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रविवार, 26 सितंबर 2010

मुक्तिका: फिर ज़मीं पर..... संजीव 'सलिल'

मुक्तिका:

फिर ज़मीं पर.....

संजीव 'सलिल'
*
फिर ज़मीं पर कहीं काफ़िर कहीं क़ादिर क्यों है?
फिर ज़मीं पर कहीं नाफ़िर कहीं नादिर क्यों है?
*
फिर ज़मीं पर कहीं बे-घर कहीं बा-घर क्यों है?
फिर ज़मीं पर कहीं नासिख कहीं नाशिर क्यों है?
*
चाहते हम भी तुम्हें चाहते हो तुम भी हमें.
फिर ज़मीं पर कहीं नाज़िल कहीं नाज़िर क्यों है?
*
कौन किसका है सगा और किसे गैर कहें?
फिर ज़मीं पर कहीं ताइर कहीं ताहिर क्यों है?
*
धूप है, छाँव है, सुख-दुःख है सभी का यक सा.
फिर ज़मीं पर कहीं तालिब कहीं ताजिर क्यों है?
*
ज़र्रे -ज़र्रे में बसा वो न 'सलिल' दिखता है.
फिर ज़मीं पर कहीं मस्जिद कहीं  मंदिर क्यों है?
*
पानी जन आँख में बाकी न 'सलिल' सूख गया.
फिर ज़मीं पर कहीं सलिला कहीं सागर क्यों है?
*
-- दिव्यनर्मदा.ब्लागस्पाट.कॉम

कुछ शब्दों के अर्थ : काफ़िर = नास्तिक, धर्मद्वेषी, क़ादिर = समर्थ, ईश्वर, नाफ़िर = घृणा करनेवाला, नादिर = श्रेष्ठ, अद्भुत, बे-घर = आवासहीन, बा-घर = घर वाला, जिसके पास घर हो, नासिख = लिखनेवाला,  नाशिर = प्रकाशित करनेवाला, नाज़िल = मुसीबत, नाज़िर = देखनेवाला, ताइर = उड़नेवाला, पक्षी, ताहिर = पवित्र, यक सा = एक जैसा, तालिब =  इच्छुक, ताजिर = व्यापारी, ज़र्रे - तिनके, सलिला = नदी, बहता पानी,  सागर = समुद्र, ठहरा पानी.

शनिवार, 25 सितंबर 2010

मुक्तिका: बिटिया संजीव 'सलिल'

मुक्तिका:

बिटिया

संजीव 'सलिल'
*
*
चाह रहा था जग बेटा पर अनचाहे ही पाई बिटिया.
अपनों को अपनापन देकर, बनती रही पराई बिटिया..

कदम-कदम पर प्रतिबंधों के अनुबंधों से संबंधों में
भैया जैसा लाड़-प्यार, पाने मन में अकुलाई बिटिया..

झिड़की ब्यारी, डांट कलेवा, घुड़की भोजन था नसीब में.
चौराहों पर आँख घूरती,  तानों से घबराई बिटिया..

नत नैना, मीठे बैना का, अमिय पिला घर स्वर्ग बनाया.
हाय! बऊ, दद्दा, बीरन को, बोझा पड़ी दिखाई बिटिया..

खान गुणों की रही अदेखी, रंग-रकम की माँग बड़ी थी.
बीसों बार गयी देखी, हर बार गयी ठुकराई बिटिया..

करी नौकरी घर को पाला, फिर भी शंका-बाण बेधते.
तनिक बोल ली पल भर हँसकर, तो हरजाई कहाई बिटिया..

राखी बाँधी लेकिन रक्षा करने भाई न कोई पाया.
मीत मिले जो वे भी निकले, सपनों के सौदाई बिटिया..

जैसे-तैसे ब्याह हुआ तो अपने तज अपनों को पाया.
पहरेदार ननदिया कर्कश, कैद भई भौजाई बिटिया..

पी से जी भर मिलन न पाई, सास साँस की बैरन हो गयी.
चूल्हा, स्टोव, दियासलाई, आग गयी झुलसाई बिटिया..

फेरे डाले सात जनम को, चंद बरस में धरम बदलकर
लाया सौत सनम, पाये अब राह कहाँ?, बौराई बिटिया..

दंभ जिन्हें हो गए आधुनिक, वे भी तो सौदागर निकले.
अधनंगी पोशाक, सुरा, गैरों के साथ नचाई बिटिया..

मन का मैल 'सलिल' धो पाये, सतत साधना स्नेह लुटाये.
अपनी माँ, बहिना, बिटिया सम, देखे सदा परायी बिटिया..

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दिव्यनर्मदा.ब्लागस्पाट.कॉम  

कन्हैयालाल नंदन दिवंगत - अविनाश वाचस्पति

कन्‍हैयालाल नंदन
हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता को अमूल्य योगदान देने वाले तथा आत्मीयता,संवेदनशील तथा मिलनसार व्यक्तित्व के स्वामी श्रद्धेय कन्हैयालाल नंदन का आज २५ सितंबर को प्रातः ४ बजे स्वर्गवास हो गया।। २६ सितंबर को साढ़े दस बजे लोधी रोड दिल्ली स्थित श्‍मशानघाट  में उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा। उनकी कविता अहसास का घर की पंक्तियां हैं: दिवंगत

हर सुबह को कोई दोपहर चाहिए,
मैं परिंदा हूं उड़ने को पर चाहिए।
 
वे बिना पर के ही उड़ गए, दोपहर का भी इंतजार नहीं किया पर दोपहर आ रही है। बस नंदन जी नहीं हैं, उनकी स्मृतियाँ हैं।

                                                                                                                  - अविनाश वाचस्पति  

नव गीत: कैसी नादानी??... संजीव 'सलिल'

नव गीत:

कैसी नादानी??...

संजीव 'सलिल'
*
मानव तो रोके न अपनी मनमानी.
'रुको' कहे प्रकृति से कैसी नादानी??...
*
जंगल सब काट दिये
दरके पहाड़.
नदियाँ भी दूषित कीं-
किया नहीं लाड़..
गलती को ले सुधार, कर मत शैतानी.
'रुको' कहे प्रकृति से कैसी नादानी??...
*
पाट दिये ताल सभी
बना दीं इमारत.
धूल-धुंआ-शोर करे
प्रकृति को हताहत..
घायल ऋतु-चक्र हुआ, जो है लासानी...
'रुको' कहे प्रकृति से कैसी नादानी??...
*
पावस ही लाता है
हर्ष सुख हुलास.
तूने खुद नष्ट किया
अपना मधु-मास..
मेघ बजें, कहें सुधर, बचा 'सलिल' पानी.
'रुको' कहे प्रकृति से कैसी नादानी??...
*

बातचीत: डॉ. शहरयार ---- डॉ. प्रेमकुमार

यह दौर बड़ी शायरी का दौर नहीं है [डॉ. शहरयार से बातचीत] [डॉ. शहरयार को ज्ञानपीठ प्राप्त होने की बधाई स्वरूप विशेष प्रस्तुति] - डॉ. प्रेमकुमार




भारतीय ज्ञानपीठ ने शुक्रवार को 43वें और 44वें ज्ञानपीठ पुरस्कारों की एक साथ घोषणा की। ये पुरस्कार उर्दू के जाने-माने साहित्यकार शहरयार और मलयालम कवि नीलकानंदन वेलु कुरुप को दिए जाएंगे। ज्ञानपीठ की ओर से जारी विज्ञप्ति के अनुसार ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता सीताकांत महापात्र की अध्यक्षता में चयन समिति की बैठक में यह निर्णय लिया गया। चयन समिति के अन्य सदस्य प्रो. मैनेजर पाण्डेय, डा. के.सच्चिदानंदन, प्रो. गोपीचंद नारंग, गुरदयाल सिंह, केशुभाई देसाई, दिनेश मिश्रा और रवींद्र कालिया बैठक में मौजूद थे।
साहित्य शिल्पी पर डॉ. शहरयार का यह साक्षात्कार हमने लगभग डेढ वर्ष पूर्व प्रस्तुत किया था। आज उनकी इस महति उपलब्धि के अवसर पर हम इसे पुनर्प्रकाशित कर रहे हैं।

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कमलेश्वर शहरयार को एक खामोश शायर मानते थे। एक ऐसा खामोश शायर जब इस कठिन दौर व खामोशी से जुड़्ता है, तो एक समवेत चीखती आवाज मे बदल जाता है। बडे अनकहे तरीके से अपनी खामोशी भरी शाइस्ता आवाज को रचनात्मक चीख में बदल देने का यह फन शहरयार की महत्वपूर्ण कलात्मक उपलब्धि है। वे मानते है कि शहरयार की शायरी चौकाने वाली आतिशबाजी और शिकायती तेवर से अलग बड़ी गहरी सांस्कृतिक सोच की शायरी है और वह दिलो दिमाग को बंजर बना दी गयी जमीन को सीचती है।

अकादमी पुरस्कार के अतिरिक्त विभिन्न स्तरों पर देश विदेश में सम्मान और ख्याती प्राप्त शहरयार के उर्दू में ‘इस्में आज़्म’, ‘सातवाँ दर’, ‘हिज्र की जमीन’ शीर्षकों से आए काव्य संग्रह काफी चर्चित और प्रशंशित हुए हैं। ‘ख्वाब का दर बंद है’ हिन्दी और अंग्रेजी मे भी प्रकाशित हो चुका है तथा ‘काफिले यादों के’, ‘धूप की दीवारे’, ‘मेरे हिस्से की ज़मीन’ और ‘कही कुछ कम है’ शीर्षकों से उनके काव्य संग्रह हिन्दी मे प्रकाशित हो चुके है। ‘सैरे जहाँ’ हिन्दी मे शीघ्र प्रकाश्य है।

‘उमराव जान’ की गजलों से शहरयार को जो ख्याति, जो सम्मान मिला उसे वे अपनी उपलब्धि और खुशकिस्मती मानते हैं। फिल्म को आज के संदर्भ में वे काफी ‘इफेक्टिव मीडिया’ मानते हैं। वे कहते है कि उन्होने अपनी आइडियोलाजी के लिये इस मीडिया का बेहतर इस्तेमाल किया। एक श्रेष्ठ और समर्पित कवि के अतिरिक्त वे एक संवेदनशील, विनम्र, आत्मीय और दूसरों की भावनाओं का सम्मान करने वाले व्यक्ति हैं। प्रस्तुत है डॉ. प्रेम कुमार से उनकी बातचीत

[ नोट - डॉ. प्रेम कुमार ने बेहद विस्तार से शहरयार को जानने व इस मंच पर प्रस्तुत करने का उल्लेखनीय कार्य किया है इसके लिये साहित्य शिल्पी समूह उनका आभार व्यक्त करता है। अंतरजाल की सीमाओं के मद्देनजर दो खंडो और चालीस पृष्ठों में प्रेषित इस साक्षात्कार के महत्वपूर्ण अंश मुख्य पृष्ठ पर प्रस्तुत किये जा रहे हैं। शेष बातचीत पढने के लिये प्रस्तुत साक्षात्कार के नीचे दिये गये लिंक पर चटखा लगायें]

लेखन के शुरुआती दौर के विषय में कुछ बतायें

ये मुझे याद नहीं आता. बार-बार सोचा है - कोई ऐसा सिरा नहीं मिला कि पकड़ कर कह सकूँ कि मैं शायरी की तरफ जाने वाला था। बेसिकली यह याद आता है कि खलीलुर्रहमान साहब, जो बड़े कवि और आलोचक थे, ए.एम.यू. में रीडर थे; से मिलना-जुलना होता था। जब मैंने तय किया कि मुझे थानेदार नहीं बनना है तो घर से अलग होना पड़ा। तब मैं खलीलुर्रहमान के साथ रहने लगा।...। तो शुरू में मेरी जो चीजें छपीं, ऐक्चुअली वो मेरी नहीं हैं। बाद में अचानक कोई मेरी ज़िंदगी में आया.... नहीं, यह कांफीडेंशियल है... मैं कितना ही रुसवा हो जाऊँ इस उम्र में, किसी और को रुसवा क्यों करूँ?.... तब दुनिया मुझे अज़ीब लगने लगी और फिर मैं शायरी करने लगा। बी.ए. की आखिरी साल में शेर लिखने की रफ़्तार तेज हो गई। एम.ए. में साइकोलोजी में दाखिला लिया और जल्दी ही अहसास हुआ कि फैसला गलत लिया है। दिसम्बर में नाम कटा लिया। फिर चार छ: महीने केवल शायरी की - खूब छपवाई। ऊपर वाले की मुझ पर.... हाँ, यूँ मैं मार्क्सिस्ट हूँ फिर भी मानता हूँ कि कोई शक्ति है; कोई बड़ी ताक़त है जो मेरी चीजों को तय करती रही है। उर्दू की बहुत अच्छी मैगजींस में मेरी चीजें छपने लगीं। तेज़ रफ़्तारी से सामने आया। फिर एम.ए. उर्दू में ज्वाइन किया। उस दौर में मेरा और मासूम रज़ा राही का कम्पिटीशन चलता था। जी, हमने बी.ए. साथ-साथ किया, फिर मैं एक साल पीछे हो गया।

इस पर खुश नहीं होना चाहिये कि यह फिक्शन का दौर है। इस पर अफसोस होना चाहिये है, यह अदब का दौर नहीं है। महसूस करने को आला जुबान है- हर शख्स की मादरी जुबान और उसकी सबसे अच्छी चाहते है, तो महसूस करने का यह माद्दा खत्म नहीं होना चाहिए। जो शख्स महसूस नहीं कर सकता, वह खासा खतरनाक होता है। वह न तो अच्छा शायर हो सकता है, न अच्छा बाप, न शौहर, न पड़ोसी। इसलिये वे आर्गनाइज्ड लोग, जो समाज मे उथल-पुथल करना चाहते हैं, वे इंसानो से उनके महसूस करने का हक छीन लेना चाहते हैं। शायरी, पेंटिग, म्यूजिक सब इमेजिनेशन की पैदावार है। सोसायटी में इनका न होना खतरनाक है। वैल्यूज को जितनी फोर्सफुली और पर्फेक्टली पोयट्री रेप्रेजेंट कर सकती है, उतना और कोई फैकल्टी आँफ आर्ट नहीं कर सकती।

पिछले दिनों हिन्दी में “ कविता की मौत “ और गद्य के भविष्य पर काफी कुछ कहा गया है। पिछले दिनों काजी अब्दुल सत्तार ने पोयट्री पर कई कोणों से प्रहार करते हुए इक्कीसवीं सदी को फिक्शन की सदी कहा है। एक शायर होने के नाते आप इन बिन्दुओं पर किस प्रकार सोचते है?

देखिये इस पर खुश नहीं होना चाहिये कि यह फिक्शन का दौर है। इस पर अफसोस होना चाहिये है, यह अदब का दौर नहीं है। महसूस करने को आला जुबान है- हर शख्स की मादरी जुबान और उसकी सबसे अच्छी चाहते है, तो महसूस करने का यह माद्दा खत्म नहीं होना चाहिए। जो शख्स महसूस नहीं कर सकता, वह खासा खतरनाक होता है। वह न तो अच्छा शायर हो सकता है, न अच्छा बाप, न शौहर, न पड़ोसी। इसलिये वे आर्गनाइज्ड लोग, जो समाज मे उथल-पुथल करना चाहते हैं, वे इंसानो से उनके महसूस करने का हक छीन लेना चाहते हैं। शायरी, पेंटिग, म्यूजिक सब इमेजिनेशन की पैदावार है। सोसायटी में इनका न होना खतरनाक है। वैल्यूज को जितनी फोर्सफुली और पर्फेक्टली पोयट्री रेप्रेजेंट कर सकती है, उतना और कोई फैकल्टी आँफ आर्ट नहीं कर सकती। पोयट्री से लुत्फ उठाने के लिये, उसे एप्रीशिएट करने के लिए कई चीज जरूरी हैं-म्यूजिक, पेंटिग, फिलासफी, मीटर्स बगैरह। उन्हें जानना जरूरी है। यदि आपको आईरकी सोसायटी चाहिये और उसमें वैल्यूज की बुनियाद चाहिये, तो पोयट्री जरूरी है। सारी दुनिया की जुबानों में पहले पोयट्री पैदा हुई फिर फिक्शन। फिक्शन को लोमैन भी पढ़ सकता है, पर पोयट्री का लुत्फ बहुत कुछ जानने पर ही लिया जा सकता है। बड़ा फिक्शन भी पोयट्री के बिना नहीं लिखा जा सकता।

हिंदी में तो मंच के स्तर के गिरते जाने की........?

वो तो उर्दू में भी है। अच्छे बुरे हर तरह के लोग जाते भी हैं। नहीं किसी के साथ पढने-न-पढ़ने की शर्त नहीं रखी। यह सही है कि खाली लिटरेरी हैसियत के प्रोग्राम अच्छे लगते हैं यह दुनिया कुछ खास लोगों के लिए नहीं बनी है, हर तरह के लोग उस में मौज़ूद हैं। और उन्हें मौजूद और जिंदा रहने का हक है। खुद हम जिन लोगों को कंटेम्प्ट के साथ देखते हैं, उनका एक रोल है वो जिस सतह पर लोगों को एंटरटेन करते हैं, उसकी भी एक जरुरत है। हम-आप भी अगर अपने आपको अपने बनाए हुए जाल से थोडा सा निकाल सकें तो हमको भी वो चीजें अच्छी लगती हैं।

मंच में और सीरियस लिटरेचर में जो फ़ासला पैदा हो गया है, उसकी थोडी बहुत जिम्मेदारी सीरियस राइटर्स पर भी है। वो उस इडियस में बात करने लगे है कि जो बहुत खास लोगों के लिए रह गया है। इसका मतलब यह नहीं है कि हमें अपने से नीचे उतरना चाहिए, पर अर्थ यह है कि हमें अपनी गंभीर बात को सहज अंदाज में कहने का आर्ट हासिल करना चाहिए।

मंच में और सीरियस लिटरेचर में जो फ़ासला पैदा हो गया है, उसकी थोडी बहुत जिम्मेदारी सीरियस राइटर्स पर भी है। वो उस इडियस में बात करने लगे है कि जो बहुत खास लोगों के लिए रह गया है। इसका मतलब यह नहीं है कि हमें अपने से नीचे उतरना चाहिए, पर अर्थ यह है कि हमें अपनी गंभीर बात को सहज अंदाज में कहने का आर्ट हासिल करना चाहिए।

अदब में फ़ार्म और कटेंट की बहस में हमेशा उलझावा रहा है, इसीलिये कि अदब में इन दोनो को अलग-अलग देखना नामुमकिन है। ये तो हम उसका असेस्मेंट करने में, उसको एप्रीशिएट करने में अपनी सहूलियत के लिये अलग-अलग कर के देखते हैं और कभी एक चीज पर और कभी दूसरी चीज पर ज्यादा एम्फ़ैसिस देने लगते हैं। मैं उन लोगों में हुँ जिनका ख्याल है कि अगर कोई मजबूरी आन पड़े और हमें फ़ार्म और कटेंट में से किसी एक को तस्लीम करना पडे तो मैं कंटेट को अहमियत दूंगा

उर्दू में शायरी की ताकत के नाम पर प्राय: गज़ल का जिक्र किया जाने लगता है। आप भी पहले नज़्म की तुलना मे गज़ल के रूप को बेहतर मानते रहे हैं। गज़ल और नज़्म के स्तर पर आज आप शायरी या शायर को किस तरह अलग अथवा बेहतर-कमतर मानते हैं।

गज़ल मे जो भी ट्रुथ होता है वह जनरल बन जाता है। उसकी डिटेल्स मौजूद नहीं होती इसलिये शेर कई जगह कई बातों को निकालते हुए आता है। यह उसकी ताकत भी है कमजोरी भी। आप चाहते है कि किसी पर्टिकुलर चीज पर निगाह डालें लोग, पर जनरल होने की वजह से सुनने-पढ़्ने वाला अपनी तरह से अर्थ ले लेता है। नज़्म में जिस तरह आप अपनी बात कहते है, उसमे पढने-सुनने वाला पूरी तरह नहीं तो काफी बड़ी हद तक आपकी सोच के आस-पास रहता है। गज़ल कहते समय उस फार्म की कुछ बंदिशे है, जिनकी वजह से कभी-कभी कुछ ज्यादा कह जाते हैं या कुछ कम रह जाता है। जरूरी नहीं कि हर नज़्म मे सौ फीसदी कामयाब हों, लेकिन गज़ल के मुकाबले मे लिखने वाले को यह अहसास होता है कि वह अपनी बात दूसरों तक पहुँचा सका है।

पहले मेरा इस पर रूख दूसरा था। अब चेंज किया है, मैने अपनी राय को। अब दोनों में ही में सभी तरह की प्राब्लम्स फेस करता हूँ। गज़ल मे जो भी ट्रुथ होता है वह जनरल बन जाता है। उसकी डिटेल्स मौजूद नहीं होती इसलिये शेर कई जगह कई बातों को निकालते हुए आता है। यह उसकी ताकत भी है कमजोरी भी। आप चाहते है कि किसी पर्टिकुलर चीज पर निगाह डालें लोग, पर जनरल होने की वजह से सुनने-पढ़्ने वाला अपनी तरह से अर्थ ले लेता है। नज़्म में जिस तरह आप अपनी बात कहते है, उसमे पढने-सुनने वाला पूरी तरह नहीं तो काफी बड़ी हद तक आपकी सोच के आस-पास रहता है। गज़ल कहते समय उस फार्म की कुछ बंदिशे है, जिनकी वजह से कभी-कभी कुछ ज्यादा कह जाते हैं या कुछ कम रह जाता है। जरूरी नहीं कि हर नज़्म मे सौ फीसदी कामयाब हों, लेकिन गज़ल के मुकाबले मे लिखने वाले को यह अहसास होता है कि वह अपनी बात दूसरों तक पहुँचा सका है।

गज़ल की ताकत या कमजोरी की बात नहीं है। उसके फार्म ने न खुशी है, न खामी है। इस्तेमाल करने वाले पर है। हमारे यहाँ इसका बहुत चलन रहा है। उसके जरिये जो भी कहा जाता है वो बहुत ही जल्द और बहुत से लोगों तक पहुचता है। ग़ज़ल के बारे मे हर बार कहा गया है कि अपने जमाने का साथ नहीं दे सकरी पर इकबाल, फैज सबने साबित किया कि दे सकती है। मुशायरे की शायरी से हिन्दी या उर्दू मे अंदाज नहीं लगाना चाहिए।

हमारे यहाँ बहुत से शायर है-अच्छे शायर, जिन्होने गजल बिल्कुल नहीं लिखी पर उनकी शायरी कुछ खास लोगों की शायरी है। शायरी मे शायर की अपनी सोच होनी चाहिए, पहचान होनी चाहिए। कुछ खास बातें उसकी होनी चाहिए, लेकिन उसकी पहुँच खास के साथ आम लोगों तक भी हो। तब वह एक सच्ची और अच्छी शायरी होती है। उर्दू मे इसकी सब से बड़ी मिसाल गालिब है, बहुत गहरी, बहुत फिलासफी कल बातें करते है और जिन्दगी की ऐसी सच्चाइयाँ सामने लाते है, जो हमें हैरान कर देती हैं। उनकी जुबान भी , ईडियम कहिए, वो आसान नहीं है, लेकिन इसके बावजूद एक सतह पर आम आदमी भी उससे लुत्फंगूज होता है, मजा लेता है।

गज़ल और नज़्म की जहाँ तक बार है, हम उर्दू वालों का मिजाज गज़ल मे इतना रच-बस गया है कि वो नज़्म को उतना पसंद नही करता। यही वजह है कि उर्दू में वो शायर नुक्सान में रहे, जिन्होने सिर्फ नज़्में लिखी। आम मकबूलियत में अनकी गजलों का बड़ा हाथ है। अगरचे अदब को सतह पर देखा जाए तो उनका असली कंट्रीब्यूशन उनकी नज़्मो मे है।

आपने गजल की जिस खूबी-खामी और उर्दू शायरों की पसंद व मिजाज की बात की है वह तो अपनी जगह है पर आपको भी ऐसा लगता है कि गजलों में अपने पूर्वर्तियो की छाया अथवा नकल या दोहराव अधिक बहुत अधिक दिखाई देता है। मौलिकता के संदर्भ में आप उर्दू गजल को कहा देखते है?

ऐसा नही है। ये दौर बड़ी शायरी का दौर नहीं है। दूसरे दर्जे के शायर है और वे सब मिलकर बड़ी शायरी बनते है। फैज, मकदूम, मज़ाज़, जज़्बी, सरदार बगैरह मिलकर एक शक्ल बनाते है। अच्छे शायर है ये सब और अच्छी बात यह है अलग-अलग अच्छे शायर होना। हर शायर का जहाँ प्वांइट आफ व्यू होगा वह उससे देखेगा चीजों को। सिलेक्ट करने न करने का आला प्वाइंट आफ व्यू है। ऐसा मालूम होता है कि कुछ सिमलीज व मेहाफर्स बार बार आ रहे है। उससे लगता है कि रिपिट कर रहा है शायर अपने को। अच्छा सच्चा शायर कोशिश करता है कि अपने को रिपीट न करे। अब जैसे रात आया या सहर आया कहीं। पालिटिकल सोशियो प्राबलम्स है, अपनी बात है, कहने मे कुछ सिम्बल हैल्प करते है। इसलिये रात और दिन सिम्बल बन गए। सिचुएशन की मुख्तलिफी से फैज की, मेरी, पाकिस्तान का रात या दिन अलग होंगे। बहुत से दौर अदब मे ऐसे आते है और आए है जहाँ शायरो की बात ओवर लैप करती है। वह पूरे दौर की बात बन जाती है। एक्सटर्नल फोर्सेज, बहुत से लोगों को एक तरह से सोचने को मजबूर कर देती है। जब सब लोग एक तरह से सोचने को मजबूर हो जाए तो जाहिर है कि उनकी जुबान मे भी समानताएँ नजर आती है। पर ये उपरी समानताएँ होती है। सरसरी नजर से, कैजुअली जो पढ़्ता है, उसे यह धोखा है कि सब एक तरह की बातें कर रहे हैं। शायरी मे हर शायर की इडिवीजुअलिटी जरूर मौजूद रहती है। इसलिए क्रिएट करने वाले की अपनी जो आइडैंटिटी है, वह गुम नही होती। शायरी या कोई भी सीरियस आर्ट-फार्म पढ़्ने सुनने देखने वाले से थोडी सावधानी और थोडा वक्त मांगता है। जाकिर साहब का यह कथन कि “अगर कोई काम इस काबिल है कि किया जाए तो फिर उसे दिल लगाकर किया जाए अदब पर भी पूरी तरह लागू होता है।

आपको मुशायरो मे भी बुलाया जाता रहा है। आप शिरकत भी करते रहे है। ऐसा क्यों है कि आपकी मुशायरो के बारे मे अच्छी राय नही है? अपनी कुछ खामियो के बावजूद मुशायरो या कवि सम्मेलन अपनी अपनी भाषाओं को लोकप्रिय तो बना ही रहे है?

इंडिया मे मुशायरों और कवि सम्मेलनों मे सिर्फ चार बाते देखी जाती है- पहली, मुशायरा कंडक्ट कौन करेगा? दूसरी- उसमे गाकर पढ़्ने वाले कितने लोग होगे? तीसरी- हंसाने वाले शायर कितने होंगे और चौथी यह कि औरतें कितनी होगीं? मुशायरा आर्गेनाइज –पेट्रोनाइज करने वाले इन्ही चीजों को देखते है। इसमे शायरी का कोई जिक्र नहीं। हर जगह वे ही आजमाई हुई चीजें सुनाते है। भूले बिसरे कोई सीरियस शायर फँस जाता है, तो सब मिलकर उसे डाउन करने की कोशीश करते है। इसे आप पॉपुलर करना कह लीजिए। फिल्म ग़ज़ल भी बहुत पॉपुलर कर रहे है। पर बहुत पापुलर करना वल्गराइज करना भी हो जाता है बहुत बार। इंस्टीट्यूशन मे खराबी नहीं, पर जो पैसा देते है, वे अपनी पसंद से शायर बुलाते है। उनके बीच मे सीरियस शायर होगे तो मुशकिल से तीन चार और उन्हे भी लगेगा जैसे वे उन सबके बीच आ फँसे है। जिस तरह की फिलिंग मुशायरो के शायर पेश करते है, गुमराह करने वाली, तास्तुन, कमजरी वाली चीजें वे देते है, सीरियस शायर उस हालात मे अपने को मुश्किल मे पाता है।

आप हिन्दी के साहित्य और साहित्यकारों से भी आत्मीय व करीबी स्तर पर जुडे रहे है। हिन्दी –उर्दू साहित्य को अगर आज तुलनात्मक दृष्टि से हम देखना चाहें, तो क्या मुख्य समानताए या असमानताए उनके बीच दिखती है? हिन्दी गजल के बारे मे विशेष रूप से अपनी राय जाहिर करते हुए आप अन्य विधाओ मे लिखे गए साहित्य की वर्तमान स्थिति के बारे मे अपने अनुभव, अपने विचार प्रकट करना अवश्य चाहेगे?

हिन्दुस्तानी वाला इलाका बैक्क बर्ड है। यहाँ अदब के बूते जिन्दा नहीं रहा जा सकता। रीजनल जुबानों में रिकॉगनीशन मिलने पर जिन्दगी गुजारी जा सकती है। मराठी, उडिया, बंगाली, तमिल वगैरह मे पढ़ा-लिखा कोई आदमी ऐसा नहीं होगा जो अपनी भाषा के लेखको को न जानता होगा। हिन्दी-उर्दू वाले आसानी से नये लोगों को रिकगनाइज नहीं करते। हम ही रहें नये न आए। एस्टेबलिशमेंट बन गया है। एकेडमिक इंस्टीयूशंन और हिन्दी-उर्दू डिपार्ट्मेंट्स की स्थिति यह है कि वहा लिटरेचर से लेना देना नहीं। साहित्य पढ़ाने मे लगे है, किंतु एकेडिमिक काम के अलावा दुनिया भर के काम उन्हे है। प्रोग्रेसिव आइडियाज से हिन्दी उर्दू दोनो मे लोग बिदकते है।

मैने हिन्दी साहित्य को हिस्टोरिक प्रोस्पेक्टिव मे सिस्टेमेटिक और आर्गेनाइज्ड ढंग से नही पढ़ा। पर हाँ जिन लोगो से सम्बन्ध रहे है उन्हे पढा है। भले ही सिस्टेमेटिक ढंग से नहीं पर मैने सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, गिरिधर राठी, अशोक वाजपेयी, भारती, शमशेर, दुष्यंत, केदारनाथ, त्रिलोचन, नागार्जुन, श्रीकांत वर्मा वगैरह को पढ़ा है। वह अलग शायरी है। इसमे कम्पेयर नहीं। हिन्दी मे लोग गजल लिखते है, यह अच्छी बात है। पर दुष्य़ंत ने जो छाप लगा दी, वह बिलकुल अलग है। किसी भी तरह देखे वह गजल है। हम जिस तरह के मीटर के आदी है, हिन्दी शायरी हमें थोडी प्रोजेक लगती है। हम जिस तरह के मीटर और रिदम के कायल है, उसकी वजह से यह अहसास होता है कि जैसे वह प्रोज के करीब है। महादेवी, निराला मे ऐसी बात नहीं। पर जहा तक थाट-कंटेट को बात है, बहुत सीरियस शायरी है। वहाँ क्रिटीहिज्म मैने सुनी ज्यादा है, पढ़ी कम है। अपनी तकरीर मे नामवर सिंह बहुत इम्प्रेस करते है। उनका रिकार्ड काफी दिनों से एक जगह ठहरा हुआ है। मुझे कमलेश्वर और नामवर की तकरीर में अंतर नहीं लगता। दोनो इम्प्रेस करते है और दोनो के कुछ पहलू ऐसे है तो ज्यादा देर मुतस्सिर करते है। हिन्दी मे फिक्शन अच्छा है। कमलेश्वर, मोहन राकेश यादव, मुन्नू, शानी, श्रीलाल शुक्ल को पढ़ा है। एक खास पीरियड में राकेश , कमलेश्वर, यादव, शानी ने अच्छा लिखा है।

खराबियाँ-अच्छाइयाँ दोनो मे कॉमन है। हिन्दुस्तानी वाला इलाका बैक्क बर्ड है। यहाँ अदब के बूते जिन्दा नहीं रहा जा सकता। रीजनल जुबानों में रिकॉगनीशन मिलने पर जिन्दगी गुजारी जा सकती है। मराठी, उडिया, बंगाली, तमिल वगैरह मे पढ़ा-लिखा कोई आदमी ऐसा नहीं होगा जो अपनी भाषा के लेखको को न जानता होगा। हिन्दी-उर्दू वाले आसानी से नये लोगों को रिकगनाइज नहीं करते। हम ही रहें नये न आए। एस्टेबलिशमेंट बन गया है। एकेडमिक इंस्टीयूशंन और हिन्दी-उर्दू डिपार्ट्मेंट्स की स्थिति यह है कि वहा लिटरेचर से लेना देना नहीं। साहित्य पढ़ाने मे लगे है, किंतु एकेडिमिक काम के अलावा दुनिया भर के काम उन्हे है। प्रोग्रेसिव आइडियाज से हिन्दी उर्दू दोनो मे लोग बिदकते है।

आपके बारे में कहा जाता है कि आपने अपने लेखन से हिन्दी उर्दू के बीच एक पुल बनाया है। आप हिन्दी में भी काफी लोकप्रिय हैं। आपकी लोकप्रियता में फिल्म के गीतों की क्या भूमिका है? आप अपनी उपलब्धियों और देश की वर्तमान हालत पर क्या कुछ कहना चाहते हैं?

मैं हिन्दी या उर्दू को नहीं लिख रहा, बल्कि उन लोगों के लिये लिख रहा हूँ जो खास तौर पर उर्दू भाषा भाषी हैं पर स्क्रिप्ट नहीं जानते, उन लोगों के लिये इनकी मातृभाषा उर्दू नहीं है पर मेरी शायरी पसंद करते हैं। मेरे शेर सुन कर, मुझसे मिल कर खुश होते हैं, मुझे प्यार देते हैं। हिन्दी में ज्यादा पॉपुलर होने की वजह यह है कि वे छापते हैं, पैसे देते हैं, इज्जत देते हैं, मानते हैं। उर्दू में खुद छपवानी पडती हैं किताबें।

मेरी ज़िन्दगी में फिल्म के मेरे गीतों नें बहुत अहं रोल अदा किया है। मैं अपनी लिटररी अहमियत की वजह से फिल्म में गया फिर आम स्तर पर फिल्म की वजह से लिटरेचर में मेरी अहमियत बढी। मोहब्बत, शौहरत, दौलत, इज्जत, बच्चे...आदमी जो ख्वाहिश कर सकता है मुझे खूब मिला। वैसे आप जानते हैं पूरी तरह कोई मुतमइन नहीं होता। शायद आदमी के ज़िन्दा रहने को जरूरी है कि वह किसी चीज की ख्वाहिश करता रहे।किसी चीज की कमी महसूस करता रहे।

जहाँ तक देश के सूरत-ए-हाल का सवाल है, तो जैसे मुल्क का फ्यूचर तय हो रहा है, रिफॉर्म्स के नाम पर जैसे जो हो रहा है और आम आदमी को कुछ नहीं मिल रहा है, हम खुली आँखों से देख रहे हैं और अपने को बेबस महसूस करते हैं। ईस्ट ईंडिया कम्पनी दूसरी तरह से आ रही है। आम आदमी को सच्चाईयों से दिन प्रतिदिन दूर किया जा रहा है। लेकिन हिन्दुस्तान के बारे में मेरा जो अनुभव है वह यह कि वह पाखंड को बहुत समय तक बर्दाश्त नहीं कर सकता। यहाँ लोग शोर नहीं मचाते लेकिन जब फैसले का वक्त आता है तो सच्चे और अच्छे फैसले करते हैं। मेरा यह ईमान मुझे फ्यूचर से मायूस नहीं होने देता। मुझे यकीन है कि आने वाली जनरेशन को वह सब कुछ नहीं देखना पडेगा जो हम देख सह रहे हैं।

न जिसकी शक्ल है कोई, न जिसका नाम है
कोई इक एसी शै का क्युँ हमेँ अज़ल से इंतज़ार है

जहाँ तक देश के सूरत-ए-हाल का सवाल है, तो जैसे मुल्क का फ्यूचर तय हो रहा है, रिफॉर्म्स के नाम पर जैसे जो हो रहा है और आम आदमी को कुछ नहीं मिल रहा है, हम खुली आँखों से देख रहे हैं और अपने को बेबस महसूस करते हैं। ईस्ट ईंडिया कम्पनी दूसरी तरह से आ रही है। आम आदमी को सच्चाईयों से दिन प्रतिदिन दूर किया जा रहा है। लेकिन हिन्दुस्तान के बारे में मेरा जो अनुभव है वह यह कि वह पाखंड को बहुत समय तक बर्दाश्त नहीं कर सकता। यहाँ लोग शोर नहीं मचाते लेकिन जब फैसले का वक्त आता है तो सच्चे और अच्छे फैसले करते हैं। मेरा यह ईमान मुझे फ्यूचर से मायूस नहीं होने देता। मुझे यकीन है कि आने वाली जनरेशन को वह सब कुछ नहीं देखना पडेगा जो हम देख सह रहे हैं:-

आज का दिन बहुत अच्छा नहीं तस्लीम है
आने वाला दिन बहुत बहतर है, मेरी राय है।

आपको उमरावजान के गीतों के कारण बेहद ख्याति मिली। फिल्म जगत के आपके अनुभव कैसे रहे हैं? फिल्मों के लिये गीत लिखते हुए स्वयं को कितना समर्थ और अनुकूल मानते हैं?

मुझे ज़िन्दगी में बहुत सी चीजें फिल्म के गानों की मकबूलियत से मिलीं। दूर दराज मुल्कों में जो मुशायरों में बुलाया जाता है तो उसमें यही इंट्रोडेक्शन काफी होता है कि ये उमरावजान के गीतों के लेखक हैं। मेरे बच्चों से अक्सर यह सवाल किया जाता है कि आप उन्ही शहरयार के बच्चे हैं, जिन्होने उमरावजान के गाने लिखे हैं? मैं आवाम की पसंद की अहमियत का हमेशा कायल रहा हूँ। अगर कोई किसी को पसंद करता है तो उसमें कुछ न कुछ अच्छा जरूर है। नासिर काज़मी का एक मिसरा है – “कुछ होता है जब पलके खुदा कुछ कहती है” मकबूलियत की अपनी जगह है।

वहाँ निन्यानबे प्रतिशत गाने धुनों पर लिखे जाते हैं, फौरन वहीं पर। हम नहीं लिख सकते। बहुत दिनों से यह काम हो रहा है। साहिर वगैरह बहुत लोगों नें लिखे। लगता है जैसे कफन तैयार है अब मुर्दा तैयार कीजिये। जब तक हम कहानी कैरेक्टर का हिस्सा न बना लें गीत को कैसे लिखें? क्रियेटिव प्रोसेस इंटरकोर्स से मिलता जुलता है। उसको प्राईवेसी जरूरी है। हम दनादन धुन पर तुरंत नहीं लिख सकते।

पिक्चर को मन इस लिये होता है कि उस मीडियम का इफैक्ट है। हमारी बहुत सी बातें जो वैसे नहीं पहुँच रहीं वहाँ से पहुँचें। हमने उस मीडिया को अपनी आईडियोलॉजी के लिये इस्तेमाल किया है। हमें खडे होने के लिये सही जगह मिलनी चाहिये, हम उसके सारे रिग्वायरमेंट पूरे कर सकते हैं। मेरे अनुभव बहुत अच्छे रहे हैं वहाँ के। हमें हमेशा यह अहसास रहा कि हम युनिवर्सिटी के नौकर हैं। हमने मुशायरों फिल्मों के लिये छुट्टियाँ जाया करना ज़रूरी नहीं समझा। बाहर के ऑफर्स उन दिनो एवायड करते रहे। अब रिटायरमेंट के बाद हम वक्त देना अफोर्ड कर सकते हैं।
                                                                                                                                 ( आभार : साहित्य शिल्पी)
                                                                                *****

शुक्रवार, 24 सितंबर 2010

दोहा सलिला : रूपमती तुम... -संजीव 'सलिल'

दोहा सलिला :
                                                                                                                                                                                                            
रूपमती तुम...

संजीव 'सलिल'
*
रूपमती तुम, रूप के, हम पारखी अनूप.
तृप्ति न पाये तृषित गर, व्यर्थ रूप का कूप..
*
जुही चमेली चाँदनी, चम्पा कार्सित देह.
चंद्रमुखी, चंचल, चपल, चतुरा मुखर विदेह..
*
नख-शिख, शिख-नख मक्खनी, महुआ सा पीताभ.
तन पाताल रत्नाभ- मुख, पौ फटता अरुणाभ..
*
वाक् सारिका सी मधुर, भौंह नयन धनु बाण.
वार अचूक कटाक्ष का, रुकें न निकलें प्राण..
*
सलिल-बिंदु से सुशोभित, कृष्ण-कुंतली भाल.
सरसिज पंखुड़ी से अधर, गुलकन्दी टकसाल..
*
देह-गंध मादक-मदिर, कस्तूरी अनमोल.
ज्यों गुलाब-जल में 'सलिल', अंगूरी दी घोल..
*
दस्तक कर्ण-कपाट पर, देते रसमय बोल.
पहुँच माधुरी हृदय तक, कहे नयन-पट खोल..
*
दाड़िम रद-पट मौक्तिकी, संगमरमरी श्वेत.
रसना मुखर सारिका, पिंजरे में अभिप्रेत..
*
वक्ष-अधर रस-गगरिया, सुख पा, कर रसपान.
बीत न जाए उमरिया, रीते ना रस-खान..
*
रस-निधि पा रस-लीन हो, रस पी हो लव-लीन.
सरस सृष्टि, नीरस बरस, तरस न हो रस-हीन..
*
दरस-परस बिन कब हुआ, कहो सृष्टि-विस्तार?
दृष्टि वृष्टि कर स्नेह की, करे सुधा-संचार..
*
कंठ सुराहीदार है, भौंह कमानीदार.
करें दीद दीदार कह, तुम सा कौन उदार?.
*
मधुशाला से गाल हैं, मधुबाला सी चाल.
छलक रहे मधु-कलश लख, होते रसिक निहाल..
*
कदली-दल सम पग युगल, भुज द्वय कमल-मृणाल.
बंधन में बँधकर हुआ, तन-मन-प्राण निहाल..
*
करधन, पायल, चूड़ियाँ, खनक खोलतीं राज.
बोल अबोले बोलकर, साधें काज-अकाज..
*
बिंदी चमके भाल पर, जैसे नभ पर सूर्य.
गुँजा रही विरुदावली, 'सलिल' नासिका तूर्य..
*
झूल-झूल कुंडल करें, रूप-राशि का गान.
नथनी कहे अरूप है, कोई न सके बखान..
*
नग-शोभित मुद्रिका दस, दो-दो नगाधिराज.
व्याल-जाल कुंतल हुए, क्या जाने किस व्याज?.
*
दीवाने-दिल चाक कर, हुई हथेली लाल.
कुचल चले अरमान पग, हुआ आलता काल..
*
रूप-रंग, मति-वाक् में, निपुणा राय प्रवीण.
अविरल रस सलिला 'सलिल', कीर्ति न किंचित क्षीण,,
*
रूपमती का रूप-मति, मणि-कांचन संयोग.
भूप दास बनते विहँस, योगी बिसरे योग..
*
रूप अकेला भोग बन, कर विलास हो लाज.
तेज महालय ताज हो, जब संग हो मुमताज़..
*
मीरा सी दीवानगी, जब बनती श्रृंगार.
रूप पूज्य होता तभी, नत हों जग-सरकार..
*
रूप शौर्य का साथ पा, बनता है श्रद्धेय.
करे नमन झुक दृष्टि हर, ज्ञेय बने अज्ञेय..
*
ममता के संग रूप का, जब होता संयोग.
नटवर खेलें गोद में, सहा न जाए वियोग..
*
होता रूप अरूप जब, आत्म बने विश्वात्म.
शब्दाक्षर कर वन्दना, देख सकें परमात्म..
******************

Acharya Sanjiv Salil

http://divyanarmada.blogspot.com

गुरुवार, 23 सितंबर 2010

सामयिक रचना: मंदिर बनाम मस्जिद संजीव 'सलिल'

सामयिक रचना:

मंदिर बनाम मस्जिद

संजीव 'सलिल'
*
*
नव पीढ़ी सच पूछ रही...
*
ईश्वर-अल्लाह एक अगर
मंदिर-मस्जिद झगड़ा क्यों?
सत्य-तथ्य सब बतलाओ
सदियों का यह लफड़ा क्यों?
*
इसने उसको क्यों मारा?
नातों को क्यों धिक्कारा?
बुतशिकनी क्यों पुण्य हुई?
किये अपहरण, ललकारा?
*
नहीं भूमि की तनिक कमी.
फिर क्यों तोड़े धर्मस्थल?
गलती अगर हुई थी तो-
हटा न क्यों हो परिमार्जन?
*
राम-कृष्ण-शिव हुए प्रथम,
हुए बाद में पैगम्बर.
मंदिर अधिक पुराने हैं-
साक्षी है धरती-अम्बर..
*
आक्रान्ता अत्याचारी,
हुए हिन्दुओं पर भारी.
जन-गण का अपमान किया-
यह फसाद की जड़ सारी..
*
ना अतीत के कागज़ हैं,
और न सनदें ही संभव.
पर इतिहास बताता है-
प्रगटे थे कान्हा-राघव..
*
बदला समय न सच बदला.
किया सियासत ने घपला..
हिन्दू-मुस्लिम गए ठगे-
जनता रही सिर्फ अबला..
*
एक लगाता है ताला.
खोले दूजा मतवाला..
एक तोड़ता है ढाँचा-
दूजे का भी मन काला..
*
दोनों सत्ता के प्यासे.
जन-गण को देते झाँसे..
न्यायालय का काम न यह-
फिर भी नाहक हैं फासें..
*
नहीं चाहता कोई दल.
मसला यह हो पाये हल..
पंडित,मुल्ला, नेता ही-
करते हलचल, हो दलदल..
*
जो-जैसा है यदि छोड़ें.
दिशा धर्म की कुछ मोड़ें..
मानव हो पहले इंसान-
टूट गए जो दिल जोड़ें..
*
पंडित फिर जाएँ कश्मीर.
मिटें दिलों पर पड़ी लकीर..
धर्म न मजहब को बदलें-
काफ़िर कहों न कुफ्र, हकीर..
*
हर इंसां हो एक समान.
अलग नहीं हों नियम-विधान..
कहीं बसें हो रोक नहीं-
खुश हों तब अल्लाह-भगवान..

जिया वही जो बढ़ता है.
सच की सीढ़ी चढ़ता है..
जान अतीत समझता है-
राहें-मंजिल गढ़ता है..
*
मिले हाथ से हाथ रहें.
उठे सभी के माथ रहें..
कोई न स्वामी-सेवक हो-
नाथ न कोई अनाथ रहे..
*
सबका मालिक एक वही.
यह सच भूलें कभी नहीं..
बँटवारे हैं सभी गलत-
जिए योग्यता बढ़े यहीं..
*
हम कंकर हैं शंकर हों.
कभी न हम प्रलयंकर हों.
नाकाबिल-निबलों को हम
नाहक ना अभ्यंकर हों..
*
पंजा-कमल ठगें दोनों.
वे मुस्लिम ये हिन्दू को..
राजनीति की खातिर ही-
लाते मस्जिद-मन्दिर को..
*
जनता अब इन्साफ करे.
नेता को ना  माफ़ करे..
पकड़ सिखाये सबक सही-
राजनीति को राख करे..
*
मुल्ला-पंडित लड़वाते.
गलत रास्ता दिखलाते.
चंगुल से छुट्टी पायें-
नाहक हमको भरमाते..
*
सबको मिलकर रहना है.
सुख-दुख संग-संग सहना है..
मजहब यही बताता है-
यही धर्म का कहना है..
*
एक-दूजे का ध्यान रखें.
स्वाद प्रेम का 'सलिल' चखें.
दूह और पानी जैसे-
दुनिया को हम एक दिखें..
*

रपट: तरही मुशायरा: -- योगराज प्रभाकर

रपट:
                                                                                                             
तरही मुशायरा: 

योगराज प्रभाकर
प्रधान सम्पादक
ओपन बुक्स ऑनलाइन डाट कॉम
*
अंतरजाल पर दिव्य नर्मदा की सहयोगी  "ओपन बुक्स ऑनलाइन" के मंच से हमारे अजीज़ दोस्त राणा प्रताप सिंह द्वारा आयोजित तीसरे तरही मुशायरे में इस बार का मिसरा 'बशीर बद्र' साहब की ग़ज़ल से लिया गया था :

"ज़िंदगी में तुम्हारी कमी रह गई"

मुशायरे का आगाज़ मोहतरमा मुमताज़ नाज़ा साहिबा कि खुबसूरत गज़ल के साथ हुआ ! यूं तो मुमताज़ नाज़ा साहिबा की गज़ल का हर शेअर ही काबिल-ए-दाद और काबिल-ए-दीद था, लेकिन इन आशार ने सब का दिल जीत लिया :

//कारवां तो गुबारों में गुम हो गया
एक निगह रास्ते पर जमी रह गई
मिट गई वक़्त के साथ हर दास्ताँ
एक तस्वीर दिल पर बनी रह गई//
---------------------------------------------
//गुम गयी गिल्ली, डंडा भी अब दूर है.
हाय! बच्चों की संगी रमी रह गयी..//

मोहतरमा मुमताज़ नाज़ा के बाद आचार्य संजीव वर्मा सलिल
साहिब की एक बाकमाल गज़ल (बकौल उनके मुक्तिका) ने पाठकों का मन मोह लिया ! गिल्ली डंडा सहित बहुत से विशुद्ध भारतीय बिम्बों से सराबोर शेअर सभी का ध्यानाकर्षण करने में सक्षम रहे ! "रमी" और "ममी" जैसे शब्द गजल में आज टल देखने को नहीं मिले, लेकिन आचार्य सलिल जी ने जिस सुन्दरता से इन शब्दों को शेअरों में पिरोया - वाकई कमाल है! मुशायरे का रंग आचार्य जी पर इस क़दर चढ़ा कि वो एक और बा-कमाल ग़ज़ल (बकौल उनके मुक्तिका) लेकर नमूदार हुए ! पाठकों को एक दफा फिर अपनी मिट्टी कि खुशबू आचार्य जी के आशार से महसूस हुई ! उसका एक नमूना पेश है:

//खेत, खलिहान, पनघट न चौपाल है.
गाँव में शेष अब, मातमी रह गई.. //

जहाँ आपकी ग़ज़ल को देसी शब्दों ने चार चाँद लगाए वहीँ अंग्रेजी भाषा के शब्दों को किस प्रकार प्रवाह और वजन में बंधा जा सकता है, उसकी मिसाल निम्नलिखित से मिल जाएगी :

//रंग पश्चिम का पूरब पे ऐसा चढ़ा.
असलियत छिप गई है, डमी रह गई..//

"डमी" शब्द को जिस सरलता और सुन्दरता से प्रयोग किया गया है, वो निहायत ही प्रशंसनीय है !
------------------------------------------------------
मुशायरे के तीसरे शुरका थे जनाब नवीन चतुर्वेदी, जो एक बेहद दिलकश ग़ज़ल के साथ महफ़िल में हाज़िर हुए ! आपने नाम ही कि तरह ही वो जदीद (नवीन) ख्यालों के लिए जाने जाते हैं ! सादगी, खुशबयानी और प्रयोग - इनकी शायरी का अटूट हिस्सा लगा है हमेशा ही मुझे ! आपकी ग़ज़ल से मेरे तीन सब से मनपसंदीदा शेअर :

//वो भले घर से थी, 'चीज़' ना बन सकी
इसलिए, नौकरी ढूँढती रह गयी
जब 'तजुर्बे' औ 'डिग्री' का दंगल हुआ|
कामयाबी, बगल झाँकती रह गयी
बन्दरी, जो मदारी के 'हत्थे' चढी|
ता-उमर, कूदती-नाचती रह गयी //

इन शेअरों को पढ़कर या सुनकर सिवाए "वाह वाह" के कुछ कहा और जा सकता है क्या ? आप चंद और पुरनूर शेअरों के साथ कई दफा बीच बीच में नमूदार होकर भी महफ़िल को रौशनी बख्शते रहे ! आपके कुछ और बेहतरीन आशार :

//गाँव की 'आरजू' - शहरी 'महबूब' का|
डाकिये से पता पूछती रह गयी||
नौजवानो उठो, कुछ बनो, कुछ गढो|
क्या लुटाने को बस 'जान' ही रह गयी|| //

ये ही नहीं जामा मस्जिद के पास हुई फायरिंग पर भी उनकी कलम ने इसी ज़मीन पर एक अच्छी खासी ग़ज़ल कह डाली, ग़ज़ल में मेरे सब से पसंदीदा आशार:

//फ़र्ज़ अपना पुलिस फिर करेगी अदा
पूछेगी कार काहे खड़ी रह गई||
तंत्र अपना ग़ज़ब का है मुस्तैद, तो|
फिर कहाँ कैसी पेचीदगी रह गई //

मुशायरा अब तक रंग पकड चुका था, बकौल जनाब नवीन चतुर्वेदी :
//हर गजलगो यही सोचता फिर रहा|
बात क्या अनछुई, अनकही रह गयी||//
----------------------------------------------------------
इसके बाद मुशायरे को नवाजने की ज्रहमत-ए-सुखन कुबूल फरमाई जनाब पुरषोत्तम आज़र साहब ने ! फन्ने गज़ल और इल्म-ए-अरूज़ में आपकी पकड़ अनूठी है, जिसका सुबूत उनकी गजल में देखने को मिला ! हालाकि उनको किसी भी एक शेअर का इन्तखाब एक इन्तेहाई मुश्किल काम है, मगर मेरी नाचीज़ राय में मन्दर्जा ज़ैल दो शेअर बकाम हैं :

//इक इशारे से उसके वो हलचल मची
मेरे दिल की यूं धडकन थमी रह गई
//क्यूं खफ़ा किस लिए है बाता दे मुझे
क्या लियाकत में मेरे कमी रह गई !//

जिस तहम्मुल का इज़हार आपने आपने आशार में किया तो आपके एक एक शेअर को भरपूर दाद हासिल हुई
---------------------------------------------------------------------
हमारे नवोदित शायर जनाब पल्लव पंचोली भी अपनी एक छोटी सी गजल के साथ महफ़िल में हाज़िर हुए ! इनका ये शेअर इनके अन्दर कि प्रतिभा का सूचक है:

//लगी आग तो बस्ती जली सारी
दिलों मे बर्फ थी, जमी रह गयी !"

मगर जैसा कि आचार्य संजीव वर्मा "सलिल" जी ने उनके बारे में कहा :

//बात पल्लव ने की है समझदारी की.
बस बहर में कहीं कुछ कमी रह गयी..//
------------------------------------------------------------------
दावत-ए-सुखन कबूल करने वाले अगले शायर थे पंजाबी साहित्य जगत से जुड़े जनाब तरलोक जज साहब ! जो गालिबन हिंदी (हिन्दुस्तानी) गजल में पहली दफा हाथ आज़मा रहे थे ! मगर उनका तजुर्बा और प्रौढ़ साहित्यक उनकी ग़ज़ल से साफ़ साफ़ झलकता हुआ महसूस हुआ ! और वो अपनी ग़ज़ल से महफ़िल को मुअत्तर करने में कामयाब रहे ! और आपकी ग़ज़ल को खूब सराहा गया, खास कर इन आशार को :

//देश की कल्पना खोई आकाश में
एक उम्मींद सी देखती रह गई
जब से सहरा में गुम हो गए हैं सजन
रेत पैरों के नीचे दबी रह गई ! //
-------------------------------------------------------------------

तरलोक जज साहब के बाद अगले शुरका थे जनाब धर्मेन्द्र कुमार सिंह साहब, जो एक बहुत ही संतुलित और गहरी सोच वाली गजल लेकर हाज़िर हुए ! मोहतरम हाजरीन से आपको भी भरपूर दाद हासिल हुई ! इनकी गजल में मेरे मनपसंदीदा शेअर:

//लाल जोड़ा पहन साँझ बिछड़ी जहाँ,
साँस दिन की वहीं पर थमी रह गई।
//रात ने ग़म-ए-दिल तो छुपाया मगर
दूब की शाख़ पर कुछ नमी रह गई।//
------------------------------------------------------------------
//ऐसा मुमकिन नहीं भूल पाओ हमें
हम जो रुखसत हुए आँखें नम रह गयी//

ये शेअर है अगले शायर जनाब दीपक शर्मा "कुल्लूवी" साहब का जो कि मुशायरे क़ी रौनक बढ़ने वाले आगे शायर थे ! आपकी ग़ज़ल ने भी सब को प्रभावित किया !
--------------------------------------------------------------------
निम्नलिखित शेअर मोहतरमा अर्चना सिन्हा जी का है, जो मुशायरे की अगली शायरा थीं :

//थाम कर चाँद को बैठी रही थी रात भी
सुबह को देखा तो बस चांदनी रह गयी //

आपके काव्य प्रयास को भी महफ़िल में सराहा गया, और मोहतरम साथियों के द्वारा इस्लाह भी दी गई !
-------------------------------------------------------------------
जनाब दीपक कुमार जो कि अर्चना जी के बाद अपनी एक गजल के साथ निशिश्त में तशरीफ़ लाए उनकी गज़ल के दो शेअर पेश-ए-खिदमत हैं :

//मन-मुताबिक खिलौने कहाँ मिल सके
सबके हिस्से यहाँ बेबसी रह गई
दाँव अपने कभी काम आये नहीं
होशियारी धरी-की-धरी रह गई //

मुकम्मिल ग़ज़ल के बाद आप दोबारा चंद दिलकश शेअर लेकर हाज़िर हुए जिनको सभी ने दिल से सराहा ! जाती तौर पर मेरा सब से पसंदीदा शेअर::

//उम्र भर नींद आई नहीं ढंग से
आँख लेकिन लगी तो लगी रह गई !//
---------------------------------------------------------------
जनाब सुबोध कुमार "शरद" साहब ने भी दावत-ए-सुखन कबूल फरमा कर महफ़िल में अपनी एक ग़जल कही ! गजल का मकता काफी अच्छा रहा :

//ऐसा लगे देख के आईना ‘‘शरद‘"
जिस्म कहीं और रूह कहीं रह गई !"
-------------------------------------------------------------
अजय कन्याल भी आपने तीन शेअरों के साथ मुशायरे में शरीक हुए ! वरिष्ठ साथियों द्वारा उन्हें कुछ बहुमूल्य सुझाव भी दिए गए उनके आशार के मुताल्लिक !
-----------------------------------------------------------
//घर से बाहर निकलने वो जब से लगी
ढूँढती तब से वो आदमी रह गई //

राणा प्रताप सिंह जिन्होंने इस मुशायरे को मुन्क्किद किया था, अगले शायर थे जो अपने पुरनूर आशार के साथ (थोड़ी ताखीर से ही सही) महफ़िल-ए-गजल में नमूदार हुए ! हालाकि हर एक शेअर "सवा सवा लाख" का रहा उनका, मगर निम्नलिखित शेअर सीने में हाथ डाल कर दिल निकल कर ले जाने वाले और मुशायरा लूटने वाले साबित हुए :

//मौत से पहले ही उनको मौत आ गई
जिनके हिस्से में बस मुफलिसी रह गई
कोई रहबर न ठोकर लगाता मुझे
पहले सी अब कहाँ दिल्लगी रह गई
अब कन्हैया का कुछ भी पता न चले
पार जमुना के राधा खड़ी रह गई
जब से हम सब तरक्की की जानिब हुए
गंगा, मैया से बनकर नदी रह गई
लाख धो डाला चोले को तुमने मगर
पान की पीक जो थी लगी रह गई ! //

गंगा, यमुना, कन्हेया, राधा और पान जैसे भारतीय शब्दों के प्रयोग ने इस ग़ज़ल को एक मुनफ़रिद पहचान बख्शी है, जिसके लिए राणा जी शायर मुबारकबाद के हकदार हैं ! मुकम्मिल गजल के बाद अपने तीन और शेअरों से महफ़िल को नवाज़ा, उन में दो शेअर तो ऐसे मानो २ मिसरों में पूरा अफसाना बयाँ कर दिया हो, आप सब कि पेश-ए-नजर हैं:

//बाप लड़की का पैसे जुटा न सका
सुर्ख जोड़े में दुल्हन सजी रह गई|
लाश कब से पड़ी कोई ना पूछता
सिर्फ खबरों में ही सनसनी रह गई //

मानवीय संवेदनायों कि नब्ज़ टटोलते इन आशार को भी भरपूर दाद हासिल हुई !
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जनाब नवीन चतुर्वेदी जी शायद मुशायरा पूरी तरह से लूटने के मूड में थे, तीन और बाकमाल शेयर लेकर आए, दो का ज़िक्र यहाँ करना लाजमी है :

//गाँव की 'आरजू' - शहरी 'महबूब' का|
डाकिये से पता पूछती रह गयी||
नौजवानो उठो, कुछ बनो, कुछ गढो|
क्या लुटाने को बस 'जान' ही रह गयी //
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.//काजू अखरोट बादाम तस्वीर में ,
थाल में सब्जी एक मौसमी रह गयी //

ये शे'र है जनाब अरुण कुमार पाण्डेय "अभिनव" का जो महफ़िल के अगले शायर थे ! बहुत ही पुरअसर आशार साबित हुए इनकी गजल के !

//लौट कर बेटी आई यकायक जो घर ,
सबकी धड़कन थमी की थमी रह गयी // एक ही शेअर में पूरी कहानी के दी हो जैसे !

//सब मशालें शहर को मुखातिब हुईं ,
गाँव में अब कहाँ रौशनी रह गयी // इंडिया और भारत के बीच की खाई पर बहुत ही सटीक व्यंग !

//जार की मछलियाँ हैं पशोपेश में ,
उनके पीछे नदी में गमी रह गयी. // ये शायर कि बुलंद परवाज़-ए-तखय्युल का सुबूत है !
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जनाब राज "लाली" बटालवी भी अपने एक गजल के साथ शरीक हुए, आपकी कोशिश और विचारों को भी सराहा गया, और बेशकीमती सुझाव भी कई साथियों से उनको मिले !
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ज़हमत-ए-सुखन मंज़ूर फरमाने वाले अगले शुरका थे (indeed a surprise package) श्री सौरभ पाण्डेय जी ! कविता के अन्य स्वरूपों में उनकी महारत से हम सब वाकिफ थे मगर उनकी ग़जल में पकड़ ने भी सब को हैरत में डाल दिया ! आपकी गजल के चंद आशार पेश-ए-खिदमत है :

//झक्क उजालों में गुम लक्ष्मी रह गई ।
मन के अंदर की कालिख जमी रह गई॥
वास्तु के ताब पर घर बनाया गया ।
दर गया, दिल गए, शाखेशमी रह गई ॥
दौरेहालात हैं या तक़ाज़ा कोई -
था धावक कभी, चहल-कदमी रह गई॥//

लक्ष्मी, वास्तु और धावक जैसे शब्द मैंने ग़ज़ल में कभी भी नहीं देखे ! आपकी गजल को भरपूर सराहा गया, ये बताने कि ज़रुरत नहीं ! आपकी गजल को आचार्य "सलिल" जी ने जो खिराज-ए-अकीदत पेश किया वो सब कुछ ब्यान करता है :

//शारदा की कृपा जब भी जिस पर हुई.
उसकी हर पंक्ति में इक ग़ज़ल रह गई॥
पुष्प सौरभ लुटाये न तो क्या करे?
तितलियों की नसल ही असल रह गई॥ //
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हालाकि जनाब नवीन चतुर्वेदी और राणा प्रताप मुशायरा लूट ही चुके थे, मगर एक हिमाकत इस खादिम से भी हो गई ! एक खोटी चवन्नी जैसी ग़ज़ल लेकर अशर्फियों की पोटलियों के दरम्यान जा धमका ! लेकिन जब सब साथियों और अग्रजों ने मेरे कंधे पर हाथ रखा तो जान में जान आई !
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डॉ बृजेश त्रिपाठी जी, जो कि पहले तरही मिसरे को पकड़ नहीं पाए थे, मेरे बाद अपने शेयरों के साथ हम सब को कृतार्थ करने पहुंचे ! बड़े ही सम सामायिक विषय पर उनके चारों शेअर दिल को छू गए !

//इस समय तो अवध है ग्रहण काल में
काल की गति भी देखो थमी रह गयी
कुछ समय तो अब इनकी भी चल जाएगी
आसुरी शायद मन की छिपी रह गयी
कोई खतरा अमन को आये न अब कभी
सारी कोशिश प्रशासन की यही रह गयी
सत्य का वध न कोई,पर कर पायेगा
हशरतें रावणों की धरी रह गयीं .. //

काल, अवध, गति, ग्रहण, असुरी और प्रशासन जैसे शब्दों से सजे इन शेअरों को पढ़कर क्या कोई भाव विभोर हुए बिना रह सकता है ?
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जनाब अरविन्द चौधरी कि ग़ज़ल ने भी खूब समय बंधा जो कि डॉ बृजेश त्रिपाठी के बाद मुशायरे में तशरीफ़ लाए !

//बाँटने को ख़ुशी, हाथ तैयार थे,
बीच दीवार कोई खड़ी रह गई
आँसुओं की झडी, तोहफा प्यार का
पास दरिया मगर तिश्नगी रह गई //

आपने ने जिस तहम्मुल मिजाजी के साथ सुझावों को स्वीकार किया वाह भी काबिल-ए-तारीफ है !
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बकौल जनाब नवीन चतुर्वेदी जी, अपने बगावती अंदाज़ के साथ ओपन बुक्स ऑनलाइन के सर्वे-सर्वा जनाब गणेश जी "बागी" भी अपनी गजल के साथ निस्बतन थोड़ी देर से मुशायरे में अपना कलाम कहने के लिए पधारे ! इस नवोदित शायर के विचार और इनकी सोच भी धरातल से जुड़ी हुई है जोकि बायस-ए-मसर्रत है ! इनके शेअर इस बात क़ी पूरी तर्जुमानी भी करते हैं, बानगी हाज़िर है - मुलाहिजा फरमाएं :

//घर नया ले लिया शहर में बेटे ने,
बाप माँ को वही झोपड़ी रह गई,
जो सभी को खिला बैठी खाने बहू,
उसकी हिस्से की रोटी जली रह गई,
बेटियों के लिये तरसता इक पिता,
लालसा कन्यादान की दबी रह गई, //

मानवीय संवेदना और सामजिक सरोकारों के हमराह चलते इनके आशार क़ी जहाँ एक तरफ प्रशंसा हुई वहीँ दूसरी तरफ उरूज़ के नुक्ता-ए-नजर से इन्हें कुछ बेशकीमती सुझाव भी दिए गए ! बकौल जनाब पुरषोत्तम आज़र साहिब:

//भाव अच्छे लगे दिल से दे दूं दुआ
बस जरा सी बहर में कमी रह गई//
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"मैं कैसे डूब सकता हूँ, वफ़ा के खुश्क दरिया में,
तेरे दरिया-ए-उल्फत में कोई गहराई भी तो हो ! "

यह शेयर है जनाब हिलाल अहमद "हिलाल" साहिब का !
इल्म-ए-उरूज़ और फन-ए-सुखन में हज़रत शौक़ वजीरगंजवी से बाकायदा तरबीयत हासिल करने वाले और इनके के सब से चहेते और लाडले शागिर्द जनाब हिलाल अहमद "हिलाल" भी दावते-कलाम मंज़ूर कर इस तरही मुशायरे की शोभा बढ़ाने पहुंचे! आपकी आमद ने इस मुशायरे को एक मुनफ़रिद पहचान दे दी ! आपकी ग़ज़ल के कुछ ख़ास आशार :

//अक्स क्या उड़ गया तेरा अलफ़ाज़ से
खाली बे रंग की शायरी रह गयी
अपने घर से चला जब मै परदेस को
दूर तक माँ मुझे देखती रह गयी
उसने इक बात भी मेरी चलने न दी
सारी तोहमत मेरे सर मढ़ी रह गयी //
---------------------------------------------------------
जनाब आशीष यादव भी अपनी एक छोटी सी ग़ज़ल के साथ इस मुशायरे में शरीक हुए, और तरही मिसरे के मुताबिक आपने आशार को बाँधने की कोशिश की, आपके दो शेअर ख्यालात के हिसाब से काफी अच्छे रहे :

//क्या क्या न मिला ज़िन्दगी से मुझे,
कहीं आँखों में एक नमी रह गयी|
वज्म-ए-जिंदगानी सजी तो मगर,
ज़िन्दगी में तुम्हारी कमी रह गयी //
----------------------------------------------------

आचार्य संजीव वर्मा "सलिल" जी अपनी दो और ग़ज़लों (बकौल उनके मुक्तिका) लेकर पुन: मंच क़ी शोभा बढ़ाने पधारे, पहले ही की शेअरों की तरह इस बार भी पुरनूर और पुरअसर आशार के साथ ! हर शेअर ख्याल और अदायगी में मुकम्मिल है मगर एक शेअर जिसने आँखें नाम कर दीं, हाज़िर है :

//माँ! अधूरी मेरी बन्दगी रह गई.
ज़िन्दगी में तुम्हारी कमी रह गई..//

दूसरी ग़ज़ल भी बहुत ही अनूठी और विलक्षण सुगंध लिए हुए थी:

//मुक्त से मुक्ति ही क्यों छिपी रह गई?
भक्त की भक्ति ही क्यों बिकी रह गई?
छोड़ तन ने दिया, मन ने धारण किया.
त्यक्त की चाह पर क्यों बसी रह गई?
चाहे लंका में थी, चाहे वन में रही.
याद मन में तेरी क्यों धँसी रह गई?
शेष कौरव नहीं, शेष यादव नहीं..
राधिका फाँस सी क्यों फँसी रह गई?
ज़िंदगी जान पाई न पूरा जिसे
मौत भी क्यों अजानी बनी रह गई?
खोज दाना रही मूस चौके में पर
खोज पाई न क्यों खोजती रह गई?
एक ढाँचा गिरा, एक साँचा गिरा.
बावरी फिर भी क्यों बावरी रह गई?
दुनिया चाहे जिसे सीखना आज भी.
हिंद में गैर क्यों हिन्दवी रह गई?
बंद मुट्ठी पिता, है हकीकत यही
शीश पर कुछ न क्यों छाँव ही रह गई?
जिंदगी में तुम्हारी कमी रह गई
माँ बिना व्यर्थ क्यों बन्दगी रह गई?
बह रहा है 'सलिल' बिन रुके, बिन थके.
बोल इंसान क्यों गन्दगी रह गई? //
--------------------------------------------------------------------
मुशायरे के आख़री शायर थे जनाब नवीन चतुर्वेदी, जो पहले तो लीक से हटकर इस बार तरही मुशायरे की संजीदगी को अपने मजाहिया कलाम से खुशगवार करने के लिए तशरीफ़ लाए और हजब-ए-मामूल फिर से छा गए ! ग़ज़ल इतनी खूबसूरत रही कि आपकी पूरी ग़ज़ल मैं यहाँ एक बार फिर से पेश कर रहा हूँ ताकि आप सब भी लुत्फ़-अन्दोज़ हो सकें !

//मोटू ब्याने को जिस दम चढ़ा घोड़ी पर|
वो बेचारी जमीँ सूंघती रह गयी|

देखा दुल्हन ने, गश खा के वो गिर पड़ी|
सासू माँ बालों को नोंचती रह गयी|

खाने बैठा वो जैसे ही पंडाल में|
केटरर की भी धड़कन थमी रह गयी|

मोटू के साथ आए थे बाराती जो|
उनकी किस्मत में बस दाल ही रह गयी|

मोटू ख़ाता गया और ख़ाता गया|
उस की अम्मा उसे टोकती रह गयी|

खूबसूरत दुल्हन - बेटी मजदूर की|
आँसुओं को फकत पोंछती रह गयी|//

फिर आखिर में जनाब नवीन जी ५ शेअरों का एक और गुलदस्ता लेकर महफ़िल में तशरीफ़ लाये, उन में से २ सब से बेहतरीन शेअर आप सब के सामने प्रस्तुत है :

//बाद गाँधीजी के, यार - इस मुल्क में|
पुस्तकों में ही 'गाँधीगिरी' रह गयी|

मेरे ''दिल की तसल्ली' कहाँ गुम हो तुम|
जिंदगी में तुम्हारी कमी रह गयी ! //
----------------------------------------------------------

मुशायरा हर लिहाज़ से कामयाब रहा, बहुत से नए चेहरे इस बार हम से जुड़े ! कई नवोदित शायरों की शिरकत ने भी मुशायरे को एक रंगत बक्शी, बड़ा अच्छा लगा ये देखकर कि प्राय: सभी लोगों ने सुझावों को खिले माथे से स्वीकार किया !

सर्वश्री आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' जी, सौरभ पाण्डेय और डॉ बृजेश त्रिपाठी जैसे सीनीअर्ज़ ने भी बढ़ चढ़ कर इसमें हिस्सा लिया, जो ज्यादा ख़ुशी कि बात है ! हिंदी साहित्य से जुड़ी इन विभूतियों को गजल हर कलम अजमाई करते देखना वाकई में बड़ा अद्भुत रहा !

उस से भी ज्यादा प्रसन्नता की बात यह है कि लगभग सभी शायरों ने धरातल से जुडी बात की ! जहाँ राम, सीता, राधा, हनुमान, गंगा, यमुना, लक्ष्मी, चूल्हा, रसोई, पालथी, खेत, खलिहान, पनघट, चौपाल, काल, अवध, गति, ग्रहण, असुरी और प्रशासन, कन्यादान, शारदा, गिल्ली डंडा इत्यादि हिंदी के शब्दों को बाकमाल ढंग से पिरोया गया है, तो वहीँ दूसरी ओर टेबल, डिग्री, रमी, ममी, फायरिंग और केटरर जैसे कई अंग्रेजी के शब्द भी कुछ इस तरह से बांधे गए कि अपनेपन का अहसास देते नज़र आते हैं !

हर प्रयोजन में कमी बेशी का रह जाना एक आम सी बात है ! कुछ बहुत से अच्छे आशार जहाँ उचित ध्यानाकर्षण से महरूम रहे वहीँ बहुत सी जगह बहर-वजन, बर्तनी, व्याकरण और तथ्यात्मक त्रुटियाँ Unnoticed रह गईं ! मेरी तुच्छ राय में ऐसी महफ़िलों में अगर किसी भी प्रकार से पूर्वाग्रह से मुक्त होकर सम्मिलित हुआ जाए तो ज्यादा बेहतर होगा !

यह बात सही है कि कई बार जोश या ख़ुशी में महफ़िल के आदाब को नज़रंदाज़ कर दिया जाता है, मगर बेहतर हो कि उनको याद रखा जाए और उनका पालन भी किया जाए ! दाद देते वक़्त :
"क्या ग़ज़ल निकाली है", "क्या शेअर निकाला है", "ग़ज़ल या शेअर मस्त हें !" इत्यादि जुमलों का प्रयोग ना करके साहित्यक भाषा का उपयोग किया जाए तो बहुत बेहतर होगा !

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बुधवार, 22 सितंबर 2010

लेख : हिंदी की प्रासंगिकता और हम. संजीव वर्मा 'सलिल'

लेख :

हिंदी की प्रासंगिकता और हम.

संजीव वर्मा 'सलिल'

हिंदी जनवाणी तो हमेशा से है...समय इसे जगवाणी बनाता जा रहा है. जैसे-जिसे भारतीय विश्व में फ़ैल रहे हैं वे अधकचरी ही सही हिन्दी भी ले जा रहे हैं. हिंदी में संस्कृत, फ़ारसी, अरबी, उर्दू , अन्य देशज भाषाओँ या अंगरेजी शब्दों के सम्मिश्रण से घबराने के स्थान पर उन्हें आत्मसात करना होगा ताकि हिंदी हर भाव और अर्थ को अभिव्यक्त कर सके. 'हॉस्पिटल' को 'अस्पताल' बनाकर आत्मसात करने से भाषा असमृद्ध होती है किन्तु 'फ्रीडम' को 'फ्रीडमता' बनाने से नहीं. दैनिक जीवन में व्याकरण सम्मत भाषा हमेशा प्रयोग में नहीं लाई जा सकती पर वह समीक्षा, शोध या गंभीर अभिव्यक्ति हेतु अनुपयुक्त होती है. हमें भाषा के प्राथमिक, माध्यमिक, उच्च तथा शोधपरक रूपों में भेद को समझना तथा स्वीकारना होगा. तत्सम तथा तद्भव शब्द हिंदी की जान हैं किन्तु इनका अनुपात तो प्रयोग करनेवाले की समझ पर ही निर्भर है. हिन्दी में अहिन्दी शब्दों का मिश्रण दल में नमक की तरह हो किन्तु खीर में कंकर की तरह नहीं.

हिंदी में शब्दों की कमी को दूर करने की ओर भी लगातार काम करना होगा. इस सिलसिले में सबसे अधिक प्रभावी भूमिका चिट्ठाकार निभा सकते हैं. वे विविध प्रदेशों, क्षेत्रों, व्यवसायों, रुचियों, शिक्षा, विषयों, विचारधाराओं, धर्मों तथा सर्जनात्मक प्रतिभा से संपन्न ऐसे व्यक्ति हैं जो प्रायः बिना किसी राग-द्वेष या स्वार्थ के सामाजिक साहचर्य के प्रति असमर्पित हैं. उनमें से हर एक का शब्द भण्डार अलग-अलग है. उनमें से हर एक को अलग-अलग शब्द भंडार की आवश्यकता है. कभी शब्द मिलते हैं कभी नहीं. यदि वे न मिलनेवाले शब्द को अन्य चिट्ठाकारों से पूछें तो अन्य अंचलों या बोलियों के शब्द भंडार में से अनेक शब्द मिल सकेंगे. जो न मिलें उनके लिये शब्द गढ़ने का काम भी चिट्ठा कर सकता है. इससे हिंदी का सतत विकास होगा.

सिविल इन्जीनियरिंग को हिंदी में नागरिकी अभियंत्रण या स्थापत्य यांत्रिकी क्या कहना चाहेंगे? इसके लिये अन्य उपयुक्त शब्द क्या हो? 'सिविल' की हिंदी में न तो स्वीकार्यता है न सार्थकता...फिर क्या करें? सॉइल, सिल्ट, सैंड, के लिये मिट्टी/मृदा, धूल तथा रेत का प्रयोग मैं करता हूँ पर उसे लोग ग्रहण नहीं कर पाते. सामान्यतः धूल-मिट्टी को एक मान लिया जाता है. रोक , स्टोन, बोल्डर, पैबल्स, एग्रीगेट को हिंदी में क्या कहें? मैं इन्हें चट्टान, पत्थर, बोल्डर, रोड़ा, तथा गिट्टी लिखता हूँ . बोल्डर के लिये कोई शब्द नहीं है?

रेत के परीक्षण में 'मटेरिअल रिटेंड ऑन सीव' तथा 'मटेरिअल पास्ड फ्रॉम सीव' को हिंदी में क्या कहें? मुझे एक शब्द याद आया 'छानन' यह किसी शब्द कोष में नहीं मिला. छानन का अर्थ किसी ने छन्नी से निकला पदार्थ बताया, किसी ने छन्नी पर रुका पदार्थ तथा कुछ ने इसे छानने पर मिला उपयोगी या निरुपयोगी पदार्थ कहा. काम करते समय आपके हाथ में न तो शब्द कोष होता है, न समय. कार्य विभागों में प्राक्कलन बनाने, माप लिखने तथा मूल्यांकन करने का काम अंगरेजी में ही किया जाता है जबकि अधिकतर अभियंता, ठेकेदार और सभी मजदूर अंगरेजी से अपरिचित हैं. सामान्यतः लोग गलत-सलत अंगरेजी लिखकर काम चला रहे हैं. लोक निर्माण विभाग की दर अनुसूची आज भी सिर्फ अंगरेजी मैं है. निविदा हिन्दी में है किन्तु उस हिन्दी को कोई नहीं समझ पाता, अंगरेजी अंश पढ़कर ही काम करना होता है. किताबी या संस्कृतनिष्ठ अनुवाद अधिक घातक है जो अर्थ का अनर्थ कर देता है. न्यायलय में मानक भी अंगरेजी पाठ को ही माना जाता है. हर विषय और विधा में यह उलझन है. मैं मानता हूँ कि इसका सामना करना ही एकमात्र रास्ता है किन्तु चिट्ठाजगत हा एक मंच ऐसा है जहाँ ऐसे प्रश्न उठाकर समाधान पाया जा सके तो...? सोचें...

भाषा और साहित्य से सरकार जितना दूर हो बेहतर... जनतंत्र में जन, लोकतंत्र में लोक, प्रजातंत्र में प्रजा हर विषय में सरकार का रोना क्यों रोती है? सरकार का हाथ होगा तो चंद अंगरेजीदां अफसर पाँच सितारेवाले होटलों के वातानुकूलित कमरों में बैठकर ऐसे हवाई शब्द गढ़ेगे जिन्हें जनगण जान या समझ ही नहीं सकेगा. राजनीति विज्ञान में 'लेसीज फेयर' का सिद्धांत है जिसका आशय यह है कि वह सरकार सबसे अधिक अच्छी है जो सबसे कम शासन करती है. भाषा और साहित्य के सन्दर्भ में यही होना चाहिए. लोकशक्ति बिना किसी भय और स्वार्थ के भाषा का विकास देश-काल-परिस्थिति के अनुरूप करती है. कबीर, तुलसी सरकार नहीं जन से जुड़े और जन में मान्य थे. भाषा का जितना विस्तार इन दिनों ने किया अन्यों ने नहीं. शब्दों को वापरना, गढ़ना, अप्रचलित अर्थ में प्रयोग करना और एक ही शब्द को अलग-अलग प्रसंगों में अलग-अलग अर्थ देने में इनका सानी नहीं.

चिट्ठा जगत ही हिंदी को विश्व भाषा बना सकता है? अगले पाँच सालों के अन्दर विश्व की किसी भी अन्य भाषा की तुलना में हिंदी के चिट्ठे अधिक होंगे. क्या उनकी सामग्री भी अन्य भाषाओँ के चिट्ठों की सामग्री से अधिक प्रासंगिक, उपयोगी व् प्रामाणिक होगी? इस प्रश्न का उत्तर यदि 'हाँ' है तो सरकारी मदद या अड़चन से अप्रभावित हिन्दी सर्व स्वीकार्य होगी, इस प्रश्न का उत्तर यदि 'नहीं" है तो हिंदी को 'हाँ' के लिये जूझना होगा...अन्य विकल्प नहीं है. शायद कम ही लोग यह जानते हैं कि विश्व के अंतरिक्ष वैज्ञानिकों ने हमारे सौर मंडल और आकाशगंगा के परे संभावित सभ्यताओं से संपर्क के लिये विश्व की सभी भाषाओँ का ध्वनि और लिपि को लेकर वैज्ञानिक परीक्षण कर संस्कृत तथा हिन्दी को सर्वाधिक उपयुक्त पाया है तथा इन दोनों और कुछ अन्य भाषाओँ में अंतरिक्ष में संकेत प्रसारित किए जा रहे हैं ताकि अन्य सभ्यताएँ धरती से संपर्क कर सकें. अमरीकी राष्ट्रपति अमरीकनों को बार-बार हिन्दी सीखने के लिये चेता रहे हैं किन्तु कभी अंग्रेजों के गुलाम भारतीयों में अभी भी अपने आकाओं की भाषा सीखकर शेष देशवासियों पर प्रभुत्व ज़माने की भावना है. यही हिन्दी के लिये हानिप्रद है.

भारत विश्व का सबसे बड़ा बाज़ार है तो भारतीयों की भाषा सीखना विदेशियों की विवशता है. विदेशों में लगातार हिन्दी शिक्षण और शोध का कार्य बढ़ रहा है. हर वर्ष कई विद्यालयों और कुछ विश्व विद्यालयों में हिंदी विभाग खुल रहे हैं. हिन्दी निरंतर विकसित हो रहे है जबकि उर्दू समेत अन्य अनेक भाषाएँ और बोलियाँ मरने की कगार पर हैं. इस सत्य को पचा न पानेवाले अपनी मातृभाषा हिन्दी के स्थान पर राजस्थानी, मारवाड़ी, मेवाड़ी, अवधी, ब्रज, भोजपुरी, छत्तीसगढ़ी, मालवी, निमाड़ी, बुन्देली या बघेली लिखाकर अपनी बोली को राष्ट्र भाषा या विश्व भाषा तो नहीं बना सकते पर हिंदी भाषियों की संख्या कुछ कम जरूर दर्ज करा सकते हैं. इससे भी हिन्दी का कुछ बनना-बिगड़ना नहीं है. आगत की आहट को पहचाननेवाला सहज ही समझ सकता है कि हिंदी ही भावी विश्व भाषा है. आज की आवश्यकता हिंदी को इस भूमिका के लिये तैयार करने के लिये शब्द-निर्माण, शब्द-ग्रहण, शब्द-अर्थ का निर्धारण, अनुवाद कार्य तथा मौलिक सृजन करते रहना है जिसे विश्व विद्यालयों की तुलना में अधिक प्रभावी तरीके से चिट्ठाकर कर रहे हैं.

नए रचनाकारों के लिये आवश्यक है कि भाषा के व्याकरण और विधा की सीमाओं तथा परम्पराओं को ठीक से समझते हुए लिखें. नया प्रयोग अब तक लिखे को जानने के बाद ही हो सकता है. काव्य के क्षेत्र में हाथ आजमानेवालों को 'पिंगल' (काव्य-शास्त्र) में वर्णित नियम जानने ही चाहिए. इसमें किसी कठिन और उच्च कक्षा की पुस्तक की जरूरत नहीं है. १० वीं कक्षा तक की हिन्दी की किताबों में जो जानकारी है वह लेखन प्रारंभ करने के लिये पर्याप्त है. लिंग, वाचन, क्रिया, कारक, शब्द-भेद, उच्चारण के अनुसार हिज्जे कर शब्द को शुद्ध रूप में लिखना आ जाए तो गद्य-पद्य दोनों लिखा जा सकता है. बोलते समय हम प्रायः असावधान होते हैं. शब्दों के देशज (ग्रामीण या भदेसी) रूप बोलने में भले ही प्रचलित हैं पर साहित्य में दोष कहे गए हैं. कविता लिखते समय पिंगल (काव्य-शास्त्र) के नियमों और मान्यताओं का पालन आवश्यक है. कोई बदलाव या परिवर्तन विशेषज्ञता के बाद ही सुझाई जाना चाहिए.

विश्व वाणी हिन्दी के उन्नयन और उत्थान में हमारी भूमिका शून्य हो तो भी हिन्दी की प्रगति नहीं रुकेगी किन्तु यदि हम प्रभावी भूमिका निभाएँ तो यह जीवन की बड़ी उपलब्धि होगी. आइए, हम सब इस दिशा में चिंतन कर अपने-अपने विचारों को बाँटें.

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दिव्यनर्मदा.ब्लागस्पाट.कॉम/ सलिल.संजीव@जीमेल.कॉम

मुक्तिका: क्यों?..... संजीव 'सलिल'

मुक्तिका:
                                                         
क्यों?.....

संजीव 'सलिल'
*
मुक्त से मुक्ति ही क्यों छिपी रह गई?
भक्त की भक्ति ही क्यों बिकी रह गई?

छोड़ तन ने दिया, मन ने धारण किया.
त्यक्त की चाह पर क्यों बसी रह गई?

चाहे लंका में थी, चाहे वन में रही.
याद मन में तेरी क्यों धँसी रह गई?

शेष कौरव नहीं, शेष यादव नहीं..
राधिका फाँस सी क्यों फँसी रह गई?

ज़िंदगी जान पाई न पूरा जिसे
मौत भी क्यों अजानी बनी रह गई?

खोज दाना रही मूस चौके में पर
खोज पाई न क्यों खोजती रह गई?

एक ढाँचा गिरा, एक साँचा गिरा.
बावरी फिर भी क्यों बावरी रह गई?

दुनिया चाहे जिसे सीखना आज भी.
हिंद में गैर क्यों हिन्दवी रह गई?

बंद मुट्ठी पिता, है हकीकत यही
शीश पर कुछ न क्यों छाँव ही रह गई?

जिंदगी में तुम्हारी कमी रह गई
माँ बिना व्यर्थ क्यों बन्दगी रह गई?

बह रहा है 'सलिल' बिन रुके, बिन थके.
बोल इंसान क्यों गन्दगी रह गई?

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दोहा-नवगीत : बरसो राम धड़ाके से -संजीव 'सलिल'

दोहा-नवगीत :
बरसो राम धड़ाके से


संजीव 'सलिल'
*
बरसो राम धड़ाके से !
मरे न दुनिया फाके से !

*
लोकतंत्र की जमीं पर, 
लोभतंत्र के पैर
अंगद जैसे जम गए 
अब कैसे हो खैर?

अपनेपन की आड़ ले, 
भुना रहे हैं बैर
देश पड़ोसी मगर बन- 
कहें मछरिया तैर

मारो इन्हें कड़ाके से, 
बरसो राम धड़ाके से !
मरे न दुनिया फाके से !
*
कर विनाश मिल, कह रहे, 
बेहद हुआ विकास
तम की कर आराधना- 
उल्लू कहें उजास

भाँग कुएँ में घोलकर, 
बुझा रहे हैं प्यास
दाल दल रहे आम की- 
छाती पर कुछ खास

पिंड छुड़ाओ डाके से, 
बरसो राम धड़ाके से !
मरे न दुनिया फाके से !
*
मगरमच्छ अफसर मुए, 
व्यापारी घड़ियाल
नेता गर्दभ रेंकते- 
ओढ़ शेर की खाल

देखो लंगड़े नाचते, 
लूले देते ताल
बहरे शीश हिला रहे- 
गूँगे करें सवाल

चोरी होती नाके से, 
बरसो राम धड़ाके से !
मरे न दुनिया फाके से !

****************

मंगलवार, 21 सितंबर 2010

नवगीत: मेघ बजे.... संजीव 'सलिल'

नवगीत:

मेघ बजे....

संजीव 'सलिल'
*
मेघ बजे, मेघ बजे,
मेघ बजे रे!
धरती की आँखों में,
स्वप्न सजे रे...
*
सोई थी सलिला.
अंगड़ाई ले जगी.
दादुर की टेर सुनी-
प्रीत में पगी..

मन-मयूर नाचता,
न वर्जना सुने.
मुरझाये पत्तों को,
मिली ज़िंदगी..

झूम-झूम झर झरने,
करें मजे रे.
धरती की आँखों में,
स्वप्न सजे रे...
*
कागज़ की नौका,
पतवार बिन बही.
पनघट-खलिहानों की-
कथा अनकही..

नुक्कड़, अमराई,
खेत, चौपालें तर.
बरखा से विरह-अगन,
तपन मिट रही..

सजनी पथ हेर-हेर,
धीर तजे रे!
धरती की आँखों में,
स्वप्न सजे रे...
*
मेंहदी उपवास रखे,
तीजा का मौन.
सातें-संतान व्रत,
बिसरे माँ कौन?

छत्ता-बरसाती से,
मिल रहा गले.
सीतता रसोई में,
शक्कर संग नौन.

खों-खों कर बऊ-दद्दा,
राम भजे रे!
धरती की आँखों में,
स्वप्न सजे रे...
*****************

मुक्तिका: आँखें गड़ाये... संजीव 'सलिल'

मुक्तिका:

आँखें गड़ाये...

संजीव 'सलिल'
*
आँखें गड़ाये ताकता हूँ आसमान को.
भगवान का आशीष लगे अब झरा-झरा..

आँखें तरस गयीं है, लबालब नदी दिखे.
जंगल कहीं तो हो सघन कोई हरा-हरा..

इन्सान तो बहुत हैं शहर-गाँव सब जगह.
लेकिन न एक भी मिला अब तक खरा-खरा..

नेताओं को सौंपा था देश करेंगे सरसब्ज़.
दिखता है खेत वतन का सूखा, चरा-चरा..

फूँक-फूँक पी रहे हम आज छाछ को-
नादां नहीं जल चुके दूध से जरा-जरा..

मंदिर हो. काश्मीर हो, या चीन का मसला.
कर बंद आँख कह रहे संकट टरा-टरा..

जो हिंद औ' हिन्दी के नहीं काम आ रहा.
जिंदा भले लगे, मगर है वह मरा-मरा..

देखा है जबसे भूख से रोता हुआ बच्चा.
भगवान का भी दिल है दर्द से भरा-भरा..

माता-पिता गए तो सिर से छाँव ही गई.
बेबस है 'सलिल' आज सभी से डरा-डरा..

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त्रिपदिक रचना: प्रात की बात संजीव 'सलिल

त्रिपदिक रचना:

प्रात की बात

संजीव 'सलिल'
*
सूर्य रश्मियाँ
अलस सवेरे आ
नर्तित हुईं.
*
शयन कक्ष
आलोकित कर वे
कहतीं- 'जागो'.
*
कुसुम कली
लाई है परिमल
तुम क्यों सोये?
*
हूँ अवाक मैं
सृष्टि नई लगती
अब मुझको.
*
ताक-झाँक से
कुछ आह्ट हुई,
चाय आ गयी.
*
चुस्की लेकर
ख़बर चटपटी
पढ़ूँ, कहाँ-क्या?
*
अघट घटा
या अनहोनी हुई?
बासी खबरें.
*
दुर्घटनाएँ,
रिश्वत, हत्या, चोरी,
पढ़ ऊबा हूँ.
*
चहक रही
गौरैया, समझूँ क्या
कहती वह?
*
चें-चें करती
नन्हीं चोचें दिखीं
ज़िन्दगी हँसी.
*
घुसा हवा का
ताज़ा झोंका, मुस्काया
मैं बाकी आशा.
*
मिटा न सब
कुछ अब भी बहकी
उठूँ-सहेजूँ.
************

मुक्तिका रह गयी संजीव 'सलिल'

मुक्तिका
 रह गयी

संजीव 'सलिल'
*
शारदा की कृपा जब भी जिस पर हुई.
उसकी हर पंक्ति में इक ग़ज़ल रह गई॥
*
पुष्प सौरभ लुटाये न तो क्या करे?
तितलियों की नसल ही असल रह गई॥
*
जान की खैर माँगे नहीं जानकी.
मौन- कह बात सब जानकी रह गयी..
*
वध अवध में खुले-आम सत का हुआ.
अनसुनी बात सम्मान की रह गई..
*
ध्वस्त दरबार पल में समय ने किया.
पर गढ़ी शेष हनुमान की रह गई..
*
अर्चना वंचना में उलझती है क्यों?
प्रार्थना-वन्दना में कमी रह गयी?.
*
डोर रिश्तों की पकड़ी है आशीष भी.
पर दुआओं में थोड़ी कमी रह गई..
*

सोमवार, 20 सितंबर 2010

एक और मुक्तिका: माँ! अधूरी मेरी बन्दगी रह गई संजीव 'सलिल'

एक और मुक्तिका:
                                                                                        माँ! अधूरी मेरी बन्दगी रह गई

संजीव 'सलिल'
*
ज़िंदगी में तुम्हारी कमी रह गई.
अब न पहले सी यह ज़िंदगी रह गई..

मन ने रोका बहुत, तन ने टोका बहुत.
आस खो, आँख में पुरनमी रह गई..

दिल की धड़कन बढ़ी, दिल की धड़कन थमी.
दिल पे बिजली गिरी कि गिरी रह गई..

साँस जो थम गई तो थमी रह गई.
आँख जो मुंद गई तो मुंदी रह गई..

मौन वाणी हुई, मौन ही रह गई.
फिर कहर में कसर कौन सी रह गई?.

दीप पल में बुझे, शीश पल में झुके.
ज़िन्दगी बिन कहे अनकही कह गई..

माँ! अधूरी मेरी बन्दगी रह गई.
ज़िन्दगी में तुम्हारी कमी रह गई..

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मुक्तिका: आँख नभ पर जमी संजीव 'सलिल

मुक्तिका:
आँख नभ पर जमी

संजीव 'सलिल'
*
आँख नभ पर जमी तो जमी रह गई.
साँस भू की थमी तो थमी रह गई.
*
सुब्ह सूरज उगा, दोपहर में तपा.
साँझ ढलकर, निशा में नमी रह गई..
*
खेत, खलिहान, पनघट न चौपाल है.
गाँव में शेष अब, मातमी रह गई..
*
रंग पश्चिम का पूरब पे ऐसा चढ़ा.
असलियत छिप गई है, डमी रह गई..
*
जो कमाया गुमा, जो गँवाया मिला.
ज़िन्दगी में तुम्हारी, कमी रह गई..
*****************
अनुवाद सलिला: १  

अंग्रेजी ग़ज़ल:

प्रो. अनिल जैन
*
This is still a fact.
What I am in fact..

It is the part of it.
What is lost in fact..

Don't pay heed on that
Already got in fact..

I was dreaming that
Already got in fact..

Moving away from there
Life is where in fact..

I could give you that
What I had in fact..

Only moment that lived
That is a fact in fact..

What they never can do
That they promised in fact..

Only gave that up
Never had in fact..

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हिन्दी भावानुवाद : संजीव 'सलिल'

यह तो है अब तक एक सच.
मैं जो हूँ वह भी है सच..

इसका ही तो हिस्सा है
जिसे गँवाया वह- यह सच..

उस पर किंचित ध्यान न दो.
जिसे पा चुके सचमुच सच..

देख रहा उसका सपना
हाथ लग चुका है जो सच..

जाता दूर वहाँ से हूँ.
जीवन जहाँ हुआ है सच..

दे पाया तुमको उतना
जितना मैंने पाया- सच..

वह पल जिसे जिया मैंने
केवल वह ही सच्चा सच..

कभी न जो वे कर सकते.
उसका वादा करते- सच..

आखिर में सब छोड़ गया
जो न कभी था उसका- सच..


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रविवार, 19 सितंबर 2010

विशेष विचार प्रधान शोधपरक लेख: समय और परिस्थितियों के शिकार कायस्थ जन संजीव वर्मा 'सलिल'

 समय और परिस्थितियों के शिकार कायस्थ जन

संजीव वर्मा 'सलिल'
*
समस्त सृष्टि के निर्माता परात्पर परमब्रम्ह निर्विकार-निराकार हैं. आकार न होने से उनका चित्र गुप्त है. जिस अनहद नाद में योगी लीन रहते हैं, वह ॐ ही सकल सृष्टि का जन्दाताजन्मदाता, पालक, तारक है. निराकार चित्र गुप्त जब आकार धारण करते हैं तो सृष्टि ब्रम्हांड के जन्मदाता ब्रम्हा, पालक विष्णु व तारक शिव के रूप में प्रथम ३ कायस्थ अवतार लेते हैं. 'कायास्थितः सः कायस्थः'' अर्थात वह निराकार परमशक्ति जब आकार (काया) धारण करती है तो काया में स्थित होने के कारण कायस्थ होता है.

'ब्रम्हम जानाति सः ब्राम्हणः' जो ब्रम्ह को जानते हैं वे ब्राम्हण हैं अर्थात जिनका काम सृष्टि उत्पत्ति के गूढ़ रहस्य जैसे जटिल विषयों को जानना और ज्ञान देना है वे ब्राम्हण हैं. इसी तरह जो रक्षा करते हैं वे क्षत्रिय, जो व्यापार करते हैं वे वैश्य तथा जो सेवा कर्म करते हैं वे शूद्र हैं. कायस्थ वे हैं जो ये सभी कर्म समान भाव से करते हैं.

जात कर्म तथा जातक कथाओं में 'जात' शब्द का अर्थ जन्म लेना है. व्यक्ति जिस क्षेत्र का ज्ञान प्राप्त कर उसे व्यवसाय रूप में अपनाता है, उस क्षेत्र में उसका जन्म लेना माना जाता है. कहावत है 'कायथ घर भोजन करे, बचहु न एकौ जात' अर्थात कायस्थ के घर भोजन करने से अन्य किसी जात के घर भोजन करना शेष नहीं रहता, कायस्थ के घर खाया तो हर जात में खा लिया अर्थात कायस्थ की गणना हर वर्ण में है, वह किसी एक वर्ण का नहीं है. जो चारों वर्णों के कार्य समान दक्षता से करने में समर्थ होते हैं वे किसी अन्य की तुलना में अधिक योग्य होने से ''कायस्थ'' कहे गए.

सृष्टि का कण-कण कायायुक्त है. अतः, सभी चर-अचर, दृष्ट-अदृष्ट कायस्थ, जीव-अजीव हैं.

आरम्भ में कायस्थों ने अपने आराध्य श्री चित्रगुप्त का न तो कोई चित्र या मूर्ति बनाई, न मंदिर या मठ, न व्रत-त्यौहार, न कथा-उपवास. वे जानते थे कि हर दैवी शक्ति श्री चित्रगुप्त का अंश है, किसी भी रूप में पूजें पूजा चित्रगुप्त की ही होती है. कायस्थों में विवाहादि प्रसंगों में इसी कारण जन्मना जाति प्रथा मान्य कट्टरता से नहीं रही. कालांतर में कायस्थों के आराध्य निराकार चित्रगुप्त के साकार रूप की कल्पना सत्यनारायण के रूप में हुई जिसे चुटकी भर आटे के साथ कोई गरीब से गरीब व्यक्ति भी पूज सकता था, जो राजा को भी दण्डित कर सकते थे.

कायस्थों में अनेक श्रेष्ठ पंडित, वैद्य, ज्योतिष, संत, योद्धा, व्यापारी, शासक, प्रशासक आदि होने का कारण यही है कि वे चारों वर्णों को अपनाते थे. किसी पिता के ४ पुत्र अपनी रूचि या योग्यता के आधार पर चारों वर्णों में व्यवसाय कर सकते थे. चारों वर्णों में रोती-बेटी के सम्बन्ध स्थापित होना प्रतिबंधित न था. कालांतर में महर्षि व्यास द्वारा श्रुति-स्मृति पर आधारित व्यवस्था को ज्ञान का संहिताकरण कर व्यासपीठ के संचालकों के माध्यम से संचालित करने पर गुरु गद्दी पर जन्मना औरस पुत्र या कर्मणा श्रेष्ठ मानस पुत्र के आसीन होने के प्रश्न खड़े हुए. कायस्थ कर्म को देवता मानते थे तथा निरपेक्ष कर्मवाद के समर्थक थे. उन्होंने मानस पुत्रों (श्रेष्ठ शिष्य) को योग्य पाया जबकि ब्राम्हणों ने जन्मना औरस पुत्र को. यही स्थिति राज गद्दी के सम्बन्ध में भी हुई.

कायस्थ कर्म विधान को मानते थे अर्थात जीव का जन्म पूर्व जन्म के शेष कर्मों का फल भोगने के लिये हुआ है. केवल सत्कर्मों से ही जीव मुक्त हो सकता है. किसी देव की पूजा, उपवास, कर्म काण्ड, कथा श्रावण, भोग-प्रसाद, गण्डा-ताबीज, मन्त्र-तंत्र, नाग-रत्न आदि से कर्म-फल से मुक्ति नहीं पाई जा सकती. ब्राम्हणों ने परिश्रम और योग्यता के स्थान पर कर्मकांड और जन्माधारित विरासत का पक्ष लिया. गरीब, पीड़ित, अभावग्रस्त आम लोगों के मन में धर्म और ईश्वर संबंधी भय अनेक कपोल कल्पित कथाएँ सुनाकर पैदा के दिया तथा निदान स्वरूप कर्म काण्ड, व्रत, उपवास, दान आदि बताये जिनमें स्वयं (ब्राम्हणों) को ही दान का प्रावधान था.

राज गद्दी पर योग्यता के आधार पर सभी लोगों में से योग्यतम को चुनने के स्थान पर राजा के प्रिय या ज्येष्ठ पुत्र को चुनने की परंपरा प्रारंभ कर ब्राम्हण राज परिवार के प्रिय हुए. यहाँ तक कि स्वयं को ईश्वर का प्रतिनिधि भी ब्राम्हणों ने खुद को घोषित कर दिया. संतानहीन राजाओं की रानियों को नियोग के माध्यम से ब्राम्हण पुत्र भी देने लेगे. राजा का विवाह होने पर रानी को पहले ब्राम्हण के साथ जाना होता था तथा राजा ब्राम्हण को शुल्क देकर रानी को प्राप्त करता था.

कायस्थ सता से जुड़े रहने से भोग-विलास के आदी, षड्यंत्रों के शिकार तथा निरपेक्ष सत्य कहने के कारण सत्ताधारियों के अप्रिय हुए. स्वामिभक्त होने के कारण वे मारे भी गए. ब्राम्हणों ने राजा को ईश्वर का प्रतिनिधि माना. जब जो राजा आया ब्राम्हण उसे ही मान्यता देते रहे, जबकि कायस्थ अपनी निष्ठा बदल नहीं सके. कर्मकांड की बढ़ती प्रतिष्ठा के कारण ब्राम्हण समाज में पूज्य हो गए जबकि कायस्थ किसी एक वर्ण या जाति से न जुड़ने के कारण उपेक्षित हो गए. प्रतिभा के धनी तथा बलिदानी होने पर भी कायस्थ सत्तासीन नहीं हो सके. 

आधुनिक काल में श्री जवाहरलाल नेहरु, डॉ, राजेन्द्र प्रसाद तथा नेताजी सुभाषचन्द्र बोस को देखें. प्रथम की तुलना में शेष दोनों की प्रतिभा, योग्यता, समर्पण, बलिदान बहुत अधिक होने पर भी उनका प्राप्य अत्यल्प रहा. डॉ. राजेन्द्र प्रसाद नेहरु के कड़े विरोध के बाद राष्ट्रपति बने किन्तु पश्चातवर्ती राजनीति में उनके किसी स्वजन-परिजन को कोई स्थान न मिला जबकि नेहरु का वंश न होने पर भी वे और उनके स्वजन कोंग्रेस और सत्ता पर आसीन रहे. नेताजी के हिस्से में केवल संघर्ष, त्याग, बलिदान ही आया.

अन्यत्र भी कायस्थों की नियति ऐसी ही रही. कायस्थ व्यक्तिगत मूल्यपरक जीवनमूल्यों को जीता है जबके अन्य वर्ण समूह्परक हितों को साधते हैं. लोकतंत्र में समूह-नायक धोबी के आक्षेप पर राम भी सीता को त्यागने पर विवश हो गए थे. कायस्थ में समूह निर्माण का संस्कार ही नहीं है तो समूहगत चेतना या समूह के हितों का संरक्षण का प्रश्न ही नहीं उठता. इसीलिये वह संगठित नहीं हो पाता, न संगठित हो सकेगा. सभी स्टारों पर कायस्थ सभाएं और संस्थाएं असफल हुईं हैं और होती रहेंगी. ऐसा नहीं है कि इनमें योग्य, समर्पित, बलिदानी या संपन्न नेतृत्व नहीं आया या लोग नहीं जुड़े या सुनियोजित कार्यक्रम और नीतियां नहीं बनीं. यह सब होने के बाद भी परिणाम शून्य हुआ.

कायस्थ न तो व्यक्तिपरक रहा, न समष्टिगत हो सका. उदारता-संकीर्णता, साक्षरता-नासमझी, ज्ञान की प्रचुरता-लक्ष्मी का अभाव, दानवृत्ति का ह्रास, अनुकरण करने की भावना का अभाव तथा सामूहिक निर्णय या गतिविधि के प्रति अरुचि ने कायस्थों को उनके मूल आधार से अलग कर दिया और किसी नए विचार को वे अपना नहीं सके. आज की बदलती परिस्थिति में कायस्थों के अपनी मूलवृत्ति विश्व को कुटुंब मानकर जन्मना जाति को ठुकराने, योग्यता और गुण के आधार पर अंतरजातीय विवाह सम्बन्ध करने, आर्थिक गतिविधिपरक समूह बनाने और संस्थाएँ चलाने, सेवावृत्ति पर उद्योग और राजनीति को वरीयता देने, परिश्रम और लगन के साथ कर्म को आराध्य मानने के अपनाना होगा तभी वे व्यक्तिगत रूप से समृद्ध, सामाजिक रूप से संगठित तथा सांस्कृतिक रूप से संपन्न हो सकेंगे. उन्हें स्वयं को विश्व मानव के रूप में ढालना होगा तथा विश्व साक्षरता, विश्व शांति, विश्व न्याय तथा विश्व समानता के ध्वजवाहक बनकर दुनिया के कोने-कोने में जाना और छाना होगा.

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Acharya Sanjiv Salil

http://divyanarmada.blogspot.com

शुभ कामना गीत: -- संजीव 'सलिल'

शुभ कामना गीत:


दिव्य नर्मदा संचालक मंडल सदस्य डॉ. साधना वर्मा की जन्म तिथि 

 

१२ सितंबर पर :


संजीव 'सलिल'
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वर्षगाँठ यह मंगलमय हो...
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जो भी चाहे अंतर्मन,
पाने का नित करो जतन.
विनय दैव से है इतनी-
मिलें सफलताएँ अनगिन..

जीवन-पथ पर पग निर्भय हो,
वर्षगाँठ यह मंगलमय हो...
*
अधरों पर सोहे मुस्कान.
पाओ सब जग से सम्मान.
शतजीवी हो, स्वस्थ्य रहो-
पूरा हो मन का अरमान..

श्वास-श्वास सरगम सुरमय हो
वर्षगाँठ यह मंगलमय हो...
*
मिले कीर्ति, यश, अभिनन्दन,
मस्तक पर रोली-चन्दन.
घर-आँगन में खुशियाँ हों-
स्नेहिल नातों का वन्दन..

आस-हास की निधि अक्षय हो,
वर्षगाँठ यह मंगलमय हो...
*