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सोमवार, 22 सितंबर 2014

vimarsh: ucharan truti, maryada, vishwas -sanjiv

विमर्श: 
उच्चारण-त्रुटि दंडनीय क्यों???
संजीव 
*
भारत में विविध भाषा कुल के लोग हैं. वे सब अपनी मूलभाषा  का उच्चारण करते हैं. हम 'बीजिंग' को 'पीकिंग' कहते आये हैं. हमारे लिए 'हॉस्पिटल' को 'अस्पताल' कहना, 'मास्टर साहब' को 'मास्साब' कहना सही है. 
पिछले दिनों वाचिका को 'Xi' को इलेवन पढ़ने पर नौकरी से अलग कर दिया गया. उन दिनों चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग भारत में थे, उनके नाम का उच्चारण गलत हो गया तो अधिक से अधिक समाचार लेखक और वाचक को  स्पष्टीकरण पत्र देकर भविष्य में सतर्क रहने के लिए चेतावनी दी जा सकती थी. 
यहाँ समाचार वाचक का दोष नहीं है. उसने कागज पर जो देखा वह पढ़ा. 
क्या समाचार लिखनेवाले को  चीनी लिपि में 'Xi 'के स्थान पर देवनागरी में 'शी' नहीं लिखना था? यदि इस तरह लिखा होता तो त्रुटि नहीं होती। 
यह एक सामान्य मानवी त्रुटि है जिसे चर्चा कर भविष्य में सुधारा जा सकता है. यदि दंड देना जरूरी हो तो  समाचार लेखक को दिया जाए. हमारी नौकरशाही सबसे कमजोर कड़ी पर प्रहार करती है. प्रायः, समाचार लेखक स्थाई और वाचक अस्थायी होते हैं.

राजनय की मर्यादा 

विदेशियों को सर-आँखों पर बैठने की हमारी लत अब भी सुधरी नहीं है.  
पिछले दिनों चीन की पहली महिला ने पूर्वोत्तर की एक छात्रा से कहा 'वह चीनी है'. गनीमत है कि छत्रा सजग थी. उसने उत्तर दिया 'नहीं, मैं  भारतीय हूँ'. यदि घबड़ाहट में उसने 'हाँ' कह दिया होता तो क्या होता? चीनी नेता और हमारी प्रेस तूफ़ान खड़ा कर देते। 
​​
विस्मय कि हमारी सरकार ने इस पर आपत्ति तक नहीं की. भारतीय विदेश सेवा के अधिकारी राष्ट्रीय गौरवभाव से दूर हैं,  पूर्वोत्तर  भरोसाः  है तभी तो इस दौरे में विवादस्पद अंचल के कर्मचारियों प्रांतीय सरकार, सांसदों विधायकों यहाँ तक कि एकमात्र केंद्रीय मंत्री तक को दूर रखा गया. यदि हम इन सबको चीनी राष्ट्राध्यक्ष के सामने लाते और वे एक स्वर से खुद को भारतीय बताते तो चीन का दावा  कमजोर होता। 

अविश्वास क्यों?:

कल्पना कीजिए की चीनी राष्ट्रपरि को गुजरात के स्थान पर पूर्वोत्तर राज्यों में ले जाया गया होता और वहां की लोकतान्त्रिक पद्धति से चुनी गयी सरकारें, जन प्रतिनिधि और जातीय मुखिय गण चीनी राष्ट्रपति को वही उत्तर देते जो दिल्ली की छात्रा ने दिया था तो क्या भारत का गौरव नहीं बढ़ता। निस्संदेह इसके लिए साहस और विश्वास चाहिए, कमी कहाँ है? मोदी जी के पास इन दोनों तत्वों की कमी नहीं है, कमी नौकरशाही में है जो शंका और अविश्वास अपनी सजगता मानती है और कमजोर को प्रताड़ित कर गौरवान्वित होती है.    

इन बिन्दुओं पर सोचना और अपनी राय मंत्रालयों और नेताओं की साइट से उन तकक्या पहुँचाना क्या हम नागरिकों  दायित्व नहीं है ? 
facebook: sahiyta salila / sanjiv verma 'salil' 

रविवार, 21 सितंबर 2014

shabana azami, kundli aur samman : vijay raj bali mathur

शबाना आज़मी को सम्मान क्यों? ---विजय राजबली माथुर



हिंदुस्तान,लखनऊ, 05 अप्रैल 2012 को प्रकाशित चित्र जो राष्ट्रपति महोदया  से  'पद्म भूषण'  लेते समय हिंदुस्तान,आगरा,03 जून,2007 को प्रकाशित कुंडली 

शीर्षक देख कर चौंके नहीं। मै शबाना आज़मी जी को पुरस्कार प्राप्त होने का न कोई विरोध कर रहा हू और न यह कोई विषय है। मै यहाँ आपको प्रस्तुत शबाना जी की जन्म कुंडली के आधार पर उन ग्रह-नक्षत्रो से परिचय करा रहा हूँ जो उनको सार्वजनिक रूप से सम्मान दिलाते रहते हैं।

शुक्र की महा दशा मे राहू की अंतर्दशा 06 मार्च 1985 से 05 मार्च 1988 तक फिर ब्रहस्पत की अंतर्दशा 05 नवंबर 1990 तक थी। इस दौरान शबाना आज़मी को 'पद्म श्री' पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। उनकी कुंडली मे पंचम भाव मे चंद्रमा,सप्तम भाव मे बुध,अष्टम भाव मे शुक्र और दशम भाव मे ब्रहस्पत स्व-ग्रही हैं। इन अनुकूल ग्रहो ने शबाना जी को कई फिल्मी तथा दूसरे पुरस्कार भी दिलवाए हैं। वह कई बार सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री भी इनही ग्रहो के कारण चुनी गई हैं। सूर्य और ब्रहस्पत की स्थिति ने उन्हे राजनीति मे भी सक्रिय रखा है। वह भाकपा की कार्ड होल्डर मेम्बर भी रही हैं। 06 नवंबर 1996 से 05 जनवरी 1998 तक वह शुक्र महादशा मे केतू की अंतर्दशा मे थीं तभी उन्हे राज्य सभा के लिए नामित किया गया था।

वर्तमान 'पद्म भूषण'पुरस्कार ग्रहण करते समय चंद्रमा की महादशा के अनर्गत शुक्र की अंतर्दशा चल रही है  जो 06 नवंबर 2011 से लगी है और 05 जूलाई 2013 तक रहेगी।* यह समय स्वास्थ्य के लिहाज से कुछ नरम भी हो सकता है। हानि,दुर्घटना अथवा आतंकवादी हमले का भी सामना करना पड़ सकता है। अतः खुद भी उन्हे सतर्क रहना चाहिए और सरकार को भी उनकी सुरक्षा का चाक-चौबन्द बंदोबस्त करना चाहिए। इसके बाद 29 नवंबर 2018 तक समय उनके अनुकूल रहेगा।

शबाना जी की जन्म लग्न मे राहू और पति भाव मे केतू बैठे हैं जिसके कारण उनका विवाह विलंब से हुआ। पंचम-संतान भाव मे नीच राशि का मंगल उनके संतान -हींन रहने का हेतु है। यदि समय पर 'मंगल' ग्रह की शांति कारवाई गई होती तो वह कन्या-संतान प्राप्त भी कर सकती थी। इसी प्रकार वर्तमान अनिष्टकारक समय मे 'बचाव व राहत प्राप्ति' हेतु उन्हें शुक्र मंत्र-"ॐ शु शुकराय नमः " का जाप प्रतिदिन 108 बार पश्चिम की ओर मुंह करके और धरती व खुद के बीच इंसुलेशन बना कर अर्थात किसी ऊनी आसन पर बैठ कर करना चाहिए।

कुछ तथाकथित प्रगतिशील और तथाकथित विज्ञानीज्योतिष की कटु आलोचना करते हैं और इसके लिए जिम्मेदार हैं ढ़ोंगी लोग जो जनता को उल्टे उस्तरे से मूढ़ते हैं। ऐसे ही लोगो के कारण 'मानव जीवन को सुंदर,सुखद व समृद्ध'बनाने वाला ज्योतिष विज्ञान हिकारत की नजरों से देखा जाता है। ये ग्रह-नक्षत्र क्या हैं और इंनका मानव जीवन पर प्रभाव किस प्रकार पड़ता है यदि यह समझ आ जाये तो व्यक्ति दुखो व कष्टो से बच सकता है यह पूरी तरह उस व्यक्ति पर ही निर्भर है जो खुद ही अपने भाग्य का निर्माता है। जो भाग्य को कोसते हैं उनको विशेषकर नीचे लिखी बातों को ध्यान से समझना चाहिए की भाग्य क्या है और कैसे बंनता या बिगड़ता है-

सदकर्म,दुष्कर्म,अकर्म -का फल जो व्यक्ति अपने वर्तमान जीवन मे प्राप्त नहीं कर पाता है आगामी जीवन हेतु संचित रह जाता है। ये कर्मफल भौतिक शरीर नष्ट होने के बाद आत्मा के साथ-साथ चलने वाले कारण शरीर और सूक्ष्म शरीर के साथ गुप्त रूप से चलते रहते हैं। आत्मा के चित्त पर गुप्त रूप से अंकित रहने के कारण ही इन्हे 'चित्रगुप्त' संज्ञा दी गई है। चित्रगुप्त ढोंगियों द्वारा बताया गया कोई देवता या कायस्थों का सृजक नहीं है।

कर्मानुसार आत्मा 360 डिग्री मे बंटे ब्रह्मांड मे (भौतिक शरीर छोडने के बाद ) प्रतिदिन एक-एक राशि मे भ्रमण करती है और सदकर्म,दुष्कर्म,अकर्म जो अवशिष्ट रहे थे उनके अनुसार आगामी जीवन हेतु निर्देश प्राप्त करती है। 30-30 अंश मे फैली एक-एक राशि के अंतर्गत सवा दो-सवा दो नक्षत्र आते हैं। प्रत्येक नक्षत्र मे चार-चार चरण होते हैं। इस प्रकार 12 राशि X 9 ग्रह =108 या 27 नक्षत्र X4 चरण =108 होता है। इसी लिए 108 को एक माला का क्रम माना गया है जितना एक बार मे जाप करना निश्चित किया गया है। इस जाप के द्वारा अनिष्ट ग्रह की शांति उच्चारण की तरंगों (VIBRATIONS) द्वारा उस ग्रह तक संदेश पहुंचाने से हो जाती है।

जन्मपत्री के बारह भाव 12 राशियों को दर्शाते हैं और जन्म समय ,स्थान और तिथि के आधार पर ज्ञात 'लग्न' के अनुसार अंकित किए जाते हैं। नवो ग्रह उस समय की आकाशीय स्थिति के अनुसार अंकित किए जाते हैं। इनही की गणना से आगामी भविष्य का ज्ञान होता है जो उस व्यक्ति के पूर्व जन्म मे किए गए सदकर्म,दुष्कर्म एवं अकर्म पर आधारित होते हैं। अतः व्यक्ति खुद ही अपने भाग्य का निर्माता है वह बुद्धि,ज्ञान व विवेक का प्रयोग कर दुष्प्रभावो को दूर कर सकता है या फिर लापरवाही करके अच्छे को बुरे मे बदल डालता है।

उपरोक्त कुंडली का विश्लेषण वैज्ञानिक आधार पर है। कुंडली जैसी अखबार मे छ्पी उसे सही मान कर विश्लेषण किया गया है।

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शनिवार, 20 सितंबर 2014

bramhanon ki kutilata:

विमर्श: श्रम और बुद्धि 

ब्राम्हणों ने अपनी श्रेष्ठता स्थापित करने के लिये ग्रंथों में अनेक निराधार, अवैज्ञानिक, समाज के लिए हानिप्रद और सनातन धर्म के प्रतिकूल बातें लिखकर सबका कितना अहित किया? तो पढ़िए व्यास स्मृति विविध जातियों के बारे में क्या कहती है?

जानिए और बताइये क्या हमें व्यास का सम्मान कारण चाहिए???

व्यास स्मृति, अध्याय १

वर्द्धकी नापितो गोपः आशापः कुम्भकारकः
वीवक किरात कायस्थ मालाकर कुटिम्बिनः 
एते चान्ये च वहवः शूद्रा भिन्नः स्वकर्मभिः    -१०
चर्मकारः भटो भिल्लो रजकः पुष्ठकारो नट:
वरटो भेद चाण्डाल दासं स्वपच कोलकाः        -११
एते अन्त्यज समाख्याता ये चान्ये च गवारान:
आशाम सम्भाषणाद स्नानं दशनादरक वीक्षणम् -१२

अर्थ: बढ़ई, नाई, अहीर, आशाप, कुम्हार, वीवक, किरात, कायस्थ, मालाकार कुटुम्बी हैं। ये भिन्न-भिन्न कर्मों के कारण शूद्र हैं. चमार, भाट, भील, धोबी, पुस्तक बांधनेवाले, नट, वरट, चाण्डालों, दास, कोल आदि माँसभक्षियों अन्त्यज (अछूत) हैं. इनसे बात करने के बाद स्नान तथा देख लेने पर सूर्य दर्शन करना चाहिए। 

उल्लेख्य है कि मूलतः ब्राम्हण और कायस्थ दोनों की उत्पत्ति एक ही मूल ब्रम्ह या परब्रम्ह से है। दोनों बुद्धिजीवी रहे हैं. बुद्धि का प्रयोग कर समाज को व्यवस्थित और शासित करनेवाले अर्थात राज-काज को मानव की उन्नति का माध्यम माननेवाले कायस्थ (कार्यः स्थितः सह कायस्थः) तथा बुद्धि के विकास और ज्ञान-दान को मानवोन्नति का मूल माननेवाले ब्राम्हण (ब्रम्हं जानाति सः ब्राम्हणाः) हुए। 

ये दोनों पथ एक-दूसरे के पूरक हैं किन्तु अपनी श्रेष्ठता स्थापित करने के लिए ब्राम्हणों ने वैसे ही निराधार प्रावधान किये जैसे आजकल खाप के फैसले और फतवे कर रहे हैं. उक्त उद्धरण में व्यास ने ब्राम्हणों के समकक्ष कायस्थों को श्रमजीवी वर्ग के समतुल्य बताया और श्रमजीवी कर्ज को हीन कह दिया। फलतः, समाज विघटित हुआ। बल और बुद्धि दोनों में श्रेष्ठ कायस्थों का पराभव केवल भुज बल को प्रमुख माननेवाले क्षत्रियों के प्रभुत्व का कारण बना। श्रमजीवी वर्ग ने अपमानित होकर साथ न दिया तो विदेशी हमलावर जीते, देश गुलाम हुआ। 

इस विमर्श का आशय यह कि अतीत से सबक लें। समाज के उन्नयन में हर वर्ग का महत्त्व समझें, श्रम को सम्मान देना सीखें। धर्म-कर्म पर केवल जन्मना ब्राम्हणों का वर्चस्व न हो। होटल में ५० रु. टिप देनेवाला रिक्शेवाले से ५-१० रु. का मोल-भाव न करे, श्रमजीवी को इतना पारिश्रमिक मिले कि वह सम्मान से परिवार पाल सके। पूंजी पे लाभ की दर से श्रम का मोल अधिक हो। आपके अभिमत की प्रतीक्षा है। 

फ़ोटो: वाल्मीकि रामायण को कोई नहीं पूछता लेकिन आज भी तुलसीदास रचित रामचरितमानस की पारायण सप्ताह बिठाई जाती है, जिस में ओबीसी-शुद्र, एससी-एसटी-अति शुद्रो और महिलाओ के बारे में स्पष्ट लिखा है, -
"पुजिये विप्र शील, गुण हिना, न पुजिये शुद्र गुण ज्ञान प्रवीना."
"ढोल, गंवार, शुद्र अरु पशु, नारी ये सब ताडन के अधिकारी."
"जे वरणाधिम तेली कुम्हारा, कोल, किरात, कलवारा.".अयौद्या कांड "

छत्रपति शिवाजी महाराज कुणबी थे इसी लिए महाराष्ट्र के ब्राह्मणों ने उन को शुद्र बताकर राज्याभिषेक करने से इंकार कर दिया था. ओबीसी समुदाय की जातियों वर्ण में ब्राह्मण, वैश्य और क्षत्रिय नहीं है इसीलिए उन को जनेऊ धारण करने का अधिकार नहीं था. 

इश्वर, कुदरत या प्रकृति ने हाथी, घोडा, गाय और मानव जैसे प्राणियो का विश्व में सर्जन किया है. भारत को छोड़कर विश्व के एक भी देश में मानव के ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शुद्र और अवर्ण ऐसा जन्मजात विभाजन नहीं है.

इश्वर, कुदरत या प्रकृति ने हाथी, घोडा, गाय और मानव जैसे प्राणियो का विश्व में सर्जन किया है. जन्मजात वर्ण इश्वर या प्रकृति का सर्जन नहीं है. अगर ऐसा होता तो इश्वर ने मानव की तरह ही गध्धे में भी ब्राह्मण गध्धा,क्षत्रिय गध्धा, वैश्य गध्धा, शुद्र गध्धा और अवर्ण गध्धा का सर्जन किया होता.

पौराणिक ब्राह्मण धर्म के माध्यम से कुछ चालाक और धूर्त लोगो ने खुद को श्रेष्ठ, सर्वोच्च और पृथ्वी पर के भूदेव के तौर पर घोषित कर के सदियों से बिन ब्राह्मणों को उच्च नीच के भेदभाव में बांट के रख दिया है, जिन के शिकार आज का ओबीसी समुदाय, एससी समुदाय और एसटी समुदाय बना हुवा है.



navgeet: sanjiv

नवगीत:
संजीव
*
अजब निबंधन
गज़ब प्रबंधन

नायक मिलते
सैनिक भिड़ते
हाथ मिलें संग
पैर न पड़ते

चिंता करते
फ़िक्र न हरते
कूटनीति का
नाटक मंचन
*
झूले झूला
अँधा-लूला
एक रायफल
इक रमतूला

नेह नदारद
शील दिखाएँ
नाहक करते
आत्म प्रवंचन
*
बिना सिया-सत
अधम सियासत
स्वार्थ सिद्धि को
कहें सदाव्रत

नाम मित्रता
काम अदावत
नैतिकता का
पूर्ण विखंडन
***

शुक्रवार, 19 सितंबर 2014

geet shamiyana: sanjiv

विमर्श: शामियाना

गीत:

धरा की शैया सुखद है
अमित  नभ का शामियाना
मनुज लेकिन संग तेरे
कभी भी कुछ भी न जाना

जोड़ता तू फिर रहा है
मोह-तम में घिर रहा है
पुत्र है तू ब्रम्ह का पर
वासना में घिर रहा है

पंक में पंकज सदृश रह
सीख पगले मुस्कुराना

उग रहा है सूर्य नित प्रति
सांझ खुद ही ढल रहा है
पालता है जो किसी को
वह किसी से पल रहा है

उसको उतना ही मिलेगा
जितना जिसका आबो-दाना

लाये क्या?, ले जायेंगे क्या??
कौन जाता संग किसके?
संग जग आनंद में हो
पीर आपद देख खिसके

औपचारिक भावनाएं
अधर पर मीठा बहाना

रहे जिसमें ढाई आखर
खुशनुमा है वही बाखर
सुन रहा खन-खन सतत जो
कौन है उससे बड़ा खर?

छोड़ पद-मद धन सियासत
ओढ़ भगवा-पीत बाना

कब भरी है बोल गागर?
रीतता क्या कभी सागर??
पाई जैसी त्याग वैसी
कर्म की हँस 'सलिल' चादर

हंस उड़ चल बस वहीं तू
है जहाँ अंतिम ठिकाना

*****
व्यवसाय बहुत से लोग करते हैं किन्तु श्री अशोक खुराना सबसे अलग हैं. 
कैसे? 
ऐसे कि वे अपने व्यवसाय से रोजी-रोटी कमाने के साथ-साथ व्यवसाय के हर पहलू पर सोचते हैं और औरों को सोचने-कहने के लिए प्रेरित करते हैं.   
कैसे?  
ऐसे की वे हर वर्ष अपने व्यवसाय पर केंद्रित कवितायेँ कवियों से लिखवाते-बुलवाते, उनका संकलन निजी खर्च छपवाते और कवियों को निशुल्क भिजवाते हैं.

'शामियाना ३' इस श्रंखला की तीसरी कड़ी है. २४० पृष्ठ के इस सजिल्द संकलन में १८८ रचनाएँ हैं. निरंकारी अब्बा हरदेव सिंह, बालकवि बैरागी तथा कुंवर बेचैन के आशीर्वचनों से समृद्ध इस संकलन में गीत, ग़ज़ल, कवितायेँ और शेर आदि सम्मिलित हैं. परम्परानुसार शुभारम्भ आचार्य भगवत दुबे रचित गणेश-सरस्वती वंदना से हुआ है. शामियाना (टेंट हाउस) व्यवसाय से आजीविका अर्जित कर अपने पुत्र को आई.पी. एस. अधिकारी बनानेवाले अशोक जी से प्रेरणा लेकर अन्य व्यवसायी भी अपने व्यवसाय के विविध पहलुओं पर चिंतन के साथ सारस्वत रचनाकर्म को प्रोत्साहित कर सकते हैं. 

इस शारदेय अनुष्ठान में मेरी समिधा से आप ऊपर आनंदित हो ही चुके हैं. जो रचनाकार बंधू शामियाना के अगले अंक में रचनात्मक भागीदारी करना चाहें वे अपना नाम, पता, ईमेल आई. डी., चलभाष / दूरभाष कंमांक तथा एक रचना यहाँ लगा दें. रचनाएँ यथा समय श्री अशोक खुराना तक पहुंचा दी जाएंगी.    

   

geet: harsingar muskaye -sanjiv

 

गीत:

हरसिंगार मुस्काए


 संजीव

*
खिलखिला
यीं पल भर तुम
हरसिंगार मुस्काए 

अँखियों के पारिजात
उठें-गिरें पलक-पात
हरिचंदन देह धवल 
मंदारी मन प्रभात 
शुक्लांगी नयनों में
शेफाली शरमाए 

परजाता मन भाता 
अनकहनी कह जाता
महुआ तन महक रहा 
टेसू रंग दिखलाता
फागुन में सावन की
हो प्रतीति भरमाए 

पनघट खलिहान साथ, 
कर-कुदाल-कलश हाथ
सजनी-सिन्दूर सजा- 
कब-कैसे सजन-माथ? 
हिलमिल चाँदनी-धूप 
धूप-छाँव बन गाए
*
हरसिंगार पर्यायवाची: हरिश्रृंगार, परिजात, शेफाली, श्वेतकेसरी, हरिचन्दन, शुक्लांगी, मंदारी, परिजाता,  पविझमल्ली, सिउली, night jasmine, coral jasmine, jasminum nitidum, nycanthes arboritristis, nyclan,

cheen hindu rashtra tha: alaknanda singh

सच है कि...कभी हिंदू राष्‍ट्र था चीन

-अलकनंदा सिंह 
वैसे तो संपूर्ण जम्बूद्वीप पर हिन्दू साम्राज्य स्थापित था। जम्बूद्वीप के 9 देश थे उसमें से 3 थे- हरिवर्ष, भद्राश्व और किंपुरुष। उक्त तीनों देशों को मिलाकर आज इस स्‍थान को चीन कहा जाता है। चीन प्राचीनकाल में हिन्दू राष्ट्र था। 1934 में हुई एक खुदाई में चीन के समुद्र के किनारे बसे एक प्राचीन शहर च्वानजो 1000 वर्ष से भी ज्यादा प्राचीन हिन्दू मंदिरों के लगभग एक दर्जन से अधिक खंडहर मिले हैं। यह क्षेत्र प्राचीन काल में हरिवर्ष कहलाता था, जैसे भारत को भारतवर्ष कहा जाता है।
वैसे वर्तमान में चीन में कोई हिन्दू मंदिर तो नहीं हैं, लेकिन एक हजार वर्ष पहले सुंग राजवंश के दौरान दक्षिण चीन के फूच्यान प्रांत में इस तरह के मंदिर थे लेकिन अब सिर्फ खंडहर बचे हैं।
भारतीय प्रदेश अरुणाचल के रास्ते लोग चीन जाते थे और वहीं से आते थे। दूसरा आसान रास्ता था बर्मा। हालांकि लेह, लद्दाख, सिक्किम से भी लोग चीन आया-जाया करते थे लेकिन तब तिब्बत को पार करना होता था। तिब्बत को प्राचीनकाल में त्रिविष्टप कहा जाता था। यह देवलोक और गंधर्वलोक का हिस्सा था।
मात्र 500 से 700 ईसापूर्व ही चीन को महाचीन एवं प्राग्यज्योतिष कहा जाता था लेकिन इसके पहले आर्य काल में यह संपूर्ण क्षेत्र हरिवर्ष, भद्राश्व और किंपुरुष नाम से प्रसिद्ध था।
महाभारत के सभापर्व में भारतवर्ष के प्राग्यज्योतिष (पुर) प्रांत का उल्लेख मिलता है। हालांकि कुछ विद्वानों के अनुसार प्राग्यज्योतिष आजकल के असम (पूर्वात्तर के सभी 8 प्रांत) को कहा जाता था। इन प्रांतों के क्षेत्र में चीन का भी बहुत कुछ हिस्सा शामिल था।
रामायण बालकांड (30/6) में प्राग्यज्योतिष की स्थापना का उल्लेख मिलता है। विष्णु पुराण में इस प्रांत का दूसरा नाम कामरूप (किंपुरुष) मिलता है। स्पष्ट है कि रामायण काल से महाभारत कालपर्यंत असम से चीन के सिचुआन प्रांत तक के क्षेत्र प्राग्यज्योतिष ही रहा था। जिसे कामरूप कहा गया। कालांतर में इसका नाम बदल गया।
चीनी यात्री ह्वेनसांग और अलबरूनी के समय तक कभी कामरूप को चीन और वर्तमान चीन को महाचीन कहा जाता था। अर्थशास्त्र के रचयिता कौटिल्य ने भी 'चीन' शब्द का प्रयोग कामरूप के लिए ही किया है। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि कामरूप या प्राग्यज्योतिष प्रांत प्राचीनकाल में असम से बर्मा, सिंगापुर, कम्बोडिया, चीन, इंडोनेशिया, जावा, सुमात्रा तक फैला हुआ था अर्थात यह एक अलग ही क्षेत्र था जिसमें वर्तमान चीन का लगभग आधा क्षेत्र आता है।
इस विशाल प्रांत के प्रवास पर एक बार श्रीकृष्ण भी गए थे। यह उस समय की घटना है, जब उनकी अनुपस्थिति में शिशुपाल ने द्वारिका को जला डाला था। महाभारत के सभापर्व (68/15) में वे स्वयं कहते हैं- कि 'हमारे प्राग्यज्योतिष पुर के प्रवास के काल में हमारी बुआ के पुत्र शिशुपाल ने द्वारिका को जलाया था।'
चीनी यात्री ह्वेनसांग (629 ई.) के अनुसार इस कामरूप प्रांत में उसके काल से पूर्व कामरूप पर एक ही कुल-वंश के 1,000 राजाओं का लंबे काल तक शासन रहा है। यदि एक राजा को औसतन 25 वर्ष भी शासन के लिए दिया जाए तो 25,000 वर्ष तक एक ही कुल के शासकों ने कामरूप पर शासन किया। अंग्रेज इतिहासकारों ने कभी कामरूप क्षेत्र के 25,000 वर्षीय इतिहास को खोजने का कष्ट नहीं किया। करते भी नहीं, क्योंकि इससे आर्य धर्म या हिन्दुत्व की गरिमा स्थापित हो जानी थी।
कालांतर में महाचीन ही चीन हो गया और प्राग्यज्योतिषपुर कामरूप होकर रह गया। यह कामरूप भी अब कई देशों में विभक्त हो गया। कामरूप से लगा 'चीन' शब्द लुप्त हो गया और महाचीन में लगा 'महा' शब्द हट गया।
पुराणों के अनुसार शल्य इसी चीन से आया था जिसे कभी महाचीन कहा जाता था। माना जाता है कि मंगोल, तातार और चीनी लोग चंद्रवंशी हैं। इनमें से तातार के लोग अपने को अय का वंशज कहते हैं, यह अय पुरुरवा का पुत्र आयु था। (पुरुरवा प्राचीनकाल में चंद्रवंशियों का पूर्वज है जिसके कुल में ही कुरु और कुरु से कौरव हुए)। इस आयु के वंश में ही सम्राट यदु हुए थे और उनका पौत्र हय था। चीनी लोग इसी हय को हयु कहते हैं और अपना पूर्वज मानते हैं।
एक दूसरी मान्यता के अनुसार चीन वालों के पास 'यू' की उत्पत्ति इस प्रकार लिखी है कि एक तारे (तातार) का समागम यू की माता के साथ हो गया। इसी से यू हुआ। यह बुद्घ और इला के समागम जैसा ही किस्सा है। इस प्रकार तातारों का अय, चीनियों का यू और पौराणिकों का आयु एक ही व्यक्ति है। इन तीनों का आदिपुरुष चंद्रमा था और ये चंद्रवंशी क्षत्रिय हैं।
 
संदर्भ : कर्नल टॉड की पुस्तक ‘राजस्थान का इतिहास’ और पं. रघुनंदन शर्मा की पुस्तक ‘वैदिक संपत्ति’ और 'हिन्दी-विश्वकोश' आदि से।

अब छोड़ो भी से साभार 

गुरुवार, 18 सितंबर 2014

kundali: sanjiv

कुंडली:
संजीव
*
चीनी सेना घुस रही, भारत में हे राम!
स्वागत जिनपिंग का करें, हम तज शर्म तमाम
हम तज शर्म तमाम, पसारे हाथ खड़े हैं
है निवेश की आस, चरण पर हाय पड़े हैं
बंद करें आयात, न क्यों निज धरती छीनी
बदलें अपनी चाल तभी सुधरेंगे चीनी
*
हास्य कुंडली

'लालू जी! सुत आपका मेरा बच्चा एक
सचमुच नटखट है बहुत, लेकिन भोला नेक
लेकिन भोला नेक' सुना लालू चकराए
लाली यदि सुन सके तुरत शामत आ जाए
गए तुरत एकांत टालने नेता चालू
मिली नहीं तरकीब परेशां बेहद लालू

पूछा 'इमरतिया'? मगर गलत रहा अंदाज़
'हो जिलेबिया?', 'जी नहीं' जान न पाये राज़
'जुही?, चमेली?, गुलबिया?' पूछ-पूछ हैरान
'बच्चा कैसे? कब? कहाँ? सोच निकलती जान
हुए रुआँसे क्षमा माँग जब परिचय पूछा
'बच्चे की शिक्षिका' मिला तब उत्तर छूछा
*

muktika sagar palampuri

पहाड़ी मुक्तिका :


कीह्याँ सैर मनाइये ?

स्वर्गीय  ’साग़र’ पालमपुरी

मँघयाइया दा  जोर कीह्याँ सैर मनाइये ?
जीणे दा  क्या धोर कीह्याँ सैर मनाइये ?

जे मैह्ल बणे म्हारिआ मिह्णती ने तिह्नाँ 
आई बस्से कोई होर कीह्याँ सैर मनाइये ?

कुथु खेह्लिये हण खोड़ाँकीह्याँ गाइये छंझोटी?
रुत  बड़ी मुँह्जोर कीह्याँ सैर मनाइये ?

अपणेयाँ  कुलाचाराँ त्यागी ने असाँ लोक
होआ दे आँ कमजोर कीह्याँ सैर मनाइये ?

सैह रूप नीं सैह रंग नीं धरियाइयाँ बणाँ दा
नचदे नईं हण मोर कीह्याँ सैर मनाइये ?

किछ लाळचाँ लोब्भाँ देह्यी ग्रेथिओ दुनियाँ
जळबाँ दी  टकठोर कीह्याँ सैर मनाइये ?

दान्नाँ ब्रताँजगाँ दा सुफल मिल्लै बी कीह्याँ?
बस्सेया  मनें चोरकीह्याँ सैर मनाइये ?

दड़ी जाइ्ये कुथु मित्तरोजमाने ते डरी ने
हण तोपिये कुण झोर कीह्याँ सैर मनाइये ?

लोहुए ने दीया सान्जो बलाणाँ   पोऐ
निह्यारा  बड़ा घोर कीह्याँ सैर मनाइये ?

’साग़र’ दिखा जिस पास्से बह्दी गेह्यो  माह्णू
गोह्राँ बत्ताँ  सोर  कीह्याँ सैर मनाइये

navgeet: maan ji hain beemar -sanjiv

मातृदिवस पर 
नवगीत :
माँ जी हैं बीमार...
संजीव 'सलिल' 
*
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*
माँ जी हैं बीमार...
*
प्रभु! तुमने संसार बनाया.
संबंधों की है यह माया..
आज हुआ है वह हमको प्रिय 
जो था कल तक दूर-पराया..

पायी उससे ममता हमने-
प्रति पल नेह दुलार..
बोलो कैसे हमें चैन हो?
माँ जी हैं बीमार...
*
लायीं बहू पर बेटी माना.
दिल में, घर में दिया ठिकाना..
सौंप दिया अपना सुत हमको-
छिपा न रक्खा कोई खज़ाना. 

अब तो उनमें हमें हो रहे-
निज माँ के दीदार..
करूँ मनौती, कृपा करो प्रभु!
माँ जी हैं बीमार...
*
हाथ जोड़ कर करूँ वन्दना.
प्रभुजी! सुनिए नम्र प्रार्थना 
तन-मन से सेवा करती हूँ
सफल कीजिए सकल साधना..

चैन न लेने दूँगी, तुमको 
जग के तारणहार.
स्वास्थ्य लाभ दो मैया को हरि!
हों न कभी बीमार..
****
संदेश में फोटो देखें

doha: sanjiv

दोहा सलिला:
*
दोहा रसनिधि चाहते, जो वे चतुर सुजान 
जिनका दिल रसलीन है, जिनका मन रसखान।  
*
गौ भाषा को दूहता, दोहा दे नव अर्थ 
चमत्कार-लय चाहिए, रस बिन दोहा व्यर्थ 
*
दोहा दुनिया में नहीं, ताकतवर का दाम 
दिलवर की ही कद्र है, भले लक्ष्मी वाम 
*
गोबर में भी देखता, दोहा दिव्य गणेश 
सार-सार ले गह सदा, थोथा रखे न लेश 
*
पत्थर में भगवान है, देख सके तो देख 
प्रभु लेकिन पत्थर नहीं, खिंचे न जल में रेख 
*

muktak : salila

मुक्तक  : 
संजीव 
*
गले में हँस विष धरा, विषधर लपेटा है 
करें मंगल, सब अमंगल हँस समेटा है 
पूजते हैं काल को हम देवता कहकर 
रुष्ट जिस पर हुए उसको तुरत मेटा है
*
घोलकर चीनी करें स्वागत हमेशा हम 
करें स्वागत तो कहें हम जोर से बम-बम 
बम-धमाकों के मसीहा चेत भी जाओ 
चाह लें तो तुम्हारा तम-गम न होगा कम 
रूप की जब धूप निकले छाँह में जाओ 
रूपसी यदि चाहती हो बाँह में जाओ 
निमंत्रण पाया नहीं, मुड देख मत उस ओर 
आत्म में परमात्म लखकर जोर से गाओ 
गले से जिसको लगाया जगे उसके भाग 
की तनिक नफरत बने हम एक पल में आग 
 रागरंजित फाग गाकर पालते अनुराग 
 दगा देता जो उसे बन नाग देते दाग 

मंगलवार, 16 सितंबर 2014

doha : sanjiv

दोहा:
संजीव
*
मात-पिता का हाथ था, जब तक सर पर मीत
प्राणों में घुलता रहा, शुभाशीष-संगीत
*
नहीं शीश पर हाथ अब, किसका थामें हाथ
बारिश, जाड़ा घाम सह, कहाँ नवायें माथ
*
खाँसी आह कराहना, लगता था हो बंद
बंद न ऐसे हो कभी, लगे गुम गए छंद
*
अर्पण-तर्पण क्या करूँ, कैसे मुझे न ज्ञात
मात्र समर्पण जानता, स्वीकारो माँ-तात
*
अगणित त्रुटि-गलती करीं, क्षमा आपने नित्य
क्षमा करेगा  कौन अब, कहिए पूज्य अनित्य
***   
  

muktak: sanjiv

मुक्तक सलिला:
संजीव
*
देश को प्रणाम कीजिए हँसकर
भाषा को नमन कीजिए खिलकर
आशा का कल्पवृक्ष झूमेगा
कोशिश की राह पकड़िए मिलकर
*
देश-गीत गाओ तो धन्य हो
देश-प्रीत पाओ तो धन्य हो
देश-नीत है पुनीत भूल मत
देश-मीत पाओ तो धन्य हो.
*
गगन पर हस्ताक्षर करेंगे हम
पीड़ित का दर्द कम करेंगे हम
श्रम गंगा नहाकर तरेंगे हम
नित नवीन मंज़िलें वरेंगे हम
*
 


रविवार, 14 सितंबर 2014

इंजीनियर्स डे १५ सितम्बर ,,सर मोक्षगुण्डम विश्वेवश्वरैया के जन्म दिवस पर

इंजीनियर्स डे १५ सितम्बर

भारत रत्न इंजीनियर सर मोक्षगुण्डम विश्वेवश्वरैया के जन्म दिवस पर

विवेक रंजन श्रीवास्तव
अधीक्षण अभियंता सिविल
ओ बी ११ , विद्युत मण्डल कालोनी
रामपुर जबलपुर
४८२००८
मो ९४२५४८४४५२


        आज अमेरिका में सिलिकान वैली में तब तक कोई कंपनी सफल नही मानी जाती जब तक उसमें कोई भारतीय इंजीनियर कार्यरत न हो ....,भारत के आई आई टी जैसे संस्थानो के इंजीनियर्स ने विश्व में अपनी बुद्धि से भारतीय श्रेष्ठता का समीकरण अपने पक्ष में कर दिखाया है . प्रतिवर्ष भारत रत्न सर मोक्षगुण्डम विश्वेश्वरैया का जन्मदिवस इंजीनियर्स डे के रूप में मनाया जाता है . पंडित नेहरू ने कल कारखानो को नये भारत के तीर्थ कहा था , इन्ही तीर्थौ के पुजारी , निर्माता इंजीनियर्स को आज अभियंता दिवस पर बधाई ....विगत कुछ दशको में इंजीनियर्स की छबि में भ्रष्टाचार के घोलमाल में बढ़ोत्री हुई है , अनेक इंजीनियर्स प्रशासनिक अधिकारी या मैनेजमेंट की उच्च शिक्षा लेकर बड़े मैनेजर बन गये हैं , आइये आज इंजीनियर्स डे पर कुछ पल चिंतन करे समाज में इंजीनियर्स की इस दशा पर , हो रहे इन परिवर्तनो पर ... इंजीनियर्स अब राजनेताओ के इशारो चलने वाली कठपुतली नही हो गये हैं क्या? देश में आज इंजीनियरिंग शिक्षा के हजारो कालेज खुल गये हैं , लाखो इंजीनियर्स प्रति वर्ष निकल रहे हैं , पर उनमें से कितनो में वह जज्बा है जो भारत रत्न इंजीनियर सर मोक्षगुण्डम विश्वेवश्वरैया में था .......मनन चिंतन का विषय है .

भारत रत्न इंजीनियर सर मोक्षगुण्डम विश्वेवश्वरैया की जीवनी

        भारत रत्न इंजीनियर सर मोक्षगुण्डम विश्वेवश्वरैया का जन्म मैसूर (कर्नाटक) के कोलार जिले के चिक्काबल्लापुर तालुक में 15 सितंबर 1860 को हुआ था। उनके पिता का नाम श्रीनिवास शास्त्री तथा माता का नाम वेंकाचम्मा था। पिता संस्कृत के विद्वान थे। विश्वेश्वरैया ने प्रारंभिक शिक्षा जन्म स्थान से ही पूरी की। आगे की पढ़ाई के लिए उन्होंने बंगलूर के सेंट्रल कॉलेज में दाखिला लिया। लेकिन यहां उनके पास धन का अभाव था। अत: उन्हें टयूशन करना पड़ा। विश्वेश्वरैया ने 1881 में बीए की परीक्षा में अव्वल स्थान प्राप्त किया। इसके बाद मैसूर सरकार की मदद से इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए पूना के साइंस कॉलेज में दाखिला लिया। 1883 की एलसीई व एफसीई (वर्तमान समय की बीई उपाधि) की परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त करके अपनी योग्यता का परिचय दिया। इसी उपलब्धि के चलते महाराष्ट्र सरकार ने इन्हें नासिक में सहायक इंजीनियर के पद पर नियुक्त किया।

        दक्षिण भारत के मैसूर, कर्र्नाटक को एक विकसित एवं समृद्धशाली क्षेत्र बनाने में भारत रत्न इंजीनियर सर मोक्षगुण्डम विश्वेवश्वरैया का अभूतपूर्व योगदान है। तकरीबन 55 वर्ष पहले जब देश स्वंतत्र नहीं था, तब कृष्णराजसागर बांध, भद्रावती आयरन एंड स्टील व‌र्क्स, मैसूर संदल ऑयल एंड सोप फैक्टरी, मैसूर विश्वविद्यालय, बैंक ऑफ मैसूर समेत अन्य कई महान उपलब्धियां एमवी ने कड़े प्रयास से ही संभव हो पाई। इसीलिए इन्हें कर्नाटक का भगीरथ भी कहते हैं। जब वह केवल 32 वर्ष के थे, उन्होंने सिंधु नदी से सुक्कुर कस्बे को पानी की पूर्ति भेजने का प्लान तैयार किया जो सभी इंजीनियरों को पसंद आया। सरकार ने सिंचाई व्यवस्था को दुरुस्त करने के उपायों को ढूंढने के लिए समिति बनाई। इसके लिए भारत रत्न इंजीनियर सर मोक्षगुण्डम विश्वेवश्वरैया ने एक नए ब्लॉक सिस्टम को ईजाद किया। उन्होंने स्टील के दरवाजे बनाए जो कि बांध से पानी के बहाव को रोकने में मदद करता था। उनके इस सिस्टम की प्रशंसा ब्रिटिश अधिकारियों ने मुक्तकंठ से की। आज यह प्रणाली पूरे विश्व में प्रयोग में लाई जा रही है। विश्वेश्वरैया ने मूसा व इसा नामक दो नदियों के पानी को बांधने के लिए भी प्लान तैयार किए। इसके बाद उन्हें मैसूर का चीफ इंजीनियर नियुक्त किया गया।

        उस वक्तराज्य की हालत काफी बदतर थी। विश्वेश्वरैया लोगों की आधारभूत समस्याओं जैसे अशिक्षा, गरीबी, बेरोजगारी, बीमारी आदि को लेकर भी चिंतित थे। फैक्टरियों का अभाव, सिंचाई के लिए वर्षा जल पर निर्भरता तथा खेती के पारंपरिक साधनों के प्रयोग के कारण समस्याएं जस की तस थीं। इन समस्याओं के समाधान के लिए विश्वेश्वरैया ने इकॉनोमिक कॉन्फ्रेंस के गठन का सुझाव दिया। मैसूर के कृष्ण राजसागर बांध का निर्माण कराया। कृष्णराजसागर बांध के निर्माण के दौरान देश में सीमेंट नहीं बनता था, इसके लिए इंजीनियरों ने मोर्टार तैयार किया जो सीमेंट से ज्यादा मजबूत था। 1912 में विश्वेश्वरैया को मैसूर के महाराजा ने दीवान यानी मुख्यमंत्री नियुक्त कर दिया।
विश्वेश्वरैया शिक्षा की महत्ता को भलीभांति समझते थे। लोगों की गरीबी व कठिनाइयों का मुख्य कारण वह अशिक्षा को मानते थे। उन्होंने अपने कार्यकाल में मैसूर राज्य में स्कूलों की संख्या को 4,500 से बढ़ाकर 10,500 कर दिया। इसके साथ ही विद्यार्थियों की संख्या भी 1,40,000 से 3,66,000 तक पहुंच गई। मैसूर में लड़कियों के लिए अलग हॉस्टल तथा पहला फ‌र्स्ट ग्रेड कॉलेज (महारानी कॉलेज) खुलवाने का श्रेय भी विश्वेश्वरैया को ही जाता है। उन दिनों मैसूर के सभी कॉलेज मद्रास विश्वविद्यालय से संबद्ध थे। उनके ही अथक प्रयासों के चलते मैसूर विश्वविद्यालय की स्थापना हुई जो देश के सबसे पुराने विश्वविद्यालयों में से एक है। इसके अलावा उन्होंने श्रेष्ठ छात्रों को अध्ययन करने के लिए विदेश जाने हेतु छात्रवृत्ति की भी व्यवस्था की। उन्होंने कई कृषि, इंजीनियरिंग व औद्योगिक कालेजों को भी खुलवाया।
        वह उद्योग को देश की जान मानते थे, इसीलिए उन्होंने पहले से मौजूद उद्योगों जैसे सिल्क, संदल, मेटल, स्टील आदि को जापान व इटली के विशेषज्ञों की मदद से और अधिक विकसित किया। धन की जरूरत को पूरा करने के लिए उन्होंने बैंक ऑफ मैसूर खुलवाया। इस धन का उपयोग उद्योग-धंधों को विकसित करने में किया जाने लगा। 1918 में विश्वेश्वरैया दीवान पद से सेवानिवृत्त हो गए। औरों से अलग विश्वेश्वरैया ने 44 वर्ष तक और सक्रिय रहकर देश की सेवा की। सेवानिवृत्ति के दस वर्ष बाद भद्रा नदी में बाढ़ आ जाने से भद्रावती स्टील फैक्ट्री बंद हो गई। फैक्ट्री के जनरल मैनेजर जो एक अमेरिकन थे, ने स्थिति बहाल होने में छह महीने का वक्त मांगा। जोकि विश्वेश्वरैया को बहुत अधिक लगा। उन्होंने उस व्यक्ति को तुरंत हटाकर भारतीय इंजीनियरों को प्रशिक्षित कर तमाम विदेशी इंजीनियरों की जगह नियुक्त कर दिया। मैसूर में ऑटोमोबाइल तथा एयरक्राफ्ट फैक्टरी की शुरूआत करने का सपना मन में संजोए विश्वेश्वरैया ने 1935 में इस दिशा में कार्य शुरू किया। बंगलूर स्थित हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स तथा मुंबई की प्रीमियर ऑटोमोबाइल फैक्टरी उन्हीं के प्रयासों का परिणाम है। 1947 में वह आल इंडिया मैन्युफैक्चरिंग एसोसिएशन के अध्यक्ष बने। उड़ीसा की नदियों की बाढ़ की समस्या से निजात पाने के लिए उन्होंने एक रिपोर्ट पेश की। इसी रिपोर्ट के आधार पर हीराकुंड तथा अन्य कई बांधों का निर्माण हुआ।
        वह किसी भी कार्य को योजनाबद्ध तरीके से पूरा करने में विश्वास करते थे। 1928 में पहली बार रूस ने इस बात की महत्ता को समझते हुए प्रथम पंचवर्षीय योजना तैयार की थी। लेकिन विश्वेश्वरैया ने आठ वर्ष पहले ही 1920 में अपनी किताब रिकंस्ट्रक्टिंग इंडिया में इस तथ्य पर जोर दिया था। इसके अलावा 1935 में प्लान्ड इकॉनामी फॉर इंडिया भी लिखी। मजे की बात यह है कि 98 वर्ष की उम्र में भी वह प्लानिंग पर एक किताब लिख रहे थे। देश की सेवा ही विश्वेश्वरैया की तपस्या थी। 1955 में उनकी अभूतपूर्व तथा जनहितकारी उपलब्धियों के लिए उन्हें देश के सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से नवाजा गया। जब वह 100 वर्ष के हुए तो भारत सरकार ने डाक टिकट जारी कर उनके सम्मान को और बढ़ाया। 101 वर्ष की दीर्घायु में 14 अप्रैल 1962 को उनका स्वर्गवास हो गया। 1952 में वह पटना गंगा नदी पर पुल निर्माण की योजना के संबंध में गए। उस समय उनकी आयु 92 थी। तपती धूप थी और साइट पर कार से जाना संभव नहीं था। इसके बावजूद वह साइट पर पैदल ही गए और लोगों को हैरत में डाल दिया। विश्वेश्वरैया ईमानदारी, त्याग, मेहनत इत्यादि जैसे सद्गुणों से संपन्न थे। उनका कहना था, कार्य जो भी हो लेकिन वह इस ढंग से किया गया हो कि वह दूसरों के कार्य से श्रेष्ठ हो।
उनकी जीवनी हमारे लिये प्रेरणा है

गुरुवार, 11 सितंबर 2014

muktak: sanjiv

मुक्तक:
संजीव
*
मरघट में है भीड़ पनघट है वीरान
मोल नगद का न्यून है उधार की शान
चमक-दमक की चाह हुई सादगी मौन
सब अपने में लीन किसको पूछे कौन 
*


doha salila:

बुंदेली दोहांजलि
संजीव
*
जब लौं बऊ-दद्दा जिए, भगत रए सुत दूर
अब काए खों कलपते?, काए हते तब सूर?
*
खूबई तौ खिसियात ते, दाबे कबऊं न गोड़
टँसुआ रोक न पा रए, गए डुकर जग छोड़
*
बने बिजूका मूँड़ पर, झेलें बरखा-घाम
छाँह छीन काए लई, काए बिधाता बाम
*
ए जी!, ओ जी!, पिता जी, सुन खें कान पिराय
'बेटा' सुनबे खों जिया, हुड़क-हुड़क अकुलाय
*
      

Pitar, shraddh aur vidhi -kavita vachakanavi

पितर, श्राद्ध और विधि  
-  कविता वाचक्नवी

'श्राद्ध' शब्द बना है 'श्रद्धा' से। 'श्रद्धा' शब्द की व्युत्पत्ति 'श्रत्' या 'श्रद्' शब्द से 'अङ्' प्रत्यय की युति होने पर होती है, जिसका अर्थ है- 'आस्तिक बुद्धि। ‘सत्य धीयते यस्याम्’ अर्थात् जिसमें सत्य प्रतिष्ठित है। छान्दोग्योपनिषद् 7/19 व 20 में श्रद्धा की दो प्रमुख विशेषताएँ बताई गई हैं - मनुष्य के हृदय में निष्ठा / आस्तिक बुद्धि जागृत कराना व मनन कराना।

मनुष्य समाज की समस्या यह है कि वह दिनों-दिन विचार और बुद्धि के खेल खेलने में तो निष्णात होता जा रहा है, किन्तु श्रद्धा का अभाव उसके जीवन को दु:ख और पीड़ा से भरने का बड़ा कारक है। विचार के बिना श्रद्धा पंगु है व श्रद्धा तथा भावना के बिना विचार । वह अंध-श्रद्धा हो जाती है क्योंकि विवेक के अभाव में यही पता नहीं कि श्रद्धा किस पर व क्यों लानी है या कि उसका अभिप्राय क्या है। इसीलिए ध्यान देने की आवश्यकता है कि मूलतः श्रद्धा का शाब्दिक अर्थ हृदय में निष्ठा व आस्तिक बुद्धि है..... बुद्धि के साथ श्रद्धा। 

यह तो रही 'श्राद्ध' के अर्थ की बात। पितरों से जोड़ कर इस शब्द की बात करें तो उनके प्रति श्रद्धा, कुल- परिवार व अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा, अपनी जातीय-परम्परा के प्रति श्रद्धा, माता-पिता-आचार्यों के प्रति श्रद्धा की भावना से प्रेरित होकर किए जाने वाले कार्यों को 'श्राद्ध' कहा जाता है। यदि हमने अपने घर-परिवार व समाज के जीवित पितरों व माता-पिता के शारीरिक-मानसिक-आत्मिक सुख की भावना से कुछ नहीं किया तो मृतक पितरों के नाम पर भोजन करवाने मात्र से हमारे पितरों की आत्मा शान्ति नहीं पाएगी। न ही पितर केवल भोजन के भूखे होते हैं। वे अपने कुल व सन्तानों में वे मूलभूत आदर्श देखने में अधिक सुख पाते हैं जिसकी कामना कोई भी अपनी सन्तान से करता है । इसलिए यदि हम में वे गुण नहीं हैं व हम अपने जीवित माता-पिता या बुजुर्गों को सुख नहीं दे सकते तो निश्चय जानिए कि तब श्राद्ध के नाम किया जाना वाला सारा कर्मकाण्ड तमाशा-मात्र है। 

संस्कृत न जानने वालों को बता दूँ कि 'पितर' शब्द संस्कृत के 'पितृ' से बना है जो पिता का वाचक है, किन्तु माता व पिता (पेरेंट्स) के लिए संस्कृत में 'पितरौ' शब्द है। इसी से हिन्दी में 'पिता' व जर्मन में 'Vater' (जर्मन में 'V' का उच्चारण 'फ' होने से उच्चारण है 'फाटर' ) शब्द बना है व उसी से अङ्ग्रेज़ी में 'फादर' शब्द बना। संस्कृत में 'पितरौ" क्योंकि माता व पिता (अर्थात् 'पेरेंट्स' ) का वाचक है तो जर्मनी में इसीलिए 'पितर' शब्द के लिए 'Manes' (उच्चारण कुछ-कुछ मानस शब्द जैसा) शब्द कहा जाता है जबकि इसी से अङ्ग्रेज़ी में शब्द बना Manes (उच्चारण मैनेस् )। 'माँ' से इसकी उच्चारण व वर्तनी साम्यता देखी-समझी जा सकती है।

समस्या यह है कि श्राद्ध को लोग कर्मकाण्ड समझते व करते हैं और वैसा कर वे अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेते हैं। जबकि मृतक पितरों के नाम पर पूजा करवा कर यह समझना कि किसी को खाना खिलाने से उन तक पहुँच जाएगा, यह बड़ी भूल है। जीवित पितरों को सुख नहीं दो व मृतक पितरों के नाम पर कर्मकाण्ड करना ही गड़बड़ है। कर्मकाण्ड श्राद्ध नहीं है। कोई भी कर्मकाण्ड मात्र प्रतीक-भर है मूल जीवन में अपनाने योग्य किसी भी संस्कार का। यदि जीवन में उस संस्कार को आचरण में नहीं लाए तो कर्मकाण्ड केवल तमाशा है। घरों परिवारों में बुजुर्ग और बड़े-बूढ़े दु:ख पाते रहें, उनके प्रति श्रद्धा का वातवरण घर में लेशमात्र भी न हो और हम मृतक पितरों को जल चढ़ाते रहें, तर्पण करते रहें या उनके नाम पर श्राद्ध का आयोजन कर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझते रहें, इस से बड़ा क्रूर व हास्यास्पद पाखण्ड और क्या होगा।

वस्तुतः मूल अर्थों में श्राद्ध, श्रावणी उपाकर्म के पश्चात् अपने-अपने कार्यक्षेत्र में लौटते समय वरिष्ठों आदि के अभिनंदन सत्कार के लिए होने वाले आयोजन के निमित्त समाज द्वारा प्रचलित परम्परा थी, जिसका मूल अर्थ व भावना लुप्त होकर यह केवल प्रदर्शन-मात्र रह गई है। मूल अर्थों में यह 'पितृयज्ञ' का वाचक है व उसी भावना से इसका विनियोग समाज ने किया था, इसीलिए इसे पितृपक्ष भी कहा जाता है; किन्तु अब इसे नेष्ट, कणातें, अशुभ, नकारात्मक दिन, शुभकार्य प्रारम्भ करने के लिए अपशकुन आदि मान लिया गया है। हमारे पूर्वजों से जुड़ा कोई दिन अशुभ कैसे हो सकता है, नकारात्मक प्रभाव कैसे दे सकता है, अपशकुन कैसे कर सकता है ? क्या हमारे पूर्वज हमारे लिए अनिष्ट चाह सकते हैं ? क्या किसी के भी पूर्वज उनके लिए अशुभकारी हो सकते हैं? माता-पिता के अतिरिक्त संसार में कोई भी अन्य सम्बन्ध केवल और केवल हितकारी व निस्स्वार्थ नहीं होता। सन्तान भी माता-पिता का वैसा हित कदापि नहीं चाह सकती जैसा माता-पिता अपनी संतान के लिए स्वयं हानि, दु:ख व निस्स्वार्थ बलिदान कर लेते हैं, उसे अपने से आगे बढ़ाना चाहते हैं, उसे अपने से अधिक पाता हुआ देखना चाहते हैं और ऐसा होता देख ईर्ष्या नहीं अपितु सुख पाते हैं। ऐसे में 'पितृपक्ष' (पितृयज्ञ की विशेष अवधि) को नकारात्मक प्रभाव देने वाला मानना कितना अनुचित व अतार्किक है। 

आज समाज में सबसे निर्बल व तिरस्कृत कोई हैं, तो वे हैं हमारे बुजुर्ग। वृद्धाश्रमों की बढ़ती कतारों वाला समाज श्राद्ध के नाम पर कर्मकाण्ड कर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ ले तो यह भीषण विडम्बना ही है। यदि हम घर परिवारों में उन्हें उचित आदर-सत्कार, मान-सम्मान व स्नेह के दो बोल भी नहीं दे सकते तो श्राद्ध के नाम पर किया गया हमारा सब कुछ केवल तमाशा व ढोंग है। यों भी वह अतार्किक व श्राद्ध का गलत अभिप्राय लगा कर किया जाने वाला कार्य तो है ही। जब तक इसका सही अर्थ समझ कर इसे सही ढंग से नहीं किया जाएगा तब तक यह करने वाले को कोई फल नहीं दे सकता (यदि आप किसी फल की आशा में इसे करते हैं तो)। वैसे प्रत्येक कर्म अपना फल तो देता ही है और उसे अच्छा किया जाए तो अच्छा फल भी मिलता ही है। 

मृतकों तक कोई सन्देश या किसी का खाया भोजन नहीं पहुँचता और न ही आपके-हमारे दिवंगत पूर्वज मात्र खाने-पीने से संतुष्ट और सुखी हो जाने वाले हैं। भूख देह को लगती है, आत्मा को यह आहार नहीं चाहिए। मृतक पूर्वजों को भोजन पहुँचाने ( जिसकी उन्हें आवश्यकता ही नहीं) से अधिक बढ़कर आवश्यक है कि भूखों को भोजन मिले, अपने जीवित माता पिता व बुजुर्गों को आदर सम्मान से हमारे घरों में स्थान, प्रतिष्ठा व अपनापन मिले, उन्हें कभी कोई दुख सन्ताप हमारे कारण न हो। उनके आशीर्वादों के हम सदा भागी बनें और उनकी सेवा में सुख पाएँ। किसी दिन वृद्धाश्रम में जाकर उन सबको आदर सत्कार पूर्वक अपने हाथ से भोजन करवा उनके साथ समय बिताकर देखिए... कितने आशीष मिलेंगे। परिवार के वरिष्ठों व अपने माता-पिता आदि की सेवा सम्मान में जरा-सा जुट कर देखिए, कैसे घर पर सुख सौभाग्य बरसता है। 


श्राद्ध के माध्यम से मृतकों से तार जोड़ने या आत्माओं से संबंध जोड़ने वाले अज्ञानियों को कौन बताए कि पुनर्जन्म तो होता है, विज्ञान भी मानता है; किन्तु यदि इन्हें आत्मा के स्वरूप और कर्मफल सिद्धान्त का सही-सही पता होता तो ये ऐसी बात नहीं करते। आत्मा का किसी से कोई रिश्ता नहीं होता, न आप हम उसे यहाँ से संचालित कर सकते हैं। प्रत्येक आत्मा अपने देह के माध्यम द्वारा किए कर्मों के अनुसार फल भोगता है और तदनुसार ही अगला जीवन पाता है । आत्मा को 'रिमोट ऑपरेशन' से 'कंट्रोल' करने की उनकी थ्योरी बचकानी, अतार्किक व भारतीय दर्शन तथा वैदिक वाङ्मय के विरुद्ध है।


अभिप्राय यह नहीं कि श्राद्ध गलत है या उसे नहीं करना चाहिए। वस्तुतः तो जीवन ही श्राद्धमय हो जाए तब भी गलत नहीं, अपितु बढ़िया ही है। वस्तुत: इस लेख का मूल अभिप्राय यह है कि श्राद्ध क्या है, क्यों इसका विधान किया गया, इसके करने का अर्थ क्या है, भावना क्या है आदि को जान कर इसे करें। श्राद्ध के नाम पर पाखण्ड व ढकोसला नहीं करें अपितु सच्ची श्रद्धा से कुल- परिवार व अपने पूर्वजों के प्रति, अपनी जातीय-परम्परा के प्रति, माता-पिता-आचार्यों के प्रति, समाज के बुजुर्गों व वृद्धों के प्रति श्रद्धा की भावना से प्रेरित होकर अपने तन, मन, धन से तथा निस्स्वार्थ व कृतज्ञ भाव से जीवन जीना व उनके ऋण को अनुभव करते हुए पितृयज्ञ की भावना बनाए रखना ही सच्चा श्राद्ध है। 

मंगलवार, 9 सितंबर 2014

दोहा सलिला :

बुंदेली दोहा
*
का भौ काय नटेर रय, दीदे मो खौं देख?
कई-सुनी बिसरा- लगा, गले मिटा खें रेख.
*
बऊ-दद्दा खिसिया रए, कौनौ धरें न कान
मौडीं-मौड़ां बाँट रये, अब बूढ़न खें ज्ञान.
*


bundeli muktak: sanjiv

बुंदेली मुक्तक 
संजीव 
*
को खों हेरत फिर रईं बिन्ना?
पाँव नच रए ता-ता-धिन्ना 
उटकन दीदा काढ़ कसीदा
काए नैन नटेरे भिन्ना?
*