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बुधवार, 10 जनवरी 2024

गीता बोध, सुनीता सिंह

पुरोवाक -

प्रज्ञानिका कृष्णार्जुन संवाद : गीता चिंतन नाबाद, आबाद और आजाद 

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

*

गीता का महत्व और उपादेयता

विश्व साहित्य की सर्वकालिक श्रेष्ठ कृतियों में श्रीमद्भगवत गीता का स्थान अग्रगण्य था, है और रहेगा। हो भी क्यों ना? भ्रमित-शंकालु मन में आत्म विश्वास जगाने, कर्तव्य का पथ दिखलाने, करणीय-अकरणीय का अंतर समझाने तथा निष्काम कर्म योग की शिक्षा गागर में सागर की तरह देने वाला कोई अन्य ग्रंथ नहीं है। यह भारतीय सभ्यता-संस्कृति का जीवंत दस्तावेज है। यह अंधविश्वासों का निषेध कर पारंपरिक कुरीतियों को नकारने, बुराइयों से संघर्ष करने की प्रेरणा देती है। दैनंदिन जीवन की समस्याओं का समाधान गीता में अंतर्निहित है।

 

श्रीमद्भगवद्गीता की उत्पत्ति मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी के दिन कुरुक्षेत्र के मैदान में मौखिक वार्ता के रूप में हुई। विश्व में इस तरह और इन परिस्थितियों में अन्य कोई ग्रंथ नहीं रचा गया। गीता में कुल १८ अध्याय हैंजिनमें  अध्याय कर्मयोग अध्याय ज्ञानयोग और अंतिम ६ अध्याय भक्तियोग पर हैं गीता एकमात्र ग्रंथ है जिस पर विश्व की सभी प्रमुख भाषाओं में सर्वाधिक भाष्यटीकाव्याख्याटिप्पणीनिबंधशोधग्रंथ आदि लिखे गए हैं और निरंतर लिखे जा रहे हैं।गीता का सबसे पहला भाष्य शांकर भाष्य आद्य शंकराचार्य ने लिखा। संत ज्ञानेश्वरबालगंगाधर तिलकपरमहंस योगानंदमहात्मा गाँधीसर्वपल्ली डॉराधाकृष्णनमहर्षि अरविन्द घोषएनी बेसेन्टगुरुदत्तविनोबा भावेओशो रजनीशश्रीराम शर्मा आचार्य आदि अनगिनत विद्वानों ने गीता पर भाष्य लिखे हैं। गीता कर्म का संदेश ही नहीं देती है बल्कि जीवन की कशमकश में हमेशा पथ प्रदर्शन करती है।

 

धर्माचार्यों ने गीता को सांसारिकता का त्याग कर सन्यास का पथ बतानेवाले ग्रंथ के रूप में व्याख्यायित किया किंतु स्वामी विवेकानंद जी गीता का वैशिष्ट्य ‘धर्म के विविध मार्गों का समन्वय तथा निष्काम कर्म’ को मानते हैं। (२९ मई १९००, सैनफ्रांसिस्को में भाषण)

 

महर्षि अरबिंदो घोष के अनुसार- ‘वह चेतना की दो विशालतम और उच्चतम अवस्थाओं या शक्तियोंअर्थात् समता और एकता का मिलन है । इसकी पद्धति का सार है भगवान् को अपने जीवन में तथा अपनी अन्तरात्मा और आत्मा में निःशेष रूप से अंगीकार करना।

 

गीता रहस्यकार लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के अनुसार गीता का निष्काम कर्म योग ज्ञान, भक्ति तथा क्रम में समन्वत स्थापित करता है।  

गाँधी जी कहते हैं- ‘’गीता केवल मेरी बाइबिल या कुरान नहीं है, यह मेरी माँ है, शाश्वत माँ। ... जब कभी मुझे संदेह घेरते हैं और मेरे चेहरे पर निराश छाने लगती है तो मैं गीता को उम्मीद की एक किरण के रूप में देखता हूँ। गीता में मुझे एक छंद मिल जाता है जो मुझे सांत्वना देता है। मैं कष्टों के बीच मुस्कुराने लगता हूँ।’’

 

गीता प्रवचन के लेखक, भूदान आंदोलन के प्रणेता संत विनोबा भावे के मत में- अच्छी चीज की भी आसक्ति नहीं होनी चाहिएआसक्ति से घोर अनर्थ होता हैक्षय के कीटाणु यदि भूल से भी फेफड़ों में चले जाते हैंसारा जीवन भीतर से खा डालते हैंउसी तरह आसक्ति के कीटाणु भी असावधानी से सात्त्विक कर्म में घुस जायेंगेतो स्वधर्म सड़ने लगेगाउस सात्त्विक स्व-धर्म में भी राजस और तामस की दुर्गंध आने लगेगीअतः कुटुंब रूपी यह बदलने वाला स्व-धर्म यथा समय छूट जाना चाहिएयह बात राष्ट्र धर्म के लिए भी हैराष्ट्र-धर्म में अगर आसक्ति आ जाये और केवल अपने ही राष्ट्र के हित का विचार हम करने लगेंतो ऐसी राष्ट्र-भक्ति भी बड़ी भयंकर वस्तु होगीइससे आत्म-विकास रुक जाएगा

 

महर्षि महेश योगी जी के शब्दों में ‘’भगवद-गीता व्यावहारिक जीवन के लिए एक संपूर्ण मार्गदर्शिका है। यह किसी भी स्थिति में मनुष्य को बचाने के लिए हमेशा मौजूद रहेगा। यह समय की अशांत लहरों पर तैरते जीवन के जहाज के लिए एक लंगर की तरह है। यह जीवन का विश्वकोश है।’’

 

ओशो कहते हैं- कृष्ण की गीता समन्वय है। सत्य की उतनी चिंता नहीं है जितनी समन्वय की है चिंता है। समन्वय का आग्रह इतना गहरा है कि अगर सत्य थोड़ा खो भी जाए तो कृष्ण राजी हैं। कृष्ण की गीता खिचड़ी जैसी है, इसीलिए सभी को भाती है क्योंकि सभी का कुछ न कुछ उसमें मौजूद है। ऐसा कोई संप्रदाय खोजना मुश्किल है जो जो गीता में अपनी वाणी न खोज ले।’’

 

नव कृति का औचित्य


गीता पर हर चिन्तक की व्याख्या और मत अन्यों से भिन्न है। लोक कहता है जितने मुँह उतनी बातें, पंडित कहते हैं मुंडे मुंडे मतिर्भिन्ना। गीता पर जब इतना कहा जा चुका है तो एक और कृति क्यों? यह जिज्ञासा होना स्वाभाविक है।

 

 सुनीता जी ने गीता-प्रसंग पर एक कृति रचने के विचार की चर्चा की तो मैंने भी यही प्रश्न किया? कारण यह कि इन दिनों हिंदी में गीता का अनुवाद करने-छपाने की होड़ है। लगभग २० अनुवाद मेरे पास हैं। खेद यह कि इनमें चिंतन परकता या मौलिकता नहीं है। गीता मूलत: संस्कृत भाषा में है, अधिकांश अनुवादक संस्कृत नहीं जानते, केवल अर्थ पढ़कर भाषांतरण कर देते है जो नीरस, उबाऊ तथा निरुपयोगी होता है। मेरा सुझाव यह था कि गीता का अक्षरश: काव्यानुवाद न कर चयनित घटना प्रसंगों को इंगित करते हुए अंतर्वस्तु का विस्तार करें तथा कुछ ऐसा भी हो जो इसके पूर्व न लिखा गया हो ताकि यह प्रबंध काव्य अन्यों से भिन्न हो। प्रसन्नता है कि सुनीता ने सुझावों को सकारात्मकता तथा सहजता से मान्य किया। मैंने पूछा- संजय जब रणक्षेत्र का घटनाक्रम सुनाते थे तब कौन सुनता था? उत्तर मिला धृतराष्ट्र। मैंने प्रश्न किया- तुम्हारा पुत्र किसी गतिविधि में भाग ले और उसका वर्णन कोई करता हो तो क्या तुम बिना सुने रह सकती हो? उत्तर था- नहीं, ऐसा कैसे हो सकता है? माँ को पुत्र के बारे में सुनने की जिज्ञासा सबसे अधिक होती है। मैंने फिर पूछा- संजय १०५ पुत्रों का हालचाल कहता हो और उनकी २ माताएँ वहाँ हों तो क्या वे अपने पुत्रों के पराक्रम और युद्ध के परिणाम जानने को उत्सुक न होंगी? विदुषी कवयित्री में अंदर बैठी माँ ने संकेत समझ उत्तर दिया कुंती और गांधारी बिना सुने तो नहीं रह सकतीं पर ऐसा उल्लेख तो कहीं नहीं है। प्रश्न किया- जो अतीत में नहीं लिखा जा सका वह भविष्य में भी न लिखा जाए, ऐसा विधान तो कहीं नहीं है। रचनाकार अपनी रचना का स्वयंभू ब्रह्मा होता है। चर्चा का सार यह निकला कि गीता संजय ने केवल धृतराष्ट्र के लिए सुनाई किंतु वहाँ उपस्थित विदुर, गांधारी और कुंती ने भी सुनी। 


मैंने फिर प्रश्न किया कि तुम अपने कार्यालय में सब कर्मचारियों को एक साथ निर्देश तो क्या वे सब एक समान ग्रहण करते हैं? उत्तर मिला- 'नहीं, उनकी समझ, कार्यविधि और कार्य सामर्थ्य भिन्न-भिन्न होती है।' मैंने कहा- गीता कहने-सुननेवालों ने क्या उसका समान अर्थ ग्रहण किया होगा?' कुछ समय सोचने के बाद उत्तर आया- 'नहीं, ऐसा तो नहीं हो सकता। उनकी समझ, सामर्थ्य और जीवन दृष्टि भिन्न होने के कारण वे भिन्न अर्थ निकालेंगे।' मैंने कहा कि यही सब सोचना और लिखना है, यह पहले नहीं लिखा गया है। यह अंश इस कृति का वैशिष्ट्य होगा। पाठक और समीक्षक समर्थन-विरोध, प्रशंसा-आलोचना करेंगे, उसकी चिंता न कर अपने चिंतन को शब्द दो।' 


कृति का शीर्षक भी पर्याप्त विमर्श के बाद निर्धारित किया गया। सामान्यत:, कुरुक्षेत्र महायुद्ध संबंधी कृतियों के शीर्षक में 'गीता' शब्द का प्रयोग किया जाता रहा है। हमारी दृष्टि यह रही कि यह कृति गीता की छायामात्र न होकर स्वतंत्र कृति हो जिसकी रचना का आधार कुरुक्षेत्र महायुद्ध हो। कृष्णार्जुन संवाद को मथकर माखन की तरह प्राप्त 'प्रज्ञान' को अपनी शब्द-मंजूषा में समेटे 'प्रज्ञानिका' कृष्ण सखा पाठकों के रसास्वादन हेतु प्रस्तुत है।        


मौलिकता

 

कथा-प्रवेश सर्ग में प्रस्तुत कृति का श्री गणेश पुष्टिमार्ग प्रणेता वल्लभाचार्य जी के स्वप्न में संत ज्ञानेश्वर के आगमन तथा मराठी गीता सार सुनाने से होना सर्वथा मौलिक अवधारणा है।

 

देखा एक दिवस स्वप्नों में / गुरु ज्ञानेश्वर आए हैं।

गीता सार मराठी में जो / कर अनुवाद सुनाए हैं।।

 

किसी राज्य के नेत्रहीन अधिपति को संकटकाल में किसी बाहरी व्यक्ति के साथ नित्य प्रति अकेला नहीं छोड़ा जा सकता, इसलिए महामंत्री विदुर और कुरु माता गांधारी तथा पांडव माता कुंती सकल वृत्तान्त सुनें, यह स्वाभाविक है। वृत्तान्त सुनकर उन पर हुई प्रतिक्रिया या उनमें विचार-विनिमय कवयित्री को कल्पनाकाश में वैचारिक उड़ान भरने हेतु स्वतंत्रता देते हैं तथापि सुनीता ने संयम बरतते हुए सीमित स्वतंत्रता ही ली है।

 

धृतराष्ट्र घटनाक्रम जानने की उत्सुकता के साथ, उन पर लगे जाते लांछनों के प्रति चिंतित व दुखी हैं। संजय उन्हें रोकते हुए युद्ध क्षेत्र में खड़ी दोनों सेनाओं और योद्धाओं के बलाबल की जानकारी देते हैं। अर्जुन कुरु सेनाओं का निरीक्षण कर चिंतित और दुखी है। जिज्ञासा सर्ग में पुत्रों की कुशल जानने के लिए धृतराष्ट्र संजय से रणक्षेत्र का हाल सुनना चाहते हैं-

 

चिंतित से धृतराष्ट्र पूछते / कुरुक्षेत्र का हाल कहो

दिव्य दृष्टि डालो हे संजय! / नहीं व्यग्र हो मौन रहो

 

शंका-समाधान सर्ग में रणभूमि में पूज्यों और संबंधियों को देखकर विचलित अर्जुन, श्री कृष्ण से अंतर्मन की व्यथा कहते हुए शंका का समाधान चाहते हैं-

 

बोले अर्जुन कातर मन से / हे प्रभु! मुझको बतलाएँ

गुरु द्रोण और भीष्म पितामह / पर कैसे बाण चलाएँ?

 

दूर करें हे माधव! मेरी / मन की सब शंकाओं को

शोक उपजता भारी मन में / मूर्छित कर मृदु भावों को

 

श्री कृष्ण अर्जुन का समाधान करते हुए गूढ़ ज्ञान देते हैं-  

 

आत्मा अजर अमर अविनाशी / नित्य सनातन रहती है

चिंतित क्यों हो व्यर्थ सदा वह / नवल पुरातन रहती है

 

हे अर्जुन! जो सत्य जानते / वे निर्लिप्त रहा करते

जो अविनाशी और अजन्मी / उसको नहीं मार सकते


        धृतराष्ट्र के आचरण में उसकी कुटिलता सामने आती है। वह कौरव पक्ष की शक्ति का अनुमान कर, उनकी विजय की कल्पना कर मन में आनंदित होकर भी अपनी भावना व्यक्त न कर छिपाता है-    


महाराज धृतराष्ट्र सोचते, / मन ही मन मुसकाते हैं।
कौरव-जीत सुनिश्चित लगती, लेकिन खुशी छिपाते हैं।।
 
            महारानी गांधारी के चिंतन में अपेक्षाकृत अधिक संतुलन अभिव्यक्त हुआ है। वह अपने पुत्रों को राज्य सत्ता देना चाहती है, पर पांडु पुत्रों का अधिकार नकारती नहीं - 

लेकिन कुन्ती पुत्रों को भी, दोष नहीं मैं दे सकती।
नहीं पराये वे भी अपने, हृदय - दशा विचलित रहती।।

            कुंती अपने पुत्रों को धर्म मार्ग पर चलते देख और कृष्ण को उनके साथ देख पांडवों की जय के प्रति आश्वस्त होते हुए भी, कौरवों में भी अपनों को ही देखती हैं। उनका चिंतन अर्जुन की ही तरह है, वे कौरवों का अहित नहीं चाहतीं- 

कुन्ती सोच रही क्या दिन ये, विधना ने है दिखलाया।
बोल सकूं कुछ भी न किसी को, संकट अपनों पर आया।।
    
            महामति विदुर सबके प्रति अपनत्व भाव रखते हुए, शहीद होने वालों के लिए दुखी होते हैं- 

सोचे विदुर सभी अपने हैं, / हानि सभी की दुख देगी।
बिछड़ेगें जो युद्ध भूमि में, / कमी उन्हीं की खटकेगी।।

 

कर्म माहात्म्य सर्ग में श्री कृष्ण कर्म तथा ज्ञान का सम्यक विश्लेषण करते हुए दोनों को आवश्यक बताते हैं-

 

कृष्ण कहें हे अर्जुन ! सुन लो / इस जग की दो निष्ठाएँ

ज्ञान क्रम दोनों आवश्यक / पृथक रहीं परिभाषाएँ

 

ज्ञान की महत्ता प्रतिपादित कर, श्री कृष्ण अनासक्त कर्म की श्रेष्ठता प्रतिपादित करते हैं-

 

मानव जैसा कर्म करेगा / वैसा ही फल पाएगा

सत्कर्मों से शुभ फल मिलता / वरना कर्म रुलाएगा


        इस सर्ग के घटनाक्रम को जानने के बाद धृतराष्ट्र कृष्ण को दोष देते हैं कि वे अर्जुन को युद्ध विमुख न होने देकर अधर्म कर रहे हैं, कुंती कृष्ण के कार्य को सार्थक और धर्मयुक्त कहती हैं, गांधारी किंकर्तव्यविमूढ़, विदुर तथा संजय मौन हैं। स्पष्ट है कि सभी श्रोता भावी के प्रति आशंकित हैं।    

 

दिव्य परंपरा सर्ग में गीता के सनातनत्व, अपने अवतरण, गुरु-माहात्म्य तथा ईश-शरणागति से पार्थ को अवगत कराते हैं-

 

रूप ब्रह्म का रहा क्रम भी / रत समाधि में हों जैसे

क्रम फलों की प्राप्ति ब्रह्म है / गति हो कर्मों के जैसी


        धृतराष्ट्र ज्येष्ठ होते हुए भी नेत्रहीन होने के कारण अनुज पांडु को सत्ता मिलने से हुई पीड़ा को व्यक्त कर, सत्ता पर अपने पुत्रों का अधिकार न्यायोचित मानते हैं। वे अनासक्ति को स्वीकारते नहीं और अपने मोह को उचित पाते हैं- 

 

कर्म करें क्यों अनासक्त रह, भोग न क्यों वैभव का हो?
आखिर जन्म लिया है क्योंकर, दूर सभी तम जड़ता हो॥ 

        गांधाती अपने विवेक का परिचय देते हुए कृष्ण से रन र न होने देने की अपेक्षा करती हैं, जबकि वे भली-भाँति जानती हैं कि दुर्योधन ने शांति दूत कृष्ण के प्रयासों को हठपूर्वक अमान्य कर द्रौपदी चीरहरण का दुष्प्रयास किया - 

सुना रहे अर्जुन को बातें,/ क्यों सन्यासी जीवन की?
सन्धि करें रोकें रण को वे, / व्यथा थमे अस्थिर मन की॥ 

        कुंती और विदुर सदा की तरह शांत हैं-

संजय मुख से कृष्ण वचन सुन, खोये विदुर विचारों में।
चिंतन करते सार - तत्व पर, कर्म ज्ञान अभिसारों में॥ 

 

        कर्म सन्यास और निष्काम काम सर्ग में अर्जुन की जिज्ञासा शांत करते हुए कृष्ण कहते हैं-

 

आसक्त कर्म से हो न सके / दास इंद्रियों का न बने

निर्लिप्त भाव से कर्म करे / हृदय नहीं अभिमान तने


        धृतराष्ट्र कृष्ण द्वारा कहे गए तत्वज्ञान को निरर्थक मानते हैं-


सुलझेगा परलोक कहो क्या, / अगर न सुलझा लोक यहाँ?
नहीं जरूरत तत्व ज्ञान की, / मिलता निश्छल हृदय कहाँ?

 

अष्टांग योग और समाधि सर्ग में ध्यान योग की महत्ता प्रतिपादित करते हुए ईश शरणागति को एकमात्र राह बताते हैं।

 

कार्य शुरू करने से पहले / जो ईश्वर को याद करे

सच्चे मन से मुझे सुमिर वह / मुझसे मृदु संवाद करे

वह श्रेष्ठ योगियों से रहता / मुझको भी आती प्रिय रहता

कार्य सिद्ध हो जाते उसके / मुझे ध्यान में जो रहता


        गांधारी धृतराष्ट्र से असहमत होते हुए कृष्ण के कथन की सार्थकता और विश्वसनीयता के प्रति कुंती की राय पूछती है। कुंती नम्र भाव से कृष्ण के प्रति विष्यवस वयुक्त करती है। 


गांधारी धृतराष्ट्र की तरफ, / मुड़कर बोली हे राजन!
मीठे लगते मोह रहे मन, / बोल रहे जो कृष्ण वचन॥  

 

ज्ञान-विज्ञान विमर्श सर्ग में कृष्ण स्वयं को कारणों का कारण बताते हैं।

 

अनासक्त जो शांत हृदय से / मोह मुक्त हो जाते हैं

दृढ़ मन हो पाता जिनका वह / भजकर मुझको पाते हैं


        धृतराष्ट्र कृष्ण के वचनाओं को सुनते-समझते हुए भी उन पर भरोसा नहीं कर पाते। उनकी मनस्थिति से गांधारी समेत कोई भी सहमत नहीं हो पाता। वे विदुर से पूछते हैं- 


धृतराष्ट्र कहें हे विदुर! कहो, / नीति ज्ञान के हो ज्ञाता।
बात कृष्ण की मन भरमाती, / सत्य नजर कुछ कम आता॥ 

 

प्रभु सुमिरन सर्ग में ईश स्मरण को श्री कृष्ण मुक्ति का मार्ग बताते हैं-

 

प्राण त्यागने से पहले जो / मुझको सुमिरन करता है

प्राप्त मुझे कर लेता है वह, जब भी प्राण निकलता है


        धृतराष्ट्र सत्य समझते हुए भी उसे झुठलाकर अपने मन को सांत्वना देते हुए तन ही नहीं माँ से भी चक्षुहीन दिखते हैं, जबकि गांधारी, कुंती और विदुर सत्य को समझते हैं। धृतराष्ट्र अंतत: अपनी विवशता व्यक्त कार ही देते हैं- 

चाह नहीं मैं पुत्रमोह का, / त्याग कभी कर पाऊँगा॥
बात न दुर्योधन मानेगा, / दुख न उसे दे पाऊँगा॥

 

गुह्य ज्ञान सर्ग में कृष्ण स्वयं को परब्रह्म बताते हुए, अर्जुन को अभिन्न होने की राह सुझाते हैं-

 

सबका निवास मुझमें ही है / ओंकार भी रहा मैं ही

बीज रूप हूँ मैं अविनाशी / जीवन मैं और मृत्यु भी

 

भक्ति करो तो ऐसी करना / घुल समग्र मुझमें जाना

जल जैसे जल में मिल जाता / संभव तभी मुझे पाना


        धृतराष्ट्र की कुटिल और मलिन मानसिकता क्रमश: सामने आती है। वे खुद को सर्वोच्च समझते हुए सत्य न कहने को अपना कर्तव्य माँ बैठते हैं- 


मन के भाव छुपाने होंगे, / महाराज हूँ मैं आखिर।
सोच रहे धृतराष्ट्र हृदय में, / करना होगा मन को स्थिर॥  

 

ऐश्वर्य सर्ग में सकल कारणों के कारण स्वरूप श्री कृष्ण को सब विभूतियों का अक्षरे और परम पूज्य बताया गया है।

 

मैं ही जनक व नाशक सबका / पूज्य परम अनतर्यामी

मैं पौष माह मैं विष्णु सूर्य / मैं सबसे बढ़कर निष्कामी

 

संपूर्ण जगत को मैंने ही / एक अंग पर धारा है

हे पार्थ! जान लो बस इतना / जितना अधिकार तुम्हारा है


        नेत्रहीन धृतराष्ट्र अक्षम होकर भी देखने पा प्रयास करते हैं मानो अपनी नियति बदल देंगे। पत्नी गांधारी, अनुज वधू कुंती, महामंत्री विदुर तथा संजय किसी की सहमति न मि,ने से खिन्न होकर वे भौंहें सिकोड़ लेते हैं- 


महाराज की भौंहे ऊपर, / कृष्ण - वचन सुन उठ जातीं।
शक्ति - पुंज निज को कहने की, / बातें तनिक नहीं भातीं॥

 

ग्यारहवें विराट रूप सर्ग में नत मस्तक अर्जुन की के निवेदन को स्वीकारते हुए कृष्ण उसे दुवय दृष्टि देकर अपने विराट रूप की झलक दिखाने के साथ-साथ उसे अभीत भी करते हैं-  

 

मैं प्रसन्न तुम पर हे अर्जुन! / अत: रूप यह दिखलाया

लेकिन तुम भयभीत न होना / सत्पथ सन्मार्ग सुझाया


        धृतराष्ट्र की एकांगी सोच कृष्ण को महासमर रोकने में समर्थ मानती है और युद्ध न रोकने के लिए दोषी भी कहती है। वे दुर्योधन की कोई गलती नहीं देखते, चल चलने के लिए कृष्ण को ही दोषी मानते हैं-  

 

टाल महाभारत सकते थे, / डटी न होतीं सेनाएँ ।
वासुदेव बस चालें चलते, / अपनी ही करते जाएँ॥

भक्ति माहात्म्य सर्ग में कृष्ण अपने सामान्य रूप में अर्जुन को भक्त-भगवान के संबंध की महत्ता समझाते हुए निर्भय करते हैं-

 

अर्पण कर्मों को मुझमें कर / याद करे परमेश्वर को

शुद्ध हृदय वाले भक्तों का / ध्यान रहे परमेश्वर को


        विदुर कृष्ण के दिव्य रूप को देखकर अवाक् रह जाते हैं- 


दिव्य कृष्ण का रूप देखकर, / संजय शब्द विहीन हुए।
विस्मय से विस्तारित आँखें, / सुध - बुध खोकर लीन हुए॥

        कुंती भी विविध आशंकाओं से घिरी हैं किंतु कृष्ण पर उनका विश्वास अधिग है की वे पांडवों का अहित नहीं होने देंगे। 

कुन्ती के मन में भी चलता, / अलग तरह का ही मन्थन।
पूर्ण भरोसा वासुदेव पर, / अन्तर से कर अभिनन्दन॥ 

चेतना सर्गांतर्गत अर्जुन ने प्रकृति-पुरुष का रहस्य जानना चाहा। श्री कृष्ण ने अर्जुन का समाधान करते हुए बताया-

 

प्रकृति-पुरुष दोनों अनादि हैं / इनके प्रति रूप सृष्टि में होते

पदार्थ विकार राग-द्वेष सब उत्पन्न प्रकृति से ही होते

 

काया स्थित आत्मा होती / अंश उसी परमात्मा का

साक्षी होने से उपदृष्टा यथार्थ सम्मति अनुमंता

 

सबका धारण-पोषण करके, आत्मा ही भर्ता होती

वही सच्चिदानंद महेश्वर, जीव रूप भोक्ता होती


        धृतराष्ट्र जब युद्ध को अवश्यंभावी देखते हैं तो अनिष्ट की आशंका सम्मुख देख सोचते हैं कि ५ गाँव देकर इस संकट से बचना बेहतर होता किंतु 'अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुँग गई खेत'- 


हानि किसी की युद्ध भूमि में, / हो सकती है सत्य यही।
पाँच गाँव पाण्डव को देना, / हो सकता था कृत्य सही॥    

 

त्रिगुण सर्ग में भौतिक प्रकृति के मूल ३ गुणों की चर्चा है जिनसे हर देहधारी नियंत्रित होता है। श्री कृष्ण त्रिगुण के प्रभाव तथा परिणाम बताते हुए कहते हैं-

 

ज्ञान सत्व गुण से जन्मे तो / लोभ तमोगुण से होता

मोह-प्रमाद तमोगुण से हो / खुले अज्ञान का सोता

 

स्वर्ग लोक में जाते प्राणी / जो सत्व गुणों में स्थित हों

और रजोगुण वाले प्राणी / भू आने को शापित हों

 

लें जन्म तमो गुण के प्राणी / पशु-पक्षियों की योनि में


        धृतराष्ट्र कृष्ण से तत्वज्ञान सुनकर सोचते हैं की पांडव कौरवों की तुलना में अधिक धर्म प्रेमी हैं किंतु सत्य को जानकर भी माँ से बचते दिखते हैं। वे कौरवों को अधिक ताकतवर मानते हुए भी युद्ध के परिणामों के प्रति इसलिए शंकित हैं कि कृष्ण पांडवों के साथ हैं- 


पाण्डव तुलना में कौरव की, / पुण्यात्मा हैं कहीं अधिक।
परिणाम न जाने क्या होगा, / किस पथ का हो कौन पथिक?

 

परम पुरुष सर्ग में जीवन का चरम लक्ष्य मोह-पाश से बचते हुए परम सत्ता के परम स्वरूप को समझ कर उनकी भक्ति बताया गया है-

 

अविनाशी या नाशवान द्वय / प्राणी इस जग में होते

कायाएँ मिट जाती लेकिन / नाश न आत्मा के होते


        गांधारी श्रीकृष्ण द्वारा पाँच गाँव पांडवों को देकर शांति स्थापना चाहते थे। धृतराष्ट्र तथा गांधारी ने यह प्रस्ताव स्वीकारने हेतु सलाह भी दी थी किंतु दंभी और हठी दुर्योधन न माना। गांधारी नियति को स्वीकारने हेतु विवश हैं- 


अब दोष किसी का क्या कहना, / बदल नहीं कुछ पाना है।
गांधारी सोचे निज मन में, / भाग्य लिखा जो आना है॥ 

 

स्वभाव सर्ग में चंचल मन को नियंत्रित कर योग साधना द्वारा वैराग्य तथा कल्याण मार्ग पर ले जाने का मार्गदर्शन है।

 

योग साधना से वश में मन / वैराग्य सहज पथ कर दे


        कुंती वासुदेव के प्रति विश्वास होने के कारण मन की ऊहापोह को हावी नहीं होने देतीं, शेष सभी भयाक्रांत हैं-  


कुंती थाम विचार हृदय के, / लगी देखने इधर-उधर।
विदुर ज्येष्ठ गांधारी संजय, / सबके अपने-अपने डर॥  

 

श्रद्धा सर्ग त्रिगुणों से उत्पन्न तीन तरह की श्रद्धा का उपदेश है।

 

जिस प्राणी की जैसी श्रद्धा / हो स्वरूप उसका वैसा

सात्विक प्राणी देव पूजते / हो सत् श्रद्धा का ऐसा

पूजें राक्षस तमो रजो गुण / विदयाहीन बने रहते

कल्पित घोर तपों में रत हो / मुक्ति-कामना से दहते


        विदुर महामंत्री होने के कारण धृतराष्ट्र से सहमत होते हुए भी असहमति बोलकर नहीं जताते और मौन रहते हैं किंतु एक दिन उनका भी धैर्य चुक जाता है- 


पाण्डव कौरव दोनों मुझको / हे महाराज! प्रिय लगते ।
पर उचित न पथ दुर्योधन का, / मेरे नीति - वचन कहते॥ 

 

अठारहवें सन्यास-सिद्धि सर्ग में वैराग्य का अर्थ, ब्रह्म की अनुभूति तथा श्री कृष्ण शरणागति से मोक्ष प्राप्ति का संकेत देकर यह कृष्णार्जुन संवाद पूर्ण होता है।

 

करता जो निष्काम कर्म वह / दृढ़ वैरागी भी होता

संपूर्ण कर्म करता योगी / इच्छा का भार नहीं ढोता

आश्रय त्याग सभी कर्मों का / बस मेरा ही ध्यान करो

मुक्त पाप स्व कर दूँगा मैं / अन्य न मेरी शरण गहो


         दूत होते हुए भी संजय अंतत:, परामर्श देने से खुद को नहीं रोक पाता- 


निष्काम कर्म करते रहना, / ध्यान सदा रख ईश्वर का।
संजय बोले बड़ा मन्त्र यह, / सुख लाएगा अन्तर का॥

 

अंतिम प्रभाव सर्ग कवयित्री की मौलिक उद्भावना है जिसके अंतर्गत कृष्ण-अर्जुन संवाद सुन रहे धृतराष्ट्र, गांधारी, कुंती व विदुर तथा वक्ता संजय पर हुई प्रतिक्रिया का सूक्ष्म संकेतन है।

 

धृतराष्ट्र गीता-ज्ञान ग्रहण न कर पांडवों को दोषी मानकर उनकी मृत्यु कामना करते हैं-

 

कहते धृतराष्ट्र पांडवों को / नहीं चाहिए रन लड़ना

अति विशाल कौरव सेना से / व्यर्थ उन्हें होगा मरना

 

गांधारी अधिकांश समय अपने पुत्रों के हित चिंतन में लीन रहीं, उन्हें ज्ञान खंड रुचा-

 

रहीं वहीं पर गांधारी / खंड खंड ही सुन पाईं

निकल विचारों से अपने वह / ज्ञान खंड को गुन पाईं

 

कुंती को श्री कृष्ण के दैव्यत्व में अडिग विश्वास है। वे गीता-ज्ञान ग्रहण कर धृतराष्ट्र को भावी का संकेत कर देती हैं-

 

जिस पक्ष रहेंगे कृष्ण सदा, जीत उसी की होनी है

समग्र सृष्टि मदद है करती / बहस व्यर्थ ही होनी है

 

संजय इस दिव्य वार्ता को सुनते-सुनाते हुए वैराग्य भाव में स्थित हो जाते हैं-

 

वैरागी ज्ञानी जैसी गति / हुई मगर अब संजय की

सारा गीता ज्ञान सुन लिया / छवि देखि परमात्मा की


       पुस्तकांत में कृष्णार्जुन संवाद का श्रवण कर रहे पंच महाभागी जनों का मानस मंथन कर पाँच अध्याय रचकर सुनीता ने सकल प्रसंग को विविध दृष्टियों से पाठकों के लिए मननीय बनाया है। इस अंश से यह स्पष्ट होता है कि हर मनुष्य अपनी चेतन, संस्कारों और विचारों के अनुरूप घटनाओं का विश्लेषण और चरित्रों का मूल्यांकन करता है, तदनुसार निष्कर्ष निकालता है, कार्य करता है और उसका परिणाम पाता है। विधि के विधान या भाग्य को दोष देना निरर्थक है। धृतराष्ट्र और गांधारी यदि अन्यों के दृष्टिकोण को ग्रहण कर सके होते तो श्री कृष्ण को शापित नहीं होना पड़ता, विजय पश्चात भीम आदि को नष्ट करने के दुष्प्रयास धृतराष्ट्र नहीं करते। लोक कहता है- 


                                    होनी तो होकर रहे, अनहोनी ना होय 

                                   जाको राखे साइयाँ, मार सके नहिं कोय'

 

‘कृष्ण वचन प्रज्ञानिका’ का वैशिष्ट्य भाषिक सारल्य, शाब्दिक सटीकता, सम्यक विवेचन, लय बद्धता तथा संक्षिप्तता है। सुनीता ने गीता के पाँचों श्रोताओं की मानसिकता, पात्रता और ग्रहण सामर्थ्य का संकेत मात्र किया है, यदि वह इन्हें पाँच अध्यायों में विस्तार से विवेचित करतीं और समकालिक परिदृश्य से संबद्ध कर देतीं तो यह कृति और अधिक विचारोत्तेजक, मननीय और भीमाकारी होकार सामान्य पाठक के लिए गरिष्ठ और केवल विद्वज्जनों के लिए ग्राह्य होती। वर्तमान रूप में यह विद्वज्जनों ही नहीं, सामान्य पाठकों को भी मुक्त चिंतन के उस धरातल पर ले जाने में समर्थ है जहाँ से वे श्री कृष्ण भक्ति मार्ग पर पग बढ़ा सकें। सुनीता को इस महत सारस्वत अनुष्ठान के लिए बधाई और इसकी सफलता हेतु अनंताशीष।

                                                                                संजीव

संपर्क- विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

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धृतराष्ट्र

नेत्रहीन धृतराष्ट्र जन्म से, दुखी कुपित रहते अक्सर ।
भाग्य विहीन हुआ मैं ऐसा मेरे साथ हुआ क्योंकर?

ईर्ष्या भ्राता पांडु से रही, पलती बढ़ती बचपन से ।
देख नहीं सकते दृग फिर भी, द्वेष न निकला जीवन से॥

सिंहासन भी गया हाथ से, दृष्टिहीनता के कारण।
शब्द मौन भूचाल हृदय में, नहीं दूर तक था तारण ॥

विधना मुझसे खेल रही क्यों, भाव उठें ये ही मन में ।
अत्याचार सहूँ मैं कितना, लिखा यही क्या जीवन में ?

कुंठित होकर जा सिमटे सब वैचारिक आयाम कहीं ।
स्वार्थ साधना लक्ष्य बन गया, इससे बढ़कर धाम नहीं॥

विधना मोड़ नया ले आयी, भ्राता पाण्डु गये वन को ।
सिंहासन धृतराष्ट्र पा गये, प्राण मिला नव जीवन को॥

मेरा पुत्र बनेगा राजा, हर प्रयास होगा मेरा।
प्राणों से प्रिय सुत दुर्योधन, काटूंगा हर तम - घेरा॥

भ्राता - सुत भी तो प्रिय मुझको, निज सुत प्रिय अतिशय लेकिन।
अगर न मैं सरंक्षण दूंगा, गद्दी जाएगी फिर छिन॥

कहने दो जग को जो कहता, क्या अंतर पड़ता मुझको ?
अधिकार छिना जब था मेरा, नहीं समझ आया उनको ॥

लोग कहेंगे पुत्र - मोह में न्याय नहीं कर पाता हूं।
उनके अनुचित कर्मों पर भी मैं उनको दुलराता हूं॥

कैसे बढ़ने दे सकता मैं, पाण्डव को कुरु गौरव से?
चाह रहा निज कुल हित ही तो, जिसमें मेरे प्राण बसे॥

बनूं त्याग की मूरत क्योंकर, कुछ पाण्डव भी त्याग करें।
मेरे हेतु किया क्या किसने, कुछ वो भी तो धीर धरें॥

भीष्म विदुर के परामर्श से, पत्थर रख कर निज मन पर।
युवराज युधिष्ठिर को घोषित, किया मगर आखिर थककर॥

माना लाक्षागृह अनुचित था, भूल किया दुर्योधन ने।
क्या करता यदि क्षमा न करता, क्या लगता मैं भी कहने?

क्या दे देता दण्ड उसे मैं, अपना कुल - घातक बनता।
भ्राता ज्येष्ठ रहा हूँ मैं ही, नृप का निज - सुत हक बनता॥

राज चाहते क्यों पाण्डव ही, टाल विवाद वही सकते। 
बनने दें नृप दुर्योधन को, साये स्याह सभी टलते ॥

पाण्डव लाक्षागृह से जीवित, बच निकलेंगे पता न था।
बात खुशी की जीवित वे पर, समझे मेरी कौन व्यथा?

मृत जान उन्हें दुर्योधन को, घोषित था युवराज किया।
अब न छोड़ना पद वह चाहे, समझ स्वयं का ताज लिया॥

फिर मैं क्या कर सकता आखिर, प्राणों से प्रिय दुर्योधन।
छोड़ युधिष्ठिर ही दें पद को, शान्त रहे सबका जीवन॥

जाने कृष्ण उन्हें भड़काते, क्योंकर रहते हैं अक्सर?
अधिकार दिलाने को तत्पर न्याय धर्म की बातें कर॥

हित मेरे सुत दुर्योधन का, दिखता उनको कभी नहीं।
पाण्डव ही प्रिय उनको जैसे, लें सुधि कौरव की न कहीं॥

माना चक्र सुदर्शनधारी, शूरवीर अति बलशाली।
बनते तारणहारा अक्सर, वार न उनका हो खाली ॥

तो क्या डरकर हार मान लूँ, निज सुत का हित जाने दूं ?
राज्य सौंप कर पाण्डु - सुतों को तो क्या दुर्दिन आने दूँ ?

अगर न मैं सोचूंगा तो फिर, और कौन सोचेगा क्यों?
अपने सुत का भला चाहता, दूजा तो चाहेगा क्यों?

अगर पाण्डवों ने किंचित भी, अहित किया कौरव कुल का,
प्रश्न क्षमा का नहीं उठेगा, मिटा चिन्ह दूंगा सबका॥

मन करता है लगा गले से, फोड़ उन्हें दूं मूरत सा।
बार - बार का क्लेश मिटे यह, जो अनहोनी सूरत सा॥

नृप हूँ वाचाल न हो सकता, मौन साधना ही होगा।
साम दाम या दण्ड भेद पथ, का ये मन राही होगा॥

गान्धारी


धर्मपरायण सदाचारिणी, उदार दयालु गुणी कन्या ।
गान्धार कुमारी अति सुन्दर सदगुण धारे भी धन्या॥

शत पुत्रवती वरदान मिला, गुरु वेदव्यास से उसको।
सात्विक भाव प्रसिद्धि दिलाते, ख्याति गयी थी चहुँ दिश को॥

ख्याति बनी अभिशाप वहीं जब, आये भीष्म लगन लेकर।
दृष्टिहीन धृतराष्ट्र के लिए, जिन्हें बनाना उसका वर॥

अगर मना करते पितु उनको, दण्ड भुगतना भी पड़ता।
चिन्तित परिजन बोल न पायें, छायी मुख पर भी जड़ता॥

गान्धारी ने लेकर निर्णय, दिया उबार संकट से कुल।
बनूं धृतराष्ट्र की परिणीता, जाये कठिनाई रज धुल॥

बाँध रही हूँ निज आँखों पर, पट्‌टी अपने हाथों से।
नेत्रहीन वर लिखा भाग्य में, क्या होगा अब बातों से॥

देख नहीं सकते स्वामी यदि, अन्धकार उनका जीवन।
मुझको भी वैसे ही तम में, रहना पति अनुगामी बन॥

चाहे मेरी निष्ठा समझो या मानो प्रतिरोध इसे
मुझ पर क्या बीते मैं जानूं लेकिन है परवाह किसे ?

कुन्ती को छोटी बहना सम मान दिया मैं करती हूँ
सुख दुख पीड़ा मन की बातें बाँट लिया मै करती हूँ

पांचाली को भी पुत्री सा, प्रेम किया मैं करती हूँ।
ऑच न आये उस पर कोई ध्यान दिया मैं करती हूँ॥

पर पुत्र मोह में निज पुत्रों को ॥ सत राह न दिखला पाती।
कैसे कर्कश होऊं उन पर मेरे सुत मेरी थाती॥

जानूं कृष्ण बड़े बलशाली, दिव्य शक्तियों के धारक।
कूटनीति के कुशल प्रबन्धक अस्त्र - शस्त्र उनके मारक॥

कौरव पुत्रों का संरक्षण, वे चाहें तो कर सकते ।
पर बस पाण्डव हित में उनके सोच विचार चला करते ॥

अगर चाहते कृष्ण हृदय से, रोक युद्ध को सकते थे।
टल भी जाता विनाश भारी, बात धर्म की करते थे॥

जीवित होते सुत सब मेरे, चहुँदिश खुशहाली होती ।
खूब लबालब भरी सुधा से जीवन की प्याली होती ॥

 पाण्डव जैसे कौरव भी तो, इस कुल के बालक ही थे।
अगर कृपा उन पर थी इतनी, मेरे सुत क्यों भारी थे ?

बालक तो हठ करते ही हैं, भूल भी कभी हो जाती ।
मृत्युदण्ड क्या देना ही हल, राह न दूजी मिल पाती?

पुत्र अगर त्रुटि करता कोई, उद्दण्ड निकल ही जाये।
अर्थ न इसका दोषी कह दें, प्राणों पर ही बन आये ॥

पथ से थोड़ा गया भटक सुत, अन्यायी पदवी पाये॥
नहीं अधर्मी हो जाता वह, दण्ड कठोर दिया जाये॥

राह निकाली जा सकती थी, अगर कृष्ण चाहे होते।
पक्षपात क्यों किया उन्होंने, आँसू अब धीरज खोते॥

क्या दोष पाण्डवों को दूँ मैं, वे भी हैं बालक सम ही।
मारे पुत्र गये उनके भी, जीत मिला उनको तम ही॥

पाण्डव तो मोहरे की तरह, उन पर नीर बहाऊंगी।
किंतु कृष्ण को क्षमा नहीं मैं, कभी कहीं कर पाऊंगी।

बाद युद्ध के गान्धारी से, मिलने जब माधव आये।
कौरव - माता के मुख पर वह, क्रोध रोष लाली पाये॥

स्वाभाविक था संयम खोना, ज्ञात कृष्ण को था लेकिन।
बुलवाया था गान्धारी ने, रहते कैसे जाये बिन ?

धधक उठी बातों में ज्वाला, गान्धारी रोक न पायी।
मन के भीतर दबी हुई जो, चिंगारी बाहर आयी॥

डूबा जैसे वंश हमारा, एक न शत सुत शेष बचा।
देखोगे वैसी गति तुम भी, खेल तुम्हीं ने सभी रचा॥

शाप यही देती हूं तुमको, वंश हीन हो जाओगे।
जो पीड़ा मैंने भोगी वह, पीड़ा तुम भी भोगोगे॥

कुन्ती

पुत्री राजा शूरसेन की, वसुदेव बहन सुकुमारी।
नाम पृथा जिसका बचपन में भातु मारिशा थी वारी॥

चाचा कुन्तीभोज ने लिया, गोद पृथा सुकुमारी को।
निःसन्तान रहे थे अब तक, मिली सुता अति पुलकित वो॥

नव नाम मिला कुन्ती उसको, रही लाडली सबकी जो।
शान्त मृदुल सत्कारी सुन्दर, हृदय जीत लेती थी वो॥

दुर्वासा ऋषि ने सेवा से प्रसन्न हो वरदान दिया।
पंचदेव होंगे वश में जब, तुमने उनको याद किया॥

लगी परखने एक दिवस जब, गुरु के वर की सच्चाई।
याद सूर्य को किया उसी क्षण, दृग सम्मुख रवि - छवि आई॥

कुंती बोली हे देव! सुनें, दर्शन पाकर धन्य हुई।
अब वापस आप चले जाएं, शंका हिय अनुमन्य हुई॥

बिना दिए वर जा न सकूं मैं, अतः यही कर देता हूं।
तेजस्वी सुत मेरे जैसा, पाने का वर देता हूँ॥

बिन ब्याही माता कहलाऊं, अपयश झेल नहीं सकती।
पुत्र मिला तेजस्वी रवि सम, साथ मगर कैसे रखती ?

अतः टोकरी में रख उसको, गंगा - धार बहा आयी।
पत्थर रखकर मन पर अपने, अपराध ग्लानि भर लायी॥

शेष न कोई पथ दूजा था, अतः नियति स्वीकार लिया।
आया जो भी समझ मुझे वह मैंने अंगीकार किया॥

ब्याही गयी हस्तिनापुर में, प्रथम पाण्डु - परिणीता बन॥
टीस उठाती स्मृतियों से तब, धीरे - धीरे उबरा मन॥

रानी बनी हस्तिनापुर की, दिन बीते खुशहाली में।
मन को जैसे पंख लग गये, जगमग जगत दिवाली में॥

एक समान न रहते सब दिन, नियति व्यथा पीड़ा लायी।
मद्र देश की राजकुमारी, माद्री सौतन बन आयी॥

सहज उदार सरल मन कुन्ती, पुनः नियति स्वीकार लिया।
मिलता वह जो भाग्य लिखा हो, बस यह हृदय विचार किया॥

शाप पाण्डु को आखेटन में ऋषि किंदामा से मिलता।
पश्चाताप करें वह वन जा, वैचारिक मन्थन चलता॥

कुंती पतिव्रत धर्म निभाती बाधा खड़ी न वह करती
माद्री भी सहमति जतलाती वन जाने को हठ करती ॥

वरदान मिला जो कुंती को उनसे त्रय सुत पाती है।
बहन मान कर माद्री को भी, द्वय सुत - सुख दिलवाती है॥

मोहित माद्री पर पांडु हुए, भूल शाप रति - लीन सहज।
प्राण पखेरू तत्क्षण निकले, असर शाप का हुआ महज॥

फिर एक बार था कुंती पर घन साया सा लहराया ।
सती हुई माद्री तज निज सुत पालन कुंती पर आया॥

पालन पोषण पाण्डु - सुतों का, अब कुन्ती को करना था।
लौट हस्तिनापुर आई वह, धीरज निज मन धरना था॥

गान्धारी के साथ सदा वह घुल-मिल कर रहती थी ।
दुर्योधन धृतराष्ट्र दुशासन सबके प्रति मृदु कहती थी॥

भाव न प्रतिहिंसा का किंचित, कौरव प्रति कुंती - मन में।
चाहे शूल न बिछाये कितने निज पुत्रों के जीवन में॥

सदा भतीजे कृष्ण पर रहा, विश्वास अटूट हृदय में।
रक्षण न्याय नीति का करके, रहते सत्य धर्म जय में॥

नैतिक सामाजिक मूल्यों की, डोर सदा थामे रहती ।
एक सूत्र में सब पुत्रों को, कर प्रयास बाँधे रखती॥

पुत्रवधू के साथ भी रहा, रिश्ता मधुरिम कुन्ती का।
बुद्धिमती दृढ़ निश्चय वाली, सार समझती जगती का॥

ज्ञात हुआ जब कर्ण पुत्र निज करती रही प्रयास सभी।
कर्ण पाण्डवों संग मिल रहे, भूल हुई जो हुई कभी॥

तत्पर अब अपयश स्वीकारूं , जीवित सारे पुत्र रहें।
अग्रज कर्ण सभी पुत्रों के, मिलकर सब एकत्र रहें॥

भरा विसंगतियों से जीवन पीड़ा का सामान रहा।
माता बलशाली पुत्रों की, पर न समय आसान रहा॥

विदुर

दासी पुत्र विदुर धर्मात्मा, सुत थे व्यास महामुनि के।
धृतराष्ट्र पाण्डु के भ्राता सम, परित: आभा ज्ञान दिखे॥

लेते रहते पक्ष धर्म का, नीति-परक संवादों में।
संग सत्य के रहें हमेशा, दिखता साहस बातों में॥

दासी - सुत होने की पीड़ा, मनोदशा चाकर वाली।
विश्वास स्वयं पर कम रहता, साहस ज्ञान रहे खाली॥

भाव दीनता का हावी था, अन्तरमन के प्रांगण में।
ओज न आ पाया वाणी में, मन दशा रही ज्यो रण में ॥

विदुर सोचते कभी कहीं क्या, कोई मुझको समझेगा?
दुर्योधन को समझाऊं तो क्रोध उसे आ जाएगा॥

जन्मा दासी - पुत्र रूप में, सीख न युद्ध - कला पाया।
भीष्म पितामह मुझे सिखाएं, ऐसा भाग्य कहाँ पाया?

क्षत्रिय जन ही युद्ध कलाएं, सीख सकेंगें नियम यही।
सब अपने विद्रोह करूं क्या, गुरुजन मे यह बात कही॥

शास्त्रों वेदों राजनीति का ज्ञानार्जन कर पाया हूँ।
बुद्धिमान विद्वान सरल छवि, मन्त्री पद तक आया हूँ॥

वरना दासी - सुत को कितना मान यहाँ मिल पाता है?
चाह रही रण - कौशल सीखूँ, युद्ध पराक्रम भाता है॥

करता हूँ स्वीकार हृदय से, नियति जहाँ ले आयी है।
कुछ विधना ने सोचा होगा, जो यह किस्मत पायी है॥

शांत सरल मन दूरदर्शिता, गुण मेरे हैं ज्ञात मुझे।
करते मुझको कृष्ण प्रेम हैं, भाती है यह बात मुझे॥

चर्चा करते महाराज भी, नीति विषय पर हैं मुझसे।
विदुर नीति पहचान बन रही, ये भी मुझको बात रुचे॥

संतोष सरलता भक्ति सहज, नीति निपुणता मेरा बल।
डगर धर्म की चलना मुझको, तनिक न भाता मुझको छल॥

रखनी भी पहचान जरूरी, अपने और पराये की।
संकट ज्ञात करा जाता सब, भला समय भरमाये भी॥

पितृ विहीन हुए पाण्डव यदि क्यों उनका अधिकार छिने?
जब पथ-भ्रष्ट हुए कौरव - जन, उनके भी तो पाप गिने॥

असहाय विवश पाता निज को, बस कह ही तो सकता हूँ।
मगर डिगूँगा नहीं डगर से, सच को थामे रहता हूँ॥

दुर्योधन दुःशासन कौरव, या फिर हो धृतराष्ट्र सभी।
भरी हुई है हृदय कुटिलता, मुझको तो है ज्ञात सभी।

धर्मपरायण रहे युधिष्ठिर, संग सभी निज भ्रात लिए।
अतुलित बलशाली सब के सब, नीति न्याय के कार्य किए॥

कौरव चालें चलें हमेशा, पाण्डव - जीवन संकट में।
काट सकूं हर कुटिल चाल को, झेल सकें पाण्डव झटके॥

पांचाली के चीर हरण में, किया विरोध यथासंभव।
मगर बाध्य नृप आज्ञा मानूँ, हा। धिक जीवन का वैभव॥

पुत्र-मोह में महाराज भी, अन्याय बहुत कर जाते।
पाण्डु - सुतों के संग नहीं वह, न्याय कभी कर पाते॥

माना देख नहीं सकते पर अन्तर - दृष्टि न खोलें क्यों ?
अधिकार पाण्डवों का भी है, बात नहीं वे समझें क्यों ?

जो भी मैं कह सकता हूँ वह, बिन भय के कह जाऊंगा।
चक्षु खुले रख जो भी कर सकता हूँ कर जाऊंगा॥

पाण्डु - सुतों पर मेरे रहते, आँच न कोई आ पाये।
सदा प्रयास रहेगा मेरा, अधिकार उन्हें मिला जाये॥

कुन्ती भाभी धर्म - परायण कृष्ण धर्म के रक्षक हैं।
धर्मराज युधिष्ठिर के संग, पाण्डव सतपथ तक्षक हैं॥

मौन समर्थन मेरा उनको, पक्ष न खुलकर ले सकता।
संभव यथा रहा है जितना, रक्षण को तत्पर रहता॥

कृष्ण त्याग कर राजभोग को, गृह मेरे जो आते हैं।
अपना मान बढ़ा पाता हूँ, धन्य प्राण हो जाते हैं॥

संजय

गावाल्गण विद्वान सूत थे, सुत उनका संजय बुनकर।
विनम्र धार्मिक स्वभाव मधुरिम राजसभा में रहें मुखर॥

रहे सारथी महाराज के, सलाहकार बने संजय।
बातें राज्य हितों की करते, कर पाते न कभी अभिनय॥

बात खरी ही बोलें संजय, कड़े वचन कह जाते थे।
धृतराष्ट्र रहे या सुत उनके, धर्म - नीति समझाते थे॥

अन्यायों का विरोध करते,बिन किंचित भय रख मन में।
सहानुभूति रही पाण्डव से, कृष्ण - भक्ति की जीवन में॥

मन्त्री थे धृतराष्ट्र राज्य में, सत्य सलाह दिया करते ।
होते क्षुब्ध महाराज मगर, बातें स्पष्ट किया करते॥

जब पाण्डव वनवास गये थे, चेताया नृप को तब भी।
नाश समूल लिखा कुरु कुल का, पर प्रजा निरीह मरेगी॥

पूर्व महाभारत के भेजा, पास युधिष्ठिर राजन ने ।
धर्मराज के संदेशे को, लौट सुनाया संजय ने॥

दोनों पक्षों को समझाया, जैसे भी हो युद्ध टले।
अथक प्रयास करें जो संभव, संजय को यह युद्ध खले॥

हुआ सुनिश्चित जब यह सबको टल सकता अब युद्ध नहीं।
दिव्य दृष्टि दी वेद व्यास ने संजय सकते देख कहीं॥

पल-पल का हाल सुना सकते, रण स्थल हाल बता सकते।
कौरव पाण्डव सेनाओं का, आँखों देखा वर्णन कहते॥

साथ सुनाया भगवद्गीता, संवादों की शैली में।
अर्जुन माधव से क्या पूछें, कृष्ण कहें क्या रैली में ?

हाल सुनाते संजय सोचें, अद्भुत ज्ञान सुनें सारे।
मनोदशा अनुकूल ग्रहण कर, सबने ज्ञान हृदय धारे॥

एकाग्र नहीं मन अगर हुआ, व्यर्थ ज्ञान हो जाएगा।
बस निज हित की बात सुनें यदि, क्षीण असर हो जाएगा॥

गान्धारी धृतराष्ट रहें या कुन्ती विदुर उपस्थित सब।
खो जाते अपने चिन्तन में वर्णन मध्य कहें क्या अब?

विस्तृत इतना वृहद ज्ञान वह, समझेंगे बस ईश्वर ही।
छलकी जाती ज्ञान गगरिया, पर कहती आयाम सही॥

क्षुद्र बहुत अपने को मानूं, अल्प बुद्धि क्या समझूंगा?
धन्य हुआ मैं दिव्य दृष्टि पा, संभव ज्ञान समेटूंगा॥

कृपा रही ईश्वर की मुझ पर, दिव्य दृष्टि पाया मैंने।
देख सका अर्जुन के जैसे, कृष्ण - रूप देखा मैनें॥

सफल हो गया जीवन जीना, रोष न कोई अब मन में।
लीलाधर की लीला देखी, मैने भी इस जीवन में॥

रूप दिव्य जो कृष्ण दिखाते अर्जुन को रण के स्थल पर।
रूप वही संजय ने भी था, देखा अन्तः सिहरन भर॥

दिव्य कृष्ण छवि दर्शन करके, रहा न पहले सा जीवन।
अन्तः करण हुआ परिवर्तित, हो आया वैरागी मन॥

तटस्थ होकर हाल सुनाते, यथारूप वर्णन करते। 
पक्ष - विपक्ष भाव अब धूमिल, रंजित रक्त - कथा कहते॥

अन्दर रहती उदासीनता, वैरागी सम भावों में।
दायित्व नहीं था पूर्ण हुआ, व्यर्थ समय न सुझावों में॥

धर्म - युद्ध यह नियति कराये, सबके अपने लेखे हैं।
ज्ञान कृष्ण का ग्रहण कर लिया, फल कर्मों के देखें हैं॥

भाया अब सन्यासी जीवन, गूढ़ ज्ञान की सुन बातें।
कृष्ण - भक्ति में बीते जीवन, चाहें दिन हों या रातें॥

दिव्य दृष्टि खो दी संजय ने, जब वह युद्ध समाप्त हुआ।
आमूल - चूल परिवर्तन भी, संजय भीतर व्याप्त हुआ॥

बातें गूढ़ बहुत थीं लेकिन, समझ सका जो ज्ञान न कम।
धन्य हुआ जीवन यह मेरा अब न हृदय में रहता तम॥

वाद विवाद न बहस लगे प्रिय, भक्ति मौन में मुखर हुई।
अन्तर दिशा दशा सुधरी मृदु, अन्तर आत्मा निखर हुई॥

गंग छंद, नवगीत, लघु कथा, हिंदी आरती, दोहा, सॉनेट, सोरठा, मुक्तक,

सलिल सृजन  १० जनवरी 
*
सोरठा सलिला
कालिंदी के तीर, लिखा गया इतिहास था।
मन में धरकर धीर, जन-हित साधा कृष्ण ने।।
*
प्रकृति मैया पोस, मारा शोषक कालिया।
सहा इंद्र का रोष, गोवर्धन छिप कान्ह ने।।
*
मिला पूत नहिं एक, बंजर भू सम पूतना।
खोकर चली विवेक, कृष्ण मारने खुद मरी।।
*
जोशीमठ में आज, कान्हा हो जाओ प्रगट।
जन-जीवन की लाज, मात्र तुम्हारे हाथ में।।
*
दोषी शासन-नीति, रही प्रकृति को छेड़ती।
है पाखंडी रीति, घड़ियाली आँसू बहे।।
*
जनता जागे आज, कहें कृष्ण विप्लव करो।
बदल इंद्र का राज, करो प्रकृति से मित्रता।।
१०-१-२०२३
***
सॉनेट
हिंदी
*
जगवाणी हिंदी का वंदन, इसका वैभव अनुपम अक्षय।
हिंदी है कृषकों की भाषा, श्रमिकों को हिंदी प्यारी है।
मध्यम वर्ग कॉंवेंटी है, रंग बदलता व्यापारी है।।
जनवाणी, हैं तंत्र विरोधी, न्यायपालिका अंग्रेजीमय।।
बच्चों से जब भी बतियाएँ, केवल हिंदी में बतियाएँ।
अन्य बोलिओं-भाषाओँ को, सिखा-पढ़ाएँ साथ-साथ ही।
ह्रदय-दिमाग न हिंदी भूले, हिंदी पुस्तक लिए हाथ भी।।
हिंदी में प्रार्थना कराएँ, भजन-कीर्तन नित करवाएँ।।
शिक्षा का माध्यम हिंदी हो, हिंदी में हो काम-काज भी।
क्यों अंग्रेजी के चारण हैं, तनिक न आती हया-लाज भी।
हिंदी है सहमी गौरैया, अंग्रेजी है निठुर बाज सी।
शिवा कह रहे हैं शिव जी को, कैसे आए राम राज जी?
हो जब निज भाषा में शिक्षा, तभी सधेंगे, सभी काज जी।।
देवनागरी में लिखिए हर भाषा, होगा तब सुराज जी।।
***
सॉनेट
जात को अपनी कभी मरने न दीजिए।
बात से फिरिए नहीं, तभी तो बात है।
ऐब को यह जिस्म-जां चरने न दीजिए।।
करें फरेब जीत मिले तो भी मात है।।
फायदा हो कायदे से तभी लीजिए।
छीनिए मत और से, न छीनने ही दें।
वायदा टूटे नहीं हर जतन कीजिए।।
पंछियों को अन्न कभी बीनने भी दें।।
दुर्दशा लोगों की देखकर पसीजिए।
तंत्र रौंद लोक को गर्रा रहा हुज़ूर।
आईने में देख शकल नहीं रीझिए।।
लोग मरे जा रहे हैं; देखिए जरूर।।
सचाई से आखें कभी चार कीजिए।
औरों की सुन; तनिक ख़ुशी कभी दीजिए।।
१०-१-२०२२
***
हिंदी आरती
*
भारती भाषा प्यारी की।
आरती हिन्दी न्यारी की।।
*
वर्ण हिंदी के अति सोहें,
शब्द मानव मन को मोहें।
काव्य रचना सुडौल सुन्दर
वाक्य लेते सबका मन हर।
छंद-सुमनों की क्यारी की
आरती हिंदी न्यारी की।।
*
रखे ग्यारह-तेरह दोहा,
सुमात्रा-लय ने मन मोहा।
न भूलें गति-यति बंधन को-
न छोड़ें मुक्तक लेखन को।
छंद संख्या अति भारी की
आरती हिन्दी न्यारी की।।
*
विश्व की भाषा है हिंदी,
हिंद की आशा है हिंदी।
करोड़ों जिव्हाओं-आसीन
न कोई सकता इसको छीन।
ब्रम्ह की, विष्णु-पुरारी की
आरती हिन्दी न्यारी की।।
१०.१.२०१९
***
लघुकथा-
गूंगे का गुड़
*
अपने लेखन की प्रशंसा सुन मित्र ने कहा आप सब से प्रशंसा पाकर मन प्रसन्न होता है किंतु मेरे पति प्राय: कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं करते। मेरा ख़याल था कि उन्हें मेरा लिखना पसंद नहीं है परन्तु आप कहते हैं कि ऐसा नहीं है। यदि उन्हें मेरा लिखना औए मेरा लिखा अच्छा लगता है तो यह जानकर मुझे ख़ुशी और गौरव ही अनुभव होगा। मुझे उनकी जो बात अच्छी लगती है मैं कह देती हूँ, वे क्यों नहीं कहते?
मैंने कहा- आपके प्रश्न का उत्तर एक कहावत में निहित है 'गूंगे का गुड़'
***
मुक्तक
मन जी भर करता रहा, था जिसकी तारीफ
उसने पल भर भी नहीं, कभी करी तारीफ
जान-बूझ जिस दिन नहीं, मन ने की तारीफ
उस दिन वह उन्मन हुई, कर बैठी तारीफ
***
सोरठा
मन बैठा था मौन, लिखवाती संगत रही।
किसका साथी कौन?, संग खाती पंगत रही।।
***

दोहा सलिला
*
मन मीरां तन राधिका,तरें जपें घनश्याम।
पूछ रहे घनश्याम मैं जपूँ कौन सा नाम?
*
जिसको प्रिय तम हो गया, उसे बचाए राम।
लक्ष्मी-वाहन से सखे!, बने न कोई काम।।
*
प्रिय तम हो तो अमावस में मत बालो दीप।
काला कम्बल ओढ़कर, काजल नैना लीप।।
*
प्रियतम बिन कैसे रहे, मन में कहें हुलास?
विवश अधर मुस्का रहे, नैना मगर उदास।।
*
चाह दे रही आह का, अनचाहा उपहार।
वाह न कहते बन रहा, दाह रहा आभार।।
*
बिछुड़े आनंदकंद तो, छंद आ रहा याद।
बेचारा कब से करे, मत भूलो फरियाद।।
*
निठुर द्रोण-मूरत बने, क्यों स्नेहिल संजीव।
सलिल सलिल सा तरल हो, मत करिए निर्जीव।।
***

आलेख-
मत करें उपयोग इनका
हम जाने-अनजाने ऐसी सामग्री का उपयोग करते रहते हैं जो हमारे स्वस्थ्य, पर्यावरण और परिवेश के लिए घातक होती है. निम्न वस्तुएँ ऐसी ही हैं, इनका प्रयोग बंद कर हम आप तथा समाज और पर्यावरण को बेहतर बना सकते हैं.
१. प्लास्टिक निर्मित सामान- मनुष्य द्वारा किसी सामान का उपयोग किये जाने के बाद बचा निरुपयोगी कचरा कूड़े के ढेर, नाली, नाला, नदी से होते हुए अंतत: समुद्र में पहुँचकर 'रत्नाकर' को 'कचराघर' बना देता है. समुद्र को प्रदूषित करते कचरे में ८०% प्लास्टिक होता है. प्लास्टिक सड़ता, गलता नहीं, इसलिए वह मिट्टी में नहीं बदलता. भूमि में दबाये जाने पर बरसों बाद भी ज्यों का त्यों रहता है. प्लास्टिक जलने पर ओषजन वजू नष्ट होती है और प्रदूषण फैलानेवाली हानिप्रद वायु निकलती है. प्लास्टिक की डब्बियाँ, चम्मचें, प्लेटें, बर्तन, थैलियाँ, कुर्सियाँ आदि का कम से कम प्रयोग कर हम प्रदूषण कम कर सकते हैं.
प्लास्टिक के सामान मरम्मत योग्य नहीं होते. इनके स्थान पर धातु या लकड़ी का सामान प्रयोग किया जाए तो उसमें टूट-फूट होने पर मरम्मत तथा रंग-रोगन करना संभव होता है. इससे स्थानीय बेरोजगारों को आजीविका मिलती है जबकि प्लास्टिक सामग्री पूंजीपतियों का धन बढ़ाती है.
२. दन्तमंजन- हमने बचपन में कंडों या लकड़ी की राख में नमक-हल्दी मिले मंजन या दातौन का प्रयोग वर्षों तक किया है जिससे दांत मुक्त रहे. आजकल रसायनों से बने टूथपेस्ट का प्रयोग कर शैशव और बचपन दंत-रोगों से ग्रस्त हो रहा है. टूथपेस्ट कंपनियाँ ऐसे तत्वों (माइक्रोबीड्स) का प्रयोग करती हैं जिन्हें सड़ाया नहीं जा सकता. कोयले को घिसकर अथवा कोयले की राख से दन्तमंजन का काम लिया का सकता है. वनस्पतियों से बनाये गए दंत मंजन का प्रयोग बेहतर विकल्प है.
स्टीरोफोम
३. स्टिरोफोम से बने समान- आजकल तश्तरी, कटोरी, गिलास और चम्मच न सड़नेवाले (नॉन बायोडिग्रेडेबल) तत्वों से बनाये जाते हैं. हल्का और सस्ता होने पर भी यह गंभीर रोगों को जन्म दे सकता है. इसके स्थान पर बाँस, पेड़ के पत्तों, लकड़ी या छाल से बने समान का प्रयोग करें तो वह सड़कर मिटटी बन जाता है तह स्थानीय रोजगार का सर्जन करता है. इनकी उपलब्धता के लिए पौधारोपण बड़ी संख्या में करना होगा जिससे वन बढ़ेंगे और वायु प्रदूषण घटेगा.
१०.१.२०१७
***
नवगीत:
क्यों?
*
इसे क्यों
हिर्स लगती है
जिठानी से?
उसे क्यों
होड़ लेना
देवरानी से?
*
अँगुलियाँ कब हुई हैं
एक सी बोलो?
किसी को बेहतर-कमतर
न तुम तोलो
बँधी रख अँगुलियाँ
बन जाओ रे! मुट्ठी
कभी मत
हारना, दुनिया
दीवानी से
*
लड़े यदि नींव तो
दीवार रोयेगी
दिखाकर आँख छत
निज नाश बोयेगी
न पूछो हाल कलशों का
कि क्या होगा?
मिटाओ
विषमता मिल
ज़िंदगानी से
*
न हीरे-मोतियों से
प्यास मिटती है
न ताकत से अधर पर
हँसी खलती है
नयन में आस ही
बन प्रीत पलती है
न छीने
स्वप्न युग
नादां जवानी से
१०-१-२०१६
***
लघुकथा
जीत का इशारा
*
पिता को अचानक लकवा क्या लगा घर की गाड़ी के चके ही थम गये। कुछ दिन की चिकित्सा पर्याप्त न हुई. आय का साधन बंद और खर्च लगातार बढ़ता हुआ रोजमर्रा के खर्च, दवाई-इलाज और पढ़ाई।
उसने माँ के चहरे की खोटी हुई चमक और पिता की बेबसी का अनुमान कर अगले सवेरे औटो उठाया और चल पड़ी स्टेशन की ओर। कुछ देर बाद माँ जागी, उसे घर पर न देख अनुमान किया मंदिर गयी होगी। पिता के उठते ही उनकी परिचर्या के बाद तक वह न लौटी तो माँ को चिंता हुई, बाहर निकली तो देखा औटो भी नहीं है।
बीमार पति से क्या कहती?, नन्हें बेटे को जगाकर पडोसी को बुलाने का विचार किया। तभी एकदम निकट हॉर्न की आवाज़ सुनकर चौंकी। पलट कर देख तो उन्हीं का ऑटो था। ऑटो लेकर भागने वाले को पकड़ने के लिए लपकीं तो ठिठक कर रह गयीं, चालक के स्थान पर बैठी बेटी कर रही थी जीत का इशारा।
***
लघुकथा :
सहारे की आदत
*
'तो तुम नहीं चलोगे? मैं अकेली ही जाऊँ?' पूछती हुई वह रुँआसी हो आयी किंतु उसे न उठता देख विवश होकर अकेली ही घर से बाहर आयी और चल पड़ी अनजानी राह पर।
रिक्शा, रेलगाड़ी, विमान और टैक्सी, होटल, कार्यालय, साक्षात्कार, चयन, दायित्व को समझना-निभाना, मकान की तलाश, सामान खरीदना-जमाना एक के बाद एक कदम-दर-कदम बढ़ती वह आज विश्राम के कुछ पल पा सकी थी। उसकी याद सम्बल की तरह साथ होते हुए भी उसके संग न होने का अभाव खल रहा था।
साथ न आया तो खोज-खबर ही ले लेता, मन हुआ बात करे पर स्वाभिमान आड़े आ गया, उसे जरूरत नहीं तो मैं क्यों पहल करूँ? दिन निकलते गये और बेचैनी बढ़ती गयी। अंतत: मन ने मजबूर किया तो चलभाष पर संपर्क साधा, दूसरी और से उसकी नहीं माँ की आवाज़ सुन अपनी सफलता की जानकारी देते हुए उसके असहयोग का उलाहना दिया तो रो पड़ी माँ और बोली बिटिया वह तो मौत से जूझ रहा है, कैंसर का ऑपरेशन हुआ है, तुझे नहीं बताया कि फिर तू जा नहीं पाती। तुझे इतनी रुखाई से भेजा ताकि तू छोड़ सके उसके सहारे की आदत।
स्तब्ध रह गयी वह, माँ से क्या कहती?
तुरंत बाद माँ के बताये चिकित्सालय से संपर्क कर देयक का भुगतान किया, अपने नियोक्ता से अवकाश लिया, आने-जाने का आरक्षण कराया और माँ को लेकर पहुँची चिकित्सालय, वह इसे देख चौंका तो बोली मत परेशान हो, मैं तम्हें साथ ले जा रही हूँ। अब मुझे नहीं तुम्हें डालनी है सहारे की आदत।
***

लघुकथा:
विधान
*
नवोढ़ा पुत्रवधू के हर काम में दोष निकलकर उन्हें संतोष होता, सोचतीं यह किसी तरह मायके चली जाए तो पुत्र पर फिर एकाधिकार हो जाए. बेटी भी उनका साथ देती। न जाने किस मिट्टी की बनी थी पुत्रवधु कि हर बात मुस्कुरा कर टाल देती।
कुछ दिनों बाद बेटी का विवाह बहुत अरमनों से किया उन्होंने। कुछ दिनों बाद बेटी को अकेला देहरी पर खड़ा देखकर उनका माथा ठनका, पूछा तो पता चला कि वह अपनी सास से परेशान होकर लौट आयी फिर कभी न जाने के लिये। इससे पहले कि वे बेटी से कुछ कहें बहू अपनी ननद को अन्दर ले गयी और वे सोचती रह गयीं कि यह विधि का विधान है या शिक्षा-विधान?
१०.१.२०१६
***

विचित्र भारत
सोनिया गांधी मंदिर महबूबनगर, आंध्र




आंध्र प्रदेश में कांग्रेस के एक कार्यकर्ता पूर्व मंत्री पी शंकर राव ने वर्ष १९१४ में सत्ताधारी दल की मुखिया सोनिया गांधी की ९ फुट ऊंची प्रतिमा स्थापित कर मंदिर तैयार करवाया है। इतालवी मूल की ७१ वर्षीय श्रीमती सोनिया गांधी देश के सबसे ताकतवर राजनीतिज्ञों में से एक हैं। वे उस नेहरू-गाँधी परिवार की सदस्य हैं जिसने देश को ३ तीन प्रधानमंत्री (जवाहर लाल जी, इंदिरा गाँधी जी और राजीव गाँधी जी) दिए हैं जिनमें से बाद के दोनों शहीद हुए। राव ने जुलाई १९९३ में आंध्र प्रदेश के विभाजन और अलग तेलंगाना राज्य बनाने के पार्टी के फैसले के बाद सोनिया गांधी को धन्यवाद देने के लिए महबूबनगर में यह मंदिर बनवाया है। ३.५ करोड़ आबादी वाले तेलंगाना इलाके में हैदराबाद समेत आंध्र प्रदेश के 23 जिलों के 10 जिले शामिल किए गए हैं। राव ने कहा, ''अलग तेलंगाना राज्य बनाने की दशकों पुरानी माँग को पूरा करने में ऐतिहासिक भूमिका अदा करने के लिए सोनिया गाँधीको धन्यवाद देने का यह हमारा तरीक़ा है।''
उल्लेखनीय है कि उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्य मंत्री रहीं बहुजन समाजवादी पार्टी की मायावती जी ने राजधानी लखनऊ में खुद अपनी प्रतिमा युक्त मंदिर का उद्घाटन किया है। दक्षिण भारत में साहित्यकारों, राजनेताओं और अभिनेताओं के मंदिर बनाने की लंबी परंपरा रही है।
***
नवगीत:
.
छोड़ो हाहाकार मियाँ!
.
दुनिया अपनी राह चलेगी
खुदको खुद ही रोज छ्लेगी
साया बनकर साथ चलेगी
छुरा पीठ में मार हँसेगी
आँख करो दो-चार मियाँ!
.
आगे आकर प्यार करेगी
फिर पीछे तकरार करेगी
कहे मिलन बिन झुलस मरेगी
जीत भरोसा हँसे-ठगेगी
करो न फिर भी रार मियाँ!
.
मंदिर में मस्जिद रच देगी
गिरजे को पल में तज देगी
लज्जा हया शरम बेचेगी
इंसां को बेघर कर देगी
पोंछो आँसू-धार मियाँ!
नवगीत:
.
रब की मर्ज़ी
डुबा नाखुदा
गीत गा रहा
.
किया करिश्मा कोशिश ने कब?
काम न आयी किस्मत, ना रब
दुनिया रिश्ते भूल गयी सब
है खुदगर्ज़ी
बुला, ना बुला
मीत भा रहा
.
तदबीरों ने पाया धोखा
तकरीरों में मिला न चोखा
तस्वीरों का खाली खोखा
नाता फ़र्ज़ी
रहा, ना रहा
जीत जा रहा
.
बादल गरजा दिया न पानी
बिगड़ी लड़की राह भुलानी
बिजली तड़की गिरी हिरानी
अर्श फर्श को
मिला, ना मिला
रीत आ रहा
***
नवगीत:
.
उम्मीदों की फसल
ऊगना बाकी है
.
अच्छे दिन नारों-वादों से कब आते हैं?
कहें बुरे दिन मुनादियों से कब जाते हैं?
मत मुगालता रखें जरूरी खाकी है
सत्ता साध्य नहीं है
केवल साकी है
.
जिसको नेता चुना उसीसे आशा है
लेकिन उसकी संगत तोला-माशा है
जनप्रतिनिधि की मर्यादा नापाकी है
किससे आशा करें
मलिन हर झाँकी है?
.
केंद्रीकरण न करें विकेन्द्रित हो सत्ता
सके फूल-फल धरती पर लत्ता-पत्ता
नदी-गाय-भू-भाषा माँ, आशा काकी है
आँख मिलाकर
तजना ताका-ताकी है
***
नवगीत:
.
लोकतंत्र का
पंछी बेबस
.
नेता पहले डालें दाना
फिर लेते पर नोच
अफसर रिश्वत गोली मारें
करें न किंचित सोच
व्यापारी दे
नशा रहा डँस
.
आम आदमी खुद में उलझा
दे-लेता उत्कोच
न्यायपालिका अंधी-लूली
पैरों में है मोच
ठेकेदार-
दलालों को जस
.
राजनीति नफरत की मारी
लिए नींव में पोच
जनमत बहरा-गूँगा खो दी
निज निर्णय की लोच
एकलव्य का
कहीं न वारिस
१०-१-२०१५
छंद सलिला:
नौ मात्रिक छंद गंग
(अब तक प्रस्तुत छंद: अग्र, अचल, अचल धृति, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रा वज्रा, उपेन्द्र वज्रा, कीर्ति, घनाक्षरी, प्रेमा, वाणी, शक्तिपूजा, सार, माला, शाला, हंसी, दोधक, सुजान, छवि)
*
९ वसुओं के आधार पर नौ मात्राओं के छंदों को वासव छंद कहा गया है. नवधा भक्ति, नौ रस, नौ अंक, अनु गृह, नौ निधियाँ भी नौ मात्राओं से जोड़ी जा सकती हैं. नौ मात्राओं के ५५ छंदों को ५ वर्गों में विभाजित किया जा सकता है.
१. ९ लघु मात्राओं के छंद १
२. ७ लघु + १ गुरु मात्राओं के छंद ७
३. ५ लघु + २ गुरु मात्राओं के छंद २१
४. ३ लघु + ३ गुरु मात्राओं के छंद २०
५. १ लघु + ४ गुरु मात्राओं के छंद ५
नौ मात्रिक छंद गंग
नौ मात्रिक गंग छंद के अंत में २ गुरु मात्राएँ होती हैं.
उदाहरण:
१. हो गंग माता / भव-मुक्ति-दाता
हर दुःख हमारे / जीवन सँवारो
संसार चाहे / खुशियाँ हजारों
उतर आसमां से / आओ सितारों
जन्नत जमीं पे, नभ से उतारो
शिव-भक्ति दो माँ / भाव-कष्ट-त्राता
२. दिन-रात जागो / सीमा बचाओ
अरि घात में है / मिलकर भगाओ
तोपें चलाओ / बम भी गिराओ
सेना लड़ेगी / सब साथ आओ
३. बचपन हमेशा / चाहे कहानी
है साथ लेकिन / दादी न नानी
हो ज़िंदगानी / कैसे सुहानी
सुने न किस्से, न / बातें बनानी
१०.१.२०१४
***

विश्वनाथाष्टक, विघ्नेश्वराष्टोत्तर शतनामस्तोत्र

 ||श्री विघ्नेश्वराष्टोत्तर शतनामस्तोत्रम्||

विनायको विघ्नराजो गौरीपुत्रो गणेश्वरः .
स्कंदाग्रजोव्ययः पूतो दक्षोऽध्यक्षो द्विजप्रियः .. १..
अग्निगर्वच्छिद इन्द्रश्रीप्रदः .
वाणीप्रदोअः अव्ययः सर्वसिद्धिप्रदश्शर्वतनो शर्वरीप्रियः .. २..
सर्वात्मकः सृष्टिकर्ता देवोनेकार्चितश्शिवः .
शुद्धबुद्धि प्रियश्शांतो ब्रह्मचारी गजाननः .. ३..
द्वैमात्रेयो मुनिस्तुत्यो भक्तविघ्नविनाशनः .
एकदन्तश्छतुर्बाहुश्छतुरश्शक्तिसंयुतः .. ४..
लम्बोदरश्शूर्पकर्णो हरर्ब्रह्म विदुत्तमः .
कालो ग्रहपतिः कामी सोमसूर्याग्निलोचनः .. ५..
पाशाङ्कुशधरश्चण्डो गुणातीतो निरञ्जनः .
अकल्मषस्स्वयंसिद्धस्सिद्धार्चितः पदाम्बुजः .. ६..
बीजपूरफलासक्तो वरदश्शाश्वतः कृतिः .
द्विजप्रियो वीतभयो गदी चक्रीक्षुचापधृत् .. ७..
श्रीदोज उत्पलकरः श्रीपतिः स्तुतिहर्षितः .
कुलाद्रिभेत्ता जटिलः कलिकल्मषनाशनः .. ८..
चन्द्रचूडामणिः कान्तः पापहारी समाहितः .
अश्रितश्रीकरस्सौम्यो भक्तवांछितदायकः .. ९..
शान्तः कैवल्यसुखदस्सच्चिदानन्द विग्रहः .
ज्ञानी दयायुतो दांतो ब्रह्मद्वेषविवर्जितः ..१०..
प्रमत्तदैत्यभयदः श्रीकंथो विबुधेश्वरः .
रामार्चितोविधिर्नागराजयज्ञोपवीतकः ..११..
स्थूलकंठः स्वयंकर्ता सामघोषप्रियः परः .
स्थूलतुण्डोऽग्रणी धीरो वागीशस्सिद्धिदायकः .. १२..
दूर्वाबिल्वप्रियोऽव्यक्तमूर्तिरद्भुतमूर्तिमान् .
शैलेन्द्रतनुजोत्सङ्गखेलनोत्सुकमानसः .. १३..
स्वलावण्यसुधासारो जितमन्मथविग्रहः .
समस्तजगदाधारो मायी मूषकवाहनः ..१४..
हृष्टस्तुष्टः प्रसन्नात्मा सर्वसिद्धिप्रदायकः .
अष्टोत्तरशतेनैवं नाम्नां विघ्नेश्वरं विभुं .. १५..
तुष्टाव शंकरः पुत्रं त्रिपुरं हंतुमुत्यतः .
यः पूजयेदनेनैव भक्त्या सिद्धिविनायकम् ..१६..
दूर्वादलैर्बिल्वपत्रैः पुष्पैर्वा चंदनाक्षतैः .
सर्वान्कामानवाप्नोति सर्वविघ्नैः प्रमुच्यते ..
ॐ विश्वग्दृशे नमः
***
|विश्वनाथाष्टकम्||
गङ्गातरंगरमणीयजटाकलापं
गौरीनिरन्तरविभूषितवामभागम् |
नारायणप्रियमनंगमदापहारं
वाराणसीपुरपतिं भज विश्वनाथम् ||
वाचामगोचरमनेकगुणस्वरूपं
वागीशविष्णुसुरसेवितपादपीठम् |
वामेनविग्रहवरेणकलत्रवन्तं
वाराणसीपुरपतिं भज विश्वनाथम् ||
भूताधिपं भुजगभूषणभूषितांगं
व्याघ्राजिनांबरधरं जटिलं त्रिनेत्रम् |
पाशांकुशाभयवरप्रदशूलपाणिं
वाराणसीपुरपतिं भज विश्वनाथम् |
शीतांशुशोभितकिरीटविराजमानं
भालेक्षणानलविशोषितपंचबाणम् |
नागाधिपारचितभासुरकर्णपूरं
वाराणसीपुरपतिं भज विश्वनाथम् ||
पंचाननं दुरितमत्तमतङ्गजानां
नागान्तकं दनुजपुंगवपन्नगानाम् |
दावानलं मरणशोकजराटवीनां
वाराणसीपुरपतिं भज विश्वनाथम् ||
तेजोमयं सगुणनिर्गुणमद्वितीयं
आनन्दकन्दमपराजितमप्रमेयम् |
नागात्मकं सकलनिष्कलमात्मरूपं
वाराणसीपुरपतिं भज विश्वनाथम् ||
रागादिदोषरहितं स्वजनानुरागं
वैराग्यशान्तिनिलयं गिरिजासहायम् |
माधुर्यधैर्यसुभगं गरलाभिरामं
वाराणसीपुरपतिं भज विश्वनाथम् ||
आशां विहाय परिहृत्य परस्य निन्दां
पापे रतिं च सुनिवार्य मनः समाधौ |
आदाय हृत्कमलमध्यगतं परेशं
वाराणसीपुरपतिं भज विश्वनाथम् ||
वाराणसीपुरपतेः स्तवनं शिवस्य
व्याख्यातमष्टकमिदं पठते मनुष्यः |
विद्यां श्रियं विपुलसौख्यमनन्तकीर्तिं
सम्प्राप्य देहविलये लभते च मोक्षम् ||
विश्वनाथाष्टकमिदं यः पठेच्छिवसन्निधौ |
शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते ||
|| इति श्रीमहर्षिव्यासप्रणीतं श्रीविश्वनाथाष्टकं संपूर्णम् ||

***

सोनिया गांधी मंदिर

 विचित्र भारत 

सोनिया गांधी मंदिर महबूबनगर, आंध्र 


आंध्र प्रदेश में कांग्रेस के एक कार्यकर्ता पूर्व मंत्री पी शंकर राव ने वर्ष १९१४ में सत्ताधारी दल की मुखिया सोनिया गांधी की ९ फुट ऊंची प्रतिमा स्थापित कर मंदिर तैयार करवाया है। इतालवी मूल की ७१ वर्षीय श्रीमती सोनिया गांधी देश के सबसे ताकतवर राजनीतिज्ञों में से एक हैं। वे उस नेहरू-गाँधी परिवार की सदस्य हैं जिसने देश को ३ तीन प्रधानमंत्री (जवाहर लाल जी, इंदिरा गाँधी जी और राजीव गाँधी जी) दिए हैं जिनमें से बाद के दोनों शहीद हुए। राव ने जुलाई १९९३ में आंध्र प्रदेश के विभाजन और अलग तेलंगाना राज्य बनाने के पार्टी के फैसले के बाद सोनिया गांधी को धन्यवाद देने के लिए महबूबनगर में यह मंदिर बनवाया है। ३.५ करोड़ आबादी वाले तेलंगाना इलाके में हैदराबाद समेत आंध्र प्रदेश के 23 जिलों के 10 जिले शामिल किए गए हैं। राव ने कहा, ''अलग तेलंगाना राज्य बनाने की दशकों पुरानी माँग को पूरा करने में ऐतिहासिक भूमिका अदा करने के लिए सोनिया गाँधीको धन्यवाद देने का यह हमारा तरीक़ा है।''
उल्लेखनीय है कि उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्य मंत्री रहीं बहुजन समाजवादी पार्टी की मायावती जी ने राजधानी लखनऊ में खुद अपनी  प्रतिमा युक्त मंदिर का उद्घाटन किया है। दक्षिण भारत में साहित्यकारों, राजनेताओं और अभिनेताओं के मंदिर बनाने की लंबी परंपरा रही है। 
***  

मंगलवार, 9 जनवरी 2024

सॉनेट, राधोपनिषद, राउत नाचा, छत्तीसगढ़ी, यायावर, हास्य, लालू, गीत, निर्माण, तसलीस,

सलिल सृजन ९ जनवरी 
सॉनेट
गौरैया कलरव करे, तुलसी जाए झूम,
बरगद बब्बा खाँसते, पीपल कक्का मौन,
इमली दादी टेरतीं, चैया देगा कौन,
ठुमक गिलहरी नाचती, नन्हें शिशु को चूम।।
बया-कबूतर मचाते, बैठ मुँडेरे धूम।
शुगर समझ के डालती, नीम बहुरिया नौन।
ननद चमेली मजा ले, देख तमाशा भौन।।
बिखरी लट-बिंदी कहे, बिना कहे जो राज,
सदा सुहागन लाज से, हुई लाल रतनार,
चूड़ी खनक खनक कहे, भाया चंपा खूब।
बैंगन देवर खिजाता, शीश सजाए ताज,
बिन पेंदी का लुढ़कता, आलू खाता खार,
भोर भई सूरज-उषा, हँसे हर्ष में डूब।
९.१.२०२४
•••
राधोपनिषद
*
शंख विष्णु का घोष सुन, क्षीर सिंधु दधि मग्न।
रमा राधिका रुक्मिणी, है हरि साथ निमग्न।।
ब्रह्म साथ जो प्रगटते, वे वैकुण्ठी मित्र।
विविध रूप धर प्रगटते, है यह सत्य विचित्र।।
नीलांबर प्रभु-छत्र है, व्यास आदि वंदन करें।
प्रभु महिमा का गान, करें सिंधु भव वे तरें।।
गदा कालिका, धनुष है, माया शर है काल।
कमल धरें लीला करें, भक्ति धारते भाल।।
गोप-गोपियों से नहीं, भिन्न आप गोपाल।
स्वर्ग निवासी अवतरे, प्रभु के संग निहाल।।
कृष्ण धाम वैकुण्ठ है, जाने देहातीत।
राम-कृष्ण दोउ एक हैं, दो हों भले प्रतीत।।
भू पर आ वैकुण्ठ खुद, सत-रज-तम धरकर रूप।
प्रभु के साथ सतत रहे, है यह कथा अनूप।।
गूढ़ अर्थ सरला जमुन, रहें शारदा साथ।
कर संकल्प दाधीच सम, रानी थामे हाथ।।
वेद ऋचाएँ बन गईं, गोपी-रानी आप।
सत्यभामा भू रूप धर, सकीं कृष्ण में व्याप।।
देव कृष्ण सान्निन्ध्य पा, धन्य हो गए आप।
सलिल कृष्ण अभिषेक कर, तरा जमुन में व्याप।।
राधातापनीयोपनिषद
राधा पूजन क्यों करें, दे प्रकाश आदित्य।
कहें शक्ति दैवत्व की, है राधा भवितव्य।।
सकल जीव अस्तित्व में, राधा-शक्ति सुहेतु।
हैं इन्द्रियाँ समस्त सुर, चेष्टा राधा सेतु।।
भू भुव: स्व: आहुती, राधा शक्ति प्रणम्य।
राधा-कृष्ण न भिन्न हैं, युगल रूप अति रम्य।।
श्रुतियाँ विनत नमन करें, हो राधिका प्रसन्न।
कृष्ण आप सेवक बनें, चाहें कृपा विपन्न।।
दिव्य रासलीला निरख, भूले जस अस्तित्व।
अंक बसे श्रीकृष्ण जी, बिसरा दें निज स्वत्व।।
त्रय सप्तक स्वर सप्त मिल, गाएँ राधा-कीर्ति।
शक्ति-शक्तिधर एक हैं, भले दिखें दो मूर्ति।।
९.१.२०२३
***
छत्तीसगढ़ी रास राउत नाचा
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छत्तीसगढ़ की लोकनृत्य की परंपरा में राउत नाचा ( अहीर नृत्य, मड़ई) का महत्वपूर्ण स्थान है। राउत नाचा नंद ग्राम के गोप-गोपिकाओं के साथ कृष्ण द्वारा गौ चरवाहे के रूप में गोवर्धन व कालिंदी के तट पर किए गए नृत्य नाट्य का ही रूपांतरित रूप है जो पार (दोहे) बोलकर कृष्ण भक्ति को अभिव्यक्त करने हेतु तन्मयता के साथ नृत्य प्रस्तुत कर भावातिरेक प्रसन्नता प्रदर्शित करते हैं। उनके विशेष परिधान में धोती के साथ सलूखा, जैकेटनुमा रंग-बिरंगा चमकदार आस्किट, पगड़ी या मुराठा बाँधकरकर गुलाबी, बैगनी, हरे, नीले रंग की कलगी व मयूरपंख खोंसे (लगाए) रहते हैं। साथ में बाँसुरी, सिंग बाजा, डाफ, टिमकी, गुरदुम, मोहरी, झुनझुना जैसे वाद्य यंत्र पंचम स्वर तक पहुँच कर नए दोहा पारने के अंतराल तक रुके रहते हैं और दोहा पारते ही वाद्य के साथ रंग-बिरंगे लउठी और फरी (लोहे का कछुआ आकृति का ढ़ाल जिसके ऊपरी सिरे पर अंकुश होता है जो ढाल के साथ-साथ नजदीकी लड़ाई या आक्रमण या सुरक्षा के समय अस्र के रूप में उपयोग किया जाता है) के साथ योद्धा की मुद्रा में शौर्य नृत्य करते हैं।
राउत प्रकृति से शांत व गौसेवक के रूप में धार्मिक-सहिष्णु होते हैं। पहले अलग-अलग गोलों में नाचते हुए पुरानी रंजिश को लेकर पहले मातर, मड़ई आपस में खूब झगड़ा करते थे। आजकल मंचीय व्यवस्था होने से वे कम झगड़ते हैं। हाथ में लाठी व ढाल के अस्त्र उन्हें योद्धा का रूप देता है और वे दोहा और वाद्य यंत्रों के थाप पर आक्रमण और बचाव करने के नाना रूपों में शौर्य नृत्य करते हैं। पहले दैहान में खोड़हर गाड़कर मातर पूजन करते हुये लोग खोड़हर के चारों ओर घूमते हुये गोल या दल बना कर राउत नृत्य करते थे। तात्कालीन मंत्री स्व. बी. आर. यादव जी के प्रयास से १९७७ से बिलासपुर में राउत नृत्य का नया रूप सामने आय। जब विविध गाँवों से आए राउत नाचा दल गोल बिलासपुर में रउताई नृत्य करते हुए शनीचरी का चक्कर लगाते थे। उनमें व्यक्तिगत व सामूहिक दुश्मनी लड़ाई में बदल जाती थी। इस दुश्मनी को समाप्त करने सभी गोल के लोगों के पढ़े-लिखे प्रमुखों के मध्य एक बैठक कर इस नृत्य को एक सांस्कृतिक मंच का रूप दिया गया। मंच के लिए सार्वजनिक संस्कृति समिति गठितकर शहर कोतवाली के पास राउत नृत्य का आयोजन किया जाने लगा। स्थान कम पड़ने पर राउत नृत्य मंच का स्थान बदल कर लालबहादुर शास्त्री विद्यालय के मैदान में पहले लकड़ी का मंच और बाद में ईंट-सीमेंट का पक्का मंच बनाकर राउत नाचा आयोजित किया जाने लगा। एक समय इन गोलों की संख्या सौ से ऊपर तक पहुँच गई थी किंतु ग्रामीण नवयुवकों के शहर की ओर पलायन के कारण अब राउत नाचा का अभ्यास करने वाले लोग कम संख्या में मिलते हैं। आजकल लगभग पचास नृत्य गोल (दल) रह गए हैं। इन गोलों की वृद्धि एवं संरक्षण हेतु प्रयास किए जाना आवश्यक है।
छेरता पूष पुन्नी के दिन सुबह घर-घर जाकर छेर-छेरता (शाकंभरी माँ और वामन देव के रूप में) दान याचना कर, दानदाता गृहस्थ किसान को अन्न धन से भंडार भरने व क्लेश से बचे रहने का आशीर्वाद देते हैं। इन आयोजनों में बतौर सुरक्षा पुलिस साथ रहती है जो भीड़ नियंत्रण व लोगों के अनधिकृत प्रवेश पर रोक लगाती है। इससे बाहर से आनेवाले यादव समाज का एक वर्ग नाराज रहता है। ७२ वर्षीय डा. मंतराम यादव ने राउत नाचा को १९९२-९३ से सांस्कृतिक मंच अहीर नृत्य कला परिषद का गठन, साहित्य सृजन हेतु रउताही स्मारिका प्रकाशन तथा साहित्यकार सम्मान का कर नाराज व असंतुष्ट वर्ग को विश्वास में लेकर देवरहट में अहीर नृत्य मंच आरंभ किया। उनके दादा जी के पास लगभग चार सौ गायें थीं तब छुरिया कलामी, लोरमी के जंगलों में दैहान-गोठान में गाय रखते थे। सभी गायें देशी थीं तथा एक गाय एक से डेढ़ लीटर दूध देती थी। औषधीय घास पत्ते, जड़ी बूटी चरने के कारण उनका दूध पौष्टिक व रोह दूर करनेवाला होता था। उउनके पूर्वज नाथ पंथी थे। जंगली हिंसक पशुओं से बचने के लिए नाथपंथी मंत्र (साबर मंत्र) जो वशीकरण मंत्र होता था से अपनी रक्षा कर लेते थे। दादा जी वैदकी जानते थे और सामान्य रोगों जैसे लाल आँखी हो जाना आदि को फूँककर तथा एक थपरा (तमाचा) मारकर शर्तिया ठीक कर दिया करते थे। दादा जी पशुओं का भी इलाज करते थे। पशुधन की महामारी से रक्षा करने के लिए सावन के सोमवार व गुरुवार को गाँव बाँधते थे। बैगा के साथ लोहार सभी घर के दरवाजे पर लोहे की कील ठोंकते थे, राउत लोग नीम पत्ता की डंडी बाँधकर अभिमंत्रित दही-मही छींटते थे। कोठा में ठुँआ (अर्जुन के बारह नाम लिखकर) टाँगने का टोटका करते थे। ठुँआ में आग को मंत्र से बाँधकर उस पर नंगे पैर चलते हैं। जैसे ज्वाला देवी की आग से पानी उबलता है पर पानी गर्म नहीं लगता उसी तंत्र का प्रकारांतर है ठुँआ। उनके पिता जी बारह भाई-बहन में सबसे छोटे थे तथा उनके पास दंवरी करने के लिए पर्याप्त बैल थे। आज भी बिलासपुर स्थित उनके घर में सात गोधन हैं। आजकल बच्चों में गौ सेवा में रुझान कम हो होते जाना चिंता का विषय है। गौ सेवा आर्यधर्म होने के कारण सभी हिंदुओं व विशेष कर नाथ परंपरा का पवित्र कर्म है।
आजकल लोग गायों को हरी घास, पैरा, कुट्टी नहीं खिलाकर जूठन या रोटी सब्जी, दाल, फास्टफुड, बिस्किट, ब्रेड आदि कुछ भी खिलाकर गौ सेवा का भाव प्रदर्शित करते हैं। धनपुत्रों द्वारा गौ शालाओं के लिए होटलों से सौ रोटी बनवाकर गौ सेवा का पुण्य कमाने का अहं दिखाने के स्थान पर हरी घास प्रदाय की व्यवस्था की जाए तो शुद्ध आयुर्वेदिक दुग्ध व पवित्र गोबर की प्राप्ति हो तथा घसियारों (घास की खेती वकरने वालों) को रोजगार मिले। अन्न आदि भोजन का गौ स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। देशी भारतीय गाय व संकर नस्ल की विदेशी गायों के दुग्ध व गोबर की गुणवत्ता में अंतर साफ दिखता है जिसे आम उपभोक्ता नजरंदाज करते दिख रहे है। गोबर में मैत्रेय जैविक संरचना व परि शोधन गुण होता है तथा पवित्रता भावित गुण से युक्त होता है जबकि गौमल अपशिष्ट का दुर्गंधयुक्त हानिकारक विसर्जन होता है। जंगल में चरनेवाली देशी गाय और डेरियों से प्रदाय किए जानेवाले दूध का पान करें तो पहले से स्वाद, गाढ़ापन व तृप्ति का अनुभव होगा जबकि दूसरे में महक तथा पतलापन अनुभव होगा।
नाथ पंथ:
सनातनधर्म के बौद्ध, जैन, सिख, आदि पंथों प्राचीन नाथ पंथ है जिनमें प्रमुख नौ नाथ व चौरासी उपनाथों की परंपरा है। नाथ पंथ की शक्ति स्रोत शिव (केदारनाथ, अमरनाथ, भोलेनाथ, भैरवनाथ,गोरखनाथ आदि) हैं। कलियुग में नाथ पंथ के प्रसिद्ध गुरु गोरखनाथ (गोरक्षनाथ) हुए हैं। लोकश्रुति के अनुसार गुरु गोरखनाथ का जन्म बारह वर्ष की अवस्थावाले बालक के रूप में गौ गोबर से हुआ, वे योनिज (स्त्री से उत्पन्न) नहीं थे। उन्होंने गौरक्षा के लिए जन जागरण अभियान चलाया तथा इस कार्य को साहित्य संहिताबद्ध कर अनेक ग्रंथ भी लिखे जिनमें अमवस्क, अवधूत गीता, गौरक्षक कौमुदी, गौरक्ष चिकित्सा, गौरक्ष पद्धति, गौरक्ष शतक आदि प्रमुख हैं। गुरु गोरख नाथ हठयोग सिद्ध योगी थे तथा गुरु मत्स्येंद्र नाथ के मानस पुत्र व शिव भगवान के अवतार थे। काया कल्प संपूर्णता उपरांत उन्होने समाधि ले ली। गोरखपुर में गुरु गोरखनाथ का प्रसिद्ध मंदिर है जिसके परंपरागत महंत योगी आदित्यनाथ आजकल उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री हैं।
साबर:
साबर मंत्र सरल होते हैं जो नवनाथ द्वारा मानव कल्याण के लिए बनाए गए थे। आम लोगों के जीवन की दैविक, दैविक, भौतिक ताप या समस्याओं का शमन करनेवाले इन मंत्रों की संख्या लगभग सौ करोड़ हैं। इन्हें एकांत में शुद्ध मन से शुद्ध वातावरण में सिद्ध अर्थात प्रत्येक मंत्र के लिए निर्धारित संख्या में उच्चरित कर याद कर मंत्रमुग्ध या सिद्ध किया जाता है। इन मंत्रों का प्रयोग मानव कल्याण के उद्देश्य से ही करने के गुरु निर्देश हैं, इन मंत्रों का अनुचित प्रयोग से संबंधित व्यक्ति के लिए क्षतिकारक व विपरीत प्रभाव डालने वाला होता है। इस मंत्र की सिद्धि के लिए तर्पण, न्यास, अनुष्ठान, हवन जैसे कर्मकांड की आवश्यकता नहीं पड़ती है। किसी भी जाति, वर्ण, आयु, लिंग का व्यक्ति इसकी साधना कर सकता है। इन मंत्रों का उपयोग धन, शिक्षा, प्रगति, सफलता, व्यापार व जोखिम से बचने के लिए किया जाता है। इन मंत्रों को सिद्ध योगी धमकी देकर एवं अन्य श्रद्धा भाव से प्रयोग कर सकते हैं। गुरु गोरखनाथ जी की ज्ञानगोदरी प्राप्त करने के लिए पवित्र संकल्प के साथ गौ सेवा व नाथ सेवा करनी पड़ती है।
सर्वप्रभावी मंत्र:
"ओम गुरुजी को आदेश, गुरुजी को प्रणाम, धरती माता, धरती पिता, धरनी धरे न धीर बाजे, श्रींगी बाजे, तुरतुरी आया, गोरखनाथ मीन का पूत मुंज का छड़ा लोहे का कड़ा, हमारी पीठ पीछे यति हनुमंत खड़ा,शब्द सांवा पिंड काचास्फुरो मंत्र ईश्वरो वाचा। "
भैरव मंत्र:
ॐ आदि भैरव जुगाद भैरव, भैरव है सब थाई। भैरो ब्रह्मा,भैरो ही भोला साइन।।
बाधा हरण मंत्र:
"काला कलवा चौसठ वीर वेगी आज माई, के वीर अजर तोड़ो बजर तोड़ो किले का, बंधन तोड़ो नजर तोड़ मूठ तोड़ो,जहाँ से आई वहीं को मोड़ो। जल खोलो जलवाई। खोलो बंद पड़े तुपक का खोलो, घर दुकान का बंधन खोलो, बँधे खेत खलिहान खोलो, बँधा हुआ मकान खोलो, बँधी नाव पतवार खोलो। इनका काम किया न करे तो तुझको माता का दूध पिया हराम है।
माता पार्वती की दुहाई। शब्द सांचा फुरो मंत्र वाचा।"
गुरु गोरखनाथ मंत्र:
ॐ सोऽहं तत्पुरुषाय विद्यहे शिव गोरक्षाय धीमहि तन्नो गोरक्ष प्रचोदयात् ॐ।
विद्या प्राप्ति मंत्र:
ॐ नमो श्रीं श्रीं शश वाग्दाद वाग्वादिनी भगवती सरस्वती नमः स्वाहा। विद्या देहि मम ऋण सरस्वती स्वाहा।।
लक्ष्मी प्राप्ति मंत्र:
ॐ ॐ ऋं ऋं श्रीं श्रीं ॐ क्रीं कृं स्थिरं स्थिरं ॐ।
उल्लेखनीय है कि राउत नाचा करनेवाले कृष्णभक्तों और नाथ संप्रदाय के शिवभक्तों के मध्य शृद्ध-विश्वास का ताना-बाना सदियों से सामाजिक स्तर पर बना। पाश्चात्य शिक्षा प्रणाली से शिक्षित पीढ़ी मंत्र-तंत्र को त्याज्य व् अन्धविश्वास कहती है जबकि पुरानी पीढ़ी इनकी सत्यता प्रमाणित करती है। वस्तुत: किसी भी पारंपरिक विद्या परीक्षण किए बिना उसे ख़ारिज नहीं किया जाना चाहिए। राउतों द्वारा गौ के आहार पर दूध की गुणवत्ता व प्रभाव तथा शाबर मंत्रों के प्रभावों पर विज्ञान सम्मत शोध कार्य होना चाहिए। मन्त्रों का ध्वनि विज्ञान सिद्धांतों पर परिक्षण हो, उनके सामाजिक तथा वैयक्तिक प्रभाव का आकलन हो। राउत नाचा और गौपालन तथा गौ संरक्षण विद्या आधुनिक डेयरी प्रणाली के दुग्ध उत्पाद गुणवत्ता और प्रभाव पर परीक्षण जाएँ तो विज्ञान सम्मत निष्पक्ष निष्कर्ष पर सकेगा।
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पुस्तक सलिला-
'झील अनबुझी प्यास की' : गाथा नवगीती रास की
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[पुस्तक विवरण - झील अनबुझी प्यास की, नवगीत संग्रह, डॉ. रामसनेही लाल शर्मा 'यायावर', वर्ष २०१६, आकार डिमाई, आवरण सजिल्द जैकेट सहित, बहुरंगी, पृष्ठ १२८, मूल्य ३०० रु., उत्तरायण प्रकाशन, के ३९७ आशियाना कॉलोनी, लखनऊ २२६०१२, नवगीतकार संपर्क ८६ तिलक नगर, बाई पास रोड, फीरोजाबाद २८३२०३, चलभाष ९४१२३ १६७७९, dr.yayavar@yahoo.co.in ]
सरसता, सरलता, सहजता, सारगर्भितता तथा सामयिकता साहित्य को समय साक्षी बनाकर सर्वजनीन स्वीकृति दिलाती हैं। डॉ. रामसनेही लाल शर्मा यायावर और गीत का नाता इस निकष पर सौ टका खरा है। गीत, मुक्तक, दोहा, हाइकु, ग़ज़ल, कुण्डलिनी, निबंध, समीक्षा तथा शोध के बहुआयामी सृजन में निरंतर संलग्न यायावर जी की सत्रह प्रकाशित कृतियाँ उनके सर्जन संसार की बानगी देती हैं। विवेच्य कृति 'झील अनबुझी प्यास की' का शीर्षक ही कृति में अन्तर्निहित रचना सूत्र का संकेत कर देता है। प्यास और झील का नाता आवश्यकता और तृप्ति का है किन्तु इस संकलन के नवगीतों में केवल यत्र-तत्र ही नहीं, सर्वत्र व्याप्त है प्यास वह भी अनबुझी जिसने झील की शक्ल अख्तियार कर ली है। झील ही क्यों नदी, झरना या सागर क्यों नहीं? यहाँ नवगीतकार शीर्षक में ही अंतर्वस्तु का संकेत करता है। कृति के नवगीतों में आदिम प्यास है, यह प्यास सतत प्रयासों के बावजूद बुझ नहीं सकी है, प्यास बुझाने के प्रयास जारी हैं तथा ये प्रयास न तो समुद्र की अथाह हैं कि प्यास को डूबा दें, न नदी के प्रवाह की तरह निरंतर हैं, न झरने की तरह आकस्मिक है बल्कि झील की तरह ठहराव लिये हैं। झील की ही तरह प्यास बुझाने के प्रयासों की भी सीमा है जिसने नवगीतों का रूप ग्रहण कर लिया है।
डॉ. यायावर समाज में व्याप्त विसंगतियों और पारिस्थितिक वैषम्य को असहनीय होता देखकर चिंतित होते हैं, उनकी शिक्षकीय दृष्टि सर्व मंगल की कामना करती है। 'मातु वागीश्वरी / दूर कर शर्वरी / सृष्टि को / प्राण को / ज्योति दे निर्झरी / मन रहे इस मनुज का / सदा छलरहित / उज्ज्वलम्, उज्ज्वलम्'। डॉ. यायावर के लिये नवगीत ही नहीं सकल साहित्य साधना 'उज्ज्वलम्' की प्राप्ति का माध्यम है, वे क्रांति की भ्रान्ति से दूर सर्व मंगल की कामना करते हैं। सभ्यता, संस्कृति, संस्कार के सोपानों से मानवीय उत्थान-पतन को देख यायावर जी का नवगीतकार मन चिंतित होता है 'खिड़कियाँ खुलती नहीं / वातायनों में / राम गायब / आधुनिक रामायणों में / तख्त पर बैठे मिले / अंधे अँधेरे / जुगनुओं से हारते / उजले सवेरे / जान्हवी अब पंक से / धोई हुई है / क्या करें? / कैसे बचायें?' विसंगतियों से निराश न होकर कवि उपाय खोजने के लिये प्रवृत्त होता है।
नवगीत को खौलाती संवेदन की वर्ण-व्यंजना अथवा मोम के अश्व पर सवार होकर दहकते मैदान पर चक्कर लगाने के समान माननेवाले यायावर जी के नवगीतों में संवेदना, यथार्थ, सामाजिक सरोकार तथा संप्रेषणीयता के निकष पर खरे उतरने वाले नवगीतों में गीत से भिन्न कथ्य और शिल्प होना स्वाभाविक है। 'अटकी आँधियाँ / कलेजों में / चेहरों पर लटकी मायूसी / जन-मन विश्वास / ठगा सा है / कर गया तंत्र फिर जासूसी / 'मौरूसी हक़' पा जाने में / राजा फिर समर्थ हुआ'।
यायावर जी का प्रकृतिप्रेमी मन जीवन को यांत्रिकता के मोह-पाश में दम तोड़ते देख व्याकुल है- ' 'रोबोटों की इस दुनिया में / प्रेम कथायें / पागल हो क्या? / मल्टीप्लेक्स, मॉल, कॉलोनी / सेंसेक्स या सेक्स सनसनी / क्रिकेट, कमेंट्री, काल, कैरियर / टेररिज़्म या पुलिस छावनी / खोज रहे हो यहाँ समर्पण / की निष्ठाएँ / पागल हो क्या? / लज्जा-घूँघट, हँसता पनघट / हँसी-ठिठौली, कान्हा नटखट / भरे भवन संवाद आँख के / मान-मनौवल नकली खटपट / खोज रहे हो वही प्यार / विश्वास-व्यथाएँ / पागल हो क्या?' जीवन के दो चेहरों के बीच आदमी ही खो गया है और यही आदमी यायावर के नवगीतों का नायक अथवा वर्ण्य विषय है- 'ढूँढ़ते हो आदमी / क्या बावले हो? / इस शहर में? / माल हैं, बाजार हैं / कालोनिया हैं - ऊबते दिन रात की / रंगीनियाँ हैं / भीड़ में कुचली / मरीं संवेदनाएँ / ढूँढ़ते स्वर मातमी / क्या बावले हो? / इस शहर में?
ये विसंगतियाँ सिर्फ शहरों में नहीं अपितु गाँवों में भी बरक़रार हैं। 'खर-पतवारों के / जंगल ने / घेर लिया उपवन / आदमखोर लताएँ लिपटीं / बरगद-पीपल से / आती ही / भीषण बदबू / जूही के अंचल से / नीम उदासी में / डूबा है / आम हुआ उन्मन।' गाँव की बात हो और पर्यावरण की फ़िक्र न हो यह कैसे संभव है? आम हुआ उन्मन, पुरवा ने सांकल खटकाई, कान उमेठे हैं, मौसम हुआ मिहिरकुल, कहाँ बची, भीतर एक नदी शीर्षक नवगीतों में प्रकृति और पर्यावरण की चिंता मुखर हुई है।
कुमार रवीन्द्र के अनुसार 'नवगीत दो शब्दों 'नव' तथा 'गीत' के योग से बना है। अत:, जब गीत से नवता का संयोग होता है तो नवगीत कहा जाता है। गीत से छांदसिकता और गेयता तथा नव का अर्थ ऐसी नव्यता से है जिसमें युगबोध, यथर्थ-चिंतन, सामाजिक सरोकार और परिवेशगत संवेदना हो।' डॉ. यायावर के नवगीत आम आदमी की पक्षधरता को अपना कथ्य बनाते हैं। यह आम आदमी, शहर में हो या गाँव में, सुसंस्कृत हो या भदेस, सभ्य हो या अशिष्ट, शुभ करे या अशुभ, ऐश करे या पीड़ित हो नवगीत में केवल उपस्थित अवश्य नहीं रहता अपितु अपनी व्यथा-कथा पूरी दमदारी से कहता है। आस्था और सनातनता के पक्षधर यायावर जी धार्मिक पाखंडों और अंधविश्वासों के विरोध में नवगीत को हथियार की तरह इस्तेमाल करते हैं। 'गौरी माता, भोले शंकर / संतोषी मैया / सबका देंगे दाम / बताते हैं दलाल भैया / अंधी इस सुरंग के / भीतर है / लकदक दुनिया / बड़े चतुर हैं / बता रहे थे / पश्चिम के बनिया / तुमको तरह-तीन करेंगे / बड़े घाघ बनजारे हैं / गोधन-गोरस / गाय गोरसी / सबकी है कीमत / भाभी के घूँघट के बदले / देंगे पक्की छत / मंदिर की जमीन पर / उठ जायेगा / माल नया / अच्छे दिन आ गए / समझ लो / खोटा वक़्त गया / देखो / ये बाजार-मंडियां / सब इनके हरकारे हैं।'
वैश्वीकरण और बाज़ारीकरण से अस्त-व्यस्त-संत्रस्त होते जन-जीवन का दर्द-दुःख इन नवगीतों में प्रायः मुखरित हुआ है। बिक जा रामखेलावन, वैश्वीकरण पधारे हैं, इस शहर में, पागल हो क्या?, बाज़ार, क्षरण ही क्षरण बंधु आदि में यह चिंता दृष्टव्य है। मानवीय मनोवृत्तियों में परिवर्तन से उपजी विडंबनाओं को उकेरने के यायावर जी को महारथ हासिल है। धर्म और राजनीति दोनों ने आम जन की मनोवृत्ति कलुषित करने में अहं भूमिका निभायी है।यायावर जी की सूक्ष्म दृष्टि ने यह युग सत्य रजनीचर सावधान, खुश हुए जिल्लेसुभानी, आदमी ने बघनखा पहना, शल्य हुआ, मंगल भवन अमंगलहारी, सबको साधे, शेष कुशल है शीर्षक नवगीतों में व्यक्त किया है।सामाजिक मर्यादा भंग के स्वर की अभिव्यक्ति देखिए- ' घर में जंगल / जंगल में घर / केवल यही कथा / तोताराम असल में / तेरी-मेरी एक व्यथा / धृष्ट अँधेरे ने कल / सूरज बुरी तरह डाँटा / झरबेरी ने बूढ़े बरगद / को मारा चाँटा / मौसम आवारा था / लेकिन / ऐसा कभी न था।'
डॉ. यायावार हिंदी के श्रेष्ठ-ज्येष्ठ प्राध्यापक, शोध लेखक, शोध निर्देशक, समीक्षक हैं इसलिए उनका शब्द भण्डार अन्य नवगीतकारों से अधिक संपन्न-समृद्ध होना स्वाभाविक है। बतियाती, खौंखियाती, कड़खे, जिकड़ी, पुरवा, गुइयाँ, चटसार, नहान, विध्न, मैका, बाबुल, चकरघिन्नी, चीकट, सँझवाती, पाहुन, आवन, गलकटियों, ग्यावन, बरमथान, पिछौरी जैसे देशज शब्द, निर्झरी, उन्मन, दृग, रजनीचर, वैश्वीकरण, तमचर, रसवंती, अर्चनाएं, देवार्पित , निर्माल्य, वैकल्य, शुभ्राचार, साफल्य, दौर्बल्य, दर्पण, चीनांशुक, त्राहिमाम, मृगमरीचिका, दिग्भ्रमित, उद्ग्रीव, कार्पण्य, सहस्त्रार, आश्वस्ति, लाक्षाग्रह, सार्थवाह, हुताशन जैसे शुद्ध संस्कृतनिष्ठ शब्द, आदमखोर, बदबू, किस्से, जुनून, जिल्लेसुभानी, मुहब्बत, मसनद, जाम, ख्वाबघर, आलमपनाही, मनसबदार, नफासत, तेज़ाब, फरेब, तुनकमिजाजी, नाज़ुकखयाली, परचम, मंज़िल, इबारत, हादसा आदि उर्दू शब्द, माल, कार, कंप्यूटर, कमेंट्री, मल्टीप्लेक्स, कॉलोनी, सेंसेक्स, क्रिकेट, कमेंट्री, काल, कैरियर, टेरिरज़्म, फ्रिज, ओज़ोन, कैलेंडर, ब्यूटीपार्लर, पेंटिंग, ड्राइडन, ड्रेगन, कांक्रीट, ओवरब्रिज आदि अंग्रेजी शब्द अपनी पूर्ण अर्थवत्ता सहित गलबहियाँ डाले हैं. परिनिष्ठित हिंदी के आग्रहियों को ऐसे अहिन्दी शब्दों के प्रयोग पर आपत्ति हो सकती है जिनके प्रचलित हिंदी समानार्थी उपलब्ध हैं। अहिन्दी शब्दों का उपयोग करते समय उनके वचन या लिंग हिंदी व्याकरण के अनुकूल रखे गये हैं जैसे कॉलोनियों, रोबोटों आदि।
यायावर जी ने शब्द-युगलों का भी व्यापक प्रयोग किया है। मान-मनौअल, जन-मन, हँसी-ठिठोली, खट-मिट्ठी, जाना-पहचाना, राग-रंग, सुलह-संधि, छुई-मुई, व्यथा-वेदना, ईमान-धरम, सत्ता-भरम, लाज-शर्म, खेत-मड़ैया, प्यार-बलैया, अच्छी-खासी, चन-चबेना, आकुल-व्याकुल आदि शब्द युग्मों में दोनों शब्द सार्थक हैं जबकि लदा-फदा, आटर-वाटर, आत्मा-वात्मा, आँसू-वाँसू, ईंगुर-वींगुर, इज्जत-विज्जत आदि में एक शब्द निरर्थक है। लक-दक , हबड-तबड़ आदि ऐसे शब्द युग्म हैं जिनका अर्थ एक साथ रहने पर ही व्यक्त होता है अलग करने पर दोनों अंश अपना अर्थ खो देते हैं। बाँछें खिलना, राम राखे, तीन तेरह करना, वारे-न्यारे होना आदि मुहावरों का प्रयोग सहजता से किया गया है।
गुडाकेश ध्वनियाँ, पैशाचिक हुंकारें, मादक छुअन, अवतारी छवियाँ, फागुन की बातून हवाएँ, संवाद आँख के, समर्पण की निष्ठाएँ, सपनों की मरमरी कथाएं, लौह की प्राचीर, आँखों की कुटिल अँगड़ाइयाँ, कुरुक्षेत्र समर के शल्य, मागधी मंत्र जैसे मौलिक और अर्थवत्ता पूर्ण प्रयोग डॉ. यायावर की भाषिक सामर्थ्य के परिचायक हैं।केसरी खीर में कंकर की तरह कुछ मुद्रण त्रुटियाँ खटकती हैं। जैसे- खीज, छबि, वेबश, उद्वत आदि। 'सूरज बुरी तरह डाँटा' में कारक की कमी खलती है।
'समकालीन गीतिकाव्य: संवेदना और शिल्प' विषय पर डी. लिट. उपाधि प्राप्त यायावर जी का छंद पर असाधारण अधिकार होना स्वाभाविक है। विवेच्य कृति के नवगीतों में अभिनव छांदस प्रयोग इस मत की पुष्टि करते हैं। 'मंगलम्-मंगलम्' में महादैशिक, आम हुआ उन्मन में 'महाभागवत', रजनीचर सावधान में 'महातैथिक' तथा 'यौगिक', पागल हो क्या में 'लाक्षणिक' जातीय छंदों के विविध प्रकारों का प्रयोग विविध पंक्तियों में कुशलतापूर्वक किया गया है। मुखड़े और अंतरे में एक जाति के भिन्न छंद प्रयोग करने के साथ यायावर जी अँतरे की भिन्न पंक्तियों में भी भिन्न छंद का प्रयोग लय को क्षति पहुंचाए बिना कर लेते है जो अत्यंत दुष्कर है। 'इस शहर में' शीर्षक नवगीत में मुखड़ा यौगिक छंद में है जबकि तीन अंतरों में क्रमश: १२, ९, १२, ९, ९, १२ / १४, ७, १४, ७, १०, १८ तथा ७, ७, ७, ९, १२, २१ मात्रिक पंक्तियाँ है। कमाल यह कि इतने वैविध्य के बावजूद लय-भंग नहीं होती।
नवगीतों से रास रचाते यायावर जी विसंगति और विषमत तक सीमित नहीं रहते। वे नवशा एयर युग परिवर्तन का आवाहन भी करते हैं। जागेंगे कुछ / जागरण गीत / सोयेंगे हिंसा, घृणा, द्वेष / हो अभय, हँसेंगे मंगलघट / स्वस्तिक को / भय का नहीं लेश / देखेगा संवत नया कि / जन-मन / फिर से सबल-समर्थ हुआ, चलो! रक्त की इन बूंदों से / थोड़े रक्तकमल बोते हैं / महका हुए चमन होते हैं, तोड़नी होंगी / दमन की श्रंखलायें / बस तभी, आश्वस्ति के / निर्झर झरेंगे आदि अभिव्यक्तियाँ नवगीत की जनगीति भावमुद्रा के निकट हैं। चंदनगंधी चुंबन गीले / सुधाकुम्भ रसवंत रसीले / वंशी का अनहद सम्मोहन, गंध नाचती महुआ वैन में / थिरकन-सिहरन जागी मन में, नीम की कोंपल हिलातीं / मृदु हवाएँ / तितलियाँ भौरों से मिलकर / गुनगुनायें / रातरानी ने सुरभि का / पत्र भेजा, एक मुरली ध्वनि / मधुर आनंद से भरती रही / रास में डूबी निशा में / चाँदनी झरती रही / 'गीत' कुछ 'गोविन्द' के / कुछ भ्रमर के, आलिंगनों की / गन्धमय सौगात में / रात की यह उर्वशी / बाँहें पसारे आ गयी / चंद्रवंशी पुरुरवा की / देह को सिहरा गयी / नृत्यरत केकी युगल / होने लगे / सर्वस्व खोये जैसी श्रंगारिक अभिव्यक्तियों को नवगीतों में गूंथ पाना यायावर जी के ही बस की बात है।
नवगीत के संकीर्ण मानकों के पक्षधर ऐसे प्रयोगों पर भले ही नाक-भौंह सिकोड़ें नवगीत का भविष्य ऐसी उदात्त अभिव्यक्तियों से ही समृद्ध होगा। सामाजिक मर्यादाओं के विखंडन के इस संक्रमण काल में नवता की संयमित अबिव्यक्ति अपरिहार्य है। 'धनुर्धर गुजर प्रिया को / अनुज को ले साथ में / मूल्य, मर्यादा, समर्पण / शील को ले हाथ में' जैसी प्रेरक पंक्तियाँ पथ-प्रदर्शन करने में समर्थ हैं। नवगीत के नव मानकों के निर्धारण में 'झील अनबुझी प्यास की' के नवगीत महती भूमिका निभायेंगे।
९.१.२०१६
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तुम शब्द की संजीवनी का रूप अनूठा हो
शब्द जैसे सलिल सा बहता हुआ तुम्हीं हो
- पंकज त्रिवेदी
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हास्य सलिला:
याद
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कालू से लालू कहें, 'दोस्त! हुआ हैरान.
घरवाली धमका रही, रोज खा रही जान.
पीना-खाना छोड़ दो, वरना दूँगी छोड़.
जाऊंगी मैं मायके, रिश्ता तुमसे तोड़'
कालू बोला: 'यार! हो, किस्मतवाले खूब.
पिया करोगे याद में, भाभी जी की डूब..
बहुत भली हैं जा रहीं, कर तुमको आजाद.
मेरी भी जाए कभी प्रभु से है फरियाद..'
९.१.२०१४
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नवगीत:
निर्माणों के गीत गुँजाएँ ...
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चलो सड़क एक नयी बनाएँ,
निर्माणों के गीत गुँजाएँ...
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मतभेदों के गड्ढें पाटें,
सद्भावों की मुरम उठाएँ.
बाधाओं के टीले खोदें,
कोशिश-मिट्टी-सतह बिछाएँ.
निर्माणों के गीत गुँजाएँ...
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निष्ठा की गेंती-कुदाल लें,
लगन-फावड़ा-तसला लाएँ.
बढ़ें हाथ से हाथ मिलाकर-
कदम-कदम पथ सुदृढ़ बनाएँ.
निर्माणों के गीत गुँजाएँ...
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आस-इमल्शन को सींचें,
विश्वास गिट्टियाँ दबा-बिछाएँ.
गिट्टी-चूरा-रेत छिद्र में-
भर धुम्मस से खूब कुटाएँ.
निर्माणों के गीत गुँजाएँ...
*
है अतीत का लोड बहुत सा,
सतहें समकर नींव बनाएँ.
पेवर माल बिछाये एक सा-
पंजा बारंबार चलाएँ.
निर्माणों के गीत गुँजाएँ...
*
मतभेदों की सतह खुरदुरी,
मन-भेदों का रूप न पाएँ.
वाइब्रेशन-कोम्पैक्शन कर-
रोलर से मजबूत बनाएँ.
निर्माणों के गीत गुँजाएँ...
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राष्ट्र-प्रेम का डामल डालें-
प्रगति-पंथ पर रथ दौड़ाएँ.
जनगण देखे स्वप्न सुनहरे,
कर साकार, बमुलियाँ गाएँ.
निर्माणों के गीत गुँजाएँ..
*
श्रम-सीकर का अमिय पान कर,
पग को मंजिल तक ले जाएँ.
बनें नींव के पत्थर हँसकर-
काँधे पर ध्वज-कलश उठाएँ.
निर्माणों के गीत गुँजाएँ...
*
टिप्पणी:
१. इमल्शन = सड़क निर्माण के पूर्व मिट्टी-गिट्टी की पकड़ बनाने के लिए छिड़का जानेवाला डामल-पानी का तरल मिश्रण, पेवर = डामल-गिट्टी का मिश्रण समान समतल बिछानेवाला यंत्र, पंजा = लोहे के मोटे तारों का पंजा आकार, गिट्टियों को खींचकर गड्ढों में भरने के लिये उपयोगी, वाइब्रेटरी रोलर से उत्पन्न कंपन तथा स्टेटिक रोलर से बना दबाव गिट्टी-डामल के मिश्रण को एकसार कर पर्त को ठोस बनाते हैं, बमुलिया = नर्मदा अंचल का लोकगीत।
२. इस नवगीत की नवता सड़क-निर्माण की प्रक्रिया वर्णित होने में है।
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तसलीस (उर्दू त्रिपदी)
सूरज
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बिना नागा निकलता है सूरज,
कभी आलस नहीं करते देखा.
तभी पाता सफलता है सूरज..
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सुबह खिड़की से झाँकता सूरज,
कह रहा जग को जीत लूँगा मैं.
कम नहीं खुद को आंकता सूरज..
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उजाला सबको दे रहा सूरज,
कोई अपना न पराया कोई.
दुआएं सबकी ले रहा सूरज..
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आँख रजनी से चुराता सूरज,
बाँह में एक, चाह में दूजी.
आँख ऊषा से लड़ाता सूरज..
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जाल किरणों का बिछाता सूरज,
कोई चाचा न भतीजा कोई.
सभी सोयों को जगाता सूरज..
*
भोर पूरब में सुहाता सूरज,
दोपहर-देखना भी मुश्किल हो.
शाम पश्चिम को सजाता सूरज..
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काम निष्काम ही करता सूरज,
मंजिलें नित नयी वरता सूरज.
खुद पे खुद ही नहीं मरता सूरज..
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अपने पैरों पे ही बढ़ता सूरज,
डूबने हेतु क्यों चढ़ता सूरज?
भाग्य अपना खुदी गढ़ता सूरज..
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लाख़ रोको नहीं रुकता सूरज,
मुश्किलों में नहीं झुकता सूरज.
मेहनती है नहीं चुकता सूरज..
९-१-२०११
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हिंदी, स्वर, व्यंजन, वर्ण, लघु, गुरु, प्लुत, अनुस्वार, अनुनासिक,

विश्ववाणी हिंदी में स्वर-व्यंजन 
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हिंदी भाषा में ५२ वर्ण और १६ स्वर हैं, जबकि अंग्रेजी में इंग्लिश में केवल २६ वर्ण  हैं जिनमें ७ स्वर हैं। हिंदी में लिंग केवल दो हैं स्त्रीलिंग और पुल्लिंग, संस्कृत में ३ लिंग हैं स्त्रीलिंग, पुल्लिंग और नपुंसक लिंग जबकि अंग्रेजी में ४ लिंग हैं फेमिनिन जेंडर, मैसक्यूलाइन जेंडर, कॉमन जेंडर और न्यूट्रल जेंडर (स्त्रीलिंग, पुल्लिंग, उभय लिंग और नपुंसकलिंग)।  हिंदी में दो वचन (एक वचन और बहु वचन), संस्कृत में ३ वचन (एक वचन, द्वि वचन और बहु वचन) तथा अंग्रेजी में दो वचन (सिंगुलर और प्लूरल) होते हैं। हर भाषा की सुदीर्घ परंपरा, विशेषता और कमियाँ होती हैं जो उसे बोले जाने वाले क्षेत्र के लोगों की आवश्यकता, सभ्यता, संस्कृति, मौसम, प्रकृति, पर्यावरण, वनस्पति, पशु-पक्षी आदि से विकसित होती है। हर भाषा में उसका श्रेष्ठ साहित्य होता है। इसलिए किसी भाषा को हेय नहीं माना जाना चाहिए। हिंदी भाषा के तत्वों को समझें- 

वर्ण - वर्ण उस मूल ध्वनि को कहते हैं, जिसके खंड या टुकड़े नहीं किये जा सकते। जैसे- अ, ई, व, च, क, ख् इत्यादि। वर्ण भाषा की सबसे छोटी इकाई है, इसके और खंड नहीं किये जा सकते। उदाहरण द्वारा मूल ध्वनियों को यहाँ स्पष्ट किया जा सकता है। 'राम' और 'गया' में चार-चार मूल ध्वनियाँ हैं, जिनके खंड नहीं किये जा सकते- र + आ + म + अ = राम, ग + अ + य + आ = गया। इन्हीं अखंड मूल ध्वनियों को वर्ण कहते हैं। हर वर्ण की अपनी लिपि होती है। लिपि को वर्ण-संकेत भी कहते हैं। हिन्दी में ५२ वर्ण हैं।

वर्णमाला- किसी भाषा के समस्त वर्णो के समूह को वर्णमाला कहते हैै। प्रत्येक भाषा की अपनी वर्णमाला होती है। हिंदी व संस्कृत - अ, आ, क, ख, ग आदि, अंग्रेजी- A, B, C, D, E आदि, फारसी व उर्दू अलिफ़ बे पे ते टे से जीम दाल सीम काफ नून आदि ।  

वर्ण के भेद- हिंदी भाषा में वर्ण दो प्रकार के होते है।- (१) स्वर (vowel) (२) व्यंजन (Consonant)

(१) स्वर (vowel) :- वे वर्ण जिनके उच्चारण में किसी अन्य वर्ण की सहायता की आवश्यकता नहीं होती, स्वर कहलाता है। इसके उच्चारण में कंठ, तालु का उपयोग होता है, जीभ, होठ का नहीं। हिंदी वर्णमाला में १६ स्वर हैं। जैसे- अ आ इ ई उ ऊ ए ऐ ओ औ अं अः ऋ ॠ ऌ ॡ।

स्वर के भेद-  स्वर के दो भेद होते है- (१) मूल स्वर- अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ए, ओ (२) संयुक्त स्वर- ऐ (अ +ए) और औ (अ +ओ)

मूल स्वर के भेद- मूल स्वर के तीन भेद होते हैं- (१) ह्स्व स्वर (२) दीर्घ स्वर तथा (३) प्लुत स्वर। 

(१) ह्रस्व, लघु या छोटा स्वर :- जिन स्वरों के उच्चारण में कम समय लगता है उन्हें ह्स्व स्वर कहते है। ह्स्व स्वर पाँच होते है- अ इ उ ऋ। इनकी एक मात्रा गिनी जाती है। 'ऋ' की मात्रा (ृ) के रूप में लगाई जाती है तथा उच्चारण 'रि' की तरह होता है।

(२) दीर्घ, गुरु या बड़ा स्वर :-वे स्वर जिनके उच्चारण में ह्रस्व स्वर से दोगुना समय लगता है, वे दीर्घ स्वर कहलाते हैं। जिन स्वरों केउच्चारण में अधिक समय लगता है उन्हें दीर्घ स्वर कहते हैं। इनकी २ मात्रा गिनी जाती हैं। हिंदी में दीर्घ स्वर सात हैं- आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ। दीर्घ स्वर दो शब्दों के योग से बनते हैं। जैसे- आ =(अ +अ ), ई =(इ +इ ), ऊ =(उ +उ ), ए =(अ +इ ), ऐ =(अ +ए ), ओ =(अ +उ ), औ =(अ +ओ)।

(३) प्लुत स्वर :-वे स्वर जिनके उच्चारण में दीर्घ स्वर से भी अधिक समय यानी तीन मात्राओं का समय लगता है, प्लुत स्वर कहलाते हैं। सरल शब्दों में- जिस स्वर के उच्चारण में तिगुना समय लगे, उसे 'प्लुत' कहते हैं। इसका चिह्न (ऽ) है। इसका प्रयोग अकसर पुकारते समय किया जाता है। जैसे- सुनोऽऽ, राऽऽम, ओऽऽम्। हिन्दी में साधारणतः प्लुत का प्रयोग नहीं होता। वैदिक संस्कृत, निमाड़ी -मलवी बोलियों आदि में प्लुत स्वर का प्रयोग अधिक हुआ है। इसे 'त्रिमात्रिक' स्वर भी कहते हैं। हिंदी में ॐ/ओम्  त्रिमात्रिक है। 

अनुस्वार-विसर्ग- अं, अः अयोगवाह कहलाते हैं। वर्णमाला में इनका स्थान स्वरों के बाद और व्यंजनों से पहले होता है। अं को अनुस्वार तथा अः को विसर्ग कहा जाता है।

अनुनासिक, निरनुनासिक, अनुस्वार और विसर्ग

अनुनासिक, निरनुनासिक, अनुस्वार और विसर्ग- हिन्दी में स्वरों का उच्चारण अनुनासिक और निरनुनासिक होता हैं। अनुस्वार और विसर्ग व्यंजन हैं, जो स्वर के बाद, स्वर से स्वतंत्र आते हैं। 

अनुनासिक (ँ)- ऐसे स्वरों का उच्चारण नाक और मुँह से होता है और उच्चारण में लघुता रहती है। जैसे- गाँव, दाँत, आँगन, साँचा इत्यादि।

अनुस्वार ( ं)- यह स्वर के बाद आनेवाला व्यंजन है, जिसकी ध्वनि नाक से निकलती है। जैसे- अंगूर, अंगद, कंकन।

निरनुनासिक- केवल मुँह से बोले जानेवाला सस्वर वर्णों को निरनुनासिक कहते हैं। जैसे- इधर, उधर, आप, अपना, घर इत्यादि।

विसर्ग( ः)- अनुस्वार की तरह विसर्ग भी स्वर के बाद आता है। यह व्यंजन है और इसका उच्चारण 'ह' की तरह होता है। संस्कृत में इसका काफी व्यवहार है। हिन्दी में अब इसका अभाव होता जा रहा है; किन्तु तत्सम शब्दों के प्रयोग में इसका आज भी उपयोग होता है। जैसे- मनःकामना, पयःपान, अतः, स्वतः, दुःख इत्यादि।

टिप्पणी- अनुस्वार और विसर्ग न तो स्वर हैं, न व्यंजन; किन्तु ये स्वरों के सहारे चलते हैं। स्वर और व्यंजन दोनों में इनका उपयोग होता है। जैसे- अंगद, रंग। इस सम्बन्ध में आचार्य किशोरीदास वाजपेयी का कथन है कि ''ये स्वर नहीं हैं और व्यंजनों की तरह ये स्वरों के पूर्व नहीं पश्र्चात आते हैं, ''इसलिए व्यंजन नहीं। इसलिए इन दोनों ध्वनियों को 'अयोगवाह' कहते हैं।'' अयोगवाह का अर्थ है- योग न होने पर भी जो साथ रहे।

अनुस्वार और अनुनासिक में अन्तर

अनुनासिक के उच्चारण में नाक से बहुत कम साँस निकलती है और मुँह से अधिक, जैसे- आँसू, आँत, गाँव, चिड़ियाँ इत्यादि। अनुनासिक स्वर की विशेषता है, अर्थात अनुनासिक स्वरों पर चन्द्रबिन्दु लगता है। लेकिन, अनुस्वार एक व्यंजन ध्वनि है।
अनुस्वार की ध्वनि प्रकट करने के लिए वर्ण पर बिन्दु लगाया जाता है। तत्सम शब्दों में अनुस्वार लगता है और उनके तद्भव रूपों में चन्द्रबिन्दु लगता है ; जैसे- अंगुष्ठ से अँगूठा, दन्त से दाँत, अन्त्र से आँत। इसकी एक मात्रा गिनी जाती है। 

अनुस्वार के उच्चारण में नाक से अधिक साँस निकलती है और मुख से कम, जैसे- अंक, अंश, पंच, अंग इत्यादि। इसकी २ मात्रा गिनी जाती हैं 

(2) व्यंजन (Consonant):- जिन वर्णो को बोलने के लिए स्वर की सहायता लेनी पड़ती है उन्हें व्यंजन कहते हैं। व्यंजन उन वर्णों को कहते हैं, जिनके उच्चारण में स्वर वर्णों की सहायता ली जाती है। 'क' से विसर्ग ( : ) तक सभी वर्ण व्यंजन हैं। प्रत्येक व्यंजन के उच्चारण में 'अ' की ध्वनि छिपी रहती है। 'अ' के बिना व्यंजन का उच्चारण सम्भव नहीं। जैसे- क् + अ = क,  ख्+अ=ख, प्+अ =प आदि। व्यंजन वह ध्वनि है, जिसके उच्चारण में भीतर से आती हुई वायु मुख में कहीं-न-कहीं, किसी-न-किसी रूप में, बाधित होती है। स्वर वर्ण स्वतंत्र और व्यंजन वर्ण स्वर पर आश्रित है। हिन्दी में व्यंजन वर्णो की संख्या ३३ है।

व्यंजनों के प्रकार - व्यंजन तीन प्रकार के होते है- (1)स्पर्श व्यंजन, (2)अन्तःस्थ व्यंजन तथा (3)उष्म व्यंजन । 

(1)स्पर्श व्यंजन :- स्पर्श का अर्थ होता है -छूना। जिन व्यंजनों का उच्चारण करते समय जीभ मुँह के किसी भाग जैसे- कण्ठ, तालु, मूर्धा, दाँत, अथवा होठ का स्पर्श करती है, उन्हें स्पर्श व्यंजन कहते है। ये कण्ठ, तालु, मूर्द्धा, दन्त और ओष्ठ स्थानों के स्पर्श से बोले जाते हैं। इसी से इन्हें स्पर्श व्यंजन या 'वर्गीय व्यंजन' कहते हैं; क्योंकि ये उच्चारण-स्थान की अलग-अलग एकता लिए हुए वर्गों में विभक्त हैं। इनकी संख्या २५ है। 
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