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शुक्रवार, 29 अगस्त 2014

muktak salila: sanjiv

मुक्तक सलिला:
संजीव
*
बंधन में हैं मुक्त रह
अलग-अलग संयुक्त रह.
किसको ठगता कौन है?
क्यों चुप रहे प्रयुक्त रह??
*
स्वार्थ-हवस का साथ था
जुड़े हाथ, नत माथ था.
दासी-स्वामिनी यह नहीं-
दास न वह, ना नाथ था.
*
बंधन जिन्हें न भा सका,
जो आज़ाद ख़याल थे.
बंधन टूटा, दुखी क्यों?
उत्तर बने सवाल थे.
*




बुधवार, 27 अगस्त 2014

मंगलवार, 26 अगस्त 2014

vimarsh: chitragupt ji sinhasan par patniyan jameen par kyon?


विमर्श :

भगवन चित्रगुप्त सिंहासन पर तो उनकी दोनों पत्नियां जमीन पर क्यों ?

क्या आपने राम जी को सिंहासन पर शिव जी को सिंहासन पर पारवती जी को जमीन पर, राम जी को सिंहासन पर सीता जी को जमीन पर, कृष्ण जी को सिंहासन पर रुक्मिणी जी को जमीन पर देखा है?

क्या आपके पिता कुसी पर माँ जमीन पर, भाई कुर्सी पर भाभी जमीन पर, बहनोई कुर्सी पर बहिन जमीन पर, आप कुसी पर पत्नी जमीन पर या आपके पति कुर्सी पर आप जमीन पर बैठते हैं?

या चित्रगुप्त जी इतने निर्धन थे कि ३ सिंहासन नहीं क्रय सकते थे?

क्या यह नर-नारी समानता के विरुद्ध नहीं है? 

इस तरह के चित्र की पूजा करनेवाले या अपनी साइट पर लगानेवाले उत्तर दें. क्या आप जाने हैं के अखिल भारतीय कायस्थ महासभा के हैदराबाद सम्मलेन १९९१ में इस चित्र के दोषों पर व्यापक चर्चा के बाद इसे अपूजनीय घोषित किया जा चुका है?

केवल 'लाइक, न करें। अपने विचाए दें. यदि आपत्ति से सहमत है तो क्या ऐसे चित्रों को  चित्र की पूजा करेंगे? चित्र में क्या बदलाव हो या कैसा चित्र बनाया जाए?


doha salila: sanjiv

दोहा सलिला:
संजीव
*
शशि की स्नेहिल ज्योत्सना, करे प्राण संचार 
सलिल-तरंगें निनादित, हो ज्योतित जलधार
*
पूनम शीतल चाँदनी, ले जग का मन मोह 
नहीं अमावस सह सके, श्यामल हो कर द्रोह 
*
नाज़ उठाने की नहीं, सीमा कोई मीत 
नभ सी अपरम्पार है, मानव मन की प्रीत 
अधिक न कम देना मुझे, सोना हे दातार!
बस उतना ही चाहिए, चले जगत व्यापार
*
करे गगन को सुशोभित, गहन तिमिर के जूझ 
नत रवीन्द्र सम्मुख जगत, थको न श्रम हो बूझ 
*
पायल की झंकार सुन, मन मयूर ले नाच 
समय पुरोहित हँस रहे, प्रणय पत्रिका बाँच 
*
प्रात रवि किरण देख उठ, जग जाएगा भाग 
कीर्ति-माल मुस्कान से, घर हो पुण्य प्रयाग 

सोमवार, 25 अगस्त 2014

navgeet: nastak ki rekhayen -sanjiv

नवगीत:
मस्तक की रेखाएँ …
संजीव 
 
*
मस्तक की रेखाएँ 
कहें कौन बाँचेगा? 
*
आँखें करतीं सवाल 
शत-शत करतीं बवाल। 
समाधान बच्चों से 
रूठे, इतना मलाल। 
शंका को आस्था की 
लाठी से दें हकाल।  
उत्तर न सूझे तो 
बहाने बनायें टाल। 

सियासती मन मुआ
मनमानी ठाँसेगा … 
अधरों पर मुस्काहट 
समाधान की आहट। 
माथे बिंदिया सूरज 
तम हरे लिये चाहत।
काल-कर लिये पोथी
खोजे क्यों मनु सायत? 
कल का कर आज अभी
काम, तभी सुधरे गत।

जाल लिये आलस 
कोशिश पंछी फाँसेगा…
*
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शनिवार, 23 अगस्त 2014

vimarsh: varmaal ya jaymaal kyon??? -sanjiv

अनावश्यक कुप्रथा: वरमाल या जयमाल???

संजीव 

*

आजकल विवाह के पूर्व वर-वधु बड़ा हार पहनाते हैं। क्यों? इस समय वर के मिटे हुल्लड़ कर उसे उठा लेते हैं ताकि वधु माला न पहना सके। प्रत्युत्तर में वधु पक्ष भी यही प्रक्रिया दोहराता है। 

दुष्परिणाम:

वहाँ उपस्थित सज्जन विवाह के समर्थक होते हैं और विवाह की साक्षी देने पधारते हैं तो वे बाधा क्यों उपस्थित करते हैं? इस कुप्रथा के दुपरिणाम देखने में आये हैं, वर या वधु आपाधापी में गिरकर घायल हुए तो रंग में भंग हो गया और चिकित्सा की व्यवस्था करनी पडी। सारा कार्यक्रम गड़बड़ा गया. इस प्रसंग में वधु को उठाते समय उसकी साज-सज्जा और वस्त्र अस्त-व्यस्त हो जाते हैं. कोई असामाजिक या दुष्ट प्रकृति का व्यक्ति हो तो उसे छेड़-छाड़ का अवसर मिलता है. यह प्रक्रिया धार्मिक, सामाजिक या विधिक (कानूनी) किसी भी दृष्टि से अनिवार्य नहीं है.

औचित्य:

यदि जयमाल के तत्काल बाद वर-वधु में से किसी एक का निधन हो जाए या या किसी विवाद के कारण विवाह न हो सके तो क्या स्थिति होगी? सप्तपदी, सिंदूर दान या वचनों का आदान-प्रदान न हुआ तो क्या केवल माला को अदला-बदली को विवाह माना जायेगा?हिन्दू विवाह अधिनियम ऐसा नहीं मानता।ऐसी स्थिति में वधु को वर की पत्नी के अधिकार और कर्तव्य (चल-अचल संपत्ति पर अधिकार, अनुकम्पा नियुक्ति या पेंशन, वर का दूसरा विवाह हो तो उसकी संतान के पालन-पोषण का अधिकार) नहीं मिलते।सामाजिक रूप से भी उसे अविवाहित माना जाता है, विवाहित नहीं। धार्मिक दृष्टि से भी वरमाल को विवाह की पूर्ति अन्यथा बाद की प्रक्रियाओं का महत्त्व ही नहीं रहता।  

कारण:

धर्म, समाज तथा विधि तीनों दृष्टियों से अनावश्यक इस प्रक्रिया का प्रचलन क्यों, कब और कैसे हुआ? 
सर्वाधिक लोकप्रिय राम-सीता जयमाल प्रसंग का उल्लेख राम-सीता के जीवनकाल में रचित वाल्मीकि रामायण में नहीं है. रामचरित मानस में तुलसीदास  प्रसंग का मनोहारी चित्रण किया है। तभी श्री राम के ३  भाइयों के विवाह सीता जी की ३ बहनों के साथ संपन्न हुए किन्तु उनकी जयमाल का वर्णन नही है। 

श्री कृष्ण के काल में द्रौपदी स्वयंवर में ब्राम्हण वेषधारी अर्जुन ने मत्स्य वेध किया। जिसके बाद द्रौपदी ने उन्हें जयमाल पहनायी किन्तु वह ५ पांडवों की पत्नी हुईं अर्थात जयमाल न पहननेवाले अर्जुन के ४ भाई भी द्रौपदी के पति हुए। स्पष्ट है कि  जयमाल और विवाह का कोई सम्बन्ध नहीं है। रुक्मिणी का श्रीकृष्ण ने और सुभद्रा का अर्जुन  के पूर्व अपहरण कर लिया था। जायमाला कैसी होती?  

ऐतिहासिक प्रसंगों में पृथ्वीराज चौहा और संयोगिता का प्रसंग उल्लेखनीय है। पृथ्वीराज चौहान और जयचंद रिश्तेदार होते हुए भी एक दूसरे के शत्रु थे। जयचंद की पुत्री संयोगिता के स्वयंवर के समय पृथ्वीराज द्वारपाल का वेश बनाकर खड़े हो गये। संयोगिता जयमाल लेकर आयी तो आमंत्रित राजाओं को छोड़कर पृथ्वीराज के गले में माल पहना दी और पृथ्वीराज चौहान संयोगिता को लेकर भाग गये। इस प्रसंग से बढ़ी शत्रुता ने जयचंद के हाथों गजनी के मो. गोरी को भारत आक्रमण के लिए प्रेरित कराया, पृथ्वीराज चौहान पराजितकर बंदी बनाये गये, देश गुलाम हुआ 

स्पष्ट है कि जब विवाहेच्छुक राजाओं में से कोई एक अन्य को हराकर अथवा निर्धारित शर्त पूरी कर वधु को जीतता था तभी जयमाल होता था अन्यथा नहीं। 

मनमानी व्याख्या: 

तुलसी ने राम को मर्यादपुषोत्तम  मुग़लों द्वारा  उत्साह जगाने के लिए कई प्रसंगों की रचना की। प्रवचन कारों ने प्रमाणिकता का विचार किये बिना उनकी चमत्कारपूर्ण सरस व्याख्याएँ  चढ़ोत्री बढ़े। वरमाल तब भी विवाह का अनिवार्य अंग नहीं थी। तब भी केवल वधु ही वर को माला पहनाती थी, वर द्वारा वधु को माला नहीं पहनायी जाती थी। यह प्रचलन रामलीलाओं से प्रारम्भ हुआ। वहां भी सीता की वरमाला को स्वीकारने के लिये उनसे लम्बे राम अपना मस्तक शालीनता के साथ नीचे करते हैं। कोई उन्हें   ऊपर नहीं उठाता, न ही वे सर ऊँचा रखकर सीता को उचकाने के लिए विवश करते हैं  

कुप्रथा बंद हो: 

जयमाला वधु द्वारा वर  डाली जाने के कारण वरमाला कही जाने लगी। रामलीलाओं में जान-मन-रंजन के लिये और सीता को जगजननी बताने के लिये उनके गले में राम द्वारा माला पहनवा दी गयी किन्तु यह धार्मिक रीति न थी, न है। आज के प्रसंग में विचार करें तो विवाह अत्यधिक अपव्ययी और दिखावे के आयोजन हो गए हैं। दोनों पक्ष वर्षों की बचत खर्च कर अथवा क़र्ज़ लेकर यह तड़क-भड़क करते हैं।  हार भी कई सौ से कई हजार रुपयों के आते हैं। मंच, उजाला, ध्वनिविस्तारक सैकड़ों  कुसियों और शामियाना तथा सैकड़ों चित्र खींचना, वीडियो बनाना आदि पर बड़ी राशि खर्चकर एक माला पहनाई जाना हास्यास्पद नहीं तो और क्या है? 

इस कुप्रथा का दूसरा पहलू यह है की लाघग सभी स्थानीयजन तुरंत बाद भोजन कर चले जाते हैं जिससे वे न तो विवाह सम्बन्ध के साक्षी बन पते हैं, न वर-वधु को आशीष दे हैं, न व्धु को मिला स्त्रीधन पाते हैं। उन्हें  के २ कारण विवाह का साक्षी बनना तथा विवाह पश्चात नव दम्पति को आशीष  देना ही होते हैं। जयमाला के तुरंत बाद चलेजाने पर ये उद्देश्य पूर्ण नहीं हो पाते। अतः, विवेकशीलता की मांग है की जयमाला की कुप्रथा का त्याग किया जाए। नारी समानता के पक्षधर वर द्वारा वधु को जीतने के चिन्ह रूप में जयमाला को कैसे स्वीकार सकते हैं? इसी कारण विवाह पश्चात वार वधु से समानता का व्यवहार न कर उसे अपनी अर्धांगिनी नहीं अनुगामिनी और आज्ञानुवर्ती मानता है। यह प्रथा नारी समानता और नारी सम्मान के विपरीत और अपव्यय है। इसे तत्काल बंद किया जाना उचित होगा       
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शुक्रवार, 22 अगस्त 2014

divya nadi kshipra:



दिव्य-नदी क्षिप्रा

    अपनी प्राचीनतम, पवित्रता एवं पापनाशकता आदि के कारण प्रसिद्ध उज्जयिनी की प्रमुख नदी शिप्रा सदा स्मरणीय है। यजुर्वेद में 'शिप्रे अवेः पयः' पद के द्वारा इस नदी के स्मरण हुआ है। निरूक्त में 'शिप्रा कस्मात?' यह शिप्रा क्यों कही जाती हैउत्तर दिया गया 'शिवेन पातितं यद रक्तं तत्प्रभवति, तस्मात।' शिवजी द्वारा गिराया गया रक्त प्रभाव दिखला रहा है नदी के रूप में बह रहा है, अतः यह क्षिप्रा है।

क्षिप्र - नर्मदा का सम्मिलन 
    शिप्रा और सिप्रा ये दोनों नाम अग्रिम ग्रन्थों में प्रयुक्त हुए हैं। इनकी व्युत्पत्तियाँ भी क्रमशः इस प्रकार प्रस्तुत हुई है  शिवं प्रापयतीति शिप्रा और सिद्धिं प्राति पूरयतीत सिप्रा कोशकारों ने सिप्रा को अर्थ करधनी भी किया। तदनुसार यह नदी उज्जयिनी के तीन ओर से बहने के कारण करधनीरूप मानकर भी सिप्रा नाम से मण्डित हुई। उन दोनों नामों को साथ इसे क्षिप्रा भी कहा जाता है। यह उसके जल प्रवाह की द्रुतगति से सम्बद्ध प्रतीत होता है। स्कन्दपुराण में शिप्रा नदी का बड़ा माहात्म्य बतलाया है। यथा

नास्ति वत्स महीपृष्ठे शिप्रायाः सदृशी नदी।
यस्यास्तीरे क्षणान्मुक्तिः कच्चिदासेवितेन वै।।

    हे वत्स इस भू-मण्डल पर शिप्रा के समान अन्य नदी नहीं है जिसके तीर पर कुछ समय रहने से तथा स्मरण, स्नानदानादि करने से ही मुक्ति प्राप्त हो जाती है।

क्षिप्रा तट पर महाकाल मंदिर 
    शिप्रा का उत्पत्ति के सम्बन्ध में कथा में कहा गया है कि विष्णु की अँगुली को शिव द्वारा काटने पर उसका रक्त गिरकर बहने से यह नदी के रूप में प्रवाहित हुई। इसीलिये 'विष्णु-देहात समुत्पन्ने शिप्रेत्वं पापनाशिनी' इत्यादि पदों से शिप्रा की स्तुति की गयी है। अन्य प्रसड़्ग से शिप्रा को गड़्गा भी कहा गया है। पञचगङ्गाओं में एक गङ्गा शिप्रा भी मान्य हुई है। अवन्तिका को विष्णु का पद कमल भी कहना नितान्त उचित है। कालिकापुराण में शिप्रा की उत्पत्ति मेधातिथि द्वारा अपनी कन्या अरून्धती के विवाह-संस्कार के समय महर्षि वसिष्ठ को कन्यादान का सङ्कल्पार्पण करने के लिये शिप्रासर का जो जल लिया गया था, उसी के गिरने से शिप्रा नदी बह निकली बतलाई है। शिप्रा का अतिपुण्यमय क्षेत्र भी पुराणों में दिखाया गया है

    वर्तमान स्थिति के अनुसार शिप्रा का उद्गम म.प्र. के महू नगर से 11 मील दूर स्थित एक पहाड़ी से हुआ है और यह मालवा में 120 मील की यात्रा करती हुई चम्बल (चर्मण्वती) में मिल जाती है। इसका सङ्गम-स्थल आज सिपावरा  के नाम से जाना जाता है, जो कि सीतामऊ (जिला मन्दसौर) और आलोट के ठीक 10-10 मील के मध्य में है। वहाँ शिप्रा अपने प्रवाह की विपुलता से चम्बल में मिलने की आतुरता और उल्लास को सहज ही प्रकट करती है।

क्षिप्रा तट पर उज्जैन (अवंतिकापुरी) में भूतभावन पतित पावन महाकालेश्वर विराजते हैं। यहीं महर्षि संदीपनी का आश्रम है जहाँ कृष्ण-सुदामा ने शिक्षा प्राप्त की विक्रमादित्य और उनके नव रत्नों (कालिदास, वराहमिहिर, ) राजा भोज आदि की कर्म स्थली यही है 

    उज्जयिनी शिप्रा के उत्तरवाहिनी होने पर पूर्वीतट पर बसी है। यहीं ओखलेश्वर से मंगलनाथ तक पूर्ववाहिनी है। अतः सिद्धवट और त्रिवेणी में भी स्नान-दानादि करने का माहात्म्य है। क्षिप्रा में सनातन सलिला नर्मदा का जल प्रवाहित होने लगा है: देखें प्रथम चित्र नर्मदा विश्व  की सर्वाधिक प्राचीन सलिला ६ करोड़ से अधिक वर्ष पुरानी है। नर्मदा का एक नाम क्षिप्रा द्रुत वेग से बहानेवाली जलधारा के कारण मिला है 
  
   

गुरुवार, 21 अगस्त 2014

muktika: siyasat -sanjiv

रचना-प्रति रचना

फ़ोटो: नज़र मुझसे मिलाती हो तो तुम शरमा-सी जाती हो 
इसी को प्यार कहते हैं, इसी को प्यार कहते हैं।

जबाँ ख़ामोश है लेकिन निग़ाहें बात करती हैं, अदाएँ लाख भी रोको अदाएँ बात करती हैं।

नज़र नीची किए दाँतों में उँगली को दबाती हो। इसी को प्यार कहते हैं, इसी को प्यार कहते हैं।

छुपाने से मेरी जानम कहीं क्या प्यार छुपता है, ये ऐसा फूल है ख़ुशबू हमेशा देता रहता है।

तुम तो सब जानती हो फिर भी क्यों , मुझको सताती हो?  इसी को प्यार कहते हैं, इसी को प्यार कहते हैं।

तुम्हारे प्यार का ऐसे हमें इज़हार मिलता है, हमारा नाम सुनते ही तुम्हारा रंग खिलता है

और फिर दिल ही-दिल मे तुम हमारे गीत गाती हो। इसी को प्यार कहते हैं, इसी को प्यार कहते हैं।

तुम्हारे घर में जब आऊँ तो छुप जाती हो परदे में मुझे जब देख ना पाओ तो घबराती हो परदे में

ख़ुद ही परदा उठा कर फिर इशारों से बुलाती हो।

   इसी को प्यार कहते हैं, इसी को प्यार कहते हैं।

आपका दिन शुभ रहे .......  

                                      आपका दोस्त - प्रेम

'चाँद सा' जब कहा, वो खफा हो गये
चाँदनी थे, तपिश दुपहरी हो गये
नेह निर्झर नहीं, हैं चट्टानें वहाँ
'मैं न वैसी' कहा औ' जुदा हो गये
*
'चाँद' हूँ मैं नहीं, आइना देख लो
चाँद सर पर तुम्हें साफ़ दिख जाएगा
सर झुकाओ तनिक लूँ लिपस्टिक लगा
चाँद में चन्दनी रूप बस जाएगा
*
मुक्तिका:
संजीव
*
नज़र मुझसे मिलाती हो, अदा उसको दिखाती हो  
निकट मुझको बुलाती हो, गले उसको लगाती हो 

यहाँ आँखें चुराती हो, वहाँ आँखें मिलाती हो 
लुटातीं जान उस पर, मुझको दीवाना बनाती हो 

हसीं सपने दिखाती हो, तुरत हँसकर भुलाती हो  
पसीने में नहाता मैं, इतर में तुम नहाती हो 

जबाँ मुझसे मुखातिब पर निग़ाहों में बसा है वो 
मेरी निंदिया चुराती, ख़्वाब में उसको बसाती हो   

अदा दिलकश दिखा कर लूट लेती हो मुझे जानम 
सदा अपना बतातीं पर नहीं अपना बनाती हो  

न इज़हारे मुहब्बत याद रहता है कभी तुमको  
कभी तारे दिखाती हो, कभी ठेंगा दिखाती हो

वज़न बढ़ना मुनासिब नहीं कह दुबला दिया मुझको 
न बाकी जेब में कौड़ी, कमाई सब उड़ाती हो

कलेजे से लगाकर पोट, लेतीं वोट फिर गायब 
मेरी जाने तमन्ना नज़र तुम सालों न आती हो 

सियासत लोग कहते हैं सगी होती नहीं संभलो 
बदल बैनर, लगा नारे मुझे मुझसे चुराती हो

सखावत कर, अदावत कर क़यामत कर रही बरपा 
किसी भी पार्टी में हो नहीं वादा निभाती हो 
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मंगलवार, 19 अगस्त 2014

vimarsh: nyaya pranali men netaon kee sendh

देश में आज़ादी के बाद से नेताओं और आई. ए. एस. अफसरों में अधिकार हड़पने और अधिक से अधिक मनमानी करने की होड़ है. अब तक न्यायपालिका में कुछ काम हस्तक्षेप था. अब मोदी सरकार ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता और निष्पक्षता में सेंध लगा ली है. कोलेजियम सिस्टम की कुछ कमियों को दूर करने के स्थान पर नयी समिति में नेताओं को अधिक संख्या में रखा गया है. इससे सत्ताधारी दल को अपने अनुकूल न्यायाधीशों को क्रम तोड़कर सर्वोच्च न्यायालय में ले जाकर मनमाने निर्णय कर सकेगी। यह शंका निराधार नहीं है. बिना किसी बहस के सभी राजनैतिक दलों द्वारा एकमतेन बिल को पास करना 'चोर-चोर मौसेरे भाई' की लोकोक्ति को सही सिद्ध करता है? पिछले दिनों लालू यादव और अन्य नेताओं के विरुद्ध हुए निर्णयों के परिप्रेक्ष्य में सभी दल न्यायलय के पर कतरना चाहते हैं ताकि भ्रष्टाचार कर  सकें।

यह बिल ऐसे समय पास किया गया कि तुरंत बाद संसद सत्र समाप्त होने और स्वतंत्रता दिवस समीप होने से इस पर दूरदर्शन और समाचार पत्रों में भी चर्चा नहीं हुई.

सवाल यह है कि जनता कि जनता मौन क्यों है?
क्या कोलेजियम सिस्टम में बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया के अध्यक्ष, ला कमीशन के चेयरमैन आदि को सम्मिलित कर सुधार नहीं किया जा सकता है?     

सोमवार, 18 अगस्त 2014

jankashtami par: sanjiv

जन्माष्टमी पर:
संजीव 
*
हो चुका अवतार, अब हम याद करते हैं मगर 
अनुकरण करते नहीं, क्यों यह विरोधाभास है?
*
कल्पना इतनी मिला दी, सत्य ही दिखता नहीं 
पंडितों ने धर्म का, हर दिन किया उपहास है 
*
गढ़ दिया राधा-चरित, शत मूर्तियाँ कर दीं खड़ी 
हिल गयी जड़ सत्य की, क्या तनिक भी अहसास है?
*
शत विभाजन मिटा, ताकतवर बनाया देश को  
कृष्ण ने पर भक्त तोड़ें,  रो रहा इतिहास है 
*
रूढ़ियों से जूझ गढ़ दें कुछ प्रथाएँ स्वस्थ्य हम 
देश हो मजबूत, कहते कृष्ण- 'हर जन खास है' 
*
भ्रष्ट शासक आज  भी हैं, करें उनका अंत मिल
सत्य जीतेगा न जन को हो सका आभास है 
*
फ़र्ज़ पहले बाद में हक़, फल न अपना साध्य हो 
चित्र जिसका गुप्त उसका देह यह आवास है.
***   
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शनिवार, 16 अगस्त 2014

muktak shringar ke: sanjiv

चित्र पर कविता 

 

नयन में शत सपने सुकुमार 
अधर का गीत करे श्रृंगार 
दंत शोभित ज्यों मुक्तामाल 
केश नागिन नर्तित बलिहार 

भौंह ज्यों  प्रत्यंचा ली तान 
दृष्टि पत्थर में फूंके जान
नासिका ऊँची रहे सदैव 
भाल का किंचित घटे न मान 

सुराही कंठ बोल अनमोल 
कर्ण में मिसरी सी दे घोल 
कपोलों पर गुलाब खिल लाल
रहे नपनों-सपनों को तोल  

शुक्रवार, 15 अगस्त 2014

geet: kab honge azad -sanjiv

गीत:
कब होंगे आजाद 
इं. संजीव वर्मा 'सलिल' 
*
कब होंगे आजाद? 
कहो हम
कब होंगे आजाद?....
*
गए विदेशी पर देशी अंग्रेज कर रहे शासन.
भाषण देतीं सरकारें पर दे न सकीं हैं राशन..
मंत्री से संतरी तक कुटिल कुतंत्री बनकर गिद्ध-
नोच-खा रहे 
भारत माँ को
ले चटखारे स्वाद.
कब होंगे आजाद? 
कहो हम
कब होंगे आजाद?....
*
नेता-अफसर दुर्योधन हैं, जज-वकील धृतराष्ट्र.
धमकी देता सकल राष्ट्र को खुले आम महाराष्ट्र..
आँख दिखाते सभी पड़ोसी, देख हमारी फूट-
अपने ही हाथों 
अपना घर 
करते हम बर्बाद.
कब होंगे आजाद? 
कहो हम
कब होंगे आजाद?....
*
खाप और फतवे हैं अपने मेल-जोल में रोड़ा.
भष्टाचारी चौराहे पर खाए न जब तक कोड़ा. 
तब तक वीर शहीदों के हम बन न सकेंगे वारिस-
श्रम की पूजा हो 
समाज में 
ध्वस्त न हो मर्याद.
कब होंगे आजाद? 
कहो हम
कब होंगे आजाद?....
*
पनघट फिर आबाद हो सकें, चौपालें जीवंत. 
अमराई में कोयल कूके, काग न हो श्रीमंत.
बौरा-गौरा साथ कर सकें नवभारत निर्माण-
जन न्यायालय पहुँच 
गाँव में 
विनत सुनें फ़रियाद-
कब होंगे आजाद? 
कहो हम
कब होंगे आजाद?....
*
रीति-नीति, आचार-विचारों भाषा का हो ज्ञान. 
समझ बढ़े तो सीखें रुचिकर धर्म प्रीति विज्ञान.
सुर न असुर, हम आदम यदि बन पायेंगे इंसान-
स्वर्ग तभी तो 
हो पायेगा
धरती पर आबाद.
कब होंगे आजाद? 
कहो हम
कब होंगे आजाद?....
*
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बुधवार, 13 अगस्त 2014

doha geet: kya sachmugh? -sanjiv

सामयिक  दोहागीत:
क्या सचमुच?
संजीव
*
क्या सचमुच स्वाधीन हम?

गहन अंधविश्वास सँग
पाखंडों की रीत 
शासन की मनमानियाँ
सहें झुका सर मीत

स्वार्थ भरी नजदीकियाँ
सर्वार्थों की मौत
होते हैं परमार्थ नित
नेता हाथों फ़ौत

संसद में भी कर रहे 
जुर्म विहँस संगीन हम
क्या सचमुच स्वाधीन हम?
*
तंत्र लाठियाँ घुमाता
जन खाता है मार
उजियारे की हो रही
अन्धकार से हार

सरहद पर बम फट रहे
सैनिक हैं निरुपाय
रण जीतें तो सियासत
हारे, भूल भुलाय

बाँट रहें हैं रेवड़ी
अंधे तनिक न गम
क्या सचमुच स्वाधीन हम?
*
दूषित पर्यावरण कर 
मना रहे आनंद 
अनुशासन की चिता पर
गिद्ध-भोज सानंद

दहशतगर्दी देखकर
नतमस्तक कानून
बाज अल्पसंख्यक करें
बहुल हंस का खून

सत्ता की ऑंखें 'सलिल' 
स्वार्थों खातिर नम
क्या सचमुच स्वाधीन हम?
*
salil.sanjiv@gmail.com
9425183244   

मंगलवार, 12 अगस्त 2014

doha salila: sanjiv

दोहा सलिला
गले मिले दोहा यमक
संजीव
देव! दूर कर बला हर, हो न करबला और
जाई न हो अन्याय अब, चले न्याय का दौर
*
'सलिल' न हो नवजात की, अब कोई नव जात
मानव मानव एक हो, भेद रहे अज्ञात
*
अबला सबला या बला, बतलायेगा कौन?
बजे न तबला शीश पर, बेहतर रहिए मौन
*

shodh: kaaee roke khoon: dr. monika bhatnagar

शोध: 

रक्तस्राव रोके रेगिस्तानी काई : डॉ. मोनिका भटनागर बधाई 
*
अजमेर. थार के मरुस्थल में सहज उपलब्ध काई केवल ५-७ सेकंड में शरीर से बहानेवाले खून को रोककर प्राणरक्षा कर सकती है। डॉ. मोनिका भटनागर ने एस. डी. एम. विश्व विद्यालय अजमेर के शैवाल जैव ईंधन एवं जैव अनुसंधान केंद्र (एल्गी बायोफ्युअल एंड बायोमॉलीक्यूल सेंटर) में शोधकर जाना कि रेगिस्तान में सुलभ हरी नीली काई (टोलियापोथ्रिक्स टेनुईस और एनेबिना की ३ प्रजातियाँ) अपनी कोशिकाओं से १ लीटर घोल में ०. ग्राम से ३. ५ ग्राम तक शर्करा के बहुलक (पॉलीमर) छोड़ते हैंजो ५-७ सेकंड में खून का थक्का जमा देते हैं जबकि काँच पर खून जमने में १२ सेकंड लगते हैं। 

डॉ. मोनिका भटनागर ने बताया कि इस अन्वेषण का प्रयोगकर अधिक खून बहने के कारन होनेवाली मौतें रोकी जा सकेंगी। घावों मई चिकित्सा में शुष्क मलहम-पट्टी (ड्रेसिंग) के स्थान पर अब नम मलहम-पट्टी होगी जो दर्द घटने के साथ घाव का  निशान भी मिटाएगी। जयपुर की डॉ. वीणा शर्मा ने चूहों की त्वचा पर काई-बहुलकों से निर्मित पट्टी का प्रयोग कर प्रयोगकर देखा कि ७२ घंटों बाद भी कोई एलर्जिक प्रतिक्रिया नहीं हुई।चूहों के घाव ६ दिनों में बिना किसी निशान के भर गये जबकि एंटीबायोटिक ऑइंटमेंट लगाने पर घाव भरने में १० दिन लगे। इस खोज से मधुमेह (डायबिटीज) के मरीजों राहत मिलने के साथ घाव के निशाओं की प्लास्टिक सर्जरी करने से भी मुक्ति मिलेगी।

इस खोज हेतु विकास: विश्व कायस्थ समाज के संस्थापक-राष्ट्रीय कायस्थ महापरि षद के महामंत्री संजीव वर्मा 'सलिल' ने नवजीवनदायी खोज के लिये डॉ. मोनिका भटनागर एवं डॉ. वीणा शर्मा को बधाई देते हुए उनके उज्जवल भविष्य की कामना की। 
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रविवार, 10 अगस्त 2014

haiku: sanjiv

हाइकु सलिला:

संजीव
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रक्षाबंधन

निबल को बली का 

दे संरक्षण।
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भाई-बहिन

हैं पौधे के दो फूल

सदा महकें।
*
मन से मन

जोड़ दूरी मिटाता

राखी त्यौहार।
*



kosarnag teerth

 पर्यटन: 
कश्मीर में कौसर या कोणसर नाग झील तीर्थ 

डा० कुलदीप चन्द अग्निहोत्री
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कश्मीर घाटी में अनेक पर्यटन स्थल हैं । कुछ ज़्यादा ज्ञात हैं और कुछ अल्प ज्ञात हैं । इनमें से एक पर्यटन स्थल कुलगाम ज़िले में स्थित कौसर या कोणसर नाग झील है । ध्यान रहे कश्मीर घाटी को नाग भूमि भी कहा जाता है , जिसके कारण घाटी के अनेक तीर्थ पर्यटन स्थलों का नाम नाग  शब्द से मिलता है । यह झील दो मील लम्बी और तक़रीबन आधा मील चौड़ी है । पीर पाँचाल की श्रृंखलाओं में स्थित यह झील समुद्र तल से लगभग चार किलोमीटर की ऊँचाई पर स्थित है । यह तीर्थ स्थल विष्णुपाद  के नाम से भी जाना जाता है । कहा जाता है कि इस स्थल पर भगवान विष्णु के पद चिन्ह विद्यमान हैं । पिछले दिनों जम्मू कश्मीर में सीपीएम के एकमात्र विधायक ने सुझाव दिया था कि कौसर नाग झील को पर्यटनस्थलों के रुप में विकसित किया जाना चाहिए ताकि प्रदेश की आय में वृद्धि हो सके । हिन्दुओं के लिये विष्णु के नाम से सम्बंधित होने के कारण यह स्थान अत्यन्त पवित्र माना जाता है । जुलाई मास में इस तीर्थ स्थान पर पूजा अर्चना के लिए कश्मीर के हिन्दू एकत्रित होते हैं । देश के अन्य स्थानों से भी कुछ थोड़ी संख्या में श्रद्धालु इस तीर्थ यात्रा के लिए आते हैं । लेकिन अब वे सब पुरानी यादें हैं । जब से कश्मीर घाटी पर आतंकवादियों का प्रभाव बढ़ा और राज्य सरकार ने उनके सामने या तो अपनी ही योजना से या फिर विवशता में आत्मसमर्पण कर दिया तब से यह तीर्थ यात्रा बन्द पड़ी है । उसके बाद का अध्याय तो और भी दुखद है । आतंकवादियों ने कश्मीर घाटी में से छह लाख हिन्दू सिक्खों को निकाल बाहर किया और घाटी को मुस्लिम घाटी बनाने में सफलता प्राप्त कर ली ।
उसके बाद से शेख़ अब्दुल्ला परिवार और उनकी पार्टी नैशनल कान्फ्रेंस लगातार घड़ियाली आँसू बहाती रही कि हम हर हालत में हिन्दुओं को घाटी में वापस लाएंगे । पिछले छह साल से जम्मू कश्मीर में सरकार भी नैशनल कान्फ्रेंस की ही है और महरुम शेख़ अब्दुल्ला के पौत्र उमर अब्दुल्ला ही प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं । वे दिन रात अपने अब्बूजान और दादाजान के नाम ले लेकर मीडिया को अपने परिवार के पंथनिरपेक्ष होने के बारे में कहानियाँ सुनाते  रहते हैं और उसी पंथनिरपेक्षता की सुगंध खाकर घाटी में वापिस आ जाने के लिये हिन्दुओं से अपील करते रहते हैं । अब राज्य में चुनाव नज़दीक़ आ गये हैं और उमर अब्दुल्ला व उनकी पार्टी ने जम्मू के हिन्दुओं और लद्दाख के बौद्धों व शियाओं को अपने पक्ष में करने के लिये जाल फेंकना है इसलिये उन्होंने “हिन्दुओं घाटी में लौट आओ ” की माला कुछ ज़्यादा तेज़ी से जपना शुरु कर दी है । कश्मीर घाटी के कुछ हिन्दु सचमुच उनके झाँसे में आ गए । जुलाई का मास आया तो उन्हें कुलगाम के कौसरनाग की परम्परागत तीर्थ यात्रा का ध्यान आया होगा । पच्चीस तीस कश्मीरी हिन्दुओं ने इस बार जुलाई मास में कौसरनाग झील पर पहुँच कर पूजा अर्चना करने का निर्णय किया । वैसे इस पूजा अर्चना के लिये उन्हें राज्य सरकार से अनुमति लेने की जरुरत नहीं थी लेकिन घाटी में आतंकवादियों के प्रभाव को देखते हुये उन्होंने सुरक्षा के लिहाज़ से राज्य सरकार से भी अनुमति प्राप्त कर ली ।
लेकिन जैसे ही ये तीर्थ यात्री पूजा अर्चना के लिये कौसरनाग झील की ओर रवाना होने लगे अलगाव और आतंकवाद के मिले जुले प्रभाव का प्रतिनिधित्व करने वाली हुर्रियत कान्फ्रेंस ने इसका विरोध ही नहीं किया बल्कि आतंकवादियों ने घाटी में बन्द का भी आह्वान कर दिया । इस आह्वान में कश्मीर घाटी की बार एसोसिएशन भी शामिल हो गई । श्रीनगर के कुछ हिस्सों में दुकानें बंद भी रहीं । लेकिन अभी सबसे बड़ा आश्चर्य तो प्रकट होने वाला था । यात्रा के विरोध में तर्क देते हुये हुर्रियत कान्फ्रेंस के नेताओं , जिनमें से अधिकांश सैय्यद हैं , ने कहा कि यात्रा का यह प्रयास घाटी की जनसंख्या अनुपात बदलने का षड्यन्त्र है । ये लोग घाटी में हिन्दुओं की संख्या बढ़ाना चाहते हैं । यह यात्रा घाटी पर हिन्दु सांस्कृतिक आक्रमण है ।
लेकिन कौसरनाग की तीर्थ यात्रा पर जाने वाले इन पच्चीस तीस यात्रियों के मन में अभी भी यह आशा बची हुई थी कि राज्य सरकार उनकी सहायता करेगी और इस यात्रा का विरोध कर रहे अलगाववादियों के इस दुष्प्रयास का खंडन करेगी कि यह यात्रा घाटी पर हिन्दू सांस्कृतिक आक्रमण है और इससे घाटी का जनसंख्या अनुपात बदल जायेगा । परन्तु सबसे बड़ा ताज्जुब तब हुआ जब राज्य सरकार के मुखिया उमर अब्दुल्ला ने ही अलगाववादियों से मुआफ़ी माँगते हुये कहना शुरु कर दिया कि उनकी सरकार ने तो इस यात्रा की अनुमति दी ही नहीं थी । इतना ही नहीं उन्होंने इस यात्रा पर रोक लगा दी । दरअसल इस पूरे घटनाक्रम में आतंकवादियों को दोष दिया जा सकता है, हुर्रियत को ज़िम्मेदार ठहराया जा सकता है लेकिन अब्दुल्ला परिवार के फ़ारूक़ या उनके बेटे उमर को दोषी नहीं ठहराया जा सकता , क्योंकि अब्दुल्ला परिवार अपने जनक शेख़ अब्दुल्ला के समय से ही कश्मीर घाटी को मुस्लिम बहुल बनाने के लिये ही नहीं बल्कि किसी भी तरीक़े से घाटी में से ग़ैर मुसलमानों को बाहर रखा जा सके , इसके लिये प्रयास रह रहा है । शेख़ अब्दुल्ला के अनेक पत्र उपलब्ध हैं जिसमें उन्होंने स्पष्ट कहा है कि वे कश्मीर के मुस्लिम बहुल चरित्र की हर हालत में रक्षा करेंगे और ग़ैर मुसलमानों यदि घाटी में आते हैं तो उन्हें यहाँ बसने नहीं देंगे । यही कारण था कि दिन रात महाराजा हरि सिंह को गालियाँ देने वाले शेख़ ने महाराजा के”राज्य के स्थायी निवासी” के प्रावधान को बहुत बुरी तरह संभाल कर रखा और उसकी आड़ में घाटी में हिन्दु सिखों के आने पर पाबन्दी लगा दी । शेख़ दरअसल कश्मीर को इस्लामी प्रान्त बनाना चाहते थे और उसके लिए वे जीवन भर प्रयासरत रहे । इसे उन्होंने कभी छिपाया भी नहीं । उसी परम्परा का निर्वाह उनका परिवार अभी तक कर रहा है । मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला को कहना तो यह चाहिए था कि कुछ लोग कौसरनाग झील पहुँच कर पूजा अर्चना करते हैं तो यह हिन्दू सांस्कृतिक आक्रमण कैसे हो गया ? उन्हें विरोध तो हुर्रियत की इस ग़ैर भारतीय मानसिकता का और अलगाववादी सोच का करना चाहिए था । लेकिन परोक्ष रुप से वे ख़ुद ही इस गिरोह में शामिल हो गए और इन के पास अपनी सरकार का मुआफीनामा दाख़िल करवाने लगे कि सरकार ने इस तीर्थ यात्रा की अनुमति नहीं दी । वैसे उमर साहिब को हर ज़रुरी ग़ैर ज़रुरी मसले पर ट्वीट यानि चीं चीं करने की आदत है , लेकिन इस बार वे आश्चर्य जनक रुप से चुप्पी साधे हुए हैं । हुर्रियत कान्फ्रेंस जो बातें अब कह रही है , कश्मीर घाटी के बारे में अब्दुल्ला परिवार की नैशनल कान्फ्रेंस पिछले छह दशकों से वही बातें कह रही है । अन्तर केवल इतना है कि हुर्रियत कान्फ्रेंस की बात कहने की शैली अलग है और नैशनल कान्फ्रेंस की बात कहने की शैली अलग है । भाव दोनों का एक ही है ।

शनिवार, 9 अगस्त 2014

विश्व बंधुत्व का महापर्व रक्षाबंधन : संजीव

: विश्व बंधुत्व का महापर्व रक्षाबंधन :
संजीव 
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इस वर्ष इस वर्ष राखी बांधने का शास्त्रोक्त समय (अपरहरण) भद्रा से मुक्त है। रक्षाबंधन अपरान्ह १.३८ बजे से रात्रि ९.११ बजे  तक करें। अपरान्ह १.४५ बजे से ४.२३ बजे तक तथा प्रदोषकाल में संध्या ७.०१ बजे से रात्रि ९.११ बजे तक का समय विशेष शुभ है। भद्रापुच्छकाल प्रातः १०.०८ से ११.०८ भद्रामुख ११.०८ से १२.४८ तथा भद्रा मोक्ष १.३८ तक है। निर्णयसिन्धु के अनुसार:

इदं भद्रायां न कार्यं। भद्रयान द्वे न कर्तव्ये श्रावणी फाल्गुनी तथा 
श्रावणी नृपंति हन्ति ग्रामं दहति फाल्गुनी। इति संग्रहोक्ते 
ततस्त्वे तु रात्रावपि तदन्ते कुर्यादिति निर्णयामृते। 

भद्रा विना चेदपरान्हे तदापरा तत्सवे तु रात्रावप्रीत्यर्थ:

तदनुसार भद्रा में श्रावणी राजा (प्रमुख) का नाश तथा फाल्गुनी ग्राम (गृह) का दहन करती है. लोकश्रुति है कि लंकापति रावण ने भद्रा में अपनी बहिन चंद्रनखा (शूर्पणखा) से राखी बनवाई थी और एक वर्ष के अंदर उसका तथा लंका का नाश हो गया था. अत: भद्रा के पश्चात ही (भले ही रात्रि में) रक्षाबंधन करें। अपरिहार्य परिस्थिति में भद्रापुच्छकाल में रक्षासूत्र बंधन किया जा सकता है  किन्तु भद्रामुख काल में राखी कदापि न बांधें।

रक्षा बंधन के पूूर्व स्नान कर शुभ मुहूर्त में भगवान को राखी समर्पित करें। बहिन भाई-भाभी के मस्तक पर जल सिंचन कर चन्दन, हल्दी, रोली, अक्षत,पुष्प से तिलककर दाहिने हाथ की कलाई में रक्षा बंधन मंत्र- 'येनबद्धो  बलि: राजा दानवेन्द्रो महाबल: तेन त्वामभिबध्नामि रक्षे मा चालमाचल' पढ़ते हुए राखी बाँधे, मिठाई खिलाये तथा ईश्वर से उनकी विजय की कामना करे। भाई-भाभी बहन-नन्द को यथाशक्ति उपहार (शुभ वस्तुएँ वस्त्र, आभूषण, ग्रन्थ आदि) देकर चरणस्पर्श करें तथा वचन दें कि आजीवन उसके सहायक होकर रक्षा करेंगे।

भारतीय संस्कृति में पर्वो और महोत्सवों का महत्व सर्वविदित है। ऋतु परिवर्तन, उदात्त मूल्य संस्थापन तथा विश्व साहचर्य पर्वों को मनाने के प्रमुख कारक रहे हैं। श्रावणी पूर्णिमा को श्रवण नक्षत्र में प्रात:काल से दो प्रहर छोड़कर मनाया जानेवाला रक्षाबंधन (राखी) पर्व उक्त तीनों दृष्टियों से महत्त्वपूर्ण है।इस दिन स्नान-ध्यानादि से निवृत्त होकर बहिनें भाई के मस्तक पर तिलक कर दाहिनी कलाई पर रक्षा सूत्र बाँधकर, मिष्ठान्न खिलाकर उसकी दीर्घायु तथा विजय की कामना करती हैं और भाई बहिन की रक्षा कर हर स्थिति में साथ निभाने का वचन तथा उपहार देता है।आरम्भ में यह पर्व केवल भाई-बहिन तक सीमित नहीं था। विप्र तथा सेवक अपने यजमान तथा स्वामी को रक्षासूत्र बाँधकर दक्षिणा व संरक्षण प्राप्त करते हैं। 

पौराणिक / ऐतिहासिक गाथाएँ:

स्कंदपुराण, पद्मपुराण तथा श्रीमद्भागवत में वामनावतार प्रसंग के अनुसार दानवेन्द्र राजा बलि का अहंकार मिटाकर उसे जनसेवा के सत्पथ पर लाने के लिए भगवान विष्णु ने वामन रूप धारणकर भिक्षा में ३ पग धरती मांग कर तीन पगों में तीनों लोकों को नाप लिया तथा बलि  अनुसार उसके मस्तक पर चरणस्पर्श कर उसे रसातल भेज दिया। बलि ने भगवान से सदा अपने समक्ष रहने का वर माँगा। नारद के सुझाये अनुसार इस दिन लक्ष्मी जी ने बलि को रक्षासूत्र बाँधकर भाई माना तथा विष्णु जी को वापिस प्राप्त किया।      

विष्णुपुराण के अनुसार श्रावण पूर्णिमा को भगवान विष्णु ने विद्या-बुद्धि के प्रतीक हयग्रीव का अवतार लेकर भगवान ब्रम्हा के लिए वेदों को पुनः प्राप्त किया था। गुरुपूर्णिमा को प्रारम्भ अमरनाथ यात्रा का समापन श्रवण पूर्णिमा को होता है तथा हिमानी (बर्फानी) शिवलिंग पूर्ण होता है जिसका दिव्य अभिषेक किया जाता है।

भविष्योत्तर पुराण के अनुसार देव-दानव युद्ध में इंद्र की पराजय सन्निकट देख उसकी पत्नी शशिकला (इन्द्राणी) ने तपकर प्राप्त रक्षासूत्र श्रवण पूर्णिमा को इंद्र की कलाई में बाँधकर उसे इतना शक्तिशाली बना दिया की वह विजय प्राप्त कर सका।

गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं- 'मयि सर्वमिदं प्रोक्तं सूत्रे मणिगणा इव' अर्थात जिस प्रकार सूत्र बिखरे हुए मोतियों को अपने में पिरोकर माला के रूप में एक बनाये रखता है उसी तरह रक्षासूत्र लोगों को जोड़े रखता है।  प्रसंगानुसार विश्व में जब-जब नैतिक मूल्यों पर संकट आता है भगवान शिव प्रजापिता ब्रम्हा द्वारा पवित्र धागे भेजते हैं जिन्हें बाँधकर बहिने भाइयों को दुःख-पीड़ा से मुक्ति दिलाती हैं।भगवान कृष्ण ने महाभारत युद्ध में विजय हेतु युधिष्ठिर को सेना सहित रक्षाबंधन पर्व मनाने का निर्देश दिया था। 

संप्राप्ते श्रावणस्यान्ते पौर्णमास्या दिने-दये
स्नानंकुर्वीत मतिमान श्रुति-स्मृति विधानतः 
उपाकरमोदिकं प्रोक्तमृषीणां चैव तर्पणं 
शूद्राणां मंत्ररहितं स्नानं दानं प्रशस्यते 
उपाकर्माणि कर्तव्य मृषीणां चैव पूजनं  
ततोsपरान्हसमये रक्षापोटलिकां शुभां 
कारयेदक्षतेशस्तैः सिद्धार्थेर्हेमभूषितैः।  इति 

अत्रोपाकर्मान्तरस्य पूर्णातिथावार्थिकास्योनुवादो न तु विधिः 
गौरवात प्रयोगविधिभेदेन क्रमायोगाच्छुद्रादौ तदयोगाच्च 
तेन परेद्युरूपाकरणेsपि पूर्वेद्युरपरान्हे तत्करणं सिद्धं   

राष्ट्रीय पर्व:

उत्तरांचल में इसे श्रावणी कहा जाता है तथा यजुर्वेदी विप्रों का उपकर्म (उत्सर्जन, स्नान, ऋषितर्पण आदि के पश्चात नवीन यज्ञोपवीत धारण किया जाता है.) राजस्थान में रामराखी (लालडोरे पर पीले फुंदने लगा सूत्र) भगवान को, चूड़ाराखी (भाभियों को चूड़ी में) या लांबा (भाई की कलाई में) बांधने की प्रथा है. मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ आदि में बहनें शुभ मुहूर्त में भाई-भाभी को तिलक लगाकर राखी बांधकर मिठाई खिलाती तथा उपहार प्राप्त कर आशीष देती हैं. महाराष्ट्र में इसे नारियल पूर्णिमा कहा जाता है. इस दिन समुद्र, नदी तालाब आदि में स्नान कर जनेऊ बदलकर वरुणदेव को श्रीफल (नारियल) अर्पित किया जाता है. उड़ीसा, तमिलनाडु व् केरल में यह अवनिअवित्तम कहा जाता है. जलस्रोत में स्नानकर  यज्ञोपवीत परिवर्तन व ऋषि का तर्पण किया जाता है. 
रक्षा बंधन पर बहिन को पाती:
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बहिन! शुभ आशीष तेरा, भाग्य का मंगल तिलक
भाई वंदन कर रहा, श्री चरण का हर्षित-पुलक

भगिनियाँ शुचि मातृ-छाया, स्नेहमय कर हैं वरद
वृष्टि देवाशीष की, करतीं सतत- जीवन सुखद

स्नेह से कर भाई की रक्षा उसे उपकारतीं
आरती से विघ्न करतीं दूर, फिर मनुहारतीं

कभी दीदी, कभी जीजी, कभी वीरा है बहिन
कभी सिस्टर, भगिनी करती सदा ममता ही वहन

शक्ति-शारद-रमा की तुझमें त्रिवेणी है अगम
'सलिल' को भव-मुक्ति का साधन हुई बहिना सुगम

थामकर कर द्वयों में दो कुलों को तू बाँधती
स्नेह-सिंचन श्वास के संग आस नित नव राँधती

निकट हो दूर, देखी या अदेखी हो बहिन
भाग्य है वह भाई का, श्री चरण में शत-शत नमन 
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Sanjiv verma 'Salil'
salil.sanjiv@gmail.com
http://divyanarmada.blogspot.in

शुक्रवार, 8 अगस्त 2014

rakhi, doha, alankar -sanjiv

दोहा सलिला:                                                                                 
अलंकारों के रंग-राखी के संग
संजीव 'सलिल'
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राखी ने राखी सदा, बहनों की मर्याद.
संकट में भाई सदा, पहलें आयें याद..
राखी= पर्व, रखना.
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राखी की मक्कारियाँ, राखी देख लजाय.
आग लगे कलमुँही में, मुझसे सही न जाय..
राखी= अभिनेत्री, रक्षा बंधन पर्व.
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मधुरा खीर लिये हुए, बहिना लाई थाल.
किसको पहले बँधेगी, राखी मचा धमाल..
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अक्षत से अ-क्षत हुआ, भाई-बहन का नेह.
देह विदेहित हो 'सलिल', तनिक नहीं संदेह..
अक्षत = चाँवल के दाने,क्षतिहीन.
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रो ली, अब हँस दे बहिन, भाई आया द्वार.
रोली का टीका लगा, बरसा निर्मल प्यार..
रो ली= रुदन किया, तिलक करने में प्रयुक्त पदार्थ.
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बंध न सोहे खोजते, सभी मुक्ति की युक्ति.
रक्षा बंधन से कभी, कोई न चाहे मुक्ति..
बंध न = मुक्त रह, बंधन = मुक्त न रह
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हिना रचा बहिना करे, भाई से तकरार.
हार गया तू जीतकर, जीत गयी मैं हार..
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कब आएगा भाई? कब, होगी जी भर भेंट?
कुंडी खटकी द्वार पर, भाई खड़ा ले भेंट..
भेंट= मिलन, उपहार.
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मना रही बहिना मना, कहीं न कर दे सास.
जाऊँ मायके माय के, गले लगूँ है आस..
मना= मानना, रोकना.
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गले लगी बहिना कहे, हर संकट हो दूर.
नेह बर्फ सा ना गले, मन हरषे भरपूर..
गले=कंठ, पिघलना.
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जन्म कुंडली :

जन्म कुंडली :



पहला घर : लग्नेश : शरीर, वर्ण, चिन्ह, आयु, कद, सुख-दुख, जाति, कुल आदि.
दूसरा घर : धनेश : संपत्ति सेवक, वाहन, दाहिनी आँख, गला, मुख आदि.
तीसरा घर : पराक्रमेश : स्वजन, बल, भाई-बहिन, मित्र, पड़ोसी, दास आदि.
चौथा घर : सुखेश : पैतृक संपत्ति, वाहन, माता-पिता आदि.
पाँचवाँ घर : पुत्रेश : पुत्र, शिष्य, नीति, विचार, शक्ति आदि.
छठवाँ  घर : रोगेश : शत्रु, रोग, पशु, मां, कष्ट, घाव, चोट आदि.
सातवाँ घर : जायेश : जीवन संगी, विवाह, वाद-विवाद, यात्रा, मृत्यु आदि.
आठवाँ घर : रन्ध्रेश : आयु, मृत्यु समय कारण, चोरी, संकट, ऋण आदि.
नौवाँ घर : भाग्येश : धर्म, परोपकार, दान, तीर्थ आदि.
दसवाँ घर : राज्येश : कर्म, आजीविका, कृषि, स्वामित्व आदि.
ग्यारहवाँ घर : लाभेश : धन, संतोष, अग्रज आदि.
बारहवाँ घर : व्ययेश : धनद, दुर्गति, खर्च, पतन, विवाद आदि.