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बुधवार, 27 दिसंबर 2017

hasya kavita

सामयिक हास्य कविता:
राहुल जी का डब्बा गोल
संजीव
*
लम्बी_चौड़ी डींग हाँकतीं, मगर खुल गयी पल में पोल
मोदी जी का दाँव चल गया, राहुल जी का डब्बा गोल
मातम मना रहीं शीला जी, हुईं सोनिया जी बेचैन
मौका चूके केजरीवाल जी, लेकिन सिद्ध हुए ही मैन
हंग असेम्बली फिर चुनाव का, डंका जनता बजा रही
नेताओं को चैन न आये, अच्छी उनकी सजा रही
लोक तंत्र को लोभ तंत्र जो, बना रहे उनको मारो
अपराधी को टिकिट दे रहे, जो उनको भी फटकारो
गहलावत को वसुंधरा ने, दिन में तारे दिखा दिये
जय-जयकार रमन की होती, जोगी जी पिनपिना गये
खिला कमल शिवराज हँस रहे, पंजा चेहरा छिपा रहा
दिग्गी को रूमाल शीघ्र दो, छिपकर आँसू बहा रहा
मतदाता जागो अपराधी नेता, बनें तो मत मत दो
नोटा बटन दबाओ भैया, एक साथ मिल करवट लो

*
२७.१२.२०१५ 

navgeet

नवगीत-
गुरु विपरीत 
*
गुरु विपरीत 
हमेशा चेले 
*
गाँधी कहते सत्य बोलना
गाँधीवादी झूठ बोलते
बुद्ध कहें मत प्रतिमा गढ़ना
बौद्ध मूर्तियाँ लिये डोलते
जिन मुनि कहते करो अपरिग्रह
जैन संपदा नहीं छोड़ते
चित्र गुप्त हैं निराकार
कायस्थ मूर्तियाँ लिये दौड़ते
इष्ट बिदा हो जाता पहले
कैसे यह
विडंबना झेले?
गुरु विपरीत
हमेशा चेले
*
त्यागी मठ-आश्रम में बैठे
अपने ही भक्तों को लूटें
क्षमा करो कहते ईसा पर
ईसाई दुश्मन को कूटें
यवन पूजते बुत मक्का में
लेकिन कहते बुत हैं झूठे
अभियंता दृढ़ रचना करते
किन्तु समय से पहले टूटें
माया कहते हैं जो जग को
रमते हैं
लगवाकर मेले
गुरु विपरीत
हमेशा चेले
*
विद्यार्थी विद्या की अर्थी
रोज निकालें नकल कर-कर
जन प्रतिनिधि जनगण को ठगते
निज वेतन-भत्ते बढ़वाकर
अर्धनग्न घूमे अभिनेत्री
नित्य न अभिनय बदन दिखाकर
हम कहते गृह-स्वामी खुद को
गृहस्वामिनी की आज्ञा लेकर
गिनें कहाँ तक
बहुत झमेले?
गुरु विपरीत
हमेशा चेले
*

२७.१२.२०१५ 

geet

गीत- 
*
सललल्लाहो अलैहि वसल्लम
*
सल्ललाहो अलैहि 
वसल्लम
क्षमा करें सबको
हम हरदम
*
सब समान हैं, ऊँच न नीचा
मिले ह्रदय बाँहों में भींचा
अनुशासित रह करें इबादत
ईश्वर सबसे बड़ी नियामत
भुला अदावत, क्षमा दान कर
द्वेष-दुश्मनी का
मेटें तम
सललल्लाहो अलैहि
वसल्लम
*
तू-मैं एक न दूजा कोई
भेदभाव कर दुनिया रोई
करुणा, दया, भलाई, पढ़ाई
कर जकात सुख पा ले भाई
औरत-मर्द उसी के बंदे
मिल पायें सुख
भुला सकें गम
सललल्लाहो अलैहि
वसल्लम
*
ज्ञान सभ्यता, सत्य-हक़ीक़त
जगत न मिथ्या-झूठ-फजीहत
ममता, समता, क्षमता पाकर
राह मिलेगी, राह दिखाकर
रंग- रूप, कद, दौलत, ताकत
भुला प्रेम का
थामें परचम
सललल्लाहो अलैहि
वसल्लम
*
कब्ज़ा, सूद, इजारादारी
नस्लभेद घातक बीमारी
कंकर-कंकर में है शंकर
हर इंसां में है पैगंबर
स्वार्थ छोड़कर, करें भलाई
ईशदूत बन
संग चलें हम
सललल्लाहो अलैहि
वसल्लम
*

२७-१२-२०१५ 

doha


एक दोहा
मोदी राहुल जप रहे, राहुल मोदी नाम
नूरा कुश्ती कर रहे, जाता ठगा अवाम
***

दोहा दुनिया

शिव भूखे हैं भाव के,
शिव को भाती भक्ति.
शिवा न शिव से भिन्न हैं.
शिव चरणों में मुक्ति.
.
भज न कभी भी स्वार्थवश,
भजन करो निस्वार्थ.
शिव होते उस पर सदय,
जो भजता सर्वार्थ.
.
असुरों को वरदान दें,
सुर के हैं शिव इष्ट.
नर वानर किन्नर सभी,
शिव के साधक शिष्ट.
.
शिव न भोग से भागते,
शिव न भोग में लीन.
योग-भोग संयोग ही,
जीवन-कला नवीन.
.
क्रोध न करते शिव कभी,
शिव दिखलाते क्रोध.
सही-गलत क्या, क्या नहीं,
हो अबोध को बोध.
...
27.12.2018

मंगलवार, 26 दिसंबर 2017

भूमिका

पुरोवाक
:
'गाँधी और उनके बाद' 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' 
*
[कृति विवरण: गाँधी और उनके बाद, काव्य संग्रह, ISBN No.: 13-978-93-83198-07-8, ओमप्रकाश शुक्ल, २०१८, आकार डिमाई, आवरण बहुरंगी, पृष्ठ  ६०, १५०/-, पाल प्रकाशन, १८२ चंद्रलोक, मंडोली मार्ग, दिल्ली ११००९३, कवि संपर्क: ९७१७६३४६३१ / ९६५४४ ७७११२]     
*
               सनातन मूल्यों के वर्तमान संक्रमण काल में सत्य और अहिंसा की आधार शिला पर  अपने व्यक्तिगत, पारिवारिक, राजनैतिक और सामाजिक जीवन इमारत खड़ी करनेवाले, साधारण रूप-रंग, कद-काठी किंतु असाधारण ही नहीं अनुपमेय चिंतन शक्ति और कर्म निष्ठा के जीवंत उदाहरण गाँधी जी से आत्मिक जुड़ाव की अनुभूति कर, उनके व्यक्तित्व-कृतित्व से अभिभूत होकर, एकांतिक निष्ठा और समर्पण के दिव्य भाव से समर्पित होकर एक युवा द्वारा ६५ काव्य रचनाएँ की जाना विस्मित करता है। म. गाँधी की नौका पर चढ़कर चुनावी वैतरणी पार करनेवाले उनके नाम का सदुपयोग (?) उनके जीवन काल से अब तक असंख्य बार करते रहे हैं और न जाने कब तक करते रहेंगे। गाँधी जी के विचारों की हत्या कर उनके अनुयायी होने का दावा करनेवालों की संख्या भी अगणित है किंतु बिना किसी स्वार्थ के गाँधी जी के व्यक्तित्व-कृतित्व से अपनत्व और अभिन्नता की प्रतीति कर काव्य कर्म को मूर्त करने की साधना न तो सहज है, न ही सुलभ। प्रतिदिन प्रकाशित हो रही अगणित हिंदी काव्य रचनाओं के बीच शुचि-सात्विक चिंतनपरक सृजन का वैचारिक अश्वमेध बिना दृढ़ संकल्प पूर्ण नहीं होता। 

               काव्य रचना वैचारिक प्रतिबद्धता के साथ प्रचुर शब्द-भण्डार, प्रासंगिक कथ्य, सम्यक भावाभिव्यक्ति, छांदस लयात्मक अभिव्यक्ति, यथोचित आलंकारिक सज्जा, बिंब-प्रतीक के सप्तपदीय अनुशासन के साथ शब्द-शक्तियों और रस के समन्वययुक्त नवधा अनुष्ठान को पूर्ण करने की संश्लिष्ट प्रक्रिया है। युवा कवि ओमप्रकाश शुक्ल ने  नितांत समर्पण भाव से इस रचना यज्ञ में भावाहुतियाँ दी हैं। इस कृति के पठन के समान्तर पाठक के मन में चिंतन प्रक्रिया आरम्भ हो जाती है। दर्शन शास्त्र में स्नातकोत्तर अध्ययन करते समय गाँधी दर्शन से दो-चार होने के अवसर मिला है। समय-समय पर अपने आचरण में यदा-कदा वह प्रभाव पाता रहा हूँ। 'गाँधी और उनके बाद' की रचनाएँ मुझे मेरे कवि के उस मनोभाव से साक्षात का सुअवसर देता रहा जिसे मैं अभिव्यक्त नहीं कर सका। बहुधा ऐसा लगता रहा जैसे अपनी ही विचार सलिला में अवगाहन कर रहा हूँ। 

               प्रथम रचना में बापू के चरणों में प्रणति-पुष्प अर्पित कर कवि कामना करता है 'देना नित मुझे मार्गदर्शन / कर सकूँ सत्य का अवलोकन'। सत्य - अवलोकन की प्रक्रिया में छद्म गाँधीवादियों की विचार यात्रा को 'दे दी हमें आजादी बिना खड्ग, बिना ढाल / साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल' से आरम्भ होकर 'मजबूरी का नाम महात्मा गाँधी' तक पहुँचते देख सत्यान्वेषी कवि बरबस ही पूछ बैठता है-
क्या हम हर क्षण, हर पल
सिर्फ गाँधी की दुहाई देंगे?
मृत्यु के पश्चात् भी
क्या हर अच्छे और बुरे कार्य के लिए
उन्हें जिम्मेवार ठहराते रहेंगे?
वर्षों से ध्यान मग्न
उनकी तन्द्रा को भंग करेंगे?
क्या बापू ही
आज तक हर बुराई के लिए
जिम्मेवार हैं?
तो भाई! क्यों नहीं आज तक
आप सभी ने मिलकर
मिटा दिया उन बुराइयों को?

               कवि ही नहीं, मैं और आप भी जानते हैं कि येन-केन-प्रकारेण सिर्फ और सिर्फ सत्ता को साध्य माननेवाले और गाँधी जी के प्रति लोक-आस्था को भुनानेवाले राजनैतिक लोग अपने मन-दर्पण में कभी नहीं  झाँकेंगे। इसलिए वह अपने आप से गाँधी के नाम नहीं विचार के अनुकरण की परंपरा का श्री गणेश करना चाहता है-
मैं बापू के चरित्र से
प्रभावित तो हूँ
और उनके ही समान
बनना चाहता हूँ,
बापू के रंग में रंगकर
एक आदर्श
प्रस्तुत करना चाहता हूँ।

               इस राह में सबसे बड़ी बाधा है बापू का न होना। कवि का यह सोचना स्वाभाविक है कि आज बापू होते तो उनके चरणों में बैठकर उन जैसा बनने की यात्रा सहजता से हो पाती-
हे बापू!
आपके न रहने से
प्रभावित हुआ हूँ मैं।
मेरे अंतर्मन की आशा
जिसमें कुछ कर दिखाने की
थी अभिलाषा
जाने कहाँ विलुप्त हो गयी?

              इन पंक्तियों को पढ़कर बरबस याद हो आती है वह कविता जिसे हमने अपने बचपन में पाठ्य पुस्तक में पढ़कर गाँधी को जाना और एक अनकहा नाता जोड़ा था-
माँ! खादी की चादर दे-दे,  मैं गाँधी बन जाऊँगा
सब मित्रों के बीच बैठकर रघुपति राघव गाऊँगा...
... एक मुझे तू तकली ला दे, चरखा खूब चलाऊँगा

              तब हम सप्ताह में एक दिन तकली भी चलाते थे, और चरखा चलाना भी सीख लिया था। आज तो बच्चों को विद्यालय जाने और पढ़ना-लिखना सीखने के पहले अभिभावक के पहले चलभाष देने में गर्व अनुभव कर रहे हैं।
               यह सनातन सत्य है कि कोई हमेशा सदेह नहीं रहता। गाँधी जी की हत्या न होती तो भी उनका जीवन कभी न कभी तो समाप्त होना ही था। इसलिए अपने मन को समझाकर कवि गाँधी - मार्ग पर चलने का संकल्प करता है-
देख मत दूसरे के दोषों को
तू अपने दोषों का सुधार कर
अहंवाद समाप्त कर
जग में समन्वय पर्याप्त कर
अपनी हर भूल से शिक्षा ले
निज पापों का परिहार कर

               गाँधी-दर्शन 'स्व' नहीं' 'सर्व' के हित साधन का पथ है। कवि गाँधी जी के आदर्श को अपनाने की राह पर अकेला नहीं सबको साथ लेकर बढ़ने का इच्छुक है-
हे बंधु! सुनो
छोड़ो भी ये नारेबाजी
अब मिल तो गयी है आज़ादी
कुछ स्वयं करो
कुछ स्वयं भरो

               निज दोषों और कमियों का ठीकरा गाँधी जी पर फोड़कर खुद कुछ न करनेवाले अन्धालोचकों को कटघरे में खड़ा करते हुए कवि निर्भीकता किंतु विनम्रता से पूछता है-
बकौल तुम्हारे
उनको किसी अच्छाई का श्रेय
नहीं दिया जा सकता
तो अकेले हर बुराई के लिए
वो जिम्मेवार कैसे
फिर गाँधी जैसे व्यक्तित्व को
तुम जैसे तुच्छ सोच
और निरर्थक कृत्य वाले के
प्रमाण पत्र की
किंचित आवश्यकता नहीं
वह स्वयं में प्रामाणिक हैं.

               अपने आदर्श को विविध दृष्टिकोणों से देखने की चाह और विविधताओं में समझने की चाह अनुकरणकर्ता को अपने आदर्श के व्यक्तित्व-कृतित्व के निरीक्षण-परीक्षण तथा उसके संबंध में अपनी अनुभूतियों को अभिव्यक्त करने के लिए प्रेरित ही नहीं विवश भी करती है। कुछ रचनाओं में भावुकता की अतिशयता होने पर भी कवि ने गाँधी जी के जीवन काल में और गाँधी जी की शहादत के बाद हुए सामाजिक, राजनैतिक और मानसिक परिवर्तनों का तुलनात्मक अध्ययन कर सटीक निष्कर्ष निकाले हैं।
यूँ लगा कि
गाँधी और उनके बाद
'भारत का भाग्य' चला गया।
अब वह मर्मस्पर्शी अपनत्व कहाँ?
अब वह सतयुग सा आभास कहाँ?
'गाँधी और उनके बाद'
वस्तुत:
सत्य यही है कि
युग बदला
समय का मूल्य सब भूल गए
नैतिकता का पतन हुआ
दुखद परिस्थितियों को
आत्मसात करना पडा
सत्य कहा मन ने कि
एक युग का अंत हुआ है
'गाँधी और उनके बाद'

               प्रथमार्ध में छंद मुक्त रचनाओं के साथ द्वितीयार्ध में रचनाकार ने हिंदी ग़ज़ल (जिसे आजकल गीतिका, मुक्तिका, अनुगीत, तेवरी आदि विविध नामों से विभूषित किया जा रहा है) के शिल्प विधान में चाँद रचनान्जलियाँ  समर्पित की हैं। गुरु वंदना के पश्चात प्रस्तुत इन रचनाओं का स्वर गाँधी चिन्तनपरक ही है-
क्यों लिखते हो खार सुनों तुम
लिख दो थोड़ा प्यार लिखो तुम

               प्यार की वकालत करते गाँधी जी और गाँधीवाद का प्रभाव  'मुहब्बत का असर है, आज कविता खूब लिखता हूँ', 'ज़िन्दगी सत्य की डगर पर है', 'प्रेम का ही आवरण दिग छा गया है', 'भारती हो भारती की जय करो', 'राम सदा ही / हैं दुःख भंजन' आदि पंक्तियाँ येन-केन संग्रह के केंद्र बिंदु को साथ रख पाती हैं।

               चतुष्पदिक मुक्तकों में 'हम दिखाते रह गए बस सादगी', 'सतयुग सरीखी रीत निभाया न कीजिए', 'आश औरि विश्वास लै, बाँधि नेह कय डोर', 'भू मंडल के जीव-जंतु सब, पुत्र भांति हैं धरती के', 'ममता, समता दिव्यता नारी के प्रतिरूप', 'ऊबड़-खाबड़ बना बिछौना' जैसी पंक्तियाँ विविध विषयांतर के बाद भी मूल को नहीं छोड़तीं। गाँधी दर्शन के दो बिंदु 'हिंदी-प्रेम' और निष्काम कर्म योग' पर केन्द्रित दो मुक्तक देखें-
हिंदी में रचना करें, हिंदी में व्याख्यान
हिन्दीमय हो हिन्द तब, हो हिंदी उत्थान
राजनीति का अंत ही उन्नति का आधार
भारत तब विकसित बने, हो भाषा का मान
*
कर्म करो मनु प्रभु बसें, हो हर अड़चन दूर
कृपा-दृष्टि की छाँव भी, मिले सदा भरपूर
मालिक नहिं कोई हुआ, धन-वैभव की खान
'शुक्ल' रहे इस जगत में, हर कोई मजदूर

               उक्त दोनों दोहा-मुक्तकों में क्रमश: 'स्वभाषा' और न्यासी (ट्रस्टीशिप) सिद्धांत को कवि ने कुशलता से संकेतित किया है। यह कवि सामर्थ्य का परिचायक है। कवि ने मानक आधुनिक हिंदी के साथ लोक भाषा का प्रयोग कर गाँधी जी की भाषा नीति को व्यावहारिक रूप दिया है।

               'प्रेम डोर से बाँध ह्रदय को', 'द्वेष, कपट, छल, बैर मिटे कुछ / मिलकर ऐसी नीत लिखो तुम', 'द्वेष भाव से विलग रहा हूँ', 'राम-भारत सम भ्रातृ-प्रेम हो', 'भले व्यक्ति को नेता चुन ले', 'लेप नेह का हिय पर मलता', 'मन को दुखी करो मत साथी, होगा जो प्रभु ने ठाना' आदि गीताशों में गाँधी-चिन्तन इस तरह पिरोया गया है कि कथ्य की विविधता के बावजूद गाँधी-सूत्र उस गीत का अभिन्न भाग हो गया है। 

               कृति के अंत में सवैये, घनाक्षरी, आल्हा, पद कुण्डलिया तथा चौपाई की प्रस्तुति छांदस कविता के प्रति रचनाकार की रूचि और कुशलता दोनों को बिम्बित करती है। कवि ने अपना गाँधीचिन्तक परक दृष्टि कोण इन लघु रचनाओं में भी पूर्ववत रखा है।

राम प्रभो मनवा अति मोहत               - राम प्रेम, सवैया 

'भारती के भाल पर, प्रकृति के गाल पर
सुर और टाल पर, हिंदी हिंदी छाई है '    - स्वभाषा प्रेम, घनाक्षरी

वंदे मातरम बोल सभी के मन में ऐसी अलख जगाय -राष्ट्र-प्रेम, आल्हा

माँ से बड़ा न कोई  जग में....               - मातृ-प्रेम, पद

सारा दिन मेहनत करे ह्रदय चीर मजदूर -श्रमिक शोषण, कुण्डलिया

अंतर्मन सत-रूप बसाओ - सत्य-प्रेम, चौपाई

हित छोड़ो, मत देश -राष्ट्र-प्रेम, सोरठा

सत्य पर हम बलि जाएँ  - सत्य-प्रेम, रोला

हिन्द देश, हिंदी जुबां, हिन्दू हैं सब लोग  -सर्व धर्म समभाव, दोहा

               काव्य को दृश्य काव्य, श्रव्य काव्य और चम्पू काव्य में वर्गीकृत किया गया है। दृश्य काव्य के अंतर्गत दृश्य अलंकार हैं। संस्कृत काव्य में इसे हेय या निम्न माना गया है। इस कारण न तो संस्कृत काव्य में न हिंदी काव्य में चित्र अलंकारों को अधिक प्रश्रय मिला। मैंने चित्र अलंकार का सर्वाधिक उपयुक्त और सटीक प्रयोग डॉ. किशोर काबरा रचित महाकाव्य उत्तर भागवत में श्री कृष्ण द्वारा महाकाल की पूजन प्रसंग में देखा है। प्रबंध काव्य कुरुक्षेत्र गाथा में में स्तूप अलंकार और ध्वजा अलंकार के रूप में मैंने भी चित्र अलंकार का प्रयोग किया है। ओमप्रकाश ने वर्ण पिरामिड तथा डमरू चित्रालंकार प्रस्तुत किये हैं। युवा रचनाकार में निरंतर नए प्रयोग करने की रचनात्मक प्रवृत्ति सराहनीय है।

               कहने की आवश्यकता नहीं कि कोई भी छंद हो, कोई भी विषय हो कवि को हर जगह गाँधी ही दृष्टिगत होते हैं। गाँधी दर्शन के प्रति यह प्रबद्धता ही इस कृति को पठनीय, मननीय और संग्रहणीय बनाती है। मुझे विशवास है कि पाठक वर्ग में इस कृति का स्वागत होगा।
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संपर्क - विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, सुभद्रा वार्ड, जबलपुर ४८२००१.
चलभाष: ९४२५१८३२४४ / ७९९९५५९६१८, salilsanjiv@gmail.com









 


सुधार

३३. भांति - भाँति, सच है बापू बड़े महान - सच ही बापू बड़े महान
३४. परम अराधक थे - परम आराधक थे
४१. निज पापों का उद्धार कर - निज पापों का परिहार कर
४२. तुम जैसे तुच्छ सोच / और निरर्थक कृत्य वाले के / प्रमाण पत्र की
      किंचित आवश्यकता नहीं / वह स्वयं में प्रामाणिक हैं.
७६. ५ पंक्ति की - कि, ८. मर्मस्पर्शी
८९ हिय तभी - हिन्द तब

karyashala: navgeet

कार्यशाला
नवगीत
सुनीता सिंह
"ताजा हो ले" बोझ गिराकर हल्का हो ले। ऐ दिल थोड़ा ताजा हो ले। रफ्ता रफ्ता धीरे-धीरे। तू कितनी दूर चला आया।। कैसी-कैसी पगडंडी से। चलकर नीम अकेला आया।। तू ही अपना राजा हो ले।। ऐ दिल थोड़ा ताजा हो ले ।। आकर-जाते जाकर-आते । पल कैसे इतने बीत गये।। लड़ते भिड़ते रोते हँसते। युग सावन कितने रीत गये।। उम्मीदों का बाजा हो ले। ऐ दिल थोड़ा ताजा हो ले ।। उठते गिरते गिरते उठते। चलना तो तू भी सीख गया ।। तूफां फिसलन लाख करे पर। तू पाँव जमाना सीख गया।। तू अपना खुद ख्वाजा हो ले। ऐ दिल थोड़ा ताजा हो ले ।।
मूल रचना
*****
"ताजा हो ले"
प्यास बुझाने माजा हो ले। ऐ दिल! थोड़ा ताजा हो ले। रफ्ता-रफ्ता धीरे-धीरे। कितनी दूर चला आया।। कैसी-कैसी पगडंडी से नीम अकेला ही आया।। तन जा तन्नक राजा हो ले।। ऐ दिल! थोड़ा ताजा हो ले ।। आकर-जाते जाकर-आते । पल जैसे युग बीत गये।। लड़ते-भिड़ते रोते-हँसते सावन कितने रीत गये।। उम्मीदों का बाजा हो ले। ऐ दिल! थोड़ा ताजा हो ले ।। उठते-गिरते गिरते-उठते। चलना तू भी सीख गया ।। तूफां फिसलन लाख करे तू पाँव जमाना सीख गया।। खुद बन्दा, खुद ख्वाजा हो ले। ऐ दिल थोड़ा ताजा हो ले ।।
(कुछ बदलाव के बाद)
***

अभियंता कवि ओमप्रकाश यति संस्कारधानी में

अभियन्ता साहित्य संगोष्ठी
जबलपुर. नये वर्ष की पूर्व संध्या पर इंस्टीटयूशन ऑफ़ इन्जीनियर्स, अभियान तथा इंडियन जिओ टेकनिकल सोसायटी के संयुक्त तत्वावधान में इन्स्टीट्यूशन कार्यालय, सिविल लाइन, गोविन्द भवन के सामने जबलपुर में ग़ज़ल विधा के देशव्यापी ख्यति प्राप्त अभियंता कवि ओम प्रकाश यति नोएडा के सम्मान तथा मुख्यातिथ्य में काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया है. कार्यक्रम की अध्यक्ष संस्थाध्यक्ष अभियंता वीरेन्द्र कुमार साहू होंगे. विशेष अतिथि हैं श्री मसुरहा. गोष्ठी का सञ्चालन अभियंता संजीव वर्मा 'सलिल' करेंगे. नगर के अभियंता कवियों सर्व अभियंता अमरेन्द्र नारायण, आर.आर. फौजदार, देवेन्द्र गोंटिया देवराज, आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल', गोपाल कृष्ण चौरसिया 'मधुर', विवेक रंजन श्रीवास्तव, डी. सी. जैन, के. सी. जैन, सुरेन्द्र सिंह पंवार, उदयभानु तिवारी 'मधुकर', बसंत मिश्रा, संजय वर्मा, शोभित वर्मा, गजेंद्र कर्ण तथा अभियंता-परिजनों श्रीमती सुमन श्रीवास्तव, श्रीमती राजलक्ष्मी शिवहरे, श्रीमती मिथलेश बड़गैया आदि द्वारा काव्य पाठ किया जाएगा. पूर्ण होते वर्ष की विदाई तथा नए वर्ष का स्वागत सारस्वत अनुष्ठान से करने की नव परम्परा अभियन्ताओं द्वारा की जा रही है. अभियंता इंस्टीटयूशन ऑफ़ इन्जीनियर्स के सदस्यों, अभियंता-परिवारों तथा काव्य प्रेमियों से उपस्थिति हेतु सर्व अभियंता तरुण कुमार आनंद, राकेश राठोड़, मुक्ता भटेले, मधुसुदन दुबे, अरुण खर्द ने अनुरोध किया है. 

दोहा दुनिया

शिव करते कल्याण हँस
शिवा करें मांगल्य.
शिव-तनया आनंद दे,
तारें हर वैकल्य.
.
शिव सत्ता वरते नहीं,
रहें लोक के साथ.
अजर-अमर होते हुए,
हैं मर्त्यों के नाथ.
.
लोक नाथ हैं सदाशिव,
करें शोक का नाश.
शंख बजा, बम-बम कहो,
कटे अमंगल-पाश.
.
हर हरते हैं कष्ट हर,
तजें नहीं मुख मोड़.
बिना कामना भज सलिल,
भक्ति-भाव मत छोड़.
.
भूत अभूत प्रभूत तप,
तापस शिव-तल्लीन.
शिवा तापसी सर्वदा,
शिव हैं उनमें लीन.
.
नीर-क्षीर हैं शिव-शिवा,
राग-द्वेष से मुक्त.
निर्मल-मन शिव-भक्ति कर,
हो हंसा उन्मुक्त.
.
कंकर-पत्थर ज्यों बनें,
घिस-घिस कर शिवलिंग.
त्यों शिव-शिव जप नित सलिल,
जुड़ जाए शिव-लिंक.
...
26.12.2017

सोमवार, 25 दिसंबर 2017

दोहा दुनिया

शिव की तनया लाड़ली,
मिला नर्मदा नाम.
शिवा सरीखी रूपसी,
दे सुख-शांति ललाम.
.
सुता लडैती शीश चढ़,
हँसती मिलता हर्ष.
रुद्र-सिर चढी रव करे,
रेवा दे उत्कर्ष.
.
रुद्र-अक्ष से अश्रु बह,
कहलाए रुद्राक्ष.
उमा-नयन मछ्ली सदृश,
मुक्ता मणि मीनाक्ष.
.
रुद्र-अक्ष के केंद्र में,
ज्योति-केंद्र लघु बिंदु.
छिद्र हुआ रुद्राक्ष में,
जैसे नभ में इंदु.
.
समय-समय पर अक्ष में,
विविध भाव लें स्थान.
वे मुख बन रुद्राक्ष के,
करें शिवा-शिव-गान.
.
हुआ हर्ष-अतिरेक शिव,
सलिल बने हर्षाश्रु.
कंकर-कंकर से करें,
प्रेम बहें प्रेमाश्रु.
.
छोड़ अमरकंटक गए,
नीलकंठ कैलाश.
मातु नर्मदा गंग हो,
काटें भव के पाश.
.
जगत्पिता शिव को नहीं,
किंचित माया-मोह.
लेकिन सहन न कर सके,
भार्या-प्रिया वियोग.
.
शिव-तांडव से सृष्टि में,
व्यापा हाहाकार.
क्रोध शांत हरि ने किया,
हुआ जगत्-उद्धार.
.
शिव ने शव को लगाया,
गले न माना भेद.
शव से शिव को मुक्तकर,
हरि थे शांत अखेद.
.
हुआ बड़ा दिन वही जब,
शिव हो परम प्रशांत.
शिवा-याद में लीन हो,
रहे न भ्रांत, न क्रांत.
.
25.12.2017

रविवार, 24 दिसंबर 2017

geet

गीत:
'बड़ा दिन'
संजीव 'सलिल'
हम ऐसा कुछ काम कर सकें
हर दिन रहे बड़ा दिन अपना.
बनें सहायक नित्य किसी के-
पूरा करदें उसका सपना.....
*
केवल खुद के लिए न जीकर
कुछ पल औरों के हित जी लें.
कुछ अमृत दे बाँट, और खुद
कभी हलाहल थोडा पी लें.
बिना हलाहल पान किये, क्या
कोई शिवशंकर हो सकता?
बिना बहाए स्वेद धरा पर
क्या कोई फसलें बो सकता?
दिनकर को सब पूज रहे पर
किसने चाहा जलना-तपना?
हम ऐसा कुछ काम कर सकें
हर दिन रहे बड़ा दिन अपना.....
*
निज निष्ठा की सूली पर चढ़,
जो कुरीत से लड़े निरंतर,
तन पर कीलें ठुकवा ले पर-
न हो असत के सम्मुख नत-शिर.
करे क्षमा जो प्रतिघातों को
रख सद्भाव सदा निज मन में.
बिना स्वार्थ उपहार बाँटता-
फिरे नगर में, डगर- विजन में.
उस ईसा की, उस संता की-
'सलिल' सीख ले माला जपना.
हम ऐसा कुछ काम कर सकें
हर दिन रहे बड़ा दिन अपना.....
*
जब दाना चक्की में पिसता,
आटा बनता, क्षुधा मिटाता.
चक्की चले समय की प्रति पल
नादां पिसने से घबराता.
स्नेह-साधना कर निज प्रतिभा-
सूरज से कर जग उजियारा.
देश, धर्म, या जाति भूलकर
चमक गगन में बन ध्रुवतारा.
रख ऐसा आचरण बने जो,
सारी मानवता का नपना.
हम ऐसा कुछ काम कर सकें
हर दिन रहे बड़ा दिन अपना.....
*
(भारत में क्रिसमस को 'बड़ा दिन' कहा जाता है.)

navgeet

एक रचना -
हिंदी भाषी 
*
हिंदी भाषी ही 
हिंदी की 
क्षमता पर क्यों प्रश्न उठाते?
हिंदी जिनको
रास न आती
दीगर भाषा बोल न पाते।
*
हिंदी बोल, समझ, लिख, पढ़ते
सीढ़ी-दर सीढ़ी है चढ़ते
हिंदी माटी,हिंदी पानी
श्रम करके मूरत हैं गढ़ते
मैया के माथे
पर बिंदी
मदर, मम्मी की क्यों चिपकाते?
हिंदी भाषी ही
हिंदी की
क्षमता पर क्यों प्रश्न उठाते?
*
जो बोलें वह सुनें - समझते
जो समझें वह लिखकर पढ़ते
शब्द-शब्द में अर्थ समाहित
शुद्ध-सही उच्चारण करते
माँ को ठुकरा
मौसी को क्यों
उसकी जगह आप बिठलाते?
हिंदी भाषी ही
हिंदी की
क्षमता पर क्यों प्रश्न उठाते?
*
मनुज-काठ में पंचस्थल हैं
जो ध्वनि के निर्गमस्थल हैं
तदनुसार ही वर्ण विभाजित
शब्द नर्मदा नद कलकल है
दोष हमारा
यदि उच्चारण
सीख शुद्ध हम नहीं सिखाते
हिंदी भाषी ही
हिंदी की
क्षमता पर क्यों प्रश्न उठाते?
*
अंग्रेजी के मोह में फँसे
भ्रम-दलदल में पैर हैं धँसे
भरम पाले यह जगभाषा है
जाग पायें तो मोह मत ग्रसे
निज भाषा का
ध्वज मिल जग में
हम सब काश कभी फहराते
***

कविता

एक रचना -
*
करें पत्ते परिंदों से गुफ्तगू 
व्यर्थ रहते हैं भटकते आप क्यूँ?
दरख्तों से बँध रहें तो हर्ज़ क्या 
भटकने का आपको है मर्ज़ मया?
परिंदे बोले न बंधन चाहिए
नशेमन के संग आँगन चाहिए
फुदक दाना चुन सकें हम खुद जहाँ
उड़ानों पर भी न बंदिश हो वहाँ
बिना गलती क्यों गिरें हम डाल से?
करें कोशिश जूझ लें हर हाल से
चुगा दें चुग्गा उन्हें असमर्थ जो
तौल कर पर नाप लें हम गगन को
मौन पत्ता छोड़ शाखा गिर गया
परिंदा झटपट गगन में उड़ गया
***

bhajan

भजन 
भोले घर बाजे बधाई
स्व. शांति देवी वर्मा
मंगल बेला आयी, भोले घर बाजे बधाई ...
गौर मैया ने लालन जनमे,
गणपति नाम धराई.
भोले घर बाजे बधाई ...
द्वारे बन्दनवार सजे हैं,
कदली खम्ब लगाई.
भोले घर बाजे बधाई ...
हरे-हरे गोबर इन्द्राणी अंगना लीपें,
मोतियन चौक पुराई.
भोले घर बाजे बधाई ...
स्वर्ण कलश ब्रम्हाणी लिए हैं,
चौमुख दिया जलाई.
भोले घर बाजे बधाई ...
लक्ष्मी जी पालना झुलावें,
झूलें गणेश सुखदायी.
भोले घर बाजे बधाई ...
******************

geet

गीत
चलो हम सूरज उगायें
आचार्य संजीव 'सलिल'
चलो! हम सूरज उगायें...
सघन तम से क्यों डरें हम?
भीत होकर क्यों मरें हम?
मरुस्थल भी जी उठेंगे-
हरितिमा मिल हम उगायें....
विमल जल की सुनें कल-कल।
भुला दें स्वार्थों की किल-किल।
सत्य-शिव-सुंदर रचें हम-
सभी सब के काम आयें...
लाये क्या?, ले जायेंगे क्या?,
किसी के मन भाएंगे क्या?
सोच यह जीवन जियें हम।
हाथ-हाथों से मिलायें...
आत्म में विश्वात्म देखें।
हर जगह परमात्म लेखें।
छिपा है कंकर में शंकर।
देख हम मस्तक नवायें...
तिमिर में दीपक बनेंगे।
शून्य में भी सुनेंगे।
नाद अनहद गूँजता जो
सुन 'सलिल' सबको सुनायें...
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muktika

मुक्तिका
तुम
आचार्य संजीव 'सलिल'
*
सारी रात जगाते हो तुम
नज़र न फिर भी आते हो तुम.
थक कर आँखें बंद करुँ तो-
सपनों में मिल जाते हो तुम.
पहले मुझ से आँख चुराते,
फिर क्यों आँख मिलाते हो तुम?
रूठ मौन हो कभी छिप रहे,
कभी गीत नव गाते हो तुम
नित नटवर नटनागर नटखट
नचते नाच नचाते हो तुम
'सलिल' बाँह में कभी लजाते,
कभी दूर हो जाते हो तुम.
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doha

दोहा सलिला:
चित्र-चित्र में गुप्त जो, उसको विनत प्रणाम।
वह कण-कण में रम रहा, तृण-तृण उसका धाम ।
विधि-हरि-हर उसने रचे, देकर शक्ति अनंत।
वह अनादि-ओंकार है, ध्याते उसको संत।
कल-कल,छन-छन में वही, बसता अनहद नाद।
कोई न उसके पूर्व है, कोई न उसके बाद।
वही रमा गुंजार में, वही थाप, वह नाद।
निराकार साकार वह, उससे सृष्टि निहाल।
'सलिल' साधना का वही, सिर्फ़ सहारा एक।
उस पर ही करता कृपा, काम करे जो नेक।
***

muktak

मुक्तक
दिल को दिल ने जब पुकारा, दिल तड़प कर रह गया।
दिल को दिल का था सहारा, दिल न कुछ कह कह गया।
दिल ने दिल पर रखा पत्थर, दिल से आँखे फेर लीं-
दिल ने दिल से दिल लगाया, दिल्लगी दिल सह गया।
दिल लिया दिल बिन दिए ही, दिल दिया बिन दिल लिए।
देखकर यह खेल रोते दिल बिचारे लब सिए।
फिजा जहरीली कलंकित चाँद पर लानत 'सलिल'-
तुम्हें क्या मालूम तुमने तोड़ कितने दिल दिए।
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नवगीत: 
खोल दो खिड़की 
हवा ताजा मिलेगी

ओम की छवि 
व्योम में हैं देखना
आसमां पर
मेघ-लिपि है लेखना
रश्मियाँ रवि की
तनिक दें ऊष्णता
कलरवी चिड़ियाँ
नहीं तुम छेंकना
बंद खिड़की हुई तो
साँसें डँसेंगी
कब तलक अमरस रहित
माज़ा मिलेगी
.
घर नहीं संसद कि
मनमानी करो
अन्नदाता पर
मेहरबानी करो
बनाकर कानून
खुद ही तोड़ दो
आप लांछित फिर
भी निगरानी करो
छंद खिड़की हुई तो
आसें मिलेंगी
क्या कभी जनता
बनी राजा मिलेगी?
.

muktika

मुक्तिका:
अवगुन चित न धरो
सुन भक्तों की प्रार्थना, प्रभुजी हैं लाचार
भक्तों के बस में रहें, करें गैर-उद्धार
कोई न चुने चुनाव में, करें नहीं तकरार
संसद टीवी से हुए, बाहर बहसें हार
मना जन्म उत्सव रहे, भक्त चढ़ा-खा भोग
टुकुर-टुकुर ताकें प्रभो,हो बेबस-लाचार
सब मतलब से पूजते, सब चाहें वरदान
कोई न कन्यादान ले, दुनिया है मक्कार
ब्याह गयी पर माँगती, है फिर-फिर वर दान
प्रभु की मति चकरा रही, बोले:' है धिक्कार'
वर माँगे वर-दान- दें कैसे? हरि हैरान
भला बनाया था हुआ, है विचित्र संसार
अवगुन चित धरकर कहे, 'अवगुन चित न धरो
प्रभु के विस्मय का रहा, कोई न पारावार
***