दिव्य नर्मदा : हिंदी तथा अन्य भाषाओँ के मध्य साहित्यिक-सांस्कृतिक-सामाजिक संपर्क हेतु रचना सेतु A plateform for literal, social, cultural and spiritual creative works. Bridges gap between HINDI and other languages, literature and other forms of expression.
कुल पेज दृश्य
रविवार, 24 दिसंबर 2017
janak chhand
janak chhand
पुरोवाक:ओझल रहे उजाले
आँखों में घड़ियाली आँसू
बगुले करते जाप।
रंग बदलते-
गिरगिट देखे ,
आसमान में साँप।
चमक-दमक,
कीकर की लगती,
जैसे हो सागौन।
.
मौसम गुंडा-
गर्दी करता
आदमखोर हवाएँ।
संवेदन की लाशें ढोतीं
कपटी शोकसभाएँ।
श्रम सीकर के
हरे घाव पर
लेपन करते लौन।
विजय का युवा मन समस्याओं को सुलझाने की प्रयास करता है और समाधान के रास्तों पर अवरोधों को देखकर कुंठित नहीं होता, वह व्यवस्था परिवर्तन का उद्देश्य लेकर कमियों को निडरता से इंगित करता है-
समाधान के दरवाज़े पर
लटक रहे हैं ताले।
.
जिरह पेशियाँ, कूट दलीलें
ढोती रोज कचहरी।
कैद फाइलों की कारा में,
अर्जी गूँगी-बहरी।
छद्म गवाही देनेवाले
गुंडे डेरा डाले।
.
सजी वकीलों की दूकानें
प्रतिष्ठान पंडों के।
बड़े-बड़े दफ्तर फरेब के
लहराते झंडों के।
मुंशी चपरासी लगते हैं
जैसे जीजा-साले।
जीवन के दरवाजे पर ताले लटकने के साथ-साथ दफ्तर की खिड़की भी बंद हो तो स्थिति बद से बदतर और गंभीर हो जाती है-
जीवन के
दफ़्तर की खिड़की
कब से नहीं खुली।
हठधर्मी के
ताले लटके,
सदियाँ बीत गईं।
मनुहारें करतीं
आँखों की
झीलें रीत गईं।
खुसुर-फुसुर
कर रहीं कुर्सियाँ,
मेजें मिलीं-जुलीं।
.
दीवारों पर
शीश पटकती,
मन की उथल-पुथल।
संदूकों में
बंद अपीलें,
कुंठित अगल-बगल।
टूट रही
बूढ़ी साँसों की,
हिम्मत नपी-तुली।
तमाम विसंगतियों और विडंबनाओं के बावजूद ज़िंदगी दर्द का दस्तावेज मात्र नहीं है, उसमें अन्तर्निहित आनंद की अनुभूतियाँ उसे जीने योग्य बनाये रखती हैं। विजय इस जीवनानंद को नवगीत का अलंकार बनाते हैं-
एक बदरिया
अँगना उतरी
छानी मार रही किलकारी।
.
कोयल मंगल-
गान सुनाती,
अमराई में रास रचाती।
चौमासे की-
शगुन पत्रिका
बाँच रही पुरवा लहराती।
बट-पीपर
आलिंगन करते,
पाँव-पखार रही फुलवारी।
.
भींज रही
पनघट पे गोरी,
उर अनुरागी चाँद-चकोरी।
ताँक-झाँक
कर रही बिजुरिया,
नैन मटक्का चोरा-चोरी।
बहुत दिनों के-
बाद दिखी हैं,
धरती की आँखें कजरारी।
रस को नवगीत का प्राणतत्व माननेवाले विजय नीरसता को किनारे कर सरसता की गगरी नवगीतों की पंक्ति-पंक्ति में उड़ेलने की सामर्थ्य रखते हैं-
मेरे गीत,
तुम्हारे मन की-
गलियों से जब गुजर रहे थे।
कर सोलह-
श्रृंगार सुहाने,
सपन सलोने सँवर रहे थे।
अधर-अधर-
दोहा चौपाई,
नज़र-नज़र कुण्डलिया रागी।
धड़कन-धड़कन
राग बसंती,
कल्याणी कविता अनुरागी।
.
कंठ-कंठ से
कलकंठी के,
सरगम के स्वर उतर रहे थे।
.
विजय के नवगीतों में मौलिक बिंबों की छटा देखते ही बनती है-
सूरज की
बूढ़ी आँखों में,
गहन मोतियाबिंद हुआ.
खेल रही है
धवल चाँदनी,
अँधियारे के साथ जुआ।
.
भिनसारे का
कुटिल कुहासा,
धुआँधार तेजाबी है।
मलय पवन
के, नैंन नशीले,
अटपट चाल शराबी है।
मौसम की
मादक नीयत से,
टपक रहा जैसे महुआ।
.
आधुनिक समाज में छद्म मुखौटा लगाने का प्रचलन इतना बढ़ गया है कि खाने से अधिक फेंकनेवाले भुखमरी पर पोथियाँ भरे जा रहे हैं जबकि भुखमरी की कगार पर खड़ा कर दिया गया आम जन तमाम अभावों से घिरा हुआ होकर भी पर्व-त्यौहार का आनंद ले-दे पाता है। विजय 'आजकल / कितनी विकल है / सभ्यता की नव सदी' 'लिख रहा / इतिहास गोया / रुग्णता की नव सदी' और 'हो रही / पत्थर ह्रदय / स्वच्छंदता की नव सदी' लिखकर विसंगतियाँ मात्र उद्घाटित नहीं करते अपितु 'कब पुजेगी / उल्लसित / उत्कृष्टता की नव सदी' लिखकर मुखौटों को उतारकर अकृत्रिमता की प्रतिष्ठा किये जाने का आव्हान भी करते हैं
नवगीत में मैंने अपने नाम या उपनाम का प्रयोग उनके शब्दकोशीय अर्थ में किया है। 'चुप्पियों के गाँव में' शीर्षक नवगीत में विसंगतियों को उद्घाटित करने के साथ विजय ने भी अपने नाम / उपनाम का प्रयोग अंतिम पंक्ति में किया है। कवि के नाम या उपनाम को रचना में प्रयोग करने की यह परंपरा लोकगीतों तथा भक्ति काव्य से होते हुए उर्दू ग़ज़ल में 'तखल्लुस' के रूप में अपनी गयी।
थरथराते
मौसमी मनुहार के,
गीत घायल
चुप्पियों के गाँव में।
चूम रहे काँटे,
अंधेरों के कुटिल,
दिन दहाड़े, रौशनी के पाँव में।
ऋतुमती पछुआ
हवा-आसक्त उर,
सिद्धपीठों के पुजारी हो गए....
.... सभ्यता के
आचरण बगुलामुखी,
संस्कारों के शिकारी हो गए।
राजमहलों के
उजाले भी 'विजय'
आजकल षड्यंत्रकारी हो गए।
विजय के इन नवगीतों की भाषा बुंदेलखंड के कस्बों में प्रयुक्त हो रही आम बोलचाल की भाषा है। आधुनिक हिंदी का शुद्ध स्वरूप इनमें दृष्टव्य है। यह भाषा खड़ी हिंदी, बुंदेली, संस्कृत, देशज, उर्दू तथा अंगरेजी शब्दों के यथावश्यक शब्दों के मेल-जोल से बनाती है जिसमें व्याकरणिक नियम हिंदी के प्रयोग किये जाते हैं। विजय ने अंगरेजी शब्दों का प्रयोग (अपवाद नैट-चैट, टी. वी., मोबाइल) नहीं किया है। यह उनका वैशिष्ट्य है। संस्कृत निष्ठ शब्दों में स्वच्छंद, उद्घोष, निर्वासन, उल्लसित, कुम्भज, उदधि, गन्तव्य, मर्माहत, अहर्निश, विहंगम, अगोचर, अविरल, अभ्युत्थान, प्रहर्षित, हेमवर्णी, अंतर्व्यथा, निदाघ, नयनोदक, स्वस्तिवाचन, अंतर्तिमिर, शब्दातीत, तमासावृत्त, संसृति, प्रभंजन, संकल्पनाएं, प्रक्षालित, प्रनिपतों, पुलकावली, वल्लरियाँ आदि से देशज बुन्देली शब्द अवां, होरा, चौमासा, खुसुर-फुसुर, भिनसारा, बतकहाव, बदरिया, भींज, बिजुरिया, बखर, माटी, नेंगचार, बूंदाबारी, चिरैया, बिलोना, कुठारी, भिनसारे, पहरुए, बिछुआ, दुपहरिया, टकोरे, छतनारी, परपंच, लगैया, को है, समुहानी, सपन, बौराने, ठकुरसुहाती, कमरिया, ओसारे, गठरिया, धुंधुवाती, नदिया, राम रसोई, चौंतरा, रामजुहारें आदि गले मिलते हुए कथ्य को सरस और ह्रदयग्राही बनाते हैं। उर्दू शब्द इम्तिहान, दफ्तर, नजरें, ज़हर, दुआ-सलाम, वक्त, सैलाब, परवाज़, रौशनी, ज़िंदगी, गर्द-गुबार, तेजाबी, नुक्ताचीनी, सरेआम, मशहूर, पनाह, नागवार, दस्तूर, सबक, मगरूर, गुस्ताखी, बगावत, अदावत, मासूम, निशाना, दिल, अरमानों, नासूर, जिगर, गाफिल, सिरफिरे, मातमपुरसी, नफरत, फ़कीर, तस्वीर, दागी, महबूब, बड़ा, मुनादी, अहसासों, हुकूमत, पर्दाफाश, फरेबी, हलाकान, मगरूर, तहकीकातों, तबाही, सवालों, बाज़ार, आबरू, तनहाइयों, शोखियाँ वगैरह हमारी गंगो-जमुनी विरासत को आगे बढ़ाते हैं।
इस कृति के गीतों-नवगीतों में हिंदी के व्याकरण नियमों का पालन उचित ही किया गया है। उर्दू शब्दों के बहुवचन हिंदी व्याकरण के अनुसार हैं। जैसे- नजरें, अरमानों, अहसासों, तहकीकातों, सवालों, शोखियाँ आदि। कथ्य की सरसता में जन की जुबान पर चढ़े मुहावरों यथा- छाती पर होरा भूंजना, नैन मटक्का, घर का भेदी लंका ढाए, ठिकाने लगाना, जंगल में मंगल आदि वृद्धि की है।
इस दशक के नवगीतकारों की भाषा शैली में में पूर्ववर्तियों की तुलना में दो नए रुझान बहुलता से शब्द-युग्मों का प्रयोग तथा शब्दावृत्तियों का प्रयोग देखने में आ रहे हैं। अपने नवगीत संग्रह 'काल है संक्रांति का' में मैंने शब्द-युग्मों तथा शब्दवृत्ति के प्रयोग किए हैं। इससे कथ्य के भाषिक-प्रवाह, लयात्मकता, सरसता तथा लोकरंजकता में वृद्धि होती है। विजय के नवगीत भी इन रुझानों से युक्त हैं। इस कृति में प्रयोग किये गए शब्द युग्मों में कुछ पारंपरिक किंतु अनेक सर्वथा नवीन हैं। मन-मतंग, हरा-भरा, धूल-धूसरित, सावन-भादों, दीन-हीन, खेतों-खलिहानों, राग-द्वेष, मान-मनौती, बाहर-भीतर, उथल-पुथल, सज-धज, पल-छिन, साँझ-सकारे, मेल-मुलाकातें, व्यथा-कथा, खेत-खलिहान, घाट-प्रतिघात, नेट-चैट, राम-रसोई, सुचिता-सच्चाई, रात-दिन, देह-पिंजरे, प्राण-पंछी, सुर-टाल, उमड़-घुमड़, दादुर-चातक, लपक-झपक, शब्द-अर्थ, लोक-लाज, हेल-मेल, रंग-बिरंगी, माया-मृग, मन-गन, तर्क-वितर्क, खंडन-मंडन, खेल-खिलौने, धरती-अम्बर, चाँद-सितारों, नदिया, पनघट, भूख-प्यास, चाँद-चकोरी, ताक-झाँक, चोरा-चोरी, मेघ-मल्हार, काल-कवलित, संगी-साथी, कुटुम-कबीले, पल-छिन, हरी-भारी, कोर-किनारे, हँसी-ठहाके, ठौर-ठिकाने, मन-मधुबन, सोलह-श्रृंगार, सपन-सलोने, दोहा-चौपाई, दुखी-निराश, सरित-सरोवर, उमड़-घुमड़, दर्द-पीर, वयः-कथा, गुना-भाग, रिश्ते-नातों, हर्ष-उल्लास, गर्द-गुबार, पुष्कर-पुण्डरीक, तुलसी-चौरे, विषय-वासना, नून-तेल, माखन-मिसरी, धक्का-मुक्की, भीड़-भाद, हाथा-पाई, ताना-बना, लुटे-पिटे, सृष्टि-दृष्टि, संत-कंत, गीत-प्रीत, नेह-गह, हेल-मेल, भूखी-प्यासी, हेरा-फेरी, जोड़-घटना, ज्ञान-ध्यान, पूजा निष्ठा, मन-मंदिर, रंग-भंग, छल-छंद, कुआँ-बावली, लू-लपट, भूखी-प्यासी, तट-तरुवर, मथुरा-काशी, माघ-पूस, जोगन-बैरागन, नाप-तौल, हँसी-खुशी, चाल-चलन, सुख-शांति, चाँद-तारे, घात-प्रतिघात, महकी-चहकी, कपट-कौशल, माघ-पूस, खात-बिछौना, छल-बल, संझा-बाती, गाँव-शहर, दावानल-पतझर, हानि-लाभ, सुख-दुःख, चहल-पहल, भूल-भूलैंया, नोंक-झोंक, रुदन-मुस्कान, छल-छंद-चतुरी, वर्ष-मास-दिन, सत्यं-शिवं-सुन्दरं आदि-आदि शब्द युग्म कथ्य की अर्थवत्ता तथा वाचिक सौन्दर्य की वृद्धि कर रहे हैं।
यह कृति शब्दावृत्तियों के प्रयोग की दृष्टि से भी समृद्ध है। शब्दावृत्ति से आशय किसी शब्द के दो बार प्रयोग करने से है। ऐसा कथ्य पर अतिरिक्त जोर देने के लिए किया जाता है। इससे उत्पन्न पुनरावृत्ति अलंकार भाषिक तथा वाचिक सौन्दर्य वर्धक होता है। विजय ने अधर-अधर, नज़र-नज़र, धड़कन-धड़कन, कंठ-कंठ, लहर-लहर, अंग-अंग, छंद-छंद, रोम-रोम, किरण-किरण, अंग-अंग, गात-गात, कण-कण, पात-पात, पोर-पोर, पनघट-पनघट, धड़कन-धड़कन, पोर-पोर, फूंक-फूंक, लहर-लहर, घाट-घाट, कली-कली, दर-दर, धार-धार, लौट-लौट, पल-पल, चुपके-चुपके, रात-रात, करवट-करवट, शब्द-शब्द, उलट-उलट, अभी-अभी, जनम-जनम, सहते-सहते, कदम-कदम, कहीं-कहीं, किराचा-किराचा, सर-सर, पोर-पोर, जन-जन, चेहरे-चेहरे, तौबा-तौबा, प्रश्न-प्रशन, अक्षर-अक्षर, क्रंदन-क्रंदन, सींच-सींच, कुहू-कुहू, चुपके-चुपके, बूँद-बूँद, घाट-घाट, तिनका-तिनका, गली-गली, घर-घर, ऊँचे-ऊँचे, रिमझिम-रिमझिम, पोर-पोर, मंद-मंद, पट्टा-पट्टा, क्या-क्या, कभी-कभी, चूर-चूर, कण-कण, सांय-सांय, माखन-मिसरी, चाल-चरित्र आदि शब्दावृत्तियों का सार्थक-सटीक प्रयोग कर गीति रचनाओं को अर्थवत्ता प्रदान की है।
युवा नवगीतकार अपने परिवेश और पर्यावरण के प्रति सचेत है। नवगीतों में वट, पीपल, अमराई, कचनार, केतकी, सरसों, हरसिंगार, पलाश, मोगरा, मंजरियाँ, फुलवारी आदि अपनी सुषमा यथास्थान बिखेर रहे हैं। कोयल, चिरैया, मैना, दादुर, चातक, बैल आदि पात्र ग्राम्यांचली परिवेश को जीवंत कर रहे हैं। यह नवगीतकार अपनी अभिव्यक्ति सामर्थ्य के बाल पर कम से कम शब्दों में अधिक से अधिक कहने की पारंपरिक विरासत को सम्हाल सका है। पंख थकावट ओढ़े / बैठे, परवाजें संकट में पारिस्थिक विवशता, धूप पसीना पोंछ रही में विरोधाभास, चटनी-रोटी / खाते-खाते गयी ज़िंदगी ऊब में निराशा, बीजों से / जब अंकुर फूटे /खेतों ने श्रृंगार किया तथा उम्मीदों की / खोल खिड़कियाँ / मुखरित हुईं मचाने में आशावाद, उठ भिनसारे / विहग-स्वरों ने / गीतों का गुंजार किया तथा छलक उठे प्यासे अधरों से / प्रीति पेय, नवगीत तुम्हारे में श्रृंगार, रौशनी के तामसी / बरताव पर, मैं चुप रहूँ में दुविधा, नेताओं के / बतकहाव से / झरने लगे बताशे में राजनैतिक हलचल, हेरा-फेरी / के चक्कर में / चोरों के सरदार में सामाजिक वातावरण, खोटे सिक्के / चाल-चलन से / हुए बहुत मगरूर में सटीक बिम्बात्मकता, बेशर्मी की / मोटी खालें / सत्ता का दस्तूर में शासन के प्रति घटती जनास्था, वक्त छोड़कर / चला गया कुछ / तहकीकातें नयी-नयी में राजनैतिक भ्रष्टाचार, रात काटती / जलती बीडी / टूटा छप्पर, टाट-बिछौना में ग्रामीण विपन्नता, रोज दिहाड़ी / मारी जाती / सरे-आम छल-बल से में श्रमिक शोषण, चले शहर की / ओर गाँव की / पगडंडी के पाँव में ग्रामीण पलायन, कहीं-कहीं / छल-छंद-चातुरी / भला करे भगवान् में पारंपरिक भाग्यवादिता, दहक रही है / अंगारों में / मधुमासी तरुणाई में युवाओं के समक्ष उपस्थित विषम परिस्थितियाँ, बदल रही / चिन्तन की भाषा / मूल्यों का अनुवाद में सतत बदलते मूल्य, कितनी बरसातों / ने आकर / पूछा कभी हिसाब में प्रकृति की उदारता, नैट-चैट / टी. वी., मोबाइल / का जूनून, लादे सर पर / राम-रसोई / अंतर्पुर तक / विज्ञापन की गिद्ध नज़र में हावी होता बाजारवाद, उमड़-घुमड़ / कर बदरा छाए / नाचन लागे मोर में ऋतु-परिवर्तन, बंदनवार / सजें गीतों के / आभूषित अनुप्रास से में लोक की उत्सवधर्मिता, ज़िंदगी ही/ जिंदगी का / आखिरी पैगाम में जिजीविषा शब्दित होकर पाठक को रचनाओं से एकात्मकता स्थापित करने में सहायक है।
'चुप्पियों के गाँव में' समय-साक्षी गीति-रचनाओं (गीत-नवगीत) का गुलदस्ता है जिसमें नाना प्रकार के पुष्प अपने रूप, रंग, सुरभि की नैसर्गिक छटा से पाठक को मंत्र-मुग्ध कर जीवन की विषमताओं के चक्रव्यूह से उपजी पीड़ा और दर्द के संत्रास को सहने, उससे बाहर निकलने के आस्था-दीप को जलाये रखने तथा अभिमन्यु की तरह जूझने की प्रेरणा देता है। नर्मदांचली लोक जीवन की सहज-सरस बानगी समेटे गीत-पंक्तियों से स्वस्थ्य जन-मन-रंजन करने की दिशा में कलम चलाता युवा रचनाकार अपनी भाषिक सामर्थ्य, शैल्पिक कौशल, छान्दस नैपुण्य तथा अभिव्यक्ति क्षमता से अपने उज्जवल भविष्य के प्रति आश्वस्त करता है। मुझे भरोसा है कि यह कृति वरिष्ठों से शुभाशीष, हमउम्रों से समर्थन और कनिष्ठों से सम्मान पाकर विजय की कलम से नयी नवगीत संकलनों के प्रागट्य की आधार शिला बनेगी।
विश्व वाणी हिंदी संस्थान आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
४०१, विजय अपार्टमेंट,
सुभद्रा वार्ड, नेपियर टाउन,
जबलपुर ४८२००१,
salil.sanjiv@gmail.com
९४२५१८३२४४ / ७९९५५५९६१८
geet
*
आ! सिरहाने रख यादों को,
सपनों की चादर पर सोएँ।
तकिया ले तेरी बाँहों का,
सुधियों की नव फसलें बोएँ।
*
अपनेपन की गरम रजाई,
शीत-दूरियाँ दूर भगा दे.
मतभेदों की हर सलवट आ!
एक साथ मिल परे हटा दे।
बहुत बटोरीं खुशियाँ अब तक
आओ! लुटाएँ, खुशियाँ खोएँ।
आ! सिरहाने रख यादों को,
सपनों की चादर पर सोएँ।
*
हँसने और हँसाने का दिन
बीत गया तो करें न शिकवा।
मिलने, ह्रदय मिलाने की
घड़ियों का स्वागत कर ले मितवा!
ख़ुशियों में खिलखिला सके तो
दुःख में मिलकर नयन भिगोएँ।
आ! सिरहाने रख यादों को,
सपनों की चादर पर सोएँ।
.*
प्रतिबंधों का मठा बिलोकर
अनुबंधों का माखन पा लें।
संबंधों की मिसरी के सँग
राधा-कान्हा बनकर खा लें।
अधरों-गालों पर चिपका जो
तृप्ति उसी में छिपी, न धो लें।
आ! सिरहाने रख यादों को,
सपनों की चादर पर सोएँ।
*
२४-१२-२०१७
शुभ कामना
सुजाता का हाथ थामे,
ललित चल जीवन सफ़र पर,
अग्र हैं,
वैभव मिले हर
शिखा दे घर खुशी से भर.
तरुण सपने लिए सौरभ
मधु मिठाई ला खिलाए.
प्रिय! जियो शत वर्ष हँसकर
कीर्ति-यश दस दिशा गाए.
.
षष्ठी पूर्ति शुभ कामना
कह रहा है आज सूरज
.
सुजाता आई जगाने
अग्र होजा.
साठ को ले मान सोलह
व्यग्र होजा.
श्वास हर कर ले प्रदीपित
तरुण होकर-
मधु कलश ले साथ सौरभ
आस बोकर.
शिखा वैभव की बहाए
स्नेह सलिला
नर्मदा में नहाकर,
सुख गले मिल जा.
दोहा दुनिया
शिव ने विष पीकर किया,
त्रिभुवन का कल्याण.
सुर नर असुरों को मिला,
भव-बाधा से त्राण.
.
ज़हर कंठ में रोककर,
नीलकंठ पा नाम.
अमर हो गए सदाशिव,
अग-जग करे प्रणाम.
.
ज़हर-ज़हर को काटता,
नीलकंठ में नाग.
नाच-नाच फ़ुन्फ़कारता,
उगल-शांत कर आग.
.
कुंडलिनी के चक्र हों,
जागृत अपने आप.
नाग कुंडली मारकर,
करता शिव-शिव जाप.
.
विषधर विष तज शिव भजे,
पूजें सुर नर नित्य.
अमृत बाँटे शशि पुजे,
शिवा अनादि-अनित्य.
.
नागपंचमी पर पुजे,
नित घर-घर में नाग.
विष-अमृत के मेल से,
जीवन में हो राग.
.
23.12.2017
शनिवार, 23 दिसंबर 2017
navgeet
*
नए साल में
हर दिन देना
बिना टैक्स
मुस्कान नयी तुम
*
हुई नोट-बंदी तो क्या गम?
बिन नोटों के नैन लड़ा लें.
क्या जानें राहुल-मोदीजी
हम बातों से क्या सुख पालें?
माया, ममता, उमा न जानें
द्वैत मिटाया जाता कैसे?
गहें हाथ में हाथ, साथ रह
हम कुटिया में महल बसा लें.
हर दिन मुझको
पडीं दिखाई
नव सद्गुण की
खान नयी तुम
*
यह मुस्कान न काली होती
यह मुस्कान न जाली होती
अधरों की यह शान सनातन
कठिनाई में खुशियाँ बोती
बेच-खरीद न सकता कोई
नहीं जमाखोरी हो सकती
है निर्धन का धन, जाड़े में
ज्यों चैया की प्याली होती
ऋचा-मन्त्र सी
निर्मल पावन
बम्बुलिया की
तान नयी तुम
*
काम न बैंकों की कतार से
कोई न नाता है उधार से
कम से कम में काम चलाना
जग सीखे तुम समझदार से
खर्च किया कम, बचत करी जो
निर्बल का बल बने समय पर
सुने न कोई कान लगाकर
दूरी रखना तुम दिवार से
कभी न करतीं
बहिष्कार जो
गृह-संसद की
शान नयी तुम
****
२३-१२-२०१६
navgeet
संजीव
नये बरस की
भोर सुनहरी
.
हरी पत्तियों पर
कलियों पर
तुहिन बूँद हो
ठहरी-ठहरी
ओस-कुहासे की
चादर को चीर
रवि किरण
हँसे घनेरी
खिड़की पर
चहके गौरैया
गाये प्रभाती
हँसे गिलहरी
*
लोकतंत्र में
लोभतंत्र की
सरकारें हैं
बहरी-बहरी
क्रोधित जनता ने
प्रतिनिधि पर
आँख करोड़ों
पुनः तरेरी
हटा भरोसा
टूटी निष्ठा
देख मलिनता
लहरी-लहरी
.
नए सृजन की
परिवर्तन की
विजय पताका
फहरी-फहरी
किसी नवोढ़ा ने
साजन की
आहट सुन
मुस्कान बिखेरी
गोरे करतल पर
मेंहदी की
सुर्ख सजावट
गहरी-गहरी
***
navgeet
नए साल
मत हिचक
बता दे क्या होगा?
.
सियासती गुटबाजी
क्या रंग लाएगी?
'देश एक' की नीति
कभी फल पायेगी?
धारा तीन सौ सत्तर
बनी रहेगी क्या?
गयी हटायी
तो क्या
घटनाक्रम होगा?
.
काशी, मथुरा, अवध
विवाद मिटेंगे क्या?
नक्सलवादी
तज विद्रोह
हटेंगे क्या?
पूर्वांचल में
अमन-चैन का
क्या होगा?
.
धर्म भाव
कर्तव्य कभी
बन पायेगा?
मानवता की
मानव जय
गुंजायेगा?
मंगल छू
भू के मंगल
का क्या होगा?
*
haiku
संजीव
.
मन मोहतीं
धूप-छाँव दोनों ही
सच सोहतीं
.
गाँव न गोरी
अब है सियासत
धनी न धोरी
.
तितली उड़ी
पकड़ने की चाह
फुर्र हो गयी
.
ओस कणिका
मुदित मुकुलित
पुष्प कलिका
.
कुछ तो करें
महज आलोचना
पथ न वरें
*
doha salila
संजीव
प्रेम चंद संग चाँदनी, सहज योग हो मीत
पानी शर्बत या दवा, पियो विहँस शुभ रीत
.
रख खातों में ब्लैक धन, लाख मचाओ शोर
जनगण सच पहचानता, नेता-अफसर चोर
.
नया साल आ रहा है, खूब मनाओ हर्ष
कमी न कोशिश में रहे, तभी मिले उत्कर्ष
.
चन्दन वंदन कर मने, नया साल त्यौहार
केक तजें, गुलगुले खा, पंचामृत पी यार
.
रहें राम-शंकर जहाँ, वहाँ कुशल भी साथ
माता का आशीष पा, हँसो उठकर माथ
.
kundalini
संजीव
.
क्यों किशोर शर्मा कहे, सही न जाए शीत
च्यवनप्राश खा चुनौती, जीत बने नव रीत
जीत बने नव रीत, जुटाकर कुनबा अपना
करना सभी अनीत, देख सत्ता का सपना
कहे सलिल कविराय, नाचते हैं बंदर ज्यों
नचते नेता पिटे, मदारी स्वार्थ बना क्यों?
*
हुई अपर्णा नीम जब, तब पाती नव पात
कली पुष्प फिर निंबोली, पा पुजती ज्यों मात
पा पुजती ज्यों मात, खरे व्यवहार सिखाती
हैं अनेक में एक, एक में कई दिखाती
माता भगिनी सखी संगिनी सुता नित नई
साली सलहज समधन जीवन में सलाद हुई
*
shatpadee
संजीव
.
है समाज परिवार में, मान हो रहे अंध
जुट समाजवादी गये, प्रबल स्वार्थ की गंध
प्रबल स्वार्थ की गंध, समूचा कुनबा नेता
घपलों-घोटालों में माहिर, छद्म प्रणेता
कथनी-करनी से हुआ शर्मसार जन-राज है
फ़िक्र न इनको देश की, संग न कोई समाज है
*
navgeet
संजीव
.
कुण्डी खटकी
उठ खोल द्वार
है नया साल
कर द्वारचार
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छोडो खटिया
कोशिश बिटिया
थोड़ा तो खुद को
लो सँवार
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श्रम साला
करता अगवानी
मुस्का चहरे पर
ला निखार
.
मंज़िल मैया
देते आशिष
पल-पल हजार
.
navgeet
संजीव
नये बरस की
भोर सुनहरी
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हरी पत्तियों पर
कलियों पर
तुहिन बूँद हो
ठहरी-ठहरी
ओस-कुहासे की
चादर को चीयर
रवि किरण
हँसे घनेरी
खिड़की पर
चहके गौरैया
गाये प्रभाती
हँसे गिलहरी
*
लोकतंत्र में
लोभतंत्र की
सरकारें हैं
बहरी-बहरी
क्रोधित जनता ने
प्रतिनिधि पर
आँख करोड़ों
पुनः तरेरी
हटा भरोसा
टूटी निष्ठा
देख मलिनता
लहरी-लहरी
.
नए सृजन की
परिवर्तन की
विजय पताका
फहरी-फहरी
किसी नवोढ़ा ने
साजन की
आहट सुन
मुस्कान बिखेरी
गोर करतल पर
मेंहदी की
सुर्ख सजावट
गहरी-गहरी
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