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सोमवार, 24 सितंबर 2018

bhasha vividha

भाषा विविधा:  
चार्ल्स बुवोस्की की एक कविता हिंदी अनुवाद सहित 
So You Want To Be A Writer...
तो तुम एक लेखक बनना चाहते हो 
charles bukowski
चार्ल्स बुवोस्की
*
if it doesn't come bursting out of you in spite of everything,
don't do it.

सब कुछ के बाद भी अगर तुम्हारे भीतर से फूटकर न निकले 
तो मत लिखो.
unless it comes unasked out of your heart and 

                       your mind and your mouth and your gut,
don't do it.

यदि तुम्हारे दिल, दिमाग, मुँह और पेट से बिना प्रयास न निकले 
तो मत लिखो 
if you have to sit for hours
staring at your computer screen
or hunched over your typewriter
searching for words,
don't do it.

यदि तुम्हें घंटों बैठना पड़े 
अपने संगणक के परदे को ताकते हुए 
या टंकक पर झुके हुए 
शब्दों की तलाश में 
तो मत लिखो 
if you're doing it for money or fame,
don't do it.

यदि तुम धन या यश के लिए कर रहे हो 
तो मत लिखो  
if you're doing it because you want women in your bed,
don't do it.

यदि तुम इस लिए लिख रहे हो कि तुम्हें बिस्तर पर स्त्री चाहिए 
तो मत लिखो 
if you have to sit there and rewrite it again and again,
don't do it.

यदि तुम्हें वहाँ बैठकर  बार बार लिखना पद रहा है 
तो मत लिखो
if it's hard work just thinking about doing it,
don't do it.

यदि इसके बारे में सोचना ही कठिन है 
तो मत लिखो
if you're trying to write like somebody else,
forget about it.

यदि किसी और की तरह लिखने की कोशिश कर रहे हो 
तो मत लिखो
if you have to wait for it to roar out of you,
then wait patiently.
if it never does roar out of you,
do something else.
यदि तुम्हारे अन्दर से गरजते हुए बाही निकलने के लिए समय चाहिए 

तो धैर्य सहित प्रतीक्षा करो 
यदि गर्जन तुम्हारे अन्दर से कभी न निकले
तो कुछ और करो  
if you first have to read it to your wife or your girlfriend or 

                      your boyfriend or your parents or to anybody at all,
you're not ready.
अगर तुम्हें पहले सुनाना पड़ता है पत्नी, महिला मित्र, 

                                              पुरुष मित्र, अभिभावक या अन्य को 
तब तुम तैयार नहीं हो 
don't be like so many writers,
don't be like so many thousands of people 

who call themselves writers,
don't be dull and boring and pretentious, 

don't be consumed with self- love.
बहुतेरे लेखकों की तरह मत बनो,
जो हजारों लोगों की तरह मत बनो 
जो खुद को लेखक कहते हैं 
मंदबुद्धि, उबाऊ या पाखंडी मत बनो 
आत्म-रति के उपभोग मत बनो 
the libraries of the world have yawned themselves 
to sleep over your kind.
don't add to that.
don't do it.

दुनिया के पुस्तकालय ऊब चुके हैं
तुम जैसों पर सोते-सोते 
उसमें वृद्धि मत करो,
बिलकुल मत करो  
unless it comes out of your soul like a rocket,
unless being still would drive you to madness or
suicide or murder,
don't do it.

जब तक तुम्हारी आत्मा से रोकेट की तरह न निकले 
जब तक वह तुम्हें मजबूर न करने लगे पागलपन, 
आत्महत्या या हत्या के लिए  
तब तक मत लिखो। 
unless the sun inside you is burning your gut,
don't do it.
जब तक तुम्हारे अंदर का सूर्य बाहर आने के लिए जलने न लगे 

तब तक मत लिखो।
when it is truly time,
and if you have been chosen,
it will do it by itself and it will keep on doing it
until you die or it dies in you.
अगर यह सही समय है 

और तुम चुने गए हो 
तो यह अपने आप हो जाएगा और होता रहेगा 
जब तुम या यह खुद समाप्त न हो जाए। 
there is no other way.
and there never was.

कोइ और रास्ता नहीं है,
और कभी नहीं था.
***

पितृ स्मरण

दोहा सलिला:
पितृ-स्मरण
संजीव
*
पितृ-स्मरण कर 'सलिल', बिसर न अपना मूल
पितरों के आशीष से, बनें शूल भी फूल
*
जड़ होकर भी जड़ नहीं, चेतन पितर तमाम
वंश-वृक्ष के पर्ण हम, पितर ख़ास हम आम
*
गत-आगत को जोड़ता, पितर पक्ष रह मौन
ज्यों भोजन की थाल में, रहे- न दिखता नौन
*
पीढ़ी दर पीढ़ी बढ़े, वंश वृक्ष अभिराम
सीढ़ी दर सीढ़ी चढ़े, पाने लक्ष्य ललाम
*
कल के आगे विनत हो, आज 'सलिल' हो धन्य
कल नत आगे आज के, थाती दिव्य अनन्य
*
जन्म अन्न जल ऋण लिया, चुका न सकते दाम
नमन न मन से पितर को, किया- विधाता वाम
*
हमें लाये जो उन्हीं का, हम करते हैं दाह
आह न भर परवाह कर, तारें तब हो वाह

रविवार, 23 सितंबर 2018

संस्मरण

इतिहास बोलता है  
शशि पाधा
वर्ष १९६५ भारत – पाक युद्ध चल रहा था | मेरे पति उस समय अपनी यूनिट के साथ अमृतसर –लाहौर सीमा पर तैनात थे | २० दिन के घमासान युद्ध के बाद भारतीय सेना ने पाकिस्तान का बहुत सा क्षेत्र जीत लिया था | इच्छोगिल नहर पर बसा हुआ बरकी गाँव लाहौर से लगभग १३-१४ किलोमीटर दूर था और युद्ध के समय भारतीय सेना वहाँ तक पहुँच गई थी | अब यह क्षेत्र और इसके आस पास के क्षेत्र भारतीय सेना के अधीन थे | युद्ध अपने पूरे वेग पर था | इस गाँव के निवासी अपनी सुरक्षा के लिए गाँव छोड़ कर किन्हीं सुरक्षित स्थानों की ओर चले गए थे | किन्तु कुछ बूढ़े और असहाय निवासी अपना गाँव छोड़ कर नहीं जाना चाहते थे | २३ सितम्बर को युद्ध विराम की घोषणा भी हो गई थी | अब बरकी गाँव के बचे-खुचे निवासी भारतीय सेना के मेहमान थे | भारतीय सैनिक उनकी सेवा करते, दवा दारू देते और हर परिस्थिति में उनकी सहायता कर रहे थे | इस तस्वीर में बंद वृद्ध दम्पति किसी भी हालत में अपना गाँव छोड़ कर नहीं जाना चाहते थे | वृद्ध पुरुष का नाम था चिरागदीन | उनकी पत्नी काफी अस्वस्थ थीं और वो कहीं जाने में असमर्थ थीं | उन्हें शायद शान्ति की उम्मीद भी थी |
एक दिन मेरे पति इस दम्पति से बातचीत कर रहे थे कि उस वृद्ध पुरुष ने इन्हें बताया कि उसका जन्म पंजाब के जालन्धर जिले के किसी गाँव में हुआ था | उसे अपने जन्मस्थान की, अपने बचपन के घर की बहुत याद सताती रहती है | यह बात कहते हुए मेरे पति ने देखा कि उस वृद्ध की ऑंखें अश्रुपूर्ण थी | आते -आते इन्होने जब उससे पूछा कि क्या उन्हें किसी चीज़ की ज़रुरत है तो उसने हाथ जोड़ कर कहा,” साहब , आप मुझे एक बार मेरे गाँव में ले जाइए | मैं मरने से पहले अपना जन्म स्थान देखना चाहता हूँ |” उसकी इच्छा पूरी करने में कुछ कठिनाइयाँ तो थी किन्तु मेरे सहृदय पति ने एक दिन उसे एक फौजी जेकेट पहनाई, गाड़ी में बिठाया और ले गए उसे उसके गाँव | उस पाकिस्तानी वृद्ध की खुशियों का विवरण तो मैं शब्दों में नहीं दे सकती | आप केवल उसे महसूस कर सकते हैं | वापिस आकर जब मेरे पति ने उनसे विदा ली तो उसने दोनों हाथ आसमान की ओर उठा कर इन्हें दीर्घ आयु का आशीर्वाद दिया |

लगभग छह महीनों के बाद ताशकंद समझौते के बाद भारतीय सेना को यह क्षेत्र पाकिस्तान को वापिस लौटाना था | मेरे पति इस वृद्ध दम्पति से मिलने गए | उन्होंने इन्हें बड़े स्नेह से गले लगाया, तस्वीर लेने को कहा और साथ में भेंट किया एक मिटटी का कटोरा और कुरान शरीफ की एक प्रति | विदा के समय दोनों की आँखें नाम थीं |
अब आप ही बताएँ कि इस युद्ध मे किसकी हार –किसकी जीत ?????

शशि पाधा








doha salila

दोहा सलिला
*
मीरा का पथ रोकना, नहीं किसी को साध्य।
दिखें न लेकिन साथ हैं, पल-पल प्रभु आराध्य।।
*
श्री धर कर आचार्य जी, कहें करो पुरुषार्थ। 
तभी सुभद्रा विहँसकर, वरण करेगी पार्थ।।
*
सरस्वती-सुत पर रहे, अगर लक्ष्मी-दृष्टि। 
शक्ति मिले नव सृजन की, करें कृपा की वृष्टि।।
*
राम अनुज दोहा लिखें, सतसई सीता-राम। 
महाकाव्य रावण पढ़े, तब हो काम-तमाम।।

व्यंजन सी हो व्यंजना, दोहा रुचता खूब। 
जी भरकर आनंद लें, रस-सलिला में डूब।।
*
काव्य-सुधा वर्षण हुआ, श्रोता चातक तृप्त। 
कवि प्यासा लिखता रहे, रहता सदा अतृप्त।।
*
शशि-त्यागी चंद्रिका गह, सलिल सुशोभित खूब।  
घाट-बाट चुप निरखते, शास्वत छटा अनूप।।
*
 दीप जलाया भरत ने, भारत गहे प्रकाश।  
कीर्ति न सीमित धरा तक, बता रहा आकाश।।
*
राव वही जिसने गहा, रामानंद अथाह। 
नहीं जागतिक लोभ की, की किंचित परवाह। 
*
अविरल भाव विनीत कहँ, अहंकार सब ओर। 
इसीलिए टकराव हो, द्वेष बढ़ रहा घोर।।
*
तारे सुन राकेश के, दोहे तजें न साथ। 
गयी चाँदनी मायके, खूब दुखा जब माथ।।

कथ्य रखे दोहा अमित, ज्यों आकाश सुनील। 
नहीं भाव रस बिंब में, रहे लोच या ढील।।
*
वंदन उमा-उमेश का, दोहा करता नित्य।
कालजयी है इसलिए, अब तक छंद अनित्य।।
*
कविता की आराधना, करे भाव के साथ। 
जो उस पर ही हो सदय, छंद पकड़ता हाथ।।
*
कवि-प्रताप है असीमित, नमन करे खुद ताज। 
कवि की लेकर पालकी, चलते राजधिराज।।  
*
अनिल अनल भू नभ सलिल, पञ्च तत्वमय सृष्टि। 
कथ्य, भाव रस बिंब लय, करें सत्य की वृष्टि।।
*
करे कल्पना कल्पना, दोहे में साकार। 
पाठक पढ़ समझे तभी, भावों का व्यापार।।
*
दूर कहीं क्या घट रहा, संजय पाया देख। 
दोहा बिन देखे करे, शब्दों से उल्लेख।।
*
बेदिल से बेहद दुखी, दिल-डॉक्टर मिल बैठ। 
कहें बिना दिल किस तरह, हो अपनी घुसपैठ।।
*
मुक्तक खुद में पूर्ण है, होता नहीं अपूर्ण। 
छंद बिना हो किस तरह, मुक्तक कोई पूर्ण।।
*
तनहा-तनहा फिर रहा, जो वह है निर्जीव।
जो मनहा होकर फिर, वही हुआ संजीव।।
*
पूर्ण मात्र परमात्म है, रचे सृष्टि संपूर्ण। 
मानव की रचना सकल, कहें लोग अपूर्ण।।
*
छंद सरोवर में खिला, दोहा पुष्प सरोज।
प्रियदर्शी प्रिय दर्श कर, चेहरा छाए ओज।.
*
किस लय में दोहा पढ़ें, समझें अपने आप। 
लय जाए तब आप ही, शब्द-शब्द में व्याप।।
*
कृष्ण मुरारी; लाल हैं, मधुकर जाने सृष्टि। 
कान्हा जानें यशोदा, अपनी-अपनी दृष्टि।। 
 *
नारायण देते विजय, अगर रहे यदि व्यक्ति। 
भ्रमर न थकता सुनाकर, सुनें स्नेहमय उक्ति।।
*
शकुंतला हो कथ्य तो, छंद बने दुष्यंत। 
भाव और लय यों रहें, जैसे कांता-कंत।।
*
छंद समुन्दर में खिले, दोहा पंकज नित्य। 
तरुण अरुण वंदन करे, निरखें रूप अनित्य।।
*
 विजय चतुर्वेदी वरे, निर्वेदी की मात। 
जिसका जितना अध्ययन, उतना हो विख्यात।।
*
श्री वास्तव में गेह जो, कृष्ण बने कर कर्म। 
आस न फल की पालता, यही धर्म का मर्म।।
*
राम प्रसाद मिले अगर, सीता सा विश्वास। 
जो विश्वास न कर सके, वह पाता संत्रास।।
*
२३.९.२०१८      
      





















शनिवार, 22 सितंबर 2018

hasya rachna

हास्य रचना:
सीता-राम
*
लालू से
कालू मिला,
खुश हो किया सलाम।
बोला-
"जोड़ी जँच रही
जैसे सीता-राम।
लालू बोला-
'सच?
न क्यों, रावण हरता बोल?
समा न लेती भू कहो,
क्यों लाकर भूडोल??'
कालू बोला -
"दिख रही सीता सी भौजाई
राम सरीखे तुम नहीं
तकते गैर लुगाई।"
लालू बोला-
'लव किया रबड़ी से सच्चा 
प्यार इमरती से किया
समझ न तू कच्चा।'
कालू बोला -
"भा गया चारा तुझको यार
बेचारा इसलिए है
बैठ जेल बेकार।
***

ek rachna

एक रचना 
*
अनसुनी रही अब तक पुकार 
मन-प्राण रहे जिसको गुहार 
वह आकर भी क्यों आ न सका?
जो नहीं सका पल भर बिसार
*
वह बाहर हो तब तो आए
मनबसिया भरमा पछताए
जो खुद परवश ही रहता है
वह कैसे निज सुर में गाए?
*
जब झुका दृष्टि मन में देखा
तब उसको नयनों ने लेखा
जग समझ रहा हम रोये हैं
सुधियाँ फैलीं कज्जल-रेखा
*
बिन बोले वह क्या बोल गया
प्राणों में मिसरी घोल गया
मैं रही रोकती लेकिन मन
पल भर न रुका झट डोल गया
*
जिसको जो कहना है कह ले
खुश हो यो गुपचुप छिप दह ले
बासंती पवन झकोरा आ
मेरी सुधियाँ गह ले, तह ले
*
कर वाह न भरना अरे! आह
मन की ले पाया कौन थाह?
जो गले मिले, भुज पाश बाँध
उनके उर में ही पली डाह
*
जो बने भक्त गह चरण कभी
कर रहे भस्म दे शाप अभी
वाणी में नहीं प्रभाव बचा
सर पीट रहे निज हाथ तभी
*
मन मीरा सा, तन राधा सा,
किसने किसको कब साधा सा?
कह कौन सकेगा करुण कथा
किसने किसको आराधा सा
*
मिट गया द्वैत, अंतर न रहा
अंतर में जो मंतर न रहा
नयनों ने पुनि मन को रोका
मत बोल की प्रत्यंतर न रहा
*

जपुजी साहब

जपु जी साहिब में दोहा
*
सोचै सोचि न होवई, जे सोची लखवार।
चुपै चुप न होवई, जे लाइ रहा लिवतार।।
*
भावार्थ
सोचा सच होता नहीं, सोचो लाखों बार।
चुप न रहे चुुुुप्पी; हुआ, जो करता करतार।।
***
  

गुरुवार, 20 सितंबर 2018

समीक्षा

कृति चर्चा:
'नील वनों के पार' श्रृंगार की बहार  
आचार्य संजीव वर्मा सलिल'
*
[कृति विवरण: नील वनों के पार, गीतसंग्रह, निर्मल शुक्ल, प्रथम संस्करण, २००८, आकार डिमाई, आवरण सजिल्द, बहुरंगी, जैकेट सहित, पृष्ठ ८०, मूल्य १५०/-, प्रकाशक-रचनाकार संपर्क- उत्तरायण प्रकाशन, लखनऊ २२६०१२, चलभाष ९८३९८२५०६२]
*
"नील वनों के पार" ख्यात नवगीतकार श्री निर्मल शुक्ल के ऐसे आरंभिक गीतों का संग्रह है जिनमें नवगीत की सामान्य से भिन्न आहट सुनाई देती है। शुक्ल जी जिस पृष्ठभूभि से साहित्य का संस्कार ग्रहण करते हैं वहाँ, सरलता और विद्वता की गंगो-जमुनी धारा सतत प्रवाहित होती रही है। उन्हें देशज बोली, प्रांजल भाषा और बैंक अधिकारी होने के नाते शब्द-शब्द की सटीकता पर सतर्क दृष्टि रखने का संस्कार मिला है। उनके हर गीत की हर पंक्ति में भाषिक प्रौढ़ता के दर्शन होते हैं। श्रेष्ठ-ज्येष्ठ साहित्याराधक प्रो. देवेंद्र शर्मा 'इंद्र' के अनुसार "नवगीत पारंपरिक गीत का ही पूर्ण परिपक्व रसाढ्य फल है और परिपक्वता तथा मधुर-फलत्व के बिंदु तक पहुँचने के लिए एक रचना को लम्बी तपन-यात्रा-प्रक्रिया से होकर गुजरना पड़ता है... नील वनों के पार का प्रत्येक गीत इस तथ्य का प्रत्यायक है कि निर्मल जी ने गीत-साधना को संपूर्ण गरिमा और गंभीरता के साथ स्वायत्त किया है। परंपरा, प्रयोग और प्रगति ने इनके गीतों को शक्तिमत्ता प्रदान की है। अमिधा, लक्षणा और व्यंजना नामक शब्द-शक्तियों के संगम अर्थ के स्नातक हैं गीत-बटुक। इनके गीत जिस संवेदना-फलक पर अभिव्यक्त हुए हैं वह उदात्त अनुभूतियों और अवदात कल्पनाओं पर आधृत हैं।"

मंगलाचरण में "अहं शिवोस्मि" शीर्षक  गीत में कवि प्रार्थना करता है- 
"हे त्रिविध, त्रिपुरारि शंकर
अलख ज्योतित कीजिए 
रिक्त है मेरा कमंडल 
ज्ञान से भर दीजिए"। 

सर्वज्ञात है कि भोले भंडारी के लिए कुछ अदेय नहीं है। शिव प्रकृति के स्वामी हैं, अत: उन्हें प्रसन्न करने का सुगम उपाय प्रकृति का सौंदर्य-गायन करना ही हो सकता - 
पहन बिछौने 
मौलसिरी के,
तू भी नव परिधान 
वल्लरियों में 
हरसिंगार की 
गुँथी चादरें तान
यह कस्तूरी 
नहीं बावरे 
उनकी गंध समाई है। 

प्रकृति ऋतु-अनुसार ऋतुराज का स्वागत, श्रृंगार और मनुहार की डगर पर पग धरकर करने से नहीं चूकती। जीत में हार और हार में जीत की अनुभूति को अभिव्यक्त करती लेखनी, देह के महकने, साँस के बहकने के पलों में महमहाती मेंहदी की गुनगुनाहट की साखी देती है-
महमहाई  
जीत के 
कुछ हार की मेंहदी 
गात महके 
साँस बहकी 
खो गये 
अभिजात मन 
घोलकर संतूर के 
सुर-तार-सप्तक में 
यमन 
गुनगुनाई 
गीत 
उपसंहार की मेंहदी 

पर्व की तरह प्रतीत होते सुहाने दिनों में रात-रात भर जागकर गुलमोहर के लाल पत्तों को अंक में भरते दिन लाज से गड़ें, निराकार शब्दों के आकार नैनों में तिरने की कल्पना ही अधरों पर गुनगुने उपहार आधार भूमि बने यह स्वाभाविक है। निर्मल जी की प्रयोगधर्मी प्रवृत्ति बिंब संयोजन में लीक से हटकर अपनी राह आप बनाती है। 'मन हिरना को हँस बनाने' की कल्पना जितनी मौलिक है उतनी ही रोमांचक भी। प्रकाश के पंख को छूने के लिए कुमकुम की सौगंध खाकर, सोंधी हल्दी से सनी हथेली नेहातुर अनुगंध को आमंत्रित कर, मन को पावन नीर और तन को कैलाश का हिम बना रहा कवि पलाश का रंग भरकर सुबह की धूप बनाता है। ऐसी अभिनव अनुभूति और उसकी अप्रचलित अभिव्यक्ति अपनी मिसाल आप आप है।
सुबह-सुबह की धूप बना लूँ
भर दूँ रंग पलाश का
मन हिरण को हंस बना लूँ
छू लूँ पंख प्रकाश का
सोंधी हल्दी सनी हथेली
कुमकुम की सौगंध
रह रहकर आमंत्रित करती
नेहातुर अनुगंध
मन को पवन नीर बना लूँ 
तन को हिम कैलाश का

अर्पण और समर्पण की रामायण रचते समय अक्षत-रोली, और देहरी-द्वार महकने लगें तो आनंद शतगुणित हो जाता है-
अक्षत महके
रोली महकी
महके देहरी-द्वार,
इंद्रधनुष के रंग बारे
हो गये बंदनवार
चौबारे में
मिली बानगी
महकी हुयी बयार की

प्रीत की रीत निरखता-परखता गीत सुध-भध भूल जाए, रात स्थाई को आँचल में बाढ़ ले और प्रभात अंतरा दोहराता रहे, तो रग-रग में मधुरता व्याप्त होगी ही-   

श्री गणेश

श्री गणेश गिनती गणित, गणना में हैं लीन 
जो समझे मतिमान वह, बिन समझे नर दीन
.           बिंदु    शिव
___      रेखा   पार्वती
o         वृत्त    गणेश
१.         ॐ
२. मति, गति, यति, बल, सुख, जय, यश।
३. अमित, कपिल, गुणिन, भीम, कीर्ति, बुद्धि।
४. गणपति, गणेश, भूपति, कवीश, गजाक्ष, हरिद्र, दूर्जा, शिवसुत, हरसुत, हरात्मज।
५. गजवदन, गजवक्र, गजकर्ण, गजदंत, गजानन, प्रथमेश, भुवनपति, शिवतनय, उमासुत, निदीश्वर, हेरंब, शिवासुत, विनायक,  अखूरथ, गणाधिप, विघ्नेश, रूद्रप्रिय।
६. गण-अधिपति, गणाध्यक्ष, एकदंत, उमातनय, विघ्नेश्वर, गजवक्त्र, गौरीसुत, लंबोदर, प्रथमेश्वर, शूपकर्ण, वक्रतुंड, गिरिजात्मज, शिवात्मज, सिद्धिसदन, गणाधिपति, स्कन्दपूर्व, विघ्नेंद्र, द्वैमातुर, धूम्रकेतु, शंकरप्रिय।
७. गिरिजासुवन, पार्वतीसुत, विघ्नहर्ता, मंगलमूर्ति, मूषकनाथ, गणदेवता, शंकर-सुवन, करिवर वदन, ज्ञान निधान, विघ्ननाशक, विघ्नहर्ता, गिरिजातनय।
८. गौरीनंदन, ऋद्धि-सिद्धिपति, विद्यावारिधि, विघ्नविनाशक, पार्वती तनय, बुद्धिविधाता, मूषक सवार, शुभ-लाभ जनक, मोदकदाता. मंगलदाता, मंगलकर्ता, सिद्धिविनायक, देवाधिदेव, कृष्णपिंगाक्ष।
९. ऋद्धि-सिद्धिनाथ, शुभ-लाभप्रदाता, गजासुरहंता, पार्वतीनंदन, गजासुरदंडक।
१०. ऋद्धि-सिद्धि दाता, विघ्नहरणकर्ता।
११. गिरितनयातनय।    ९३         
*
गजवदन = गति, जय, वर, दम, नमी।
गजानन = गरिमामय, जानकार, नवीनता प्रेमी, निरंतरता।
विनायक = विवेक, नायकत्व, यमेश, कर्मप्रिय।
*
Ganesha = gentle, active, noble, energetic, systematic, highness, alert.
Gajanana = generous, advance, judge, accuracy, novelty, actuality, non ego, ambitious.
Vinayaka  = victorious, ideal, neutrality, attentive, youthful, administrator, kind hearted, attentive.
*
Nuerological auspect
[a 1, b 2, c 3, d 4, e 5, f 6, g 7, h 8, i 9, j 10, k 11, l 12, m 13, n 14, o 15, p 16, q 17, r 18, s 19, t 20, u 21, v 22, w 23, x 24, y 25, z 16]

1. Ganesha = 7 +1 + 14 + 5 + 19 + 8 + 1 = 55 = 10 = 1.
    Gati = 7 + 1 + 20 + 9 = 37 = 10 = 1.
    Ganadhyaksha = 7 + 1 + 14 + 1 + 4 + 8 + 25 + 1 + 11 + 19 + 8 + 1 = 100 = 1.
             
    Jaya = 10 + 1 + 25 + 1 = 37 = 10 = 1.
2. Ekdanta = 5 + 11 + 4 + 1 + 14 + 20 + 1 = 56 = 11 = 2.
3. Vinayaka = 22 + 9 + 14 + 1 + 25 + 1 + 11 + 1 = 84 = 12 = 3. 
    Heramba = 8 + 5 + 18 + 1 + 13 + 2 + 1 = 48 = 12= 3.
    Buddhi = 2 + 21 + 4 + 4 + 8 + 9  = 48 = 12 = 3.
4. Ganadevata = 7 + 1 + 14 + 1 + 4 + 5 + 22 + 1 + 20 + 1 = 76 = 13 = 4.
    Gajanana = 7 + 1 + 10 + 1 + 14 + 1 + 14 + 1 = 49 = 13 = 4.
5. Vakratunda = 22 + 1 + 11 + 18 + 1 + 20 + 21 + 14 + 4 + 1 = 113 = 5.
    Bhoopati = 2 + 8 + 15 + 15 + 16 + 1 + 20 + 9 = 86 = 14 = 5.
    Kapila = 11 + 1 + 16 + 9 + 12 + 1 = 50 = 5.
6. Ganapati = 7 + 1 + 14 + 1 + 16 + 1 + 20 + 9 = 69 = 15 = 6.
7. Mahakaya = 13 + 1 + 8 + 1 + 11 + 1 + 25 + 1 = 61 = 7.
8. Gajavadana = 7 + 1 + 10 + 1+ 22 + 1 + 4 + 1 + 14 + 1 = 62 = 8.
    Vighneshvara = 22 + 9 + 7 + 8 + 14 + 5 + 19 + 8 + 22 + 1 + 18 + 1 = 134 = 8.
    Amita = 1 + 13 + 9  + 20 + 1 = 44 = 8.     
9. Ganadhipati = 7 + 1 + 14 + 1 + 4 + 8 + 9 + 16 + 1 + 20 + 9 = 90 = 9.
===============
      

एक रचना

गीत
*
यह रीझा
वह रीझी
पल-पल मधुमास
.
पूर्वा रतनार हुई
ऊषा है छुईमुई
आसमान बौराया
वसुधा भी हुलसाई
मन भाया
मन भाई
टपरी रनिवास
.
अँखुआए नव सपने
देह लगी लुक-छिपने
हरियाई मन-बगिया
हाय! उड़ गई निंदिया
यह कूका
वह कूकी
दहकी उच्छ्वास
.
यह वह है,  वह यह है
जग जीवन महमह है
बोल-बताते अबोल
भेद की नहीं तह है
यह हेरे
वह हेरे
साँसों का रास
***
संजीव
20.9.2018

बुधवार, 19 सितंबर 2018

samiksha

कृति चर्चा:
'हरापन बाकी है' इसलिए कि नवगीत जिन्दा है 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' 
[कृति विवरण: हरापन बाकी है, नवगीत संग्रह, देवेंद्र सफल, प्रथम संस्करण २०१६, पृष्ठ १२०, आकार डिमाई, आवरण बहुरंगी सजिल्द जैकेट सहित, मूल्य २५०/-, दीक्षा प्रकाशन, ११७/क्यू /७५९-ए, शारदा नगर, कानपुर २०८०२५, चलभाष ९४५१४२४२३३, ९००५२२२२६६, ८५६३८११६१५ ]
*
वर्तमान संक्रांति काल में मनुष्य सामाजिक प्राणी होने के बावजूद अधिकाधिक व्यक्तिनिष्ठ होता जा रहा है। फलत:, पति-पत्नी, भाई-बहिन, पिता-पुत्र जैसे अभिन्न संबंधों में भी दूरी (स्पेस) की तलाश की जा रही है। अधिकतम पाने और कुछ न देने की कामना ने परिवार को कष्ट-विक्षत कर दिया है। 'कुनबा' और 'खानदान' शब्दकोशों में कैद होकर रह गए हैं, 'व्यक्ति' अकेलेपन का शिकार होकर कुंठा, संत्रास, ऊब, घुटन, यांत्रिक नीरसता, मूल्यहीनता, संदेह, छल, कपट, निराशा का शिकार होकर नशे व आत्महत्या की ओर बढ़ता जा रहा है। विस्मय यह कि यह प्रवृत्ति साधनहीनों की अपेक्षा साधन सम्पन्नों में अधिक व्याप्त है। जन सामान्य हो या विशिष्ट वर्ग सफल होने की कीमत दोनों को चुकानी पड़ती है। गेहूँ के साथ चाहे-अनचाहे पिसना ही घुन की नियति है। इसलिए अंतत:, सकल समाज तथाकथित प्रगति की कीमत चुकाते-चुकाते नि:शेष होता जाता है। इस सबके बावजूद कलम हाथ में लेकर उद्घोषणा करना कि 'हरापन बाकी है' सचमुच हिम्मत की बात है। श्री देवेंद्र 'सफल' यह घोषणा दमदारी से कर रहे हैं इसलिए कि उनके हाथ में कलम और साथ में नवगीत की ताकत है। देवेंद्र 'सफल' १९९८ से २०१६ के मध्य 'पखेरू गंध के', 'नवांतर', 'लेख लिखे माटी ने', 'सहमी हुई सदी' शीर्षक नवगीत संकलनों के माध्यम से गीत-गगन में उड़ान भर चुके हैं। नित नया आसमान नापने की आदत 'हरापन बाकी है' की शक्ल  में समय को सच का आईना दिखा रहा है।

देवेंद्र जी के नवगीत समकालिक अन्य नवगीतकारों से भिन्न इस मायने में हैं कि इनमें किताबी विसंगति, विडंबना और त्रासदी पर जमीनी सचाई को वरीयता दी गयी है। देवेंद्र छद्म मार्मिकता के लिए घड़ियाली आँसू नहीं बहाते, वे दैनंदिन जीवन की कसक को उद्घाटित करते हैं-
हर करवट में बेचैनी है
भटक रहा मन इधर-उधर
सारी रात न सोने देता
दरकी दीवारों का घर

यहाँ कोई आसमान नहीं टूटा पड़ रहा, किंतु सर पर छाँव होने के बावजूद अघटित घटित होने की आशंका न जीने देती है, न मरने। बात यही तक सीमित नहीं है-
अब घर नहीं रहा घर जैसा
बाजारों का है जमघट
संबंधों की सेल लगी है
कीमत नित्य रही है घट

ज्यादा से ज्यादा पाने की दावेदारी, रसोई में कलह, घातक मंसूबे, और कुचलें, तू-तू मैं-मैं एकता की चाह रखने के बाद भी निराशा की बाढ़.... यह हर घर की व्यथा-कथा है। इन नवगीतों का कथ्य रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ा है और भाषा आम आदमी द्वारा उपयोग में लाए जाने वाले शब्दों से बनी है। अत:, पाठक को अपनी खुद की अनुभूति कही गयी प्रतीत होती है-
पिछले साल पड़ा सूखा तो
रोई मुनिया की महतारी
देबी की किरपा से अबकी
गौना देने की तैयारी   
जो संबंधी तने-तने थे
लगे तनिक वो भी निहुरे हैं

हिंदी के साहित्य जगत में जिनसे सीखा उन्हें भुला देने की कुटैव व्याप्त है। कामयाब उर्दू शायर अपने से कम कामयाब उस्ताद का भी शुक्रिया अदा करते हुए मुशायरों में फख्र के साथ खुद को उनका शागिर्द बताता है लेकिन हिंदी का छोटे से छोटा कवि भी ऐसा जताता है मानो सब कुछ माँ के पेट से सीख कर आया हो। विश्ववाणी हिंदी संस्थान जबलपुर के तत्वावधान में सद्य प्रकाशित दोहा शतक मंजूषा के तीन भागों में दोहाकार के परिचय में काव्य गुरु का नाम इसीलिये जोड़ा गया कि रचनाकारों में गुरु का स्मरण और गुरु के प्रति कृतज्ञता का भाव हो। देवेंद्र जी की ईमानदारी यह कि वे प्रो. रामस्वरूप सिंदूर को स्मरण करते हुए उनके कथन को उद्धृत कर 'अपनी बात' का श्री गणेश करते हैं- "मेरे काव्य-गुरु स्मृति-शेष प्रो. रामस्वरूप सिंदूर के कथनानुसार "गीत का कवि कालातीत, अनंतता का कवि होता है। समयातीत होकर भी गीत समय-शून्य नहीं होता। वह समय में रहकर भी समय का अतिक्रमण करता है।'

'हरापन बाकी है' का रचनाकार गाँव और शहर दोनों से समान अपनत्व के साथ जुड़ा है, उसे आम आदमी की पीड़ा से सरोकार है। वह दोनों अंचलों की वस्तिस्थिति, विसंगतियों और विडंबनाओं को उद्घाटित करता है। उसकी भाषा में कथ्य और पात्र के अनुकूल भाषा और शब्दों का व्यवहार किया गया है। उपले, महतारी, जानी, कलेवा, मन्नत, बहुरे, कुठला, बरोठे, कागा, मुंडेर, तिरिया, किरपा, निहुरे, डिठौने, काठ, मुहाचाई, दहे, खटिया जैसे ठेठ देशज शब्दों के साथ त्राण, भूमंडलीकरण, अनिवासी, पुष्ट, आसीन, संग्राम, तमस, पार्श्व, वेदिका, परिहास, नव्य, संताप, सरिता, मेघ, अनुनय, अन्तस्, लंबोदर, सहोदर, क्षत्रप, अवसाद, चरण, अरुणिम आदि संस्कृत निष्ठ शब्दों, वेलकम, होर्डिंग, बैनर, टी. वी., बंपर, जींस, टी-शर्ट, मिनी, रैम्प, मैडम, डेवलपमेंट, पाकिट, क्रास, गुड लक वगैरह अंग्रेजी शब्दों के साथ अन्य भाषाओँ के प्रचलित शब्द भी उपयोग किये गए हैं। अरबी ( अमन, आमीन, आसार, इशारे, इंसानियत, उजाले, कबीले, गायब, जुल्म, गमगीन, तमाशाई, नज़र आदि),  और फारसी (ख़ाक, खातिर, खुशहाली, खुशियाँ, खुशबू, तख़्त, दर्द, दरमियान, दरियादिली, दस्तूर, दुकां, दुश्मन वगैरह) के शब्दों को भी सफलता के साथ सफल जी ने प्रयोग किया है।

इन गीतों की मुहावरेदार भाषा इनकी ताकत है। गीतकार शब्द युग्मों (धूल-धूसरित, ताना-बाना, घर-द्वार, लिपे-सँवारे, चैता-बन्ना, रंग-बिरंगे, जादू-टोने, हँसूँ-गाऊँ, खुसुर-पुसुर, व्यंग्य-बाण, सुख-दुःख. दुःख-दर्द, कुर्सी-गद्दी, अस्थि-पिंजर, नोच-खसोट, चेतन, अवचेतन, शब्द-अर्थों, संगी-साथी, प्रणय-गाथाएँ, आग-बबूला, रिश्ते-नाते, विधि-विधान, सुर-ताल, दाँव-पेंच,बने-बिगड़े, यक्ष-प्रश्न, ज्ञानी-ध्यानी, हरे-भरे, नीति-निर्धारक, बंदूक खंजर, खेल-खिलौने, तरु-लता-पल्लव, लय-सुर-ताल, जाती धर्म भाषा आदि ), और शब्दावृत्ति (तने-तने, शुभ-शुभ, माथे-माथे, गहरे-गहरे, भद्दी-भद्दी, सोच-सोच, पल-पल, झर-झर, रह-रह, तू-तू मैं-मैं, अपने-अपने, भीतर-भीतर, डरे-डरे, देख-देख, थकी-थकी आदि ) की ताकत जानता है और उसने उनका भली-भाँति उपयोग किया है। यथास्थान मुहावरों और लोकोक्तियों के  उपयोग ने सोने में सुहागा का कार्य किया है- चिकना घड़ा, सीना तानना, सपने बुने, कीच उछालना, भाग्य सराहना, रद्दी के भाव, हाथ के तोते उड़े जैसे प्रयोग नवगीतों के भाव पक्ष को सशक्त करते हैं।

आजकल नवगीत या तो अनभिज्ञता के कारण या अकारण ही विराम चिन्हों का प्रयोग नहीं करते।   देवेंद्र जी का व्याकरणिक पक्ष मजबूत है। इस कृति में उन्होंने योजक चिन्ह (-) का उपयोग विविध अर्थों में किया है। ओस-कण ओस के कण, हँसूँ-गाऊँ हँसूँ और गाऊँ, आते-जाते आते या जाते, पुष्प-गंध पुष्प की गंध, सूत्र-से सूत्र जैसे, नज़र-वाले जिससे दिखाई दे। नए रचनाकारों को इससे सीख लेना चाहिए क्यों कि छंद की आवश्यकतानुसार अक्षर कम-अधिक करना हो तो विराम चिन्ह बहुत उपयोगी होते हैं।

अंग्रेजी में कहावत है- 'टू एरर इस ह्युमन' अर्थात गलती करना मनुष्य का स्वभाव है। 'कैसे हंस लें?' में कवि अनुनासिक चिन्ह का उपयोग करने में चूक गया है। हंस = उच्चारण हन्स = पक्षी, हँस अर्थात हँसना क्रिया। एक और त्रुटि राग-द्वेश में 'ष' के स्थान पर 'श' का उपयोग करने से हुई है।

सफल जी ने कथ्य और प्रसंग के अनुरूप प्रतीकों का उपयोग किया है। तेजी से पनपी नागफनी, हो गए प्रवासी स्वप्न सभी, आँगन में पंछी उतरे हैं, वर्षों बाद बज रही पायल, श्वासों पर पहरे ही पहरे, मन में बसे कबीले, टूटा नहीं जुड़ाव, भूख मुँह फाड़े, जाने कितनी बार ढहे आदि ऐसे शब्द-प्रयोग हैं जो शब्दकोशीय अर्थ की सीमा का उल्लंघन कर अपने अर्थ से अधिक भाव संप्रेषित करते हैं। ऐसे प्रयोगों से 'कम कहने से अधिक समझना' की परंपरा अनजाने ही सही जी उठी है। नवगीत को ऐसे प्रयोग सारगर्भित बनाते हैं।

देवेंद्र जी ने नवगीतों के कथ्य में एकपक्षीय न होकर संतुलन साधने की सफल कोशिश की है। 'सीता को पीटे राम धनी' में स्त्री-प्रताड़ना है, 'माँ को अपनी परवाह नहीं' में स्त्री की त्यागवृत्ति और खुद के प्रति लापरवाही है तो 'आशीष दे रही महतारी' में स्त्री-गौरव है। 'बेटा ब्याहा हम छले गए में' स्त्री ही स्त्री की बैरी के रूप में हैं। 'रैम्प पर जलवे बिखेरें / उर्वशी मैडम' तथा 'फटी जींस, बिकनी के ऊपर / बैकलेस है टॉप / राधारानी पहने घूमें / साधु भूलते जाप' में देह-दर्शन को प्रगति समझती स्त्री, 'दुखी रसोई घर की पीड़ा / समझे बढ़कर कौन / आँख कान मुख हाथों वाले / साधे रहते मौन' में' स्त्री की व्यथा को समझ कर नासमझ बनता समाज, 'समझ न आये / कौन गलत है, कौन सही / शबरी अपने आँसू / पीते सोच रही' में परिवर्तन के लिए चिंतन की और उन्मुख होती स्त्री अनेक बिंब इन नवगीतों में उभरते हैं और पाठक को चिंतन करने के लिए प्रेरित करते हैं।   

राजनीति के विविध रूप सफलता के साथ इन गीतों में प्रतिबिंबित हुए हैं। 'शातिर मुखिया क्या जाने कब / चल दे कैसी चाल', 'चतुर राजा जन सभा में / दे रहा भाषण', घूरें शातिर खड़े मछेरे / दाना डालें शाम-सवेरे,  'न्याय आँख पर पट्टी बांधे / अपराधी बेखटके / राजा सोया हुआ / पहरुए करें / खूब मनमानी', बौने से हो गए शीर्ष कद / दूषित मन इतने मटमैले / दोषी कौन कहे दूजे को / ढोंगी अमर बेल से फैले', 'भरोसा कैसे करें / इतना हुआ नैतिक पतन / हमारे ही नीति निर्धारक / हमें छलने लगे' आदि गीत जैसे-जैसे समय बीतेगा अधिकाधिक प्रासंगिक होते जाएँगे।

'जींस में ऐसा असर गायब हुई धोती' में परंपरा पर हावी होती अधुनातनता, 'होर्डिंग बैनर लगाये धूर्त व्यापारी' में हावी होता पूंजीवाद', 'मुझे डराने आ पहुँचा / मँहगाई का बैताल' में जमीनी सचाई, चाँद-सितारे छूकर भी हम / मन से अभी आदिवासी हैं' तथा 'खुला-खुलापन कहने को है / सहज सी सिमटी मुद्राएँ में अंतर्विरोध, 'जूझ रहे हम अंधकार से / हाथों की छिन गई मशालें में' विडंबना, 'साहूकार सुबह आ धमका / बोला ब्याज निकाल' में शोषण, मन के बंधन / बंधन लगते' में बेबसी, 'क्या कहें कैसे बताएँ / होंठ पर कितनी कथाएँ' तथा 'मन की अपनी लाचारी है / थिर हैं पाँव / सफ़र जरी है' में असमंजस आदि भावनाएँ व्यक्त कर कवि ने अपनी सामर्थ्य की झलक दिखाई है। 'हम विजयी नायक' शीर्षक नवगीत एक भिन्न भाव-मुद्रा के माध्यम से कवि की सामर्थ्य का परिचय देता है।

'हार न मानो, जीवन में हैं / यक्ष-प्रश्न अनगिन', सच न झूठ से हार मानता / हार सोचना भी अनुचित है, 'मंजिल के संदेशे आते / लगते हम किस्मतवाले हैं' द्युति चमके मचले पुरवाई / रस-विभोर उमगे तरुणाई', 'शक्ति के आधार हैं / अरुणिम सवेरे' तथा 'घोर अँधेरा अब न सहेंगी / खोल रही हैं बंद खिड़कियाँ / चौखट बढ़कर / लाँघ रही हैं / दृष्टि नई / दे रही बेटियाँ', 'आओ, हम यूँ शुरुआत करें / सुख-दुःख बाँटे / कुछ बात करें' आदि में आशावाद की झलक से नवगीत को एकांगी होने से बचाना सफल जी की ऐसी सफलता है जिससे अधिकांश नवगीतकार वंचित रहे हैं. संभव है कि वैचारिक प्रतिबद्धता से ग्रस्त पूर्वाग्रही समीक्षक ऐसे नवगीतों को नवगीत मानाने से ही इनकार कर दें किंतु देवेंद्र जी को उनकी परवाह ना करते हुए ऐसे नवगीत इतनी अधिक संख्या में रचने चाहिए कि नवगीत की भावी परिभाषा पराजय, कुंठा, पीड़ा से अधिक संघर्ष, प्रयास, विश्वास और साफल्य के रूप में हो। 'उजाला बनकर / अँधेरी / रात को खलिए' तथा 'आनेवाली पीढ़ी को हम / आओ, सुखद जवानी दे दें / अपने जले पाँव हों चाहे / उनको शाम सुहानी दे दें' जैसे नवगीत वास्तव में नयेपन की ओर बढ़ते नवगीत की ऐसी भाव मुद्राएँ हैं जिन्हें स्वीकारने में संकीर्ण-दृष्टि आलोचक को समय लगेगा। नए नवगीतकारों को यह परंपरा सुदृढ़ बनाने के प्रयास कर खुद को स्थापित करना होगा ताकि नवगीत भी कल्पना के खुले आकाश में साँस ले सके।
*
समीक्षक संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संसथान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन जबलपुर ४८२००१, चलभाष ७९९९५५९६१८, ९४२५१८३२४४, salil.sanjiv@gmail.com
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अंतरजाल पर श्रीगणेश के नामों रे गलत अर्थ

ॐ श्री गणेश १०९  नाम
१.बालगणपति : सबसे प्रिय बालक
२. भालचन्द्र : जिसके मस्तक पर चंद्रमा हो
३. बुद्धिनाथ : बुद्धि के भगवान
४. धूम्रवर्ण : धुंए को उड़ाने वाला
५. एकाक्षर : एकल अक्षर
६. एकदन्त : एक दांत वाले
७. गजकर्ण : हाथी की तरह कानवाला
८. गजानन : हाथी के मुख वाले भगवान
९. गजदंत : हाथी के दाँतवाले भगवान
१०. गजवक्र : हाथी की सूंड वाला
११. गजवक्त्र : जिसका हाथी की तरह मुँह है
१२. गणाध्यक्ष : सभी गणों के मालिक
१३. गणपति : सभी गणों के मालिक
१४. गौरीसुत : माता गौरी के पुत्र
१५. लम्बकर्ण : बड़े कान वाले
१६. लम्बोदर : बड़े पेट वाले
१७. महाबल : बलशाली
१८. महागणपति : देवो के देव
१९. महेश्वर : ब्रह्मांड के भगवान
२०. मंगलमूर्त्ति : शुभ कार्य के देव
२१. मूषकवाहन : जिसका सारथी चूहा
२२. निदीश्वरम : धन और निधि के दाता
२३. प्रथमेश्वर : सब के बीच प्रथम आने वाले
२४. शूपकर्ण : बड़े कान वाले
२५. शुभम : सभी शुभ कार्यों के प्रभु
२६. सिद्धिदाता : इच्छाओं और अवसरों के स्वामी
२७. सिद्दिविनायक : सफलता के स्वामी
२८. सुरेश्वरम : देवों के देव
२९. वक्रतुण्ड : घुमावदार सूंड
३०. अखूरथ : जिसका सारथी मूषक है
३१. अलम्पता : अनन्त देव
३२. अमित : अतुलनीय प्रभु
३३. अनन्तचिदरुपम : अनंत और व्यक्ति चेतना
३४. अवनीश : पूरे विश्व के प्रभु
३५. अविघ्न : बाधाओं को हरने वाले
३६. भीम : विशाल
३७. भूपति : धरती के मालिक
३८. भुवनपति : देवों के देव
३९. बुद्धिप्रिय : ज्ञान के दाता
४०. बुद्धिविधाता : बुद्धि के मालिक
४१. चतुर्भुज : चार भुजाओं वाले
४२. देवादेव : सभी भगवान में सर्वोपरी
४३. देवांतकनाशकारी : बुराइयों और असुरों के विनाशक
४४. देवव्रत : सबकी तपस्या स्वीकार करने वाले
४५. देवेन्द्राशिक : सभी देवताओं की रक्षा करने वाले
४६. धार्मिक : दान देने वाला
४७. दूर्जा : अपराजित देव
४८. द्वैमातुर : दो माताओं वाले
४९ . एकदंष्ट्र : एक दांत वाले
५०. ईशानपुत्र : भगवान शिव के बेटे
५१. गदाधर : जिसका हथियार गदा है
५२. गणाध्यक्षिण : सभी पिंडों के नेता
५३. गुणिन : जो सभी गुणों के ज्ञानी
५४. हरिद्र : स्वर्ण के रंग वाला
५५. हेरम्ब : माँ का प्रिय पुत्र
५६. कपिल : पीले भूरे रंग वाला
५७. कवीश : कवियों के स्वामी
५८. कीर्त्ति : यश के स्वामी
५९. कृपाकर : कृपा करने वाले
६०. कृष्णपिंगाश : पीली भूरि आंख वाले
६१. क्षेमंकरी : माफी प्रदान करने वाला
६२. क्षिप्रा : आराधना के योग्य
६३. मनोमय : दिल जीतने वाले
६४. मृत्युंजय : मौत को हरने वाले
६५. मूढ़ाकरम : जिनमें खुशी का वास होता है
६६. मुक्तिदायी : शाश्वत आनंद के दाता
६७. नादप्रतिष्ठित : जिसे संगीत से प्यार हो
६८. नमस्थेतु : सभी बुराइयों और पापों पर विजय प्राप्त करने वाले
६९. नन्दन : भगवान शिव का बेटा
७०. सिद्धांथ : सफलता और उपलब्धियों की गुरु
७१. पीताम्बर : पीले वस्त्र धारण करने वाला
७२. प्रमोद : आनंद
७३. पुरुष : अद्भुत व्यक्तित्व
७४. रक्त : लाल रंग के शरीर वाला
७५. रुद्रप्रिय : भगवान शिव के चहीते
७६. सर्वदेवात्मन : सभी स्वर्गीय प्रसाद के स्वीकर्ता
७७. सर्वसिद्धांत : कौशल और बुद्धि के दाता
७८. सर्वात्मन : ब्रह्मांड की रक्षा करने वाला
७९. ओमकार : ओम के आकार वाला
८०. शशिवर्णम : जिसका रंग चंद्रमा को भाता हो
८१. शुभगुणकानन : जो सभी गुण के गुरु हैं
८२. श्वेता : जो सफेद रंग के रूप में शुद्ध है
८३. सिद्धिप्रिय : इच्छापूर्ति वाले
८४. स्कन्दपूर्वज : भगवान कार्तिकेय के भाई
८५. सुमुख : शुभ मुख वाले
८६. स्वरुप : सौंदर्य के प्रेमी
८७. तरुण : जिसकी कोई आयु न हो
८८. उद्दण्ड : शरारती
८९. उमापुत्र : पार्वती के बेटे
९०. वरगणपति : अवसरों के स्वामी
९१. वरप्रद : इच्छाओं और अवसरों के अनुदाता
९२. वरदविनायक : सफलता के स्वामी
९३. वीरगणपति : वीर प्रभु
९४. विद्यावारिधि : बुद्धि की देव
९५. विघ्नहर : बाधाओं को दूर करने वाले
९६. विघ्नहर्त्ता : बुद्धि की देव
९७. विघ्नविनाशन : बाधाओं का अंत करने वाले
९८. विघ्नराज : सभी बाधाओं के मालिक
९९. विघ्नराजेन्द्र : सभी बाधाओं के भगवान
१००. विघ्नविनाशाय : सभी बाधाओं का नाश करने वाला
१०१. विघ्नेश्वर : सभी बाधाओं के हरने वाले भगवान
१०२. विकट : अत्यंत विशाल
१०३. विनायक : सब का भगवान
१०४. विश्वमुख : ब्रह्मांड के गुरु
१०५. विश्वराजा : संसार के स्वामी
१०६. यज्ञकाय : सभी पवित्र और बलि को स्वीकार करने वाला
१०७. यशस्कर : प्रसिद्धि और भाग्य के स्वामी
१०८. यशस्विन : सबसे प्यारे और लोकप्रिय देव
१०९. योगाधिप : ध्यान के प्रभु