मुक्तिका:
किस्मत को मत रोया कर.
संजीव 'सलिल'
*
किस्मत को मत रोया कर.
प्रति दिन फसलें बोया कर..
श्रम सीकर पावन गंगा.
अपना बदन भिगोया कर..
बहुत हुआ खुद को ठग मत
किन्तु, परन्तु, गोया कर..
मन-पंकज करना है तो,
पंकिल पग कुछ धोया कर..
कुछ दुनियादारी ले सीख.
व्यर्थ न पुस्तक ढोया कर..
'सलिल' देखने स्वप्न मधुर
बेच के घोड़ा सोया कर..
********************
दिव्य नर्मदा : हिंदी तथा अन्य भाषाओँ के मध्य साहित्यिक-सांस्कृतिक-सामाजिक संपर्क हेतु रचना सेतु A plateform for literal, social, cultural and spiritual creative works. Bridges gap between HINDI and other languages, literature and other forms of expression.
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सोमवार, 4 अक्टूबर 2010
मुक्तिका: किस्मत को...... ----संजीव 'सलिल'
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रविवार, 3 अक्टूबर 2010
मुक्तिका: घर तो घर है संजीव 'सलिल'
मुक्तिका:
घर तो घर है
संजीव 'सलिल'
*
घर तो घर है, बैठिए, आँगन में या परछी में आप.
बात इतनी सी है सब पर छोड़िए कुछ अपनी छाप..
जब कहें कुछ, जब सुनें कुछ, गैर भी चर्चा में हों.
ये न हो कुछ के ही सपने, जाएँ सारे घर में व्याप..
मिठाई के साथ, खट्टा-चटपटा भी चाहिए.
बंदिशों-जिद से लगे, घर जेल, थाना या है खाप..
अपनी-अपनी चाहतें हैं, अपने-अपने ख्वाब हैं.
कौन किसके हौसलों को कब सका है कहें नाप?
परिंदे परवाज़ तेरी कम न हो, ना पर थकें.
आसमाँ हो कहीं का बिजली रहे करती विलाप..
मंजिलों का क्या है, पग चूमेंगी आकर खुद ही वे.
हौसलों का थाम तबला, दे धमाधम उसपे थाप..
इरादों को, कोशिशों को बुलंदी हर पल मिले.
विकल्पों को तज सकें संकल्प अंतर्मन में व्याप..
******************
घर तो घर है
संजीव 'सलिल'
*
घर तो घर है, बैठिए, आँगन में या परछी में आप.
बात इतनी सी है सब पर छोड़िए कुछ अपनी छाप..
जब कहें कुछ, जब सुनें कुछ, गैर भी चर्चा में हों.
ये न हो कुछ के ही सपने, जाएँ सारे घर में व्याप..
मिठाई के साथ, खट्टा-चटपटा भी चाहिए.
बंदिशों-जिद से लगे, घर जेल, थाना या है खाप..
अपनी-अपनी चाहतें हैं, अपने-अपने ख्वाब हैं.
कौन किसके हौसलों को कब सका है कहें नाप?
परिंदे परवाज़ तेरी कम न हो, ना पर थकें.
आसमाँ हो कहीं का बिजली रहे करती विलाप..
मंजिलों का क्या है, पग चूमेंगी आकर खुद ही वे.
हौसलों का थाम तबला, दे धमाधम उसपे थाप..
इरादों को, कोशिशों को बुलंदी हर पल मिले.
विकल्पों को तज सकें संकल्प अंतर्मन में व्याप..
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परिचर्चा: अयोध्या का सबक आचार्य संजीव 'सलिल'
परिचर्चा:
अयोध्या : कल, आज और कल
अयोध्या : कल, आज और कल
आचार्य संजीव 'सलिल'
राम-मंदिर और बाबरी मस्जिद विवाद का निर्णय आ ही गया. न्यायालय ने चीन्ह-चीन्ह कर रेवड़ी बाँट दी. न किसी पक्ष को संतुष्ट होना था, न हुआ. दोनों उच्चतम न्यायलय में जाने को तैयार हैं.
अयोध्या का अथवा बहर का आम आदमी न इसके साथ है, न उसके. अयोध्या में न कोई उद्योग-धंधा, कल-कारखाना नहीं है. खेती या धर्मस्थान जाने जानेवाले तीर्थ यात्री ही उनकी आजीविका का साधन उपलब्ध कराते हैं. स्वाभाविक है कि स्थानीय जन बाहरी नेताओं और लोगों सर अलग सिर्फ शांति चाहते हैं ताकि उन्हें गुजर-बसर के लिये धन-अर्जन के अवसर मिलते रहें.
भविष्य में शांति के लिये विवादित स्थल को न्यायालय द्वारा राम-जन्म भूमि मान लिये जाने, स्थल पर राम भक्तों का आधिपत्य तथा श्री राम का पूजन होने के कारण मूर्ति या मन्दिर को हटाया जाना लगभग असंभव है,
अयोध्या मुसलमानों के लिये तीर्थ न था, न है, न होगा. वहाँ तो विवाद के कारण विघ्नसंतोषी चंद मुसलमान सक्रिय हो गए थे. स्थानीय मुसलमानों को रोजी-रोटी राम मंदिर जानेवाले यात्रियों से ही मिलती है. वहाँ अन्य कई मस्जिदें हैं जिनमें वे नमाज़ पढ़ते हैं. विवादित ढाँचे में विवाद के पहले भी नमाज़ नहीं पढ़ी जाती थी. अब मंदिर के समीप नयी मस्जिद बनाने का अर्थ नए विवाद के बीज बोना है. बेहतर है कि अन्य मस्जिदों का विस्तार और सुद्रढ़ीकरण हो. नयी मस्जिद बनानी ही हो तो मंदिर से दूर बने ताकि एक-दूसरे के कार्यक्रमों में विघ्न न हो.
जनता का साथ न होने, निर्णय में हुए विलम्ब के कारण थकन व् साधनाभाव तथा पूर्ण जीत न होने से राम मंदिर पक्ष के लोग अभी वाराणसी के विश्वनाथ मंदिर तथा मथुरा के कृष्ण मंदिर के सम्बन्ध में मौन हैं किन्तु यह निश्चित है कि राम मंदिर पूर्ण होते ही इन दोनों स्थानों से मस्जिदें हटाने की माँग जोर पकड़ेगी.
आप का इस सन्दर्भ में क्या सोचना है? आइये निष्पक्ष तरीके से तथ्यपरक बातें करें....
राम-मंदिर और बाबरी मस्जिद विवाद का निर्णय आ ही गया. न्यायालय ने चीन्ह-चीन्ह कर रेवड़ी बाँट दी. न किसी पक्ष को संतुष्ट होना था, न हुआ. दोनों उच्चतम न्यायलय में जाने को तैयार हैं.
अयोध्या का अथवा बहर का आम आदमी न इसके साथ है, न उसके. अयोध्या में न कोई उद्योग-धंधा, कल-कारखाना नहीं है. खेती या धर्मस्थान जाने जानेवाले तीर्थ यात्री ही उनकी आजीविका का साधन उपलब्ध कराते हैं. स्वाभाविक है कि स्थानीय जन बाहरी नेताओं और लोगों सर अलग सिर्फ शांति चाहते हैं ताकि उन्हें गुजर-बसर के लिये धन-अर्जन के अवसर मिलते रहें.
भविष्य में शांति के लिये विवादित स्थल को न्यायालय द्वारा राम-जन्म भूमि मान लिये जाने, स्थल पर राम भक्तों का आधिपत्य तथा श्री राम का पूजन होने के कारण मूर्ति या मन्दिर को हटाया जाना लगभग असंभव है,
अयोध्या मुसलमानों के लिये तीर्थ न था, न है, न होगा. वहाँ तो विवाद के कारण विघ्नसंतोषी चंद मुसलमान सक्रिय हो गए थे. स्थानीय मुसलमानों को रोजी-रोटी राम मंदिर जानेवाले यात्रियों से ही मिलती है. वहाँ अन्य कई मस्जिदें हैं जिनमें वे नमाज़ पढ़ते हैं. विवादित ढाँचे में विवाद के पहले भी नमाज़ नहीं पढ़ी जाती थी. अब मंदिर के समीप नयी मस्जिद बनाने का अर्थ नए विवाद के बीज बोना है. बेहतर है कि अन्य मस्जिदों का विस्तार और सुद्रढ़ीकरण हो. नयी मस्जिद बनानी ही हो तो मंदिर से दूर बने ताकि एक-दूसरे के कार्यक्रमों में विघ्न न हो.
जनता का साथ न होने, निर्णय में हुए विलम्ब के कारण थकन व् साधनाभाव तथा पूर्ण जीत न होने से राम मंदिर पक्ष के लोग अभी वाराणसी के विश्वनाथ मंदिर तथा मथुरा के कृष्ण मंदिर के सम्बन्ध में मौन हैं किन्तु यह निश्चित है कि राम मंदिर पूर्ण होते ही इन दोनों स्थानों से मस्जिदें हटाने की माँग जोर पकड़ेगी.
आप का इस सन्दर्भ में क्या सोचना है? आइये निष्पक्ष तरीके से तथ्यपरक बातें करें....
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करें वंदना-प्रार्थना, भजन-कीर्तन नित्य.
सफल साधना हो 'सलिल', रीझे ईश अनित्य..
शांति-राज सुख-चैन हो, हों कृपालु जगदीश.
सत्य सहाय सदा रहे, अंतर्मन पृथ्वीश..
गुप्त चित्र निर्मल रहे, ऐसे ही हों कर्म.
ज्यों की त्यों चादर रखे,निभा'सलिल'निज धर्म.
हिन्दी की पाठशाला : १
हिन्दी शब्द सलिला: १
औचित्य :
भारत-भाषा हिन्दी भविष्य में विश्व-वाणी बनने के पथ पर अग्रसर है. हिन्दी की शब्द सामर्थ्य पर प्रायः अकारण तथा जानकारी के अभाव प्रश्न चिन्ह लगाये जाते हैं किन्तु यह भी सत्य है कि भाषा सदानीरा सलिला की तरह सतत प्रवाहिनी होती है. उसमें से कुछ शब्द काल-बाह्य होकर बाहर हो जाते हैं तो अनेक शब्द उसमें प्रविष्ट भी होते हैं. हिन्दी शब्द सलिला की योजना इसी विचार के आधार पर बनी कि व्यावसायिक प्रकाशकों के सतही और अपर्याप्त कोशों से संतुष्ट न होनेवाले हिन्दीप्रेमियों के लिये देश-विदेश की विविध भाषाओँ-बोलिओं के हिन्दी की प्रकृति के अनुकूल ऐसे शब्द जिनके पर्याय हिन्दी में नहीं हैं, को भी कोष में सम्मिलित किया जाए. इसी तरह ज्ञान-विज्ञान, कला-संकृति, व्यापार-व्यवसाय आदि जीवन के विविध क्षेत्रों में सामान्यतः प्रचलित पारिभाषिक तथा प्रबंधन संबंधी शब्द भी समाहित किये जाएँ. यह प्रक्रिया निरंतर चलती रहे. शब्दों का समावेश तीन तरह से हो सकता है.
१. आयातित शब्द का मूल भाषा में प्रयुक्त उच्चारण यथावत देवनागरी लिपि में लिखा जाए ताकि बोले जाते समय हिन्दी भाषी तथा अन्य भाषा भाषी उस शब्द को समान अर्थ में समझ सकें. जैसे अंग्रेजी से स्टेशन, जापानी से हाइकु आदि.
२. मूल शब्द के उच्चारण में प्रयुक्त ध्वनि हिन्दी में न हो अथवा अत्यंत क्लिष्ट या सुविधाजनक हो तो उसे हिन्दी की प्रकृति के अनुसार परिवर्तित कर लिया जाए. जैसे हॉस्पिटल को अस्पताल.
३. जिन शब्दों के लिये हिन्दी में समुचित पर्याय हैं या बनाये जा सकते हैं उन्हें आत्मसात किया जाए. जैसे: बस स्टैंड के स्थान पर बस अड्डा, रोड के स्थान पर सड़क या मार्ग. यह भी कि जिन शब्दों को गलत अर्थों में प्रयोग किया जा रहा है उनके सही अर्थ स्पष्ट कर सम्मिलित किये जाएँ ताकि भ्रम का निवारण हो. जैसे: प्लान्टेशन के लिये वृक्षारोपण के स्थान पर पौधारोपण, ट्रेन के लिये रेलगाड़ी, रेल के लिये पटरी.
भाषा :
अनुभूतियों से उत्पन्न भावों को अभिव्यक्त करने के लिए भंगिमाओं या ध्वनियों की आवश्यकता होती है. भंगिमाओं से नृत्य, नाट्य, चित्र आदि कलाओं का विकास हुआ. ध्वनि से भाषा, वादन एवं गायन कलाओं का जन्म हुआ.
भारत-भाषा हिन्दी भविष्य में विश्व-वाणी बनने के पथ पर अग्रसर है. हिन्दी की शब्द सामर्थ्य पर प्रायः अकारण तथा जानकारी के अभाव प्रश्न चिन्ह लगाये जाते हैं किन्तु यह भी सत्य है कि भाषा सदानीरा सलिला की तरह सतत प्रवाहिनी होती है. उसमें से कुछ शब्द काल-बाह्य होकर बाहर हो जाते हैं तो अनेक शब्द उसमें प्रविष्ट भी होते हैं. हिन्दी शब्द सलिला की योजना इसी विचार के आधार पर बनी कि व्यावसायिक प्रकाशकों के सतही और अपर्याप्त कोशों से संतुष्ट न होनेवाले हिन्दीप्रेमियों के लिये देश-विदेश की विविध भाषाओँ-बोलिओं के हिन्दी की प्रकृति के अनुकूल ऐसे शब्द जिनके पर्याय हिन्दी में नहीं हैं, को भी कोष में सम्मिलित किया जाए. इसी तरह ज्ञान-विज्ञान, कला-संकृति, व्यापार-व्यवसाय आदि जीवन के विविध क्षेत्रों में सामान्यतः प्रचलित पारिभाषिक तथा प्रबंधन संबंधी शब्द भी समाहित किये जाएँ. यह प्रक्रिया निरंतर चलती रहे. शब्दों का समावेश तीन तरह से हो सकता है.
१. आयातित शब्द का मूल भाषा में प्रयुक्त उच्चारण यथावत देवनागरी लिपि में लिखा जाए ताकि बोले जाते समय हिन्दी भाषी तथा अन्य भाषा भाषी उस शब्द को समान अर्थ में समझ सकें. जैसे अंग्रेजी से स्टेशन, जापानी से हाइकु आदि.
२. मूल शब्द के उच्चारण में प्रयुक्त ध्वनि हिन्दी में न हो अथवा अत्यंत क्लिष्ट या सुविधाजनक हो तो उसे हिन्दी की प्रकृति के अनुसार परिवर्तित कर लिया जाए. जैसे हॉस्पिटल को अस्पताल.
३. जिन शब्दों के लिये हिन्दी में समुचित पर्याय हैं या बनाये जा सकते हैं उन्हें आत्मसात किया जाए. जैसे: बस स्टैंड के स्थान पर बस अड्डा, रोड के स्थान पर सड़क या मार्ग. यह भी कि जिन शब्दों को गलत अर्थों में प्रयोग किया जा रहा है उनके सही अर्थ स्पष्ट कर सम्मिलित किये जाएँ ताकि भ्रम का निवारण हो. जैसे: प्लान्टेशन के लिये वृक्षारोपण के स्थान पर पौधारोपण, ट्रेन के लिये रेलगाड़ी, रेल के लिये पटरी.
भाषा :
अनुभूतियों से उत्पन्न भावों को अभिव्यक्त करने के लिए भंगिमाओं या ध्वनियों की आवश्यकता होती है. भंगिमाओं से नृत्य, नाट्य, चित्र आदि कलाओं का विकास हुआ. ध्वनि से भाषा, वादन एवं गायन कलाओं का जन्म हुआ.
चित्र गुप्त ज्यों चित्त का, बसा आप में आप.
भाषा-सलिला निरंतर करे अनाहद जाप.
भाषा-सलिला निरंतर करे अनाहद जाप.
भाषा वह साधन है जिससे हम अपने भाव एवं विचार अन्य लोगों तक पहुँचा पाते हैं अथवा अन्यों के भाव और विचार ग्रहण कर पाते हैं. यह आदान-प्रदान वाणी के माध्यम से (मौखिक) या लेखनी के द्वारा (लिखित) होता है.
निर्विकार अक्षर रहे मौन, शांत निः शब्द
भाषा वाहक भाव की, माध्यम हैं लिपि-शब्द.
भाषा वाहक भाव की, माध्यम हैं लिपि-शब्द.
व्याकरण ( ग्रामर ) -
व्याकरण ( वि + आ + करण ) का अर्थ भली-भाँति समझना है. व्याकरण भाषा के शुद्ध एवं परिष्कृत रूप सम्बन्धी नियमोपनियमों का संग्रह है. भाषा के समुचित ज्ञान हेतु वर्ण विचार (ओर्थोग्राफी) अर्थात वर्णों (अक्षरों) के आकार, उच्चारण, भेद, संधि आदि , शब्द विचार (एटीमोलोजी) याने शब्दों के भेद, उनकी व्युत्पत्ति एवं रूप परिवर्तन आदि तथा वाक्य विचार (सिंटेक्स) अर्थात वाक्यों के भेद, रचना और वाक्य विश्लेषण को जानना आवश्यक है.
वर्ण शब्द संग वाक्य का, कविगण करें विचार.
तभी पा सकें वे 'सलिल', भाषा पर अधिकार.
तभी पा सकें वे 'सलिल', भाषा पर अधिकार.
वर्ण / अक्षर :
वर्ण के दो प्रकार स्वर (वोवेल्स) तथा व्यंजन (कोंसोनेंट्स) हैं.
अजर अमर अक्षर अजित, ध्वनि कहलाती वर्ण.
स्वर-व्यंजन दो रूप बिन, हो अभिव्यक्ति विवर्ण.
स्वर-व्यंजन दो रूप बिन, हो अभिव्यक्ति विवर्ण.
स्वर ( वोवेल्स ) :
स्वर वह मूल ध्वनि है जिसे विभाजित नहीं किया जा सकता. वह अक्षर है. स्वर के उच्चारण में अन्य वर्णों की सहायता की आवश्यकता नहीं होती. यथा - अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ, अं, अ:, ऋ, .
स्वर के दो प्रकार १. हृस्व : लघु या छोटा ( अ, इ, उ, ऋ, ऌ ) तथा २. दीर्घ : गुरु या बड़ा ( आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ, अं, अ: ) हैं.
अ, इ, उ, ऋ हृस्व स्वर, शेष दीर्घ पहचान
मिलें हृस्व से हृस्व स्वर, उन्हें दीर्घ ले मान.
मिलें हृस्व से हृस्व स्वर, उन्हें दीर्घ ले मान.
व्यंजन (कांसोनेंट्स) :
व्यंजन वे वर्ण हैं जो स्वर की सहायता के बिना नहीं बोले जा सकते. व्यंजनों के चार प्रकार १. स्पर्श (क वर्ग - क, ख, ग, घ, ङ्), (च वर्ग - च, छ, ज, झ, ञ्.), (ट वर्ग - ट, ठ, ड, ढ, ण्), (त वर्ग त, थ, द, ढ, न), (प वर्ग - प,फ, ब, भ, म) २. अन्तस्थ (य वर्ग - य, र, ल, व्, श), ३. ऊष्म ( श, ष, स ह) तथा ४. संयुक्त ( क्ष, त्र, ज्ञ) हैं. अनुस्वार (अं) तथा विसर्ग (अ:) भी व्यंजन हैं.
भाषा में रस घोलते, व्यंजन भरते भाव.
कर अपूर्ण को पूर्ण वे मेटें सकल अभाव.
कर अपूर्ण को पूर्ण वे मेटें सकल अभाव.
शब्द :
अक्षर मिलकर शब्द बन, हमें बताते अर्थ.
मिलकर रहें न जो 'सलिल', उनका जीवन व्यर्थ.
मिलकर रहें न जो 'सलिल', उनका जीवन व्यर्थ.
अक्षरों का ऐसा समूह जिससे किसी अर्थ की प्रतीति हो शब्द कहलाता है. शब्द भाषा का मूल तत्व है.
शब्द के भेद :
१. अर्थ की दृष्टि से : सार्थक (जिनसे अर्थ ज्ञात हो यथा - कलम, कविता आदि) एवं निरर्थक (जिनसे किसी अर्थ की प्रतीति न हो यथा - अगड़म बगड़म आदि),
२. व्युत्पत्ति (बनावट) की दृष्टि से : रूढ़ (स्वतंत्र शब्द - यथा भारत, युवा, आया आदि), यौगिक (दो या अधिक शब्दों से मिलकर बने शब्द जो पृथक किए जा सकें यथा - गणवेश, छात्रावास, घोडागाडी आदि) एवं योगरूढ़ (जो दो शब्दों के मेल से बनते हैं पर किसी अन्य अर्थ का बोध कराते हैं यथा - दश + आनन = दशानन = रावण, चार + पाई = चारपाई = खाट आदि),
३. स्रोत या व्युत्पत्ति के आधार पर तत्सम (मूलतः संस्कृत शब्द जो हिन्दी में यथावत प्रयोग होते हैं यथा - अम्बुज, उत्कर्ष आदि), तद्भव (संस्कृत से उद्भूत शब्द जिनका परिवर्तित रूप हिन्दी में प्रयोग किया जाता है यथा - निद्रा से नींद, छिद्र से छेद, अर्ध से आधा, अग्नि से आग आदि) अनुकरण वाचक (विविध ध्वनियों के आधार पर कल्पित शब्द यथा - घोडे की आवाज से हिनहिनाना, बिल्ली के बोलने से म्याऊँ आदि), देशज (आदिवासियों अथवा प्रांतीय भाषाओँ से लिए गए शब्द जिनकी उत्पत्ति का स्रोत अज्ञात है यथा - खिड़की, कुल्हड़ आदि), विदेशी शब्द ( संस्कृत के अलावा अन्य भाषाओँ से लिए गए शब्द जो हिन्दी में जैसे के तैसे प्रयोग होते हैं यथा - अरबी से - कानून, फकीर, औरत आदि, अंग्रेजी से - स्टेशन, स्कूल, ऑफिस आदि),
४. प्रयोग के आधार पर विकारी (वे शब्द जिनमें संज्ञा, सर्वनाम, क्रिया या विशेषण के रूप में प्रयोग किए जाने पर लिंग, वचन एवं कारक के आधार पर परिवर्तन होता है यथा - लड़का लड़के लड़कों लड़कपन, अच्छा अच्छे अच्छी अच्छाइयां आदि), अविकारी (वे शब्द जिनके रूप में कोई परिवर्तन नहीं होता. इन्हें अव्यय कहते हैं. इनके प्रकार क्रिया विशेषण, सम्बन्ध सूचक, समुच्चय बोधक तथा विस्मयादि बोधक हैं. यथा - यहाँ, कहाँ, जब, तब, अवश्य, कम, बहुत, सामने, किंतु, आहा, अरे आदि) भेद किए गए हैं. इस संबंध में विस्तार से जानने के लिए व्याकरण की किताब देखें.
नदियों से जल ग्रहणकर, सागर करे किलोल.
विविध स्रोत से शब्द ले, भाषा हो अनमोल.
नाना भाषा-बोलियाँ, नाना भूषा-रूप.
पंचतत्वमय व्याप्त है, अक्षर-शब्द अनूप.
विविध स्रोत से शब्द ले, भाषा हो अनमोल.
नाना भाषा-बोलियाँ, नाना भूषा-रूप.
पंचतत्वमय व्याप्त है, अक्षर-शब्द अनूप.
"भाषा" मानव का अप्रतिम आविष्कार है। वैदिक काल से उद्गम होने वाली भाषा शिरोमणि संस्कृत, उत्तरीय कालों से गुज़रती हुई, सदियों पश्चात् आज तक पल्लवित-पुष्पित हो रही है। भाषा विचारों और भावनाओं को शब्दों में साकारित करती है। संस्कृति वह बल है जो हमें एकसूत्रता में पिरोती है। भारतीय संस्कृति की नींव "संस्कृत" और उसकी उत्तराधिकारी हिन्दी ही है। "एकता" कृति में चरितार्थ होती है। कृति की नींव विचारों में होती है। विचारों का आकलन भाषा के बिना संभव नहीं. भाषा इतनी समृद्ध होनी चाहिए कि गूढ, अमूर्त विचारों और संकल्पनाओं को सहजता से व्यक्त कर सकें. जितने स्पष्ट विचार, उतनी सम्यक् कृति; और समाज में आचार-विचार की एकरुपता याने "एकता"।
भाषा भाव-विचार को, करे शब्द से व्यक्त.
उर तक उर की चेतना, पहुँचे हो अभिव्यक्त.
उर तक उर की चेतना, पहुँचे हो अभिव्यक्त.
शब्द संकलन क्रम:
शब्दों को हिन्दी की सामान्यतः प्रचलित वर्णमाला में प्रयुक्त अक्षरों के क्रम में ही रखा जाएगा. तदनुसार
अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ, अं,.अ:.
क, का, कि, की,कु, कू, के, कै, को, कौ. कं, क:, ख, खा, खि, खी, खु, खू, खे, खै, खो, खौ, खं, ख:, ग, गा, गि, गी, गु, गू, गे, गै, गो, गौ, गं, ग:, घ, घ, घी, घी, घु, घू, घे, घी, घो, घौ, घन, घ:, ङ् ,
च, चा, चि, ची, चु, चू, चे, चै, चो, चौ, चं, च:, छ, छा, छि, छी, छू, छू, छे, छै, छो, छौ, छन, छ:, ज, जा, जी, जी, जू, जू, जे, जेई, जो, जौ, जं, ज:, झ, झा, झी, झी, झु, झू, झे, झै, झो, झौ, झन, झ:, ञ् ,
ट, टा, टि, टी, टु , टू, टे, टै, टो, टौ, टं, ट:, ठ, ठा, ठि, ठी, ठु, ठू, ठे, ठै, ठो, ठौ, ठं, ठ:, ड, डा, डि, डी, डु, डू, डे, डै, डं, ड:, ढ, ढा, ढि, ढी, ढु, ढू, ढे, ढै, ढो, ढौ, ढं, ढ; ण,
त, ता, ति, ती, तु, तू, ते, तै, तो, तौ, तं, त:, थ, था, थि, थी, थु, थू, थे, थै, थो, थौ, थं, थः, द, दा, दि. दी, दु, दू, दे, दै, दो, दौ, दं, द:, ध, धा, धि, धी, धु, धू, धे, धै, धो, धौ, धं, ध:, न, ना, नि, नी, नु, नू, ने, नई, नो,नौ, नं, न:,
प, पा, पि, पी, पु, पू, पे, पै, पो, पौ, पं, प:, फ, फा, फी, फु, फू, फे, फै, फ़ो, फू, फन, फ:, ब, बा, बी, बी, बु, बू, बे, बै, बो, बौ, बं, ब:, भ, भा, भि, भी, भू, भू, भे, भै, भो. भौ, भं, भ:, म,माँ, मि, मी, मु, मू, मे, मै, मो, मौ, मन, म:,
य, या, यि, यी, यु, यू, ये, यै, यो, यू, यं, य:, र, रा, रि, री, रु, रू, रे,रै, रो, रं, र:, ल, ला, लि, ली, लू, लू, ले, लै, लो, लौ, लं:, व, वा, वि, वी, वू, वू, वे,वै, वो, वौ, वं, व:, श, शा, शि, शी, शु, शू, शे, शै, शो, शौ, शं, श:,
ष, षा, shi, षी, षु, षू, षे, shai, षो, shau, shn, ष:, स,सा, सि, सी, सु, सू, से, सै, सो, सौ, सं, स:, ह, हा, हि, ही, हु, हू, हे, है, हो, हौ, हं. ह:.
उच्चार :
ध्वनि-तरंग आघात पर, आधारित उच्चार.
मन से मन तक पहुँचता, बनकर रस आगार.
मन से मन तक पहुँचता, बनकर रस आगार.
ध्वनि विज्ञान सम्मत् शब्द व्युत्पत्ति शास्त्र पर आधारित व्याकरण नियमों ने संस्कृत और हिन्दी को शब्द-उच्चार से उपजी ध्वनि-तरंगों के आघात से मानस पर व्यापक प्रभाव करने में सक्षम बनाया है। मानव चेतना को जागृत करने के लिए रचे गए काव्य में शब्दाक्षरों का सम्यक् विधान तथा शुद्ध उच्चारण अपरिहार्य है। सामूहिक संवाद का सर्वाधिक लोकप्रिय एवं सर्व सुलभ माध्यम भाषा में स्वर-व्यंजन के संयोग से अक्षर तथा अक्षरों के संयोजन से शब्द की रचना होती है। मुख में ५ स्थानों (कंठ, तालू, मूर्धा, दंत तथा अधर) में से प्रत्येक से ५-५ व्यंजन उच्चारित किए जाते हैं।
सुप्त चेतना को करे, जागृत अक्षर नाद.
सही शब्द उच्चार से, वक्ता पाता दाद.
सही शब्द उच्चार से, वक्ता पाता दाद.
उच्चारण स्थान | वर्ग | कठोर(अघोष) व्यंजन | मृदु(घोष) व्यंजन | |||
अनुनासिक | ||||||
कंठ | क वर्ग | क् | ख् | ग् | घ् | ङ् |
तालू | च वर्ग | च् | छ् | ज् | झ् | ञ् |
मूर्धा | ट वर्ग | ट् | ठ् | ड् | ढ् | ण् |
दंत | त वर्ग | त् | थ् | द् | ध् | न् |
अधर | प वर्ग | प् | फ् | ब् | भ् | म् |
विशिष्ट व्यंजन | ष्, श्, स्, | ह्, य्, र्, ल्, व् | ||||
कुल १४ स्वरों में से ५ शुद्ध स्वर अ, इ, उ, ऋ तथा ऌ हैं. शेष ९ स्वर हैं आ, ई, ऊ, ऋ, ॡ, ए, ऐ, ओ तथा औ। स्वर उसे कहते हैं जो एक ही आवाज में देर तक बोला जा सके। मुख के अन्दर ५ स्थानों (कंठ, तालू, मूर्धा, दांत, होंठ) से जिन २५ वर्णों का उच्चारण किया जाता है उन्हें व्यंजन कहते हैं। किसी एक वर्ग में सीमित न रहने वाले ८ व्यंजन स्वरजन्य विशिष्ट व्यंजन हैं।
विशिष्ट (अन्तस्थ) स्वर व्यंजन :
य् तालव्य, र् मूर्धन्य, ल् दंतव्य तथा व् ओष्ठव्य हैं। ऊष्म व्यंजन- श् तालव्य, ष् मूर्धन्य, स् दंत्वय तथा ह् कंठव्य हैं।
स्वराश्रित व्यंजन: अनुस्वार ( ं ), अनुनासिक (चन्द्र बिंदी ँ) तथा विसर्ग (:) हैं।
संयुक्त वर्ण : विविध व्यंजनों के संयोग से बने संयुक्त वर्ण संयुक्ताक्षर: क्क, क्ख, क्र, कृ, क्त, क्ष, ख्य, ग्र, गृ, ग्न, ज्ञ, घृ, छ्र, ज्र, ज्ह, ट्र, त्र, द्द, द्ध, दृ, धृ, ध्र, नृ, प्र, पृ, भ्र, मृ, म्र, ऌ , व्र, वृ, श्र आदि का स्वतंत्र अस्तित्व मान्य नहीं है।
मात्रा :
उच्चारण की न्यूनाधिकता अर्थात किस अक्षर पर कितना कम या अधिक भार ( जोर, वज्न) देना है अथवा किसका उच्चारण कितने कम या अधिक समय तक करना है ज्ञात हो तो लिखते समय सही शब्द का चयन कर दोहा या अन्य काव्य रचना के शिल्प को संवारा और भाव को निखारा जा सकता है। गीति रचना के वाचन या पठन के समय शब्द सही वजन का न हो तो वाचक या गायक को शब्द या तो जल्दी-जल्दी लपेटकर पढ़ना होता है या खींचकर लंबा करना होता है, किंतु जानकार के सामने रचनाकार की विपन्नता, उसके शब्द भंडार की कमी, शब्द ज्ञान की दीनता स्पष्ट हो जाती है. अतः, दोहा ही नहीं किसी भी गीति रचना के सृजन के पूर्व मात्राओं के प्रकार व गणना-विधि पर अधिकार कर लेना जरूरी है।
उच्चारण नियम :
उच्चारण हो शुद्ध तो, बढ़ता काव्य-प्रभाव.
अर्थ-अनर्थ न हो सके, सुनिए लेकर चाव.
शब्दाक्षर के बोलने, में लगता जो वक्त.
वह मात्रा जाने नहीं, रचनाकार अशक्त.
हृस्व, दीर्घ, प्लुत तीन हैं, मात्राएँ लो जान.
भार एक, दो, तीन लो, इनका क्रमशः मान.
अर्थ-अनर्थ न हो सके, सुनिए लेकर चाव.
शब्दाक्षर के बोलने, में लगता जो वक्त.
वह मात्रा जाने नहीं, रचनाकार अशक्त.
हृस्व, दीर्घ, प्लुत तीन हैं, मात्राएँ लो जान.
भार एक, दो, तीन लो, इनका क्रमशः मान.
१. हृस्व (लघु) स्वर : कम भार, मात्रा १ - अ, इ, उ, ऋ तथा चन्द्र बिन्दु वाले स्वर।
२. दीर्घ (गुरु) स्वर : अधिक भार, मात्रा २ - आ, ई, ऊ, ऋ, ए, ऐ, ओ, औ, अं।
३. बिन्दुयुक्त स्वर तथा अनुस्वारयुक्त या विसर्ग युक्त वर्ण भी गुरु होता है। यथा - नंदन, दु:ख आदि.
४. संयुक्त वर्ण के पूर्व का लघु वर्ण दीर्घ तथा संयुक्त वर्ण लघु होता है।
५. प्लुत वर्ण : अति दीर्घ उच्चार, मात्रा ३ - ॐ, ग्वं आदि। वर्तमान हिन्दी में अप्रचलित।
६. पद्य रचनाओं में छंदों के पाद का अन्तिम हृस्व स्वर आवश्यकतानुसार गुरु माना जा सकता है।
७. शब्द के अंत में हलंतयुक्त अक्षर की एक मात्रा होगी।
पूर्ववत् = पूर् २ + व् १ + व १ + त १ = ५
ग्रीष्मः = ग्रीष् 3 + म: २ +५
कृष्ण: = कृष् २ + ण: २ = ४
हृदय = १ + १ +२ = ४
अनुनासिक एवं अनुस्वार उच्चार :
उक्त प्रत्येक वर्ग के अन्तिम वर्ण (ङ्, ञ्, ण्, न्, म्) का उच्चारण नासिका से होने का कारण ये 'अनुनासिक' कहलाते हैं।
१. अनुस्वार का उच्चारण उसके पश्चातवर्ती वर्ण (बाद वाले वर्ण) पर आधारित होता है। अनुस्वार के बाद का वर्ण जिस वर्ग का हो, अनुस्वार का उच्चारण उस वर्ग का अनुनासिक होगा। यथा-
१. अनुस्वार के बाद क वर्ग का व्यंजन हो तो अनुस्वार का उच्चार ङ् होगा।
क + ङ् + कड़ = कंकड़,
श + ङ् + ख = शंख,
ग + ङ् + गा = गंगा,
ल + ङ् + घ् + य = लंघ्य
२. अनुस्वार के बाद च वर्ग का व्यंजन हो तो, अनुस्वार का उच्चार ञ् होगा.
प + ञ् + च = पञ्च = पंच
वा + ञ् + छ + नी + य = वांछनीय
म + ञ् + जु = मंजु
सा + ञ् + झ = सांझ
३. अनुस्वार के बाद ट वर्ग का व्यंजन हो तो अनुस्वार का उच्चारण ण् होता है.
घ + ण् + टा = घंटा
क + ण् + ठ = कंठ
ड + ण् + डा = डंडा
४. अनुस्वार के बाद 'त' वर्ग का व्यंजन हो तो अनुस्वार का उच्चारण 'न्' होता है.
शा + न् + त = शांत
प + न् + थ = पंथ
न + न् + द = नंद
स्क + न् + द = स्कंद
५ अनुस्वार के बाद 'प' वर्ग का व्यंजन हो तो अनुस्वार का उच्चार 'म्' होगा.
च + म्+ पा = चंपा
गु + म् + फि + त = गुंफित
ल + म् + बा = लंबा
कु + म् + भ = कुंभ
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शनिवार, 2 अक्टूबर 2010
मुक्तिका : .......क्यों है? संजीव 'सलिल'
मुक्तिका :
.......क्यों है?
संजीव 'सलिल'
*
काम रहजन का करे नाम से रहबर क्यों है?
मौला इस देश का नेता हुआ कायर क्यों है??
खोल अखबार- खबर सच से बेखबर क्यों है?
फिर जमीं पर कहीं मस्जिद, कहीं मंदर क्यों है?
जो है खूनी उकाब उसको अता की ताकत.
भोला-मासूम परिंदा नहीं जबर क्यों है??
जिसने पैदा किया तुझको तेरी औलादों को.
आदमी के लिए औरत रही चौसर क्यों है??
एक ही माँ ने हमें दूध पिलाकर पाला.
पीठ हिन्दोस्तां की पाक का खंजर क्यों है??
लाख खाता है कसम रोज वफ़ा की आदम.
कर न सका आज तलक बोल तो जौहर क्यों है??
पेट पलता है तेरा और मेरा भी जिससे-
कामचोरी की जगह, बोल ये दफ्तर क्यों है??
ना वचन सात, ना फेरे ही लुभाते तुझको.
राह देखा किया जिसकी तू, वो कोहबर क्यों है??
हर बशर चाहता औरत तो पाक-साफ़ रहे.
बाँह में इसको लिए, चाह में गौहर क्यों है??
पढ़ के पुस्तक कोई नादान से दाना न हुआ.
ढाई आखर न पढ़े, पढ़ के निरक्षर क्यों है??
फ़ौज में क्यों नहीं नेताओं के बेटे जाते?
पूछा जनता ने तो नेता जी निरुत्तर क्यों है??
बूढ़े माँ-बाप की खातिर न जगह है दिल में.
काट-तन-पेट खड़ा तुमने किया घर क्यों है??
तीन झगड़े की वज़ह- जर, जमीन, जोरू हैं.
ये अगर सच है तो इन बिन न रहा नर क्यों है??
रोज कहते हो तुम: 'हक समान है सबको"
ये भी बोलो, कोई बेहतर कोई कमतर क्यों है??
अब न जुम्मन है, न अलगू, न रही खाला ही.
कौन समझाए बसा प्रेम में ईश्वर क्यों है??
रुक्न का, वज्न का, बहरों का तनिक ध्यान धरो.
बा-असर थी जो ग़ज़ल, आज बे-असर क्यों है??
दल-बदल खूब किया, दिल भी बदल कर देखो.
एक का कंधा रखे दूसरे का सर क्यों है??
दर-ब-दर ये न फिरे, वे भी दर-ब-दर न फिरे.
आदमी आम ही फिरता रहा दर-दर क्यों है??
कहकहे अपने उसके आँसुओं में डूबे हैं.
निशानी अपने बुजुर्गों की गुम शजर क्यों है??
लिख रहा खूब 'सलिल', खूबियाँ नहीं लेकिन.
बात बेबात कही, ये हुआ अक्सर क्यों है??
कसम खुदा की, शपथ राम की, लेकर लड़ते.
काले कोटों का 'सलिल', संग गला तर क्यों है??
बेअसर प्यार मगर बाअसर नफरत है 'सलिल'.
हाय रे मुल्क! सियासत- जमीं बंजर क्यों है??
************************************************
रहजन = राह में लूटनेवाला, रहबर = राह दिखानेवाला, मौला = ईश्वर, उकाब = बाज, अता करना = देना, जबर = शक्तिवान, बशर = व्यक्ति, गौहर = अपने समय की सर्वाधिक प्रसिद्ध वैश्या, नादान = नासमझ, दाना = समझदार, रुक्न = लयखंड, वज्न = पदभार , बहर = छंद, बेअसर = प्रभावहीन, बा-असर = प्रभावपूर्ण, शजर = वृक्ष, जमीं = भूमि.
.......क्यों है?
संजीव 'सलिल'
*
काम रहजन का करे नाम से रहबर क्यों है?
मौला इस देश का नेता हुआ कायर क्यों है??
खोल अखबार- खबर सच से बेखबर क्यों है?
फिर जमीं पर कहीं मस्जिद, कहीं मंदर क्यों है?
जो है खूनी उकाब उसको अता की ताकत.
भोला-मासूम परिंदा नहीं जबर क्यों है??
जिसने पैदा किया तुझको तेरी औलादों को.
आदमी के लिए औरत रही चौसर क्यों है??
एक ही माँ ने हमें दूध पिलाकर पाला.
पीठ हिन्दोस्तां की पाक का खंजर क्यों है??
लाख खाता है कसम रोज वफ़ा की आदम.
कर न सका आज तलक बोल तो जौहर क्यों है??
पेट पलता है तेरा और मेरा भी जिससे-
कामचोरी की जगह, बोल ये दफ्तर क्यों है??
ना वचन सात, ना फेरे ही लुभाते तुझको.
राह देखा किया जिसकी तू, वो कोहबर क्यों है??
हर बशर चाहता औरत तो पाक-साफ़ रहे.
बाँह में इसको लिए, चाह में गौहर क्यों है??
पढ़ के पुस्तक कोई नादान से दाना न हुआ.
ढाई आखर न पढ़े, पढ़ के निरक्षर क्यों है??
फ़ौज में क्यों नहीं नेताओं के बेटे जाते?
पूछा जनता ने तो नेता जी निरुत्तर क्यों है??
बूढ़े माँ-बाप की खातिर न जगह है दिल में.
काट-तन-पेट खड़ा तुमने किया घर क्यों है??
तीन झगड़े की वज़ह- जर, जमीन, जोरू हैं.
ये अगर सच है तो इन बिन न रहा नर क्यों है??
रोज कहते हो तुम: 'हक समान है सबको"
ये भी बोलो, कोई बेहतर कोई कमतर क्यों है??
अब न जुम्मन है, न अलगू, न रही खाला ही.
कौन समझाए बसा प्रेम में ईश्वर क्यों है??
रुक्न का, वज्न का, बहरों का तनिक ध्यान धरो.
बा-असर थी जो ग़ज़ल, आज बे-असर क्यों है??
दल-बदल खूब किया, दिल भी बदल कर देखो.
एक का कंधा रखे दूसरे का सर क्यों है??
दर-ब-दर ये न फिरे, वे भी दर-ब-दर न फिरे.
आदमी आम ही फिरता रहा दर-दर क्यों है??
कहकहे अपने उसके आँसुओं में डूबे हैं.
निशानी अपने बुजुर्गों की गुम शजर क्यों है??
लिख रहा खूब 'सलिल', खूबियाँ नहीं लेकिन.
बात बेबात कही, ये हुआ अक्सर क्यों है??
कसम खुदा की, शपथ राम की, लेकर लड़ते.
काले कोटों का 'सलिल', संग गला तर क्यों है??
बेअसर प्यार मगर बाअसर नफरत है 'सलिल'.
हाय रे मुल्क! सियासत- जमीं बंजर क्यों है??
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रहजन = राह में लूटनेवाला, रहबर = राह दिखानेवाला, मौला = ईश्वर, उकाब = बाज, अता करना = देना, जबर = शक्तिवान, बशर = व्यक्ति, गौहर = अपने समय की सर्वाधिक प्रसिद्ध वैश्या, नादान = नासमझ, दाना = समझदार, रुक्न = लयखंड, वज्न = पदभार , बहर = छंद, बेअसर = प्रभावहीन, बा-असर = प्रभावपूर्ण, शजर = वृक्ष, जमीं = भूमि.
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मुक्तिका: खिलेंगे फूल..... संजीव 'सलिल'
मुक्तिका: खिलेंगे फूल.....
संजीव 'सलिल'
*
खिलेंगे फूल-लाखों बाग़ में, कुछ खार तो होंगे.
चुभेंगे तिलमिलायेंगे, लिये गलहार तो होंगे..
लिखे जब निर्मला मति, सत्य कुछ साकार तो होंगे.
पढेंगे शब्द हम, अभिव्यक्त कारोबार तो होंगे..
करें हम अर्थ लेकिन अनर्थों से बचें, है मुमकिन.
बनेंगे राम राजा, सँग रजक-दरबार तो होंगे..
वो नटवर है, नचैया है, नचातीं गोपियाँ उसको.
बजाएगा मधुर मुरली, नयन रतनार तो होंगे..
रहा है कौन ज़ालिम इस धरा पर हमेशा बोलो?
करेगा ज़ुल्म जब-जब तभी कुछ प्रतिकार तो होंगे..
समय को दोष मत दो, गलत घटता है अगर कुछ तो.
रहे निज फ़र्ज़ से गाफिल, 'सलिल' किरदार तो होंगे..
कलम कपिला बने तो, अमृत की रसधार हो प्रवहित.
'सलिल' का नमन लें, अब हाथ-बन्दनवार तो होंगे..
***********************************
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दोहा सलिला: संजीव 'सलिल'
दोहा सलिला:
संजीव 'सलिल'
*
है महेश सिर पर लिये चन्द्र हमेशा साथ.
सीमा में बँध जाये तो कौन कहे जग-नाथ?
*
चट्टानों से भी रिसे, 'सलिल' न रुकता यार.
मिल ही जाती हमेशा, गुप्ता कोई दरार..
*
शब्द न बूढा हो कभी, रहते भाव जवान.
कलम न कुंठित हो कभी, बने तभी रस-खान..
*
छोड़ फ़िक्र-चिंता सभी, हो जा मन रस-लीन.
रस-निधि तेरे पास है, फिर क्यों होता दीन?.
*
गद्य-पद्य शिव-शिव सम, मिलकर होते पूर्ण.
बिन चिंतन कविता करे, कोई रहे अपूर्ण..
*
चिंतन से चिंता करे, कविता हरदम दूर.
सविता मन आनंद पा, बाँटे तुरत हुज़ूर..
*
खलिश न निष्क्रिय हो कभी, देती रहती पीर.
धीर धरे सहते रहे, जो- होता बेपीर..
*
पीर पीर सहकर बने, सबसे बड़ा अमीर.
रहे न धेला पास में, पग-नत रहते मीर..
*
शब्द ब्रम्ह आराधना, रहे कलम का ध्येय.
'सलिल' न कुछ भी तब रहे, ज्ञेय तुझे अज्ञेय..
*
करें समीक्षा कभी हो, रस-पिंगल की बात.
सीख-सिखा सकते सभी, शाश्वत ज्ञान-प्रभात..
*
आँगन-परछी भी 'सलिल', घर के हैं दो भाग.
जहाँ रुचे बैठें वहीं, किन्तु न लें बैराग..
*********************************
संजीव 'सलिल'
*
है महेश सिर पर लिये चन्द्र हमेशा साथ.
सीमा में बँध जाये तो कौन कहे जग-नाथ?
*
चट्टानों से भी रिसे, 'सलिल' न रुकता यार.
मिल ही जाती हमेशा, गुप्ता कोई दरार..
*
शब्द न बूढा हो कभी, रहते भाव जवान.
कलम न कुंठित हो कभी, बने तभी रस-खान..
*
छोड़ फ़िक्र-चिंता सभी, हो जा मन रस-लीन.
रस-निधि तेरे पास है, फिर क्यों होता दीन?.
*
गद्य-पद्य शिव-शिव सम, मिलकर होते पूर्ण.
बिन चिंतन कविता करे, कोई रहे अपूर्ण..
*
चिंतन से चिंता करे, कविता हरदम दूर.
सविता मन आनंद पा, बाँटे तुरत हुज़ूर..
*
खलिश न निष्क्रिय हो कभी, देती रहती पीर.
धीर धरे सहते रहे, जो- होता बेपीर..
*
पीर पीर सहकर बने, सबसे बड़ा अमीर.
रहे न धेला पास में, पग-नत रहते मीर..
*
शब्द ब्रम्ह आराधना, रहे कलम का ध्येय.
'सलिल' न कुछ भी तब रहे, ज्ञेय तुझे अज्ञेय..
*
करें समीक्षा कभी हो, रस-पिंगल की बात.
सीख-सिखा सकते सभी, शाश्वत ज्ञान-प्रभात..
*
आँगन-परछी भी 'सलिल', घर के हैं दो भाग.
जहाँ रुचे बैठें वहीं, किन्तु न लें बैराग..
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महामना मदन मोहन मालवीय के प्रति दोहांजलि : संजीव 'सलिल'
महामना मदन मोहन मालवीय के प्रति दोहांजलि :
संजीव 'सलिल'
*
म - महक रहा यश-कीर्ति से, जिनकी भारत देश. संजीव 'सलिल'
*
हा - हाड़-मांस के मनुज थे, हम से किन्तु विशेष..
ना - नाना कष्ट सहे किये, भागीरथी प्रयास..
म - मद न उन्हें किंचित हुआ, 'मदन' रहा बन दास.
द - दमन न उनकी नीति थी, संयत दीप उजास..
न - नमन करे जन-गण उन्हें, रख श्रृद्धा-विश्वास.
मो - मोह नहीं किंचित किया, 'मोहन' धवल हुलास..
ह - हरदम सेवा राष्ट्र की, था जीवन का ध्येय.
मा - माल तिजोरी में सड़े, सेठों की है व्यर्थ.
ल - लगन लगी धन धनपति, दें जो धनी-समर्थ..
वी - वीर जूझ बाधाओं से, लेकर रोगी देह.
य - यज्ञ हेतु खुद चल पड़ा, तनिक न था संदेह..
अ - अनजानों का जीत मन, पूर्ण किया संकल्प.
म - मन ही मन सोचा नहीं, बेहतर कोई विकल्प..
र - रमा न रहना चाहिए, निज हित में इंसान.
हैं - हैं जिसमें शिक्षा वही, इंसां है भगवान..
*
विश्वनाथ के धाम में, दिया बुद्ध ने ज्ञान.
लिया न इस युग में उसे, हमने आया ध्यान..
शिक्षा पा मानव बने, श्रेष्ठ राष्ट्र-सन्तान.
दीनबन्धु हो हर युवा, सद्भावों की खान..
संस्कार ले सनातन, आदम हो इंसान.
पराधीनता से लड़े, तरुणाई गुणवान..
नरम नीति के पक्षधर, थे अरि-हीन विदेह.
संत सदृश वे विरागी, नहीं तनिक संदेह..
आता उन सा युग पुरुष, कल्प-कल्प के बाद.
सत्य सनातन मूल्य-हित, जो करता संवाद..
हिन्दी जग-वाणी बने, रहे न सच अज्ञेय..
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शुक्रवार, 1 अक्टूबर 2010
मुक्तिका: जा रहे हैं... संजीव 'सलिल'
मुक्तिका:
जा रहे हैं...
संजीव 'सलिल'
*
वे पादुका पुरानी, पुजते ही जा रहे है.
ये नव सड़क के राही, घटते ही जा रहे हैं.
कमरे-जमीं यथावत, इंसान बढ़ रहे हैं.
मन दूर जा रहे, तन सटते ही जा रहे हैं..
जितनी हुई पुरानी उतना नशा बढ़ा है.
साक़ी न मीना, कविता पढ़ते ही जा रहे हैं..
जाना कहाँ न मालूम?, क्यों जा रहे?, न पूछा.
निज आँख मूँद, चुप सब, चलते ही जा रहे हैं..
प्रभु पर नहीं भरोसा, करते-कराते पूजा.
कितना चढ़ा चढ़ावा, गिनते ही जा रहे हैं...
आये हैं खाली हाथों, जायेंगे खाली हाथों.
मालूम पर तिजोरी भरते ही जा रहे हैं..
रोके न अहम् रुकता, तनता न वहम झुकता.
तम सघन 'सलिल' दीपक बुझते ही जा रहे हैं..
*******************
जा रहे हैं...
संजीव 'सलिल'
*
वे पादुका पुरानी, पुजते ही जा रहे है.
ये नव सड़क के राही, घटते ही जा रहे हैं.
कमरे-जमीं यथावत, इंसान बढ़ रहे हैं.
मन दूर जा रहे, तन सटते ही जा रहे हैं..
जितनी हुई पुरानी उतना नशा बढ़ा है.
साक़ी न मीना, कविता पढ़ते ही जा रहे हैं..
जाना कहाँ न मालूम?, क्यों जा रहे?, न पूछा.
निज आँख मूँद, चुप सब, चलते ही जा रहे हैं..
प्रभु पर नहीं भरोसा, करते-कराते पूजा.
कितना चढ़ा चढ़ावा, गिनते ही जा रहे हैं...
आये हैं खाली हाथों, जायेंगे खाली हाथों.
मालूम पर तिजोरी भरते ही जा रहे हैं..
रोके न अहम् रुकता, तनता न वहम झुकता.
तम सघन 'सलिल' दीपक बुझते ही जा रहे हैं..
*******************
बाल गीत: माँ-बेटी की बात --संजीव 'सलिल'
बाल गीत:
माँ-बेटी की बात
संजीव 'सलिल'
*
रानी जी को नचाती हैं महारानी नाच.
झूठ न इसको मानिये, बात कहूँ मैं साँच..
बात कहूँ मैं साँच, रूठ पल में जाती है.
पल में जाती बहल, बहारें ले आती है..
गुड़िया हाथों में गुड़िया ले सजा रही है.
लोरी गाकर थपक-थपक कर सुला रही है.
मारे सिर पर हाथ कहे: ''क्यों तंग कर रही?
क्यों न रही सो?, क्यों निंदिया से जंग कर रही?''
खीज रही है, रीझ रही है, हो बलिहारी.
अपनी गुड़िया पर मैया की गुड़िया प्यारी..
रानी माँ हैरां कहें: ''महारानी सो जाओ.
आँख बंद कर अनुष्का! सपनों में मुस्काओ.
तेरे पापा आ गए, खाना खिला, सुलाऊँ.
जल्दी उठाना है सुबह, बिटिया अब मैं जाऊँ?''
बिटिया बोली ठुमक कर: ''क्या वे डरते हैं?'
क्यों तुमसे थे कह रहे: 'तुम पर मरते हैं?
जीते जी कोई कभी कैसे मर सकता?
बड़े झूठ कहते तो क्यों कुछ फर्क नहीं पड़ता?''
मुझे डांटती: ''झूठ न बोलो तुम समझाती हो.
पापा बोलें झूठ, न उनको डांट लगाती हो.
मेरी गुड़िया नहीं सो रही, लोरी गाओ, सुलाओ.
नाम न पापा का लेकर, तुम मुझसे जान बचाओ''..
हुई निरुत्तर माँ गोदी में ले बिटिया को भींच.
लोरी गाकर सुलाया, ममता-सलिल उलीच..
***************
माँ-बेटी की बात
संजीव 'सलिल'
*
रानी जी को नचाती हैं महारानी नाच.
झूठ न इसको मानिये, बात कहूँ मैं साँच..
बात कहूँ मैं साँच, रूठ पल में जाती है.
पल में जाती बहल, बहारें ले आती है..
गुड़िया हाथों में गुड़िया ले सजा रही है.
लोरी गाकर थपक-थपक कर सुला रही है.
मारे सिर पर हाथ कहे: ''क्यों तंग कर रही?
क्यों न रही सो?, क्यों निंदिया से जंग कर रही?''
खीज रही है, रीझ रही है, हो बलिहारी.
अपनी गुड़िया पर मैया की गुड़िया प्यारी..
रानी माँ हैरां कहें: ''महारानी सो जाओ.
आँख बंद कर अनुष्का! सपनों में मुस्काओ.
तेरे पापा आ गए, खाना खिला, सुलाऊँ.
जल्दी उठाना है सुबह, बिटिया अब मैं जाऊँ?''
बिटिया बोली ठुमक कर: ''क्या वे डरते हैं?'
क्यों तुमसे थे कह रहे: 'तुम पर मरते हैं?
जीते जी कोई कभी कैसे मर सकता?
बड़े झूठ कहते तो क्यों कुछ फर्क नहीं पड़ता?''
मुझे डांटती: ''झूठ न बोलो तुम समझाती हो.
पापा बोलें झूठ, न उनको डांट लगाती हो.
मेरी गुड़िया नहीं सो रही, लोरी गाओ, सुलाओ.
नाम न पापा का लेकर, तुम मुझसे जान बचाओ''..
हुई निरुत्तर माँ गोदी में ले बिटिया को भींच.
लोरी गाकर सुलाया, ममता-सलिल उलीच..
***************
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गुरुवार, 30 सितंबर 2010
सामयिक कविता: फेर समय का........ संजीव 'सलिल'
सामयिक कविता:
फेर समय का........
संजीव 'सलिल'
*
फेर समय का ईश्वर को भी बना गया- देखो फरियादी.
फेर समय का मनुज कर रहा निज घर की खुद ही बर्बादी..
फेर समय का आशंका, भय, डर सारे भारत पर हावी.
फेर समय का चैन मिला जब सुना फैसला, हुई मुनादी..
फेर समय का कोई न जीता और न हारा कोई यहाँ पर.
फेर समय का वहीं रहेंगे राम, रहे हैं अभी जहाँ पर..
फेर समय का ढाँचा टूटा, अब न दुबारा बन पायेगा.
फेर समय का न्यायालय से खुश न कोई भी रह पायेगा..
फेर समय का यह विवाद अब लखनऊ से दिल्ली जायेगा.
फेर समय का आम आदमी देख ठगा सा रह जायेगा..
फेर समय का फिर पचास सालों तक यूँ ही वाद चलेगा.
फेर समय का नासमझी का चलन देश को पुनः छलेगा..
फेर समय का नेताओं की फितरत अब भी वही रहेगी.
फेर समय का देश-प्रेम की चाहत अब भी नहीं जगेगी..
फेर समय का जातिवाद-दलवाद अभी भी नहीं मिटेगा.
फेर समय का धर्म और मजहब में मानव पुनः बँटेगा..
फेर समय का काले कोटोंवाले फिर से छा जायेंगे.
फेर समय का भक्तों से भगवान घिरेंगे-घबराएंगे..
फेर समय का सच-झूठे की परख तराजू तौल करेगी.
फेर समय का पट्टी बांधे आँख ज़ख्म फिर हरा करेगी..
फेर समय का ईश्वर-अल्लाह, हिन्दू-मुस्लिम एक न होंगे.
फेर समय का भक्त और बंदे झगड़ेंगे, नेक न होंगे..
फेर समय का सच के वधिक अवध को अब भी नहीं तजेंगे.
फेर समय का छुरी बगल में लेकर नेता राम भजेंगे..
फेर समय का अख़बारों-टी.व्ही. पर झूठ कहा जायेगा.
फेर समय का पंडों-मुल्लों से इंसान छला जायेगा..
फेर समय का कब बदलेगा कोई तो यह हमें बताये?
फेर समय का भूल सियासत काश ज़िंदगी नगमे गाये..
फेर समय का राम-राम कह गले राम-रहमान मिल सकें.
फेर समय का रसनिधि से रसलीन मिलें रसखान खिल सकें..
फेर समय का इंसानों को भला-बुरा कह कब परखेगा?
फेर समय का गुणवानों को आदर देकर कब निरखेगा?
फेर समय का अब न सियासत के हाथों हम बनें खिलौने.
फेर समय का अब न किसी के घर में खाली रहें भगौने..
फेर समय का भारतवासी मिल भारत की जय गायें अब.
फेर समय का हिन्दी हो जगवाणी इस पर बलि जाएँ सब..
*
Acharya Sanjiv Salil
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फेर समय का........
संजीव 'सलिल'
*
फेर समय का ईश्वर को भी बना गया- देखो फरियादी.
फेर समय का मनुज कर रहा निज घर की खुद ही बर्बादी..
फेर समय का आशंका, भय, डर सारे भारत पर हावी.
फेर समय का चैन मिला जब सुना फैसला, हुई मुनादी..
फेर समय का कोई न जीता और न हारा कोई यहाँ पर.
फेर समय का वहीं रहेंगे राम, रहे हैं अभी जहाँ पर..
फेर समय का ढाँचा टूटा, अब न दुबारा बन पायेगा.
फेर समय का न्यायालय से खुश न कोई भी रह पायेगा..
फेर समय का यह विवाद अब लखनऊ से दिल्ली जायेगा.
फेर समय का आम आदमी देख ठगा सा रह जायेगा..
फेर समय का फिर पचास सालों तक यूँ ही वाद चलेगा.
फेर समय का नासमझी का चलन देश को पुनः छलेगा..
फेर समय का नेताओं की फितरत अब भी वही रहेगी.
फेर समय का देश-प्रेम की चाहत अब भी नहीं जगेगी..
फेर समय का जातिवाद-दलवाद अभी भी नहीं मिटेगा.
फेर समय का धर्म और मजहब में मानव पुनः बँटेगा..
फेर समय का काले कोटोंवाले फिर से छा जायेंगे.
फेर समय का भक्तों से भगवान घिरेंगे-घबराएंगे..
फेर समय का सच-झूठे की परख तराजू तौल करेगी.
फेर समय का पट्टी बांधे आँख ज़ख्म फिर हरा करेगी..
फेर समय का ईश्वर-अल्लाह, हिन्दू-मुस्लिम एक न होंगे.
फेर समय का भक्त और बंदे झगड़ेंगे, नेक न होंगे..
फेर समय का सच के वधिक अवध को अब भी नहीं तजेंगे.
फेर समय का छुरी बगल में लेकर नेता राम भजेंगे..
फेर समय का अख़बारों-टी.व्ही. पर झूठ कहा जायेगा.
फेर समय का पंडों-मुल्लों से इंसान छला जायेगा..
फेर समय का कब बदलेगा कोई तो यह हमें बताये?
फेर समय का भूल सियासत काश ज़िंदगी नगमे गाये..
फेर समय का राम-राम कह गले राम-रहमान मिल सकें.
फेर समय का रसनिधि से रसलीन मिलें रसखान खिल सकें..
फेर समय का इंसानों को भला-बुरा कह कब परखेगा?
फेर समय का गुणवानों को आदर देकर कब निरखेगा?
फेर समय का अब न सियासत के हाथों हम बनें खिलौने.
फेर समय का अब न किसी के घर में खाली रहें भगौने..
फेर समय का भारतवासी मिल भारत की जय गायें अब.
फेर समय का हिन्दी हो जगवाणी इस पर बलि जाएँ सब..
*
Acharya Sanjiv Salil
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दोहा सलिला: राम सत्य हैं, राम शिव....... संजीव 'सलिल'
दोहा सलिला:राम सत्य हैं, राम शिव.......
संजीव 'सलिल'
*
राम सत्य हैं, राम शिव, सुन्दरतम हैं राम.
घट-घटवासी राम बिन सकल जगत बेकाम..
वध न सत्य का हो जहाँ, वही राम का धाम.
अवध सकल जग हो सके, यदि मन हो निष्काम..
न्यायालय ने कर दिया, आज दूध का दूध.
पानी का पानी हुआ, कह न सके अब दूध..
देव राम की सत्यता, गया न्याय भी मान.
राम लला को मान दे, पाया जन से मान..
राम लला प्रागट्य की, पावन भूमि सुरम्य.
अवधपुरी ही तीर्थ है, सुर-नर असुर प्रणम्य..
शुचि आस्था-विश्वास ही, बने राम का धाम.
तर्क न कागज कह सके, कहाँ रहे अभिराम?.
आस्थालय को भंगकर, आस्थालय निर्माण.
निष्प्राणित कर प्राण को, मिल न सके सम्प्राण..
मन्दिर से मस्जिद बने, करता नहीं क़ुबूल.
कहता है इस्लाम भी, मत कर ऐसी भूल..
बाबर-बाकी ने कभी, गुम्बद गढ़े- असत्य.
बनीं बाद में इमारतें, निंदनीय दुष्कृत्य..
सिर्फ देवता मत कहो, पुरुषोत्तम हैं राम.
राम काम निष्काम है, जननायक सुख-धाम..
जो शरणागत राम के, चरण-शरण दें राम.
सभी धर्म हैं राम के, चाहे कुछ हो नाम..
पैगम्बर प्रभु के नहीं, प्रभु ही हैं श्री राम.
पैगम्बर के प्रभु परम, अगम अगोचर राम..
सदा रहे, हैं, रहेंगे, हृदय-हृदय में राम.
दर्शन पायें भक्तजन, सहित जानकी वाम..
रामालय निर्माण में, दें मुस्लिम सहयोग.
सफल करें निज जन्म- है, यह दुर्लभ संयोग..
पंकिल चरण पखार कर, सलिल हो रहा धन्य.
मल हर निर्मल कर सके, इस सा पुण्य न अन्य..
**************************
Acharya Sanjiv Salil
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तरही मुक्तिका २ : ........ क्यों है? ------ संजीव 'सलिल'
तरही मुक्तिका २ :
........ क्यों है?
संजीव 'सलिल'
*
आदमी में छिपा, हर वक़्त ये बंदर क्यों है?
कभी हिटलर है, कभी मस्त कलंदर क्यों है??
आइना पूछता है, मेरी हकीकत क्या है?
कभी बाहर है, कभी वो छिपी अंदर क्यों है??
रोता कश्मीर भी है और कलपता है अवध.
आम इंसान बना आज छछूंदर क्यों है??
जब तलक हाथ में पैसा था, सगी थी दुनिया.
आज साथी जमीं, आकाश समंदर क्यों है??
उसने पर्वत, नदी, पेड़ों से बसाया था जहां.
फिर ज़मीं पर कहीं मस्जिद कहीं मंदर क्यों है??
गुरु गोरख को नहीं आज तलक है मालुम.
जब भी आया तो भगा दूर मछंदर क्यों है??
हाथ खाली रहा, आया औ' गया जब भी 'सलिल'
फिर भी इंसान की चाहत ये सिकंदर क्यों है??
जिसने औरत को 'सलिल' जिस्म कहा औ' माना.
उसमें दुनिया को दिखा देव-पुरंदर क्यों है??
*
........ क्यों है?
संजीव 'सलिल'
*
आदमी में छिपा, हर वक़्त ये बंदर क्यों है?
कभी हिटलर है, कभी मस्त कलंदर क्यों है??
आइना पूछता है, मेरी हकीकत क्या है?
कभी बाहर है, कभी वो छिपी अंदर क्यों है??
रोता कश्मीर भी है और कलपता है अवध.
आम इंसान बना आज छछूंदर क्यों है??
जब तलक हाथ में पैसा था, सगी थी दुनिया.
आज साथी जमीं, आकाश समंदर क्यों है??
उसने पर्वत, नदी, पेड़ों से बसाया था जहां.
फिर ज़मीं पर कहीं मस्जिद कहीं मंदर क्यों है??
गुरु गोरख को नहीं आज तलक है मालुम.
जब भी आया तो भगा दूर मछंदर क्यों है??
हाथ खाली रहा, आया औ' गया जब भी 'सलिल'
फिर भी इंसान की चाहत ये सिकंदर क्यों है??
जिसने औरत को 'सलिल' जिस्म कहा औ' माना.
उसमें दुनिया को दिखा देव-पुरंदर क्यों है??
*
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करें वंदना-प्रार्थना, भजन-कीर्तन नित्य.
सफल साधना हो 'सलिल', रीझे ईश अनित्य..
शांति-राज सुख-चैन हो, हों कृपालु जगदीश.
सत्य सहाय सदा रहे, अंतर्मन पृथ्वीश..
गुप्त चित्र निर्मल रहे, ऐसे ही हों कर्म.
ज्यों की त्यों चादर रखे,निभा'सलिल'निज धर्म.
बुधवार, 29 सितंबर 2010
लोकगीत: हाँको न हमरी कार..... संजीव 'सलिल'
* लोकगीत:
हाँको न हमरी कार.....
संजीव 'सलिल'
*
पोंछो न हमरी कार
नाज़ुक-नाज़ुक मोरी कलाई,
गोरी काया मक्खन-मलाई.
तुम कागा से सुघड़, कहे जग-
'बिजुरी-मेघ' पुकार..
ओ सैयां! पोछो न हमरी कार.
पोछो न हमरी कार,
ओ बलमा! हाँको न हमरी कार.....
*
संग चलेंगी मोरी गुइयां,
तनक न हेरो बिनको सैयां.
भरमाये तो कहूँ राम सौं-
गलन ना दइहों दार..
ओ सैयां! पोछो न हमरी कार.
पोछो न हमरी कार,
ओ बलमा! हाँको न हमरी कार.....
*
बनो डिरेवर, हाँको गाड़ी.
कैहों सबसे 'बलम अनाड़ी'.
'सलिल' संग केसरिया कुल्फी-
खैहों, न करियो रार..
ओ सैयां! पोछो न हमरी कार.
पोछो न हमरी कार,
ओ बलमा! हाँको न हमरी कार.....
*
दिव्यनर्मदा.ब्लागस्पाट.कॉम
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संजीव 'सलिल'
*
पोंछो न हमरी कार
ओ बलमा! हाँको न हमरी कार.....
हाँको न हमरी कार,
ओ बलमा! हाँको न हमरी कार.....
*हाँको न हमरी कार,
ओ बलमा! हाँको न हमरी कार.....
नाज़ुक-नाज़ुक मोरी कलाई,
गोरी काया मक्खन-मलाई.
तुम कागा से सुघड़, कहे जग-
'बिजुरी-मेघ' पुकार..
ओ सैयां! पोछो न हमरी कार.
पोछो न हमरी कार,
संग चलेंगी मोरी गुइयां,
तनक न हेरो बिनको सैयां.
भरमाये तो कहूँ राम सौं-
गलन ना दइहों दार..
ओ सैयां! पोछो न हमरी कार.
पोछो न हमरी कार,
ओ बलमा! हाँको न हमरी कार.....
बनो डिरेवर, हाँको गाड़ी.
कैहों सबसे 'बलम अनाड़ी'.
'सलिल' संग केसरिया कुल्फी-
खैहों, न करियो रार..
ओ सैयां! पोछो न हमरी कार.
पोछो न हमरी कार,
ओ बलमा! हाँको न हमरी कार.....
*
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अयोध्या प्रकरण : कब?, क्या??, कैसे???...आपका मत?....
अयोध्या प्रकरण : कब?, क्या??, कैसे???...आपका मत?....
*
लगभग १२ लाख वर्ष पूर्व श्री राम का काल खंड. भूगोल के अंसार तब टैथीस महासागर समाप्त होकर ज़मीन उभर आई थी. बहुत सी ज़मीन विशाल शिलाओं के कारण अनुपजाऊ थी, बंजर तथा घने जंगलोंवाली जिस ज़मीन पर लोग सारी कोशिश करने के बाद भी बस नहीं सके उसे त्याग दिया गया. वह अभिशप्त मानी गई. उस पर हल नहीं चलाया जा सका था अतः उसे उसे अहल्या कहा गया. श्री राम राजपुत्र थे उन्होंने राज्य के संसाधनों से उस ज़मीन को कृषियोग्य बनवाया, उद्धार किया. यही अहल्या उद्हर है जिसे गुअतम ऋषि की पत्नी अहल्या के साथ अकारण जोड़ दिया गया.
सीता का अर्थ है वह लकीर जो हल के चलने से बनती है जिसमें फसल बोते समय बीज डाला जाता है. सीता रावण की परित्यक्त पुत्री थीं जिन्हें जनक ने पाला था.
वर्ष १५२८ : मुग़ल आक्रान्ताओं ने स्थानीय निवासियों के विरोध के बावजूद सनातन धर्मावलम्बियों द्वारा श्री राम का जन्मस्थल मानी जाती भूमि पर उन्हें नीचा दिखाने के लिये अपना पूजा गृह बनवाया. यह मुग़ल सेना के नायक ने बनवाया. बाबर कभी अयोध्या नहीं गया. आम लोग मुग़ल सेना को बाबरी सेना कहते थे क्योंकि बाबर सर्वोच्च सेनानायक था, उसकी सेना द्वारा स्थापित ढांचा बाबरी मस्जिद कहा गया. यह लगभग १० फुट x १० फुट का स्थान था जहाँ सीमित संख्या में लोग बैठ सकते थे. यहाँ का निर्माण मस्जिद जैसा नहीं था... अजान देने के लिये मीनारें नहीं थीं, न इबादतगाह थी. बाबर की आत्मकथा बाबरनामा तथा अन्य समकालिक पुस्तकों में बाबर द्वारा अयोध्या में कोई मस्जिद बनवाने का कोई उल्लेख नहीं है. संभवतः मुग़ल सिपाहियों के नायक इसका उपयोग करते रहे हों... बाद में बड़ी संख्या हिन्दुओं को बलपूर्वक मुसलमान बनाये जाने से नमाजियों की संख्या में वृद्धि तथा अन्यत्र बड़ी मस्जिद बन जाने के कारण के बाद यह स्थान नमाज के लिये छोटा पड़ा और क्रमशः अनदेख और उपेक्षित रहा.
वर्ष १८५९: अंग्रेज शासकों ने हिन्दुओं-मुसलमानों को लड़वाने की नीति अपनी. उस काल में इसे मस्जिद कहकर बाद से घेर दिया गया. राम भक्त ढाँचे के बाहर श्री राम की पूजा करते रहे.
वर्ष १९४९: २२-२३ दिसंबर को अचानक ही श्री राम की मूर्तियाँ यहाँ मिलीं... कैसे-कहाँ से आईं?... किसने रखीं?... आज तक पता नहीं लगा. संतों ने इसे श्री राम का प्रगट होना कहा... अन्य धर्मावलम्बियों ने इसे सत्य नहीं माना. फलतः दोनों पक्षों ने एक-दूसरे के विरुद्ध मुकदमे दायर कर दिए. सरकार ने स्थल पर ताला लगा दिया. प्रारभ में श्री राम का पूजन बंद रहा किन्तु क्रमशः प्रशासन की देख-रेख में पूजन होने लगा... असंख्य श्रृद्धालु रामलला के दर्शनार्थ पहुँचते रहे.
वर्ष: १९८४: विवाद को राजनैतिक रंग दिया गया. जनसंघ ने हिन्दू हित रक्षक होने का मुखौटा पहनकर विश्व हिन्दू परिषद् के माध्यम से मंदिर निर्माण हेतु समिति का गठन कराया.
वर्ष १९८६: रामभक्तों के आवेदन पर जिला मजिस्ट्रेट ने हिन्दुओं को पूजा-प्रार्थना करने के लिये विधिवत ताला खोलने का आदेश दिया. दैनिक पूजन तथा समस्त धार्मिक आयोजन वृहद् पैमाने पर होने लगे.
वर्ष: १९९२: भारतीय जनता पार्टी ने राजनैतिक लाभ हेतु राम रथ यात्रा का आयोजन किया. नेतृत्व कर रहे श्री लालकृष्ण अडवानी का रथ बिहार में श्री लालू यादव के आदेश पर रोका गया. बाद में पूर्वघोषित कार्यक्रम के अनुसार कारसेवकों ने ढाँचा जहाँ वर्षों से नमाज नहीं पढ़ी गयी, गिरा दिया. केन्द्रीय सुरक्षा बल ने बचने के पर्याप्त प्रयास नहीं किये. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री कल्याण सिंह ने सर्वोच्च न्यायालय में ढाँचे की सुरक्षा का वायदा किया था जो पूरा नहीं हुआ. श्री आडवानी, उमा भारती, स्थानीय सांसद श्री विनय कटिहार ने हर्ष तथा श्री अटल बिहारी बाजपेई ने दुःख व्यक्त किया. ढाँचा गिराए जाने को केद्र में पदासीन कोंग्रेस सरकार ने विश्वासघात कहा किन्तु कोंग्रेसी प्रधानमंत्री स्व. नरसिम्हाराव की बाल्य-काल में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़े रहने की पृष्ठभूमि को देखते हुए उनका परोक्ष समर्थन माना गया. घटना की जाँच हेतु केंद्र सरकार ने लिब्राहन आयोग का गठन किया.
वर्ष २००२: सर्वोच्च न्यायालय ने ३ मार्च को यथास्थिति बनाये रखने का आदेश दिया.
वर्ष २००३: जनवरी रेडिओ तरंगों के माध्यम से विवादित स्थान के अवशेषों की खोज की गई. मार्च में केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय से विवादित स्टाल पर पूजन-पथ की अनुमति देने हेतु अनुरोध किया जो अस्वीकार कर दिया गया. अप्रैल में इलाहबाद उच्च न्यायालय के निर्देश पर पुरातात्विक विभाग (आर्किओलोजिकल डिपार्टमेंट) ने खुदाई कर प्रतिवेदन दिया जिसके अनुसार मंदिर से मिलते-जुलते अवशेष एक विशाल इमारत, खम्बे, शिव मंदिर और मूर्तियों के अवशेष प्राप्त होना स्वीकारा गया.
वर्ष २००५:विवादित परिसर में स्थापित रामलला परिसर पर आतंकवादी हमला... पाँच आतंकी सुरक्षा बालों से लम्बी मुठभेड़ के बाद मार गिराए गये.
वर्ष २००९: गठन के १७ वर्षों बाद लिब्राहन आयोग ने अपना जाँच-प्रतिवेदन प्रस्तुत किया. ७ जुलाई उत्तर प्रदेश सरकार ने स्वीकारा कि विवाद से जुड़ी २३ महत्वपूर्ण नस्तियाँ सचिवालय से लापता हो गयीं.
वर्ष २०१०:
मूल प्रश्न: क्या विवादित ढाँचा किसी मंदिर को तोड़कर बनाया गया था?, क्या विवादित ढाँचा ही श्री राम का जन्मस्थल है?
हमारा मत:
लगभग ५०० वर्ष पूर्व बनाया गया ढाँचा किसी इमारत को तोड़कर बनाया गया या किसी खाली ज़मीन पर यह भी आज जानना संभव नहीं है. इतिहास की किताबों में भी इन बिन्दुओं पर कोई जानकारी नहीं मिल सकती.
क्या उक्त दो प्रश्न किसी कानून से जुड़े है? क्या लाखों वर्ष पहले जन्में श्री राम के जन्म से संबंधित दस्तावेजी सबूत (प्रमाणपत्र) मिलना संभव है? आज भी जन्म प्रमाण पत्र में जन्म का स्थान कोई शहर, मोहल्ला या चिकित्सालय लिखा नाता है, उसके किस हिस्से में यह नहीं होता... लम्बी समयावधि के बाद यह जान पाना संभव नहीं है. कुछ भी निर्णय दिया जाए सभी पक्षों को संतुष्ट करना संभव नहीं है.
स्पष्ट है कि न्यायालय जो संविधान के अंतर्गत संवैधानिक कानून-व्यवस्था से जुड़े विवादों के हल हेतु बनाई गई है को ऐसे प्रकरण में निर्णय देने को कहा गया जो मूलतः उससे जुड़ा नहीं है. यह विवाद हमारी सामाजिक समरसता भंग होने तथा राजनैतिक स्वार्थों के लिये लोक हित को किनारे रखकर विविध वर्गों को लड़ाने की प्रवृत्ति से उपजा है. इसके दोषी राजनैतिक दल और संकुचित सोचवाले धार्मिक नेता हैं.
न्यायालय कोई भी निर्णय दे कोई पक्ष संतुष्ट नहीं होगा. वर्तमान में लम्बे समय से पूजित श्री राम की मूर्तियों को हटाने और मस्जिद बनाने या ढाँचे को पुनर्स्थापित करने जैस्सा एक पक्षीय निर्णय न तो सामाजिक, न धार्मिक, न विधिक दृष्टि से उचित या संभव है. लंबी मुक़दमेबाजी से कुछ पक्षकार दिवंगत हो गए, जो हैं वे थक चुके हैं और किसी तरह निर्णय करना चाहते है, जो नए लोग बाद में जुड़ गए हैं वे मसाले को जिंदा रखने और अपने साथ जनता की सहानुभूति न होने से असहाय हैं... वे जो भी निर्णय आये उसे स्वीकार या अस्वीकार कर अपने लिये ज़मीन पाना चाहते हैं. आम भारतवासी, सामान्य राम भक्तों या अयोध्यावासियों को इस विवाद या निर्णय से कोई सरोकार नहीं है... वह अमन-चैन से सद्भावनापूर्वक रहना चाहता है पर राजनीति और धर्म से जुड़े और उसे आजीविका बनाये लोग आम लोगों को चैन से जीने नहीं देना कहते और विवादों को हवा देकर सुर्ख़ियों में बने रहना ही उनका ध्येय है. दुर्भाग्य से प्रसार माध्यम भी निष्पक्ष नहीं है. उसके मालिक इस या उस खेमे से जुड़े हैं और बहुत से तो हर पक्ष से सम्बन्ध रखे हैं कि कोई भी सत्ता में आये स्वार्थ सधता रहे.
एक सच यह भी बरसों से लड़ रहे लोग अयोध्या में रहेँ तो भी न तो रोज राम-दर्शन को जाते हैं... न ही कभी ढाँचे में नमाज पढने गए. वे विवाद से निष्ठा नहीं स्वार्थ के कारण जुड़े हैं.
पाठक अपना मत दें उनके अनुसार निर्णय क्या होना चाहिए?
मुक्तिका:
फिर ज़मीं पर.....
संजीव 'सलिल'
*
फिर ज़मीं पर कहीं काफ़िर कहीं क़ादिर क्यों है?
फिर ज़मीं पर कहीं नाफ़िर कहीं नादिर क्यों है?
*
फिर ज़मीं पर कहीं बे-घर कहीं बा-घर क्यों है?
फिर ज़मीं पर कहीं नासिख कहीं नाशिर क्यों है?
*
चाहते हम भी तुम्हें चाहते हो तुम भी हमें.
फिर ज़मीं पर कहीं नाज़िल कहीं नाज़िर क्यों है?
*
कौन किसका है सगा और किसे गैर कहें?
फिर ज़मीं पर कहीं ताइर कहीं ताहिर क्यों है?
*
धूप है, छाँव है, सुख-दुःख है सभी का यक सा.
फिर ज़मीं पर कहीं तालिब कहीं ताजिर क्यों है?
*
ज़र्रे -ज़र्रे में बसा वो न 'सलिल' दिखता है.
फिर ज़मीं पर कहीं मस्जिद कहीं मंदिर क्यों है?
*
पानी जन आँख में बाकी न 'सलिल' सूख गया.
फिर ज़मीं पर कहीं सलिला कहीं सागर क्यों है?
*
कुछ शब्दों के अर्थ : काफ़िर = नास्तिक, धर्मद्वेषी, क़ादिर = समर्थ, ईश्वर, नाफ़िर = घृणा करनेवाला, नादिर = श्रेष्ठ, अद्भुत, बे-घर = आवासहीन, बा-घर = घर वाला, जिसके पास घर हो, नासिख = लिखनेवाला, नाशिर = प्रकाशित करनेवाला, नाज़िल = मुसीबत, नाज़िर = देखनेवाला, ताइर = उड़नेवाला, पक्षी, ताहिर = पवित्र, यक सा = एक जैसा, तालिब = इच्छुक, ताजिर = व्यापारी, ज़र्रे - तिनके, सलिला = नदी, बहता पानी, सागर = समुद्र, ठहरा पानी.
Acharya Sanjiv Salil
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मंगलवार, 28 सितंबर 2010
कंप्यूटर शोर्ट कट्स: प्रीतम तिवारी 'प्रीत'
उपयोगी लेख:कंप्यूटर शोर्ट कट्स:
प्रीतम तिवारी 'प्रीत'
*
आप लोग भी इसमें योगदान करे..जिससे मैं और सभी लावान्वित हो सके....
ctrl+Z-- word या excel में लिखी हुई चीज अगर गलती से डिलीट हो गयी हो तो वापस आ जाती है...
ctrl+X-- word या excel या कहीं भी खुद की लिखी हुई चीज कट या हटाने के लिए...
ctrl+C-- कहीं भी लिखी हुई किसी चीज को कॉपी करने के लिए...
ctrl+V-- कहीं से भी कॉपी की चीज को पेस्ट करने के लिए...
ctrl+B-- कहीं भी लिखी हुई चीज को बोल्ड(मोटा) करने के लिए(BROWSER में लिखी किसी चीज में ऐसा नहीं होता है)
ctrl+A-- सभी लिखी हुई चीज को सेलेक्ट करने के लिए...
ctrl+S-- लिखी हुई चीज को save करने के लिए...
ctrl+U-- लिखी हुई चीज को underline करने के लिए..
ctrl+I-- लिखी हुई चीज को थोडा तिरछा करने के लिए...
ctrl+T-- browser में नयी TAB खोलने के लिए...
alt+F4-- कोई भी प्रोग्राम बंद करने के लिए तथा कंप्यूटर को shut down करने के लिए..
F1 -- हेल्प के लिए..
F11 -- browser या किसी भी window को fullscreen करने के लिए...
alt +TAB -- किसी भी प्रोग्राम को maximise करने ले लिए..
alt +space +N -- किसी भी window को minimise करने के लिए...
esc -- किसी भी प्रोग्राम से बहार निकलने के लिए...
ctrl +alt +del -- tab manager खोलने के लिए...
window key +R -- run window खोलने के लिए..
window key +L -- desktop lock करने के लिए..
prnt scrn -- स्क्रीन shot लेने के लिए...
for VLC media player
F -- fullscreen करने के लिए..
N -- next करने के लिए..
P -- previous गाना या विडियो देखने के लिए..
S -- stop करने के लिए..
space -- pause या play करने के लिए...
(आभार: OBO)
************************
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करें वंदना-प्रार्थना, भजन-कीर्तन नित्य.
सफल साधना हो 'सलिल', रीझे ईश अनित्य..
शांति-राज सुख-चैन हो, हों कृपालु जगदीश.
सत्य सहाय सदा रहे, अंतर्मन पृथ्वीश..
गुप्त चित्र निर्मल रहे, ऐसे ही हों कर्म.
ज्यों की त्यों चादर रखे,निभा'सलिल'निज धर्म.
हास्य कविता: कान बनाम नाक संजीव 'सलिल'
हास्य कविता:
कान बनाम नाक
संजीव 'सलिल'
*
शिक्षक खींचे छात्र के साधिकार क्यों कान?
कहा नाक ने- 'मानते क्यों अछूत श्रीमान?
क्यों अछूत श्रीमान, न क्यों कर मुझे खींचते?
क्यों कानों को लाड़-क्रोध से आप मींचते??
शिक्षक बोला- "छात्र की अगर खींच दूँ नाक,
कौन करेगा साफ़ यदि बह आयेगी नाक?
बह आयेगी नाक, नाक पर मक्खी बैठे.
ऊँची नाक हुई नीची, तो हुए फजीते..
नाक एक है कान दो, बहुमत का है राज.
जिसकी संख्या अधिक हो, सजे शीश पर ताज..
सजे शीश पर ताज, सभी संबंध भुनाते.
गधा बाप को और गधे को बाप बताते..
नाक कटे तो प्रतिष्ठा का हो जाता अंत.
कान खिंचे तो सहिष्णुता बढ़ती, बनता संत..
संत बने तो गुरु कहें सारे गुरुघंटाल.
नाक खिंचे तो बंद हो श्वास हाल-बेहाल..
कान ज्ञान को बाहर से भीतर पहुँचाते.
नाक दबा अन्दर की दम बाहर ले आते..
टाँग अड़ा या फँसा मत, खींचेगे सब टाँग.
टाँग खिंची, औंधे गिरा, बिगड़ेगा सब स्वांग..
खींच-खिंचाकर कान, हो गिन्नी बुक में नाम.
'सलिल' सीख कर यह कला, खोले तुरत दुकान..
खोले तुरत दुकान, लपक पेटेंट कराये.
एजेंसी दे-देकर भारी रकम कमाये..
हम भी खींचें जाएँ, दो हमको भी अधिकार.
केश निकालेंगे जुलुस, माँग न हो स्वीकार..
माँग न हो स्वीकार, न तब तक माँग भराएँ.
छोरा-छोरी तंग, किस तरह ब्याह रचाएँ?
साली जीजू को पकड़, खींचेगी जब बाल.
सहनशीलता सिद्ध हो, तब पायें वरमाल..
तब पायें वरमाल, न झोंटा पकड़ युद्ध हो.
बने स्नेह सम्बन्ध, संगिनी शुभ-प्रबुद्ध हो..
विश्वयुद्ध हो गृह में, बाहर खबर न जाए.
कान-केश को खींच, पराक्रम सुमुखि दिखाए..
आँख, गाल ना अधर खिंचाई सुख पा सकते.
कान खिंचाते जो लालू सम हरदम हँसते..
**********************************
कान बनाम नाक
संजीव 'सलिल'
*
शिक्षक खींचे छात्र के साधिकार क्यों कान?
कहा नाक ने- 'मानते क्यों अछूत श्रीमान?
क्यों अछूत श्रीमान, न क्यों कर मुझे खींचते?
क्यों कानों को लाड़-क्रोध से आप मींचते??
शिक्षक बोला- "छात्र की अगर खींच दूँ नाक,
कौन करेगा साफ़ यदि बह आयेगी नाक?
बह आयेगी नाक, नाक पर मक्खी बैठे.
ऊँची नाक हुई नीची, तो हुए फजीते..
नाक एक है कान दो, बहुमत का है राज.
जिसकी संख्या अधिक हो, सजे शीश पर ताज..
सजे शीश पर ताज, सभी संबंध भुनाते.
गधा बाप को और गधे को बाप बताते..
नाक कटे तो प्रतिष्ठा का हो जाता अंत.
कान खिंचे तो सहिष्णुता बढ़ती, बनता संत..
संत बने तो गुरु कहें सारे गुरुघंटाल.
नाक खिंचे तो बंद हो श्वास हाल-बेहाल..
कान ज्ञान को बाहर से भीतर पहुँचाते.
नाक दबा अन्दर की दम बाहर ले आते..
टाँग अड़ा या फँसा मत, खींचेगे सब टाँग.
टाँग खिंची, औंधे गिरा, बिगड़ेगा सब स्वांग..
खींच-खिंचाकर कान, हो गिन्नी बुक में नाम.
'सलिल' सीख कर यह कला, खोले तुरत दुकान..
खोले तुरत दुकान, लपक पेटेंट कराये.
एजेंसी दे-देकर भारी रकम कमाये..
हम भी खींचें जाएँ, दो हमको भी अधिकार.
केश निकालेंगे जुलुस, माँग न हो स्वीकार..
माँग न हो स्वीकार, न तब तक माँग भराएँ.
छोरा-छोरी तंग, किस तरह ब्याह रचाएँ?
साली जीजू को पकड़, खींचेगी जब बाल.
सहनशीलता सिद्ध हो, तब पायें वरमाल..
तब पायें वरमाल, न झोंटा पकड़ युद्ध हो.
बने स्नेह सम्बन्ध, संगिनी शुभ-प्रबुद्ध हो..
विश्वयुद्ध हो गृह में, बाहर खबर न जाए.
कान-केश को खींच, पराक्रम सुमुखि दिखाए..
आँख, गाल ना अधर खिंचाई सुख पा सकते.
कान खिंचाते जो लालू सम हरदम हँसते..
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करें वंदना-प्रार्थना, भजन-कीर्तन नित्य.
सफल साधना हो 'सलिल', रीझे ईश अनित्य..
शांति-राज सुख-चैन हो, हों कृपालु जगदीश.
सत्य सहाय सदा रहे, अंतर्मन पृथ्वीश..
गुप्त चित्र निर्मल रहे, ऐसे ही हों कर्म.
ज्यों की त्यों चादर रखे,निभा'सलिल'निज धर्म.
Excellent 3d Software: Autodesk 3ds Max 2011
Excellent 3d Software: Autodesk 3ds Max 2011
Autodesk 3ds Max 2011 is a program which is used by artists and media producers everywhere in order to composite, render, animate and model digital objects in 3D. It's a standard for TV and film, visual effects, video games and graphic design.This program provides some of the best, most thorough tool sets for 3D modeling that you can find in this industry. Autodesk 3ds Max 2011 permits you to use NURBS, spline and polygon-based modeling to generate organic and parametric objects. You'll get more than one hundred high-tech tools for free form 3D design and polygonal modeling, and exacting control over the quantity of points and faces in any given object when utilizing the ProOptimizer tech. You'll also be able to simplify any selection you make by 75% and you'll never lose any detail.
You can maintain your scene's assets while you perform layering, mapping and texture painting operations. Among these operations are spine mapping, removal of distortion, UV stretching, mirroring, decal placement, blurring and tiling. You can edit and design shading hierarchies that range from complex to simple using the slate editor.
You'll also be able to leverage procedural rigging and animation using the CAT, or Character Animation Toolkit, which aids in crowd and biped animation. The Muscle and Skin Modifier within the CAT tool assists you when carefully and precisely controlling the ways in which the model's skeleton deforms are different parts are set into motion.
Different tools assist you when generating effects and dynamics, including fur and hair (and other effects that incorporate strands), as well as cloth. Even blades of grass can be exactingly controlled and styled. Particle effects which are driven by events, like snow, spray, fire and water can all be manipulated using scripts and expressions.
Autodesk 3ds Max 2011 provides excellent software for 3D rendering, which can quickly generate astounding imagery. New to Autodesk 3ds Max 2011, Quicksilver rendering tech helps you make top quality animatics and sketches to visualize your final animation. Mental Ray is another great rendering tool which rapidly establishes realistic lighting situations and customized shadows, using the idle processing units of your computer system.
FBX formatting means that you'll be able to trade information with other popular 3D programs, as well as have support for over thirty other related formats, which includes FLT, SKP, OBJ, IPT, DWG, IPT, DXF. 3DS and AI, among others.
When you buy Autodesk 3ds Max Composite, you'll get a high-powered, high dynamic range compatible compositor which allows you to control depth of field, paint in both vector and raster, motion blur, camera map, color correct and key, as well as other functions.
New aspects of Autodesk 3ds Max 2011 include the ability to edit and create detailed materials using the Slate editor, additional Viewpoint Canvas and Graphite Modeling tools, display of your materials via the Viewport function, the ability to customize your interface, and to save your work to earlier releases.
सोमवार, 27 सितंबर 2010
हरयाणवी दोहे: राम कुमार आत्रेय.कैथल
हरयाणवी दोहे:
राम कुमार आत्रेय.कैथल
*
तिन्नू सैं कड़वै घणे, आक करेला नीम.
जितना हो कड़वा घणा, उतना भला हकीम..
सच्चाई कडवी घणी, मिट्ठा लाग्गै झूठ.
सच्चाई के कारणे, रिश्ते जावैं टूट..
बिना लोक चलरया सै, लोकतंत्र यूँ आज.
जिस गेल्यां गुंडे घणे, उसके सिर पर ताज..
पोर-पोर न्यूं फूल्ग्या, जंगल का औ ढाक.
निच्चे-उप्पर तक जड़ूं, आग खेलरी फाग..
कपड़े कम जाड्डा घणा, क्यूंकर ढाप्पूं गात.
छोट्टा सै यू सांग अर, घणी बड़ी सै रात..
या ब्रिन्दावन धाम की, ख़ास बताऊँ बात.
रटरे राधा-कृस्न सब, डाल-पात दिन-रात..
गरमी आंदी देख कै, आंब गए बौराय.
कोयल कुक्की बाग़ में, पिय को रही बुलाय..
तुलसी तेरे राम का, रूप-सरूप- अनूप.
अमरित भरया हो जिसा, ठंडा-मिट्ठा कूप..
**************************
राम कुमार आत्रेय.कैथल
*
तिन्नू सैं कड़वै घणे, आक करेला नीम.
जितना हो कड़वा घणा, उतना भला हकीम..
सच्चाई कडवी घणी, मिट्ठा लाग्गै झूठ.
सच्चाई के कारणे, रिश्ते जावैं टूट..
बिना लोक चलरया सै, लोकतंत्र यूँ आज.
जिस गेल्यां गुंडे घणे, उसके सिर पर ताज..
पोर-पोर न्यूं फूल्ग्या, जंगल का औ ढाक.
निच्चे-उप्पर तक जड़ूं, आग खेलरी फाग..
कपड़े कम जाड्डा घणा, क्यूंकर ढाप्पूं गात.
छोट्टा सै यू सांग अर, घणी बड़ी सै रात..
या ब्रिन्दावन धाम की, ख़ास बताऊँ बात.
रटरे राधा-कृस्न सब, डाल-पात दिन-रात..
गरमी आंदी देख कै, आंब गए बौराय.
कोयल कुक्की बाग़ में, पिय को रही बुलाय..
तुलसी तेरे राम का, रूप-सरूप- अनूप.
अमरित भरया हो जिसा, ठंडा-मिट्ठा कूप..
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रविवार, 26 सितंबर 2010
बाल गीत / नव गीत: ज़िंदगी के मानी संजीव 'सलिल'
बाल गीत / नव गीत:
ज़िंदगी के मानी
संजीव 'सलिल'
*
खोल झरोखा, झाँक-
ज़िंदगी के मानी मिल जायेंगे.
मेघ बजेंगे, पवन बहेगा,
पत्ते नृत्य दिखायेंगे.....
*
बाल सूर्य के संग ऊषा आ,
शुभ प्रभात कह जाएगी.
चूँ-चूँ-चूँ-चूँ कर गौरैया
रोज प्रभाती गायेगी..
टिट-टिट-टिट-टिट करे टिटहरी,
करे कबूतर गुटरूं-गूं-
कूद-फांदकर हँसे गिलहरी
तुझको निकट बुलायेगी..
आलस मत कर, आँख खोल,
हम सुबह घूमने जायेंगे.
खोल झरोखा, झाँक-
ज़िंदगी के मानी मिल जायेंगे.....
*
आई गुनगुनी धूप सुनहरी
माथे तिलक लगाएगी.
अगर उठेगा देरी से तो
आँखें लाल दिखायेगी..
मलकर बदन नहा ले जल्दी,
प्रभु को भोग लगाना है.
टन-टन घंटी मंगल ध्वनि कर-
विपदा दूर हटाएगी.
मुक्त कंठ-गा भजन-आरती,
सरगम-स्वर सध जायेंगे.
खोल झरोखा, झाँक-
ज़िंदगी के मानी मिल जायेंगे.....
*
मेरे कुँवर कलेवा कर फिर,
तुझको शाला जाना है.
पढ़ना-लिखना, खेल-कूदना,
अपना ज्ञान बढ़ाना है..
अक्षर,शब्द, वाक्य, पुस्तक पढ़,
तुझे मिलेगा ज्ञान नया.
जीवन-पथ पर आगे चलकर
तुझे सफलता पाना है..
सारी दुनिया घर जैसी है,
गैर स्वजन बन जायेंगे.
खोल झरोखा, झाँक-
ज़िंदगी के मानी मिल जायेंगे.....
*
Acharya Sanjiv Salil
http://divyanarmada.blogspot.com
ज़िंदगी के मानी
संजीव 'सलिल'
*
खोल झरोखा, झाँक-
ज़िंदगी के मानी मिल जायेंगे.
मेघ बजेंगे, पवन बहेगा,
पत्ते नृत्य दिखायेंगे.....
*
बाल सूर्य के संग ऊषा आ,
शुभ प्रभात कह जाएगी.
चूँ-चूँ-चूँ-चूँ कर गौरैया
रोज प्रभाती गायेगी..
टिट-टिट-टिट-टिट करे टिटहरी,
करे कबूतर गुटरूं-गूं-
कूद-फांदकर हँसे गिलहरी
तुझको निकट बुलायेगी..
आलस मत कर, आँख खोल,
हम सुबह घूमने जायेंगे.
खोल झरोखा, झाँक-
ज़िंदगी के मानी मिल जायेंगे.....
*
आई गुनगुनी धूप सुनहरी
माथे तिलक लगाएगी.
अगर उठेगा देरी से तो
आँखें लाल दिखायेगी..
मलकर बदन नहा ले जल्दी,
प्रभु को भोग लगाना है.
टन-टन घंटी मंगल ध्वनि कर-
विपदा दूर हटाएगी.
मुक्त कंठ-गा भजन-आरती,
सरगम-स्वर सध जायेंगे.
खोल झरोखा, झाँक-
ज़िंदगी के मानी मिल जायेंगे.....
*
मेरे कुँवर कलेवा कर फिर,
तुझको शाला जाना है.
पढ़ना-लिखना, खेल-कूदना,
अपना ज्ञान बढ़ाना है..
अक्षर,शब्द, वाक्य, पुस्तक पढ़,
तुझे मिलेगा ज्ञान नया.
जीवन-पथ पर आगे चलकर
तुझे सफलता पाना है..
सारी दुनिया घर जैसी है,
गैर स्वजन बन जायेंगे.
खोल झरोखा, झाँक-
ज़िंदगी के मानी मिल जायेंगे.....
*
Acharya Sanjiv Salil
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