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रविवार, 4 अगस्त 2019

समीक्षा काल है संक्रांति का’तथा‘सड़क पर

समीक्षा-
आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ के गीत- नवगीत संग्रह
‘काल है संक्रांति का’तथा‘सड़क पर’ -ं
डाॅ. रमेश चंद्र खरे, दमोह
*
व्यक्ति की दबी प्रकृति और रुचि प्राप्त आजीविका में भी अंततः
अपना मार्ग खोज ही लेती है। सिविल इंजीनियर संजीव वर्मा भी ‘लोक
निर्माण’ के व्यस्त जीवन में दो-दो कला स्नातकोत्तर होकर ‘सलिल’ सम
साहित्य-सेवा में घुल-मिल गए। आपकी साहित्यिक अभियांत्रिक यात्रा अपनी
आजीविका से ताल-मेल बिठाते हुए, भूकंप में सुरक्षित भवन निर्माण
तकनीक की समुचित जानकारी के साथ ‘भूकंप में जीना सीखें’
लोकोपयोगी लघु कृति के साथ प्रारंभ हुई और १९७७ में ‘कलम
के देव’ के गुणानुवाद से भक्ति गीत के रूप में आगे बढ़ी।

‘समन्वय प्रकाशन अभियान’ जबलपुर के माध्यम से आपने लंबी यात्रा तय की
और सन् २००० में अखिल भारतीय स्तर पर ११ राज्यों के ७४ कवियों का
सचित्र परिचय सहित ३३२ पृष्ठों का वृहत काव्य संकलन- ‘तिनका तिनका नीड़’
संपादित कर प्रकाशित किया। २००१ मे ही व्यवस्था की खामियों को उजागर
करने का खतरा उठाते हुए (९ करोड़ की प्रस्तावित लागत पर ५२ करोड. के
म.प्र. विधान सभा भवन के उद्घाटन पर) स्वतंत्र संवेदनशील चिंतन
का काव्य संकलन ‘लोकतंत्र का मकबरा’ प्रकाशित हुआ।

२००३ में आया आपका मुक्त छंद के नवगीतों का ‘मेरे गीत’
संकलन। परिस्थिति की प्रतिकूलता में अनुकूलन को तत्पर कवि की जिजीविषा
की अपराजित स्वीकारोक्ति। वह मात्र स्वप्नजीवी नहीं, मानव मूल्यों का
आशावादी सजग प्रहरी है। प्रकाश दूत ‘दीपक’ और श्रमजीवी विपन्न वर्ग का
प्रतीक ‘नींव का पत्थर’ उनके आदर्श हैं। कवि कटाक्ष के व्यंग्य को
मारक हथियार बनाता है। विडंबना है आज उच्च शासन, प्रशासन, समाज, व्यापारी,
अधिकारी, न्यायालय सब इस मानसिकता में एक दूसरे के बाप हैं’। लोकतंत्र
की बदहाली पर वह विक्षुब्ध है - ‘राजनीति का सांप/लोकतंत्र के मेंढक
को/बेशर्मी से खा रहा है/ भोली-भाली जनता को/यही मन भा रहा है/जो समझदार
है/वह पछता रहा है/लेकिन कोई भी बदलाव/ नहीं ला पा रहा है।’ कवि की
जागरूकता समाज के संचेतन रूप में उसका श्याम प़क्ष उजागर कर, परिवर्तन
हेतु प्रेरित करने में भी है-

‘ईमानदार की जेब हमेशा खाली क्यों ? मतदाताओं की अनदेखी/नेताओं की
लूट’ और विस्मय! ‘जिन भ्रष्टों के ‘हाथों में जिसकी चाबी/वही हैं लोकतंत्र का संदूक’।
वह इसका निदान समाज की कर्तव्यशीलता में पाता हैं-ं ‘लहलहाती फसल/अधिकारों
की माँगते हैं/कर्तव्यों की खाद/तनिक नहीं डालते है।’

डाॅ. गार्गीशरण मिश्रं के अनुसार- ‘ सलिल का कवि हमें निरंतर पतित यथार्थ से,
उत्थित आदर्श की ओर ले जाने हेतु प्रयत्नशील ही नहीं, संकल्पवान भी है...
निष्पक्षता और निस्संगता उनकी कलम की नोंक पर विराजकर, उनके सृजन को
पठनीय ही नहीं, अनुकरणीय भी बना देती है।’ मैं तो कहूँगा
‘दोंनों स्थितियों में विचलन कठिन कठिनाई है/आदमी बनना,
अपने आप से लड़ाई है’

सघन भावात्मकता और तरल लयात्मकता का आंतरिक विस्फोट हीे गीत
है। आज गीत के कथ्य और शिल्प में समसामयिक परिवर्तन हो रहे हैं।
आधुनिक यांत्रिक जीवन और उसके मोहभंग पर आंचलिकता से भी
जुड़ा है वह, जिसे कुछ लोग ‘नवगीत’ की संज्ञा देते हैं। पर कहा गया
है- ‘ केवल शाब्दिक छोंक-बघार से कोई गीत, ‘नवगीत’ नहीं हो
जाता, चिंतन के तेवर भी होने चाहिए।’ कविवर सलिल जी का ६५
‘गीत-नवगीत’ के मिश्रण का नया संकलन २०१६ में ‘काल है संक्रांति का’
/(तुम मत थको सूरज!) के नाम से आया है। इसका कथ्य भी
पूर्व-पश्चिम, प्रचीन-नवीन, संस्कृति-सभ्यता के अंतर्द्वंद की
किंकर्तव्यविमूढ़ता व्यक्त करता है- ‘प्राच्य पर पाश्चात्य का चढ़ गया है
रंग/कौन किसको संभाले, पी रखी मद की भंग.....मनुज करनी देखकर
है, खुद नियति भी दंग/तिमिर को लड़़ जीतना /तुम मत चुको सूरज’।

याद आती है धर्मवीर भारती की पंक्तियाँ ‘अभी तो पड़ी है धरा
अधबनी/सृजन की थकन भूल जा देवता’। यह क्रांति नहीं, ‘संक्रांति
काल है’- क्रांति के पूर्व दो युगों के बीच का ‘ट्रांसिट पीरियड’
जो अपनी विसंगतियों,विद्रूपताओं में व्यंग्य का भरपूर अवसर देता
है- ‘प्रतिनिधि होकर जन से दूर/आँखें रहते भी हो सूर’ (
गवर्मेंट फार- एफओआर नहीं, एफएआर- द पीपुल) और ‘तज सिद्धांत, बना
सरकार/ कुसीै पा लो, ऐश रहे’। आगे भी ऐसी विडंबनाओं के कई
तेवर हैं- ‘खासों में खास’ - ‘सब दुनिया में कर अँधियारा/वह खरीद
लेता उजियारा’ और ‘बग्घी बैठा/बन सामंती समाजवादी’। कवि
प्रशासनिक भ्रष्टाचार और श्रेय लूट की भुक्तभोगी पीड़ा से भी
कराहता है- ‘अगले जनम/उपयंत्री न कीजो’। कथित ‘नवगीतों’- ‘अधर
पर’,‘मिली दहाड़ी’,‘अंध श्रद्धा’,‘राम बचाए’,‘लोकतंत्र का पंछी’,‘दिशा न
दर्शन’ आदि के बारे में कहा गया है कि अपने गुण-धर्म में नव होते
हुए भी गीत को कोई विषेशण जरूरी नहीं है। वे मूल ‘गीत’ में
ही श्रेष्ठ हैं। आज छंद की ओर लौटती कविता के कई प्रयोग हो रहे
हैं- मुक्त छंद, पर छंद मुक्त नहीं। सलिलजी ने ईसुरी की बुंदेली
चौकड़िया, आल्हा छंद, पंजाबी और सोहर लोक गीत भी रूपांतरित किए
हैं और हरिगीतिका, दोहा, सोरठा भी। छंदविधान में मात्रिक
करुणाकर छंद और वर्णिक सुप्रतिष्ठा जातीय नायक छंद जैसे कई प्रयोग
करने में वे व्यस्त हैं।‘ ‘नर्मदा’ सहित्यिक सांस्कृतिक पत्रिका
संपादन-प्रकाशन के बाद, आज कल इलेक्ट्रॉनिक ‘वाट्स एप’ पर ‘टू मीडिया
सलिल विशेषांक’ पत्रिका में चर्चित, वे पिंगल, ‘भाषा-व्याकरण’ के
विविध अंगों के निरूपण में शोधरत प्रयोगधर्मी हैं। बहरहाल भाव
और विचारों का सम्यक संगम, ‘सलिल- काव्य सरिता, संवेदनशीलता और
आक्रोश लिए कवि की वाग्विदग्धता का प्रमाण है।

अभी भी लगता है जैसे ‘संक्रांति काल’ समाप्त नहीं हुआ। पूर्व
संग्रह के अनुपूरक सा, नये गीत नवगीत- व्यस्त, त्रस्त जनजीवन के सार्वजनिक
प्रतीक के रूप में ‘सड़क पर’ सामने आया है। इस संग्रह की अंतिम नौ
कविताएँ इसी ‘सड़क पर’ संचालित सतत जिंदगी, अप्रिय ‘दुरंगी चालों वाली
छलती सियासत’ के ‘सड़क पर पसरे सियासी नजारे वाले गंदे हृदय सफेदपोश,
चारित्रिक दूषण और प्रदूषण, अतिक्रमण, जन्म-मरण उसके बहुरंगी दुख
दर्द, विसंगति पर उसका पछतावा, भीड़तंत्र की स्वच्छंद धींगा-मस्ती के
विवादित दंगे, असुरक्षा, बेइज्जती, अस्वच्छता, राजपुरुषों के
उत्थान-पतन सबकी साक्षी ‘सड़क’ का जैसे मानवीकरण एक धारावाहिक
यथार्थवादी फिल्म की तरह विद्रूप कच्चा चिट्ठा है, इसीलिय यह संग्रह
का शीर्षक भी है। धूमिल की ‘संसद से सड़़क तक’ भी लोकतंत्र की
अंतर्द्व्न्द गाथा है।


कवि प्रारंभ में कुछ प्रकृति और पर्यावरण के सुदर चित्र- मनभावन
सावन, मेघ बजे, ओढ़ कुहासे की चादर, पर्वत पछताया, कैसी होली
?, रंग हुआ बदरंग’, उल्लास में भी विषाद की छाया देखते हुए
चिंतित है- ‘मानव तो करता है निश-दिन मनमानी/प्रकृति से छेड़छाड़
घातक नादानी।’ और फिर वह अपने मूल कथ्य को व्यंग्य में उतार लाता
है। व्यंग्य, वास्तव में अन्योक्ति से व्यवस्था को कटघरे में खड़ा
करता है। उसका जन्म ही विडंबना से होता है- ‘ऐसा तो नहीं होना
चाहिए था, ऐसा क्यों हुआ’ ? इस पर संवेदनशील कवि (जन) मन
आक्रोशित होता है और तदनुरूप उसकी भाषा और मुहावरे कभी
कटूक्ति भी अपनाते हुए बदलते हैं । अपनी मातृभाषा से
परहेजी- ‘आंखें रहते भी हैं सूर/ फेंक अमिय नित विष घोलें।’

समाज असंस्कारों से दुर्भावग्रस्त हुआ है। पारिवारिक स्वार्थी
शहरीपन, सरल गाँवों में घुस आया है- ‘बढ़े सियासत के बबूल/सूखा
हैं चंपा सद्भावों का’ जहाँ-ं ‘बहू सो रही ए.सी. में/ खटती बऊ
दुपहरिया में’..विसंगति देखिए- शासन ने आदेश दिया है/मरुतल खातिर
नावों का’ और- ‘मेहनतकश के हाथ हमेशा रहते हैं क्यों खाली
खाली?/मोटी तोदों के महलों में/क्यों बसंत लाता खुशहाली?
ऊँची कुर्सी वाले पाते/अपने मुॅह में सदा बताशा’ ! जलाभाव, गरीबी,
भूख, जंगल कटने की समस्या-‘सर्प दर्प का झूल रहा है डर लगता हैं
पोल खोलते।’ वह स्वार्थी राजनीति के व्यवसाय पर व्यंग्य करता है-

जब तक कुर्सी तब तक ठाठ...सत्ताभोग करा बेगारी/सगा न कोई यहाँ किसी
का/ स्वार्थ साधने करते यारी/फूँको नैतिकता, ले काठ’। राजनीति
अब राज्यनीति नहीं, त्याज्य ‘नीति’ है, जो अवमूल्यित है। साधारण
विवाद- हल में भी षड्यंत्र की बू आती है- ‘आप राजनीति कर रहे
हैं’। अब वह सेवा साधना नहीं- ‘बेच खरीदो रोज देश को/साध्य
मान लो भोग ऐश को/वादों का क्या किया, भुलाया/लूट
दबाओ स्वर्ण कैश को/-झूठ आचरण सच का पाठ’। यही अनीति
भ्रष्टाचार, घोटालों की जड़ है। कटु यथार्थ- ख्ंडन मारक
है- ‘कौन कहता है कि मँहगाई अधिक है?/बहुत सस्ता बिक रहा इंसान
है/जहाँ जाओगे सहज ही देख लोगे/बिक रहा बेदाम ही इ्रंसान है
आज की अपसंस्कृति और विकृति को देखकर कवि को ध्वंसोन्मुख प्रकृति
ही नहीं,सहज मानव प्रकृति की विद्रूपता याद आती है- ‘कुटिलता वरेण्य
हुई/त्याज्य सहज बोली’। आज ‘अंधा युग’(धर्मवीर भारती) नहीं,
‘बहरा युग’ है- सब दिखाई देता है, पर ‘त्राहिमाम, त्राहिमाम’ की आर्त
ध्वनि भर सुनाई नहीं देती। एक भ्रम निवारण- द्वापर में कौेरव कुल
नष्ट नहीं हुआ- ‘वंष वृक्ष कट गया किंतु जड़़/शेष रह गई है अब
भी।’ कवि का रूपक सार्थक है- ‘आंखों पर पट्टी बाँधे न्याय’,
‘मंत्रालय, सचिवालय में शकुनि’, ‘दुःशासन खाकी वर्दी में’, द्रौपदी
अब भी लुटती ‘निर्भया’-सी, ‘प्रतिभा की नीलामी’ ‘स्वार्थों के
कैदी गुरु की तरह बेकाम शिक्षा’ और दूषित, भ्रष्ट धर्म- 'सभी
युगांतर में अर्थांतर है। प्रचलित शब्दार्थों का विचलन ही व्यंग्य
होता है। लोक और तंत्र में स्थाई द्वंद्व है।

कवि नकारात्मक ही नहीं, सकारात्मक दृष्टिकोण भी रखता है
- ‘खुद अपना मूल्याङ्कन कर लो’- ‘अँधेरे और उजाले को
जोड़़ने वाला कोई पुल आपने बनाया क्या ? श्रम सीकर और स्नेह सलिल
के अभाव में क्या कोई फूल आपका आभारी है ?- ‘स्नेह साधना करी
सलिल कब/दीन-हीन में दिखे कभी रब ?’ और सहज ही याद आती हैं कविवर
भवानी प्रसाद तिवारी के गीतांजलि के काव्यानुवाद की
पंक्तियां- ‘दिखता है प्रभु कहीं?/यहाँ नहीं/वहाँ
नहीं/फिर कहाँ ? अरे वहम जहाँ पर दीन/ जोतता कड़ी जमीन/वसन
हीन/तन मलीन.....।’ यही मन मंथन है। गीत संग्रह के कथ्य और
शिल्प के विषय में विद्वान समीक्षक श्री राजेन्द्र वर्मा (लखनऊ) ने अपनी
लंबी भूमिका में पर्याप्त प्रकाश डाला है। अब शेष क्या ? गीत और
नवगीत के बीच कोई विभाजक लक्षमण रेखा नहीं खींची गई है।
कई कवि तो गीत की पंक्ति को तोड़कर, चार की छोटी- बड़ी आठ
बनाकर, बगैर इसके व्याकरण को समझे, इस शिविर में शामिल हो जाते हैं।

अतः, किसी खेमेबाजी में न पड़कर ये सुंदर भाव-विचाारात्मक ६२ ‘नये
गीत’ ( वास्तव में ६०, ३० और ८१ तथा ६२ और ७५ में पुनरावृत्ति
है) अपने कहन में नयी जमीन तोड़ते हैं। बहुत से बुंदेलखंडी
देशज शब्दों- ‘खिझिया, जिमाए, गुजरिया, डुकरो, डुकरिया, बऊ-दद्दा,
हकाल, ठाँसेगा, सुस्ता, मुस्का, टपरिया, सौं, हेरते, पेरते, सुआ,
बाँचेगा, गत, कलपते, कुलिया, दुत्कार के प्रयोग से आंचलिकता ने इन
गीतों की लोकरंजना बढ़ाई है। प्रकारांतर से यह जागरण गीत मेँ- ‘बहुत
-झुकाया अब तक तूने/अब तो अपना भाल उठा’- लोक मंगल भी है। अ.
भा. स्तर पर फिर १५-१५ कवियों के १००-१०० दोहों के नये ३
संकलनों का सभूमिका संपादन-प्रकाशन भी आपकी विशिष्ट उपलब्धि
है। वैयाकरणिक भाई ‘सलिल’ इस दिशा में सैद्धांतिक और व्यावहारिक
काव्य साधना में बधाई के पात्र हैं।

***

अगस्त : कब-क्या?

अगस्त : कब-क्या?
*
  • ०१ अगस्त - विश्व स्तनपान दिवसबाल गंगाधर तिलक स्मृति दिवस, देवकीनंदन खत्री जयंती, राजर्षि पुरुषोत्तम  दास टंडन जयंती   
  • ०२ अगस्त - दादरा एवं नगर हवेली मुक्ति दिवस  
  • ०३ अगस्त - हृदय प्रत्यारोपण दिवस, नाइजर स्वतंत्रता दिवस, मैथिलीशरण गुप्त जयंती,   
  • ०४ अगस्‍त - महान गायक किशोर कुमार का जन्‍म दिवस
  • ०५ अगस्त - मैत्री दिवस, शिवमंगल सिंह सुमन जयंती,  
  • ०६ अगस्त - हिरोशिमा दिवस, विश्व शांति दिवस, सुरेन्द्रनाथ बैनर्जी दिवस
  • ०७ अगस्‍त - राष्‍ट्रीय हथकरघा दिवस, रवीन्द्रनाथ टैगोर स्मृति दिवस, रक्षा बंधन 
  • ०८. अगस्त - विश्व वरिष्ठ नागरिक दिवस, भीष्म साहनी जयंती, कृष्णकांत उपाध्याय जयंती,  
  • ०९ अगस्त - अगस्त क्रांति दिवस, नागासाकी दिवस, भारत छोड़ो आन्दोलन स्मृति दिवस, विश्व आदिवासी दिवस 
  • १० अगस्‍त - विश्‍व जैव ईंधन दिवस, डेंगू निरोधक दिवस, कजरी तीज, पं. रघुनाथ पाणिग्रही निधन,      
  • ११ अगस्त - खुदीराम बोस शहीद दिवस, दिलीप कुमार जन्म १९२२   
  • १२ अगस्त - अंतर्राष्ट्रीय युवा दिवस, पुस्तकालयाध्यक्ष दिन, विक्रम साराभाई जन्‍म दिवस, विश्व हाथी दिवस, नाग पंचमी   
  • १३ अगस्त - वायें हाथ के बल्लेबाज दिवस, विश्व अंगदान दिवस
  • १४ अगस्त - संस्‍कृत दिवस, पाकिस्तान स्वतंत्रता दिवस, स्वामी अखंडानंद सरस्वती जयन्ती, शहीद गुलाब सिंह पटेल पुण्य तिथि, निहाल तांबा जन्म,  
  • १५अगस्त - स्वतंत्रता दिवस (भारत), महर्षि अरविन्द घोष जयंती, महादेव देसाई दिवस, बांग्लादेश का राष्ट्रीय शोक दिवस, जन्माष्टमी   
  • १६ अगस्त - पांडिचेरी विलय दिवस, रानीअवन्ती बाई दिवस,   
  • १७ अगस्त - इण्डोनेशिया का स्वतंत्रता दिवस, अमृतलाल नागर जयंती, शहीद मदनलाल ढींगरा दिवस, नेताजी वायुयान दुर्घटना   
  • १८ अगस्त -  सुभाष चंद्र बोस स्‍मृति दिवस , अफ़ग़ानिस्तान का स्वतंत्रता दिवस, देशज जन अधिकार दिवस, गुलज़ार जन्म, 
  • १९ अगस्त - विश्व मानवता दिवस , विश्व फोटोग्राफी दिवस, विश्व कमीज दिवस, चरक जयन्ती,   
  • २० अगस्त - विश्व मच्छर दिन, राजीव गांधी जयंती, अर्थ ओवरशूट डे, सद्भावना दिवस भारत, संजीव सलिल जन्म 
  • २१ अगस्त - विष्णु दिगंबर पलुस्कर दिवस, बिस्मिल्ला खां निधन      
  • २३ अगस्त - दास व्यापार उन्मूलन दिवस  
  • २५ अगस्त - पं. रघुनाथ पाणिग्रही निधन 
  • २६ अगस्त - महिला समानता दिवस  
  • २७ अगस्त - मदर टेरेसा जयंती, महान गायक मुकेश जी की पुण्यतिथि  
  • २८ अगस्त - रास बिहारी बोस दिवस, फिराक़ गोरखपुरी जयंती, राजेंद्र यादव जन्म, श्याम सखा श्याम जन्म  
  • २९ अगस्त - राष्‍ट्रीय खेल दिवस, ध्यानचंद जन्म दिवस,अन्तर्राष्ट्रीय नाभिकीय परीक्षण विरोध दिवस, वर्षा सिंह जन्म     
  • ३० अगस्त - लघु उद्योग दिवस, भगवती चरण वर्मा दिवस, 
  • ३१ अगस्त - अमृता प्रीतम जन्म, शिवाजी सावंत जन्म  

कृति चर्चा: ''पाखी खोले पंख'' श्रीधर प्रसाद द्विवेदी

कृति चर्चा: 
''पाखी खोले पंख'' : गुंजित दोहा शंख 
[कृति विवरण: पाखी खोले शंख, दोहा संकलन, श्रीधर प्रसाद द्विवेदी, प्रथम संस्करण, २०१७, आकार २२ से.मी. x १४ से.मी., पृष्ठ १०४, मूल्य ३००/-, आवरण सजिल्द बहुरंगी जैकेट सहित, प्रगतिशील प्रकाशन दिल्ली, दोहाकार संपर्क अमरावती। गायत्री मंदिर रोड, सुदना, पलामू, ८२२१०२ झारखंड, चलभाष ९४३१५५४४२८, ९९३९२३३९९३, ०७३५२९१८०४४, ईमेल sp.dwivedi7@gmail.com]
*
दोहा चेतन छंद है, जीवन का पर्याय
दोहा में ही छिपा है, रसानंद-अध्याय 
*
रस लय भाव प्रतीक हैं, दोहा के पुरुषार्थ 
अमिधा व्यंजन लक्षणा, प्रगट करें निहितार्थ 
*
कत्था कथ्य समान है, चूना अर्थ सदृश्य  
शब्द सुपारी भाव है, पान मान सादृश्य 
*
अलंकार-त्रै शक्तियाँ, इलायची-गुलकंद
जल गुलाब का बिम्ब है, रसानंद दे छंद 
*
श्री-श्रीधर नित अधर धर, पान करें गुणगान 
चिंता हर हर जीव की, करते तुरत निदान 
*
दोहा गति-यति संतुलन,  नर-नारी का मेल 
पंक्ति-चरण मग-पग सदृश, रचना विधि का खेल 
*
कवि पाखी पर खोलकर, भरता भाव उड़ान 
पूर्व करे प्रभु वंदना, दोहा भजन समान  
*
अन्तस् कलुष मिटाइए, हरिए तमस अशेष। 
उर भासित होता रहे, अक्षर ब्रम्ह विशेष।।                 पृष्ठ २१  
*
दोहानुज है सोरठा, चित-पट सा संबंध 
विषम बने सम, सम-विषम, है अटूट अनुबंध 
*
बरबस आते ध्यान, किया निमीलित नैन जब। 
हरि करते कल्याण, वापस आता श्वास तब।।           पृष्ठ २४ 
*
दोहा पर दोहा रचे, परिभाषा दी ठीक  
उल्लाला-छप्पय  सिखा, भली बनाई लीक 
*
उस प्रवाह में शब्द जो, आ जाएँ 'अनयास'।               पृष्ठ २७ 
शब्द विरूपित हो नहीं, तब ही सफल प्रयास 
*
ऋतु-मौसम पर रचे हैं, दोहे सरस  विशेष      
रूप प्रकृति का समाहित, इनमें हुआ अशेष 
*
शरद रुपहली चाँदनी, अवनि प्रफुल्लित गात। 
खिली कुमुदिनी ताल में, गगन मगन मुस्कात।।      पृष्ठ २९ 
*
दिवा-निशा कर एक सा, आया शिशिर कमाल। 
बूढ़े-बच्चे, विहग, पशु, भये विकल बेहाल।।              पृष्ठ २१   
*
मन फागुन फागुन हुआ, आँखें सावन मास।
नमक छिड़कते जले पर, कहें लोग मधुमास।।          पृष्ठ ३१

शरद-घाम का सम्मिलन, कुपित बनाता पित्त। 
झरते सुमन पलाश वन, सेमल व्याकुल चित्त।।       पृष्ठ ३३ 

बादल सूरज खेलते,  आँख-मिचौली खेल। 
पहुँची नहीं पड़ाव तक, आसमान की रेल।।               पृष्ठ ३५ 
*
बरस रहा सावन सरस्, साजन भीगे द्वार। 
घर आगतपतिका सरस, भीतर छुटा फुहार।।            पृष्ठ ३६
*
उपमा रूपक यमक की,  जहँ-तहँ छटा विशेष 
रसिक चित्त को मोहता, अनुप्रास अरु श्लेष 
*
जेठ सुबह सूरज उगा, पूर्ण कला के साथ। 
ज्यों बारह आदित्य मिल, निकले नभ के माथ।।       पृष्ठ ३९    
*
मटर 'मसुर' कटने लगे, रवि 'उष्मा' सा तप्त             पृष्ठ ४३ / ४५ 
शब्द विरूपित यदि न हों, अर्थ करें विज्ञप्त 
*
कवि-कौशल है मुहावरे, बन दोहा का अंग 
वृद्धि करें चारुत्व की, अगिन बिखेरें रंग 
*
उनकी दृष्टि कपोल पर, इनकी कंचुकि कोर। 
'नयन हुए दो-चार' जब, बँधे प्रेम की डोर।।                 पृष्ठ ४६ 

'आँखों-आँखों कट गई', करवट लेते रैन।
कान भोर से खा रही, कर्कश कोकिल बैन।।                पृष्ठ ४७  २४ 
*
बना घुमौआ चटपटा, अद्भुत रहता स्वाद। 
'मुँह में पानी आ गया', जब भी आती याद।।               पृष्ठ ४९

दल का भेद रहा नहीं, लक्ष्य सभी का एक। 
'बहते जल में हाथ धो', 'अपनी रोटी सेंक'।।                पृष्ठ ५४ 
*
बाबा व्यापारी हुए, बेचें आटा-तेल। 
कोतवाल सैंया बना, खूब जमेगा खेल।।                     पृष्ठ ७७ 

कई देश पर मर मिटे, हिन्दू-तुर्क न भेद। 
कई स्वदेशी खा यहाँ, पत्तल-करते छेद।।                  पृष्ठ ७४

अरे! पवन 'कहँ से मिला', यह सौरभ सौगात।             पृष्ठ ४७ 
शब्द लिंग के दोष दो, सहज मिट सकें भ्रात।। 
*
'अरे पवन पाई कहाँ, यह सौरभ सौगात' 
कर त्रुटि कर लें दूर तो, बाधा कहीं न तात  
*
झूमर कजरी की कहीं, सुनी न मीठी बोल।                  पृष्ठ ४८ 
लिंग दोष दृष्टव्य है, देखें किंचित झोल 
*
'झूमर-कजरी का कहीं, सुना न मीठा बोल         
पता नहीं खोया कहाँ, शादीवाला ढोल 
*
पर्यावरण बिगड़ गया, जीव हो गए लुप्त 
श्रीधर को चिंता बहुत, मनुज रहा क्यों सुप्त?
*
पता नहीं किस राह से, गिद्ध गए सुर-धाम। 
बिगड़ा अब पर्यावरण, गौरैया गुमनाम।।                 पृष्ठ ५८  
*
पौधा रोपें  तरु बना, रक्षा करिए मीत 
पंछी आ कलरव करें, सुनें मधुर संगीत
*
आँगन में तुलसी लगा, बाहर पीपल-नीम। 
स्वच्छ वायु मिलती रहे, घर से दूर हकीम।।            पृष्ठ ५८ 
*
देख विसंगति आज की, कवि कहता युग-सत्य
नाकाबिल अफसर बनें, काबिल बनते भृत्य 
*
कौआ काजू चुग रहा, चना-चबेना हंस। 
टीका उसे नसीब हो, जो राजा का वंश।।                    पृष्ठ ६१ / ३६ 
*
मानव बदले आचरण, स्वार्थ साध हो दूर 
कवि-मन आहत हो कहे, आँखें रहते सूर 
*
खेला खाया साथ में, था लँगोटिया यार। 
अब दर्शन दुर्लभ हुआ, लेकर गया उधार।।               पृष्ठ ६४ 
*
'पर सब कहाँ प्रत्यक्ष हैँ, मीडिया पैना दर्भ                 पृष्ठ ७०/६१ 
चौदह बारह कलाएँ, कहते हैं संदर्भ 
*
अलंकार की छवि-छटा, करे चारुता-वृद्धि 
रूपक उपमा यमक से, हो सौंदर्य समृद्धि 
*
पानी देने में हुई, बेपानी सरकार। 
बिन पानी होने लगे, जीव-जंतु लाचार।।                   पृष्ठ ७९ 
*
चुन-चुन लाए शाख से, माली विविध प्रसून।              पृष्ठ ७७  
बहु अर्थी है श्लेष ज्यों, मोती मानुस चून 
*
आँख खुले सब मिल करें, साथ विसंगति दूर   
कवि की इतनी चाह है, शीश न बैठे धूर 
*
अमिधा कवि को प्रिय अधिक, सरस-सहज हो कथ्य  
पाठक-श्रोता समझ ले, अर्थ न चूके तथ्य 
*
दर्शन दोहों में निहित, सहित लोक आचार 
पढ़ सुन समझे जो इन्हें, करे श्रेष्ठ व्यवहार 
*
युग विसंगति-चित्र हैं, शब्द-शब्द साकार 
जैसे दर्पण में दिखे, सारा सच साकार 
*
श्रेष्ठ-ज्येष्ठ श्रीधर लिखें, दोहे आत्म उड़ेल 
मिले साथ परमात्म  भी, डीप-ज्योति का खेल 
***
चर्चाकार : आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' 
विश्व वाणी हिंदी संस्थान,  
४०१ विजय अपार्टमेंट नेपियर टाउन जबलपुर  ४८२००१ 
चलभाष: ९४२५१ ८३२४४। ईमेल salil.sanjiv@gmail.com

शनिवार, 3 अगस्त 2019

राष्ट्रीय शिक्षा नीति

विमर्श
माननीय मानव संसाधन विकास मंत्री,
मानव संसाधन विकास मंत्रालय, भारत सरकार
नई दिल्ली – 110001 
विषय: राष्ट्रीय शिक्षा नीति
मान्यवर! 
           वंदे मातरम। 
० १. प्रकृति गर्भ से ही जीव को शिक्षित करना प्रारम्भ कर देती है। माता प्रथम गुरु होती है अत:,   माँ द्वारा उपयोग की जाती भाषा जातक की मातृभाषा होती जिसके शब्दों और उनके साथ जुडी संवेदना को शिशु गर्भ से ही पहचानने लगता है। विश्व के सभी शिक्षा-शास्त्री और मनोवैज्ञानिक एकमत हैं कि शिशु का शिक्षण मातृ भाषा में होना चाहिए। दुर्योगवश भारत में राजनैतिक स्वतंत्रता मिलने के तुरंत बाद अंग्रेजभक्त नेता, दल और प्रशासनिक अधिकारी सत्ता पर आ गए और मातृभाषा तथा राजभाषा उपेक्षित होकर पूर्व संप्रभुओं की आंग्ल भाषा शिक्षा पर थोप दी गयी। वर्तमान में सबसे पहली प्राथमिकता शिक्षा के माध्यम के रूप में पहला स्थान मातृभाषा फिर राज भाषा हिंदी को देना ही हो सकता है। अंग्रेजी का भाषिक आतंक यदि अब भी बना रहा तो वह भविष्य के लिए घातक और त्रासद होगा।

 ०२. शिक्षा की दो प्रणालियाँ शैशव से ही समाज को विभक्त कर देती हैं। अत:, निजी शिक्षण व्यवस्था को हतोत्साहित कर क्रमश; समाप्त किया जाए। राष्ट्रीय एकात्मकता के लिये भाषा, धर्म, क्षेत्र, लिंग या अभिभावक की आर्थिक स्थिति कुछ भी हो हर शिशु को एक समान शिक्षा प्राथमिक स्तर पर दी जाना अपरिहार्य है। इस स्तर पर मातृ भाषा, राजभाषा, गणित, सामान्य विज्ञान (प्रकृति, पर्यावरण, भौतिकी, रसायन आदि), सामान्य समाज शास्त्र (संविधान प्रदत्त अधिकारों व् कर्तव्यों की जानकारी, भारत की सभ्यता, संस्कृति, सर्व धर्म समभाव, राष्ट्रीयता, मानवता, वैश्विकता आदि), मनोरंजन (साहित्य, संगीत, नृत्य, खेल, योग, व्यायाम आदि), सामाजिक सहभागिता व समानता (परिवार, विद्यालय, ग्राम, नगर, राष्ट्र, विश्व के प्रति कर्तव्य) को केंद्र में रखकर दी जाए। बच्चे में शैशव से ही उत्तरदायित्व व् लैंगिक समानता का भाव विकसित हो तो बड़े होने पर उसका आचरण अनुशासित होगा और अनेक समस्याएँ जन्म ही न लेंगीं। 

०३. माध्यमिक शिक्षा का केंद्र बच्चे के प्रतिभा, रूचि, योग्यता, आवश्यकता और संसाधनों का आकलन कर उसे शिक्षा ग्रहण करने के क्षेत्र विशेष का चयन करने के लिए किया जाना चाहिए। प्राथमिक शिक्षा के विषयों में कुछ अधिक ज्ञान देने के साथ-साथ शारीरिक-मानसिक सबलता बढ़े तथा अभीष्ट दिशा का निर्धारण इसी स्तर पर हो तो कैशोर्य समाप्त होने तक बच्चे में उत्तरदायित्व के प्रति जागरूकता व् उत्सुकता होगी, साथ ही सामने एक लक्ष्य भी होगा। जिस बच्चे में किसी खेल विशेष की प्रतिभा हो उसे उस खेल विशेष का नियमित तथा विशिष्ट प्रशिक्षण उपलब्ध करा सकनेवाली संस्था में प्रवेश दे कर अन्य विषय पढ़ाए जाए। इसी तरह संगीत, कला, साहित्य, समाजसेवा, विज्ञान आदि की प्रतिभा पहचान कर स्वभाषा में शिक्षण दिया जाए। हर विद्यालय में स्काउट / गाइड हो ताकि बच्चों में चारित्रिक गुणों का विकास हो।  

०४. उच्चतर माध्यमिक स्तर पर हर बच्चे की प्रतिभा के अनुरूप क्षेत्र में उसे विशेष शिक्षण मिले। इस स्तर पर यह भी पहचान जाए कि किस विद्यार्थी में उच्च शिक्षा ग्रहण करने की पात्रता और चाहत है तथा कौन आजीविका अर्जन को प्राथमिकता देता है? जिन विद्यार्थियों में व्यावहारिक समझ अधिक और किताबी ज्ञान में रूचि कम हो उन्हें रोजगारपरक शिक्षा हेतु पॉलिटेक्निक और आई. आई. टी. में भेजा जाए जबकि किताबी ज्ञान में अधिक रूचि रखनेवाले विद्यार्थी स्नातक शिक्षा हेतु आगे जाएँ। हर विद्यार्थी में चारित्रिक विकास के लिए स्काउट / गाइड अनिवार्य हो।  

०५. विद्यार्थी स्नातक पाठ्यक्रम हेतु खुद विषय न चुने अपितु मनोवैज्ञानिक परीक्षण कर उसकी सामर्थ्य और उसमें छिपी सम्भावना का पूर्वानुमान कर उसे दिशा-दर्शन देकर उसके लिये सर्वाधिक उपयुक्त विषय, उस विषय के योग्यतम शिक्षक जिस संस्थान में हों वहाँ उसे प्रवेश दिया जाए। हर विद्यार्थी को एन. सी. सी. लेना अनिवार्य हो ताकि उसमें आत्मरक्षण, अनुशासन तथा चारित्रिक गुण विकसित हों।  आपदा अथवा संकट काल में वह अपनी और अन्यों की रक्षा करने के प्रति सजग हो।  

०६. शालेय शिक्षा की अंतिम परीक्षा में प्राप्त अंकों के आधार पर ही स्नातक कक्षाओं में प्रवेश हो। सभी चयन परीक्षाएँ तत्काल बंद कर दी जाएँ तो इन के आयोजन में व्यर्थ खर्च होनेवाली विशाल धनराशि, स्टेशनरी, कार्य घंटे, इनके आयोजन में हो रहा भ्रष्टाचार (उदाहरण व्यापम, बिहार का फर्जीवाड़ा आदि) अपने आप समाप्त हो जायेगा तथा अभिभावक को पैसों की दम पर अयोग्य को बढ़ाने का अवसर न मिलेगा। इससे शालेय स्तर पर गंभीरता से पढ़ने और अनुशासित रहने की प्रवृत्ति भी होगी।

०७. स्नातक स्तर पर विषय का अद्यतन ज्ञान देने के साथ-साथ विद्यार्थी की शोध क्षमता का आकलन हो। जिनकी रुचि व्यवसाय में हों वे इसी स्तर पर संबंधित विषय के प्रबंधन, कानूनों, बाज़ार, अवसरों और सामग्रियों आदि पर केंद्रित डिप्लोमा कर व्यवसाय में आ सकेंगे। इससे उच्च शिक्षा स्तर पर अयोग्य विद्यार्थियों की भीड़ कम होगी और योग्य विद्यार्थियों पर अधिक ध्यान दिया जा सकेगा।

०८. स्नातकोत्तर कक्षाओं में वही विद्यार्थी प्रवेश पायें जिन्हें शिक्षण अथवा शोध कार्य में रूचि हो। प्राथमिक, माध्यमिक, उच्चतर माध्यमिक, स्तर तक अध्यापन हेतु स्नातक शिक्षा तथा अध्यापन शास्त्र में विशेष शिक्षा आवश्यक हो। स्नातकोत्तर कक्षाओं में अध्यापन हेतु शोध उपाधि अपरिहार्य हो। 

०९ शोध निदेशक बनने हेतु शोध उपाधि के साथ पाँच वर्षीय अध्यापन अनुभव अनिवार्य हो जिसमें ७५% विद्यार्थी उच्च श्रेणी में उत्तीर्ण हुए हों।  

१०. तकनीकी (अभियांत्रिकी / चिकित्सा / कृषि ) शिक्षा- इन क्षेत्रों में उच्चतर माध्यमिक परीक्षा में प्राप्तांकों के आधार पर विद्यार्थी को प्रवेश दिया जाय। प्रतियोगिता परीक्षाएँ समाप्त की जाएँ ताकि विशाल धनराशि, लेखा सामग्री एवं ऊर्जा का अपव्यय और भ्रष्टाचार समाप्त हो। विद्यार्थियों को उपलब्ध स्थान के अनुसार  मनपसन्द शाखा तथा स्थान समाप्त होने पर उपलब्ध शाखा में प्रवेश लेना होगा। निजी अभियांत्रिकी महाविद्यालयों को शासन ने रियायती दर पर बहुमूल्य भूमि और अन्य सुविधाएँ उपलब्ध कराई हैं। इनके प्रबंधक प्राध्यापकों को न्यूनतम से काम पारिश्रमिक देकर उनका शोषण कर रहे हैं।  कम वेतन के कारण विषय के विद्वान् शिक्षक यहाँ नहीं हैं। औसत अंक लेकर उत्तीर्ण हुआ विषय का पूरा ज्ञान नहीं रखता तो वह विद्यार्थी को पूरा विषय कैसे पढ़ा सकता है? फलत: सा; दर साल अभियांत्रिकी उपाधिधारकों का स्तर निचे गिर रहा है। माननीय प्रधानमंत्री जी इस सन्दर्भ में कई बार चिंता व्यक्त कर चुके हैं। जिन निजी शैक्षणिक संस्थाओं के विद्यालय / महाविद्यालय घाटे में बताये जा रहे हैं उनसे शासन मूल कीमत देकर भूमि तथा वर्तमान मूल्यांकन के आधार पर भवन वापिस लेकर वहाँ अभियांत्रिकी या अन्य विषयों के शिक्षण संस्थान चलाए या भवनों का कार्यालय आदि के लिए उपयोग कर ले।   

१ १. तकनीकी शिक्षा का स्तर उठाने के लिये सभी परीक्षाएँ ऑन लाइन हों। प्रश्नों की संख्या अधिक रखी जाए ताकि नकल करना या प्रश्नोत्तरी किताबों से पढ़ने की प्रवृत्ति घटे और विषय की मुख्य पाठ्यपुस्तक से पूरी तरह पढ़े बिना उत्तीर्ण होना संभव न रहे। किसी विषय में शिक्षा प्राप्त युवा उसी क्षेत्र में सेवा या व्यापार कार्य करें। किसी पद के लिए निर्धारित से काम या अधिक योग्यता के उम्मीदवार विचारणीय न हों क्यों कि ऐसा न होने पर सामान योग्यताधारकों को समान अवसर के नैसर्गिक सिद्धांत का पालन नहीं हो पाता।  

१२. प्रशासनिक सेवाओं के अधिकारी तकनीकी क्षेत्र के कार्यों का प्रबंधन, मार्गदर्शन और नियंत्रण करते हैं इसलिए इन पदों के लिए तकनीकी शिक्षाधारी ही सुपात्र हैं। तकनीकी शिक्षा के पाठ्यक्रम में सम्बंधित विषय से जुड़े अथवा कार्यक्षेत्र में प्रयुक्त होनेवाले कानूनों, प्रबंधन शास्त्र, लेखा शास्त्र तथा प्रशासन कला से जुड़े प्रश्न पत्र जोड़े जाएँ ताकि तकनीकी स्नातक कार्य क्षेत्र में इनसे जुडी जिम्मेदारियों को सुचारू रूप से वहन कर सकें। तकनीकी उपाधि के समान्तर प्रबंधन और प्रशासन की उपाधि का अध्ययन कराया जा सकें तो ५ वर्ष की समयावधि में दो उपाधिधार युवक को अवसर प्राप्ति अधिक होगी।  

१३. शासकीय कार्य विभागों में ठेकेदारी हेतु अभियांत्रिकी में स्नातक होना अनिवार्य हो ताकि गैर तकनीकी ठरकेदारों से कार्य की गुणवत्ता न गिरे।

१४. अभियांत्रिकी पाठ्यक्रमों में मानक संहिताओं को सम्मिलित किया जाए। नेशनल बिल्डिंग कोड आदि विद्यार्थियों को रियायती मूल्य पर अनिवार्यत: दिए जाएँ।

१५. अभियंताओं की सर्वोच्च संस्थाओं इंस्टीट्यूशन ऑफ़ इंजीनियर्स, इन्डियन जियोटेक्निकल सोसायटी, इंडियन अर्थक्वैक सोसायटी आदि की मदद से पाठ्यक्रमों का पुनर्निर्धारण हो।  पूरे देश में एक समान पाठ्यक्रम हो। 

१६. इंस्टीट्यूशन ऑफ़ इंजीनियर्स के केंद्रों में सदस्य अनुभवी अभियंता होते हैं उनके कौशल और ज्ञान का उपयोग शासकीय योजनाओं के प्रस्ताव बनाने, कार्यों के पर्यवेक्षण, मूल्यांकन, संधारण आदि में किया जा सकता है। सेवानिवृत्त अभियंताओं की योग्यता का लाभ देश और समाज के लिये लिया जा सकता है। 

१७. प्राकृतिक आपदाओं तथा संकट काल का सामना करने  विशेष प्रविधियों की आवश्यकता होती है।  ऐसे समय में हर नागरिक की भूमिका महत्वपूर्ण तथा अन्यों की जीवन बचने में महत्वपूर्ण होती है। सभी पाठ्यक्रमों में आपदा प्रबंधन  तथा सामान्य स्वास्थ्य रक्षा सम्बन्धी सामग्री जोड़ी जाए। 

१८. सभी पाठ्यक्रमों में शिक्षा का माध्यम हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाएँ हों। अंग्रेजी की भूमिका क्रमश: समाप्त की जाए। 

मुझे आशा ही  विश्वास है की सुझावों पर विचार कर समुचित निर्णय लिए जायेंगे। इस सम्बन्ध में किसी भी प्रकार का सहयोग कर प्रसन्नता होगी।    
                                                                                         एक नागरिक 
                                                       अभियंता संजीव वर्मा 'सलिल'
                                                                  अधिवक्ता उच्च न्यायालय मध्य प्रदेश 
समन्वयम २०४ विजय अपार्टमेंट,  नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१
salil.sanjiv@gmail.com -चलभाष ९४२५१८३२४४

व्यंग्य लेखांश : ‘भगत की गत’ हरिशंकर परसाई

व्यंग्य लेखांश :
‘भगत की गत’ 
हरिशंकर परसाई जी 
*
...एक भगत ने मरने के बाद भगवान के पास जाकर स्वर्ग की डिमांड की, फिर क्या हुआ ......
प्रभु ने कहा- तुमने ऐसा क्या किया है, जो तुम्हें स्वर्ग मिले?
भगतजी को इस प्रश्न से चोट लगी। जिसके लिए इतना किया, वही पूछता है कि तुमने ऐसा क्या किया! भगवान पर क्रोध करने से क्या फायदा- यह सोचकर भगतजी गुस्सा पी गये। दीनभव से बोले- मैं रोज आपका भजन करता रहा।
भगवान ने पूछा- लेकिन लाउड-स्पीकर क्यों लगाते थे?
भगतजी सहज भव से बोले- उधर सभी लाउड-स्पीकर लगाते हैं। सिनेमावाले, मिठाईवाले, काजल बेचने वाले- सभी उसका उपयोग करते हैं, तो मैंने भी कर लिया।
भगवान ने कहा- वे तो अपनी चीज का विज्ञापन करते हैं। तुम क्या मेरा विज्ञापन करते थे? मैं क्या कोई बिकाऊ माल हूं।
भगतजी सन्न रह गये। सोचा, भगवान होकर कैसी बातें करते हैं।
भगवान ने पूछा- मुझे तुम अन्तर्यामी मानते हो न?
भगतजी बोले- जी हां!
भगवान ने कहा- फिर अन्तर्यामी को सुनाने के लिए लाउड-स्पीकर क्यों लगाते थे? क्या मैं बहरा हूं? यहां सब देवता मेरी हंसी उड़ाते हैं। मेरी पत्नी मजाक करती है कि यह भगत तुम्हें बहरा समझता है।
भगतजी जवाब नहीं दे सके।
भगवान को और गुस्सा आया। वे कहने लगे- तुमने कई साल तक सारे मुहल्ले के लोगों को तंग किया। तुम्हारे कोलाहल के मारे वे न काम कर सकते थे, न चैन से बैठ सकते थे और न सो सकते थे। उनमें से आधे तो मुझसे घृणा करने लगे हैं। सोचते हैं, अगर भगवान न होता तो यह भगत इतना हल्ला न मचाता। तुमने मुझे कितना बदनाम किया है!
भगत ने साहस बटोरकर कहा- भगवान आपका नाम लोंगों के कानों में जाता था, यह तो उनके लिए अच्छा ही था। उन्हें अनायास पुण्य मिल जाता था।
भगवान को भगत की मूर्खता पर तरस आया। बोले- पता नहीं यह परंपरा कैसे चली कि भक्त का मूर्ख होना जरूरी है। और किसने तुमसे कहा कि मैं चापलूसी पसंद करता हूं? तुम क्या यह समझते हो कि तुम मेरी स्तुति करोगे तो मैं किसी बेवकूफ अफसर की तरह खुश हो जाऊंगा? मैं इतना बेवकूफ नहीं हूं भगतजी कि तुम जैसे मूर्ख मुझे चला लें। मैं चापलूसी से खुश नहीं होता कर्म देखता हूं।
***
टीप: वे भगवान् अवश्य कर्मदेव चित्रगुप्त रहे होंगे.

लघुकथा

लघुकथा :
सोई आत्मा 
*
मदरसे जाने से मना करने पर उसे रोज डाँट पड़ती। एक दिन डरते-डरते उसने पिता को हक़ीक़त बता ही दी कि उस्ताद अकेले में.....
वालिद गुस्से में जाने को हुए तो वालिदा ने टोंका गुस्से में कुछ ऐसा-वैसा क़दम न उठा लेना उसकी पहुँच ऊपर तक है।
फ़िक्र न करो, मैं नज़दीक छिपा रहूँगा और आज जैसे ही उस्ताद किसी बच्चे के साथ गलत हरकत करेगा उसकी वीडियो फिल्म बनाकर पुलिस ठाणे और अखबार नवीस के साथ उस्ताद की बीबी और बेटी को भी भेज दूँगा।
सब मिलकर उस्ताद की खाट खड़ी करेंगे तो जाग जायेगी उसकी सोई आत्मा।
****

लघुकथा
बीज का अंकुर
*
चौकीदार के बेटे ने सिविल सर्विस परीक्षा उत्तीर्ण कर ली। समाचार पाकर कमिश्नर साहब रुआंसे हो आये। मन की बात छिपा न सके और पत्नी से बोले बीज का अंकुर बीज जैसा क्यों नहीं होता?
अंकुर तो बीज जैसा ही होता है पर जरूरत सेज्यादा खाद-पानी रोज दिया जाए तो सड़ जाता है बीज का अंकुर। 
***


मुक्तक

मुक्तक 
*
दीपिका दे साथ तो हो अमावस में भी दिवाली।
माहेश्वरी महेश को भज आप होती उमा-काली।।
नित सृजन कर सृष्टि का सज्जित करे, पल-पल सँवारे

जो उसे नत शिर नमन, लौ बार उसके लिए ताली।।

*
हो गए हैं धन्य हम तो आपका दीदार कर 
थे अधूरे आपके बिन पूर्ण हैं दिल हार कर 
दे दिया दिल आपको, दिल आपसे है ले लिया
जी गए हैं आप पर खुद को 'सलिल' हम वार कर 

बह्रर 2122-2122-2122-212
*
बोलिये भी, मौन रहकर दूर कब शिकवे हुए
तोलिये भी, बात कह-सुन आप-मैं अपने हुए
मैं सही हूँ, तू गलत है, यह नज़रिया ही गलत
जो दिलों को जोड़ दें, वो ही सही नपने हुए

बह्रर 2122-2122-2122-212
*****
salil.sanjiv@gmail.com

लेख: नागपंचमी

लेख :
नागको नमन : 
संजीव 
*
नागपंचमी आयी और गयी... वन विभागकर्मियों और पुलिसवालोंने वन्य जीव रक्षाके नामपर सपेरों को पकड़ा, आजीविका कमानेसे वंचित किया और वसूले बिना तो छोड़ा नहीं होगा। उनकी चांदी हो गयी.
पारम्परिक पेशेसे वंचित किये गए ये सपेरे अब आजीविका कहाँसे कमाएंगे? वे शिक्षित-प्रशिक्षित तो हैं नहीं, खेती या उद्योग भी नहीं हैं. अतः, उन्हें अपराध करनेकी राह पर ला खड़ा करनेका कार्य शासन-प्रशासन और तथाकथित जीवरक्षणके पक्षधरताओंने किया है.
जिस देशमें पूज्य गाय, उपयोगी बैल, भैंस, बकरी आदिका निर्दयतापूर्वक कत्ल कर उनका मांस लटकाने, बेचने और खाने पर प्रतिबंध नहीं है वहाँ जहरीले और प्रतिवर्ष लगभग ५०,००० मृत्युओंका कारण बननेवाले साँपोंको मात्र एक दिन पूजनेपर दुग्धपानसे उनकी मृत्युकी बात तिलको ताड़ बनाकर कही गयी. दूरदर्शनी चैनलों पर विशेषज्ञ और पत्रकार टी.आर.पी. के चक्करमें तथाकथित विशेषज्ञों और पंडितों के साथ बैठकर घंटों निरर्थक बहसें करते रहे. इस चर्चाओंमें सर्प पूजाके मूल आर्य और नाग सभ्यताओंके सम्मिलनकी कोई बात नहीं की गयी. आदिवासियों और शहरवासियों के बीच सांस्कृतिक सेतुके रूपमें नाग की भूमिका, चूहोंके विनाश में नागके उपयोगिता, जन-मन से नागके प्रति भय कम कर नागको बचाने में नागपंचमी जैसे पर्वोंकी उपयोगिता को एकतरफा नकार दिया गया.
संयोगवश इसी समय दूरदर्शन पर महाभारत श्रृंखला में पांडवों द्वारा नागों की भूमि छीनने, फलतः नागों द्वारा विद्रोह, नागराजा द्वारा दुर्योधन का साथ देने जैसे प्रसंग दर्शाये गये किन्तु इन तथाकथित विद्वानों और पत्रकारों ने नागपंचमी, नागप्रजाजनों (सपेरों - आदिवासियों) के साथ विकास के नाम पर अब तक हुए अत्याचार की और नहीं गया तो उसके प्रतिकार की बात कैसे करते?
इस प्रसंग में एक दुर्भाग्यपूर्ण पक्ष यह भी है कि इस देशमें बुद्धिजीवी माने जानेवाले कायस्थ समाज ने भी यह भुला दिया कि नागराजा वासुकि की कन्या उनके मूलपुरुष चित्रगुप्त जी की पत्नी हैं तथा चित्रगुप्त जी के १२ पुत्रों के विवाह भी नाग कन्याओं से ही हुए हैं जिनसे कायस्थों की उत्पत्ति हुई. इस पौराणिक कथा का वर्ष में कई बार पाठ करने के बाद भी कायस्थ आदिवासी समाज से अपने ननिहाल होने के संबंध को याद नहीं रख सके. फलतः। खुद राजसत्ता गंवाकर आमजन हो गए और आदिवासी भी शिक्षित हुआ. इस दृष्टि से देखें तो नागपंचमी कायस्थ समाज का भी महापर्व है और नाग पूजन उनकी अपनी परमरा है जहां विष को भी अमृत में बदलकर उपयोगी बनाने की सामर्थ्य पैदा की जाती है.
शिवभक्तों और शैव संतों को भी नागपंचमी पर्व की कोई उपयोगिता नज़र नहीं आयी.
यह पर्व मल्ल विद्या साधकों का महापर्व है लेकिन तमाम अखाड़े मौन हैं बावजूद इस सत्य के कि विश्व स्तरीय क्रीड़ा प्रतियोगिताएं में मल्लों की दम पर ही भारत सर उठाकर खड़ा हो पाता है. वैलेंटाइन जैसे विदेशी पर्व के समर्थक इससे दूर हैं यह तो समझा जा सकता है किन्तु वेलेंटाइन का विरोध करनेवाले समूह कहाँ हैं? वे नागपंचमी को यवा शौर्य-पराक्रम का महापर्व क्यों नहीं बना देते जबकि उन्हीं के समर्थक राजनैतिक दल राज्यों और केंद्र में सत्ता पर काबिज हैं?
महाराष्ट्र से अन्य राज्यवासियों को बाहर करनेके प्रति उत्सुक नेता और दल नागपंचमई को महाराष्ट्र की मल्लखम्ब विधा का महापर्व क्यों कहीं बनाते? क्यों नहीं यह खेल भी विश्व प्रतियोगिताओं में शामिल कराया जाए और भारत के खाते में कुछ और पदक आएं?
अंत में सर्वाधिक महत्वपूर्ण तथ्य यह कि जिन सपेरों को अनावश्यक और अपराधी कहा जा रहा है, उनके नागरिक अधिकार की रक्षा कर उन्हें पारम्परिक पेशे से वंचित करने के स्थान पर उनके ज्ञान और सामर्थ्य का उपयोग कर हर शहर में सर्प संरक्षण केंद्र खोले जाए जहाँ सर्प पालन कर औषधि निर्माण हेतु सर्प विष का व्यावसायिक उत्पादन हो. सपेरों को यहाँ रोजगार मिले, वे दर-दर भटकने के बजाय सम्मनित नागरिक का जीवन जियें। सर्प विष से बचाव के उनके पारम्परिक ज्ञान मन्त्रों और जड़ी-बूटियों पर शोध हो.
क्या माननीय नरेंद्र मोदी जी इस और ध्यान देंगे?
*****
salil.sanjiv@gmail.com

नवगीत - बारिश

नवगीत 
*
बारिश तो अब भी होती है 
लेकिन बच्चे नहीं खेलते. 
*
नाव बनाना 
कौन सिखाये?
बहे जा रहे समय नदी में.
समय न मिलता रिक्त सदी में.
काम न कोई
किसी के आये.
अपना संकट आप झेलते
बारिश तो अब भी होती है
लेकिन बच्चे नहीं खेलते.
*
डेंगू से भय-
भीत सभी हैं.
नहीं भरोसा शेष रहा है.
कोई न अपना सगा रहा है.
चेहरे सबके
पीत अभी हैं.
कितने पापड विवश बेलते
बारिश तो अब भी होती है
लेकिन बच्चे नहीं खेलते.
*
उतर गया
चेहरे का पानी
दो से दो न सम्हाले जाते
कुत्ते-गाय न रोटी पाते
कहीं न बाकी
दादी-नानी.
चूहे भूखे दंड पेलते
बारिश तो अब भी होती है
लेकिन बच्चे नहीं खेलते.
*
salil.sanjiv@gmail.com
#दिव्यनर्मदा