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रविवार, 25 नवंबर 2012

घनाक्षरी: फूंकता कवित्त प्राण... संजीव 'सलिल'

घनाक्षरी:
   फूंकता कवित्त प्राण...
   संजीव 'सलिल'
    *
फूँकता कवित्त प्राण, डाल मुरदों में जान, 
    दीप बाल अंधकार, ज़िन्दगी का हरता।    
    नर्मदा निनाद सुनो,सच की ही राह चुनो,
    जीतता सुधीर वीर, पीर पीर सहता।।
    'सलिल'-प्रवाह पैठ, आगे बढ़ नहीं बैठ,
    सागर है दूर पूर, दूरी हो निकटता।
    आना-जाना खाली हाथ, कौन कभी देता साथ,
    हो अनाथ भी सनाथ, प्रभु दे निकटता।।
    *
    (वर्णिक छंद, 8-8-8-7 पर यति,
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