रविवार, 14 दिसंबर 2014

navgeet

नवगीत:
नवगीतात्मक खंडकाव्य रच
महाकाव्य की ओर चला मैं
.
कैसा मुखड़ा?
लगता दुखड़ा
कवि-नेता ज्यों
असफल उखड़ा
दीर्घ अंतरा क्लिष्ट शब्द रच
अपनी जय खुद कह जाता बच
बहुत हुआ सम्भाव्य मित्रवर!
असम्भाव्य की ओर चला मैं
.
मिथक-बिम्ब दूँ
कई विरलतम
निकल समझने
में जाए दम
कई-कई पृष्ठों की नवता 
भारी भरकम संग्रह बनता 
लिखूं नहीं परिभाष्य अन्य सा
अपरिभाष्य की ओर चला मैं
.
नवगीतों का
मठाधीश हूँ
अपने मुँह मिट्ठू
कपीश हूँ
वहं अहं का पाल लिया है 
दोष थोपना जान लिया है  
मानक मान्य न जँचते मुझको 
तज अमान्य की ओर चला मैं
.




   

4 टिप्‍पणियां:

vijay3@comcast.net ने कहा…

vijay3@comcast.net [ekavita]

नवगीत अच्छा लगा। बधाई।
विजय निकोर

Om Prakash Tiwari ने कहा…

Om Prakash Tiwari

वहं अहं का पाल लिया है .......... वाह क्या बात कही है। बधाई।

shiv ji shrivastava ने कहा…

Shivji Srivastava

सुंदर व्यंजना


kalpana ramani ने कहा…

कल्पना रामानी

वाह! वाह बहुत बढ़िया