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शुक्रवार, 5 सितंबर 2014

lekh vaishwikata ke nikash par bharteey yantrikeey sanrachnayen -sanjiv

लेख: 
वैश्विकता के निकष पर भारतीय यांत्रिकी संरचनाएँ 
अभियंता संजीव वर्मा 'सलिल' 
*
भारतीय परिवेश में अभियांत्रिकी संरचनाओं को 'वास्तु' कहा गया है। छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी प्रत्येक संरचना को अपने आपमें स्वतंत्र और पूर्ण व्यक्ति के रूप में   'वास्तु पुरुष' कहा गया है। भारतीय परंपरा प्रकृति को माता और पूज्य मानती है, पाश्चात्य मानक उसे निष्प्राण पदार्थ मानकर उसका दोहन  शोषण भी करते हैं और फेंक भी देते हैं। भारतीय यांत्रिक संरचनाओं के दो वर्ग वैदिक-पौराणिक काल की संरचनाओं और आधुनिक संरचनाओं के रूप में किये जा सकते हैं और तब उनको वैश्विक गुणवत्ता, उपयोगिता और दीर्घता के मानकों पर परखा जा सकता है। 

शिव की कालजयी अभियांत्रिकी: 

पौराणिक साहित्य में सबसे अधिक समर्थ अभियंता शिव हैं। शिव नागरिक यांत्रिकी (सिविल इंजीनियरिग), शस्त्र यांत्रिकी, शल्य यांत्रिकी, चिकित्सा यांत्रिकी, पर्यावरण यांत्रि की के साथ परमाण्विक यांत्रिकी में भी निष्णात हैं। वे इतने समर्थ यंत्री है कि पदार्थ और प्रकृति के मूल स्वभाव को भी परिवर्तित कर सके, प्राकृतिक परिवर्तनों के कारण जनगण की सुनिश्चित मृत्यु को भी टाल सके। उन्हें मृत्युंजय और महाकाल विशेषण प्राप्त हुए। 



शिव की अभियांत्रिकी का प्रथम ज्ञात नमूना ६ करोड़ से अधिक वर्ष पूर्व का है जब उन्होंने टैथीज़ महासागर के सूखने से निकली धरा पर मानव सभ्यता के प्रसार हेतु अपरिहार्य मीठे पेय जल प्राप्ति हेतु सर्वोच्च अमरकंटक पर्वत पर दुर्लभ आयुर्वेदिक औषधियों के सघन वन के बीच में अपने निवास स्थान के समीप बांस-कुञ्ज से घिरे सरोवर से प्रबल जलधार निकालकर गुजरात समुद्र तट तक प्रवाहित की जिसे आज सनातन सलिला नर्मदा के नाम से जाना जाता है। यह नर्मदा करोड़ों वर्षों तक मानव सभ्यता केंद्र रही है। नागलोक और गोंडवाना के नाम से यह अंचल विख्यात रहा है। नर्मदा को शिवतनया, शिव स्वेदोद्भवा, वंशलोचनी आदि नाम इसी सन्दर्भ में दिये गये हैं।

जीवनदायी नर्मदा पर अधिकार के लिए भीषण युद्ध हुए। नाग, रक्ष, देव, किन्नर, गन्धर्व, ऋक्ष, उलूक दनुज, असुर आदि अनेक सभ्यताएं सदियों तक लड़ती रहीं। अन्य कुशल परमाणुयांत्रिकीविद दैत्यराज त्रिपुर ने परमाण्विक ऊर्जा संपन्न ३ नगर बनाकर नर्मदा पर कब्जा किया तो शिव ने परमाण्विक विस्फोट कर उसे नष्ट कर दिया जिससे नि :सृत ऊर्जा ने ज्वालामुखी को जन्म दिया।  लावा के जमने से बनी चट्टानें लौह तत्व की अधिकता के कारण जाना हो गयी। यह स्थल लम्हेटाघाट के  नाम से ख्यात है। कालांतर में चट्टानों पर धूल-मिट्टी जमने से पर्वत-पहाड़ियां और उनके बीच में तालाब बने। जबलपुर से ३२ किलोमीटर दूर ऐसी ही एक पहाड़ीपर ज्वालादेवी मंदिर मूलतः ऐसी ही चट्टान को पूजने से बना। जबलपुर के ५२ तालाब इसी समय बने थे जो अब नष्टप्राय हैं। टेथीज़ महासागर के पूरी तरह सूख्नने और वर्तमान भूगोल के बेबी माउंटेन कहे जानेवाले हिमालय पर्वत के बनने पर शिव ने मानसरोवर को अपना आवास बनाकर भगीरथ के माध्यम से नयी जलधारा प्रवाहित की जिसे गंगा कहा गया।

महर्षि अगस्त्य के अभियांत्रिकी कार्य:

महर्षि अगस्त्य अपने समय के कुशल परमाणु शक्ति विशेषज्ञ थे। विंध्याचल पर्वत की ऊँचाई और दुर्गमता उत्तर से दक्षिण जाने के मार्ग में  बाधक हुई तो महर्षि ने परमाणु शक्ति का प्रयोग कर पर्वत को ध्वस्त कर मार्ग बनाया। साहित्यिक भाषा में इसे  मानवीकरण कर पौराणिक गाथा में लिखा गया कि अपनी ऊंचाई पर गर्व कर विंध्याचल सूर्य का पथ अवरुद्ध करने लगा तो  सृष्टि में अन्धकार छाने लगा। देवताओं ने महर्षि अगस्त्य से समाधान हेतु प्रार्थना की। महर्षि को देखकर विंध्याचल प्रणाम करने झुका तो महर्षि ने आदेश दिया कि दक्षिण से मेरे लौटने तक ऐसे ही झुके रहना और वह आज तक झुका है। 

इनलाइन चित्र 3

दस्युओं द्वारा आतंक फैलाकर समुद्र में छिप जाने की घटनाएँ बढ़ने पर अगस्त्य ने परमाणु शक्ति का प्रयोग कर समुद्र का जल सुखाया और राक्षसों का संहार किया। पौराणिक कथा में कहा गया की अगस्त्य ने चुल्लू में समुद्र का जल पी लिया। राक्षसों से आर्य ऋषियों की रक्षा के लिए अगस्त्य ने नर्मदा के दक्षिण में  अपना आश्रम (परमाणु अस्त्रागार तथा शोधकेन्द्र) स्थापित किया। किसी समय नर्मदा घाटी के एकछत्र सम्राट रहे डायनासौर राजसौरस नर्मदेंसिस  खोज लिए जाने के बाद इस क्षेत्र की प्राचीनता और उक्त कथाएँ अंतर्संबन्धित और  प्रामाणिकता होना असंदिग्ध है।
रामकालीन अभियांत्रिकी:  


रावण द्वारा परमाण्विक शस्त्र  विकसित कर देवों तथा मानवों पर अत्याचार किये जाने  को सुदृढ़ दुर्ग के रूप में बनाना यांत्रिकी का अद्भुत नमूना था। रावण की सैन्य यांत्रिकी विद्या और कला अद्वितीय थी।  स्वयंवर के समय राम ने शिव का एक परमाण्वास्त्र जो जनक के पास था  पास था,  रावण हस्तगत करना चाहता था नष्ट किया। सीताहरण  में प्रयुक्त रथ जो भूमार्ग और नभमार्ग पर चल सकता था वाहन यांत्रिकी की मिसाल था। राम-रावण  परमाण्विक युद्ध के समय शस्त्रों से निकले यूरेनियम-थोरियम के कारण सहस्त्रों वर्षों तक लंका  दुर्दशा रही जो हिरोशिमा नागासाकी की हुई थी। श्री राम के लिये नल-नील द्वारा लगभग १३ लाख वर्ष पूर्व निर्मित रामेश्वरम सेतु अभियांत्रिकी की अनोखी मिसाल है। सुषेण वैद्य द्वारा बायोमेडिकल इंजीनियरिंग का प्रयोग युद्ध अवधि में प्रतिदिन घायलों का इस तरह उपचार किया गया की वे अगले दिन पुनः युद्ध कर सके।   

कृष्णकालीन अभियांत्रिकी:

[Image: 0373_dwarka01.jpg]लाक्षाग्रह, इंद्रप्रस्थ तथा द्वारिका कृष्णकाल की अद्वितीय अभियांत्रिकी संरचनाएँ हैं। सुदर्शन चक्र, पाञ्चजन्य शंख, गांडीव धनुष आदि शस्त्र निर्माण कला के श्रेष्ठ उदाहरण हैं। महाभारत  पश्चात अश्वत्थामा द्वारा उत्तरा के गर्भस्थ शिशु पर प्रहार, श्रीकृष्ण द्वारा सुरक्षापूर्वक शिशु जन्म कराना बायो मेडिकल इंजीनियरिंग का अद्भुत उदाहरण है। गुजरात में समुद्रतट पर कृष्ण द्वारा बसाई गयी द्वारिका नगरी उनकी मृत्यु पश्चात जलमग्न हो गयी। २००५ से भारतीय नौसेना के सहयोग से इसके अन्वेषण का कार्य प्रगति पर है। वैज्ञानिक स्कूबा डाइविंग से इसके रहस्य  जानने  में लगे हैं। 

श्रेष्ठ अभियांत्रिकी के ऐतिहासिक उदाहरण :

श्रेष्ठ भारतीय संरचनाओं में से कुछ इतनी प्रसिद्ध हुईं कि  उनका रूपांतरण कर निर्माण का श्रेय  सुनियोजित प्रयास शासकों द्वारा किया गया। उनमें से कुछ निम्न  निम्न हैं:   
    
तेजोमहालय (ताजमहल) आगरा: 


हिन्दू राजा परमार देव  द्वारा ११९६ में बनवाया गया तेजोमहालय  (शिव के पाँचवे  रूप अग्रेश्वर महादेव नाग नाथेश्वर का उपासना गृह तथा राजा का आवास) भवन यांत्रिकी कला का अद्भुत उदाहरण है जिसे विश्व के  सात आश्चर्यों में गिना जाता है

तेजो महालय के रेखांकन  

 १०८ कमल पुष्पों तथा १०८ कलशों से सज्जित संगमरमरी जालियों से सज्जित यह भवन ४०० से अधिक कक्ष तथा तहखाने हैं। इसके गुम्बद निर्माण के समय यह व्यवस्था भी की  गयी है कि बूँद-बूँद वर्षा टपकने से शिवलिंग का जलाभिषेक अपने आप होता रहे

विष्णु स्तम्भ (क़ुतुब मीनार) दिल्ली : 
युनेस्को द्वारा विश्व धरोहर घोषित, ​दक्षिण दिल्ली के विष्णुपद गिरि में राजा विक्रमादित्य के नवरत्नों में से एक प्रख्यात ज्योतिर्विद आचार्य मिहिर की शोध तथा निवासस्थली मिहिरा अवली (महरौली) में ​दिन-रात के प्रतीक 12 त्रिभुजाका​रों - 12 कमल पत्रों ​और 27 
नक्षत्रों
​ के प्रतीक 27 पैवेलियनों सहित निर्मित 7 मंज़िली ​विश्व की सबसे ऊँची 
मीनार ​(72.7 मीटर
​,
आधार 
व्यास 14.3 
मीटरशिखर व्यास 2.75 मीटर
,​379 सीढियाँनिर्माण काल सन 1193 पूर्वविष्णु ध्वज/स्तंभ (क़ुतुब मीनार) भारतीय अभियांत्रिकी संरचनाओं के श्रेष्ठता का उदाहरण है। इस पर सनातन धर्म के देवों, मांगलिक प्रतीकों तथा संस्कृत उद्धरणों का अंकन है

  
​​इन पर मुग़लकाल में समीपस्थ जैन मंदिर तोड़कर उस सामग्री से पत्थर लगाकर आयतें लिखाकर मुग़ल इमारत का रूप देने का प्रयास कुतुबुद्दीन ऐबक व् इलततमिश द्वारा 1199-1368 में किया गया ।   निकट ही ​चन्द्रगुप्त द्विती द्वारा विष्णुपद गिरि पर स्थापित और विष्णु भगवान को समर्पित 
गिरि पर स्थापित और विष्णु भगवान को समर्पित मीटर ऊंचा 6 टन वज़न का ध्रुव/गरुड़स्तंभ (लौह स्तंभ) स्तम्भ ​चंद्रगुप्त  विक्रमादित्य ने बाल्हिक युद्ध में विजय पश्चात बनवाया। इस पर अंकित लेख में सन 1052  के राजा अंनगपाल द्वितीय का उल्लेख हैतोमर नरेश विग्रह ने इसे खड़ा करवाया जिस पर सैकड़ों वर्षों बाद भी जंग नहीं लगी। फॉस्फोरस मिश्रित लोहे से निर्मित यह स्तंभ भारतीय धात्विक यांत्रिकी की श्रेष्ठता का अनुपम उदाहरण हैआई. आई. टी. कानपूर के प्रो. बालासुब्रमण्यम  के अनुसार हाइड्रोजन फॉस्फेट हाइड्रेट (FePO4-H3PO4-4H2O) जंगनिरोधी ​सतह है का निर्माण करता है

जंतर मंतर :
Samrat Yantra New Delhi.jpgसवाई जयसिंह द्वितीय द्वारा 1724 में दिल्ली जयपुर, उज्जैन, मथुरा और वाराणसी में ​निर्मित जंतर मंतर प्राचीन भारत की वैज्ञानिक उन्नति की मिसाल है।यहाँ​ सम्राट यंत्र सूर्य की सहायता से समय और ग्रहों की स्थितिमिस्र यंत्र वर्ष से सबसे छोटे ओर सबसे बड़े दिनराम यंत्र और जय प्रकाश यंत्र से खगोलीय पिंडों की गति जानी जा सकती ​है इनके अतिरिक्त दिल्ली, आगरा, ग्वालियर, जयपुर, चित्तौरगढ़, गोलकुंडा आदि के किले अपनी मजबूती, उपयोगिता और श्रेष्ठता की मिसाल हैं।​

आधुनिक अभियांत्रिकी संरचनाएँ:

भारतीय अभियांत्रिकी  संरचनाओं को शकों-हूणों और मुगलों के आक्रमणों के कारण पडी। मुगलों ने पुराने निर्माणों को बेरहमी से तोडा और  किये। अंग्रेजों ने भारत को एक इकाई बनाने के साथ अपनी प्रशासनिक पकड़ बनाने के लिये किये। स्वतंत्रता के पश्चात  सर मोक्षगुंडम विश्वेस्वरैया, डॉ. चन्द्रशेखर वेंकट रमण, डॉ. मेघनाद साहा आदि ने विविध परियोजनाओं को मूर्त किया। भाखरानागल, हीराकुड, नागार्जुन सागर, बरगी, सरदार सरोवर, टिहरी आदि जल परियोजनाओं ने कृषि  उत्पादन से भारतीय अभियांत्रिकी को गति दी।

जबलपुर, कानपूर, तिरुचिरापल्ली, शाहजहाँपुर, इटारसी आदि में  सीमा सुरक्षा बल हेतु अस्त्र-शास्त्र और सैन्य वाहन गुणवत्ता और मितव्ययिता के साथ बनाने में भारतीय संयंत्र किसी विदेशी संस्थान से पीछे नहीं हैं। 

परमाणु ऊर्जा संयंत्र निर्माण, परिचालन और दुर्घटना नियंत्रण में भारत के प्रतिष्ठानों ने विदेशी प्रतिष्ठानों की तुलना में बेहतर काम किया है।  कम सञ्चालन व्यय, अधिक रोजगार और उत्पादन के साथ कम दुर्घटनाओं ने परमाणु वैज्ञानिकों को प्रतिशत दिलाई है जिसका श्रेय डॉ. होमी जहांगीर भाभा को जाता है।

भारत की अंतरिक्ष परियोजनाएं और उपग्रह तकनालॉजी दुनिया में श्रेष्ठता, मितव्ययिता और सटीकता के लिए ख्यात हैं। सीमित संसाधनों के बावजूद भारत ने कीर्तिमान स्थापित किये हैं और खुद को प्रमाणित किया है। डॉ. विक्रम साराभाई का योगदान विस्मृत नहीं किया जा सकता।

इनलाइन चित्र 1भारत के अभियंता पूरी दुनिया में अपनी लगन, परिश्रम और योग्यता के लिए जाने जाते हैं ।  देश में प्रशासनिक सेवाओं की तुलना में  वेतन, पदोन्नति, सुविधाएँ और सामाजिक प्रतिष्ठा अत्यल्प होने के बावजूद भारतीय अभियांत्रिकी परियोजनाओं ने कीर्तिमान स्थापित किये हैं।

अग्निपुरुष डॉ. कलाम के नेतृत्व में भारतीय मिसाइल अभियांत्रिकी की  विश्व्यापी ख्याति प्राप्त की है। 
सारत: भारत की महत्वकांक्षी अभियांत्रिकी संरचनाएँ मेट्रो ट्रैन, दक्षिण रेल, वैष्णव देवी रेल परियोजना हो या बुलेट ट्रैन की भावी  योजना,राष्ट्रीय राजमार्ग चतुर्भुज हो या नदियों को जोड़ने की योजना भारतीय अभियंताओं ने हर चुनौती को स्वीकारा है। विश्व के किसी भी देश की तुलना में भारतीय संरचनाएँ और परियोजनाएं श्रेष्ठ सिद्ध हुई हैं। 

doha salila: sanjiv

दोहा सलिला :
संजीव 
*
सद्गुरु उसको मानिये, नित्य बताये खोट  
देख अदेखा मत करे, तुरत लगाये चोट 
*
गुरु वह जो हँस ज्ञान दे, प्रीचर करता प्रीच 
शिक्षक देता सीख ही, टीचर धन ले टीच 
*
गुरु की करी तलाश तो, पाये गुरु घंटाल
दी उपाधि लेकिन समझ, मिली न सालों-साल
*
टीचर जी बाजार में, मिलें टके के तीन  
दो कौड़ी पा दें बजा, भैंस सामने बीन 
*
छुरी बगल में ले- रखें, प्रीचर मुँह में राम
श्रेष्ठ बता निष्काम को, मन में जपते राम 
*
माँ पहली गुरु दे पढ़ा, जीवन का यदि पाठ 
पैर जमा सुत चल सके, खड़ी न होती खाट 
*
श्रद्धा बिन सम्मान दें, बिना स्नेह आशीष 
 छलनामय शिक्षक दिवस, गुरु पीटें निज शीश 

Guru-shishya: sanjiv

शिक्षक दिवस पर एक कहावत:
गुरु गुड तो चेला शक्कर अर्थात गुरु ने की श्रेष्ठ उनसे भी बेहतर बना.
श्रेष्ठ शिक्षक वही जिसका छात्र भी श्रेष्ठ हो, शिक्षक दिवस पर नमन शिक्षक-छात्र की परंपरा को :
विश्वामित्र - राम, लक्ष्मण
संदीपनी - कृष्णा, सुदामा
बुद्ध - आनंद
सुकरात - प्लेटो - अरस्तु - सिकंदर
रामकृष्ण परमहंस - स्वामी विवेकानंद
द्रोणाचार्य - अर्जुन, एकलव्य, भीम, युधिष्ठिर
परशुराम - कर्ण
डॉ. होमी जहांगीर भाभा - डॉ - साराभाई - डॉ. अब्दुल कलाम
बलराम - दुर्योधन
रामानंद - कबीर - मीरां
चाणक्य - चन्द्रगुप्त
स्वामी ब्रम्हानंद सरस्वती - महर्षि महेश योगी, स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती
गुरु रामदास - छत्रपति शिवाजी
रमाकांत आचरेकर - सचिन तेंदुलकर
इस सूची में आप भी जोड़िए कुछ नाम.

गुरुवार, 4 सितंबर 2014

lekh: manav sabhyata ko bhrteey virasat

मानव सभ्यता को भारतीय विरासत : 

भास्कराचार्य - गुरुत्वाकर्षण शक्ति की खोज न्यूटन से सदियों पहले की




आधुनिक युग में धरती की गुरुत्वाकर्षण शक्ति (पदार्थों को अपनी ओर खींचने की शक्ति) की खोज का श्रेय न्यूटन को दिया जाता है। वास्तव में गुरुत्वाकर्षण के रहस्य की खोज न्यूटन से कई सदियों पहले भास्कराचार्य ने कर ली थी। भास्कराचार्य ने अपने ग्रंथ सिद्धांतशिरोमणि में पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के बारे में लिखा है कि पृथ्वी आकाशीय पदार्थों को विशिष्ट शक्ति से अपनी ओर खींचती है। इस वजह से आसमानी पदार्थ पृथ्वी पर गिरता है। सिद्धांत शिरोमणी के गोलाध्याय भुवनखंड के अनुसार :- 



आकृष्टिशक्तिश्च मही तया यत् खस्थं गुरुस्वाभिमुखं स्वशक्तत्या।
आकृष्यते तत्पततीव भाति समेसमन्तात् क्व पतत्वियं खे।।



अर्थात् पृथ्वी अपनी आकर्षण शक्ति से भारी पदार्थों को अपनी ओर खींचती है इस कारण वह जमीन पर गिरते हैं किन्तु आकाश में समान ताकत चारों ओर से लगे, तो कोई कैसे गिरे? अर्थात् आकाश में ग्रह निरावलम्ब रहते हैं क्योंकि विविध ग्रहों की गुरुत्व शक्तियां संतुलन बनाए रखती हैं।


ऋषि भरद्वाज - विमान यांत्रिकी के जनक 


आधुनिक विज्ञान के मुताबिक राइट बंधुओं ने वायुयान का आविष्कार किया। जबकि सदियों पहले ही ऋषि भरद्वाज ने विमान शास्त्र के जरिए वायुयान को गायब करने के असाधारण विचार से लेकर, एक ग्रह से दूसरे ग्रह व एक दुनिया से दूसरी दुनिया में ले जाने की खोज कर डाली थी। वस्तुतः ऋषि भरद्वाज वायुयान के आविष्कारक हैं। 


गर्गमुनि - नक्षत्रों के खोजकर्ता 



गर्गमुनि ने श्रीकृष्ण और अर्जुन के बारे नक्षत्र विज्ञान के आधार पर जो कुछ बताया, वह पूरी तरह सही सिद्ध  हुआ। कौरव-पांडवों के बीच महाभारत युद्ध विनाशक रहा। इसके पीछे वजह यह थी कि युद्ध के पहले पक्ष में तिथि क्षय होने के तेरहवें दिन अमावस थी। इसके दूसरे पक्ष में भी तिथि क्षय थी। पूर्णिमा चौदहवें दिन आ गई और उसी दिन चंद्रग्रहण था। तिथि-नक्षत्रों की यही स्थिति व नतीजे गर्ग मुनिजी ने बहुत पहले बता दिये थे।

ऋषि विश्वामित्र - ज्ञान - पुरुषार्थ के समुच्चय 


ऋषि बनने से पहले विश्वामित्र क्षत्रिय (शासक) थे। ऋषि वशिष्ठ से कामधेनु गाय को पाने के लिये हुए युद्ध में मिली हार के बाद तपस्वी (ज्ञानसाधक / अन्वेषक) हो गये। विश्वामित्र ने भगवान शिव से अस्त्र विद्या पाई। विश्वामित्र ने ही प्रक्षेपास्त्र या मिसाइल प्रणाली लाखों साल पहले खोजी थी। विश्वामित्र ही ब्रह्म गायत्री मंत्र के दृष्टा माने जाते हैं। विश्वामित्र का अप्सरा मेनका पर मोहित होकर तप भंग होना प्रसिद्ध है। शरीर सहित त्रिशंकु को स्वर्ग भेजने का चमत्कार भी विश्वामित्र ने तपोबल (अलौकिक ज्ञान) से कर दिखाया था।

महर्षि सुश्रुत - शल्यविज्ञान के प्रणेता  


शल्यचिकित्सा विज्ञान यानी सर्जरी के जनक व दुनिया के पहले शल्यचिकित्सक (सर्जन) महर्षि सुश्रुत हैं। वे शल्यकर्म या आपरेशन में दक्ष थे। महर्षि सुश्रुत द्वारा लिखी गई सुश्रुतसंहिता ग्रंथ में शल्य चिकित्सा के बारे में कई अहम ज्ञान विस्तार से बताया है। इनमें सुई, चाकू व चिमटे जैसे तकरीबन 125 से भी ज्यादा शल्यचिकित्सा में जरूरी औजारों के नाम और 300 तरह की शल्यक्रियाओं व उसके पहले की जाने वाली तैयारियों, जैसे उपकरण उबालना आदि के बारे में पूरी जानकारी है। आधुनिक विज्ञान ने शल्य क्रिया की खोज लगभग चार सदी पहले की है। महर्षि सुश्रुत मोतियाबिंद, पथरी, हड्डी टूटना जैसे पीड़ाओं के उपचार के लिए शल्यकर्म यानी आपरेशन करने में माहिर थे। यही नहीं वे त्वचा बदलने की शल्य चिकित्सा भी करते थे।


आचार्य चरक -
चरकसंहिता जैसा महत्वपूर्ण आयुर्वेद ग्रंथ रचनेवाले आचार्य चरक आयुर्वेद विशेषज्ञ व त्वचा चिकित्सक हैं। आचार्य चरक ने शरीर विज्ञान, गर्भविज्ञान, औषधि विज्ञान के बारे में गहन शोधें की। आजकल सबसे ज्यादा होने वाली बीमारियों जैसे मधुमेह (डायबिटीज), हृदय रोग व क्षय रोग के निदान व उपचार की जानकारी बरसों पहले ही उजागर कर दी।



पतंजलि -
आधुनिक दौर में जानलेवा बीमारियों में एक कैंसर है।आज भी इसका उपचार लंबा, कष्टप्रद और खर्चीला है लेकिन कई सदियों पहले ही ऋषि पतंजलि ने कैंसर (कर्करोग का और्वेदिक औषधियों और योग से उपचार और निदान 

आचार्य च्यवन: 

बुधवार, 3 सितंबर 2014

geet: rakesh khandelwal

गीत:

राकेश खण्डेलवाल
*
आह न बोले, वाह न बोले
मन में है कुछ चाह न बोले
जिस पथ पर चलते मेरे पग
कैसी है वो राह न बोले…

फिर भी ओ आराध्य ह्रदय के पाषाणी ! इतना बतला दो
कितने गीत और लिखने हैं ?
कितने गीत और लिखने हैं, लिखे सुबह से शाम हो गई
थकी लेखनी लिखते लिखते, स्याही सभी तमाम हो गई

संझवाती, तुलसी का चौरा, ले गुलाब, गुलमोहर चन्दन
मौसम की हर अँगड़ाई से मैने किये नये अनुबन्धन
नदिया, वादी, ताल, सरोवर, कोयल की मदमाती कुहु से
शब्दों पर आभरण सजा कर, किया तुम्हारा ही अभिनन्दन

किन्तु उपासक के खंडित व्रत जैसा तप रह गया अधूरा
और अस्मिता दीपक की लौ में जलकर गुमनाम हो गई

अँधियारी रजनी में नित ही रँगे चांदनी चित्र तुम्हारे
अर्चन को नभ की थाली में दीप बना कर रखे सितारे
दिन की चौखट पर ऊषा की करवट लेकर तिलक लगाये
जपा तुम्हारा नाम खड़े हो, मैने निमिष निमिष के द्वारे

बन आराधक मैने अपनी निष्ठा भागीरथी बनाई
लगा तुम्हारे मंदिर की देहरी पर वह निष्काम हो गई

है इतना विश्वास कि मेरे गीतों को तुम स्वर देते हो
सागर की गहराई, शिखरों की ऊंचाई भर देते हो
भटके हुए भाव आवारा, शब्दों की नकेल से बाँधे
शिल्पों के इंगित से ही तुम उन्हें छंदमय कर देते हो

कल तक मेरे और तुम्हारे सिवा ज्ञात थी नहीं किसी को
आज न जाने कैसे बातें यह, बस्ती में आम हो गईं

जो अधरों पर संवरा आकर, एक नाम है सिर्फ़ तुम्हारा
और तुम्हारी मंगल आरति से गूँजा मन का चौबारा
हो ध्यानस्थ, तुम्हारे चित्रों से रँगकर नैनों के पाटल
गाता रहा तुम्हीं को केवल, मेरी धड़कन का इकतारा

किन्तु न तुमने एक सुमन भी अपने हाथों दिया मुझे है
जबकि तुम्हारे नाम-रूप की देहरी तीरथधाम हो गई

आशीषों की अनुभूति को मिला नीड़ न अक्षयवट का
तॄषित प्राण की तॄष्णाओं को, देखा, हाथ रूका मधुघट का
दूर दिशा के वंशीवादक ! तान जहां सब विलय हो रहीं
आज उसी बस एक बिन्दु पर सांसों का यायावर अटका

स्वर था दिया, शब्द भी सौंपे, और न अब गीतों का ॠण दो
एक बात को ही दोहराते अभिव्यक्तियां विराम हो गईं

अनुभूति को अहसासों को, बार बार पिंजरे में डाला
एक अर्थ से भरा नहीं मन, अर्थ दूसरा और निकाला
आदि-अंत में धूप-छाँह में, केवल किया तुम्हें ही वर्णित
अपने सारे संकल्पों में मीत तु्म्हें ही सदा संभाला

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nibndh: dohe ki wapsi -bhartendu mishra

साहित्यिक निबंध
दोहे की वापसी--भारतेन्दु मिश्र
समकालीन कविता में नवदोहा अभियान छंद की वापसी का प्रमुख
दस्तावेज़ है। जिस प्रकार उर्दू का शायर एक शेर में ही बड़ी से ड़ी
बात कह जाता है उसी प्रकार हिंदी में दोहा सूक्ष्मातिसूक्ष्म संवेदना 
को मुखर करने तथा गूढ़ातिगूढ़ वैचारिक दृष्टि को अभिव्यक्त करने 
की सामर्थ्य रखता है। दोहा लोकजीवन में रचा-बसा छंद है। 

संप्रति नये दोहे में आंचलिकता, ग्राम्यता, जनपदीयता के ललित
सौंदर्य-बोध व महानगरीय विरूपता की विसंगतियाँ सुंदरतम ढंग से
 अभिव्यक्त की जा रही हैं। पौराणिक, ऐतिहासिक, लौकिक बिंबों व 
प्रतीकों के माध्यम से आज का दोहा अपने वर्तमान की विविधवर्णी 
संवेदनाओं को बहुत अच्छे ढंग से मुखरित कर रहा है। आज का 
दोहा संसद से सड़क और गलियारों से हो कर सुदूर गाँव की पगडंडी 
से, खेतों-खलिहानों व चौपालों तक से समान रूप से जुड़ा है। 
गृह-रति-व्यंजक, पारिवारिक बिंब भी नये दोहे की मौलिक भूमि कहे 
जा सकते हैं। जिन दोहाकारों के स्वतंत्र दोहा संग्रह प्रकाशित हो चुके 
हैं उनके अतिरिक्त कुमार रवींद्र, योगेंद्र दत्त शर्मा, हरीश निगम, यश 
मालवीय, शरद सिंह, कुँअर बेचैन, राजेंद्र गौतम, राम बाबू रस्तोगी, 
कैलाश गौतम, गंगा प्रसाद शर्मा, माहेश्वर तिवारी, विज्ञान व्रत, 
चिरंजीत, उर्मिलेश, भगवान दास एजाज़, अब्दुल बिस्मिल्लाह, रमा 
सिंह, विद्या बिंदु सिंह आदि भी सार्थक दोहाकारों की सूची में शामिल 
किए जा सकते हैं।

आज के दोहे में कबीर का समाज सुधारक वाला स्वर प्रबल है। तुलसी 
की भक्तिपरकता, बिहारी की शृंगारिकता व रहीम की सूक्तिधर्मिता आज 
के दोहाकारों का विषय नहीं है। यह युग व्यंग्य विडंबनाओं और 
विसंगतियों की अभिव्यक्ति का है। गत कई दशकों से समकालीन 
कविता का यही केंद्रीय स्वर रहा है। कबीर अपने समाज को 
व्यवस्थित करने के उद्देश्य से धर्म के ठेकेदारों को फटकारते हैं, 
आडंबर का विरोध करते हैं। आज का कवि भी अपने दोहों के 
माध्यम से अपनी शक्ति भर अपने वर्तमान से जूझ रहा है। 
परिस्थितियाँ भिन्न हैं, परंतु दोहे का केंद्रीय स्वर बहुत कुछ वही 
है। जिन कवियों को अपने कठिन वर्तमान से जूझना पड़ रहा है 
उनके दोहे निश्चित रूप से दमदार हैं। अच्छी कविता में अपने 
युग का साक्ष्य विद्यमान होता है, सामाजिक विसंगतियों पर व्यंग्य
करते हुए कुछ दोहे इस प्रकार हैं :
वर्गभेद की नीतियाँ, जाति धर्म की मेज़
अब भी अपने मुल्क में, राज करें अंग्रेज़।- दिनेश शुक्ल

पुलिस-पतुरिया-पातकी-नेता-नमक हराम

हाथ जोड़ कर दूर से, इनको करो प्रणाम।- विश्वप्रकाश दीक्षित 'वटुक'

मेरे हिंदुस्तान का, है फ़लसफ़ा अजीब
ज्यों-ज्यों आई योजना, त्यों-त्यों बढ़े गरीब।- हस्तीमल हस्ती

राजनीति के ठूँठ पर, तने वक्त के शाह

रोज़ चिरायैंध उठ रही, उठे किसे परवाह।- पाल भसीन

मंदिर-मस्जिद चुप खड़े, रहे चीखते भक्त
अब अजान औ आरती, लगे मांगने रक्त।- देवेंद्र शर्मा 'इंद्र'


समकालीन दोहों में लोक जीवन को कवियों ने नये ढंग से 
रेखांकित किया है। लोक जीवन का अर्थ छप्पर-मोह नहीं होता।
छंदोबद्ध कवियों ने ग्राम्य अंचल के मनोरम चित्र खींचे हैं। नव
गीत के बाद दोहों में ही लोक जीवन अपनी समग्रता के साथ 
उभरकर सामने आया है। लोक जीवन के कुछ मार्मिक चित्र 
निम्नवत है :

नदियाँ सींचे खेत को, तोता कुतरे आम

सूरज ठेकेदार सा, सब को बाँटे काम।- निदा फ़ाज़ली

सरे राह नंगा हुआ, फागुन वस्त्र निकाल

काली टेसू की कली, हुई शर्म से लाल।- किशोर काबरा

पंडित जी बैठे रहे, अपनी पोथी खोल
नक्कारे में गुम हुए, सप्तपदी के बोल।- माहेश्वरी तिवारी


पहले जैसे आत्मीय, रहे न अपने गाँव
तेरे मेरे में बँटे, सुर्ती-चिलम-अलाव।- इसाक अश्क़

पोर पोर पियरा गई, खड़ी फसल की देह
डरती है फिर पालकी, शायद छेंके मेह।- कैलाश गौतम

नीलकंठ बोल कहीं, इतने बरसों बाद
फिर माँ का आँचल उड़ा, बचपन आया याद।- योगेंद्र दत्त शर्मा


समकालीन कविता में गृहरति के बड़े मनोरम दृश्य कवियों ने 
उपस्थित किए हैं। दोहों में ऐसे पारिवारिक संबंधों की खटास व 
मिठास के स्वर सुंदर ढंग से व्यक्त किए जा रहे हैं, यथा :

बच्चे दादा की छड़ी, दादी की आसीस
माँ की छाती, बाप के दिन भर श्रम की फीस।- भारतेंदु मिश्र

भाभी पीली रोशनी, करती घर उजियार

सोन चिरैया थी कभी उड़ी न पंख पसार।- राधेश्याम शुक्ल

आज के दोहे में कथ्य की ताज़गी व पैनापन भी विद्यमान है। 
समकालीन दोहे की भाषा नई है- उस के मुहावरे भी नये तेवर 
लिए हुए हैं। आज के दोहे की संवादधर्मिता व अनगढ़ भाषा 
उसे उद्धरणीय बनाने के लिए पर्याप्त है। आज का दोहा विचार-
भाषा-कथ्य व संवेदना के स्तर पर पारंपरिक दोहे से नितांत
भिन्न हैं। जहाँ तक पौराणिक-ऐतिहासिक व लोक में प्रचलित 
पात्रों व संदर्भों को प्रतीक रूप में ग्रहण करने की बात है, 
दोहे में पौराणिक व ऐतिहासिक बिंब भी दोहोकारों ने बखूबी 
गढ़े हैं। किंतु उन बिंबों अथवा आख्यानों से नवीन कथ्य 
और समकालीन जीवन की संवेदना स्पष्ट रूप से मुखर हुई है।
यह अच्छी बात है कि समकालीन कविता में दोहे को धीरे-धीरे 
सम्मान की दृष्टि से देखा जाने लगा है। हालांकि असली 
दोहाकार व देखादेखी दोहे लिखने वाले कवियों की इस भीड़ में
अभी तक इस दोहा अभियान की परिणति क्या होगी, नहीं
 कहा जा सकता, पर समकालीन कविता में यह नवदोहा लेखन 
की परंपरा हमें कहीं न कहीं काव्यानुशासन व भारतीय काव्य 
परंपरा से अवश्य जोड़ती है।

वस्तुत: दोहा रचना इतना सरल नहीं है, जितना कि आज के 

कवि ने मान लिया है। दोहा तो जीवन में दैनंदिन अनुभूत 
संवेदनाओं के शब्दार्थमय दोहन की प्रक्रिया है। वह लिखा नहीं 
जा सकता, उसका दोहन किया जा सकता है, उसकी रचना की 
जाती है। वह बात-बात में कहा भी जा सकता है।
साभार : अभिव्यक्ति 

मंगलवार, 2 सितंबर 2014

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चित्र पर कविता:

doha salila: sanjiv

दोहा सलिला:
संजीव
*
साँप नचाना हो गया, अब तो 'सलिल' गुनाह
डँसें साँप सम देश को, नेता पाते वाह
*
बंदर पाला? जेल चल, रहे मदारी काँप
अफसर देश नचा रहे, समय-हवा को भाँप
*
बलि देवी पर चढ़े तो, पाप कहे कानून
बकरा काटें ईद पर, पुण्य बहायें खून
*
मंत्र शंख घंटा करें, शोर लगाते रोक
शासन सुने अजान पर, मौन हाय क्यों? शोक
*  



mukatak salila: sanjiv

मुक्तक सलिला:

संजीव
*
मनमानी कर रहे हैं
गधे वेद पढ़ रहे हैं
पंडित पत्थर फोड़ते
उल्लू पद वर रहे हैं
*
कौन किसी का सगा है
अपना देता दगा है
छुरा पीठ में भोंकता
कहे प्रेम में पगा है
*
आप टेंट देखे नहीं
काना पर को दोष दे
कुर्सी पा रहता नहीं
कोई अपने होश में
*
भाई-भतीजावाद ने
कमर देश की तोड़ दी
धारा दीन-विकास की
धनवानों तक मोड़ दी
*
आय नौकरों की गिने
लेते टैक्स वसूल वे
मालिक बाहर पकड़ से
कहते सही उसूल है
*

सोमवार, 1 सितंबर 2014

lekh: radha bante jana hai -- alaknanda sinh

राधाष्‍टमी पर

राधा बनते जाना है और ...बस !

 - अलकनंदा सिंह 

ओशो द्वारा कृष्ण पर दिए गए प्रवचन
को लेकर कभी अमृता प्रीतम ने लिखा 
था-''जिस तरह कृष्ण की बाँसुरी को 
भीतर से सुनना है, ठीक उसी तरह ‘भारत
एक सनातन यात्रा’को पढ़ते-सुनते, इस 
यात्रा पर चल देना है।कह सकती हूँ कि 
अगर कोई तलब कदमों में उतरेगी और 
कदम इस राह पर चल देंगे, तब वक्त 
आएगा कि यह राह सहज होकर कदमों के 
साथ चलने लगेगी और फिर ‘यात्रा’ शब्द अपने अर्थ को पा लेगा !''

यात्रा... , जी हां। एक ऐसा अनवरत सिलसिला जिसे किसी ठांव या मकसद की
हमेशा जरूरत  होती  है जिसे हर हाल में मंज़िल की तलाश होती और मंज़िल 
को पाना ही लक्ष्‍य।यूं तो यात्रा का अर्थ बहुत गहरा है मगर जब यह यात्रा एक 
धारा बनकर बहती है तो अनायास ही वह अपने उद्गम की ओर आने को उत्‍सुक 
रहती है। यही उत्‍सुकता धारा को राधा बना देती है।

राधा कोई एक किसी ग्‍वाले कृष्‍ण की एक सुन्‍दर सी प्रेयसी का नाम नहीं, ना ही
वो केवल वृषभान की दुलारी कन्‍या है बल्‍कि वह तो अनवरत हर कृष्‍ण अर्थात् 
ईश्‍वर के प्रत्‍येक अंश-अंश से मिलने को आतुर रहने वाली हर उस आध्‍यात्‍मिक 
शक्‍ति के रूप में बहने वाली धारा का नाम है जो भौतिकता के नश्‍वरवाद से 
आध्‍यात्‍मिक चेतना की ओर बहती है, उसमें एकात्‍म हो जाने को... बस यहीं से 
शुरू होती है किसी के भी राधा हो जाने की यात्रा ।

इसी 'राधा होते जाने की प्रक्रिया' को ओशो अपने प्रवचनों में कुछ यूं सुनाते हैं—
‘‘पुराने शास्त्रों में राधा का कोई जिक्र नहीं, वहाँ गोपियाँ  हैं, सखियाँ  हैं, कृष्ण 
बाँसुरी बजाते हैं और रास की लीला होती है। राधा का नाम पुराने शास्त्रों में नहीं है। 
बस इतना सा जिक्र है, कि सारी सखियों में कोई एक थीं, जो छाया की तरह साथ 
रहती थीं। यह तो महज सात सौ वर्ष पहले 'राधा' नाम प्रकट हुआ । उस नाम के 
गीत गाए जाने लगे, राधा और कृष्ण को व्‍यक्‍ति के रूप में प्रस्‍थापित किया गया। 
इस नाम की खोज में बहुत बड़ा गणित छिपा है । राधा शब्द बनता है धारा शब्द
को उलटा कर देने से।

‘‘गंगोत्री से गंगा की धारा निकलती है। स्रोत से दूर जाने वाली अवस्था का नाम
धारा है और धारा शब्द को उलटा देने से राधा हुआ, जिसा अर्थ है—स्रोत की तरफ 
लौट जाना। गंगा वापिस लौटती है गंगोत्री की तरफ। बहिर्मुखता, अंतर्मुखता 
बनती है।’’ओशो जिस यात्रा की बात करते हैं—वह अपने अंतर में लौट जाने की 
बात करते हैं। एकयात्रा धारामय होने की होती है, और एक यात्रा राधामय होने की।

यूं तो विद्वानों ने राधा शब्‍द और राधा के अस्‍तित्‍व तथा राधा की ब्रज व कृष्‍ण के
जीवन में उपस्‍थिति को लेकर अपने नज़रिये से आध्‍यत्‍मिक विश्‍लेषण तो किया ही 
है, मगर लोकजीवन में आध्‍यत्‍म को सहजता से पिरो पाना काफी मुश्‍किल होता है।
दर्शन यूं भी भक्‍ति जैसी तरलता और सरलता नहीं पा सकता इसीलिए राधा भले ही 
ईश्‍वर की आध्‍यात्‍मिक चेतना में धारा की भांति बहती हों मगर आज भी उनके 
भौतिक- लौकिक स्‍वरूप पर कोई बहस नहीं की जा सकती।

ज्ञान हमेशा से ही भक्‍ति से ऊपर का पायदान रहा है, इसीलिए जो सबसे पहला
पायदान है भक्‍ति का, वह आमजन के बेहद करीब रहता है और राधा को 
आध्‍यात्‍मिक शक्‍ति से ज्‍यादा कृष्‍ण की प्रेयसी मान और उनकी अंतरसखी मान उन्‍हें
किसी भी एक सखी में प्रस्‍थापित कर उन्‍हें अपना सा जानता है। ये भी तो ईश्‍वर की 
ओर जाने की धारा ही है, बस रास्‍ता थोड़ा लौकिक है, सरल है...। ब्रज में समाई हुई 
राधा ... कृष्ण के नाम से पहले लगाया हुआ मात्र एक नामभ र नहीं हैं और ना ही राधा 
मात्र एक प्रेम स्तम्भ हैं जिनकी कल्‍पना किसी कदम्ब के नीचे कृष्ण के संग की जाती 
है।भक्‍ति के रास्‍ते ही सही राधा फिर भी कृष्‍ण के ही साथ जुड़ा हुआ एक आध्यात्मिक 
पृष्ठ है, जहाँ द्वैत-अद्वैत का मिलन है। राधा एक सम्पूर्ण काल का उद्गम है जो कृष्ण रुपी 
समुद्र से मिलती है ।

समाज में प्रेम को स्‍थापित करने के लिए इसे ईश्‍वर से जोड़कर देखा गया और समाज
को वैमनस्‍यता से प्रेम की ओर ले जाने का सहज उपाय समझा  गया इसीलिए श्रीकृष्ण 
के जीवन में राधा प्रेम की मूर्ति बनकर आईं। हो सकता है कि राधा का कृष्‍ण से संबंध 
शास्‍त्रों में ना हो मगर लोकजीवन में प्रेम को पिरोने का सहज उपाय बन गया। और इस 
तरह जिस प्रेम को कोई नाप नहीं सका, उसकी आधारशिला राधा ने ही रखी थी।

राधा की लौकिक कथायें बताती हैं कि प्रेम कभी भी शरीर की अवधारणा में नहीं सिमट
सकता...प्रेम वह अनुभूति है जिसमें साथ का एहसास निरंतर होता है। न उम्र... न जाति... 
न ऊंच नीच ...प्रेम हर बन्धनों से परे एक आत्मशक्ति है , जहाँ सबकुछ हो सकता है ।
यदि हम कृष्ण और राधा को हर जगह आत्मिक रूप से उपस्थित पाते हैं तो आत्मिक
प्यारकी ऊंचाई और गहराई को समझना होगा। कृष्‍ण इसीलिए हमारे इतने करीब हैं कि 
उन्‍हें सिर्फ ईश्वर ही नहीं बना दिया, उन्‍हें लड्डूगोपाल के रूप में लाड़ भी लड़ाया है तो वहीं 
राधा के संग झूला भी झुलाया है और रास भी रचाया है।

जब कृष्‍ण जननायक हैं तो भला राधा हममें से ही एक क्‍यों न मान ली जायें...जो सारे
आध्‍यात्‍मिक तर्कों से परे हों, फिर चाहे वो आत्‍मा की गंगोत्री से  धारा बनकर  वापस 
कृष्‍ण में समाने को राधा बनें और अपनी यात्रा का पड़ाव पा लें या फिर बरसाने वाली 
राधा प्‍यारी...संदेश तो एक ही है ना दोनों का कि प्रेम में इतना रम जाया जाये कि ईश्‍वर 
तक पहुंचने को यात्रा  कोई भी हो उसकी हर धारा राधा बन जाये, एकात्‍म हो जाये...।

nvgeet: chah kiski sanjiv

नवगीत:
चाह किसकी.... 
संजीव
*
चाह किसकी है
कि वह निर्वंश हो?....
*
ईश्वर अवतार लेता
क्रम न होता भंग
त्यगियों में मोह बसता
देख दुनिया दंग
संग-संगति हेतु करते
जानवर बन जंग
पंथ-भाषा कोई भी हो
एक ही है ढंग
चाहता कण-कण
कि बाकी अंश हो....
*
अंकुरित पल्लवित पुष्पित
फलित बीजित झाड़ हो
हरितिमा बिन सृष्टि सारी
खुद-ब-खुद निष्प्राण हो  
जानता नर काटता क्यों?
जाग-रोपे पौध अब
रह सके सानंद प्रकृति
हो ख़ुशी की सौध अब
पौध रोपें, वृक्ष होकर
'सलिल' कुल अवतंश हो....