ज्ञान-रश्मि हो खूब
'सलिल' मिटा अज्ञान निज, सके सत्य में डूब
३०-५-२०१५
*

कोई टिप्पणी नहीं: