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शनिवार, 23 दिसंबर 2017

shuddha dhvani chhand

रसानंद दे छंद नर्मदा ११४ : शुद्धध्वनि छंद
​​​​दोहा, ​सोरठा, रोला, ​आल्हा, सार​,​ ताटंक (चौबोला), रूपमाला (मदन), चौपाई​, ​हरिगीतिका, उल्लाला​, गीतिका, ​घनाक्षरी, बरवै, त्रिभंगी, सरसी, छप्पय, भुजंगप्रयात, कुंडलिनी, सवैया, शोभन/सिंहिका, सुमित्र, सुगीतिका , शंकर, मनहरण (कवित्त/घनाक्षरी), उपेन्द्रव​ज्रा, इंद्रव​​ज्रा, सखी​, विधाता/शुद्धगा, वासव​, ​अचल धृति​, अचल​​, अनुगीत, अहीर, अरुण, अवतार, ​​उपमान / दृढ़पद, एकावली, अमृतध्वनि, नित, आर्द्रा, ककुभ/कुकभ, कज्जल, कमंद, कामरूप, कामिनी मोहन (मदनावतार), काव्य, वार्णिक कीर्ति, कुंडल, गीता, गंग, चण्डिका, चंद्रायण, छवि (मधुभार), जग, जाया, तांडव, तोमर, त्रिलोकी, दिग्पाल / दिक्पाल / मृदुगति, दीप, दीपकी, दोधक, निधि, निश्चल, प्लवंगम, प्रतिभा, प्रदोष, प्रेमा, बाला, भव, भानु, मंजुतिलका, मदनाग, मधुमालती, मनमोहन, मनोरम, मानव, माली (राजीवगण), मरहठा, चुलियाला, मरहठा माधवी, मोहन, निश्छल, योग, रसामृत, रसाल (सुमित्रा), राग, रामा, राधिका, ऋद्धि, निधि, लीला, वस्तुवदनक, वाणी, विमोहा, विरहणी, विशेषिका, माया / मत्तमयूर, माला / चंद्रावती / मणिगुणनिकर, विष्णुपद, शशिवदना /चंडरसा, शास्त्र, शिव, शुभगति / सुगती, विधाता / शुद्धगा छंदों से साक्षात के पश्चात् मिलिए शुद्ध ध्वनि छंद से 


छंद-लक्षण: जाति लाक्षणिक, प्रति चरण मात्रा ३२ मात्रा, यति १८-८-८-६, पदांत गुरु
लक्षण छंद:
लाक्षणिक छंद है / शुद्धध्वनि पद / अंत करे गुरु / यश भी दे
यति रहे अठारह / आठ आठ छह, / विरुद गाइए / साहस ले

चौकल में जगण न / है वर्जित- करि/ए प्रयोग जब / मन चाहे
कह-सुन वक्ता-श्रो/ता हर्षित, सम / शब्द-गंग-रस / अवगाहे


२४ जून १५६४ महारानी दुर्गावती शहादत दिवस पर विशेष रचना
















उदाहरण:
१. बज उठे नगाड़े / गज चिंघाड़े / अंबर फाड़े / भोर हुआ
खुर पटकें घोड़े / बरबस दौड़े / संयम छोड़े / शोर हुआ


गरजे सेनानी / बल अभिमानी / मातु भवानी / जय रेवा
ले धनुष-बाण सज / बड़ा देव भज / सैनिक बोले / जय देवा

कर तिलक भाल पर / चूड़ी खनकीं / अँखियाँ छलकीं / वचन लिया
'सिर अरि का लेना / अपना देना / लजे न माँ का / दूध पिया'

''सौं मातु नरमदा / काली मैया / यवन मुंड की / माल चढ़ा
लोहू सें भर दौं / खप्पर तोरा / पिये जोगनी / शौर्य बढ़ा''

सज सैन्य चल पडी / शोधकर घड़ी / भेरी-घंटे / शंख बजे
दिल कँपे मुगल के / धड़-धड़ धड़के / टँगिया सम्मुख / प्राण तजे

गोटा जमाल था / घुला ताल में / पानी पी अति/सार हुआ
पेड़ों पर टँगे / धनुर्धारी मा/रें जीवन दु/श्वार हुआ

वीरनारायण अ/धार सिंह ने / मुगलों को दी / धूल चटा
रानी के घातक / वारों से था / मुग़ल सैन्य का / मान घटा
रूमी, कैथा भो/ज, बखीला, पं/डित मान मुबा/रक खां लें
डाकित, अर्जुनबै/स, शम्स, जगदे/व, महारख सँग / अरि-जानें

पर्वत से पत्थर / लुढ़काये कित/ने हो घायल / कुचल मरे-
था नत मस्तक लख / रण विक्रम, जय / स्वप्न टूटते / हुए लगे

बम बम भोले, जय / शिव शंकर, हर / हर नरमदा ल/गा नारा

ले जान हथेली / पर गोंडों ने / मुगलों को बढ़/-चढ़ मारा

आसफ खां हक्का / बक्का, छक्का / छूटा याद हु/ई मक्का
सैनिक चिल्लाते / हाय हाय अब / मरना है बिल/कुल पक्का

हो गयी साँझ निज / हार जान रण / छोड़ शिविर में / जान बचा
छिप गया: तोपखा/ना बुलवा, हो / सुबह चले फिर / दाँव नया

रानी बोलीं "हम/ला कर सारी / रात शत्रु को / पीटेंगे
सरदार न माने / रात करें आ/राम, सुबह रण / जीतेंगे

बस यहीं हो गयी / चूक बदनसिंह / ने शराब थी / पिलवाई
गद्दार भेदिया / देश द्रोह कर / रहा न किन्तु श/रम आई

सेनानी अलसा / जगे देर से / दुश्मन तोपों / ने घेरा
रानी ने बाजी / उलट देख सो/चा वन-पर्वत / हो डेरा

बारहा गाँव से / आगे बढ़कर / पार करें न/र्रइ नाला
नागा पर्वत पर / मुग़ल न लड़ पा/येंगे गोंड़ ब/नें ज्वाला

सब भेद बताकर / आसफ खां को / बदनसिंह था / हर्षाया
दुर्भाग्य घटाएँ / काली बनकर / आसमान पर / था छाया

डोभी समीप तट / बंध तोड़ मुग/लों ने पानी / दिया बहा
विधि का विधान पा/नी बरसा, कर / सकें पार सं/भव न रहा

हाथी-घोड़ों ने / निज सैनिक कुच/ले, घबरा रण / छोड़ दिया
मुगलों ने तोपों / से गोले बर/सा गोंडों को / घेर लिया

सैनिक घबराये / पर रानी सर/दारों सँग लड़/कर पीछे
कोशिश में थीं पल/टें बाजी, गिरि / पर चढ़ सकें, स/मर जीतें

रानी के शौर्य-पराक्रम ने दुश्मन का दिल दहलाया था
जा निकट बदन ने / रानी पर छिप / घातक तीर च/लाया था

तत्क्षण रानी ने / खींच तीर फें/का, जाना मु/श्किल बचना
नारायण रूमी / भोज बच्छ को / चौरा भेज, चु/ना मरना

बोलीं अधार से / 'वार करो, लो / प्राण, न दुश्मन / छू पाये'
चाहें अधार लें / उन्हें बचा, तब / तक थे शत्रु नि/कट आये

रानी ने भोंक कृ/पाण कहा: 'चौरा जाओ' फिर प्राण तजा
लड़ दूल्हा-बग्घ श/हीद हुए, सर/मन रानी को / देख गिरा

भौंचक आसफखाँ / शीश झुका, जय / पाकर भी थी / हार मिली
जनमाता दुर्गा/वती अमर, घर/-घर में पुजतीं / ज्यों देवी

पढ़ शौर्य कथा अब / भी जनगण, रा/नी को पूजा / करता है
जनहितकारी शा/सन खातिर नित / याद उन्हें ही / करता है

बारहा गाँव में / रानी सरमन /बग्घ दूल्ह के / कूर बना
ले कंकर एक र/खे हर जन, चुप / वीर जनों को / शीश नवा

हैं गाँव-गाँव में / रानी की प्रति/माएँ, हैं ता/लाब बने
शालाओं को भी , नाम मिला, उन/का- देखें ब/च्चे सपने

नव भारत की नि/र्माण प्रेरणा / बनी आज भी / हैं रानी
रानी दुर्गावति / हुईं अमर, जन / गण पूजे कह / कल्याणी

नर्मदासुता, चं/देल-गोंड की / कीर्ति अमर, दे/वी मैया
जय-जय गाएंगे / सदियों तक कवि/, पाकर कीर्ति क/था-छैंया
*********
टिप्पणी: कूर = समाधि,
दूरदर्शन पर दिखाई गई अकबर की छद्म महानता की पोल रानी की संघर्ष कथा खोलती है.

vidhata / shuddhaga chhand


                                   रसानंद दे छंद नर्मदा ११३: विधाता / शुद्धगा  छंद
​​​​दोहा, ​सोरठा, रोला, ​आल्हा, सार​,​ ताटंक (चौबोला), रूपमाला (मदन), चौपाई​, ​हरिगीतिका, उल्लाला​, गीतिका, ​घनाक्षरी, बरवै, त्रिभंगी, सरसी, छप्पय, भुजंगप्रयात, कुंडलिनी, सवैया, शोभन/सिंहिका, सुमित्र, सुगीतिका , शंकर, मनहरण (कवित्त/घनाक्षरी), उपेन्द्रव​ज्रा, इंद्रव​​ज्रा, सखी​, विधाता/शुद्धगा, वासव​, ​अचल धृति​, अचल​​, अनुगीत, अहीर, अरुण, अवतार, ​​उपमान / दृढ़पद, एकावली, अमृतध्वनि, नित, आर्द्रा, ककुभ/कुकभ, कज्जल, कमंद, कामरूप, कामिनी मोहन (मदनावतार), काव्य, वार्णिक कीर्ति, कुंडल, गीता, गंग, चण्डिका, चंद्रायण, छवि (मधुभार), जग, जाया, तांडव, तोमर, त्रिलोकी, दिग्पाल / दिक्पाल / मृदुगति, दीप, दीपकी, दोधक, निधि, निश्चल, प्लवंगम, प्रतिभा, प्रदोष, प्रेमा, बाला, भव, भानु, मंजुतिलका, मदनाग, मधुमालती, मनमोहन, मनोरम, मानव, माली (राजीवगण), मरहठा, चुलियाला, मरहठा माधवी, मोहन, निश्छल, योग, रसामृत, रसाल (सुमित्रा), राग, रामा, राधिका, ऋद्धि, निधि, लीला, वस्तुवदनक, वाणी, विमोहा, विरहणी, विशेषिका, माया / मत्तमयूर, माला / चंद्रावती / मणिगुणनिकर, विष्णुपद, शशिवदना /चंडरसा, शास्त्र, शिव, शुभगति/सुगती छंदों से साक्षात के पश्चात् मिलिए विधाता / शुद्धगा छंद से 


छंद लक्षण:  जाति यौगिक, प्रति पद २८ मात्रा, 
                   यति ७-७-७-७ / १४-१४ , ८ वीं - १५ वीं मात्रा लघु 
विशेष: उर्दू बहर हज़ज सालिम 'मुफाईलुन मुफाईलुन मुफाईलुन मुफाईलुन' इसी छंद पर आधारित है. 

लक्षण छंद:


    विधाता को / नमन कर ले , प्रयासों को / गगन कर ले 
    रंग नभ पर / सिंधु में जल , साज पर सुर / अचल कर ले 
    सिद्धि-तिथि लघु / नहीं कोई , दिखा कंकर / मिला शंकर  
    न रुक, चल गिर / न डर, उठ बढ़ , सीकरों को / सलिल कर ले        
    संकेत: रंग =७, सिंधु = ७, सुर/स्वर = ७, अचल/पर्वत = ७ 
               सिद्धि = ८, तिथि = १५ 
उदाहरण:


१.  न बोलें हम न बोलो तुम , सुनें कैसे बात मन की?       
    न तोलें हम न तोलो तुम , गुनें कैसे जात तन की ?  
    न डोलें हम न डोलो तुम , मिलें कैसे श्वास-वन में?   
    न घोलें हम न घोलो तुम, जियें कैसे प्रेम धुन में? 
     जात = असलियत, पानी केरा बुदबुदा अस मानुस की जात 

२. ज़माने की निगाहों से , न कोई बच सका अब तक
   निगाहों ने कहा अपना , दिखा सपना लिया ठग तक     
   गिले - शिकवे करें किससे? , कहें किसको पराया हम?         
   न कोई है यहाँ अपना , रहें जिससे नुमायाँ हम  

३. है हक़ीक़त कुछ न अपना , खुदा की है ज़िंदगानी          
    बुन रहा तू हसीं सपना , बुजुर्गों की निगहबानी
    सीखता जब तक न तपना , सफलता क्यों हाथ आनी?  
    कोशिशों में खपा खुदको , तब बने तेरी कहानी

४. जिएंगे हम, मरेंगे हम, नहीं है गम, न सोचो तुम 
    जलेंगे हम, बुझेंगे हम, नहीं है तम, न सोचो तुम 
    कहीं हैं हम, कहीं हो तुम, कहीं हैं गम, न सोचो तुम 
    यहीं हैं हम, यहीं हो तुम, नहीं हमदम, न सोचो तुम 
                         *********

shubha gati / sugati chhand

रसानंद दे छंद नर्मदा ११२: शुभगति /सुगती छंद
​​​​दोहा, ​सोरठा, रोला, ​आल्हा, सार​,​ ताटंक (चौबोला), रूपमाला (मदन), चौपाई​, ​हरिगीतिका, उल्लाला​, गीतिका, ​घनाक्षरी, बरवै, त्रिभंगी, सरसी, छप्पय, भुजंगप्रयात, कुंडलिनी, सवैया, शोभन/सिंहिका, सुमित्र, सुगीतिका , शंकर, मनहरण (कवित्त/घनाक्षरी), उपेन्द्रव​ज्रा, इंद्रव​​ज्रा, सखी​, विधाता/शुद्धगा, वासव​, ​अचल धृति​, अचल​​, अनुगीत, अहीर, अरुण, अवतार, ​​उपमान / दृढ़पद, एकावली, अमृतध्वनि, नित, आर्द्रा, ककुभ/कुकभ, कज्जल, कमंद, कामरूप, कामिनी मोहन (मदनावतार), काव्य, वार्णिक कीर्ति, कुंडल, गीता, गंग, चण्डिका, चंद्रायण, छवि (मधुभार), जग, जाया, तांडव, तोमर, त्रिलोकी, दिग्पाल / दिक्पाल / मृदुगति, दीप, दीपकी, दोधक, निधि, निश्चल, प्लवंगम, प्रतिभा, प्रदोष, प्रेमा, बाला, भव, भानु, मंजुतिलका, मदनाग, मधुमालती, मनमोहन, मनोरम, मानव, माली (राजीवगण), मरहठा, चुलियाला, मरहठा माधवी, मोहन, निश्छल, योग, रसामृत, रसाल (सुमित्रा), राग, रामा, राधिका, ऋद्धि, निधि, लीला, वस्तुवदनक, वाणी, विमोहा, विरहणी, विशेषिका, माया / मत्तमयूर, माला / चंद्रावती / मणिगुणनिकर, विष्णुपद, शशिवदना /चंडरसा, शास्त्र, शिव छंदों से साक्षात के पश्चात् मिलिए शुभगति/सुगती छंद से 


लक्षण: सात मात्रिक लौकिक जातीय छंद, २१ प्रकार, पदांत गुरु। 
उदाहरण:
१. जो हो रहा 
   वह देखिए।
   क्या ठीक है 
   यह लेखिए। 
   जो है गलत 
   ठुकराइए।
   जो है सही 
   अपनाइए। 
   खुद से न डर 
   खुद भागिए।
   संघर्ष को 
   अनुरागिए। 
   ***

shiv chhand

रसानंद दे छंद नर्मदा १११: शिव  छंद
​​​​दोहा, ​सोरठा, रोला, ​आल्हा, सार​,​ ताटंक (चौबोला), रूपमाला (मदन), चौपाई​, ​हरिगीतिका, उल्लाला​, गीतिका, ​घनाक्षरी, बरवै, त्रिभंगी, सरसी, छप्पय, भुजंगप्रयात, कुंडलिनी, सवैया, शोभन/सिंहिका, सुमित्र, सुगीतिका , शंकर, मनहरण (कवित्त/घनाक्षरी), उपेन्द्रव​ज्रा, इंद्रव​​ज्रा, सखी​, विधाता/शुद्धगा, वासव​, ​अचल धृति​, अचल​​, अनुगीत, अहीर, अरुण, अवतार, ​​उपमान / दृढ़पद, एकावली, अमृतध्वनि, नित, आर्द्रा, ककुभ/कुकभ, कज्जल, कमंद, कामरूप, कामिनी मोहन (मदनावतार), काव्य, वार्णिक कीर्ति, कुंडल, गीता, गंग, चण्डिका, चंद्रायण, छवि (मधुभार), जग, जाया, तांडव, तोमर, त्रिलोकी, दिग्पाल / दिक्पाल / मृदुगति, दीप, दीपकी, दोधक, निधि, निश्चल, प्लवंगम, प्रतिभा, प्रदोष, प्रेमा, बाला, भव, भानु, मंजुतिलका, मदनाग, मधुमालती, मनमोहन, मनोरम, मानव, माली (राजीवगण), मरहठा, चुलियाला, मरहठा माधवी, मोहन, निश्छल, योग, रसामृत, रसाल (सुमित्रा), राग, रामा, राधिका, ऋद्धि, निधि, लीला, वस्तुवदनक, वाणी, विमोहा, विरहणी, विशेषिका, माया / मत्तमयूर, माला / चंद्रावती / मणिगुणनिकर, विष्णुपद, शशिवदना /चंडरसा, शास्त्र  छंदों से साक्षात के पश्चात् मिलिए शिव छंद से 


लक्षण: जाति रौद्र, पद २, चरण ४, प्रति चरण मात्रा ११, ३ री, ६ वी, ९ वी मात्र लघु, मात्रा बाँट ३-३-३-२, चरणान्त लघु लघु गुरु (सगण), गुरु गुरु गुरु (मगण) या लघु लघु लघु  (नगण), तीव्र प्रवाह।  
लक्षण छंद:
शिव-शिवा रहें सदय, रूद्र जग करें अभय 
भक्ति भाव से नमन, माँ दया मिले समन 
(संकेत: रूद्र = ११ मात्रा, समन = सगण, मगण, नगण) 
उदाहरण:
१. हम जहाँ रहें सनम, हो वहाँ न आँख नम 
   कुछ न याद हो 'सलिल', जब समीप आप-हम 
  
२. आज ना अतीत के, हार के  न जीत के 
    आइये रचें विहँस, मीत! गीत प्रीत के 
    नीत में अनीत में, रीत में कुरीत में 
    भेद-भाव कर सकें, गीत में अगीत में 
    
३. आप साथ हों सदा, मोहती रहे अदा 
    एक मैं नहीं रहूँ, आप भी रहें फ़िदा 
    
४. फिर चुनाव आ रहे, फिर उलूक गा रहे
    मतदाता आज फिर, हाय ठगे जा रहे 
    केर-बेर साथ हैं, मैल भरे हाथ हैं 
    झूठ करें वायदे, तोड़ें खुद कायदे 
    सत्ता की चाह है, आपस में डाह है 
    रीति-नीति भूलते, सपनों में झूलते
टीप: श्यामनारायण पाण्डेय ने अभिनव प्रयोग कर शिव छंद को केवल ९ वीं मात्रा लघु रखकर रचा है. इससे छंद की लय में कोई अंतर नहीं आया. तदनुसार प्रस्तुत है उदाहरण ४.
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दोहा दुनिया

लोभ, मोह, मद शूल हैं,
शिव जी लिए त्रिशूल.
मुक्त हुए, सब को करें,
मनुज न करना भूल.
.
जो त्रिशूल के लक्ष्य पर,
निश्चय होता नष्ट.
बाणासुर से पूछिए,
भ्रष्ट भोगता कष्ट.
.
तीन लोक रख सामने,
रहता मौन त्रिशूल.
अत्याचारी को मिले,
दंड हिला दे चूल.
.
जर जमीन जोरू 'सलिल',
झगड़े की जड़ तीन.
शिव त्रिशूल छोड़े नहीं,
भूल अगर संगीन.
.
शिव-त्रिशूल से काँपते,
देव दनुज नर प्रेत.
जो सम्मुख आया, हुआ
शिव प्रहार से खेत.
...
22.12.2017

दोहा दुनिया

डिम-डिम डमरू-नाद है,
शिव-तात्विक उद्घोष.
अशुभ भूल, शुभ ध्वनि सुनें,
नाद अनाहद कोष.
.
डमरू के दो शंकु हैं,
सत्-तम का संयोग.
डोर-छोर श्वासास है,
नाद वियोगित योग.
.
डमरू अधर टँगा रहे,
नभ-भू मध्य विचार.
निराधार-आधार हैं,
शिविर जी परम उदार.
.
डमरू नाग त्रिशूल शशि,
बाघ-चर्म रुद्राक्ष.
वृषभ गंग गणपति उमा
कार्तिक भस्म शिवाक्ष.
.
तेरह तत्व त्रयोदशी,
कभी नहीं भूलें भक्त.
कर प्रदोष व्रत, दोष से
मुक्त, रहें अनुरक्त.
.
शिव विराग-अनुराग हैं,
क्रोधी परम प्रशांत.
कांता कांति अजर शिवा,
नमन अमर शिव कांत.
.
गौरी-काली एक हैं,
गौरा-काला एक.
जो बतलाए सत्य यह्,
वही राह है नेक.
...
23.12.2017

शुक्रवार, 22 दिसंबर 2017

सामयिक गीत

एक रचना :
नूराकुश्ती खेल रहे हो
देश गर्त में ठेल रहे हो
*
तुम ही नहीं सयाने जग में
तुम से कई समय के मग में
धूल धूसरित पड़े हुए हैं
शमशानों में गड़े हुए हैं
अवसर पाया काम करो कुछ
मिलकर जग में नाम करो कुछ
रिश्वत-सुविधा-अहंकार ही
झिल रहे हो, झेल रहे हो
नूराकुश्ती खेल रहे हो
देश गर्त में ठेल रहे हो
*
दलबंदी का दलदल घटक
राजनीति है गर्हित पातक
अपना पानी खून बतायें
खून और का व्यर्थ बहायें
सच को झूठ, झूठ को सच कह
मैली चादर रखते हो तह
देशहितों की अनदेखी कर
अपनी नाक नकेल रहे हो
नूराकुश्ती खेल रहे हो
देश गर्त में ठेल रहे हो
*

गुरुवार, 21 दिसंबर 2017

navgeet

नवगीत- नया हस्ताक्षर
संवाद



सुनीता सिंह
*
क्या सोच कर
आईं यहाँ तुम
और क्या तुमको मिला है?
कह सकोगी??
.
चुन लिये माँ-बाप तुमने
इस धरा पर
आगमन को.
यह बताओ
देह देकर आत्मा को
कर सकीं
अपना चमन को?
कुछ कहो तो.

थे सुनहरे
ख्वाब जीने के
मिला तुमको सिला क्या?
कह सकोगी?
.
जब हुआ मालूम
पलती कोख में
नव चाँदनी है
यह बताओ
क्या हुई हलचल? समा क्या था?
खुशी थी या उदासी?
कुछ कहो भी.

आई हो तुम मान अपना
जिन जनों को
मिली उन निर्मोहियों से पीर कितनी
कह सकोगी?
.
साँस चलती, रोकने
मिल कैचियाँ
आगे बढ़ीं,
कैसे? बताओ.
कट रहे थे
अंग, घुटती सांस
की चीत्कार बेबस
भी सुनाओ।


सुन मौन चीखें
विधाता ने
दिया है अभिशाप कितना,
कह सकोगी?
****
18-12-2017

दोहा दुनिया

शिवजी के दरबार में.
ऊँच न कोई नीच.
ह्रदय-बाग जल-भक्ति से,
कर्म-पौध नित सींच.
.
नाग गले, शशि शीश पर,
नंदी भू-आसीन.
शिवा-सिंह से स्नेह पा,
हुए भक्ति में लीन.
.
शशि अमृत का कोश है.
शशि सौंदर्य-निधान.
शिव-अनुकम्पा से बढा,
शशि का भव में मान.
.
स्नेह पाल शशि से सलिल,
शिव देखें जा झाँक.
जगत्पिता की छवि तुरत,
मन मंदिर में आँक.
.
शीश बचा शशि से, न वह
हो जाए आसीन.
धुनी रमाना पड़ेगी,
ले मसान में बीन.
.
शिवा देख शशि-रूप को,
करें ईर्ष्या-मान.
'शिवा! पूर्ण शशि तवानन',
शिव बोले- 'तज मान'.
.
शंभु-शीश शशि बसा, नभ
दीन, अँधेरी रात.
शुक्ल पक्ष नभ, कृष्ण शिव
रखें कहें जग-मात.
.
21.12.17

बुधवार, 20 दिसंबर 2017

दोहा दुनिया

शिखा वार्ष्णेय :
शिखा जला साहित्य की, करती रहें प्रकाश
पैर जमा कर धरा पर, छू लें हँस आकाश
*
अपर्णा खरे :
नहीं अपर्णा अपर्णा, रचना पर्ण अनेक
दें बिखेर नव मूल्य दें, जिनसे जगे विवेक
*

द्विपदी

बड़े भैया !
विख्यात हिंदीविद, उपन्यासकार, नाटककार
डॉ. सुरेश वर्मा के जन्म दिवस पर
अनंत प्रणाम, शुभकामनाएँ 

चित्र में ये शामिल हो सकता है: 1 व्यक्ति, चश्मे

गहरी आँखें, गहरा चिन्तन,  सुमधुर मीठे बोल
कलम चले जब रख देती है सच अनजाना खोल
चिन्तन-मनन धर्म जीवन का, शब्दाराधन कर्म
शत वंदन कर सलिल धन्य है, फले पुण्य के कर्म
सादर प्रणाम
संजीव  

doha -सुमनलता



विदुषी कहानीकार सुमनलता श्रीवास्तव के
जन्मदिवस पर प्रणतांजलि:
*
सुमन लिए श्री धरा पर, देती गंध बिखेर
आ महेंद्र ने समेटा, किंचित करी न देर
*
सुर वाणी से स्नेह है, जग वाणी से प्यार
कलम सु-मन के भाव को, देती सतत निखार
*
शत वर्षों तक सृजन से, भर हिंदी का कोष
सकल जगत में व्याप्त हों, तब ही हो संतोष
*   

doha

चित्र में ये शामिल हो सकता है: 1 व्यक्ति, चश्मे और क्लोज़अप

प्रिय रघुवीर अम्बर के जन्म दिन पर दोहे 
अम्बर पर रघुवीर हैं, सीता भू पर व्यस्त
मानस कैसे लिखेंगे, तुलसी बेहद त्रस्त
.
अम्बर ने रघुवीर को, दिया धरा पर भेज
नील नील को देखकर, यादे रहा सहेज
.
अम्बर से रघुवीर आ, जन्मे भू पर आज
'सलिल' बधाई गीत गा, साध जाएँ सब काज
अनंत शुभ कामनाएँ 

bal haiku

बाल हाइकु
*
ठेंगा दिखाया
भाग गया आर्युष
नटखट है
.
पहले झेंपा
आर्यन फिर हँसा
जुगलबंदी
.
कविता-गीत
जाने क्या-क्या लिखती
मम्मी मुस्काती
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navgeet

नवगीत -
भीड़ में
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भीड़ में भी
है अकेला आदमी
*
नाम के रिश्ते कई हैं
काम का कोई नहीं
भोर के चाहक अनेकों
शाम का कोई नहीं
पुरातन है
हर नवेला आदमी
भीड़ में भी
है अकेला आदमी
*
गलत को कहते सही
पर सही है कोई नहीं
कौन सी है आँख जो
मिल-बिछुड़कर कोई नहीं
पालता फिर भी
झमेला आदमी
भीड़ में भी
है अकेला आदमी
*
जागती है आँख जो
केवल वही सोई नहीं
उगाती फसलें सपन की
जो कभी बोईं नहीं
कौन सा संकट
न झेला आदमी
भीड़ में भी
है अकेला आदमी
*

दोहा दुनिया

शिव जैसा दूजा नहीं,
अपनी आप मिसाल.
कभी स्याह दिखते कभी,
जलती हुई मशाल.
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पूजा-भेंट न चाहिए,
चाहें श्रद्धा-भाव.
भूत, सुरासुर, नर सभी,
झुकते मान प्रभाव.
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शिवा सुनीता पुनीता,
शिव का अशुभ सिँगार.
श्वेत-श्याम संगम करे
सकल सृष्टि-उद्धार.
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शिवता में प्रभुता नहीं,
प्रभुता प्रभु का भाव.
प्रभुओं के प्रभु-पूज्य शिव,
शिवज कृपा सम्भाव.
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शिवा न शिव बिन पूर्ण हैं,
शिव न शिवा बिन पूर्ण.
बिना शिवा-शिव सृष्टि ही,
सारी रहे अपूर्ण.
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20.12.2018

मंगलवार, 19 दिसंबर 2017

kundaliya

कुंडलिया
वादे कर जो भुला दे, वह खोता विश्वास.
ऐसे नेता से नहीं, जनता को कुछ आस.
जनता को कुछ आस, स्वार्थ ही वह साधेगा.
भूल देश-हित दल का हित ही आराधेगा.
सलिल कहे क्यों दल-हित को जनता पर लादे.
वह खोता विश्वास भला दे जो कर वादे
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