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गुरुवार, 3 दिसंबर 2020

गीत

गीत:
कब होंगे आजाद
इं. संजीव वर्मा 'सलिल'
*
कब होंगे आजाद?
कहो हम
कब होंगे आजाद?....
*
गए विदेशी पर देशी अंग्रेज कर रहे शासन.
भाषण देतीं सरकारें पर दे न सकीं हैं राशन..
मंत्री से संतरी तक कुटिल कुतंत्री बनकर गिद्ध-
नोच-खा रहे
भारत माँ को
ले चटखारे स्वाद.
कब होंगे आजाद?
कहो हम
कब होंगे आजाद?....
*
नेता-अफसर दुर्योधन हैं, जज-वकील धृतराष्ट्र.
धमकी देता सकल राष्ट्र को खुले आम महाराष्ट्र..
आँख दिखाते सभी पड़ोसी, देख हमारी फूट-
अपने ही हाथों
अपना घर
करते हम बर्बाद.
कब होंगे आजाद?
कहो हम
कब होंगे आजाद?....
*
खाप और फतवे हैं अपने मेल-जोल में रोड़ा.
भष्टाचारी चौराहे पर खाए न जब तक कोड़ा.
तब तक वीर शहीदों के हम बन न सकेंगे वारिस-
श्रम की पूजा हो
समाज में
ध्वस्त न हो मर्याद.
कब होंगे आजाद?
कहो हम
कब होंगे आजाद?....
*
पनघट फिर आबाद हो सकें, चौपालें जीवंत.
अमराई में कोयल कूके, काग न हो श्रीमंत.
बौरा-गौरा साथ कर सकें नवभारत निर्माण-
जन न्यायालय पहुँच
गाँव में
विनत सुनें फ़रियाद-
कब होंगे आजाद?
कहो हम
कब होंगे आजाद?....
*
रीति-नीति, आचार-विचारों भाषा का हो ज्ञान.
समझ बढ़े तो सीखें रुचिकर धर्म प्रीति विज्ञान.
सुर न असुर, हम आदम यदि बन पायेंगे इंसान-
स्वर्ग तभी तो
हो पायेगा
धरती पर आबाद.
कब होंगे आजाद?
कहो हम
कब होंगे आजाद?....
*
१४-८-२०१७
salil.sanjiv@gmail.com, ९४२५१८३२४४
#हिंदी+ब्लॉगर

मुक्तिका

कार्यशाला
मुक्तिका
दिल लगाना सीखना है आपसे
२१२२ २१२२ २१२
*
दिल लगाना सीखना है आपसे
जी चुराना सीखना है आपसे
*
वायदे को आप जुमला कह गए
आ, न आना सीखना है आपसे
*
आस मन में जगी लेकिन बैंक से
नोट लाना सीखना है आपसे
*
बस गए मन में निकलते ही नहीं
हक जमाना सीखना है आपसे
*
देशसेवा कर रहे हम भी मगर
वोट पाना सीखना है आपसे
*
सिखाने के नाम पर ले सीख खुद
गुरु बनाना सीखना है आपसे
*
ध्यान कर, कुछ ध्यान ही करना नहीं
ध्येय ध्याना सीखना है आपसे
*
मूँद नैना, दिखा ठेंगा हँस रहे
मुँह बनाना सीखना है आपसे
*
आह भरते देख, भरना आह फिर
आजमाना सीखना है आपसे
*****
४-१२-२०१६ 

क्षणिका

क्षणिका :
*
मन-वीणा पर चोट लगी जब,
तब झंकार हुई.
रिश्तों की तुरपाई करते
अँगुली चुभी सुई.
खून जरा सा सबने देखा
सिसक रहा दिल मौन?
आँसू बहा न व्यर्थ
पीर कब,
बाँट सका है कौन?
*
१३-७-२०१८ 

छंद सप्तक शुभगति, छवि, गंग, दोहा, सोरठा, रोला, कुण्डलिया

 छंद सप्तक १.

*
शुभगति
कुछ तो कहो
चुप मत रहो
करवट बदल-
दुःख मत सहो
*
छवि
बन मनु महान
कर नित्य दान
तू हो न हीन-
निज यश बखान
*
गंग
मत भूल जाना
वादा निभाना
सीकर बहाना
गंगा नहाना
*
दोहा:
उषा गाल पर मल रहा, सूर्य विहँस सिंदूर।
कहे न तुझसे अधिक है, सुंदर कोई हूर।।
*
सोरठा
सलिल-धार में खूब,नृत्य करें रवि-रश्मियाँ।
जा प्राची में डूब, रवि ईर्ष्या से जल मरा।।
*
रोला
संसद में कानून, बना तोड़े खुद नेता।
पालन करे न आप, सीख औरों को देता।।
पाँच साल के बाद, माँगने मत जब आया।
आश्वासन दे दिया, न मत दे उसे छकाया।।
*
कुण्डलिया
बरसाने में श्याम ने, खूब जमाया रंग।
मैया चुप मुस्का रही, गोप-गोपियाँ तंग।।
गोप-गोपियाँ तंग, नहीं नटखट जब आता।
माखन-मिसरी नहीं, किसी को किंचित भाता।।
राधा पूछे "मजा, मिले क्या तरसाने में?"
उत्तर "तूने मजा, लिया था बरसाने में??"
*
संजीव ३.१२.२०१८

नवगीत

नवगीत
सड़क पर
.
फ़िर सड़क पर 
भीड़ ने दंगे किए 
.
आ गए पग
भटकते-थकते यहाँ 
छा गए पग 
अटकते-चलते यहाँ 
जाति, मजहब, 
दल, प्रदर्शन, सभाएँ,
सियासी नेता 
ललच नंगे हुए 
.
सो रहे कुछ 
थके सपने मौन हो 
पूछ्ते खुद 
खुदी से, तुम कौन हो?
गएरौंदते जो, 
कहो क्यों चंगे हुए?
.
ज़िन्दगी भागी 
सड़क पर जा रही 
आरियाँ ले 
हाँफ़ती, पछ्ता रही 
तरु न बाकी 
खत्म हैं आशा कुंए 
.
झूमती-गा
सड़क पर बारात जो 
रोक ट्रेफ़िक 
कर रही आघात वो 
माँग कन्यादान 
भिखमंगे हुए 
.
नेकियों को 
बदी नेइज्जत करे 
भेडि.यों से 
शेरनी काहे डरे?
सूर देखें 
चक्षु ही अंधे हुए 
...
संजीव 
३-१२-२०१७ 

मुक्तक, नवगीत

मुक्तक
*
क्या लिखूँ? कैसे लिखूँ? मैं व्यस्त हूँ
कहूँ क्यों जग से नहीं सन्यस्त हूँ
ज़माने से भय नहीं मुझको तनिक
ईश्वर के विरह से संत्रस्त हूँ
*
नवगीत:
अनेक वर्णा पत्तियाँ हैं
शाख पर तो क्या हुआ?
अपर्णा तो है नहीं अमराई
सुख से सोइये
.
बज रहा चलभाष सुनिए
काम अपना छोड़कर
पत्र आते ही कहाँ जो रखें
उनको मोड़कर
किताबों में गुलाबों की
पंखुड़ी मिलती नहीं
याद की फसलें कहें, किस नदी
तट पर बोइये?
.
सैंकड़ों शुभकामनायें
मिल रही हैं चैट पर
सिमट सब नाते गए हैं
आजकल अब नैट पर
ज़िंदगी के पृष्ठ पर कर
बंदगी जो मीत हैं
पड़ गये यदि सामने तो
चीन्ह पहचाने नहीं
चैन मन का, बचा रखिए
भीड़ में मत खोइए
***

नवगीत

 एक रचना-

*
आपन मूं
आपन तारीफें
करते सीताराम
*
जो औरों ने लिखा न भाया
जिसमें-तिसमें खोट बताया
खुद के खुदी प्रशंसक भारी
जब भी मौका मिला भुनाया
फोड़-फाड़
फिर जोड़-तोड़ कर
जपते हरि का नाम
*
खुद की खुद ही करें प्रशंसा
कहे और ने की अनुशंसा
गलत करें पर सही बतायें
निज किताब का तान तमंचा
नट-करतब
दिखलाते जब-तब
कहें सुबह को शाम
*
जिन्दा को स्वर्गीय बता दें
जिसका चाहें नाम हटा दें
काम न देखें किसका-कितना
सच को सचमुच धूल चटा दें
दूर रहो
मत बाँह गहो
दूरी से करो प्रणाम
*
आपन मूं
आपन तारीफें
करते सीताराम
*
३-१२-२०१५

बुधवार, 2 दिसंबर 2020

दोहा सलिला प्रतिभा

दोहा सलिला 
प्रतिभा 
संजीव 
*
प्रतिभा की प्रति भा रही, मन में चुभता शूल 
हाय सूद प्यारा अधिक, हुआ उपेक्षित मूल 
*
गिरिधारी सिंह गह रहे, गए बाँसुरी भूल 
राधा निकट न आ रहीं, हेरे जमुना धूल 
*
रहा न आरक्षण बिना, प्रतिभा का कुछ मोल 
अवसर है उसके लिए, जो क्रय कर ले तोल 
*
भाई-भतीजावाद है, खुला हुआ बाजार 
प्रतिभा के गाहक नहीं, सत्य करो स्वीकार 
*
अँधा बाँटे रेवड़ी, चीन्ह-चीन्ह कर रोज 
प्रतिभा क्यों कृष्णा हुई, कौन करेगा खोज?
*
२-१२-२०२० 


त्रिपदिक मुक्तिका

अभिनव प्रयोग
त्रिपदिक मुक्तिका
*
निर्झर कलकल बहता
किलकिल न करो मानव
कहता, न तनिक सुनता।
*
नाहक ही सिर धुनता
सच बात न कह मानव
मिथ्या सपने बुनता।
*
जो सुन नहीं माना
सच कल ने बतलाया
जो आज नहीं गुनता।
*
जिसकी जैसी क्षमता
वह लूट खा रहा है
कह कैसे हो समता?
*
बढ़ता न कभी कमता
बिन मिल मिल रहा है
माँ का दुलार-ममता।
***
संजीव, ७९९९५५९६१८
२-१२-२०१८

दोहा / शे'र

दोहा 
*
अपनी अपनी ढपलियाँ, अपने-अपने राग.
कोयल-कंठी मौन है, सुरमणि होते काग.
*
जुगुनू जगमग कर रहे, सूर्य-चंद्र हैं अस्त.
मच्छर जी हैं जगजयी, पहलवान हैं पस्त.
*
संसद में प्रहसन 'सलिल', देखे दुनिया दंग 
रंग भंग में दाल ज्यों, करें रंग में भंग 

द्विपदियाँ (अश'आर)
*
आँख आँख से मिलाकर, आँख आँख में डूबती।
पानी पानी है मुई, आँख रह गई देखती।।
*
एड्स पीड़ित को मिलें एड्स, वो हारे न कभी।
मेरे मौला! मुझे सामर्थ्य, तनिक सी दे दे।।
*
बहा है पर्वतों से सागरों तक आप 'सलिल'।
समय दे रोक बहावों को, ये गवारा ही नहीं।।
*
आ काश! कि आकाश साथ-साथ देखकर।
संजीव तनिक हो सके, 'सलिल' के साथ तू।।
*

मेधावी छात्र

मेधावी छात्र
*
बात उस समय की है जब हमारे संविधान के निर्माता,देश के अग्रणी स्वतन्त्रता संग्राम सैनानी, भारतीय प्रजातन्त्र के प्रथम राष्ट्रपति, कायस्थ कुल दिवाकर डॉ. राजेन्द्र प्रसाद जी अपने शिक्षा काल में बी.ए. के विद्यार्थी थे। प्रातःकाल दैनिक कार्यों से निपट ही रहे थे कि अचानक ध्यान आया कि आज तो उनकी परीक्षा का अंग्रेजी का दूसरा पर्चा है। तत्काल भागते-दौडते कॉलेज पहुँचे लेकिन तब तक परीक्षा समाप्त होने में मात्र एक घंटे का समय शेष था। प्रिंसिपल साहब से निवेदन किया तो उन्होंने यह सोचकर कि वे एक मेधावी छात्र हैं इस शर्त पर अनुमति दे दी कि प्रश्नपत्र हल करने के लिये कोई अतिरिक्त समय नहीं दिया जायेगा। राजेन्द्र प्रस़ाद जी ने ग्रामर तथा ट्रान्सलेशन आदि तो तुरन्त हल कर दिया किन्तु एस्से (निबंध) के लिये बहुत कम समय बचा। निबंध लिखना था ताजमहल पर। बी.ए. के स्तर का निबंध कमसे कम़ ५-६ पेज का ही होना चाहिये था पर इतना समय तो अब शेष था ही नहीं। उन्होंने मात्र एक वाक्य लिखा....
"Taj is the frozen mosque of royal tears". 
परीक्षक ने उनके इस निबंध की बहुत सराहना की और उसे सर्वश्रेष्ठ निरूपित किया। पटना के संग्रहालय में यह उत्तर पुस्तिका आज भी सुरक्षित है।
***

कार्यशाला- एक मुक्तक

कार्यशाला-
एक मुक्तक
*
तुम एक सुरीला मधुर गीत, मैं अनगढ़ लोकगीत सा हूँ
तुम कुशल कलात्मक अभिव्यंजन, मैं अटपट बातचीत सा हूँ - फौजी
तुम वादों को जुमला कहतीं, मैं जी भर उन्हें निभाता हूँ
तुम नेताओं सी अदामयी, मैं निश्छल बाल मीत सा हूँ . - सलिल
****
२-१२-२०१६ 

कुण्डलिया प्रश्नोत्तर

कुण्डलिया 
प्रश्नोत्तर 
*
लिखते-पढ़ते थक गया, बैठ गया हो मौन।  
पूछ रहा चलभाष से, बोलो मैं हूँ कौन? 
बोलो मैं हूँ कौन, मिला तब मुझको उत्तर 
पाए खुद को जान, न क्यों अब तक घनचक्कर?
तुम तुम हो; तुम नहीं, अन्य खुद जैसे दिखते 
मन भटकाए बिना, न क्यों तुम कविता लिखते।
*
२९-११-२०१५ 

बृज मुक्तिका

बृज मुक्तिका 
संजीव 
*
जी भरिकै जुमलेबाजी कर 
नेता बनि कै लफ्फाजी कर 
*
दूध-मलाई गटक; सटक लै 
मुट्ठी में मुल्ला-काजी कर 
*
जनता कूँ आपस में लड़वा 
टी वी पै भाषणबाजी कर 
*
अंडा शाकाहारी बतला 
मुर्ग-मुसल्लम को भाजी कर 
*
सौ चूहे खा हज करने जा 
जो शरीफ उसको पाजी कर 
*
२-१२-२०२० 




तुम तौ खाओ दूध - मलाई जी भरिकै
हमकों खाय रई महँगाई जी भरिकै
कल कूँ सिगरे सिंथेटिक ही पीओगे  
गैया काटें रोज कसाई जी भरिकै
नेता - अफसर लूटि रए हैं जनता कूँ
चोर-चोर मौसेरे भाई, जी भरिकै
होय न सत्यानास जब तलक भारत कौ
हिन्दू-मुस्लिम करौ लड़ाई जी भरिकै
जे छिछोरगर्दी तुमकूँ लै ही डूबी
चौराहे पै भई पिटाई जी भरिकै
वो आरक्षन पायकेँ अफसर बनि बैठे
'अंजुम' तुमनें करी पढ़ाई जी भरिकै

ईश्वरचन्द्र विद्यासागर

स्मरण: 
ईश्वरचन्द्र विद्यासागर 
(२६ दिसंबर १८२० - २९ जुलाई १८९१)
*



ईश्वरचंद्र विद्यासागर बांग्ला साहित्य के समर्पित रचनाकार तथा श्रेष्ठ शिक्षाविद रहे हैं। आपका जन्म २६ दिसंबर १८२० को अति निर्धन परिवार में हुआ था। पिताश्री ठाकुरदास तथा माता श्रीमती भगवती देवी से संस्कृति, समाज तथा साहित्य के प्रति लगाव ही विरासत में मिला। गाँव में प्राथमिक शिक्षा प्राप्त कर आप १८२८ में पिता के साथ पैदल को कलकत्ता (कोलकाता) पहुँचे तथा संस्कृत महाविद्यालय में अध्ययन आरम्भ किया। अत्यधिक आर्थिक अभाव, निरंतर शारीरिक व्याधियाँ, पुस्तकें न खरीद पाना तथा सकल गृह कार्य हाथ से करना जैसी विषम परिस्थितियों के बावजूद अपने हर परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया। 
सन १८४१ में आपको फोर्ट विलियम कोलेज में ५०/- मासिक पर मुख्य पंडित के पद पर नियुक्ति मिली। आपके पांडित्य को देखते हुए आपको 'विद्यासागर' की उपाधि से विभूषित किया गया। १८५५ में आपने कोलेज में उपसचिव की आसंदी को सुशोभित कर उसकी गरिमा वृद्धि की। १८५५ में ५००/- मासिक वेतन पर आप विशेष निरीक्षक (स्पेशल इंस्पेक्टर) नियुक्त किये गये।
अपने विद्यार्थी काल से अंत समय तक आपने निरंतर सैंकड़ों विद्यार्थिओं, निर्धनों तथा विधवाओं को अर्थ संकट से बिना किसी स्वार्थ के बचाया। आपके व्यक्तित्व की अद्वितीय उदारता तथा लोकोपकारक वृत्ति के कारण आपको दयानिधि, दानवीर सागर जैसे संबोधन मिले। 
आपने ५३ पुस्तकों की रचना की जिनमें से १७ संकृत में,५ अंग्रेजी में तथा शेष मातृभाषा बांगला में हैं। बेताल पंचविंशति कथा संग्रह, शकुन्तला उपाख्यान, विधवा विवाह (निबन्ध संग्रह), सीता वनवास (कहानी संग्रह), आख्यान मंजरी (बांगला कोष), भ्रान्ति विलास (हास्य कथा संग्रह) तथा भूगोल-खगोल वर्णनं आपकी प्रमुख कृतियाँ हैं। 
दृढ़ प्रतिज्ञ, असाधारण मेधा के धनी, दानवीर, परोपकारी, त्यागमूर्ति ईश्वरचंद्र विद्यासागर ७० वर्ष की आयु में २९ जुलाई १८९१ को इहलोक छोड़कर परलोक सिधारे। आपका उदात्त व्यक्तित्व मानव मात्र के लिए अनुकरणीय है।

पैरोडी

ई मित्रता पर पैरोडी:
संजीव 'सलिल'
*
(बतर्ज़: अजीब दास्तां है ये,
कहाँ शुरू कहाँ ख़तम...)
*
हवाई दोस्ती है ये,
निभाई जाए किस तरह?
मिलें तो किस तरह मिलें-
मिली नहीं हो जब वज़ह?
हवाई दोस्ती है ये...
*
सवाल इससे कीजिए?
जवाब उससे लीजिए.
नहीं है जिनसे वास्ता-
उन्हीं पे आप रीझिए.
हवाई दोस्ती है ये...
*
जमीं से आसमां मिले,
कली बिना ही गुल खिले.
न जिसका अंत है कहीं-
शुरू हुए हैं सिलसिले.
हवाई दोस्ती है ये...
*
दुआ-सलाम कीजिए,
अनाम नाम लीजिए.
न पाइए न खोइए-
'सलिल' न न ख्वाब देखिए.
हवाई दोस्ती है ये...
*
३०-११-२०१२ 
Sanjiv Verma 'salil'
salil.sanjiv@gmail.com


मंगलवार, 1 दिसंबर 2020

कार्य शाला

कार्य शाला:
दोहा से कुण्डलिया
*
बेटी जैसे धूप है, दिन भर करती बात।
शाम ढले पी घर चले, ले कर कुछ सौगात।। -आभा सक्सेना 'दूनवी'
लेकर कुछ सौगात, ढेर आशीष लुटाकर।
बोल अनबोले हो, जो भी हो चूक भुलाकर।।
रखना हरदम याद, न हो किंचित भी हेटी।
जाकर भी जा सकी, न दिल से प्यारी बेटी।। -संजीव वर्मा 'सलिल'
***

१.१२.२०१८ 

दोहा सलिला

दोहा सलिला 
*
कथ्य भाव लय छंद रस, पंच तत्व आधार.
मुरली-धुन सा कवित रच, पा पाठक से प्यार
*
दोहा सलिला निर्मला, सारस्वत सौगात।
नेह नर्मदा सनातन, अवगाहें नित भ्रात
*
अक्षर-अक्षर ब्रम्ह है, शब्द-शब्द सौगात।
चरण-चरण में सार है, पद-पद है अवदात।।
*
दोहा दिव्य दिनेश दे, तम हर नवल प्रभात।
भाषा-भूषा सुरुचिमय, ज्यों पंकज जलजात।।
*
भाव, कहन, रस, बिंब, लय, अलंकार सज गात।
दोहा वनिता कथ्य है, अजर- अम्र अहिवात।।
*
दोहा कम में अधिक कह, दे संदेशा तात।
गागर में सागर भरे, व्यर्थ न करता बात।।
*
संजीव
१.१२.२०१८

मुक्तक

मुक्तक
नमन तुमको कर रहा सोया हुआ ही मैं
राह दिखाता रहा, खोया हुआ ही मैं
आँख बंद की तो हुआ सच से सामना
जाना कि नहीं दूध का धोया हुआ हूं मैं
*
मत जगाओ, जागकर अन्याय करेगा
आदमी से आदमी भी जाग डरेगा
बाँटकर जुमले ठगेगा आदमी खुद को
छीन-झपट, आग लगा आप मरेगा
*
उषा-स्वागत कर रही है चहक गौरैया
सूर्य-वंदन पवन करता नाच ता-थैया
बैठका मुंडेर कागा दे रहा संदेश-
तानकर रजाई मनुज सो रहा भैया
*
१-१२-२०१७ 

नवगीत

नवगीत
संजीव 
*
पत्थरों के भी कलेजे
हो रहे पानी 
आदमी ने जब से 
मन पर रख लिए पत्थर 
देवता को दे दिया है 
पत्थरों का घर 
रिक्त मन मंदिर हुआ 
याद आ रही नानी 
नाक हो जब बहुत ऊँची 
बैठती मक्खी 
कब गयी कट?, क्या पता?
उड़ गया कब पक्षी
नम्रता का?, शेष दुर्गति 
अहं ने ठानी
चुराते हैं, झुकाते हैं आँख 
खुद से यार 
बिन मिलाये बसाते हैं
व्यर्थ घर-संसार 
आँख को ही आँख
फूटी आँख ना भानी 
चीर हरकर माँ धरा का 
नष्टकर पोखर 
पी रहे जल बोतलों का 
हाय! हम जोकर 
बावली है बावली 
पानी लिए धानी 
१-१२-२०१४