कुल पेज दृश्य

मंगलवार, 21 जनवरी 2020

नवगीत

नवगीत:
संजीव
उड़ चल हंसा
मत रुकना
यह देश पराया है
.
ऊपर-नीचे बादल आये
सूर्य तरेरे आँख, डराये
कहीं स्वर्णिमा, कहीं कालिमा
भ्रमित न होना
मत मुड़ना
यह देश सुहाया है
.
पंख तने हों ऊपर-नीचे
पलक न पल भर अँखियाँ मीचे
ऊषा फेंके जाल सुनहरा
मुग्ध न होना
मत झुकना
मत सोच बुलाया है
.

एक दूसरे को नित कोसें
भत्ते बढ़वा पालन-पोसें
वादों को जुमला कह ठगते
नोटा अपना
बेच नहीं मत
तंत्र पराया है
.

छंद - बहर दोउ एक हैं विधाता मात्रिक छंद

छंद - बहर दोउ एक हैं
मुक्तिका 
*
तुझे भी क्या कभी गुजरे ज़माने याद आएँगे
मापनी - १२२२ १२२२ १२२२ १२२२
गणसूत्र - य र त म य ग
मात्रभार - २८, यौगिक जातीय, विधाता मात्रिक  छंद
वर्णभार - १६, अष्टादि: जातीय छंद
रुक्न - मुफाईलुं  x  ४ 
टीप : 'गुजरे' को 'बीते' करने पर १२२२ के स्थान पर १२११२ करने से बचा जा सकता है।
गुरु को दो लघु करने की छूट लेने पर काव्य रचना आसान हो जाती है पर पिंगल शास्त्र
के अनुसार ऐसा करने पर उन पंक्तियों में छंद भिन्न हो जाता है।
  
*
तुझे भी क्या कभी गुजरे ज़माने याद आएँगे
मिलें तन्हाईयाँ सपने सुहाने याद आएँगे

करोगे गुफ्तगू खुद से कभी तो जान लो जानां 
लिखोगे मुक्तिका  दोहे  तराने याद आएँगे

बहाओगे पसीना, बादलों में देखना हमको
हँसेंगी खेत में फ़स्लें बहाने याद आएँगे

इसे देखो दिखा उसको न वो दिन अब रहे बाकी
नए साधो न तुम बीते निशाने याद आएँगे

न तुमसे दूर हैं, तुम भी न हमसे दूर हो यारां
हमें तुम याद आओगे, तुम्हें हम याद आएँगे
***
तुझे भी क्या कभी बीते ज़माने याद आएँगे
नहीं जो साथ वो भूले ज़माने याद आएँगे

हमेशा प्यार ही पाओ नहीं होता कभी ऐसा
न चाहो तो नहीं झूठे ज़माने याद आएँगे

नदी ने प्यास से पूछा कहाँ क्या दाम वो देगी?
लुटा दी तृप्ति पाने आ  जमाने याद आएँगे

मिलेगा साथ साथी का न सच्चा आप खोजोगे
न चाहोगे जिसे वो ही जमाने याद आएँगे

न भूली हो, न भूलोगी, कहो या ना कहो प्यारी
रहे संजीव जो वो ही जमाने याद आएँगे
***
संजीव
२१.१.२०१०
७९९९५५९६१८

लघुकथा

फ़ोटो का कोई वर्णन उपलब्ध नहीं है.

विश्व विवाह दिवस

विश्व विवाह दिवस पर
*
विवाह के बाद पति-पत्नि एक सिक्के के दो पहलू हो जाते हैं, वे एक दूसरे का सामना नहीं कर सकते फिर भी एक साथ रहते हैं। - अल गोर
*
जैसे भी हो शादी करो। यदि अच्छी बीबी हुई तो सुखी होगे, यदि बुरी हुई तो दार्शनिक बन जाओगे। - सुकरात
*
महिलाएँ हमें महान कार्य करने हेकु प्रेरित करती हैं और उन्हें प्राप्त करने से हमें रोकती हैं।
- माइक टायसन
*
मैं ने अपनी बीबी से कुछ शब्द कहे और उसने कुछ अनुच्छेद।
- बिल क्लिंटन
*
इलैक्ट्रॉनिक बैंकिंग से भी अधिक तेजी से धन निकालने का एक तरीका है। उसे शादी कहते हैं। - माइकेल जॉर्डन
*
एक अच्छी बीबी हमेशा अपने शौहर को माफ कर देती है जब वह गलत होती है।
- बराक ओबामा
*
जब आप प्रेम में होते हैं तो आश्चर्य होते रहते हैं। किंतु एक बार आपकी शादी हुई तो आप आश्चर्य करते हैं क्या हुआ?
*
और अंत में सर्वोत्तम
शादी एक सुंदर वन है जिसमें बहादुर शेर सुंदर हिरणियों द्वारा मारे जाते हैं।
*

ब्राह्मण के लक्शण

भविष्यपुराण से
*
ब्राह्मण के लक्शण-
संस्कार ही ब्रह्त्व प्राप्ति का मुख्य कारण है। जिस ब्राह्मण के वेदादि शास्त्रों में निर्दिष्ट गर्भाधान, पुंसवन आदि ४८ संस्कार विधिपूर्वक हुए हों, वही ब्राह्मण ब्रह्मलोक और ब्रह्मत्व को प्राप्त करता है।
४८ संस्कार - गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, नामकरण, अन्नप्राशन, चूड़ाकर्म, उपनयन, ४ वेदव्रत, वेदस्नान, विवाह, पंचमहायग्य (जिनसे देवता, पितरों, मनुष्य, भूत और ब्रह्म तृप्त हों), सप्तपाक यग्य (संस्था, अष्टकाद्वय, पार्वण, श्रावणी, आग्रहायणी, चैत्री या शूलगव तथा अाश्वयुजी), सप्तविर्यग्य (संस्था, अग्न्याधान, अग्निहोत्र, दर्श पौर्णमास, चातुर्मास्य, निरूढ-पशुबंध, सौत्रामणी) और सप्तसोम (संस्था-अग्निष्टोम, अत्यग्निष्टोम, उक्थ्य। षोडशी, वाजपेय, अतिरात्र व आप्तोर्याम) तथा ८ आत्मगुण (अनसूया-दूसरों के गुणों में दोष-बुद्धि न रखना, दया-परदुख दूर करने की इच्छा, क्शांति-क्रोध व वैर न करना, अनायास-सामान्य बात के लिए जान की बाजी न लगाना, मंगल-मांगलिक वस्तुओं का धारण, अकार्पण्य-दीन वचन न बोलना व अति कृपण न बनना, शौच-बाह्यभ्यंतर की शुद्धि तथा अस्पृहा-परधन की इच्छा न रखना।) ।

ओशो उवाच बुद्धपुरूषों का बुद्धत्‍व

*ओशो उवाच 
बुद्धपुरूषों का बुद्धत्‍व के बाद दुबारा जन्म क्यों नहीं होता है?
*
ओशो: जरूरत नहीं रह जाती। जन्‍म अकारण नहीं है, जन्‍म शिक्षण है। जीवन एक परीक्षा है, पाठशाला है। यहां तुम आते हो, क्‍योंकि कुछ जरूरत है। बच्चे को हम स्‍कूल भेजते है, पढने लिखने,समझने—बुझने; फिर जब वह सब परीक्षाएं उत्तीर्ण हो जाता है, फिर तो नहीं भेजते। फिर वह अपने घर आ गया। फिर भेजने की कोई जरूरत न रही।
परमात्मा घर है—सत्य कहो, निर्वाण कहो, मोक्ष कहो—संसार विद्यालय है। वहां हम भेजे जाते हैं, ताकि हम परख लें, निरख लें, कस लें कसौटी पर अपने को सुख—दुख की आंच में, सब तरह के कडुवे —मीठे अनुभव से गुजर लें और वीतरागता को उपलब्ध हो जाएं। सब गंवा दें, सब तरफ से भटक जाएं, दूर—दूर अंधेरों में, अंधेरी खाइयों—खड्डों में सरके, सत्य से जितनी दूरी संभव हो सके निकल जाएं और फिर बोध से वापस लौटें।
बच्चा भी शांत होता, निर्दोष होता; संत भी शांत होता, निर्दोष होता। लेकिन संत की निर्दोषता में बड़ा मूल्य है, बच्चे की निर्दोषता में कोई खास मूल्य नहीं है। यह निर्दोषता जो बच्चे की है, मुफ्त है, कमायी हुई नहीं है। यह आज है, कल चली जाएगी। जीवन इसे छीन लेगा। संत की जो निर्दोषता है, इसे अब कोई भी नहीं छीन सकता। जो—जो घटनाएं छिन सकती थीं, उनसे तो गुजर चुका संत। इसलिए परमात्मा को खोना, परमात्मा को ठीक से जानने के लिए अनिवार्य है। इसलिए हम भेजे जाते हैं।
बुद्धपुरुष को तो भेजने की कोई जरूरत नहीं, जब फल पक जाता है तो फिर डाली से लटका नहीं रहता, फिर क्या लटकेगा! किसलिए? वृक्ष से लटका था पकने के लिए। धूप आयी, सर्दी आयी, वर्षा आयी, फल पक गया, अब वृक्ष से क्यों लटका रहेगा! कच्चे फल लटके रहते हैं। बुद्ध यानी पका हुआ फल।
छोड़ देती है डाल
रस भरे फल का हाथ
किसी और कसैले फल को
मीठा बनाने के लिए
छोड़ ही देना पड़ेगा। वृक्ष छोड़ देगा पके फल को, अब क्या जरूरत रही! फल पक गया, पूरा हो गया, पूर्णता आ गयी। बुद्धत्व का अर्थ है, जो पूर्ण हो गया। दुबारा लौटने का कोई कारण नहीं।
हमारे मन में सवाल उठता है कभी—कभी, क्योंकि हमें लगता है, जीवन बडा मूल्यवान है। यह तो बड़ी उलटी बात हुई कि बुद्धत्व को उपलब्ध व्यक्ति को फिर जीवन नहीं मिलता। हमें लगता है, जीवन बहुत मूल्यवान है। बुद्धत्व को जो उपलब्ध है, उसे तो पता चल गया और बड़े जीवन का, और विराट जीवन का।
ऐसा ही समझो कि तुम शराबघर जाते थे रोज, फिर एक दिन भक्तिरस लग गया, फिर मंदिर में नाचने लगे, डोलने लगे, फिर प्रभु की शराब पी ली, अब शराबघर नहीं जाते। शराबी सोचते होंगे कि बात क्या हो गयी! ऐसी मादक शराब को छोड्कर यह आदमी कहां चला गया? अब आता क्यों नहीं?
इसे बडी शराब मिल गयी, अब यह आए क्यों? इसे असली शराब मिल गयी, अब यह नकली के पास आए क्यों? इसे ऐसी शराब मिल गयी जिसको पीकर फिर होश में आना ही नहीं पड़ता। और इसे एक ऐसी शराब मिल गयी जिसमें बेहोशी भी होश है। अब यह इस क्षुद्र सी शराब को पीने क्यों आए?
बुद्धत्व को पाया व्यक्ति परम सागर में डूब गया। जिसकी तुम तलाश करते थे, जिस आनंद की, वह उसे मिल गया, अब वह यहां क्यों आए? यह जीवन तो कच्चे फलों के लिए है, ताकि वे पक जाएं, परिपक्य हो जाएं। इस जीवन के सुख—दुख, इस जीवन की पीड़ाएं, इस जीवन के आनंद, जो कुछ भी है, वह हमें थपेड़े मारने के लिए है, चोटें मारने के लिए है।
देखा, कुम्हार घड़ा बनाता है, घड़े को चोटें मारता है। एक हाथ भीतर रखता है, एक हाथ बाहर रखता, चाक पर घड़ा घूमता और वह चोटें मारता! फिर जब घड़ा बनकर तैयार होगा, चोटें बंद कर देता है; फिर घड़े को आग में डाल देता है। फिर जब घड़ा पक गया, तो न चोट की जरूरत है, न आग में डालने की जरूरत है। संसार में चोटें हैं और आग में डाला जाना है। जब तुम पक जाओगे, तब प्रभु का परम रस तुममें भरेगा। तुम पात्र बन जाओगे, तुम घड़े बन जाओगे, फिर कोई जरूरत न रह जाएगी।
*ओशो*

भारतीय कालगणना

भारतीय कालगणना
१८ निमेष = १ काष्ठा
३० काष्ठा = १ कला
३० कला = १ क्शण
१२ क्शण = १ मुहूर्त
३० मुहूर्त = १ दिन-रात
३० दिन रात = १ माह
२ माह = १ ऋतु
३ ऋतु = १ अयन
२ अयन = १ वर्ष
१२ वर्ष = १ युग
१ माह = पितरों का दिन-रात
१ वर्ष = देवों का दिन-रात
युग। दिव्य वर्ष - सौर वर्ष
सत = ४८०० - १७२८०००
त्रेता = ३६०० - १२९६०००
द्वापर = २४०० - ८६४०००
कलि = १२०० - ४३२००००
एक महायुग = १२००० दिव्य वर्ष = ४३,२०,००० वर्ष = १ देवयुग
१००० देवयुग = १ ब्रह्म दिन या ब्रह्म रात्रि
७१ दिव्य युग = १ मन्वन्तर
१४ मन्वन्तर = १ ब्रह्म दिन
*
ब्रह्मा जागने पर सतासत रूपी मन को उत्पन्न करते हैं। मन विकारी होकर सृष्टि रचना हेतु क्रमश: आकाश (गुण शब्द), गंध वहनकर्ता वायु (गुण स्पर्श), तमनाशक प्रकाशयुक्त तेज (गुण रूप), जल (गुण रस) तथा पृथ्वी (गुण गंध) उत्पन्न होती है।
*

संध्या सिंह

नवगीतकार संध्या सिंह को
फेसबुक द्वारा ऑथर माने जाने पर प्रतिक्रिया

संध्या को ऑथर माना मुखपोथी जी
या सिंह से डर यश गाया मुखपोथी जी
फेस न बुक हो जाए लखनऊ थाने में
गुपचुप फेस बचाया है मुखपोथी जी
लाजवाब नवगीत, ग़ज़ल उम्दा लिखतीं
ख्याल न अब तक क्यों आया मुखपोथी जी
जुड़ संध्या के साथ बढ़ाया निज गौरव
क्यों न सैल्फी खिंचवाया मुखपोथी जी
है "मुखपोथी रत्न" ठीक से पहचानो
कद्र न करना आया है मुखपोथी जी
फेस "सलिल" में देख कभी "संजीव" बनो
अब तक समय गँवाया है मुखपोथी जी
तुम से हम हैं यह मुगालता मत पालो
हम से तुम हो सच मानो मुखपोथी जी
*
संजीव
१९-१-२०
७९९९५५९६१८

लघुकथा

लघुकथा-
निर्दोष
*
उसने मनोरंजन के लिए अपने साथियों सहित जंगल में विचरण कर रहे पशुओं का वध कर दिया.
उसने मदहोशी में सडक के किनारे सोते हुए मनुष्यों को कार से कुचल डाला.
पुलिस-प्रशासन के कान पर जून नहीं रेंगी. जन सामान्य के आंदोलित होने और अखबारबाजी होने पर ऐसी धाराओं में वाद स्थापित किया गया कि जमानत मिल सके.
अति कर्तव्यनिष्ठ न्यायालय ने अतिरिक्त समय तक सुनवाई कर तत्क्षण फैसला दिया और जमानत के निर्णय की प्रति उपलब्ध कराकर खुद को धन्य किया.
बरसों बाद सुनवाई आरम्भ हुई तो एक-एक कर गवाह मरने या पलटने लगे.
दिवंगतों के परिवार चीख-चीख कर कहते रहे कि गवाहों को बचाया जाए पर कुछ न हुआ.
अंतत:, पुलिस द्वारा लगाये गए आरोप सिद्ध न हो पाने का कारण बताते हुए न्यायालय ने उसे घोषित कर दिया निर्दोष.
***

कल्पना

एक रचना
कल्पना
*
जन्म दिन 

कब कल्पना का?
प्रश्न कौन बूझेगा?
पूछता यथार्थ से मैं
उसे कुछ न सूझेगा।
कल्पना अजन्मी है
अनादि है, अनंत है।
श्वास-श्वास व्याप्त प्रिया
आस-आस कंत है।
कलप ना, सदा खुश हो
कल-पना ले आज ने
काल को बताया है
कल्पना अनंत है
***

एक रचना - शाल

एक रचना
पाई शाल
*
बड़े भाग से पाई शाल
हम लपेट बैठे खुशहाल
*
हुई प्रेरणा खीचें चित्र
भले आपको लगे विचित्र
*
चली कानपुर से चुपचाप
आई जबलपुर अपने आप
*
गंग-नर्मदा सेतु बनी
ह्रद-ऊष्मा से सनी-सनी
*
ठंड न लगने देगी यह
नेहिल नदी लहर सम बह
*
लड्डू, तिल-गुड़ गजक मधुर
खाकर हर्षित हम जी भर
*
सब दुनिया है दोरंगी
समझे तो मति हो चंगी
*

सरस्वती

स्तवन
*
सरस्वती शारद ब्रम्हाणी!
जय-जय वीणा पाणी!!
*

अमल-धवल शुचि,
विमल सनातन मैया!
बुद्धि-ज्ञान-विज्ञान
प्रदायिनी छैंया।
तिमिरहारिणी,
भयनिवारिणी सुखदा,
नाद-ताल, गति-यति
खेलें तव कैंया।
अनहद सुनवाई दो कल्याणी!
जय-जय वीणापाणी!!
*
स्वर, व्यंजन, गण,
शब्द-शक्तियां अनुपम।
वार्णिक-मात्रिक छंद
अनगिनत उत्तम।
अलंकार, रस, भाव,
बिंब तव चारण।
उक्ति-कहावत, रीति-
नीति शुभ परचम।
कर्मठ विराजित करते प्राणी
जय-जय वीणापाणी!!
*
कीर्ति-गान कर,
कलरव धन्य हुआ है।
यश गुंजाता गीत,
अनन्य हुआ है।
कल-कल नाद प्रार्थना,
अगणित रूपा,
सनन-सनन-सन वंदन
पवन बहा है।
हिंदी हो भावी जगवाणी
जय-जय वीणापाणी!!
***

सबरीमाला

एक रचना
सबरीमाला
*
सबरीमाला केंद्र है,
जनगण के विश्वास का।
नर-नारी के साम्य का,
ईश्वर के अहसास का
*
जो पतितों को तारता,
उससे दूर न कोई रहे-
आयु-रंग प्रतिबंध न हो,
हर जन हरिजन व्यथा कहे।।
अन्धकार में देवालय
स्रोत अनंताभास का
*
बना-बदलता परंपरा,
मानव जड़ता ठीक नहीं।
लिंग-भेद हो पूजा में,
सत्य ठीक यह लीक नहीं।
राजनीति ही कारन है,
मानव के संत्रास का
*
पोंगापंथी दूर करें,
एक समान सभी संतान।
अन्धी श्रद्धा त्याज्य सखे!
समता ईश्वर का वरदान।।
आरक्षण कारण बनता
सदा विरोधाभास का
***
२०-१-२०१९
संजीव, ७९९९५५९६१८

विजाति छंद

छंद शाला
* विजाति छंद
* मापनी-१२२२ १२२२
*सूत्र -यरगग
*
निहारा क्या?
गुहारा क्या?
कहो क्या साथ लाया था?
कहो क्या साथ जायेगा?
रहेंगे हाथ खाली ही -
न कोई साथ आयेगा
बनाया क्या?
बिगाड़ा क्या?
न कोई गीत है तेरा
न कोई मीत है तेरा
सुनेगा बात ना कोई
लगेगा व्यर्थ ही टेरा
अँधेरा क्या?
सवेरा क्या?
तुझे तेरे भुला देंगे
सगे साथी जला देंगे
कहेंगे तेरही तेरी
मँगा मीठा मजा लेंगे
हमारा क्या?
तुम्हारा क्या?
*
संजीव
७९९९५५९६१८
२०-१-२०२०

नवगीत

नवगीत
*
रहे तपते गर्मियों में
बारिशों में टपकते थे
सर्दियों में हुए ठन्डे
रौशनी गायब हवा
आती नहीं है
घोंसलें है कॉन्क्रीटी
घुट रही दम
हवा तक दूभर हुई है
सोम से रवि तक न अंतर
एक से सब डे
श्वास नदिया सूखती
है नहीं पानी
आस घाटों पर न मेले
नहीं हलचल
किंतु हटने को नहीं
तैयार तिल भर भी यहाँ से
स्वार्थ के पंडे
अस्पताली तीर्थ पर है
जमा जमघट
पीडितों का, लुटेरों का
रात-दिन नित
रोग पहचाने बिना
परीक्षण-औषधि अनेकों
डॉक्टरी फंडे
***
संजीव
२०-१-२०२०
७९९९५५९६१८

सोमवार, 20 जनवरी 2020

अनुप्रिया के जन्मदिन पर

अनुप्रिया के जन्मदिन पर
गीत
*
बिंदु-बिंदु सूरज बन चमके
*
माथे पर हो या कागज़ पर
बिंदु बिंदु सूरज बन चमके
रेखा-रेखा में जीवन हो
वर्तुल-वृत्त उमंग भरे हों
आकारों में निराकार हो
साकारों से रंग झरे हों
हर निर्मिति में भाव बिम्ब रस
अनायास मोती सम दमके

जिया जिया में अनुप्रिया हो
अनुप्रिया में भाव तरंग
रंग रंग वैभव दर्शाये
एक रंग में अनगिन रंग
जंग देख रंगों की खुश हों
चंन्गे हों ब्रश, कूची तंग
जीव जीव संजीव हो सके
हँसे चीर कर मेघा गम के
***
संजीव
२०-१-२०२०
७९९९५५९६१८

नवगीत

नवगीत
*
रहे तपते गर्मियों में
बारिशों में टपकते थे
सर्दियों में हुए ठन्डे

रौशनी गायब हवा
आती नहीं है
घोंसलें है कॉन्क्रीटी
घुट रही दम
हवा तक दूभर हुई है
सोम से रवि तक न अंतर
एक से सब डे


श्वास नदिया सूखती
है नहीं पानी
आस घाटों पर न मेले
नहीं हलचल
किंतु हटने को नहीं
तैयार तिल भर भी यहाँ से
स्वार्थ के पंडे

अस्पताली तीर्थ पर है
जमा जमघट
पीडितों का, लुटेरों का
रात-दिन नित
रोग पहचाने बिना
परीक्षण-औषधि अनेकों
डॉक्टरी फंडे
***
संजीव
२०-१-२०२०
७९९९५५९६१८

विजाति छंद

छंद शाला
* विजाति छंद
* मापनी-१२२२ १२२२
*सूत्र -यरगग
*
निहारा क्या?
गुहारा क्या?
कहो क्या साथ लाया था?
कहो क्या साथ जायेगा?
रहेंगे हाथ खाली ही -
न कोई साथ आयेगा
बनाया क्या?
बिगाड़ा क्या?
न कोई गीत है तेरा
न कोई मीत है तेरा
सुनेगा बात ना कोई
लगेगा व्यर्थ ही टेरा
अँधेरा क्या?
सवेरा क्या?
तुझे तेरे भुला देंगे
सगे साथी जला देंगे
कहेंगे तेरही तेरी
मँगा मीठा मजा लेंगे
हमारा क्या?
तुम्हारा क्या?
*
संजीव
७९९९५५९६१८
२०-१-२०२०

विजात छंद

छंद सलिला
* विजात छंद
* मापनी-१२२२ १२२२
*सूत्र -यरगग
*
निहारा क्या?
गुहारा क्या?

कहो क्या साथ लाया था?
कहो क्या साथ जायेगा?
रहेंगे हाथ खाली ही -
न कोई साथ आयेगा
बनाया क्या?
बिगाड़ा क्या?

न कोई गीत है तेरा
न कोई मीत है तेरा
सुनेगा बात ना कोई
लगेगा व्यर्थ ही टेरा
अँधेरा क्या?
सवेरा क्या?

तुझे तेरे भुला देंगे
सगे साथी जला देंगे
कहेंगे तेरही तेरी
मँगा मीठा मजा लेंगे
हमारा क्या?
तुम्हारा क्या?
*
संजीव
७९९९५५९६१८
२०-१-२०२०

कनाडा में सरस्वती

कनाडा में सरस्वती 

BCHM

bangladesh-canada hindu cultural society, 16 Dohme Avenue, East York, Ontario, M4B 1Y9, Canada.
Phone: (416) 693-4444, E-mail: info@hindumondir.org  
Bijit Roy (President): (647) 855-7040
Borendra Sanyal (General Secretary): (416) 737-3918 
It was late 1995, a group of highly motivated volunteers and devotes took initiative to bring Bangladeshi Hindu community members living in greater Toronto area under an umbrella.   With this cherished dream, they formed Bangladesh Canada Hindu Cultural Society (BCHCS). Since then, BCHCS has been leading the Bangladeshi Hindu Community to perform their rituals and socio-cultural activities.
After a while, we, the Bangladeshi Hindu Community, feel the urgency to establish a Temple that would accommodate all our religious and socio-cultural needs. Keeping this view in mind and to serve the community better ‘Bangladesh Canada Hindu Mandir’ (BCHM) was formed in 2005 as an associate organization of BCHCS. BCHM got the status of registered charitable organization from Canada Revenue Agency (CRA) on Jan 25, 2005. BCHM starts its journey from 27 Goodwood Park, renting the basement of a house of one of our devotees. That was a formal address and place to connect with each other and to consolidate the views and ideas towards the greater objective to establish a Temple. As a sequence of gradual efforts, BCHM establish the Temple at 300 Danforth Road, Toronto in Dec 2007 and that was a 4000 Sq feet rented premise.  During mid 2010, the owner of that property decided to demolish the premises. Finding no other suitable place the Temple temporarily moved to a small room at 2226 Kingston Road on August 15 2010. This place was too small even to perform the evening prayer. As such, the Temple again moved to another rented premise at 46 Scotia Ave, Scarborough on January 1, 2011. It had been a real hard time for BCHM Temple and its devotees. But nobody did give up!  With the blessings of ISHWAR and the restless efforts of devotees, finally morning comes with golden sun shines, dream becomes true, BCHM gets its own address, becomes the owner of the property at 16 Dohme Ave on March 28, 2011. Temple permanently settles down at this address on 31st July 2011.