रविवार, 20 मार्च 2011

आओ खेलें होली ऐसे -- सुश्री आशा वर्मा

आओ खेलें होली ऐसे 

सुश्री आशा वर्मा
*
आओ खेलें होली ऐसे.
अब तक कभी न खेली जैसे...
*
हरा रंग हरियाली लाये,
कोइ पेड़ न कटने पाये.
घर-घर पौधे नए लगायें.
पीपल, इमली, नीम उगायें.
शीतल छाया का सुख पायें.
प्राण वायु से जीवन पायें.
वर्षा बढ़े सुखी हो जाएँ.
तन-मन झूमे खुशी मनायें.
धरती हो नंदन वन जैसे...
*
लाल रंग अनुराग बढ़ायें.
हेल-मेल का पथ पढ़ायें.
सब धर्मों के भाई आयें.
एक-दूजे को गले लगायें.
भाषा-भूषा-भेद भुलायें.
ऊँच-नीच को दूर भगाये.
प्रेम-प्यार से फगुआ गायें.
समता-रंग में भीग नहायें.
दूर करेगा कोई कैसे?...
*
पानी तनिक न व्यर्थ बहायें.
कचरे की होली दहकायें.
ढोल, मंजीरा, झांझ बजायें.
गुझिया, सेव, पपड़ियाँ खायें.
भंग भवानी परे हटायें. 
ठण्डाई मिल पियें पिलायें.
सदा प्राकृतिक रंग बनायें.
फिर पिचकारी खूब चलायें.
एक्य-भाव सुदृढ़ हो जैसे
आओ होली खेलें ऐसे...

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1 टिप्पणी:

डॉ० डंडा लखनवी ने कहा…

प्रशंसनीय.........लेखन के लिए बधाई।
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देश को नेता लोग करते हैं प्यार बहुत?
अथवा वे वाक़ई, हैं रंगे सियार बहुत?
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होली मुबारक़ हो। सद्भावी -डॉ० डंडा लखनवी