गुरुवार, 1 मई 2014

chhand salila: radhika chhand -sanjiv


छंद सलिला:
राधिका छंद
संजीव
*
छंद-लक्षण: जाति महारौद्र लोक , प्रति चरण मात्रा २२ मात्रा, यति १३ - ९ ।


छंद सलिला:
राधिका छंद
संजीव
*
छंद-लक्षण: जाति महारौद्र , प्रति चरण मात्रा २२ मात्रा, यति १३ - ९ ।

लक्षण छंद:
   सँग गोपों राधिका के  / नंदसुत - ग्वाला
   नाग राजा महारौद्र  / कालिया काला
   तेरह प्रहार नौ फणों / पर विष न बाकी
   गंधर्व किन्नर सुर नरों / में कृष्ण आला   
*
राधिका बाईस कला / लख कृष्ण मोहें
तेरह - नौ यति क़ृष्ण-पग / बृज गली सोहें
भक्त जाते रीझ, भय / से असुर जाते काँप
भाव-भूखे कृष्ण कण / कण जाते  व्याप
                                                                                                                     
उदाहरण:
१. जब जब जनगण ने फ़र्ज़ / आप बिसराया
    तब तब नेता ने छला / देश पछताया
    अफसर - सेठों ने निजी / स्वार्थ है साधा
    अन्ना आंदोलन बना / स्वार्थ पथ-बाधा
    आक्षेप और आरोप / अनेक लगाये
    जनता को फ़िर भी  दूर / नहीं कर पाये

२. आया है आम चुनाव / चेत जनता रे
     मतदान करे चुपचाप / फ़र्ज़ बनता रे
     नेता झूठे मक्कार / नहीं चुनना रे
     ईमानदार सरकार / स्वप्न बुनना रे 
 
३. नारी पर अत्याचार / जहाँ भी होते
    अनुशासन बिन नागरिक / शांति-सुख खोते
     जननायक साधें स्वार्थ / न करते सेवा
     धन रख विदेश में खूब / उड़ाते मेवा
     गणतंत्र वहाँ अभिशाप / सदृश हो जाता
     अफसर  -सेठों में जुड़े / घूस का  नाता
     अन्याय न्याय का  रूप / धरे पलता है
     विश्वास - सूर्य दोपहर / लगे ढलता है 

४. राजनीति कोठरी, काजल की कारी
   हर युग हर काल में, आफत की मारी
   कहती परमार्थ पर, साधे सदा स्वार्थ
   घरवाली से अधिक, लगती है प्यारी

५. बोल-बोल थक गये, बातें बेमानी
    कोई सुनता नहीं, जनता है स्यानी
    नेता और जनता , नहले पर दहला
    बदले तेवर दिखा, देती दिल दहला
 
६. कली-कली चूमता, भँवरा हरजाई
    गली-गली घूमता, झूठा सौदाई
    बिसराये वायदे, साध-साध कायदे
    तोड़े सब कायदे, घर मिला ना घाट

                         *********
टीप राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त जी ने साकेत में राधिका छंद का प्रयोग किया है.

    हा आर्य! भरत का भाग्य, रजोमय ही है,
    उर रहते उर्मि उसे तुम्हीं ने दी है.
    उस जड़ जननी का विकृत वचन तो पाला
    तुमने इस जन की ओर न देखा-भाला।
          ******************************

(अब तक प्रस्तुत छंद: अखण्ड, अग्र, अचल, अचल धृति, अरुण, अहीर, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रवज्रा, उपेन्द्रवज्रा, उल्लाला, एकावली, कुकुभ, कज्जल, कामिनीमोहन, कीर्ति, कुडंली, गंग, घनाक्षरी, चौबोला, चंडिका, चंद्रायण, छवि, जाया, तांडव, तोमर, त्रिलोकी, दीप, दीपकी, दोधक, नित, निधि, प्लवंगम्, प्रतिभा, प्रदोष, प्रेमा, बाला, भव, भानु, मंजुतिलका, मदनअवतार, मधुभार, मधुमालती, मनहरण घनाक्षरी, मनमोहन, मनोरम, मानव, माली, माया, माला, मोहन, योग, ऋद्धि, राजीव, राधिका, रामा, लीला, वाणी, विशेषिका, शक्तिपूजा, शशिवदना, शाला, शास्त्र, शिव, शुभगति, सरस, सार, सिद्धि, सुगति, सुजान, हेमंत, हंसगति, हंसी)
।। हिंदी आटा माढ़िये, उर्दू मोयन डाल । 'सलिल' संस्कृत सान दे, पूरी बने कमाल ।।


          ******************************



कोई टिप्पणी नहीं: